>
> भारतीय कुष्ठ निवारक संघ
>
> छत्तीसगढ़ में बिलासपुर के पास चांपा नाम का एक नगर है. हाल ही में वह
> जिला बना है. वहॉं, भारतीय कुष्ठ निवारक संघ, नाम की, कुष्ठरोगियों की
> सेवा करने वाली संस्था है.
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> सदाशिव गोविंद कात्रे जी ने १९६२ में यह संस्था स्थापन की है. कात्रे जी
> स्वयं कुष्ठरोगी थे. रेल विभाग में कर्मचारी थे. वे एक ईसाई मिशनरी
> अस्पताल से रोगमुक्त हुए थे. वहॉं उन्होंने रोग-मुक्ति के साथ ही ईसाई
> धर्म का प्रसार कैसे चलता है यह देखा था. उस समय के सरसंघचालक प. पू.
> श्री गुरुजी से कात्रे जी का घनिष्ठ परिचय था. श्री गुरुजी की प्रेरणा से
> उन्होंने भारतीय कुष्ठ निवारक संघ की स्थापना की.
>
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> इस संस्था की कुछ खास विशेषताएँ :
>
> १) यहॉं कुष्ठरोगी की जाति, संप्रदाय का विचार न कर, सब पर उपचार किया
> जाता है. आज यहॉं १३६ रुग्ण है, उनमें ८६ मतलब ६० प्रतिशत से अधिक महिला
> है.
>
> २) यह संघ अपने काम का ढिंढोरा नहीं पिटता. उसका कहीं भी विज्ञापन नहीं
> रहता. उसका प्रचार-प्रसार वे ही लोग करते हैं, जो यहॉं उपचार लेकर
> रोगमुक्त हुए है. इस संस्था को दान देने वालों में भी अधिकतर यहॉं से
> रोग-मुक्त हुए लोगों का ही समावेश है.
>
> ३) यह कुष्ठ निवारक संघ चार मुख्य बातों पर जोर देता है. (अ) रुग्णों पर
> उपचार (आ) उनका पुनर्वसन (इ) उनकी शिक्षा और (ई) स्वावलंबन.
>
> ४) सब रुग्णों को नि:शुल्क भोजन, कपड़े और दवा दी जाती है. कुछ रुग्ण अपने
> परिवार के साथ यहॉं रहते हैं.
>
> ५) रुग्णों को ऍलोपॅथी के साथ होमिओपॅथी दवा भी दी जाती है. डॉ. ध्रुव
> चक्रवर्ती होमिओ उपचार करते है. वे कहते है ऍलोपॅथी दवाओं से रोग ठीक
> होता है, लेकिन कुष्ठरोग के कारण हुए घाव पूरी तरह से ठीक नहीं होते.
> होमिओ दवाओं से १५ प्रतिशत रुग्णों के घाव पूरी तरह से ठीक हुए है.
>
> ६) भा. कु. नि. संघ रुग्णों के स्वस्थ बच्चों के लिए एक विद्यालय और
> छात्रावास भी चलाता है. यह बच्चें छत्तीसगढ़, ओडिशा, झारखंड, मध्य प्रदेश
> और उत्तर प्रदेश के हैं. छात्रावास में ११० बच्चें रहते हैं और विद्यालय
> में १५१ विद्यार्थी हैं.
>
> ७) संस्था की एक गोशाला भी है. वह पंजीकृत है. उसे सरकारी अनुदान भी
> मिलता है. आज गोशाला में १२० पशु है. उनके गोबर से जैविक खाद और बायोगॅस
> की निर्मिति की जाती है. रुग्णों के उपचार के लिए भी गोमूत्र का प्रयोग
> शुरू हुआ है.
>
> ८) संघ की अपनी ७० एकड़ जमीन है. करीब ३५० लोगों - यहॉं के रुग्ण, उनके
> रिश्तेदार, और संघ के कार्यकर्ताओं - के लिए इस खेती से उत्पदित अनाज
> पर्याप्त होता है.
>
> ९) सन् २००४ में छत्तीसगढ़ सरकार की ओर से भा. कु. नि. संघ को महाराज
> अग्रसेन के नाम का पुरस्कार प्राप्त हुआ. तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री
> अटलबिहारी बाजपेयी के हस्ते वह प्रदान किया गया था.
>
> १०) यह परिसर अब 'कात्रे नगर' नाम से जाना जाता है. यह एक नया नगर ही बन
> गया है. चांपा का एक प्रसिद्ध उपनगर; और उसका 'कात्रे नगर' नाम भी
> पूर्णत: यथार्थ है.
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> बिना हाथ का कारीगर!
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> तमिलनाडु में तिम्माचन्द्र नाम का एक छोटा गॉंव है. वहॉं तिमारायप्पा नाम
> का एक ४५ वर्ष का आदमी रहता है. वह इस क्षेत्र में बहुत ही लोकप्रिय है.
> और उसकी इस लोकप्रियता का कारण है उसकी बढ़ई काम में की कुशलता. आप
> सोचेंगे इसमें विशेष क्या है? विशेष यह है कि तिमारायप्पा को जन्म से ही
> हाथ नहीं है. लेकिन वह खेती के लिए उपयुक्त औजार बनाता है. उसके पास भी
> थोडी खेती है. उस खेती में वह काम करता है. पेड़ों के लिए गड्डे खोदना,
> पेड़ तोडना, नारियल के पेड़ पर चढ़ना आदि सब काम वह करता है. लेकिन केवल
> अपने पावों के भरोसे. आश्चर्य यह की उसका विवाह भी हुआ है. उसकी पत्नी
> का नाम है धीमाक्का. शादी के समय, पंडित ने उससे कहा, मंगलसूत्र का एक
> छोर तुम दॉंत से पकड़ो, दूसरा छोर मैं (पंडित स्वयं) पकड़ूंगा और मंगलसूत्र
> पत्नी के गले में ड़ाला जाएंगा. लेकिन तिमारायाप्पा ने यह मान्य नहीं
> किया. उसने अपने पावों से दुल्हन के गले में मंगलसूत्र पहनाया!
>
> (३ सितंबर २०१२ के 'डेक्कन क्रॉनिकल' के समाचार पर आधारित)
>
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> इटालियन
> संस्कृत पंडित
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> ३ अगस्त को पुदुचेरी (पुराने पॉंडेचेरी) की वेद पाठशाला में एक दीक्षा
> समारोह हुआ. दीक्षा मतलब हिंदू धर्म की दीक्षा. दीक्षा लेने वाले सब २३
> लोग इटली के थे. मुख्य यह कि कॅथॉलिक चर्च के सर्वश्रेष्ठ अधिकारी पोप की
> राजधानी - 'व्हॅटिकन' के थे. यह दीक्षा-विधि तीन घंटे चला; और मंत्र
> पढ़ने वाले भी इटॅलियनही थे.
>
> इस सब के लिए कारण बना फ्लॅवियो नाम का एक इटॅलियन व्यक्ति. वह हिंदूओं
> की जीवनशैली से प्रभावित हुआ. वह २००१ में राजा शास्त्रीगल के संपर्क में
> आया. शास्त्रीगल व्हेटिकन गये थे; उनका वहॉं तीन माह मुकाम था. उस दौरान
> उन्होंने फ्लॅवियो और उनकी पत्नी स्टॅपेनो को संस्कृत सिखाई. वेदों में
> की ॠचाओं का पठन भी सिखाया. फिर दस-ग्यारह वर्षों में इस दम्पत्ति को
> अनेक अनुयायी मिलें. वे भी हिंदुओं की अध्यात्म विद्या से प्रभावित हुए.
>
> इस दीक्षा समारोह में कुछ लोग ही उपस्थित थे. इन इटॅलियनों ने रुद्र चमक,
> रुद्र जप, श्रीसूक्त का शुद्ध पारंपरिक पद्धति से पठन किया, इससे उपस्थित
> लोग चकित हुए. फ्लॅवियो और स्टॅपनों ने अपने मूल नाम भी बदले है. वे अब
> क्रमश: चिदानंद सरस्वती और सावित्री हो गए है.
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> 'शक्तिसुरभि' कन्याकुमारी के
> विवेकानंद केन्द्र का उपक्रम
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> कन्याकुमारी का विवेकानन्द केन्द्र उसके शिक्षा और सेवा प्रकल्पों के लिए
> प्रसिद्ध है. यहॉं उसका स्मरण होने का कारण है उन्होंने निर्माण किया हुआ
> कचरे से बायोगॅस निर्माण करने का प्लॉंट.
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> इस प्लॉंट का नाम भी बहुत अच्छा है 'शक्तिसुरभि'. इसका अर्थ है शक्ति का
> सुगंध. करीब २५ वर्ष, केन्द्र ने इस प्रयोग पर काम किया है. शेष अन्न
> (शाकाहारी और मांसाहारी), सब्जियों के अवशेष (दंठल, पत्ते आदि), चक्की
> में का फेका जानेवाला माल, नीम, जट्रोफा जैसे अखाद्य तेलों की खली का इस
> प्रकल्प में उपयोग किया जाता है. एक घन मीटर का प्लँट बनाने के लिए करीब
> ५ किलो कचरे की आवश्यकता होती है; और उससे ०.४३ किलो गॅस मिलता है.
>
> बायोगॅस, मतलब जैविक गॅस की यह संकल्पना अब पुरानी हो गई है. लेकिन, उसके
> निर्मिति की लागत और गोबर के पूर्ति की समस्या के कारण, वह लोकप्रिय नहीं
> हुई. 'शक्तिसुरभि' के लिए आवश्यक कच्चा माल बहुत ही सस्ता मिलता है.
> लेकिन सस्ती किमत इतना ही उसका गुण नहीं है. सडने वाले कचरे का निपटारा
> भी यह प्लँट करते है. कोई दुर्गंध नहीं आती और मक्खियों का भी उपद्रव
> नहीं होता. गॅस निकलने के बाद जो द्रव बचता है उससे भी अच्छी खाद बनती
> है. १०० घन मीटर का बायोगॅस प्लँट ५ किलोवॅट ऊर्जा निर्माण करता है और एक
> परिवार को, उसकी आवश्यकताएं पूर्ण करने के लिए, बीस घंटे ऊर्जा उपलब्ध
> कराता है.
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> दस मिनट में २५ हजार रोटियॉं!
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> गुजरात में के कवडीबाई कन्या विद्यालय की १२०० छात्राओं ने १० मिनट में
> २५ हजार रोटियॉं बनाई!
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> बात यों हुई की, एक पालक उनकी लड़की को शाला में दाखिल कराने के लिए आये
> थे. वे शाला की मुख्याध्यापिका से मिले. उन्होंने कहा, ''आपकी शाला अच्छी
> है. मेरी लड़की होशियार है. उसे ८६ प्रतिशत गुण मिले है. लेकिन, उसे रोटी
> बनाने में कोई रुचि नहीं. लड़कियों के शिक्षित होने से हम पालक खुश होते
> है. लेकिन शादी के बाद उन्हें रोटी बनाना नहीं आया, तो उनकी स्थिति बहुत
> असुविधाजनक होती है. इसके लिए आप कोई हल खोजें.''
>
> मुख्याध्यापिकाने उनकी बात गंभीरता से ली. छात्राओं से कहा कि, रोटियॉं
> कैसे बनाई जाती है, यह घर से सीखकर आए. छात्राओं ने रोटी बनाना सीखा. और
> फिर एक दिन १२०० लड़कियों की परीक्षा ली गई.
>
> प्रत्येक छात्रा को २५० ग्रॅम आटा दिया गया. रोटी का व्यास ५ से ७ इंच
> रखने के लिए कहा. समय केवल दस मिनट दिया गया. इतने समय में १२०० लड़कियों
> ने २५ हजार रोटियॉं बनाई. इसके लिए तीन क्विंटल आटा और १० किलो घी लगा.
> शाला ने यह रोटियॉं, शहर के दवाखानों में दाखिल रुग्णों में बॉंट दी.
>
> आपको नहीं लगता की यह घटना उल्लेखनीय है!
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> ५३ करोड़
> पुस्तकें बेची
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> एक संस्था ने ५३ करोड़ पुस्तकों की बिक्री की है. एक वर्ष में नहीं! ९०
> वर्षों में. इस संस्था की स्थापना को ९० वर्ष हुए है. प्रति वर्ष की
> बिक्री का हम औसत निकाल सकते है. लेकिन वह गलत भी हो सकता है. क्योंकि गत
> एक वर्ष में ही ढाई करोड़ पुस्तकें बेची गई है.
>
> इस प्रकाशन संस्था का नाम है 'गीता प्रेस, गोरखपुर'. हमारे मतलब हिंदू
> धर्म की पुस्तकें मुद्रित करना और बेचना यह गीता प्रेस का ध्येय है. केवल
> लाभ कमाना ध्येय नहीं होने के कारण, बाजार मूल्य की तुलना में वह बहुत
> सस्ती रहती है. संस्था, अपने पुस्तकों का विज्ञापन नहीं करती. लेकिन उसका
> कर्तृत्व अब सर्वपरिचित है.
>
> सब कर्मचारियों के लिए एक सादा नियम है. काम शुरू करने के पूर्व हाथ-पॉंव
> धोने चाहिए और 'रामधून' गानी चाहिए. उसके बाद ही काम का प्रारंभ. गत ९०
> वर्षों से यह नियम चल रहा है.
>
>
>
> -मा. गो. वैद्य
>
> (अनुवाद : विकास कुलकर्णी)
>
> babujivaidya@gmail.com
"Hindi Bhashya from M G Vaidya"
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