tag:blogger.com,1999:blog-95212042007-05-02T10:11:05.601-07:00कुछ बतकहीDhananjaya Sharmahttp://www.blogger.com/profile/11408039214418538034noreply@blogger.comBlogger19125tag:blogger.com,1999:blog-9521204.post-1125842765094120782005-09-04T07:04:00.000-07:002005-09-04T07:06:05.103-07:00आओ हम सब मिलकर इस धरती को स्वर्ग बनाएँ !<em>आओ हम सब मिलकर इस धरती को स्वर्ग बनाएँ,<br />हम सब स्वर्गीय हो जाएँ ।</em><br /><br />सुना है, वहाँ स्वर्ग में झगड़े नहीं होते,<br />छोटी-छोटी बातों में रगड़े नहीं होते ।<br />इस दुनिया से तो हम झगड़ों को मिटा ना सके,<br />खुद भी इस तरह उलझे, कि चाह कर भी सुलझा न सके ।<br />तो आओ हम सब मिलकर इस धरती को स्वर्ग बनाएँ,<br />हम सब स्वर्गीय हो जाएँ ।<br /><br />सुना है, स्वर्ग में बोलते है सब मौन की भाषा,<br />सब समझते है, एक-दूसरे की मन की अभिलाषा ।<br />यहाँ आज़ चर्चा होती रहती है कि किसने क्या कहाँ ?<br />उसने क्यों कहाँ? उसने कैसे कहाँ? उसने कब कहाँ?<br />शब्द दिया प्रभु ने हमें, मन की खुशी को व्यक्त करने को,<br />हमने बना डाला शब्दों को तीर-तलवार, मनों को छलनी करने को ।<br />तो आओ हम सब मिलकर इस धरती को स्वर्ग बनाएँ,<br />हम सब स्वर्गीय हो जाएँ ।<br /><br />समस्त जीवन भर, हम कहते-सुनते रहते है, कि<br />ये करोगें तो नरक में जाओगे, वो करोगें तो नरक में जाओगे,<br />पर बाद मरने के, कोई नहीं कहता है कि वो नरकवासी हो गया ।<br />चाहे हो धर्म या फ़िर हो ज्ञान, सब बता रहे है यही कि <br />इस समय, जीवन घोर नरक हो गया है इस युग में ।<br />तो आओ हम सब मिलकर इस धरती को स्वर्ग बनाएँ,<br />हम सब स्वर्गीय हो जाएँ ।<br /><br />बीमारी, गरीबी, भूख-प्यास, हर तरफ़ बढ़ते हुए अत्याचार-अनाचार,<br />जीवन की दौड़ में खोता हुआ बाल-पन, भ्रमित यौवन,<br />बिसराया हुआ वृद्धापन, अपने को समझने की कोशिश में करता हुआ पौढ़ापन । <br />ये उजड़ते हुए वन, सुकड़ती हुई नदियां, पिघलती हुई बर्फ़, <br />हर तरफ़ उमड़ता हुआ काल का कोलाहल, बदलती हुई धरती,<br />पिघलता हुआ आसमान, इन सब को तो शायद अब हम रोक ना पायेगें,<br />इस जीवन को, इस धरती को, इस आसमान को, इस मन को,<br />हम दिन-प्रतिदिन और नारकीय बनाते जायेगें । <br />तो आओ हम सब मिलकर इस धरती को स्वर्ग बनाएँ,<br />हम सब स्वर्गीय हो जाएँ ।<br /><br />धनन्ञ्जय शर्मा <br />जामनगर, भारत । <br />४।९।२००५।Dhananjaya Sharmahttp://www.blogger.com/profile/11408039214418538034noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-9521204.post-1119783572715244922005-06-26T03:06:00.000-07:002005-06-26T07:03:09.140-07:00"तो तुम आये थे" के आगेसुश्री प्रत्यक्षा जी अपने चिठ्ठे में एक बहुत ही सुन्दर लघु-कविता लिखी है । <br /><br /><a href="http://pratyaksha.blogspot.com/2005/06/blog-post_22.html">रात भर ये मोगरे की खुशबु कैसी थी<br />अच्छा ! तो तुम आये थे नीदों में मेरे ? </a><br /><br />इतने कम शब्दों में इस मानवीय भाव को हिन्दी कविता के द्वारा प्रत्यक्षा जी ने बहुत सशक्त रूप से प्रस्तुत किया गया है । <br /><br />उसी भाव को आगे बढ़ाने के दिशा में मेरा यह प्रयास है । अपने विवाह-पूर्व दिनों को याद करते हुए, अपनी पत्नी गीता को यह कविता समर्पित कर रहा हूँ । आशा करता हूँ कि यह कविता आपको भी पसन्द आयेगी । <br /><br /><strong>होता रहा रात भर, एक रेश्मी छुअन का अहसास । <br />अच्छा ! तो तुम आये थे नीदों में मेरे पास ? <br /><br />जागने के बाद भी, होते रहे मीठे मेरे जज़बात । <br />अच्छा ! तो तुम आये थे सपनों में मेरे, कल रात ? <br /><br />अब तो मुश्किल है दिन का गुजारना, और इन्तज़ार है, कि कब होए रात । <br />हो सकता है कि सपना कभी हकीकत बन जायें, और रहो तुम हमेशा मेरे पास, हर दिन और हर रात ॥ </strong><br />- धनञ्जय शर्मा<br />२६।६।२००५Dhananjaya Sharmahttp://www.blogger.com/profile/11408039214418538034noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-9521204.post-1118507661781706962005-06-11T09:20:00.000-07:002005-06-11T09:34:21.793-07:00कविता प्रति-कविताश्री कालीचरण जी ने अपने भात-भाजी चिठ्ठे में <a href="http://hankabaji.blogspot.com/2005/06/good-morning.html">शुभ-प्रभात </a>पर एक छोटी परन्तु बहुत ही मनमोहक कविता लिखी है । चूंकि, बिना मूल कविता को उल्लेखित किये हुए, इसकी प्रति-कविता अपना भावार्थ नहीं दे पायेगी, अतैव बिना उनसे अनुमति लिये हुए, मूल कविता का यहाँ उल्लेख कर रहा है । आशा करता हूँ कि यह चिठ्ठाकारी के मूल नियमों के तहत मान्य है ।<br /><br />श्री कालीचरण जी ने लिखा : <br /><br />"सुबह उठा तो यह पाया <br />िप्रतम हाथो मे हाथ धरे बोली<br />आपकी सान्सो मे मेरी सान्से रमी है<br />अब उठो भी, एक कप चाय की कमी है ।"<br /><br /><br />इसे पढ़ कर, जो भाव में मन में आया, उसे इस प्रति-कविता के द्वारा प्रस्तुत कर रहा हूँ:-<br /><br />"सुन कर उनकी बात, <br />लिया मैने अपने हाथो में उनका हाथ, और कहा,<br />चाय तो में बना लाउँगा, प्रिये, <br />पर, चाह तो अभी भी बनी हुई है । "Dhananjaya Sharmahttp://www.blogger.com/profile/11408039214418538034noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-9521204.post-1117995492290106272005-06-05T11:15:00.000-07:002005-06-12T00:31:41.973-07:00एक कविता का अनुवादश्री जयमिन पटेल द्वारा ई-मेल में प्राप्त एक अनुरोध के फ़लस्वरूप, पहली बार किसी एक कविता के हिन्दी अनुवाद का अवसर मिला । आप सभी के समक्ष इस अनुवाद को प्रस्तुत कर रहा हूँ । आशा करता हूँ कि हिन्दी अनुवाद में कविता का मूल भाव प्रकट हो रहा है । <br /><br /><strong>गुलाब होते है लाल, <br />बनफ़शे होते है बैगनी ।<br />अपनी पहचान को बदल सकता हूँ मै कभी भी<br />तुम्हें प्यार करते रहने को बदल सकता हूँ, कभी नहीं ॥</strong><br /><br /><em>"Roses are red<br />Violets are Blue<br />I can change my culture<br />But i can never change loving you."</em><br /><br />दिनांक १२।६।२००५ को जोड़ा :<br />--------------------<br />एक बार फ़िर, श्रीमती जी ने फ़िर सिद्ध कर दिया कि वे "श्री" + "मति" दोनों की स्वामिनी है और यदि अंग्रेजी में कहा जाएँ तो "Better Half" । उन्होनें इसी कविता का अपनी काव्यात्मक शैली और अपने परा-स्नातक हिन्दी ज्ञान का उपयोग करके इस प्रकार किया :<br /><br />लाल होते है गुलाब, नीले बनफ़ूल ।<br />खुद को बदल सकता हूँ, पर <br />तुम्हें ना-चाहने की, कर नहीं सकता हूँ भूल ॥Dhananjaya Sharmahttp://www.blogger.com/profile/11408039214418538034noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-9521204.post-1117886776714282402005-06-04T05:05:00.000-07:002005-06-04T05:06:16.716-07:00ट्रकों के पीछे लिखे जीवन के मूल्यहाई-वे पर यात्रा करने के दौरान, मै हमेशा आगे चलने वाले ट्रकों के पीछे लिखी हुई, उक्तियों/शेरो-शायरियों को पढ़ता रहता हूँ । जीवन के मूल्यों पर दो-लाइनों में, इससे अधिक किसी भी जगह पर, यह ज्ञान शायद ही उपलब्ध होगा । हाल ही, मै अपने निवास-स्थल से जामनगर की यात्रा कर रहा था । आगे जाने वाले ट्रक के पीछे लिखा था :<br /><br />"मेरा सो जावे नहीं, जावे सो मेरा नहीं ।"<br /><br />मुझे लगता है, मात्र सिर्फ़ इस विचार को ही आत्मसात करने से, और किसी तनाव-मुक्त करने की प्रक्रिया या उपचार की आवश्यकता नहीं होगी ।Dhananjaya Sharmahttp://www.blogger.com/profile/11408039214418538034noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-9521204.post-1117727556080523582005-06-02T08:50:00.000-07:002005-06-02T08:52:36.083-07:00मैनड्रिवा या मैनड्रीवा ?हाल ही में, मैनड्रैकसॉफ़्ट ने कनेक्टीवा नामक कम्पनी के साथ साझापन समझौता किया है, जिसके परिणाम-स्वरूप, इन दोनों ने आपस में एकाकार होने का निर्णय लिया । इस विलय के कारण, मैनड्रैकलिनक्स को भी एक नया नाम मिल गया । यह नया नाम Mandriva Linux है । <br /><br />अब इसे हिन्दी में मैनड्रिवा, या फ़िर मैनड्रीवा लिखा जाएँ ?<br /><br />आप सभी के मार्गदर्शन की प्रतिक्षा रहेगी । <br /><br />धन्यवाद ।<br /><br />धनञ्जय शर्माDhananjaya Sharmahttp://www.blogger.com/profile/11408039214418538034noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-9521204.post-1117474362561125182005-05-30T10:27:00.000-07:002005-05-30T11:18:02.310-07:00मेरा परिचयमेरा परिचय यानी कि "मै कौन हूँ?"<br /><br />बहुत ही जटिल प्रश्न है, जिसका उत्तर पाने के लिए बड़े-बड़े ज्ञानी-ध्यानी लगे रहते है । "मै कौन हूँ?" में तीन शब्द है । प्रथम है "मै" । अब आज़ तक यही सुना व पढ़ा कि इस "मै" को हटाओ तभी अपने वास्तविक रूप को जान पाओगे अर्थात मै "मै" तो नहीं हो सकता । अब बचा "कौन हूँ?" अब यह "कौन" तो क्षण-प्रति-क्षण' बदलता रहता है ? कभी मै पिता हो जाता हूँ, तो कभी पति । कभी मै "दल-नायक" तो कभी "दल का एक सदस्य । कभी एक चिठ्ठाकार हो जाता हूँ, तो कभी एक चिठ्ठा पाठक । इसलिए, किसी एक क्षण के लिए,यह बताना कठिन है कि "कौन हूँ?" अब बचा "हूँ?" अब यह "हूँ" भी अज़ब है क्योंकि जो मै कल था, वह आज़ नहीं हूँ, जो आज़ हूँ, वो कल नहीं रहूगा । इसलिए कभी-कभी लगता है कि वास्तव में, मै "हूँ" भी कि नहीं ।<br /><br />पर जो भी हो, यह कार्य करना तो है क्योंकि हम सभी के प्रिय जीतू भाई ने "अपना परिचय" भेजने के लिए बहुत पूर्व आग्रह किया था । यह कार्य तो बायो-डाटा बनाने से भी किलष्ट प्रतीत होता है क्योंकि अपनी इस जीवन की अभी तक की समस्त यात्रा को चंद शब्दों में समेट कर लिखना भी "गागर में सागर" भरने के समान है । जीतू-भाई के आग्रह को शिरोधार्य करते हुए, अपना परिचय लिखने की कोशिश कर रहा हूँ, आशा करता हूँ कि आपको यह रोचक व पढ़ने-योग्य लगेगा । हमेशा की भांति, आपके सूझावों का स्वागत रहेगा, जो कि ना सिर्फ़ मेरी भाषा व वर्तनी के दोषों को दूर करेगें बल्कि मेरे जीवन को भी और अधिक दोष-मुक्त करने में सहायक होगें ।<br /><br />मेरे इस जीवन की यात्रा का आरम्भ वर्ष १९६२, माह जनवरी में "नवाबों की नगरी" लखनऊ, उत्तर-प्रदेश, भारत में हुआ । आठवीं तक की शिक्षा "कपड़ा मजदूरों की कर्म-भूमि" कानपूर में, ९वी से लेकर १२वी तक की शिक्षा, "ब्रज-भूमि" हाथरस में और विज्ञान में स्नातक की उपाधि "भारतीय स्वतंत्रता सेनानियों की विद्या-पीठ" डी०ऐ०वी० कालेज, कानपुर से प्राप्त की । एम०एस०सी० (भौतिक-विज्ञान) की शिक्षा के दौरान, वर्ष १९८२ में कम्प्यूटर के कीड़े ने ऐसा काटा कि एम०एस०सी० को बीच में छोड़ कर सी०एम०सी०, दिल्ली से साफ़्टवेयर के कोर्स करके, कानपुर में अपने कम्प्यूटर की कैरियर की शुरूवात की । बाद में बड़ोदा, गुजरात से, इनवेन्टरी-प्रबंधन व स्टोर-प्रबंधन में डिप्लोमा भी किया । "करत-करत अभ्यास के, जड़वत होत सुजान" नामक कथन को सत्य मानते हुए, अनेकों आपरेटिंग-सिस्टमों, डाटाबेसों, आफ़िस-आटोमेशन कार्यक्रमों, प्रोग्रामिंग भाषाओं को जानने-समझने का प्रयास किया पर अंत में प्यार हुआ "डाटाबेस-प्रबंधन व सामग्री-प्रबंधन" से । तब से इन दो की मदद लेते हुए, रोजी-रोटी की तलाश में, टैनरी, खाद-कारखाना, कृत्रिम अंग निर्माण कारखाना, खान, कैमिकल प्लांट, कम्प्यूटर परामर्श प्रतिष्ठानों, पैट्रो-रसायन कारखानों व रिफ़ानरी की यात्रा की है । <br /><br />वर्तमान में, भारत के अग्रणी व्यापारिक प्रतिष्ठान रिलायन्स समूह की ई०पी०सी० ( इंजीनियरिंग प्रोक्योरमेन्ट कन्सट्रक्सन) इकाई, रिलायंस इन्जीनियरिंग ऐसोसियेट प्रा० लिमिटेड, ज़ामनगर में, वरिष्ट-प्रबंधक(सिस्टम) के रुप में कार्यरत हूँ । <br /><br />शुरू से, त्रिकोण के चौथे कोण को देखने, जानने व समझने का प्रयास रहा । चाहे इसे आप मेरी मानव-प्रकृति कहे या एक "Aqurius" की इस संसार को एक अलग नजरिये से समझने की चेष्टा या फ़िर सप्त-ग्रह योग में जन्में हुए व्यक्ति की एक स्वाभाविक प्रवृति । <br /><br />पत्नी गीता, जिनका दीदार विवाह-पूर्व नहीं किया था, परन्तु विवाह-उपरान्त निरंतर दिन-प्रति-दिन करता रहता हूँ । एक पुत्री रूपाश्री व एक पुत्र ऐश्वर्य के जन्म-स्वरूप, पिता बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ । "यत्र नारी पूजन्यते, तत्र देवता बसन्ते" अर्थात जहाँ नारी की पूजा होती है, वहाँ देवताओं का वास होता है नामक कथन को शिरोधार्य करते हुए, विवाह-पूर्व मातृ-भक्ति में और विवाह-उपरांत पत्नी-भक्ति में जीवन व्यतीत हो रहा है । <br /><br />देश व मातृ-भाषा हिन्दी से प्रेम के कारण, जीवन के आरम्भ से, जब से हिन्दी में पढ़ना आया, जो कुछ भी सामने आया, उसे पढ़ डाला । मुझे आज भी याद आता है, बेसिक लैग्वेज़ में एक अपना प्रोग्राम, जिसेमें मैने स्टार चिन्ह्न का उपयोग करके सिर्फ़ अपना नाम लिखा था । बाद में, इसी शैली का उपयोग करके, मेरे उस समय के प्रतिष्ठान के लिए, बहुत सारे विभागों व अन्य नोटिस-बोर्डो की विषय-वस्तुओं को हिन्दी में लिख कर देना पड़ा । वैसा ही आनन्द में, उस समय भी आया, जब मैने श्री आलोक कुमार जी के याहू-विपत्र-समूह में शामिल होने के लिए, अपनी याहू-प्रोफ़ाइल में अपना नाम हिन्दी में लिखा । <br /><br />उस दौर से लेकर आज तक ई-हिन्दी का सफ़र हमेशा मेरी सामने एक किताब जैसा खुला रहता है । ई-हिन्दी, यूनिकोड तकनीकी व लिनक्स के समन्वय के उपलब्ध हो जाने के उपरान्त, विगत ३-४ वर्षों से, हिन्दीकरण में अपना सक्रिय योगदान देने में समर्थ हो पा रहा हूँ । <br /><br />आज आप सभी चिठ्ठाकारों की रचनाओं को पढ़ते हुए, ई०-हिन्दी को एक नये आयाम में जाते हुए देख रहा हूँ । और अब लगता है कि जिस हिन्दी की दुर्दशा की जिक्र श्री अतुल श्रीवास्तव जी ने अपने चिठ्ठे लखनवी।ब्लागस्पाट।कॉम में किया है और जो हिन्दी चंद सरकारी व गैर-सरकारी संस्थानों के अन्दर, सस्ती व फ़ूहड़ उपन्यासों व किताबों में, सिमटते हुए कवि-सम्मेलनों व मुशायरों में और बिना-सर-पैर के गानों में सिमट कर रह गयी थी, वो अब ई०हिन्दी के माध्यम से, अब पुरानी दयनीय काया को छोड़ कर, एक नये रूप में जन्म ले रही है और अब देरी नहीं है, जब यह एक बार फ़िर से ना सिर्फ़ भारत की, बल्कि समस्त विश्व के जन-जन की भाषा बन जायेगी । <br /><br />आपका <br /><br />धनञ्जय शर्मा <br />जामनगर, भारत से । <br />३०।५।२००५Dhananjaya Sharmahttp://www.blogger.com/profile/11408039214418538034noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-9521204.post-1108827755853423282005-02-19T07:35:00.000-08:002005-02-19T07:42:35.856-08:00मध्यमा की महिमा व हिन्दी डिक्टेशन सॉफ़्टवेयरपिछले कुछ दिनों से, मेरे दाँये हाथ की मध्यमा में चोट लग जाने के कारण, समस्त हिन्दी की लिखा-पढ़ी व कुँजी-पटल का उपयोग बन्द हो गया था । इसी कारण-वश, ब्लागजीन के लिए प्रिय भाई जितेन्द्र जी के "अपना परिचय" दिये जाने के आग्रह को भी पूरा कर पाने में असमर्थ रहा । साथ-ही, यह भी एक एहसास हुआ कि इतनी कम्प्यूटर-क्रांति के बाद भी, आज यह सारा ज्ञान एक मध्यमा का मोहताज है । अंग्रेजी में तो शायद डिक्टेशन भी दिया जा सकता है । पर वो भी परिपक्व नहीं है । कई-बार अनेकों डिक्टेशन-सॉफ़्टवेयरों को ट्राई किया पर वे अमेरिकन या ब्रिटिश स्टाइल में अंग्रेजी बोलने वालों की अधिक समझते है । <br /><br />हिन्दी में कहीं एक बार पढ़ा था कि लखनऊ, भारत में स्थित किसी सॉफ़्टवेयर कम्पनी ने हिन्दी डिक्टेशन सॉफ़्टवेयर बनाया है । गूगल भाई से पूछ्ने पर पता चला कि मेगासॉफ़्ट इंडिया द्वारा भी एक हिन्दी डिक्टेशन सॉफ़्टवेयर बनाया गया है । गूगल भाई इसका पता विश्वभारत@TDIL में से गोता लगा कर लाये है । <br /><br />अथ विश्वभारत@TDIL उवाच:<br /><br />मेगासॉफ़्ट इंडिया द्वारा निर्मित हिन्दी डिक्टेशन सॉफ़्टवेयर<br /><br />- बिना की-बोर्ड के इस्तेमाल के टेक्ट्स को हिन्दी में कम्प्यूटर को ४० से ५० शब्द/मिनट की दर से हिन्दी में कम्प्यूटर में डाला जा सकता है । <br />- ४०,००० शब्दों की डिक्शनरी सॉफ़्टवेयर के साथ ही दी गई है जिसमें कि नये शब्दों को जोड़ा जा सकता है । <br />पता: <br />मेगासॉफ़्ट इंडिया,<br />921, सेक्टर-14, सोनीपत, हरियाणा-131001.<br />ई-मेल: megasoftindia@rediffmail.com<br /><br />इस यूटीलिटी के बारे में और अधिक जानकारी पाने के लिए, एक ई-मेल मै आज मेगासॉफ़्ट-इंडिया को भी भेज रहा हूँ । यदि इसकी एक प्रतिलिपि परीक्षण हेतु प्राप्त हो जाती है तथा ये अपनी योग्यता को सिद्ध करती है तो जब मध्यमा ना काम कर रही हो या अन्यथा भी आशा करता हूँ कि यह उपयोगी साबित होगी । <br /><br />यदि आप भी इस प्रकार के किसी सॉफ़्टवेयर या यूटीलिटी के बारे में जानकारी रखते हो, तो अपने चिठ्ठे के द्वारा, हम सभी से उसका परिचय करायें । <br /><br />प्रिय जितेन्द्र भाई (www.jitu.info) के आग्रह अनुसार, अब सबसे कठिन कार्य यानी कि एक या दो पैराग्राफ़ में अपने इस जीवन के परिचय को देने की कोशिश करने जा रहा हूँ ।Dhananjaya Sharmahttp://www.blogger.com/profile/11408039214418538034noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-9521204.post-1108116612755159312005-02-11T01:53:00.000-08:002005-02-11T02:10:12.756-08:00कार्यालय-प्रपंचों में विजय प्राप्ती के लिए नौ नीतियाँ"कार्यालय-प्रपंचों में विजय प्राप्ती के लिए नौ नीतियाँ" नामक इस अंग्रेजी मूल के लेख की लेखिका सुश्री केट लारेंज़ है तथा इस लेख का हिन्दी अनुवाद, मेरे मित्र व सहकर्मी श्री प्रदीप त्यागी जी ने किया है और अपने <a href="http://in.geocities.com/prthindi/hi/index.html">मेरा प्रयास : कम्प्यूटर व इंटरनेट जगत में हिन्दी का अधिकाधिक प्रयोग</a> नामक वेब-स्थल पर प्रकाशित किया है ।<br /><br />इस लेख के हिन्दी संस्करण की एक बानगी देखें ।<br /><br />कार्यालय-प्रपंचों द्वारा कार्यस्थल पर काली छाया पड़ सकती हैं, लेकिन कोई कंपनी कितनी ही बड़ी या छोटी क्यों न हो, यह कार्यालय-प्रपंच सभी के लिए एक टाला न जा सकने वाला सत्य है। हममें से अधिकांश यह विश्वास करना चाहते हैं कि हमें अपने कार्य में अग्रणी बनने के लिए प्रपंचों का खेल खेलने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी। परंतु सच्चाई यह है कि प्रत्येक व्यापारिक निर्णय के विस्तृत पहलू होते हैं, जिनके द्वारा एक सफल व्यापारी इस खेल को खेलने के गुर सीखता है। यदि आप अभी तक कार्यालय-प्रपंचों की कला में निपुणता हासिल नहीं कर पाए हैं तो भी अभी देर नहीं हुई है। यहाँ नौ नियम दिए जा रहे हैं, जो कि आपको कार्यालय में अपने सम्मान की रक्षा करते हुए इन प्रपंचों को रचने व खेलने में सहायता प्रदान करेंगे।<br /><br />1. नेक खेल ।<br />2. “स्वर्णिम निति” को याद करें ।<br />3. एक मार्ग-दर्शक चुनें ।<br />4. सबकी नज़रों में आएँ ।<br />5. दिखावा करें, पर अत्यधिक नहीं ।<br />6. अफवाहों से बचें ।<br />7. संचार के गुर सीखें ।<br />8. अपने बॉस की छवि सुन्दर बनाएँ ।<br />9. लोगों से बातें करें ।<br /><br />कार्यालय-प्रपंचों में विजय प्राप्ती के लिए इस सम्पूर्ण लेख को <a href="http://in.geocities.com/prthindi/hi/9_strategies_hi.html">यहाँ</a> पढ़ें ।Dhananjaya Sharmahttp://www.blogger.com/profile/11408039214418538034noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-9521204.post-1108053606184564002005-02-10T08:38:00.000-08:002005-02-10T08:40:06.183-08:00मैनड्रैकलिनक्स 10.2 बीटा 2मैनड्रैकलिनक्स 10.2 का द्वितीय बीटा अब उपलब्ध है । इस <a href="http://www.mandrakelinux.com/en/102beta.php3">बीटा पृष्ट</a> पर विवरण उपलब्ध है । <br /> <br />इसमें शामिल कुछ मुख्य पैकेजों के संस्मरण निम्न है: <br /> <br />- कर्नल 2.6.10 <br />- गील्बसी 2.3.4 और जीसीसी 3.4.3 <br />- नया केडीई 3.3.2 <br />- गनोम 2.8.1, साथ-साथ जीटीके 2.6.1 <br />- संसाधन विधि में अनेक नये लक्षणों को शामिल किया गया है, जिसमें से एक है, एक नई तथा और-अधिक क्षमतावान पैकेज-संसाधन अल्गोरिदम(कलन-विधि) व संसाधन-समापन के पूर्व सभी पैकेजों को हार्डडिस्क पर कापी करने की क्षमता । <br />- संसाधन अब एक यूएसबी कूँजी से भी बूट हो सकता है <br />- मौजिल्ला-फ़ायरफ़ॉक्स ने मौजिल्ला का स्थान ले लिया है <br />- गिम्प 2.2, डीवीडी+आर दोहरी परत समर्थन के साथ सीडीरिकार्ड 2.01.01a21, ओपनऑफ़िस.ओआरजी 1.1.4, पोस्टग्रेसीक्यूल 8.0, माईसीक्यूल 4.1.9 <br />- नया टूल: ड्रैकस्टेटस <br /> <br />मैनड्रैकलिनक्स 10.2 बीटा 2 को डॉउनलोड करें, इसका परीक्षण करें और इन नये पैकेजों और लक्षणों का आनन्द उठाएँ । Dhananjaya Sharmahttp://www.blogger.com/profile/11408039214418538034noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-9521204.post-1106920065626670602005-01-28T03:16:00.000-08:002005-01-28T05:47:45.626-08:00"तनाव" भी जरूरी है जीने के लिए !आप भी सोच रहे होगें कि यह क्या उलट बात हुई । आज जब अधिकतर चर्चा होती है कि कैसे तनाव-मुक्त रहा जाएँ तो मै कैसी उलट बात कर रहा हूँ । <br /> <br />यदि तनाव नहीं है तो जीवन भी नहीं है । जैसा कि बहुधा हम कई बार बोलत्ते है कि "मुझे तो ब्लड-प्रेशर की शिकायत है ।" लो भला बोलो, यदि ब्लड में प्रेशर ही नहीं होगा तो क्या जीना संभव होगा । मानव-मन/मष्तिक भी एक मशीन/कम्प्यूटर की भांति है । जब इसमें किसी एक विचार को बार-बार चलाया जाता है तो भले वह सत्य ना भी हो, तो भी यह उसे सत्य मानने लगता है और यदि उस विचार के साथ डराने वाली/नकारात्मक परिणामों की ही जानकारी या अपेक्षायें जुड़ी हुई हो तो मष्तिक उसके समाधान को ढ़ूढ़ने में जुट जाता है । अब यह स्थिति वैसी ही हो जाती है कि बुखार तो है नहीं पर दवा खायें जा रहे है । क्या जब हम यह बार-बार कहते है कि मुझे ब्लड-प्रेशर है या मुझे तनाव है, तो क्या वास्तव में हम चाहते है कि हमारे ब्लड में प्रेशर ही ना रहे या शरीर से तनाव गायब हो जायें । ऐसा नहीं है । परन्तु आज चारों तरफ़ चर्चा इस बात की अधिक होती है कि इस बात से हानि क्या होगी । लाभ क्या होगा यह बहुत अल्प रूप में बताया जा रहा है । <br /> <br />भाषा और बोलने की क्षमता, जो कि आज मनुष्य के अन्दर पायी जाती है, उसे चाहे धर्म की दृष्टि से मंत्र शक्ति मानें या विज्ञान के दृष्टि से एक रसायनिक प्रक्रिया, परन्तु हम स्वंय के लिए उसके सर्जन-कर्ता व नियंत्रक स्वंय ही है। इसलिए, सभी विचारों व क्रियाओं के दोनों सकारात्मक व नकारात्मक पहलुओं को जानना आवश्यक है । <br /> <br />वापस तनाव की ओर। आजकल चारों तरफ़ तनाव नामक शब्द की बहुत चर्चा होती है तथा इसे सामान्य तौर पर विपरीत व जीवन-नाशक समझा जाता है । जबकि वास्तविकता इसके उलट है । वास्तव में "तनाव" क्या है ? <br /><div align="center"> <br /><strong><span style="color:#000099;">तनाव, उत्तेजना का वह स्तर है जहाँ घटनायें और उत्तरदायित्व व्यक्ति की क्षमता से बाहर हो जाते है । </span></strong></div> <br /><strong><span style="color:#990000;"><span style="color:#cc0000;">जब इसी तनाव का, हम नकारत्मक उपयोग करते है तो यह हमारी क्षमताओं को उनके न्यूतम-स्तर तक ले जाता है और हम अपने को पंगु महसुस करते है ।</span> </span></strong> <br /><strong><span style="color:#990000;"> <br /><span style="color:#006600;">जब इसी तनाव का हम सकारात्मक उपयोग करते है तो यह हमारी क्षमताओं को असीमित बनाता है और हमसे उन कार्यों तक को करता है जो कि उससे पूर्व असम्भव माने जाते थे ।</span> <br /> <br /></span></strong>अब यह हमारे हाथ में है कि हम या तो अपनी क्षमता बढ़ायें या फ़िर घटनाओं को निर्वाकार रूप से होते हुए देखें । इस तनाव को नियंत्रित करते हुए जीना ही जीने की कला है, जिससे कि न सिर्फ़ हम अपनी क्षमताओं को बढ़ाते है, बल्कि अपना कल्याण करते हुए, इस समस्त जगत के कल्याण में भी अपना योगदान दे पाते है । <br /></span></strong> <br />इस विचार पर आपकी टिप्पणियों की प्रतीक्षा रहेगी । <br /> <br />धन्यवाद । <br />Dhananjaya Sharmahttp://www.blogger.com/profile/11408039214418538034noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-9521204.post-1106621398806720712005-01-24T18:47:00.000-08:002005-01-24T18:49:58.806-08:00आ गया! आ गया ! मैनड्रैकलिनक्स १०।२ बीटा!मैनड्रैकलिनक्स १०।२ के प्रथम बीटा संस्करण के साथ, इस सप्ताह एक दोष-निवारण पार्टी का आनंद उठायें... हमेशा की भांति, आप जितने अधिक दोषों को इंगित करेगें, उतना ही इस संस्करण का अंतिम रूप निखर कर आयेगा । कृपया यह भी समझें कि जहाँ मैनड्रैकलिनक्स के लिए दोष-रिपोर्टो का प्राप्त होना सहायक सिद्ध होता है, वही इसके साथ-साथ इन दोषों के लिए सम्भावित समाधानों को बताना, और अधिक लाभकारी सिद्ध होगा ! <a href="http://www.mandrakelinux.com/en/102beta.php3">बीटा पृष्ट</a> पर जाएँ और नये १०।२ के कुछ एक गुणों के बारे में जाने, इसे डॉउनलोड करें तथा इसके दोषों के बारे में बताएँ और इन दोषों के निवारण में अपना सहयोग दें । Dhananjaya Sharmahttp://www.blogger.com/profile/11408039214418538034noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-9521204.post-1106560408686848332005-01-24T01:12:00.000-08:002005-01-24T04:39:44.573-08:00ईश्वर क्या है और उसका क्या स्वभाव है?<div align="center"><span style="color:#006600;">गीता में श्री भगवान या ईश्वर शब्द बार-बार आया है । इस भगवान शब्द का अर्थ है-- <br /> <br /></span><span style="color:#006600;"><em>ऐश्वर्यस्य समग्रस्य धर्मस्य यशसः श्रिय । <br />ज्ञान वैराग्योस्चैव पण्णां भग इतीरणा ॥ </em> <br /> <br />अर्थात् सम्पूर्ण बल, धर्म, यश, श्री, ज्ञान और वैराग्य, इन छः का नाम भग या विभूति है । यह सब विभूतियां जिसमें सम्पूर्ण हों, वही भगवान है । इन छहों में बल के अन्तर्गत आत्मबल, तपोबल, बाहुबल आदि समस्त बलों का समावेश है । धर्म में समस्त कुल, आश्रम, जाति, देश, राज्य, नीति और जीव के कर्त्तव्य कर्मादि सम्मिलित है । यश में सभी प्रकार के यश है । श्री में सभी सम्पदा, धन, अन्न, द्रव्य, पशु और भूमि इत्यादि है । ज्ञान के अन्तर्गत सभी प्रकार के ज्ञान, विज्ञान, शास्त्र, कला और आविष्कार आदि है । जगत के यावत विषयों में रहते हुए उनमें लिप्त न होते हुये भोगने का अर्थ वैराग्य है । <br /> <br />उपर्युक्त विवेचन से ज्ञात होता है कि इन सबको ईश्वर ही हस्तगत कर सकता है । परन्तु अंश के रूप में मनुष्य इसके किसी एक विभाग या विषय में भी सिद्धि प्राप्त कर लें तो उसी अंश रूप के अनुपात में, अन्य शेष पाँच विभूतियाँ भी उसको स्वतः ही प्राप्त हो जाती है, यह एक विचित्रता है । <br /> <br />ईश्वर का स्वभाव ये है कि वो जो भी कहता है वो हो जाता है । इसलिए अगर हम अपने को अच्छा कहेगें तो, अच्छे हो जायेगें, अगर अपने को अमीर कहेगें तो अमीर हो जायेगें । समुद्र के एक बूँद पानी का विश्लेषण करें अथवा पूरे समुद्र के पानी का, उनमें समानता स्वाभाविक है । इसलिए चाहे आप छोटे हों या बड़ें, आप में और सबमें कोई अन्तर नहीं है । <br /> <br />[ <a href="http://in.geocities.com/dysxhi/hi/aol_meet_yourself01.html"><strong>जीने की कला</strong> </a>नामक लेख का एक अंश ]</span></div>Dhananjaya Sharmahttp://www.blogger.com/profile/11408039214418538034noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-9521204.post-1106404360419023312005-01-22T06:27:00.000-08:002005-01-22T06:32:40.420-08:00इटैनियम २ हेतु मैनड्रैकलिनक्स का बीटा संस्करणकल्सटरिंग और वास्तविक-काल संसाधन पर केन्द्रित होकर कार्य करने वाली, <a href="http://www.hyades-itea.org/">हयाडस परियोजना (Hyades project)</a>, में भाग लेते हुए, मैनड्रैकसॉफ़्ट ने, इटैनियम २ प्रोसेसर के लिए मैनड्रैकलिनक्स के बीटा संस्करण का विमोचन किया है । कृपया इसका <a href="http://www.mandrakelinux.com/en/itanium2.php3">डॉउनलोड और परीक्षण</a> करें !Dhananjaya Sharmahttp://www.blogger.com/profile/11408039214418538034noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-9521204.post-1105890545195324422005-01-16T07:44:00.000-08:002005-01-16T07:49:05.196-08:00मैनड्रैकलिनक्स 10.1 अधिकारिक के साथ एक महीने बाद<a href="http://www.linuxforums.org/news/article-30174.html">लिनक्सफ़ोरम्स.कॉम</a> ने <a href="http://www.mandrakesoft.com/products/101">मैनड्रैकलिनक्स 10.1 अधिकारिक</a> की समीक्षा की मेजबानी की । इस लेखक ने निष्कर्ष निकाला कि: "चाहे आप लिनक्स का पहली बार उपयोग कर रहे हो या फ़िर आप एक अनुभवी लिनक्स उस्ताद हो, मैनड्रैकलिनक्स एक घरेलु वातावरण या एक छोटे नेटवर्क वातावरण के लिए कुछ एक उत्कर्ष लक्षणो को प्रस्तावित करता है । मैनड्रैकलिनक्स नियंत्रण केन्द्र का उपयोग करके, आप लगभग सभी कुछ संरचित और संसाधित कर सकते है । एक विज़ार्ड का उपयोग करके, लगभग सभी कुछ किया जा सकता है । " सम्पूर्ण समीक्षा को <a href="http://www.linuxforums.org/news/article-30174.html">यहाँ</a> पढ़ें । Dhananjaya Sharmahttp://www.blogger.com/profile/11408039214418538034noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-9521204.post-1105087345843014942005-01-07T00:38:00.000-08:002005-01-07T00:42:25.843-08:00लिनक्स हेतु, हेलिक्स व रीयल प्लेयर हिन्दी में<a href="http://photos1.blogger.com/img/41/2880/640/helixplayer_in_hindi.jpg"> <br /><img style="BORDER-RIGHT: #000000 1px solid; BORDER-TOP: #000000 1px solid; MARGIN: 2px; BORDER-LEFT: #000000 1px solid; BORDER-BOTTOM: #000000 1px solid" src="http://photos1.blogger.com/img/41/2880/320/helixplayer_in_hindi.jpg" border="0" /></a> <br /><span style="font-size:78%;">हेलिक्स समुदाय द्वारा, उपभोक्ताओं के लिए निर्मित, हेलिक्स प्लेयर एक सम्पूर्ण, निःशुल्क और मुक्त स्रोत मीडिया प्लेयर है । इसके संस्करण 1.0.2.610 (गोल्ड) से, यह अब अन्य दस भाषाओं के अतिरिक्त "हिन्दी" में भी उपलब्ध है । इसका अनुमति-पत्र, आपकी पसन्द के तीन विकल्पों के अन्तर्गत आता है: मुक्त स्रोत (आरपीएसएल), वाणिज्य समूदाय स्रोत (आरसीएसएल), तथा मुक्त सॉफ़्टवेयर जीएनयू सामान्य जन हेतु अधिकार-पत्र (जीपीएल) । यह ओजीजी वोर्बिस तथा थियोरा, एच-261, एच-263, जीआईएफ़, जेपीइजी, पीएनजी, रीयल-टेक्ट्स व एसएमआईएल जैसे मीडिया प्रारूपों को प्ले करता है । <br /></span><a href="http://www.hello.com/" target="ext"><span style="font-size:78%;"><img style="BORDER-RIGHT: 0px; PADDING-RIGHT: 0px; BORDER-TOP: 0px; PADDING-LEFT: 0px; BACKGROUND: none transparent scroll repeat 0% 0%; PADDING-BOTTOM: 0px; BORDER-LEFT: 0px; PADDING-TOP: 0px; BORDER-BOTTOM: 0px" alt="Posted by Hello" src="http://photos1.blogger.com/pbh.gif" align="absMiddle" border="0" /></span></a> <br /> <br /><a href="http://photos1.blogger.com/img/41/2880/640/realplayer_in_hindi01.jpg"><img style="BORDER-RIGHT: #000000 1px solid; BORDER-TOP: #000000 1px solid; MARGIN: 2px; BORDER-LEFT: #000000 1px solid; BORDER-BOTTOM: #000000 1px solid" src="http://photos1.blogger.com/img/41/2880/320/realplayer_in_hindi01.jpg" border="0" /></a> <br /><span style="font-size:78%;">हेलिक्स प्लेयर की संरचना के ऊपर ही, लिनक्स के लिए रीयल प्लेयर को बनाया गया है । यह हेलिक्स प्लेयर द्वारा समर्थित प्रारूपों के अतिरिक्त रीयलआडियो/रीयल विडियो, एमपी3 इत्यादि जैसे अ-मुक्त स्रोत घटकों को भी समर्थित करता है । यह भी हेलिक्स प्लेयर की भांति, अब हिन्दी भाषा में उपलब्ध है । इन दोनों प्लेयरों के बारे में और हेलिक्स समुदाय के बारे में और अधिक जानने के लिए, https://player.helixcommunity.org/ पर जाएँ </span><a href="http://www.hello.com/" target="ext"><img style="BORDER-RIGHT: 0px; PADDING-RIGHT: 0px; BORDER-TOP: 0px; PADDING-LEFT: 0px; BACKGROUND: none transparent scroll repeat 0% 0%; PADDING-BOTTOM: 0px; BORDER-LEFT: 0px; PADDING-TOP: 0px; BORDER-BOTTOM: 0px" alt="Posted by Hello" src="http://photos1.blogger.com/pbh.gif" align="absMiddle" border="0" /></a> <br />Dhananjaya Sharmahttp://www.blogger.com/profile/11408039214418538034noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-9521204.post-1104981445513127952005-01-05T19:16:00.000-08:002005-01-05T19:17:25.513-08:00मैनड्रैकलिनक्स कार्पोरेट सर्वर 3.0 और कार्पोरेट डेस्कटॉपमैनड्रैकसॉफ़्ट ने आज कारोबारी ग्राहकों के लिए निम्न दो नये उत्पादों की घोषणा की है; <a href="http://www.mandrakesoft.com/business/corporate-server?wslang=en">कार्पोरेट सर्वर और कार्पोरेट डेस्कटॉप</a>. इन्हें "उद्यम-के-लिए-तैयार" बनाने हेतु, इन दो लिनक्स सिस्टमों को विशेष रूप से विकसित किया <br />गया है । एक लंबे समय तक की गई विकास प्रक्रिया और एक 5-वर्ष के रख-रखाव की समय-सीमा, इन दो उत्पादों के लक्षणों में शामिल है । <a href="http://www.mandrakesoft.com/company/press/pr?n=/pr/products/2526&wslang=en">प्रेस-विज्ञप्ति</a> में पूर्ण विवरण देखें । <br />Dhananjaya Sharmahttp://www.blogger.com/profile/11408039214418538034noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-9521204.post-1104981354394058682005-01-05T19:14:00.000-08:002005-01-05T19:15:54.393-08:00मैनड्रैकलिनक्स 10.1 अधिकारिक संस्करण का डॉउनलोडअनुमान लगायें? मैनड्रैकलिनक्स का नवीनतम संस्करण : 10.1 अधिकारिक अब सार्वजनिक रूप से डॉउनलोड के लिए उपलब्ध है ! इन सभी नये और स्थिर <a href="http://www.mandrakelinux.com/hi/10.1/features/">10.1 लक्षणों</a> से स्वंय को शक्तिशाली बनायें: यह 10.1 अधिकारिक निम्न प्रकार से उपलब्ध है 1) 3 आईसो सीडी इमेजे 2) नयी! डीवीडी इमेज 3) नयी! मिनी सीडी इमेज । यदि एफ़टीपी के सर्वर बहुत अधिक वयस्त हो, तो आप बिट्ट्रोरेन्ट का उपयोग कर सकते है । <a href="http://www.mandrakelinux.com/hi/ftp.php3">अभी ही डॉउनलोड करें</a>, और ना भूलें कि भव्य 10.1 अधिकारिक के पैक <a href="http://www.mandrakestore.com">मैनड्रैकस्टोर</a> पर उपलब्ध है जो कि पूर्ण प्रलेखन व सहायता तथा एक मैनड्रक क्लब <a href="http://www.mandrakelinux.com/hi/club/">सदस्यता</a> के सभी लाभों को प्रदान करते है । Dhananjaya Sharmahttp://www.blogger.com/profile/11408039214418538034noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-9521204.post-1104980699825812112005-01-05T19:03:00.000-08:002005-01-05T19:04:59.826-08:00पहली पाती आप सभी का इस चिठ्ठे में स्वागत ! <br /> <br />"लिनक्स में हिन्दी और हिन्दी में लिनक्स " के उपयोग के अपने व्यक्तिगत अनुभवों को समस्त लिनक्स व हिन्दी जगत के साथ साझा करने के उद्वेश्य से मैने एक व्यक्तिगत वेब स्थल का निर्माण किया है । इन अनुभवों को मैने मैनड्रैकलिनक्स संचालन-तंत्र पर प्राप्त किया है । वेब-स्थल में कथानक व विषय-वस्तु को जोड़ने-घटाने की एक सीमा होती है । बहुत कुछ कही-अनकही बातें और सोचे-अनसोचे विचार आते है, परन्तु एचटीएमएल तकनीकी के कारण, अल्प समय में इन्हें वेब-स्थल पर प्रकाशित करना सम्भव नहीं होता है । अनेकों बार, कुछ अबूझे और कुछ बैताल प्रश्नों के उत्तर जानने की आवश्यकता होती है । <br /> <br />इन आशाओं के साथ ही, मैने इस चिठ्ठे का आरम्भ किया है । आशा नहीं वरन विश्वास करता हूँ कि जहाँ इस चिठ्ठे के माध्यम से मुझे आप सब से जुड़ने के अवसर मिलेगा, वहीं आपके सुझावों और टिप्पणियों से मै अपने इस कार्य को और अधिक परिष्कॄत और उन्नत कर पाऊँगा । <br /> <br />धन्यवाद । <br /> <br />|| धनञ्जय शर्मा || <br />मुक्त-स्रोत सॉफ़्टवेयर योगदानकर्ता ("हिन्दी में कम्प्यूटिंग" क्षेत्र में) <br />तथा स्वतंत्र अनुवादक (अंग्रेजी-से-हिन्दी भाषा में) <br />वेब स्थल: http://in.geocities.com/dysxhi/hi <br />Dhananjaya Sharmahttp://www.blogger.com/profile/11408039214418538034noreply@blogger.com