tag:blogger.com,1999:blog-96790492009-03-01T17:34:40.426+09:00जापान के एक कोने से...बिना किसी इरादे पे चलता रहेगा ग़ैर-इंडियन के हाथों से. देखते जाइएगा किसी न किसी जगह से जहाँ भी हों.
मैं हूँ ना यहीं ,जापान !!!namastehttp://www.blogger.com/profile/11800756932934836171noreply@blogger.comBlogger44125tag:blogger.com,1999:blog-9679049.post-41330466158624188132009-01-08T01:10:00.001+09:002009-01-18T00:59:00.512+09:00आकेमाशीते बधाई 2009आप सबको "<span style="color:#ff0000;">आकेमाशीते ओमेदेतो गोज़ाइमास</span>", मेरी हार्दिक शुभ्कामनाएँ, चाहे आप नए पॉस्ट का बेसब्र इंतज़ार करते हों, या जभी यहाँ आया करते हों कि आर एस एस फ़ीड मिलती है, या फिर सर्च एंजिन पे कुछ खोजते खोजते यों ही पहुँच गए हों. देखते रहें, इस साल भी शायद कभी-कभार लेकिन ज़रूर लिखता रहूँगा, जापान के एक कोने से...<br /><br /><img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5288614626586269986" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; WIDTH: 400px; CURSOR: hand; HEIGHT: 270px; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_HJGATlQu0WQ/SWTu-4ucGSI/AAAAAAAAABQ/oz9JEuFoMVI/s400/2009+%E3%83%9E%E3%83%84%E3%83%A4%E3%83%9E%E5%B9%B4%E8%B3%80%E7%8A%B6.jpg" border="0" />वैसे तो, चीनी कैलेंडर के अनुसार यह साल "बैल-गाय" का होता है, इस लिए मेरा न्यू यियर कार्ड भी नंदी की एक लोक चित्र पर बनाया है.<div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/9679049-4133046615862418813?l=namaste20matsu.blogspot.com'/></div>namastehttp://www.blogger.com/profile/11800756932934836171noreply@blogger.com2tag:blogger.com,1999:blog-9679049.post-7488306575991054142008-06-30T18:57:00.007+09:002009-01-08T04:46:49.947+09:00होता है अचानक, होना ही है हमेशा - 2अब <a href="http://news.bbc.co.uk/2/hi/asia-pacific/7442327.stm">उस हत्याकांड</a> से कुछ टाइम बीत गया. <a href="http://namaste20matsu.blogspot.com/2008/06/blog-post.html">पिछ्ले पोस्ट</a> के बाद इस घटना के प्रति बहुत सामजिक प्रक्रियाएँ आ गई हैं. और उनमें कई तो कुछ मुझे अखरती-सी लगी हैं.<br /><br /><br />1.<br />जब उस हत्यारे के माँ-बाप पुलीस थाने में पूछ्ताछ के बाद थके-थकाए घर वापस आ पहुँचे, तभी मीडिया वालों ने दरवाज़े के सामने उन्हें घिरा लिया. कई टीवी चैनलों-अख़बारों ने दोनोमां-बाप दोनों के माफ़ी माँगते दृश्य तक दर्शाया. माँ ने तो ज़मीन पर बैठकर अपना सिर नीचे लगने तक झुकाया, जो जापान में माफ़ी माँगने के लिए सबसे संजीदा (और कभी बहुत शर्मनाक भी) अंदाज़ माना जाता है.<br /><br />मुझे आजकल ऐसा लगता है जापान में "माफ़ी" का मतलब कुछ अलग सा हो जा रहा है. आपको यह तो शायद समझ में आएगा कि माँ-बाप ने अपने बेटे की सज़ा भुगतने के लिए ही खुले आम माफ़ी माँगी. तो फिर आप समझ सकते हैं कि उन्होंने क्यों मीडिया के लोगों-कैमरों के सामने ही ऐसा किया, और किससे माफ़ी माँग रहे थे? इसका जवाब तो हमारे पास भी नहीं होता.<br />और इन दिनों ऐसे झुके सिर टीवी पर बहुत नज़र आते हैं. शायद कोई नहीं जानता होगा कि कौन, कब, और कैसे माफ़ करेगा, और जिनका न कोई नुकसान हुआ न ही माफ़ करने का कोई हक़ रहा, तो उन्हें माफ़ी मँगाने-मँगवाने की क्या ज़रूरत? अब ऐसी "माफ़ी" से तो लगता है जैसे इस देश में माफ़ी नाम की कोई चीज़ बची ही नहीं, सिवाय तमाशा या मनोरंजन के. उसी तमाशे में दर्शक किसी बकरी को ढूँढ़कर मंच पर खड़ा करा देते हैं, और सब इकट्ठे हुए उसकी निंदा करते हैं, आख़िर उसका सिर झुकवाकर ग़ुस्से चेहरों के पीछे मज़ा ही उठा लेते हैं.<br /><br /><br />2.<br />इस नरसंहार घटना की प्रक्रिया के अनुरूप दो प्रकार का प्रतिबंध लगाया जाता है.<br /><br />पहला, डैगर नाइफ़, एक प्रकार की कटार जिसका इस्तेमाल इस नरसंहार में हो गया. इसके मुख्य उत्पादक नगर में नाइफ़ शिल्पकार गिल्ड ने ऐसा एलान किया कि वहाँ न डैगर नाइफ़ का निर्माण होगा न ही उसकी बिकवाली. गिल्ड के अध्यक्ष का कहना था कि हमने ऐसा अपराध रोकने और हमारे अन्य उत्पादों की छबि सुधारने के लिए यह फ़ैसला किया है, और इससे आगे बढ़कर कानूनी तौर मना करवाने को सरकार से अपील करेंगे. इस एलान के बाद अब ऐसा कहा जा रहा है कि सरकार भी यह अपील मानने को तैयार कर रही है.<br /><br />और दूसरा, घटनास्थल अकिहाबारा क्षेत्र का साप्ताहिक गाड़ी-मुक्त सड़क. वहाँ के नगर पालिका ने घटना के फ़ौरन बाद यह घोषित किया कि "वहाँ के निवासियों के बीच सुरक्षा पर बढ़ती चिंता को ध्यान में रखकर" ऐसा फ़ैसला किया कि हर रविवार इस इलाक़े के मुख्य सड़क को पैदल चलनेवालों के लिए खुला बनाया जाता था, यह नियम कुछ समय तक बंद होता रहेगा, जबतक ऐसी घटना के दुबारा होने की संभावना न हटाई जाए. सालों से करते आए हर रविवार का जो नियम था, वह अब इतनी आसानी से ख़त्म किया गया कि बस एक हत्यारा ट्रक से अचानक रास्ते पर घुस आया और उसने वहाँ चल रहे लोगों को एक दम कुचल दिया.<br /><br />इन दो प्रक्रियाओं में शायद कोई बुराइयाँ तो नज़र नहीं आती होंगी. सो, न कोई खुलकर इसका विरोध करता है, न ही ऐसा कर सकने का माहौल है. मगर सबको यह तो मालूम ही होगा कि ऐसा तरीक़ा असली मायने में मसाइलों का हल तक हमको नहीं ले जाता, बल्कि वहाँ से दूर ही रखेगा. चाहे कैसा भी हथियार-सी औज़ार के प्रति प्रतिबंध लगाया जाए, फिर भी किसी की जान लेने के लिए विकल्प कुछ भी हो सकता है. चाहे कितने आप ख़ुद को सुरक्षित रखे और हर वक़्त सावधान रहे, फिर भी कहीं-कभी तो आप के साथ कोई घटना तो हो सकती है. तो क्यों कोई ऐसा नहीं कहता कि यह समाधान बेकार है, ऐसा करेने से कोई ख़ास फ़ायदा नहीं होगा. लेकिन आजकल यहाँ यह "स्मार्ट" विचार होता है कि आवाज़ उठानी नहीं, चुप ही बैठना, वरना शायद ऐसी निंदा की जाएगी कि मसलन 'घटना में मारे गए लोगों और उनके परिवारों का निरादर किया', या 'अगर फिर कुछ हो गया तो? ज़िम्मेदारी ले सकते हो क्या?' वग़ैरह...<br /><br /><br />3.<br />अब ऐसे ज़माना है कि जो जब जहाँ से भी हो, हर कोई मोबाइल फ़ोन में लगे कैमरे की मदद से "न्यूज़ रिपोर्टर" बनने को तैयार होता है, और अपने "स्कूप" को आसानी से सीधा दुनिया भर दर्शाने की सुविधाएँ भी उपलब्ध होती हैं. शायद जो वीडियो यूटूब या कहीं ऐसी वेबसाइटों पर अपलोड किए जाते हैं, वे हज़ार ज़बानी लफ़्ज़ों से ज़्यादा ज़ाहिर तौर आपको बताएँगे कि घटना के दौरान वहीं कैसा माहौल हो रहा था. और अब बड़े बड़े न्यूज़ चैनल भी इस "वेब 2.0" वाले दौर का ख़ूब फ़ायदा उठाते हैं.<br /><br />ऐसा सुनके तो आप विश्वास कर पाएँगे या नहीं कि जहाँ हत्यारे के हमले से सात लोग मारे गए, दसेक घायल लोग कहीं न कहीं से ख़ून बहा रहे थे, कई तो बेहोश हुए लाशों की तरह सड़क पर गिर पड़े थे, वहीं ऐसे च्श्मदीदों की भीड़ भी हो रही थी जो ऐसे पीड़ित लोगों को बचाने की कोशिश किए बग़ैर अपने हाथ में थामे मोबाइल फ़ोन का निशाना उन पीड़तओं पर साध रहे थे. कहा जाता है कि तभी बहुत लोग जमकर ऐसा करते दिखे. बहुत-से लोग ख़ुशी से असामन्य "स्कूप" को फ़ोटो-वीडियो में उतार ले रहे थे, यहाँ तक कि बचाव के काम में जुटे लोगों से मना किया गया, फिर भी ऐसे आदेश का नज़रंदाज़ कर.<br /><br />यह सिर्फ़ ग़ैर-मामूली हालात की दहशत से हो उठा सामूहिक पागलपन था? इसके बारे में यहाँ आगे तर्क नहीं करूँगा. लेकिन ऐसा कहा जा रहा है कि जैसे 'इनसान की जान सबसे क़ीमती चीज़ होती है' वाला नैतिक पाठ था, वह अब बेमतलब नारा-सा बन चुका है. यानी, लोग ऐसी बात जानते तो हैं, फिर भी दिल में उसका एहसास बहुत कम ही होता है. इस मायने में उस हत्यारे और उन चश्मदीदों की संगदिल भीड़ के बीच ज़्यादा फ़र्क़ नहीं पड़ेगा.<div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/9679049-748830657599105414?l=namaste20matsu.blogspot.com'/></div>namastehttp://www.blogger.com/profile/11800756932934836171noreply@blogger.com1tag:blogger.com,1999:blog-9679049.post-1990258515909210402008-06-17T01:12:00.004+09:002009-01-08T05:25:02.938+09:00होता है अचानक, होना ही है हमेशा - 1मीडिया की सुर्ख़ियों में ऐसी बातें थमने का नाम ही नहीं लेती, जो कुछ दिनों या हफ़्तों तक भी आपको काफ़ी उदास महसूस कराती जाएगी. और "एक्सक्लूसिव" वाली बड़ी घटनाएँ एक के बाद एक आती रहती हैं. ऐसी ख़बर रोज़ बार बार कुछ ज़्यादा ही दिखाई जाती है , तो उतना ही उस दृश्य से मुझे तंग आ जाता है, जितना ऐसा एहसास भी हो जाता है कि ऐसी घटनाओं के बारे में आगे कुछ ग़ौर करना तक छोड़ने को मज़बूर किया जा रहा हो.<br /><br />आजकल तोक्यो में हुई <a href="http://news.bbc.co.uk/2/hi/asia-pacific/7442327.stm">यही घटना</a> भी शायद ऐसा होने को गुज़र जा रही है, चाहे इस घटना ने कितनी भी दर्दनाक और निराशाजनक याद दिल पे छोड़ दी हो. अभी गटना के हत्यारे और उसके उद्देश्य को लेकर गरमागरम बहस चल रही है, लेकिन शायद यह भी तब तक की बात ही होगी जब तक कोई दूसरी घटना हेडलाइन पर जगह न ले.<br />फिर भी यहाँ बस लिख रहा हूँ, ताकि यही वास्तविक घटना कम से कम मेरी याद से पानी-हवाओं की तरह कहीं न गुम हो जाए.<br /><br /><br />***<br />कोई कहता है कि अपराध समाज का प्रतिबिंब होता है. अगर यह धारणा सही हो तो इस नरसंहार और इसकी मुसलसल घटनाओं के पीछे आज के जापानी समाज में उभरती हुई कई समस्याएँ भी देखने को मिल जाएँगी.<br /><br />सबसे पहले, समाचार रिपोर्ट के अनुसार घटना के विवरण में ऐसी है इस हत्यारे की कहानी.<br />वह बचपन में स्कूल की पढ़ाई में अच्छा रहा था, जैसे उसके ऊपर लगाई गई माँ-बाप की उम्मीद को पूरी करता था. लेकिन हाइ स्कूल में वह पढ़ाई में दूसरे छात्रों के पीछे रहने लगा. इस "नाकामी" के चलते घर वालों के साथ संबंध बिगड़ता गया. जब इंजीनियरिंग कॉलेज में दाख़िले के मौक़े पर घर छोड़ा, तबसे इस घटना के बाद तक अपने घर वालों से दूर ही रहा. कॉलेज के बाद उसने कई नौकरियाँ कीं. काम तो जो भी करता हो, वह ज़्यादातर समय अस्थायी कर्मचारी ही होता रहा. कई बार यहाँ-वहाँ कार्यस्थल बदलते बदलते उसके लिए एक ही जगह पर एक साल ही बसना भी मुश्किल हो चला. फिर उसको नौकरी ढूँढ़ते-छोड़ते अवारा सी ज़िंदगी गुज़रनी पड़ी.<br /><br />घटना से पहले उसकी आख़िरी नौकरी थी, एक कारख़ाने में जो एक नामी कार निर्माता कंपनी की सहायक कंपनी का है, और जहाँ दो शिफ़्टों (सुबह साढ़े छह से तीन बजे तक, और चार बजे से आधी रात बारह चालीस तक) में सैकड़ों अस्थायी कर्मचारियाँ एसेंबली लाइन पर अपने काम में जुटे रहते हैं. निकट भविष्य में बड़े पैमाने पर अस्थायी कर्मचारियों की बरख़ास्तगी होनी थी. लेकिन पहले ही उसको ऐसा बताया गया था कि वह तो इस बार बचने वाला है. हो सकता है कि यही बात सुनकर जैसे उसके दिल पर ख़ुशी तो नहीं बल्कि डर और संदेह का काला बादल छा गया हो. क्योंकि वह बहुत बार देख ऐसा चुका होगा कि वहाँ काम करने वाले इंसान प्रयोज्य बर्तन की तरह मनमानी ढंग से अचानक लाइन से निकाल दिए गए. कुछ दिनों बाद एक सुबह वह ड्यूटी पर कारख़ाना पहुँचा तो उसकी वर्दी वहाँ नहीं मिली जहाँ आम तौर रख रखी होती थी. कंपनी के साथ उभरे शक और कार्यस्थल के माहौल से बढ़ गई शिकायत की वजह से, ऐसा भी हो सकता है कि वह इस छोट-सी बात को लेकर ग़लत समझा कि आख़िर वह अब फ़ायर्ड हो गया. इस सुबह के बाद वह कारकख़ाने से फ़रार होकर ग़ायब हो गया, और तीन दिन बाद ही वही घटना हो गई.<br /><br />इसके अलावा हत्यारे की व्यक्तित्व पर ध्यान दिया जा रहा है. कहा जाता है कि वह दूसरों से दोस्ती करने और अच्छा रिश्ता बनाने में कमज़ोर रहा, और उसने अपने अकेलेपन को बहलाने के लिए इंटरनेट का सहारा लेता था. वह वेब पर ही अपनी बातें करते करते काफ़ी आदी हो चुका, यहाँ तक कि उसने ख़ूनख़राबा कर डालने से थोड़ी देर पहले तक अपनी योजना मोबाइल फ़ोन के ज़रिए एक वेबसाइट पर लिख-लिखकर छोड़ी थी.<br /><br /><br />यहाँ तक पढ़कर आप क्या सोचते हैं कि ऐसी घटना क्यों हुई? व्यक्तिगत असहिष्णुता? पलायन और शिक्षा की विफलता? आर्थिक शोषण? इंटरनेट और सूचना समाज का दुष्प्रभाव? सामाजिक अलगाव की अनुभूति और मानसिक रोग? कारण तो इनमें से कोई भी हो सकता है, या कोई और भी हो सकता है. लेकिन कम से कम यह तो स्पष्ट होगा कि वह क्रोध और निराशा की जो गहरी भावना में फँस गया था, अंततः इसी भावना ने ही उसको ऐसा क्रूरता का व्यवहार कर लेने तक दबा दिया और इसका अंजाम भी मुमकिन बनाया. ऐसी भावना यहाँ समाज में बेशुमार भरने-भड़कने लग रही है.<br />***<br /><br /><br /><span style="color:#999999;">...इस घटना पर सिलसिला <a href="http://namaste20matsu.blogspot.com/2008/06/2.html">अगले पोस्ट</a> में जारी है.</span><div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/9679049-199025851590921040?l=namaste20matsu.blogspot.com'/></div>namastehttp://www.blogger.com/profile/11800756932934836171noreply@blogger.com1tag:blogger.com,1999:blog-9679049.post-41717034939567870342008-01-01T23:25:00.000+09:002008-12-09T23:05:32.751+09:00नए साल के अवसर पर...नए साल के अवसर पर क्षण भर के लिए वापसी!!<br /><a href="http://2.bp.blogspot.com/_HJGATlQu0WQ/R3qZ_bOgyzI/AAAAAAAAAAc/gWpeeMHAZZA/s1600-h/Nenga2008.jpg"><img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5150598438771018546" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; CURSOR: hand; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_HJGATlQu0WQ/R3qZ_bOgyzI/AAAAAAAAAAc/gWpeeMHAZZA/s400/Nenga2008.jpg" border="0" /></a><br />क्यों मेंढक? यह साल जापान में होता है मेंढक का?<br />ग़लत! असल में तो चीनी कैलेंडर के हिसाब से "चूहे" का होता है. (कोई ख़ासा मायने नहीं, सिवाय जिस मिट्टी के मेंढक को कभी भोपाल में देखा, इसका परिचय आप लोगों से कराने का. इसका अजब-सा आकर्षण, आप समझ सकते हैं न?)<br /><br />शायद सालाना ब्लॉग होने लगा? पता नहीं अगली पोस्ट कब होगी, मगर क्भी कभार तो ज़रूर लिखता जाऊँगा. (और मेरी ग़ैर-मौजूदगी के दौरान कई कॉमेंट आए थे, अभी तक उनका जवाब दिए बिना ही छोड़के रखने के लिए क्षमा करें.)<br /><br />नववर्ष की <span style="color:#ff0000;">ओमेदेतो!!</span><br />इस साल भी <span style="color:#ff0000;">योरोशीकु ओनेगाइ मोशीआगेमासु</span><br /><span style="color:#999999;">(मतलब तो पड़ोस में रहने वाले किसी जापानी दोस्त से पूछ लीजिए.)</span><div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/9679049-4171703493956787034?l=namaste20matsu.blogspot.com'/></div>namastehttp://www.blogger.com/profile/11800756932934836171noreply@blogger.com4tag:blogger.com,1999:blog-9679049.post-1167780165828807672007-01-03T08:26:00.000+09:002007-01-03T10:23:43.236+09:00नए साल के आग़ाज़ में...इस बार भी <span style="color: rgb(255, 153, 0);">नववर्ष की शुभकामनाएँ</span> के साथ देता हूँ,<br />सभी को <strong><span style="color: rgb(255, 0, 0);font-size:130%;" >"あけまして おめでとう"</span></strong> <span style="color: rgb(153, 153, 153);font-size:85%;" >(आकेमाशीते ओमेदेतो)</span><br /><br />कैसा होगा यह साल और क्या क्या होने वाला है इस साल में, यह तो फ़िलहाल अंदाज़ा भी नहीं, पर उम्मीद है कि गुज़रे साल की तरह अच्छा ही रहेगा.<br /><br />वैसे, आपको पता है ? सुना है कि सन् 2007 <a href="http://www.outlookindia.com/pti_news.asp?id=437193">"जापान-भारत मैत्री वर्ष"</a> भी है. इस सिलसिले, दोनों देशों के अनेक जगहों में कुछ सांस्कृतिक कार्यक्रम आदि भी बहुत आयोजित किए जाएँगे. अगर ऐसे कार्यक्रम में भाग लेने का मौक़ा मिल जाए तो कभी यहाँ लिखूँगा.<br /><br /><img style="margin: 0px auto 10px; display: block; text-align: center; cursor: pointer;" src="http://photos1.blogger.com/x/blogger/6447/715/1600/773382/%3F%3F%3F%3F%3F%3F%3F%3F%3F%3F%3F%3F%3F%3F%3F%3F%3F%3F%3F%3F%3F%3F%3F%3F.jpg" alt="" border="0" /><br />बाइ द वे, पिछ्ले साल के अंत में एक छोटा मोटा काम किया, जिसमें एक विशेष डॉक्युमेंटरी प्रोग्राम के लिए हिंदी वग़ैरह का अनुवाद करने का था. नहीं नहीं, ऍग्ज़ैक्ट्ली बोले तो अनुवाद करने में मदद करने का था, मेरा काम तो. मतलब एक भारतीय पेशेवर अनुवादक के साथ बैठे वीडियो टेप देखना, उनके जापानी में अनुवाद कर कहे को टाइपिंग करते जाना, और कहीं बारीक ढंग से अनुवाद करने के लिए सहज जापानी भाषी के रूप में थोड़ी-सी सलाह देना.<br />मैंने ख़ुद इतना बड़ा काम तो किया ही नहीं, फिर भी करते करते ख़ूब मज़ा आया और अपने लिए बहुत अच्छा अनुभव भी रहा.<br />वह अनुवादक साहब मूलतः मराठी हैं, फिर भी पक्के मुंबईकर होने के नाते गुजराती भाषा भी थोड़ा-बहुत समझ लेते हैं. और वीडियो-टेप के ज़्यादा हिस्से गुजरात के शहर में शूट किए गए हैं, इस लिए इंडियन-इंग्लिश, हिंदी, मराठी के अलावा गुजराती भी हमारे काम में शामिल हुई.<br />सो, गुजराती में बहुत बातें सुनते सुनते, और अनुवादक साहब से कुछ पाठ लेने के बाद, लगता है कि मुझे थोड़ी-सी गुजराती भी आ गई.<br />ज़रा सुनिए तो गुजराती भाषी भाइयो,<br /> <span style="color: rgb(0, 0, 153);"><strong>" એ કામ મને વધારે સારું લાગ્યું છે !! "</strong></span> (सही ?)<div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/9679049-116778016582880767?l=namaste20matsu.blogspot.com'/></div>namastehttp://www.blogger.com/profile/11800756932934836171noreply@blogger.com6tag:blogger.com,1999:blog-9679049.post-1162459254835556662006-11-02T18:15:00.000+09:002006-11-02T18:27:24.580+09:00बोले तो "नमस्ते इंडिया"...लगभग डेढ़ महीने पहले की बात है, जब यहाँ तोक्यो में ऐसा दो दिवसीय <a href="http://www.indofestival.com/indexE.html">उत्सव</a> हो रहा था.<br /><br />उस दिन वहाँ खुले बाज़ार की तरह चादरों के नीचे बहुत-सी दुकानें इकट्ठे लगाई गई थीं, और उनके बीच-बीच के रास्ते तो इनसानों की भीड़ से घने हुए थे. खान-पान, पहनावे-ज़ेवरात और बॉलीवुड, ये सब चीज़ें यतायात लोगों को लुभाकर अपना ग्राहक बना लेती थीं. दूसरी तरफ़ एक कोने में तरह तरह के संगीत-नृत्य का प्रदर्शन भी हो रहा था, और मंच के सामने जमे हुए लोग ख़ूब मज़ा लेते थे.<br /><br />हम भी घूम रहे थे जलेबी और समोसे का मज़ा लेते हुए, तो दूर से देखा कि भीड़ में एक इंडियन न्यूज़ चैनल वाला माइक लेकर अपने क्रू के साथ खड़ा हुआ था और कैमरा के सामने कुछ रिपोर्टिंग चल रहा था.<br />तभी तो एक नज़र डालके ही हम आगे चले गए, और उसकी कोई ख़ास याद नहीं रही थी. फिर आज पता चला कि उस रिपोर्टिंग का नतीजा <a href="http://www.ibnlive.com/videos/22778/namaste-india-fest-has-tokyo-in-frenzy.html">यहाँ</a> देख सकते हैं. शायद आपको ज़रा अहसास दिलाएगा उस दिन के मौज़-मस्ती भरे माहौल का...<div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/9679049-116245925483555666?l=namaste20matsu.blogspot.com'/></div>namastehttp://www.blogger.com/profile/11800756932934836171noreply@blogger.com8tag:blogger.com,1999:blog-9679049.post-1161352244721258042006-10-20T22:32:00.000+09:002006-10-20T23:03:04.870+09:00इस दीवाली वाले वीकेंड...आजकल कहीं न कहीं से दीवाली की ख़ुशी से भरी ख़बर आने लगी तो है, और सुना है कि यहाँ तोक्यो के क़रीब योकोहामा में भी रविवार को "Diwali in Yokohama 2006" नामक एक समारोह में बड़े पैमाने पर दीवाली मनाई जाने वाली है.<br />अफ़सोसनाक बात यह है कि इस सप्ताहांत में कुछ काम है, जिसकी वजह मैं काफ़ी व्यस्त रहूँगा. समारोह देखने को सोचा तो था, मगर शायद नहीं कर पाऊँगा.<br /><br /><br />...चलो, दीवाली मनाने के लिए दिया जलाने के बजाय रोशनी भरी फ़ोटो से सजाके यहाँ कुछ जगमगाहट लाते हैं.<br /> <br /><img title="Maharaja's Palace, Mysore" style="CURSOR: hand" alt="" src="http://photos1.blogger.com/blogger/6447/715/1600/Maharaja%27s%20Palace%20at%20Mysore.jpg" border="0" /><br />सभी को दीवाली का<br /><span style="color:#ff6600;"><strong> ॥शुभकामनाएँ॥</strong></span><div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/9679049-116135224472125804?l=namaste20matsu.blogspot.com'/></div>namastehttp://www.blogger.com/profile/11800756932934836171noreply@blogger.com3tag:blogger.com,1999:blog-9679049.post-1160230524709343862006-10-07T22:44:00.000+09:002006-10-07T23:23:15.723+09:00फुटबॉल का प्रशंसक हैं तो...<a href="http://www.the-afc.com/hindi/index.asp"><img style="cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://photos1.blogger.com/blogger/6447/715/1600/Asian%20Football%20Confederation%20Official%20Site-in%20Hindi.jpg" border="0" alt="" title="Click HERE to AFC Official Site in Hindi"></a><br />ज़रा देखें और जानकारी लें इस बहुभाषीय साइट पर.<br />(*कभी ब्राउज़र की वजह से न दिखने का आशंका भी.)<div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/9679049-116023052470934386?l=namaste20matsu.blogspot.com'/></div>namastehttp://www.blogger.com/profile/11800756932934836171noreply@blogger.com0tag:blogger.com,1999:blog-9679049.post-1143012302186004022006-03-22T15:15:00.000+09:002006-03-23T14:23:21.436+09:00पॉडकास्टिंग से हिंदी समाचार<a href="http://www.nhk.or.jp/hindi/index.html"><img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://photos1.blogger.com/blogger/6447/715/1600/NHK_Hindi_Podcast.jpg" border="0" alt="" title="Click HERE to NHK ONLINE Hindi Service"/></a><br />अब NHK, यानी जापान की सरकारी टीवी-रेडियो संस्थान ने अपनी ऑन-लाइन न्यूज़ सेवा में <a href="http://www.nhk.or.jp/rj/index_e.html">पॉडकास्टिंग सेवा</a> भी शुरू किया है, और हिंदी, उर्दू, बंगाली वग़ैरह 22 भाषाओं में यह पॉडकास्टिंग न्यूज़-सेवा उपलब्ध है.<br />प्रसारण हर बार ठीक 10 मिनट के लिए, प्रतिदिन दो बार अप-डेट किया जाता है. और कार्यक्रम मुख्यतः जापान के राष्ट्रीय समचार और उससे संबंधित विदेशी समचार में केंद्रित होता है.<br /><br />ऑन-लाइन हिंदी न्यूज़ सुनने के लिए तो आम तौर बीबीसी हिंदी सुनता हूँ, लेकिन कभी सुबह-शाम ट्रेन में MP3 प्लेयर के ज़रिए सुनने की इच्छा हुई तो स्ट्रीमिंग प्रसारण को घर में एक बार रिकॉर्ड करना पड़ता है. ऐसी तरह सुनने वालों के लिए तो NHK की नई ऑन-लाइन सेवा बहुत सुविधाजनक होगी.<div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/9679049-114301230218600402?l=namaste20matsu.blogspot.com'/></div>namastehttp://www.blogger.com/profile/11800756932934836171noreply@blogger.com1tag:blogger.com,1999:blog-9679049.post-1142487404800068602006-03-16T15:20:00.000+09:002006-03-16T14:39:18.896+09:00रंग दे होली के...<img style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; CURSOR: hand; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://photos1.blogger.com/blogger/6447/715/1600/Holi_ka_Rang.jpg" border="0" /><br /><span style="color:#ff6666;">मेरे आसपास रंग खेलने वाले कोई नहीं, </span><br /><span style="color:#ff0000;">कम से कम फ़ोटो में ही मेरी होली रंगीन तो हो जाए...</span><div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/9679049-114248740480006860?l=namaste20matsu.blogspot.com'/></div>namastehttp://www.blogger.com/profile/11800756932934836171noreply@blogger.com3tag:blogger.com,1999:blog-9679049.post-1141882859509471972006-03-09T14:40:00.000+09:002006-03-16T14:19:47.150+09:00तोक्यो मेट्रो…कुछ दिन पहले सब्वे ट्रेन में बैठने का मौक़ा मिला, जब स्टेशन के अंदर अजीब नज़ारे भी फ़ोटो खींचने को मिल गए...<br />आइए, ज़रा देखें वहाँ क्या क्या हो रहा है.<br /><br /><img style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; CURSOR: hand; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://photos1.blogger.com/blogger/6447/715/1600/ChikaTetsu1-1.jpg" border="0" />जब ट्रेन बदलने के लिए एक स्टेशन पे उतरा, तभी इधर-उधर घूमते मैंने ख़ुद को थोड़ा लापता हुआ पाया. ऐसी हालत में ऊपर देखा तो पाइपों-तारों की अनहोनी दृश्य...<br /><br /><img style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; CURSOR: hand; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://photos1.blogger.com/blogger/6447/715/1600/ChikaTetsu1-2.jpg" border="0" />लग रहा था, जैसे मैं किसी बड़े जानवर के शरीर में घुस गया और ये लाल वाला तथा नीले वाला पाइप उसकी रक्त वाली नसें हैं.<br /><br /><br />फिर दूसरे स्टेशन पे उतरा, जहाँ अचानक नज़र में आया एक अजीब सा...<br /><img style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; CURSOR: hand; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://photos1.blogger.com/blogger/6447/715/1600/ChikaTetsu2-1.jpg" border="0" /> <div align="center">यह?</div><br /><br /><img style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; CURSOR: hand; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://photos1.blogger.com/blogger/6447/715/1600/ChikaTetsu2-2.jpg" border="0" /> <div align="center">क्या??<br /><span style="font-size:85%;"><span style="color:#cc0000;">“天井からの漏水にご注意下さい”</span><br /><span style="color:#666666;">(ऊपर से पड़ने वाले पानी से सावधान रहिएगा.)</span></span></div><br /><br /><img style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; CURSOR: hand; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://photos1.blogger.com/blogger/6447/715/1600/ChikaTetsu2-3.jpg" border="0" /> <div align="center">है! यही बात!!</div><br />छत की जो मरम्मत का काम उधर देख लिया, उसका मतलब इधर समझ में आया कि जो होना ही था सो हो रहा है...<br />मगर थोड़े पहले ही काम हो जाने के बाद भी? (वैसे वहाँ के आसपास का इलाक़ा कुछ तो नया और साफ़ नज़र आ रहा था. लगता है इन कई सालों में एक बार तो मरम्मत हो चुकी ही होगी.)<br /><br /><br /><br />आगे चला तो और एक प्लास्टिक की बोतल, दीवार पे अकेली ही खड़ी थी...<br /><img style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; CURSOR: hand; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://photos1.blogger.com/blogger/6447/715/1600/ChikaTetsu3-1.jpg" border="0" /><br /><br /><img style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; CURSOR: hand; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://photos1.blogger.com/blogger/6447/715/1600/ChikaTetsu3-2.jpg" border="0" />बारिश में आने वाला पानी, इसी काम से यहाँ आते-जाते लोगों के सिर-कंधों पे तो नहीं गिरेगा. लेकिन बिजली के तारों पे किसी तरह का असर नहीं पड़ता???<br /><br /><br /><img style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; CURSOR: hand; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://photos1.blogger.com/blogger/6447/715/1600/ChikaTetsu3-3.jpg" border="0" />एक मिनट ठहर कर क़रीब से देखें तो मज़ाक-सी दिखती है. लेकिन उससे ज़्यादा मज़ाक़िया तमाशा उसे देखने को ठिठकने और फ़ोटो तक खींचने वाला था, यानी मैं.<br />वहाँ लोग किसी न किसी जल्दी में चल रहे थे और कोई बोतल पे ध्यान नहीं देता. जैसा नियम होता हो "यहाँ रुकना मना है", उसी तरह दूसरों के क़दमों से अपना क़दम मिलाकर वहीं से चुपके दफ़ा हो गया...<div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/9679049-114188285950947197?l=namaste20matsu.blogspot.com'/></div>namastehttp://www.blogger.com/profile/11800756932934836171noreply@blogger.com7tag:blogger.com,1999:blog-9679049.post-1139731868922654132006-02-12T17:00:00.000+09:002006-02-12T17:11:09.006+09:00दुआ करें...<img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://photos1.blogger.com/blogger/6447/715/1600/Ushi.jpg" border="0" alt="" /><br />गाव को कुछ कपड़ा पहना के करें प्रार्थना, फिर क्या माँग लेंगे आप?<div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/9679049-113973186892265413?l=namaste20matsu.blogspot.com'/></div>namastehttp://www.blogger.com/profile/11800756932934836171noreply@blogger.com5tag:blogger.com,1999:blog-9679049.post-1139103789955132582006-02-05T18:39:00.000+09:002006-02-05T10:43:10.003+09:00टैक्सी नंबर 9211आज ही पता चल गया, नाना पाटेकर-जॉन अब्राहम वाली नई फ़िल्म का टाइटल <a href="http://in.movies.yahoo.com/060124/128/626sp.html"><em>"टैक्सी नंबर 9211"</em></a> है.<br /><br /><img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://photos1.blogger.com/blogger/6447/715/1600/taxi.0.jpg" border="0" alt="" /><br /><br />सो, कोई शक नहीं होगी कि जो भी इस नंबर देखेगा हर हिंदी-ब्लॉगरों को <a href="http://www.devanaagarii.net/hi/alok/blog/">आलोक जी के चिट्ठे</a> की याद ज़रूर आनी होगी.<br />आज तक "नौ दो ग्यारह" का मतलब पूछने की हिम्मत तक कभी हुई ही नहीं थी. फिर भी, अब इस मौक़े का फ़ायदा उठाकर मैं पूछ डालूँ तो... इस अज्ञान बेचारे विदेशी भाई को ज़रा कोई बता दें?<br /><br />और कुछ सोचा, शायद आलोक जी को भी उस फ़िल्म ज़रूर देखनी तो होगी...<div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/9679049-113910378995513258?l=namaste20matsu.blogspot.com'/></div>namastehttp://www.blogger.com/profile/11800756932934836171noreply@blogger.com4tag:blogger.com,1999:blog-9679049.post-1138831575196304872006-02-03T01:02:00.000+09:002006-02-03T02:53:11.366+09:00सवालात के चक्कर में...आजकल ऐसा <a href="http://help.berberber.com/" target="_blank">बहुभाषीय इंटर्नेट-फ़ोरम</a> वाला जालस्थल देखा है...<br /><br />बिलकुल-मुफ़्त अनुवाद फ़ोरमों में <a href="http://help.berberber.com/indian/" target="_blank">भारतीय भाषाओं का</a> भी है. वहाँ कई पन्नों पे थ्रेडों के विषय देखके सोचा है, यहाँ अपने नाम देवनागरी लिपि में लिखाने-लिखवाने वालों की आशियाना-सी जगह है. ऐसे लोगों में ज़्यादातर तो सिर्फ़ जिज्ञासा से पूछते हैं, लेकिन दूसरे इरादा रखने वाले भी कम नहीं, यानी अपने बदन पे डेविड बेखम की तरह टैटू गुदवाने का.<br /><br /><img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://photos1.blogger.com/blogger/6447/715/400/hindi_Vhiktoriya.0.jpg" border="0" alt="" />पता नहीं, इतने टैटू वाले क्यों ???<br />मेरा मतलब यह नहीं है कि मैं टैटू और वह लगने वालों का ख़िलाफ़ हूँ. वैसे, जो भी चाहे या पसंद करे टैटू गुदवा लो, फ़ैशन की दृष्टि से अपने को तो अच्छा लगे तो अच्छा ही होगा.<br />मगर सावधान से गुदवाना..., बात गंदी सुई से लग सकती बीमारियों की नहीं, गुदने वाले अनजानी भाषाओं के अक्षरों की है, जैसे "व्हिक्टोरिया".<br />अगर टैटू के असली नक़्शे में लिखी गई टूटी-फूटी भाषा की या बिगड़ चुके अक्षरों की वजह से कुछ "तमाशा" सदा अपने पर रह जाए, तो अपनी नादानी से पछताओगे. वरना कहीं टैटू की ग़लती पहचानने वालों की उँगली अपनी ओर उठेगी तो...<br /><br />हाँ, जैसी भी हों, विदेशों की अनजानी-अनदेखी सी अजीब चीज़ें तो कभी कभी लोगों की चाहत में आ जाती हैं. इतिहास में दुनिया ऐसे चलती आई, आजकल विदेश-यात्रा का बहुत बड़ा व्यापार हो रहा है. तो क्यों नहीं टैटू भी ?<br />यहाँ के शहर में ऐसों को ख़ामख़ाह मिल जाता है, जिसके बाँह-सीने या किसी अंग पे "तमाशा" नज़र आया, तो उससे हंस पड़ें या उसका मज़ाक़ उड़ा लें, क्यों नहीं ?<br /><br /><img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://photos1.blogger.com/blogger/6447/715/400/yakyuu_bou.jpg" border="0" alt="" />दरअसल मैंने देवनागरी वाले तो कभी नहीं, लेकिन <a href="http://www.hanzismatter.com/" target="_blank">चीनी-अक्षरों वाले ज़बरदस्त "तमाशे"</a> बहुत बार देख लिए हैं. जो शब्द-अक्षर उन लोगों की नज़र में तो कुछ नया कुछ आकर्षक हो, मेरी (और शायद जो भी उसका अर्थ समझने वालों की) नज़र में वही दिखता है जैसे छोटे हबच्चों के लिखाई-अभ्यास के पाठ्यपुस्तक देख रहा हूँ. और मामला टैटू तक ही नहीं, टी-शर्ट्स या टोपी पे भी "तमाशे" की कोई कमी नहीं है.<br />मसलन, कभी ग़लतफ़हमी मत कीजिए, इसी <a href="http://www.starbulletin.com/2000/02/15/features/story1.html" target="_blank">न्यूयोर्क यंकीस के बेसबॉल-कैप</a> पर जो लिखा हुआ वह तो क़तई "कानजी" (यानी जापानी भाषा का चीनी अक्षर) नहीं है . यही अक्षर दुनिया में कोई पढ़ भी नहीं सकता...<br /><br />मगर अफ़सोस, इमानदारी की ख़ातिर यह भी बताना पड़ेगा कि मेरे पास भी "तमाशे" वाली टी-शर्ट है, जिसके सादे ढंग और मामूली ग्रे रंग में मोटी सफ़ेद लक़ीर से जापानी में सिर्फ़ पाँच चीनी अक्षरों का एक शब्द "天然記念物" छपा है, जिसका अर्थ है "प्राकृतिक स्मारक(-ईय जानवर)".गर्मी में जान-बूझ कर वह टी-शर्ट मज़ाक़िया तौर पे पहनना अपनी बदनसीबी शरारत से पसंद करता हूँ...<br /><br /><br />फिर बात फ़ोरम के बारे में...<br />फ़ोरम का हाल तो दुनिया का जैसा-तैसा है. फ़ोरम में सवाल पूछने वाले कभी कभी हिंदी और संस्कृत का फ़र्क़ भी उछाल लेते हैं, यहाँ तक कि एक ने शायद संस्कृत के लिए "Sanscript" ही लिख डाला...<br /><br />लेकिन कभी <a href="http://help.berberber.com/forum48/21112-help-me-answer-small-girl.html" target="_blank">एक आशा की किरण</a> भी, जब अनुवाद से यहाँ और वहाँ के दो दिल और क़रीब हो जाते हैं. विक्रम जी के काम से फ़ोरम की कुछ अच्छाई भी समझ गया...<div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/9679049-113883157519630487?l=namaste20matsu.blogspot.com'/></div>namastehttp://www.blogger.com/profile/11800756932934836171noreply@blogger.com2tag:blogger.com,1999:blog-9679049.post-1137051369108698342006-01-12T16:36:00.000+09:002006-01-12T17:12:05.246+09:00عید ہے تو اردو۔ ۔ ۔<blockquote><span style="font-size:78%;color:#cccccc;"><em>For viewing this Urdu scription properly,<br />you can download "<a title="Start Font-Install Automatically from BBC Urdu" href="http://www.bbc.co.uk/urdu/fontinstall/bbcurdu.exe">Urdu Naskh Asiatype</a>.</em></span></blockquote><span style="font-family:Urdu Naskh Asiatype;font-size:130%;"><p align="right"><br /><a href="http://news.bbc.co.uk/2/hi/in_pictures/4603418.stm">عید</a> کے موقع پے خواہش ہوئی ہے کہ خط ِاردو سے کچھ لکھایا جائے۔</p><br /><img style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; CURSOR: hand; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://photos1.blogger.com/blogger/6447/715/1600/Jama_Masjid.0.jpg" border="0" /><br /><p align="center"><span style="font-size:180%;color:#339933;"><br /><span style="color:#006600;">٭</span> عید الاضحیٰ مبارک باد <span style="color:#006600;">٭</span></span></p><br /><p align="right">مگر افسوس، یہاں جاپان میں قربانی کا نظارہ دیکھنے کو نہیں ملتا، نہ ہی بکروں کے کاروبار کا۔<br />کاش، کم از کم لزیز بریانی تو کہیں مل جائے، کاش ۔ ۔ ۔<br /></p></span><div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/9679049-113705136910869834?l=namaste20matsu.blogspot.com'/></div>namastehttp://www.blogger.com/profile/11800756932934836171noreply@blogger.com4tag:blogger.com,1999:blog-9679049.post-1136815800017927872006-01-09T18:42:00.000+09:002006-01-12T10:56:35.470+09:00नववर्ष की चट्ठी...<p align="center"><img style="cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://photos1.blogger.com/blogger/6447/715/400/Nengajou2006.3.jpg" border="0" alt="" /></p><br />नए साल की शुरूआत में बधाई देने के लिए,<br /> मेरी तरफ़ से सबको<br /> <br /><div align="center"><span style="color:#ff0000;"><span style="font-size:180%;">"あけまして おめでとう" </span><br />(आकेमाशीते ओमेदेतो)</span></div><br /><blockquote><span style="font-size:85%;">बाईं से दाईं तरफ़, देवनागरी की नक़ली लिपि में ऐसा लिखे है.<br />और ऊपर से नीचे <span style="color:#ff6666;">"謹賀新年" (किन्-गा-शिन्-नेन्)</span> लिखे है, जो "आकेमाशीते..." का लिखित भाषा वाला शब्द है.</span></blockquote><br />शायद अभी थोड़ी देर हो गई होगी...<br />लेकिन, अगर कोई जापानी लोग आपके साथ काम करते हों या पड़ोस में रहते हों, और आप उनसे ज़रा बात करने के लिए कुछ बहाना चाहते हों, तो आपको इस मौक़े का फ़ायदा उठाना होगा ज़रूर.<br />कहिएगा उनसे, <span style="color:#ff0000;">"आकेमाशीते ओमेदेतो !! "</span><br />इसके बाद <span style="color:#ff0000;">"-गोज़ाइमासु"(ございます)</span> लगाएँ तो और इज़्ज़त के साथ सुनाई देंगे.<br /><br />जापान में नियमित तौर पर इस मौक़े पर ऐसी चिट्ठी <span style="color:#ff6666;">"年賀状"(नेंगाजो)</span> लिखते (या आजकल PC पे बना लेते) हैं. फिर उसे अपने दोस्तों, रिश्तेदारों, ऑफ़िस के कॉवर्करों-बॉसों, बिजनेस पार्टनरों-कस्टमरों, जो भी रोज़ मिलते हों या लंबे समय से न देखे हों, ऐसे लोगों की तरफ़ भेज देते हैं.<br /><br /><br />मेरी तरफ़ से और कुछ...<span style="color:#ff6600;">टाइमपास !</span><br />लीजिए, सन् <span style="color:#ff6600;"><strong>2006</strong></span> के लिए ऐसे बहुत नंबर युनिकोड में होते हैं.<br /><br />ज़रा देखें कितने तक पहचान पाएँगे ??<br /><span style="font-size:85%;color:#ff9966;">*जवाब; हर नंबर के किनारे पे, सफ़ेद रंग में.</span><br /><br /><blockquote><span style="font-size:190%;color:#cc0000;">२००६</span> <span style="font-size:78%;color:#ffffff;">Hindi हिंदी</span><br /><span style="font-size:260%;color:#990000;">২০০৬</span> <span style="font-size:78%;color:#ffffff;">Bangla बंग्ला</span><br /><span style="font-size:200%;color:#cc6600;">੨੦੦੬</span> <span style="font-size:78%;color:#ffffff;">Punjabi पंजाबी</span><br /><span style="font-size:200%;color:#996633;">૨૦૦૬</span> <span style="font-size:78%;color:#ffffff;">Gujarati गुजराती</span><br /><span style="font-size:200%;color:#666600;">୨୦୦୬</span> <span style="font-size:78%;color:#ffffff;">Oriya उड़िया</span><br /><span style="font-size:200%;color:#006600;">౨౦౦౬</span> <span style="font-size:78%;color:#ffffff;">Telugu तेलुगु</span><br /><span style="font-size:200%;color:#009900;">೨೦೦೬</span> <span style="font-size:78%;color:#ffffff;">Kannada कन्नड</span><br /><span style="font-size:180%;color:#339999;">൨൦൦൬</span> <span style="font-size:78%;color:#ffffff;">Malayalam मलयालम</span><br /><span style="font-size:170%;color:#336666;">௨00௬</span> <span style="font-size:78%;color:#ffffff;">Tamil तमिल</span><br /><span style="font-size:200%;color:#000099;">๒๐๐๖</span> <span style="font-size:78%;"><span style="color:#ffffff;">Thai थाई</span> </span><br /><span style="font-size:180%;color:#3333ff;">໒໐໐໖</span> <span style="font-size:78%;color:#ffffff;">Lao लाओ</span><br /><span style="font-size:200%;color:#6600cc;">༢༠༠༦</span> <span style="font-size:78%;color:#ffffff;">Tibetan तिब्बती</span><br /><span style="font-size:220%;color:#cc33cc;">۲۰۰۶</span> <span style="font-size:78%;color:#ffffff;">Arabic-Indic (Eastern:Farsi&Urdu)</span></blockquote><div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/9679049-113681580001792787?l=namaste20matsu.blogspot.com'/></div>namastehttp://www.blogger.com/profile/11800756932934836171noreply@blogger.com4tag:blogger.com,1999:blog-9679049.post-1133959663181170022005-12-08T09:35:00.000+09:002005-12-08T22:17:05.900+09:00सबसे बड़ी है यह प्यास...यह बोतल नहीं, ताबुत है...<br /><br /><img style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; CURSOR: hand; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://photos1.blogger.com/blogger/6447/715/1600/africa-coffin-beer.jpg" border="0" /><br /><br />अफ़्रीक़ा के एक कोने में तो पियक्कड़ मुर्दे को दफ़्न करने के लिए ऐसा ताबुत भी होता है...<div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/9679049-113395966318117002?l=namaste20matsu.blogspot.com'/></div>namastehttp://www.blogger.com/profile/11800756932934836171noreply@blogger.com5tag:blogger.com,1999:blog-9679049.post-1133808678451899092005-12-07T12:30:00.000+09:002006-01-19T17:01:33.053+09:00आवरण कथा : भारतपिछले महीने <a href="http://www.newsweekjapan.hankyu-com.co.jp/">न्यूज़वीक जापान-संस्करण</a> के इस तरह के कवर थे...<br /><br /><a href="http://www.newsweekjapan.hankyu-com.co.jp/cover/contents/20051123/contents.html"><img title="Newsweek:Japan Eddition/23 November 2005" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; CURSOR: hand; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://photos1.blogger.com/blogger/6447/715/1600/ind%201.jpg" border="0" /></a>यानी, लगातार दो अंकों में कवर स्टोरी के लिए भारत को चुन लिया गया.<br />पहला अंक है जिसमें भारत को देखते हैं उसकी व्यापारिक सक्षमता के नज़रिए से, दूसरा है राजनैतिक सक्षमता के नज़रिए से. और कवर पर <strong>"インド"</strong> (भारत) के नीचे ऐसे लिखे हैं, <blockquote><strong><span style="font-size:130%;">"<span style="BACKGROUND: #009900;color:#ffffff;" > 動き出す巨象経済 </span>"</span></strong><br /> (चलने लगा है महा-हाथी अर्थव्यवस्था)<br /><br /><strong><span style="font-size:130%;">"<span style="BACKGROUND: #ffff00"> 超大国の誇りと野望 </span>"</span></strong><br /> (सुपर-पॉवर का गर्व और आकांक्षा)</blockquote><a href="http://www.newsweekjapan.hankyu-com.co.jp/cover/contents/20051130/contents.html"><img title="Newsweek:Japan Eddition/30 November 2005" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; CURSOR: hand; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://photos1.blogger.com/blogger/6447/715/1600/ind%202.jpg" border="0" /></a><br />दरअसल इन कई सालों से आम जापानी लोगों के बीच भारत की छवि थोड़ी-बहुत बदल चुकी है...<br /><br />प्राचीन युग से तो बौद्ध धर्म का सुदूर देश था भारत. फिर आधुनिक युग की शुरूआत से द्वितीय विश्वयुद्ध के अंत तक, इतिहास की हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी तरह दोनों मुल्कों को क़रीब ले आईं थीं, जब रवींद्रनाथ ठाकुर (टैगोर) और सुभाष चंद्र बोस यहाँ आए, मेरी यूनिवर्सिटी के हिंदी-उर्दू विभागों (जो पहले एक ही हिंदुस्तानी विभाग थे) की स्थापना भी हुई. युद्ध के बाद भी एक न्यायाधीश, राधा बिनोद पाल थे, जिन्होंने <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/International_Military_Tribunal_for_the_Far_East">तोक्यो युद्ध-अपराध न्यायाधिकरण</a> में अकेले ऐसा अनुरोध किया कि तब तक जापान निर्दोष ही है जब तक न्याय की समानता के अनुसार जय पाने वाले देशों को भी अपने युद्ध-अपराध का दोष न लगाया जाए.<br />शीतयुद्ध के दौरान जापानी सरकार के विदेश-नीति के नक़्शे में भारत थोड़ा दूर हो गया था, जहाँ सत्थर के दशक में जापानी नागरिकों के लिए विदेश-यात्रा आज़ाद होने के बाद भारत ऐसी यात्रियों की बड़ी मंज़िल होने लगा. फिर भी आम लोगों के बीच भारत की छवि जैसी की तैसी रही थी.<br />नब्बे के दशक से दुनिया में भूमंडलीकरण का असर काफ़ी साफ़ नज़र आने लगा और आज की इस मशहूर कहानी कहीं भी सुनाई देने लगी है कि भारत और चीन, तीन अरब लोगों के, यानी दुनिया की एक-थिहाई आबादी वाले देश ही बनेंगे आगे इक्कीसवीं शताब्दी में सुपर-पॉवर. सो ऐसी सिलसिले में यह पत्रिका भी ऐसी तरह निकली है.<br /><br />माहौल केवल 5-6 साल पहले भी ऐसा था कि तब भारत के नाम को आई टी से जुड़ाने वाले लोग बहुत कम ही होते थे और भारतीयों को रोज़ देखने का मौक़ा भी ज़्यादा नहीं था सिवाय भारतीय रेस्ट्राँ के. सन् 2000 में पूर्व जापानी प्रधानमंत्री योशिरो मोरी (森 喜朗) <a href="http://www.in.emb-japan.go.jp/Japan-IndiaRelations/Japan-India_Relations_PMSpeech01.htm">भारत आए</a>, जिसके बाद दोनों देशों के बीच एक वीज़ा-समझौता किया गया. अब भारतीय आई टी इंजीनियरों को तीन साल तक लागू <a href="http://www.mofa.go.jp/announce/announce/2001/2/0202.html">मल्टिप्ल-व्यापारी-वीज़ा</a> मिल सकता है, और फ़िलहाल लगभग 14000 (दस साल पहले 4000) भारतीय नागरिक जापान में रहते हैं जिनमें 3000 ऐसे इंजीनियर हैं. अब भारत के साथ करी के देश वाला पूर्वाग्रह भी बदल रहा है.<br /><br />दूसरी तरफ़ जापान में काम करने वाले भारतीय इंजीनियोरों और उनके परिवारों के लिए कई तरह की सुविधाएँ भी तैयार हो रही हैं.<br />जापान में रहने के लिए भाषा एक समस्य तो होती है क्योंकि यहाँ अंग्रेजी में ही ख़रीदारी जैसा कुछ रोज़ाना काम करना उतना आसान नहीं है जितनी आसानी से अमरीका या अन्य पश्चिम देशों में ऐसा काम हो जाएगा. फिर भी पहले आए भारतीय पड़ोसियों से सामूहिक सहारा ले सकें तो कोई लफड़ा-वफड़ा नहीं होगा. और पहले से बड़े शहरों में कहीं न कहीं पाकिस्तानी या बंगलदेशी मालिकों की <a href="http://islamcenter.or.jp/common/Halalfoodstores.htm">हलाल-दुकानें</a> होती हैं, जहाँ मिलते हैं मुसलमानों के हलाल-गोश्त के अलावा मसाले-दाल जैसे बुनियादी खाद्य उत्पादन, कपड़े, फ़िल्म की कॉपी वीडियो, साबुन-शैंपू जैसे कॉस्मेटिक्स, वग़ैरह हर ज़रूरतों के पदार्थ. अब ऐसी चीज़ें इंटर्नेट पर भी <a href="http://www.ambikajapan.com/">इधर</a> <a href="http://www.indojin.com/shop-online/catalog/default.php?language=en">उधर</a> ख़रीद सकते हैं बिना घर से बाहर और दूर तक जाके.<br />बच्चों की पढ़ाई के लिए तो पिछले साल तोक्यो में एक <a href="http://www.japantimes.co.jp/cgi-bin/getarticle.pl5?nn20041022f1.htm">भारतीय अंतरराष्ट्रीय स्कूल</a> शुरू हुआ है, जो स्थानी पब्लिक-स्कूल (जापानी मीडियम, फ़ीज़ मुफ़्त) और निजी इंटर्नेशनल-स्कूल (अंग्रेज़ी-मीडियम, फ़ीज़ हाइ) के अलावा माता-पिताओं के लिए अच्छा विकल्प बन सकता है.<br /><br />ऐसे भी लिखा है, आज से कई सालों में जापान में रहने वाले भारतीय नागरिकों की संख्या और बढ़ सकती है. तो आगे मेरी हिंदी भी कुछ काम तो आएगी, या...??<div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/9679049-113380867845189909?l=namaste20matsu.blogspot.com'/></div>namastehttp://www.blogger.com/profile/11800756932934836171noreply@blogger.com4tag:blogger.com,1999:blog-9679049.post-1133290391845546342005-11-30T03:43:00.000+09:002005-11-30T03:55:23.723+09:00सीधा रास्ता...जापान में थोड़ी-सी ठंडी पड़ने लग रही है...<br /><br /><img style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; CURSOR: hand; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://photos1.blogger.com/blogger/6447/715/400/FromKyotoStation.jpg" border="0" /><br /><div align="center"><span style="font-size:85%;color:#000099;">एक सुबह, क्योतो स्टेशन के ऊपर से कारासुमा-रोड की तरफ़...</span></div><div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/9679049-113329039184554634?l=namaste20matsu.blogspot.com'/></div>namastehttp://www.blogger.com/profile/11800756932934836171noreply@blogger.com0tag:blogger.com,1999:blog-9679049.post-1133141189733844832005-11-28T09:56:00.000+09:002005-11-29T09:42:27.000+09:00नए रूप में...अच्छा, वापस आया तो... बताना पड़ेगा कि कई महीनों तक क्यों कुछ नहीं लिखा था मैने?<br /><br /><br /><br />...क्योंकि, कभी तो रास्ते में रुकना होता है न !<br /><br /><img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://photos1.blogger.com/blogger/6447/715/400/theheriye.jpg" border="0" alt="" /><br />फिर चलें, चलके तो जाना होगा...?<div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/9679049-113314118973384483?l=namaste20matsu.blogspot.com'/></div>namastehttp://www.blogger.com/profile/11800756932934836171noreply@blogger.com2tag:blogger.com,1999:blog-9679049.post-1126118470061317862005-09-11T08:09:00.000+09:002005-12-20T16:12:43.986+09:00इंतख़ाबात के मौसम में...<span style="color:#ff6600;">आज, ग्यारह सितंबर को यहाँ देश भर में <s>लोकसभा</s> निचले सदन के संसदीय चुनाव के लिए <a href="http://news.bbc.co.uk/2/hi/asia-pacific/4232988.stm">मतदान</a> हो रहा है....</span><br /><br /><span style="color:#993300;">इस बार चुनाव का मौक़ा अचानक ही आया, जो तत्कालीन प्रधान मंत्री <a href="http://www.kantei.go.jp/foreign/index-e.html">कोइज़ुमि जुन्'इचिरो</a> (<span style="color:#666666;">小泉 純一郎</span>; वैसे जापानी में नाम पहले पारिवारिक, उसके बाद अपना नाम आता है, जैसे दक्षिण भारतीयों की तरह) के ख़ुद अकेले ही फ़ैसले से <s>सभा</s> सदन भाँग कर दिए जाने की वजह से हुआ है.</span><br /><span style="color:#999999;">(इस चुनाव की परिस्थितियों के बारे में और जानकारी <a href="http://news.bbc.co.uk/2/hi/asia-pacific/4216756.stm">बी.बी.सी. के न्यूज़-पेज</a> पे मिलेगें. )</span><br /><br /><span style="color:#006600;">आगे तो मेरे, यानी एक वोट के हक़दार के, विचार है...</span><br /><br /><span style="color:#333300;">इन हफ़्तों से कुछ कहा जाता है कि आजकल जापान की राजनीति में द्वि-महा-पार्टियों के आमने-सामने का समय आ रहा है, जैसे अमरीका और ब्रिटेन में सदियों से होता रहा है.<br />वैसे इन सालों से बार बार पार्टियों के विभाजन व गठबंधन होकर स्थिति ऐसी ही रूप में आ गई तो है. मगर यह खुले आम अच्छी मानने वाली बात है?<br /><br />द्वि-महा-पार्टियों की एक तरफ़ <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Liberal_Democratic_Party_(Japan)">एलडीपी</a> (<span style="color:#666666;">自民党</span>;जिमिन-तो, नाम तो उतारतावादी जैसा, लेकिन रूढ़िवादी), आधी सदी से ज़्यादा सालों से (लगभग) लगातार शासन में रह रही है. दूसरी तरफ़, <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Democratic_Party_of_Japan">डीपीजे</a> (<span style="color:#666666;">民主党</span>;मिंशु-तो) गठित होकर एक दशक भी नहीं हुआ है, और अब तक सत्ता में कभी नहीं आया है. तो कैसे इस स्थिति को अमरीका-ब्रिटेन की द्वि-महा-पार्टियिक राजनीति की तरह मानी जा सकती है, जहाँ दोनों पार्टी बराबर सत्ता में आती बदलती रह चुकी हैं.<br />इस लिए उस नज़र से यहाँ की राजनैतिक स्थिति को अमरीकी-ब्रिटेन की से एक ही तरह देखना उचित नहीं होगा.<br /><br />फिर... द्वि-महा-पार्टियिक राजनीति की सबसे बड़ी दिक़्क़त यह है कि कभी वोट करने में फ़र्क़ नहीं पड़ती या वोटिंग से पहले ऐसा लग जाता है, जब दोनों पार्टियों से भी पूरी सहमत न हो पाए. मेरा मतलब यह नहीं है कि सब पार्टी की महाकांक्षाओं में कोई ख़ास फ़र्क़ नहीं (मगर यह भी कभी तो हो सकता है). वह ऐसी दिक़्क़त है कि आगर किसी मुद्दे को लेकर एक पार्टी से सहमत हूँ, दूसरे मुद्दों को लेकर तो असहमत...</span><br /><br /><span style="color:#666600;">क्या करूँ यार, शायद मेरी तरह लाखों मतदाता जोकि आम तौर पॉलिटिक्स-वॉलिटिक्स के बारे में विस्तार से साचे तो नहीं रहते हैं. लेकिन वोट तो करना ही पड़ेगा इसी बार तो ज़रूर. कई मुद्दों को लेकर इस देश का भविष्य जिस राह पर चलेगा, उसको चुनना है. वैसे जो नतीजा निकलेगा उससे हालत सुधरेगा या बिगड़ेगा, यह भी तो न पता (जो भी जीतेंगे, वह नतीजा तो ज़रूर नहीं होगा जिससे सबके लिए फ़ायदा हो) .<br />बीस की उम्र से अधिकार हासिल कर जिन कई बार वोट किया है, हर समय ऐसा महसूस कभी नहीं हुआ कि कुछ तो अपने वोट से बदलेगा. फिर भी इस बार तो बहुत उम्मीदें हैं कि कुछ बदलेगा या बदलने को है.</span><br /><br /><span style="color:#006600;">आख़िर, इस चुनाव में दो रास्ते हैं कि कोइज़ुमि जी हटेंगे या बढ़ेंगे. मेरी नज़र से वे अच्छे तो हैं मगर अब प्रधानमंत्री के पद से उन्हें हटने चाहिए भी.<br />उनकी सबसे बड़ी ग़लती यह है कि उन्होंने इराक़ में सेना भेजी है बग़ैर काफ़ी बहस व अवाम की सहमति. हाँ, सियासत की दुनिया में केवल विचार से पॉलिसी नहीं चलती, ताक़तवर शख़्सियत की ज़रूरत है. कभी तो ऐसे बड़े फ़ैसले करने के लिए ज़बरदस्ती भी करनी पड़ेगी, जिनको लेकर आम लोगों की राय विशेषज्ञों से अलग हो, अगर नहीं तो सियासत पॉप्युलिज़्म में बह जाएगी. मगर यह तरीक़ा भी एक-दो बार का ही है, आगे कोई न सहना न अनदेखी करना पाएँगे.<br />उन्होंने "देश के लिए, अवाम के लिए" वाले बहाने से अमीर की तरह बिना अवाम से कुछ बताए बहुत अहम मुद्दे तय कर चुके हैं, फिर इस समय जब उनकी महत्वपूरणतम डाक-निजीकरण बिल राज्यपरिषद में अटक गई तो अचानक भंग घोषित कर कहा दिया कि जनता से पूछेंगे हमारे साथ इस देश का पुनर्निर्माण अंत तक पूरा कर लेंगे या नहीं...<br />अभी उनके कहने से मेरा कोई भरोसा नहीं... जीतेंगे तो फिर न कुछ सुनेंगे अवाम की, न पूछेंगे जनता से.</span><br /><br /><div align="center"><img style="MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" src="http://photos1.blogger.com/blogger/6447/715/320/%3F%3F%3F%3F%3F%3F%3F%3F%3F%3F%3F%3F%20%3F%3F%3F%3F%3F%3F%3F%3F%3F%3F%3F%3F%3F%3F%3F%3F%3F%3F%3F%3F%3F.jpg" border="0" / title="kal kya hoga kis ko pata..."></div><br /><span style="color:#990000;">फिर भी अब तक ऐसे दूसरे शख़्स नज़र में नहीं आए हैं जिनके पास कोइज़ुमि की तरह देश चलवाने को काफ़ी हासियत हो. यह भी दूसरी दिक़्क़त तो होगी यहाँ की सियासत की...</span><div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/9679049-112611847006131786?l=namaste20matsu.blogspot.com'/></div>namastehttp://www.blogger.com/profile/11800756932934836171noreply@blogger.com3tag:blogger.com,1999:blog-9679049.post-1126198132374303692005-09-09T01:48:00.000+09:002005-09-09T01:48:52.383+09:00ऑटरिक्श पे भी शेर...<span style="color:#333333;">आजकल खींचा मनपसंद फ़ोटो...</span><br /><br /><br /><a href="http://photos1.blogger.com/blogger/6447/715/1600/%3F%3F%3F%3F%3F%3F%3F%3F%3F%3F%3F%3F%20%3F%3F%3F%3F%3F%3F%3F%3F%3F%3F%3F%3F%3F%3F%3F%3F%3F%3F%3F%3F%3F%3F%3F%3F%20%3F%3F%3F%20%3F%3F%3F1.jpg"><img style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; CURSOR: hand; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://photos1.blogger.com/blogger/6447/715/400/c0072728_2249312.jpg" border="0" title="Click to View Big"/> </a><p align="center"><br /><br /><span style="color:#996633;">* * * * * * * * * * * * * * * *</span><br /><span style="color:#ff0000;">कैई बह गये बोतल के इस बन्द<br />पानी में, डूबे जो पैमाने में निकले<br />ना फिर जिन्दगानी में</span><br /><span style="color:#996633;">* * * * * * * * * * * * * * * *</span></p><br /><br /><br /><p align="right"><span style="color:#666600;">...अरे, क्या हुआ यार?<br />…इंजिन ख़राब हो गई है?</span><br /><br /><span style="color:#666666;">...चलती रहे तेरी जिंदगी भी...</span></p><div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/9679049-112619813237430369?l=namaste20matsu.blogspot.com'/></div>namastehttp://www.blogger.com/profile/11800756932934836171noreply@blogger.com2tag:blogger.com,1999:blog-9679049.post-1122759331631331802005-07-31T11:00:00.000+09:002005-07-31T23:52:52.283+09:00भारतीय ब्लॉगर जापानी में भी...<span style="color:#000099;">हरेक दिन दूसरों के बलॉग देखता हूँ तो वह भी एक पक्का जापानी होने के नाते ज़्यादातर अपनी मातृभाषा, यानी जापानी में लिखे ब्लॉग यहाँ-वहाँ घूमके देख लेता हूँ...</span><br /><br /><span style="color:#ff0000;">वैसे आजकल </span><a href="http://blog.livedoor.jp/gai_jin/"><span style="font-size:180%;">यही ब्लॉग</span></a><span style="color:#ff0000;"> घूमते मिल गया...</span><br /><span style="color:#cc9933;">(*शायद यहाँ देखने वालों में ज्यादातर लोगों को जापानी भाषा समझ में नहीं आएगी, तो <em><a href="http://translate.google.com/translate?u=http%3A%2F%2Fblog.livedoor.jp%2Fgai_jin%2F&langpair=ja%7Cen&amp;amp;amp;amp;amp;amp;amp;amp;amp;amp;amp;amp;amp;amp;amp;amp;amp;amp;amp;hl=en&c2coff=1&ie=UTF-8&oe=UTF-8&prev=%2Flanguage_tools">यहाँ</a></em> या <em><a href="http://www.excite.co.jp/world/english/web/?wb_url=http%3A%2F%2Fblog.livedoor.jp%2Fgai%5Fjin%2F&wb_lp=JAEN&wb_dis=2">यहाँ</a></em>, ज़रा अंग्रेज़ी में अनुवादित पन्नों से देखें.)</span><br /><br /><span style="color:#996633;">यहाँ जापान में कॉम्प्यूटर-इंजीनियर का काम करने वाले एक भारतीय साहब के क़लम से है.<br />उनका नाम है <span style="color:#ff6600;">मनीष प्रभुणे जी</span>, जो उनके ब्लॉग के अनुसार मुंबई से आए हैं. </span><br /><br /><span style="color:#996633;">ब्लॉग का नाम <span style="color:#ff6600;">"外国人日記"</span> <span style="color:#ff9900;">(गाइकोकु-जिन निक्कि)</span> का मतलब है <span style="color:#ff9900;">"विदेशी का रोज़नामचा"</span>.</span><br /><span style="color:#cc9933;">( <span style="color:#006600;">"गाइकोकु"</span> : "विदेश" / <span style="color:#006600;">"-जिन"</span> : मूलतः "आदमी", किसी देश या जगह के नाम के साथ "-ई लोग" का शब्द बनता है. )</span><br /><br /><span style="color:#663333;">और मज़े की बात यह है कि ब्लॉग के URL के अंत में रखे <span style="color:#ff6600;">"<strong> /gai_jin/</strong> "</span>, जिनका अक्षरानुवादित मतलब होता है <span style="color:#ff6600;">"बाहर का आदमी"</span>, कभी कभी बरी तरह ग़ैर-देशियों को पहचानने के लिए भी जापानी-स्लैंग में बोला जाने वाले इसी शब्द को, शायद मनीष जी ने अपनी तरफ़ से मज़ाक़ में बनाने को रखा होगा. </span><br /><br /><br /><span style="color:#330099;">पहली बार मनीष जी का बलॉग देखके बहुत अच्छा लगा और यह भी सोचा कि मैं भी उसी तरह मेहनत करके इसी हिंदी ब्लॉग जारी रखूँगा और थोड़ी जल्दी से लिखता जाऊँगा, कम से कम कोशिश तो करनी होगी...</span><div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/9679049-112275933163133180?l=namaste20matsu.blogspot.com'/></div>namastehttp://www.blogger.com/profile/11800756932934836171noreply@blogger.com2tag:blogger.com,1999:blog-9679049.post-1119208680919894612005-06-27T23:56:00.000+09:002005-12-23T03:41:28.986+09:00भोपाल बारह बजकर पाँच मिनट<span style="color:#996633;">आजकल यह किताब कहीं कॉम्यूटर ट्रेन में पढ़ते पढ़ते आज ही सब पढ़ चुका हूँ... </span><br /><br /><span style="color:#009900;">यह जो किताब है, सन् 1984 दिसंबर में हुए <a href="http://news.bbc.co.uk/1/hi/programmes/bhopal/default.stm">वही हादसे</a> पर दो फ़्रांसिसी लेखकों द्वारा लिखी गई है.</span><br /><p align="center"><img style="BORDER-RIGHT: #000000 2px solid; BORDER-TOP: #000000 2px solid; MARGIN: 2px; BORDER-LEFT: #000000 2px solid; BORDER-BOTTOM: #000000 2px solid" src="http://photos1.blogger.com/img/290/2705/400/DSCF1261.jpg" border="0" /></p><br /><span style="color:#009900;">यह कहानी एक आदिवासी परिवार के साथ चलती है, जो मूलतः उड़ीसा में खेती करते थे लेकिन अचानक सूखे और फ़सल खाने वाले कीड़ों के मारे अपनी ज़मीन छोड़नी पड़ी, फिर भोपाल में रेल-पतरी के एक किनारे पर आ बसा, जहाँ के पास बाद में यूनियन कार्बाइड का कारख़ाना बन गया. </span><br /><br /><span style="color:#33cc00;">मेरे विचार में लेखकों का मक़सद केवल इस महादुर्घटना के लिए किसी ज़िम्मेदारों को ढूँढ़ निकालके आरोप लगाना नहीं, बल्कि इस युग में विश्व-स्थल से चल रहे कृषि उद्योग के व्यापार, यानी "ग्रीन बिज़्नेस" के मामलों पर एक सवाल उठाना है, जिसमें "विकसित" देशों या "पहली दुनिया" के बहुराष्ट्रीय कंपनियों से "विकासशील" देशों या "तीसरी दुनिया" के असंख्य किसानों का शोषण होता है, कहीं, कभी, और किसी रूप में.</span><br /><br /><span style="color:#009900;">कीटनाशक के अलावा, वैसे कहानी के अंत में एक सेल्ज़मैन विशेष बीज बेचने को आता है जहाँ मुख्या-चरित्र वाली अदिवासी परिवार की लड़की ने हादसे से बड़ी ख़ुशनसीब और साथ ही मुश्किलों से ज़िंदा बच पाने के बाद अपने पति के साथ भोपाल से बाहर गाँव में छोटी खेतीबारी शुरू किया है. उस सेल्ज़मैन का कहना है कि उसकी कंपनी से परिष्कृत तरह-तरह के बीज ख़ुद ही कीटों से अपने को बचा सकते हैं और बड़ी पुष्टता के कारण किसानों के लिए बहुत फ़ायदेमंद हैं. फिर ख़ुशी से वे उसकी बात मान लेते है, बिना इसी जानकारी दिए हुए कि उन बीजों में प्रजनन की क्षमता नहीं है, मतलब आगे ऐसा हो जाएगा किसानों को हमेशा अगली फ़सल के लिए कंपनी से बीज खरीदते रहने पड़ेंगे...</span><br /><br /><br /><br /><span style="color:#cc6600;">वैसे, यहीं जापान में भी किसानों की हालत अच्छा तो नहीं है. पेशे से खेती करना आजकल बिल्कुल कठिन हो गया है. पहले से सरकार के कृषि-नीति के तहत देश भर में खेतों का कुल-क्षेत्र बहुत कम हो जाते आ रहा है. अब सिर्फ़ चावल का फ़सल देश के ज़मीन से उतनी काफ़ी तादाद में मिल पाता है जितनी माँग राष्ट्रीय उपभोग में होती है. फिर खेती के बदले किसानों के ज़्यादा संतानों ने अपने गाँव से विदा कर नौकरी की तलाश से शहर में आ बसे हैं.<br />ऐसे ओद्योगकि व सामाजिक बदलाव यहाँ लगभग इस आधी सदी से, यानी दो तीन पीढ़ियों से हुआ.</span><br /><br /><span style="color:#999900;">यहाँ तोक्यो में पहले से ज़्यादा मिलने वाली सब्जियाँ-माहियाँ देश के दूर अलग-थलग कोनों से आ पहुँचती हैं, और अब समुद्र पार कर बहुत विदेशों से भी... सबज़ियाँ चीन और दक्षिण-पूर्वी एशिया से, सॉय-बींज़ अमरिका से, मछलियाँ रूस या उत्तर यूरोप से तक...</span><br /><br /><span style="color:#990000;">ऐसा लगता है कि हमें, यानी इस आधुनिक काल में बड़े बड़े शहरों में रहने वालों को, यह सोचना चाहिए वे चीजें जो हम खाते रहते हैं कहाँ कहाँ से आती हैं और किन किनके हाथ से कैसे बनती हैं. मुझ जैसे करोड़ों-अरबों लोग, यानी शहर में ही जिसकी ज़्यादातर ज़िंदगी गुज़रती है, इसी बात कभी कभी भूल जाते हैं या विस्तार से तो नहीं सोचेते. इसके बावजूद कि वैज्ञानिक रूप में तो जानते ही हैं खाना ज़मीन-मिट्टी से आता है फ़कटरी-मार्केट से नहीं, वास्तव में ऐसा महसूस करने का मौक़ा रोज़ बहुत कम ही होता है. </span><br /><br /><span style="color:#993300;">और ऐसा भी लगता है कि जो खाने मूल जगह से लंबे रास्ते तय करके अब घर में मेज पर परोसे हुए हैं, ये खाने खाने वाले हम आख़िर कौन हैं? इसी ज़मीन से अपने शरीर का क्या रिश्ता?....<br />...पैकेजों पर छपे मूल-देशों के नाम देखकर न जाने एक सवाल मन में खड़ा होता है; क्यों यह होता है ऐसा?</span><br /><br /><span style="color:#996633;">फिर भी...सोचने से आगे क्या क़दम उठाना होगा? ...यह भी तो न पता मुझे.<br />ऐसे भी थोड़ा लगता है शायद ऐसे ही जीना पड़ता है...या नहीं तो? </span><div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/9679049-111920868091989461?l=namaste20matsu.blogspot.com'/></div>namastehttp://www.blogger.com/profile/11800756932934836171noreply@blogger.com1tag:blogger.com,1999:blog-9679049.post-1117008931023131052005-05-25T23:31:00.000+09:002005-05-26T15:47:34.296+09:00चौबीस बरस का...<span style="color:#009900;">आज मेरा जन्मदिन था, जो पता चलते ही अब गुज़र जा रहा है... </span><br /><span style="color:#ff6666;">चौबीस साल का</span> <span style="color:#006600;">बनने में कोई ख़ास महसूस नहीं हुआ, जैसे न जाने कैसे ही बन तो गया हूँ.</span><br /><br /><span style="color:#666600;">लगता है...गुज़र जाएगी यों ही जवानी...</span><div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/9679049-111700893102313105?l=namaste20matsu.blogspot.com'/></div>namastehttp://www.blogger.com/profile/11800756932934836171noreply@blogger.com5