Vidhu

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"औरत" पत्रिका का आठ वर्षों से संपादन... "मैं शताब्दी के छोर पर खड़ा देख रहा/रही हवा की हिल्लोर मैं तिरता एक पत्ता, जान लो अभी कोई एक पृष्ट अपनी आशा मैं अक्षुण, यहाँ से कुछ भी जन्म ले सकता है..." (-राईनैर मारिया रिल्के) सन्दर्भ - खंदक मैं अकेला पड़ा सैनिक "रिल्के" की कवितायें पढता है, एक हाथ मैं मारक बन्दूक थामे और दूसरे हाथ से सतरंगी तितली पकड़ने की आरजू में हाथ बाहर निकलने पर; दन से गोली लग जाने पर मर जाने वाला सिपाही भी तो कवि था...

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