Ravindra Ranjan

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भटकता हूँ अक्सर विषय की तलाश में, सोचता हूँ लिखूं कुछ खास अंदाज़ में, विधाओं की जोड़ दूं कुछ अनजुडी लडियां, लेकिन जुड़ नहीं पातीं आपस में सब कड़ियाँ, करता हूँ बार-बार कविता का छंदों से श्रृंगार, टूट जातीं हैं, समेटता हूँ, संभालता हूँ हर बार, कुछ लिखूं, जो हो अब तक से बेहतर, औरों से कुछ…हटकर। सीखना चाहता हूँ दर्द सहना, चुप रहना. वक्त की ऊंची-नीची राहों पर, जो साबित ना हो जाये बौना, चाहूँगा कुछ ऐसा कहना. -रवींद्र रंजन (9873908854)

Which do you prefer and why: whittling with soap or whistling with wood?

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