tag:blogger.com,1999:blog-8932637.post-1102872240937221052004-12-12T09:23:00.000-08:002004-12-12T21:42:04.143-08:00ग़ज़ल - तकी मौधवीइस कदर बढती जाती हैं मजबूरियां , हर नफ़स है ग़रां ज़िन्दगी के लिए
<br />गो बहुत तल्ख़ है जामे-उल्फ़त मगर , इक सहारा तो है आदमी के लिए
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<br />दिल में नाकामियों का तआसुर लिए , लौटना अपनी मन्ज़िल से बेसूद है
<br />रास्ते पुरख़तर हैं तो होते रहें , हौसला चाहिए आदमी के लिए
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<br />आज तक ये मुअम्मा न समझा कोई, और शायद न कोई समझ पाएगा
<br />ज़िन्दगी आई है मौत के वास्ते , या कि मौत ज़िन्दगी के लिये
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<br />लोग जश्ने-चराग़ां मनाते रहे , जाने कितने शहर जगमगाते रहे
<br />इक तरफ़ आलमे-तीरगी में पड़े , हम तरसते रहे रौशनी के लिये
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<br />मुझपे इल्ज़ामे-तख़रीबकारी न रख , बाग़बां मैं चमन का वफ़ादार हूं
<br />रंज़ो-ग़म जाने कितने गवारा किये , मैंने तेरे चमन की ख़ुशी के लिये
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<br />ये वो दौरे-पुराशोब है दोस्तों , जिसमें कोई किसीका भी हमदम नहीं
<br />कौन हमदर्द होगा किसी का 'तकी' , आदमी जब नहीं आदमी के लिये
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