tag:blogger.com,1999:blog-948725304205485453.post-59857441761251731742007-04-01T16:15:00.000+05:302007-04-01T16:15:00.000+05:30आपके संस्मरण पढ़कर कुछ पुरानी यादें ताजा हो गई। सच ...आपके संस्मरण पढ़कर कुछ पुरानी यादें ताजा हो गई। सच है इन्हें वही समझ सकता है जिसने इन्हें खुद कभी महसूस किया है।<BR/><BR/>एक ऐसा समय होता है जब आदमी खुद को निसहाय पाता है, उसका कोई प्रियजन उसे छोड़कर जाने वाला है वो कुछ नहीं कर सकता ऐसा होने से रोकने को। उस समय लगता है कि इंसान बेकार ही अहंकार करता है मैं ये हूँ मैं वो हूँ असल में वो बस किस्मत के हाथों की कठपुतली होता है।<BR/><BR/>उस समय बड़े से बड़ा नास्तिक भी आस्तिक बन जाता है। आदमी का सब अहंकार दूर हो जाता है। होंठों पर बस दुआ और आंखों में आंसू होते हैं।<BR/><BR/>ऐसा एकाध बार जिंदगी में सब के साथ होता है पर ज्यादा तकलीफ तब होती है जब जाने वाला दर्द में जाता है।Shrishhttp://www.blogger.com/profile/15264688244278112743noreply@blogger.com