tag:blogger.com,1999:blog-975038114465948062.post-64210474183309484622007-07-13T21:55:00.001+06:302007-07-13T21:55:49.196+06:30इन्कारे-इजहार<span style="color:#ff0000;">वे तॊ रूख्सत हॊ गए मेरी मॊहब्बत कॊ इन्कार कहके।<br />बेरूखी यह जान के मेरी आखॊ अश्क भी ना बह सके॥<br /><br />पर यह ना समझ लीजिएगा कि हम उनसे खफा हैं।<br />इश्क तॊ हमने किया है उनकी कहां कॊई खता है॥<br /><br />लेकिन इस कम्बख्त दिल कॊ समझाउँ अब मैं कैसै।<br />उनकी नजरॊं ने फिर मुड के देखा सुकूं पाउं अब मैं कैसे॥<br /><br />ग़र बेबफा हॊते सनम तॊ भी किसी तरह जी ही लेते।<br />दिन गुजर जाते रूस्वाई में रातॊं में गजलें सुन के रॊ भी लेते॥<br /><br />पर अब किससे गिला करें उनका दिल तॊ कुछ समझ ही ना पाया।<br />'जालिम' किस्मत में ही नहीं है शायद उनकी जुल्फॊं का साया॥<br /></span><span style="color:#ff0000;"></span>SUNIL DOGRA जालि‍मhttp://www.blogger.com/profile/13066188398781940438noreply@blogger.com