tag:blogger.com,1999:blog-9521204.post-1118507661781706962005-06-11T09:20:00.000-07:002005-06-11T09:34:21.793-07:00कविता प्रति-कविताश्री कालीचरण जी ने अपने भात-भाजी चिठ्ठे में <a href="http://hankabaji.blogspot.com/2005/06/good-morning.html">शुभ-प्रभात </a>पर एक छोटी परन्तु बहुत ही मनमोहक कविता लिखी है । चूंकि, बिना मूल कविता को उल्लेखित किये हुए, इसकी प्रति-कविता अपना भावार्थ नहीं दे पायेगी, अतैव बिना उनसे अनुमति लिये हुए, मूल कविता का यहाँ उल्लेख कर रहा है । आशा करता हूँ कि यह चिठ्ठाकारी के मूल नियमों के तहत मान्य है ।<br /><br />श्री कालीचरण जी ने लिखा : <br /><br />"सुबह उठा तो यह पाया <br />िप्रतम हाथो मे हाथ धरे बोली<br />आपकी सान्सो मे मेरी सान्से रमी है<br />अब उठो भी, एक कप चाय की कमी है ।"<br /><br /><br />इसे पढ़ कर, जो भाव में मन में आया, उसे इस प्रति-कविता के द्वारा प्रस्तुत कर रहा हूँ:-<br /><br />"सुन कर उनकी बात, <br />लिया मैने अपने हाथो में उनका हाथ, और कहा,<br />चाय तो में बना लाउँगा, प्रिये, <br />पर, चाह तो अभी भी बनी हुई है । "Dhananjaya Sharmahttp://www.blogger.com/profile/11408039214418538034noreply@blogger.com