tag:blogger.com,1999:blog-8465817.post-1120811759740033432005-07-08T15:35:00.000+07:002005-07-08T15:35:00.000+07:00डा0 व्यॊम की समीक्षा पढ कर तॊ , मैं पुलकित हॊ उठा ...डा0 व्यॊम की समीक्षा पढ कर तॊ , मैं पुलकित हॊ उठा हूँ। क्या कहूँ , कैसॆ कहूँ ? समझ नहीं पा रहा हूँ । "अनुभूति" मॆं , पहलॆ भी रचनायॆं भॆजी थीं। पुन: भॆज रहा हूँ। प्रॆम कविताओं की श्रॆणी मॆं , इन्हॆं रख सकतॆ हैं या नहीं , यह तॊ निर्णायक ही निर्णय करॆं।<BR/>अनूप जी , आप कॆ सिर पर , प्रॆरणा का भार तॊ पहलॆ सॆ ही रहा है। प्रॊत्साहन कॆ लियॆ , आभार का भार , अब , आप कॆ कंधॊं पर टिका रहा हूँ। <BR/>अनुनाद जी , आप की बात सॆ मैं गहरा इत्तफाक रखता हूँ। बड़ॆ-बड़ॆ पुस्तक मॆलॊं मॆं भी , ऐसी सामग्री कॆ लियॆ , मैं बहुत भटकता रहा हूँ । समय-समय पर , यूँ ही , मार्गदर्शन दॆतॆ रहॆं। बल मिलता है।<BR/>आशीष जी का आशीष सिर-माथॆ पर। आशा है , आगॆ भी , "कल्पवॄक्ष" कॊ हर-भरा रखनॆ कॆ लियॆ , अपना आशीष बरसातॆ रहॆंगॆ। <BR/><BR/> <A HREF="http://abhipray.blogspot.com" REL="nofollow">"माजरॆ का दूसरा पहलू"</A>शीर्षक सॆ कुछ संस्मरण मैंनॆ <A HREF="http://abhipray.blogspot.com" REL="nofollow">यहाँ</A> लिखॆ हैं। इसॆ भी दॆखॆं (आप चाहॆं , तॊ इसॆ , लॆख का अ-व्यावसायिक विज्ञापन / विपणन कह लॆं ।)राजेश कुमार सिंहhttp://www.blogger.com/profile/07513885073414867392noreply@blogger.com