tag:blogger.com,1999:blog-948725304205485453.post-4334507080667573872007-10-23T02:56:00.000+05:302007-10-23T02:56:00.000+05:30वैसे शायद यह हर पत्रकार का टाइम टेबल करीब करीब यही...वैसे <BR/>शायद यह हर पत्रकार का टाइम टेबल करीब करीब यही रहता हैं। अपनी तो अभी शादी नहीं हुई लेकिन पिछले छह साल में शाम तो अपन ने भी कभी नहीं देखी। अब आपने इतना जबरदस्‍त लिखा कि सोचने को मजबूर हो गया कि क्‍या इस सवाल का सामना मुझे भी करना होगा। <BR/>पर क्‍या आपको नहीं लगता पत्रकारों की इस समस्‍या को आजतक किसी ने नहीं उठाया। <BR/>परसो तरसों पैदा हुई बीपीओ इंडस्‍टी की चिंता देश दुनिया को है। सुना है उसके लिए अब नई हैल्‍थ पॉलिसी बन रही है। ओड वर्किंग ओवर में काम करने वालों की जब भी बात आती है बस बात कॉल सेंटर्स पर आकर ही रुक जाती है। पर कभी आखिर कोई पत्रकारों की इस दुविधा को सामने क्‍यूं नहीं रखता।राजीव जैनhttp://www.blogger.com/profile/07241456869337929788noreply@blogger.com