tag:blogger.com,1999:blog-9692244.post-1108440716994686192005-02-14T21:38:00.000-06:002005-02-14T22:35:20.220-06:00क्यों आया प्यार का मौसम?<font size=3><br />भारी जबरदस्ती है साली - रूमानी हो जावो! अंतर्यामिणी ने एक से ज्यादा बार इंगित किया की सहेलियां अपने अपने मियाँ के साथ इधर-उधर इस-उस रेस्त्राँ जा कर वेलेन्टाईन डे "एन्जाय" करेंगी.. हम भी अड चुके हैं - बोल दिए, सब अगर IE पे सर्फ़िंग करते हैं तो हम जवानी में कभी नेटस्केप पे थे आज फ़ायर-फ़ाक्स पर हैं. सारा हिंदुस्तान गोरा बनने के चक्कर में इन्गलिस इस्पीकीन इस्कूल जा रिया है और हम हरा पत्ता ले के राग हिंदिनी में अलाप रहे हैं, हमारी तो बस्स उलटबन्सी ही बजेगी - भाड मे गया साला वेलेन्टाईन-फ़ेलेन्टाईन! भैंस दी टँग्ग!! हमने अगर वोही किया जो सबने किया तो हम हम कैसे?? हम अपनी वाली चला कर ही रहेंगे. ये अपना अट्टेंशन पाने और अपने आपको non-confirmist, लकीर से हट के अपनी लकीर बनाने का कीडा है जिसका कुलबुलाना हमें हमारे अस्तित्व का अहसास करवाता - ये अपना मूल-स्वाभाव है, ऐसा ही हूं मै - अब कर लो जो करते बने! <br /><br />हद हो गई यार, हम साल के ३६४ दिन रूमानी रह सकते हैं पर उस एक नही जब हमसे रूमनी होने की अपेक्षा की जावे, अपन ने पत्रिकाओं मे नुस्खे पढ कर और सेट-अप सजा कर मुहब्बत नही की, आए बात समझ मे तो ठीक वर्ना जो होगा देखी जाएगी, आज तो हो लेने दो सब्जी मे नमक तेज - कसम भगत सिंह की खुन्नस में आज मेरे प्यारे म्युज़िक सिस्टम पे भजन, दर्द भरे नगमे "ना किसी की आँख का नूर हूँ" और आएमे डीस्को डांसर जैसे फ़्लाप मिथुनी गीत बजा रहा हूँ! <br /><br />और आप मे से जो जो किसी भी सामाजिक और भावनात्मक दबाव में रुमानी हुआ है और जबरिया फ़ूल-चाकलेट ले कर घर आया - तुम्हारा मेरा दुआ-सलाम-कलाम सब बंद - ये तुम्हारा व्यक्तिगत मामला नही है बन्धू ये दबाव की राजनीति हम मर्दों का भावनात्मक शोषण है और जेब पर डाका है - यलगार हो, हर-हर महादेव - काली शर्ट-पेन्ट पहन लो, विरोध प्रकट करने को... बजा दो सडे-सडे गाने अपने अपने स्टीरीयो पे और घोषणा कर दो की हमरे रूमानी होने मे अभी १२ घन्टे बाकी है!!<br /></font>eSwamihttp://www.blogger.com/profile/04980783743177314217noreply@blogger.com