tag:blogger.com,1999:blog-83432092563612027872009-06-18T22:43:11.539-07:00आशियानाकुछ कहने से बेहतर है कुछ किया जाए, जिंदा रहने से बेहतर है जिया जाए...रवीन्द्र रंजनhttp://www.blogger.com/profile/09390660446989029892ravindraranjan@hotmail.comBlogger73125tag:blogger.com,1999:blog-8343209256361202787.post-24260402546898046852009-06-05T16:04:00.000-07:002009-06-12T21:30:58.980-07:00द ग्रेट सर्कस आफ न्यूजरूम-10<strong><span style="color:#cc0000;"><span style="color:#000000;">सर्कस की पिछली कड़ियां पढ़ें</span>-</span> <a href="http://rex-aashiyana.blogspot.com/2009/03/blog-post.html"><span style="color:#009900;">एक</span></a> <a href="http://rex-aashiyana.blogspot.com/2009/03/2.html"><span style="color:#6600cc;">दो</span></a> <a href="http://rex-aashiyana.blogspot.com/2009/03/3.html"><span style="color:#3333ff;">तीन</span></a> <a href="http://rex-aashiyana.blogspot.com/2009/03/4.html"><span style="color:#cc33cc;">चार</span></a> <a href="http://rex-aashiyana.blogspot.com/2009/03/5.html"><span style="color:#33cc00;">पांच</span></a> <a href="http://rex-aashiyana.blogspot.com/2009/03/6.html"><span style="color:#663366;">छह</span></a> <a href="http://rex-aashiyana.blogspot.com/2009/04/7.html"><span style="color:#ff0000;">सात</span></a> <a href="http://rex-aashiyana.blogspot.com/2009/04/8.html"><span style="color:#333300;">आठ</span></a> <a href="http://rex-aashiyana.blogspot.com/2009/05/9.html"><span style="color:#993300;">नौ</span></a> </strong><br /><strong><span style="font-size:180%;color:#006600;">_______________________________</span></strong><br /><br />सर्कस में लंगूरों की भी अच्छी तादाद है। लंगूर अकेले नहीं रहते। टोलियों में रहते हैं। टोलियों में खेल दिखाते हैं। जंगल की तरह ही सर्कस में भी लंगूरों ने अपना-अपना इलाका बांट रखा है। एक लंगूर दूसरे के इलाके में दखल नहीं देता। अगर कोई ऐसा करने की हिमाकत करता है तो दूसरे लंगूर को यह कतई बर्दाश्त नहीं होता। इसी चक्कर में कई बार लंगूरों के बीच शीत युद्ध छिड़ जाता है।<br /><br /><a href="http://1.bp.blogspot.com/_ekflEAbWemw/SimlazLysBI/AAAAAAAAA2U/6M9Pr5Wql6U/s1600-h/circustularge.jpg"><img style="MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 320px; FLOAT: left; HEIGHT: 247px; CURSOR: hand" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5343984312686653458" border="0" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_ekflEAbWemw/SimlazLysBI/AAAAAAAAA2U/6M9Pr5Wql6U/s320/circustularge.jpg" /></a>वैसे लंगूरों के बीच शीत युद्ध तो हमेशा ही चलता रहता है। एक लंगूर दूसरे लंगूर को मात देने में जुटा रहता है। लगा रहता है। भिड़ा रहता है। दोनों तरफ से तरह-तरह की चालें चली जाती हैं। गोटियां बैठाई जाती हैं। कोई राजा को पटाता है तो कोई वजीर को। तो कोई मोहरों के जरिये ही विजेता बनने की कोशिश करता है। लंगूरों के इस खेल में पूरी तरह किसी की जीत नहीं होती। किसी की हार नहीं होती। कभी कोई भारी पड़ता है, कभी कोई। लेकिन शह और मात का यह खेल कभी खत्म नहीं होता। हर लंगूर की कोशिश होती है खुद को तीसमार खां साबित करने की।<br /><br />चूहे-बिल्ली के बीच ही सही, अपनी सत्ता कायम करने के लिए लिए लंगूर क्या-क्या नहीं करता। हरदम परेशान रहता है। रात-रात भर जागता रहता है। इधर-उधर भागता रहता है। शांत तो वह बैठ ही नहीं सकता। अगर बैठा तो दूसरा लंगूर बाजी मार लेगा। यह 'डर' लंगूर को हर वक्त परेशान किए रहता है। जब वह शो की तैयारी कर रहा होता है तब भी। जब वह सर्कस से बाहर होता है तब भी।<br /><br />लंगूरों का काम है सर्कस के बंदरों पर काबू रखना। चूहे, बिल्ली, गीदड़ जैसे छोटे-मोटे कलाकारों को वश में रखना। लंगूर इन छोटे-मोटे कलाकारों को कंट्रोल में रखने की पूरी कोशिश करते हैं। <a href="http://1.bp.blogspot.com/_ekflEAbWemw/Siml2mTjZTI/AAAAAAAAA2c/Dhw3H9z9hs4/s1600-h/20080823-lifestyle--chimps.jpg"><img style="MARGIN: 0px 0px 10px 10px; WIDTH: 400px; FLOAT: right; HEIGHT: 222px; CURSOR: hand" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5343984790265881906" border="0" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_ekflEAbWemw/Siml2mTjZTI/AAAAAAAAA2c/Dhw3H9z9hs4/s400/20080823-lifestyle--chimps.jpg" /></a>इस बात का पूरा खयाल रखा जाता है कि कोई चूहा-बिल्ली चूं-चपड़ न करे। इसीलिए लंगूर कभी इन्हें आंख दिखाता है। कभी दांत दिखाता है। तो कभी पूंछ फटकार कर डराता है। बेचारे छोटे-मोटे कलाकर चुप रह जाते हैं। सब सह जाते हैं। मन मसोसकर। काफी कुछ सोचकर। कई बार छोटे-मोटे कलाकारों को भी गुस्सा आ जाता है। वह मुकाबले की मुद्रा में आ जाते हैं। तब लंगूर की बोलती बंद हो जाती है। वह दुम दबाने में ही भलाई समझता है। आखिर लंगूरों की भी अपनी सीमाएं हैं। सरहदें हैं जिन्हें वह लांघ नहीं सकते।<br /><br />अलग-अलग सर्कस में लंगूरों की अलग-अलग तादाद होती है। जितना बड़ा सर्कस उतने ज्यादा लंगूर। ये लंगूर खुद को चीफ रिंग मास्टर से कम नहीं समझते। फर्क सिर्फ इतना है कि चीफ रिंग मास्टर पूरे सर्कस पर काबू रखता है। ये लंगूर सर्कस के कुछ कलाकारों पर। काबू में रखने के मामले में चीफ रिंग मास्टर लंगूरों का आदर्श है। लंगूर भी हर वक्त उसके जैसा बनने की कोशिश करते हैं। इस गफलत में कई बार उन्हें गलतफहमी भी हो जाती है। वह खुद को चीफ रिंग मास्टर समझ बैठते हैं।<br /><br /><a href="http://3.bp.blogspot.com/_ekflEAbWemw/SimmU_vIQ5I/AAAAAAAAA2k/fwnlFMzJVgM/s1600-h/colage.jpg"><img style="MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 275px; FLOAT: left; HEIGHT: 320px; CURSOR: hand" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5343985312488506258" border="0" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_ekflEAbWemw/SimmU_vIQ5I/AAAAAAAAA2k/fwnlFMzJVgM/s320/colage.jpg" /></a>यह सर्कस भी अजीब है। हर खिलाड़ी खुद को 'सबसे बड़ा खिलाड़ी' समझता है। जो लंगूर जितनी ज्यादा उछल-कूद करता है, चीफ रिंग मास्टर उसे उतना ही ज्यादा पसंद करता है। चीफ को लगता है कि वही सबसे ज्यादा एक्टिव है। वही सबसे ज्यादा होनहार है। वही सबसे बड़ा कलाकार है। इसीलिए कई बार लंगूर चीफ को देखते ही उछलना शुरू कर देता है। कूदना शुरू कर देता है। छोटे-मोटे कलाकारों पर खीं-खीं करना शुरू कर देता है। चीं-ची करना शुरू कर देता है। सर्कस में सब इस 'खेल' से वाकिफ हो चुके हैं। यकीनन चीफ चीफ रिंग मास्टर भी। चीफ सब जानता है, लेकिन जाहिर नहीं करता। लंगूरों में खुशफहमी बनी रहे तो हर्ज ही क्या है? इससे लंगूरों को हौसला मिलता है। हुनर दिखाने की प्रेरणा मिलती है। वैसे हुनर हो या ना हो, वह दिखना जरूर चाहिए। सर्कस में जो दिखता है वही बिकता है। यही हकीकत है। यही सर्कस है। <strong>(जारी...)</strong><br /><strong></strong><br /><strong>सर्कस की पिछली कड़ियां पढ़ें</strong>- <a href="http://rex-aashiyana.blogspot.com/2009/03/blog-post.html"><strong><span style="color:#009900;">एक</span></strong></a><strong> </strong><a href="http://rex-aashiyana.blogspot.com/2009/03/2.html"><strong><span style="color:#ff0000;">दो</span></strong></a><strong> </strong><a href="http://rex-aashiyana.blogspot.com/2009/03/3.html"><strong><span style="color:#000099;">तीन</span></strong></a><strong> </strong><a href="http://rex-aashiyana.blogspot.com/2009/03/4.html"><strong><span style="color:#cc33cc;">चार</span></strong></a><strong> </strong><a href="http://rex-aashiyana.blogspot.com/2009/03/5.html"><strong><span style="color:#33ffff;">पांच</span></strong></a><strong> </strong><a href="http://rex-aashiyana.blogspot.com/2009/03/6.html"><strong><span style="color:#990000;">छह</span></strong></a><strong> </strong><a href="http://rex-aashiyana.blogspot.com/2009/04/7.html"><strong><span style="color:#330000;">सात</span></strong></a><strong> </strong><a href="http://rex-aashiyana.blogspot.com/2009/04/8.html"><strong><span style="color:#009900;">आठ</span></strong></a><strong> </strong><a href="http://rex-aashiyana.blogspot.com/2009/05/9.html"><strong><span style="color:#ff0000;">नौ</span></strong></a><div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8343209256361202787-2426040254689804685?l=rex-aashiyana.blogspot.com'/></div>रवीन्द्र रंजनhttp://www.blogger.com/profile/09390660446989029892ravindraranjan@hotmail.com9tag:blogger.com,1999:blog-8343209256361202787.post-45181957974020744152009-05-24T19:59:00.000-07:002009-05-25T15:51:41.639-07:00ताकतवर होते बेजान पत्ते<a href="http://3.bp.blogspot.com/_ekflEAbWemw/Shsg7EAh2zI/AAAAAAAAA2E/4QTpxD14RZ8/s1600-h/3.jpg"><img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5339897982238186290" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; WIDTH: 182px; CURSOR: hand; HEIGHT: 400px; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_ekflEAbWemw/Shsg7EAh2zI/AAAAAAAAA2E/4QTpxD14RZ8/s400/3.jpg" border="0" /></a><br /><div></div><div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8343209256361202787-4518195797402074415?l=rex-aashiyana.blogspot.com'/></div>रवीन्द्र रंजनhttp://www.blogger.com/profile/09390660446989029892ravindraranjan@hotmail.com3tag:blogger.com,1999:blog-8343209256361202787.post-51094719143365120212009-05-15T14:46:00.000-07:002009-05-15T14:50:21.423-07:00मार्केटिंग का हिंदी फंडाएक लड़के को सेल्समेन के इंटरव्यू में इसलिए बाहर कर दिया गया क्योंकि उसे अंग्रेजी नहीं आती थी। लड़के को अपने आप पर पूरा भरोसा था। उसने मैनेजर से कहा कि आपको अंग्रेजी से क्या मतलब ? अगर मैं अंग्रेजी वालों से ज्यादा बिक्री न करके दिखा दूं तो मुझे तनख्वाह मत दीजिएगा। मैनेजर को उस लड़के बात जम गई। उसे नौकरी पर रख लिया गया। <br /><br />फिर क्या था, अगले दिन से ही दुकान की बिक्री पहले से ज्यादा बढ़ गई। एक ही सप्ताह के अंदर लड़के ने तीन गुना ज्यादा माल बेचकर दिखाया। स्टोर के मालिक को जब पता चला कि एक नए सेल्समेन की वजह से बिक्री इतनी ज्यादा बढ़ गई है तो वह खुद को रोक न सका। फौरन उस लड़के से मिलने के लिए स्टोर पर पहुंचा। लड़का उस वक्त एक ग्राहक को मछली पकड़ने का कांटा बेच रहा था। मालिक थोड़ी दूर पर खड़ा होकर देखने लगा। <a href="http://2.bp.blogspot.com/_ekflEAbWemw/Sg3jJTkRfAI/AAAAAAAAA0M/6NYDkvpFuAQ/s1600-h/cartoon.gif"><img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 223px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_ekflEAbWemw/Sg3jJTkRfAI/AAAAAAAAA0M/6NYDkvpFuAQ/s320/cartoon.gif" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5336170882514648066" /></a><br />लड़के ने कांटा बेच दिया। ग्राहक ने कीमत पूछी। लड़के ने कहा-800 रु.। यह कहकर लड़के ने ग्राहक के जूतों की ओर देखा और बोला-सर, इतने मंहगे जूते पहनकर मछली पकड़ने जाएंगे क्या? खराब हो जाएंगे। एक काम कीजिए, एक जोड़ी सस्ते जूते और ले लीजिए। ग्राहक ने जूते भी खरीद लिए। अब लड़का बोला-तालाब किनारे धूप में बैठना पड़ेगा। एक टोपी भी ले लीजिए। ग्राहक ने टोपी भी खरीद ली। अब लड़का बोला-मछली पकड़ने में पता नहीं कितना समय लगेगा। कुछ खाने पीने का सामान भी साथ ले जाएंगे तो बेहतर होगा। ग्राहक ने बिस्किट, नमकीन, पानी की बोतलें भी खरीद लीं। <br /><br />अब लड़का बोला-मछली पकड़ लेंगे तो घर कैसे लाएंगे। एक बॉस्केट भी खरीद लीजिए। ग्राहक ने वह भी खरीद ली। कुल 2500रुपये का सामान लेकर ग्राहक चलता बना। मालिक यह नजारा देखकर बहुत खुश हुआ। उसने लड़के को बुलाया और कहा-तुम तो कमाल के आदमी हो यार! जो आदमी केवल मछली पकड़ने का कांटा खरीदने आया था उसे इतना सारा सामान बेच दिया? लड़का बोला-कांटा खरीदने? अरे सर, वह आदमी तो सेनिटरी पैक खरीदने आया था। मैंने उससे कहा अब चार दिन तू घर में बैठा-बैठा क्या करेगा। जा के मछली पकड़। (एक दोस्त ने ईमेल से भेजा )<div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8343209256361202787-5109471914336512021?l=rex-aashiyana.blogspot.com'/></div>रवीन्द्र रंजनhttp://www.blogger.com/profile/09390660446989029892ravindraranjan@hotmail.com4tag:blogger.com,1999:blog-8343209256361202787.post-53711500867031288782009-05-12T18:27:00.001-07:002009-05-12T19:55:29.132-07:00इंटनरेट से ऐसे करें कमाईइंटरनेट पर आमतौर पर आजकल लोग कुछ घंटे तो बिताते ही हैं। ब्लागिंग से जुड़े लोग नियमित तौर पर इसका इस्तेमाल करते हैं। ब्लागिंग भले ही मुफ्त हो, लेकिन इंटरनेट सर्विस मुफ्त में नहीं मिलती। इसके लिए हर महीने पैसा अदा करना पड़ता है। ब्लागिंग करने वाले लोग इस पर अपना जो समय देते हैं उसकी तो कोई कीमत ही नहीं। हालांकि हिंदी में ज्यादातर लोग स्वांत: सुखाय लेखन कर रहे हैं। <a href="http://4.bp.blogspot.com/_ekflEAbWemw/Sgoil3iQ_nI/AAAAAAAAAzw/jOfV_51c19c/s1600-h/pic2.jpg"><img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 250px; height: 249px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_ekflEAbWemw/Sgoil3iQ_nI/AAAAAAAAAzw/jOfV_51c19c/s320/pic2.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5335114742531948146" /></a>लेकिन जरा सोचिए कितना अच्छा हो कि अगर इंटरनेट के जरिये कुछ आमदनी भी होने लगे। ज्यादा नहीं तो नेट कनेक्शन पर होने वाला खर्च तो वसूल हो ही जाए। गूगल एडसेंस तो फिलहाल हिंदी में लिखने वालों पर मेहरबान नहीं है। लिहाजा मैं इसी उधेड़बुन हूं कि इंटरनेट पर और क्या जरिया हो सकता जिससे कुछ आमदनी भी हो। अगर आप नेट के जरिये कुछ कमाने की सोचते भी हैं तो ज्यादातर वेबसाइट पहले सदस्यता के रूप में अच्छी-खासी रकम वसूल लेती हैं। इस तरह उनकी कमाई तो हो जाती है। आपकी हो या न हो। बहरहाल कुछ दिन पहले मेरे एक दोस्त ने मुझे कुछ लिंक भेजे जिनमें एक-दो वेबसाइट का पता था। यह कुछ-कुछ नेटवर्किंग जैसा मामला था। खास बात यह थी कि इसमें मुझे एक पैसा भी खर्च नहीं करना था। ज्वाइन करने का तरीका वैसा ही था जैसे आप एक साधारण ईमेल एड्रेस बनाते हैं। या फिर कोई छोटा सा फार्म भरते हैं। मैंने यह सोचकर ज्वाइन कर लिया कि ट्राई करने में बुराई क्या है। आप भी ट्राई करना चाहते हैं तो एक लिंक दे रहा हूं। इस पर क्लिक करें और ज्वाइन कर लें। नेटवर्क में शामिल होने के बाद आप मुफ्त में जितने चाहें उतने एसएमएस भी भेज सकते हैं। समय-समय पर कई आफर्स भी मिलते रहते हैं जो आपकी कमाई बढ़ाने में मददगार होते हैं। नेटवर्क में शामिल होने के लिए <a href="http://mGinger.com/index.jsp?inviteId=1004419">इस</a> लिंक पर क्लिक करें.... <br /><br />बधाई हो। आप एक बड़े नेटवर्क से जुड़ चुके हैं। अब इसमें अपने दोस्तों को जोड़कर इसे और बढ़ाइय़े, आपकी कमाई खुद ब खुद बढ़ती जाएगी। कमाई बढ़ाने के लिए बेहतर होगा कि आप इस तरह के विभिन्न नेटवर्क ज्वाइन कर लें। यह एक और नेटवर्क का लिंक है। इस पर क्लिक करें। ज्वाइन करने का तरीका बेहद आसान है। कुछ रकम तो ज्वाइन करते ही आपके खाते में आ जाएगी। दूसरा नेटवर्क ज्वाइन करने के लिए <a href="http://www.youmint.com/network-xaption">यहां</a> क्लिक करें..... <br /><br />हां, ऐसे नेटवर्क में शामिल होने के लिए आपके पास एक अदद मोबाइल फोन नंबर जरूर होना चाहिए। नेटवर्क ज्वाइन करने के बाद आपके मोबाइल पर एसएमएस आने शुरू हो जाएंगे। हर एसएमएस के लिए कंपनी आपको कुछ एमाउंट देती है। वैसे तो वह एमाउंट शुरुआत में बहुत मामूली लगता है। लेकिन बूंद-बूंद से ही घड़ा भरता। इसमें आप यह आप्शन भी सलेक्ट कर सकते हैं कि एसएमएस किस वक्त पर आएंगे। यानि कितने बजे से कितने बजे के बीच। ऐसा नहीं है कि एसएमएस फालतू होते हैं। बल्कि एसएमएस के जरिये विभिन्न कंपनियां अपना प्रचार करती हैं। आप टीवी पर इश्तेहार देखते हैं। अखबार में विज्ञापन पढ़ते हैं तो मोबाइल पर भी क्यों नहीं। कुछ लोग इसके आलोचक और विरोधी भी हो सकते हैं। इसलिए मैं यही कहूंगा कि यह अपनी च्वाइस का मामला है। जिसे ठीक लगे वह अपनाए। जिसे ठीक न लगे वह इससे दूर रहे। मोबाइल फोन के साथ-साथ इसमें ईमेल का भी आप्शन होता है। अगर आपने वह सलेक्ट कर लिया तो आपको ईमेल भी भेजे जाएंगे। इन ईमेल्स को पढ़ने पर भी आपको एक निश्चित राशि अदा की जाएगी। जैसे ही आप इस वेबसाइट पर रजिस्टर करेंगे आपका एक एकाउंट बन जाएगा, जिसमें पैसे इकट्ठे होते रहेंगे। <a href="http://3.bp.blogspot.com/_ekflEAbWemw/SgojCg_4zqI/AAAAAAAAAz4/YpNY6aGYT3o/s1600-h/lady_flatpanel_g.gif"><img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 293px; height: 276px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_ekflEAbWemw/SgojCg_4zqI/AAAAAAAAAz4/YpNY6aGYT3o/s320/lady_flatpanel_g.gif" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5335115234698383010" /></a>इनकम बढ़ाने के भी कई तरीके हैं। आप अपने नेटवर्क को जितना बढ़ाएंगे आपकी कमाई भी उतनी ही बढ़ती जाएगी। अपने नेटवर्क में नए-नए लोगों को जोड़कर आप ऐसा कर सकते हैं। इसमें भी कोई पैसा खर्च नहीं करना है। सबसे अहम बात यह है कि इसमें किसी तरह का कोई फ्रॉड नहीं है। वेबसाइट की तरफ से आपसे कोई पैसा नहीं लिया जा रहा है। इसलिए अगर बैठे-बिठाए कुछ पैसा हाथ आ जाता है तो मेरा खयाल है इसमें कुछ गलत नहीं है। अब आप सोच रहे होंगे कि इससे वेबसाइट को क्या फायदा होता है। तो हम बता दें कि पहला तो यह कि उसके पास एक डेटाबेस तैयार हो जाता है। दूसरा यह कि जिन कंपनियों के प्रचार के रूप में वह एसएमएस भेजती है उनसे सर्विस चार्ज वसूल करती है। लेकिन आपसे कुछ नहीं वसूलती, बल्कि आपको एसएमएस और ईमेल रिसीव करने के बदले पैसे दिए जाते हैं। रकम चेक के जरिये आपके दिए गए पते पर भेज दी जाती है। तो फिर देर किस बात की। अगर ठीक लगता है तो फिर शामिल हो जाइये इस नेटवर्क में।<div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8343209256361202787-5371150086703128878?l=rex-aashiyana.blogspot.com'/></div>रवीन्द्र रंजनhttp://www.blogger.com/profile/09390660446989029892ravindraranjan@hotmail.com6tag:blogger.com,1999:blog-8343209256361202787.post-50733967123945885102009-05-11T03:04:00.000-07:002009-06-14T15:45:34.058-07:00द ग्रेट सर्कस आफ न्यूजरूम-9<strong>सर्कस की पिछली कड़ियां पढ़ें</strong>- <a href="http://rex-aashiyana.blogspot.com/2009/03/blog-post.html"><strong><span style="color:#009900;">एक</span></strong></a><strong> </strong><a href="http://rex-aashiyana.blogspot.com/2009/03/2.html"><strong><span style="color:#ff0000;">दो</span></strong></a><strong> </strong><a href="http://rex-aashiyana.blogspot.com/2009/03/3.html"><strong><span style="color:#660000;">तीन</span></strong></a><strong> </strong><a href="http://rex-aashiyana.blogspot.com/2009/03/4.html"><strong><span style="color:#000099;">चार</span></strong></a><strong> </strong><a href="http://rex-aashiyana.blogspot.com/2009/03/5.html"><strong><span style="color:#6600cc;">पांच</span></strong></a><strong> </strong><a href="http://rex-aashiyana.blogspot.com/2009/03/6.html"><strong><span style="color:#339999;">छह</span></strong></a><strong> </strong><a href="http://rex-aashiyana.blogspot.com/2009/04/7.html"><strong><span style="color:#000000;">सात</span></strong></a><strong> </strong><a href="http://rex-aashiyana.blogspot.com/2009/04/8.html"><strong><span style="color:#ff0000;">आठ</span></strong></a><span style="color:#ff0000;"> </span><strong>_______________________________________________</strong><br />सर्कस में हाथी, गैंडे और बैल भी हैं। हाथियों की तादाद जरा ज्यादा है। इनमें भी ज्यादातर सफेद हाथी है। जितना बड़ा सर्कस उतने ज्यादा सफेद हाथी। सर्कस के इन कलाकारों ने खुद को इतना ज्यादा मांजा है कि काले से सफेद हो गए हैं। लंबा वक्त लगा है। इस प्रक्रिया में। वक्त के साथ-साथ उनकी कीमत बढ़ती गई। गहरा रंग उतरता गया। उजला रंग निखरता गया। कभी वह काले थे, अब वह सफेद नजर आते हैं। सबके सब। हाथी, गैंडे और बैल सभी। दूधिया सफेद रंग। यह रंग इन पर पूरी तरह चढ़ गया है। खूबसरती को बढ़ाने वाला। वरिष्ठता को दिखाने वाला। सफेद बनने के लिए पता नहीं क्या-क्या जतन किए होंगे? पता नहीं कितने किलो फेयर एंड लवली लगाई होगी। कुछ तो रातोंरात भी काले से सफेद हो गए। उन्होंने शायद माइकल जैक्सन तकनीक का इस्तेमाल किया होगा। या फिर 'कोई और' तकनीक?<br /><br /><a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/_ekflEAbWemw/Sgf7tthSVUI/AAAAAAAAAzQ/hFJSgBv3rP0/s1600-h/ox.GIF"><img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5334509046375535938" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 400px; CURSOR: hand; HEIGHT: 160px" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_ekflEAbWemw/Sgf7tthSVUI/AAAAAAAAAzQ/hFJSgBv3rP0/s400/ox.GIF" border="0" /></a>गैंडे, हाथी और बैल खुद को एक दूसरे का अच्छा दोस्त दिखाने की कोशिश करते हैं। हमेशा। लेकिन सच तो यह है कि इनकी आपस में कभी नहीं बनती। सभी खुद को एक-दूसरे से बड़ा खिलाड़ी मानते हैं। बेजोड़ कलाकार मानते हैं। उन्हें हर वक्त यह गलतफहमी रहती है कि वह सर्कस के सबसे हुनरमंद खिलाड़ी हैं। वरिष्ठ तो खैर हैं ही। उनकी यह गलतफहमी कई बार सर्कस के लिए परेशानी का सबब बन जाती है। तब जब वह आपस में ही सींग भिड़ा बैठते हैं।<br /><br />गैंडे, हाथी और बैल से कोई पंगा नहीं लेना चाहता। हाथी के पैरों तले कुचले जाने का डर है। गैंडा बहुत पहुंच वाला है। सर्कस से ही निकलवा देगा। बैल तो हर वक्त सींग मारने की फिराक में रहता है। कभी-कभी हाथी और गैंडे आपस में ही भिड़ जाते हैं। गैंडे का एक सींग और हाथी की सूंड, मुकाबला जबर्दस्त होता है। दर्शक भी खूब मिलते हैं। मल्टीस्टोरी बिल्डिंग हिल जाती है। पूरा सर्कस कांप उठता है। चूहे, बिल्ली, भालू, बंदर, गीदड़, मोरनी, मुर्गी सब डर जाते हैं। दुबक जाते हैं।<br /><br />सर्कस का रिंग जंग का मैदान बन जाता है। गैंडा जब भी गुस्से में होता है तो सींग मारता है। उसका वार हमेशा की तरह जोरदार होता है। गैंडे की खाल मोटी है। सर्कस में आने के बाद और भी मोटी हो गई है। गैंडा दौड़ा-दौड़ा कर हाथी को मारता है। गैंडा बेखौफ है। गैंडे को किसी का डर नहीं। कहते हैं कि उसके सिर पर चीफ का हाथ है। तभी तो उसके हमले से आहत हाथी चिग्घाड़ता है, फिर चुप हो जाता है। हाथी को बहुत कुछ सोचना पड़ता है। इसीलिए हाथी कई बार गैंडे के सामने 'कमजोर' पड़ जाता है। गैंडा हाईप्रोफाइल है। विदेश से कलाएं सीखकर आया है। विदेशी बोली भी बोलता है। उसके पास विदेशी सर्कस का कलाकार होने का तमगा भी है। हाथी देशी कलाकार है। घने जंगल से निकलकर आया हुआ। गोरा रंग भी उसने अपने 'हुनर' की बदौलत पाया है। यह उसकी 'मेहनत की कमाई' है। हाथी के दांत बहुत लंबे हैं, जिन्हें वह बात-बात पर निपोरता रहता है। हाथी के दांत देखकर चीफ रिंग मास्टर भी खुश हो जाता है। दांत हाथी के हथियार हैं। दिखाने वाले दांत। खाने वाले दांतों को वह अंदर ही रखता है। इस्तेमाल उनका भी कम नहीं करता। पता नहीं क्या-क्या 'खाता' रहता है। गैंडे ज्यादातर मामलों में हाथियों से आगे रहते हैं। गहरा रंग भले ही नहीं उतर पाया, बाकी किसी भी मामले में पीछे नहीं। अनुभव बहुत है। 'खेल' भी बहुत सारे आते हैं।<br /><a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://1.bp.blogspot.com/_ekflEAbWemw/Sgf7QnXhAYI/AAAAAAAAAzI/p6O1LvPNU-Y/s1600-h/colage.bmp"><img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5334508546507735426" style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; WIDTH: 275px; CURSOR: hand; HEIGHT: 320px" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_ekflEAbWemw/Sgf7QnXhAYI/AAAAAAAAAzI/p6O1LvPNU-Y/s320/colage.bmp" border="0" /></a><br />हाथी अब खेल नहीं दिखाता। सफेद हो जाने के बाद तो बिल्कुल भी नहीं। गैंडा जरूर कभी-कभार शो में कूद पड़ता है। कभी कबूतर बनकर तो कभी सूत्रधार बनकर। बैल को तो सींग मारने के सिवा कुछ आता ही नहीं। जब देखो तब रिंग के आसपास सींग उठाए घूमता रहता है। दौड़ता रहता है। लड़ने-भिड़ने को हर वक्त तैयार। शायद यह उसका जन्मजात गुण है। शायद इसीलिए उसे सर्कस में लाया भी गया है। बैल किसी शो में सहयोग करना अपनी तौहीन समझता है। बैल को कभी-कभी कबूतर भी बना दिया जाता है। तब वह कबूतर की तरह फुदकने की कोशिश करता है। न होते हुए भी हुनर दिखाने की कोशिश करता है। स्टाइल मारने की कोशिश करता है। दर्शक उसे देखकर हंसते हैं। जोकर तालियां बजाता है। बिल्लियों, मोरनियों और मुर्गियों के लिए वह हंसी का पात्र बन जाता है।<br /><br />बैल अक्सर छोटे-मोटे कलाकारों को 'हांकने' का काम करता है। यह शो करो। वह शो करो। तुम्हारा शो अच्छा नहीं था। ठीक से हुनर दिखाओ। आदि-आदि। उसकी इस सक्रियता से लगता है कि वह वाकई 'बड़ा' कलाकार हैं। जानकार है। हुनरमंद है। बैल रिंग पर खेल नहीं दिखा पाता। रिंग के बाहर वह बहुत से 'हुनर' दिखाता है। बड़े-बड़े 'खेल' करता है। पूरे 'इंट्रस्ट' और 'परफेक्शन' के साथ। रिंग के बाहर खेल दिखाने का यही 'परफेक्शन' उसकी योग्यता है। टेलेंट हैं। फन है। हुनर है। बैल में यह 'टेलेंट' कूट-कूट कर भरा है। वह दूसरे कई तरह के 'खेल' जानता है। तभी तो वह चीफ रिंग मास्टर का चहेता है। वैसे वह रिंग पर खेल दिखाए भी तो कैसे? उसे खेल दिखाना कम और गड़बड़ करना ज्यादा आता है। कई लोग तो बैल को देखकर गलतफहमी का शिकार हो जाते हैं। उसे सर्कस की बजाय जंगल का जानवर समझ बैठते हैं। इसमें उनकी गलती नहीं। बैल का 'व्यक्तित्व' ही ऎसा है। वैसे भी सर्कस में बैल के होने का 'कांसेप्ट' दर्शकों के गले नहीं उतरता। वहीं गैंडे को देखिए। कितना फुर्तीला है। दिन भर पूरे रिंग पर इधर से उधर भागता रहता है। जैसे सारा सर्कस सिर पर उठा रखा हो।<br /><br />हाथी, गैंडे और बैल हमेशा सर्कस को बदल डालने की बात करते हैं। सारे शो हिट करा देने की बात करते हैं। गोया सब कुछ बदल डालेंगे। लेकिन अफसोस, बदलता कुछ नहीं। वही ढाक के तीन पात। हाथी, गैंडे और बैल सर्कस के पुराने कलाकार हैं। यह कलाकार सर्कस की दुनिया में बहुत मशहूर हैं। सभी सर्कस के लोग इन्हें जानते हैं। पहचानते हैं। बड़े-बड़े सर्कस के चीफ रिंग मास्टर तक उन्हें मानते हैं। इन कलाकारों के बारे में बहुत बड़ी-बडी़ बाते मशहूर होती हैं। मसलन वह बहुत 'बड़े' कलाकार हैं। कई सर्कस के खिलाड़ी रह चुके हैं। ढेरों खेल कर चुके हैं। बड़े-बड़े शो दिखा चुके हैं। उनके सारे शो हिट हैं। वह हिट हैं। सुपर हिट। दूर के ढोल हमेशा सुहावने होते हैं। नजदीक से हकीकत कुछ और ही नजर आती है। भड़कीले रंग स्याह नजर आते हैं। यही हकीकत है। यही सर्कस है।<span style="FONT-WEIGHT: bold">(जारी...)</span><div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8343209256361202787-5073396712394588510?l=rex-aashiyana.blogspot.com'/></div>रवीन्द्र रंजनhttp://www.blogger.com/profile/09390660446989029892ravindraranjan@hotmail.com8tag:blogger.com,1999:blog-8343209256361202787.post-56320122950749287102009-05-09T08:34:00.000-07:002009-05-10T07:14:31.659-07:00...तो फिर कौन है असली पप्पू?<span style="font-weight:bold;">-प्रशांत <br /></span><br />अगर आप भारत के नागरिक हैं और लोकसभा चुनावों में वोट डालने नहीं जाते हैं, तो आप पप्पू हैं, ये हम नहीं कह रहे चुनाव आयोग की ओर से जारी सारे विज्ञापनों में यही बताने की कोशिश की गई है... लेकिन आप अगर पोलिंग बूथ पर जाएं, आपके पास मतदाता पहचान पत्र भी हो और पिछले कई चुनावों से आप वोट डालते रहे हों, और तब भी आपको वोट देने का मौका नहीं मिले, तो आप क्या कहेंगे। पप्पू कौन? <br /><br /><a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://3.bp.blogspot.com/_ekflEAbWemw/SgWsmkONwXI/AAAAAAAAAyI/qm1eEyd7iXY/s1600-h/EVM.jpg"><img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 200px; height: 150px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_ekflEAbWemw/SgWsmkONwXI/AAAAAAAAAyI/qm1eEyd7iXY/s200/EVM.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5333859112248525170" /></a>इससे भी बड़ी बात तो ये कि आप उस जगह के स्थायी निवासी हों, आपके नाम पर एक अदद घर भी हो, आपके नाम से बिजली विभाग ने मीटर लगा रखा हो,आप करीब 9 साल से एक ही जगह पर रह रहे हों, आप कई बार वोट डाल चुके हैं और तब भी आपका नाम वोटर लिस्ट से गायब हो, तब भी क्या आप पप्पू कहलाएंगे। <br /><br />एक और दृश्य-आप बिना वोट डाले लौटकर घर आ रहे हों और आपकी बिल्डिंग की कभी रखवाली करने वाला एक नेपाली चौकीदार रास्ते में मिल जाए और ये कहे, कि सर, वोटर लिस्ट में हमारा भी नाम है, तब आपको कैसा लगेगा? <br /><br />जी हां, मैं किसी और की नहीं अपनी आपबीती बयान कर रहा हूँ। गुरुवार 7 मई को चौथे चरण में गाजियाबाद में वोट डाला गया। एक पढ़ा-लिखा शहरी होने के नाते मैं भी सुबह उठकर वोट डालने के इरादे से पोलिंग बूथ पर गया। मेरे हाथ में भारत के चुनाव आयोग की ओर से जारी मतदाता पहचान पत्र था। हां भाग संख्या पता नहीं था, लेकिन अपने याददाश्त के मुताबिक और अपनी बिल्डिंग के दूसरे लोगो से मिली जानकारी के आधार पर अपने क्षेत्र के पोलिंग बूथ पर पहुंच गया। वहां बूथ के बाहर बैठे पोलिंग एजेंट से पूछा कि भाई मेरा नाम किस लिस्ट में है और किस बूथ नंबर पर मुझे वोट डालना है, अपनी सूची में देखकर ये बता दो। वहां बेतहाशा भीड़ मौजूद थी, लोग अपने अपने बूथ के बारे में जानकारी हासिल करने की होड़ लगाए थे। धक्का मुक्की हो रही थी, पहले तो मैं, इस अफरा-तफरी में थोडा पीछे हो लिया और अपनी बारी का इंतजार करने लगा। <br /><a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/_ekflEAbWemw/SgWsuxgjJhI/AAAAAAAAAyQ/6fD2Vy4tqA4/s1600-h/vote.jpg"><img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 240px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_ekflEAbWemw/SgWsuxgjJhI/AAAAAAAAAyQ/6fD2Vy4tqA4/s320/vote.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5333859253254039058" /></a><br />काफी देर इंतजार करने के बाद भी जब मेरी बारी नहीं आई, तो मैं आगे बढ़ा और एक बार फिर पोलिंग एजेंट से आग्रह किया। फिर वही हाल... करीब घंटाभर गुजर जाने के बाद मेरा धैर्य जवाब देने लगा, तो मैं भी बाकी लोगों की तरह जबरदस्ती घुस गया। तब जाकर पोलिंग एजेंट को इस बात का ख्याल आया कि मैं काफी देर से खडा हूं। उसने मेरा कार्ड देखा और ये कह चलता किया कि आपका नाम इस बूथ पर नहीं, दूसरे बूथ पर है। <br /><br />वोट देने की लालसा लिए मैं दूसरे बूथ पर जा पहुंचा। वहां भी वैसा ही हाल नजर आया। फिर मैं पोलिंग एजेंट से आग्रह कर खड़ा हो गया। काफी देर इंतजार करने के बाद भी जब बात नहीं बनी, तो उससे कड़क आवाज में कहा कि भाई आखिर तुमने ये लाइन क्यों लगा रखी है, जब अपने पहचान वालों का ही नाम तुम्हें बताना है, तो यहां एक बोर्ड टांग दो कि यहां सिर्फ पहचानवालों की ही पर्ची दी जाती है। कृपया दूसरे लोग यहां लाइन में ना लगें। मेरे इन सवालों ने उसे थोड़ा सचेत किया और वो मेरे जैसे कई लोगों से वोटर कार्ड लेकर सूची में नाम तलाश करने लगा। <br /><br />काफी देर बाद मेरी बारी आई। तो उसने एक-एक कर सभी सूचियों में खोज डाला, लेकिन मेरा नाम कहीं नहीं था। मैं हैरान रह गया कि पिछले कई चुनावों में वोट डाल चुका हूं और मेरे पास मतदाता पहचान पत्र भी है, लेकिन इस बार क्या हो गया कि मेरा नाम नहीं है। <br /><br />लेकिन मैं भी हार मानने को तैयार नहीं था, हर कीमत पर अपना नाम खोज वोट डालना चाहता था। मैं पहुंच गया पोलिंग बूथ के अंदर कि शायद वहां पता चल जाए। बूथ के अंदर कुछ कर्मचारी बैठे थे, जिनके पास पूरी सूची मौजूद थी। लोग अपने-अपने नाम खोजने का आग्रह कर रहे थे, तो कुछ नाम नहीं मिल पाने को लेकर बहस भी कर रहे थे। सबकी जुबां पर एक ही सवाल था, कि पिछले कई चुनावों में नाम मौजूद था, वोट भी डाला है और वोटर आईकार्ड भी है, तब मेरा नाम क्यों नहीं है। बाकी लोगों की तरह मैंने भी उस कर्मचारी से नाम खोजने का आग्रह किया, तो उनका सवाल था कि भाग संख्या और वोटर संख्या बताईए। उन्हें शायद इस बात का ध्यान नहीं रहा कि अगर भाग संख्या और वोटर संख्या पता होता तो, मुझे उनके पास जाने की जरुरत ही नहीं पड़ती। मैं सीधे बूथ पर जाता और वोट डाल अपने घर लौट जाता। <br /><br />जब वहां भी कुछ पता नहीं चल पाया, तब बूथ के अंदर गया, वहां एक बूथ खाली था, जहां कोई वोटर मौजूद नहीं था। मैंने वहां मौजूद पुलिस बल से गुजारिश की, तो उन्होंने अंदर जाने की इजाजत दे दी। मैं अंदर जाकर पोलिंग कर्मचारियों से बात की कि मेरे पास वोटर आईकार्ड है, लेकिन सूची में मेरा नाम नहीं मिल पा रहा, क्या कोई तरीका है कि आईकार्ड को देखकर इससे अंदाजा लगाया जा सके कि आखिर किस सूची में मेरा नाम होगा। तो उस सज्जन ने कहा कि नहीं वोटर कार्ड से कुछ पता नहीं चल पाएगा। आपको भाग संख्या पता करना होगा। <br /><br /><a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://1.bp.blogspot.com/_ekflEAbWemw/SgWs3xHm9QI/AAAAAAAAAyY/TRARMPwWDzM/s1600-h/voting.jpg"><img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 200px; height: 133px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_ekflEAbWemw/SgWs3xHm9QI/AAAAAAAAAyY/TRARMPwWDzM/s200/voting.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5333859407768253698" /></a>थक हार कर करीब चार घंटे की मशक्कत के बाद मैं बिना वोट डाले घर लौटने लगा। लेकिन एक पत्रकार के मन को ये नहीं भाया। सोचा कुछ दूसरे बूथों का चक्कर लगा लिया जाए। क्या पता यहां की तरह दूसरे बूथों पर भी कुछ ऐसा ही हाल हो। आसपास के करीब पांच पोलिंग बूथों पर गया। हर जगह ऐसे दर्जनों लोग मिले, जिनके पास वोटर आई कार्ड तो मौजूद था और पिछले चुनावों में वोट भी डाल चुके थे, लेकिन इस बार नाम लिस्ट से गायब था। <br /><br />ऐसे में ये सवाल उठता है कि चुनाव आयोग ने वोटर आईकार्ड अनिवार्य करना चाहता है लेकिन वोटर आईकार्ड मौजूद होने के बाद भी लोगों के नाम वोटर लिस्ट से गायब क्यों हैं जबकि उन लोगों का नाम मौजूद हैं, जो ना तो भारत के नागरिक हैं और ना ही उनका कोई स्थायी पता है। खैर, सबसे जरुरी सवाल कि असली पप्पू कौन? वोट देने के इरादे से घर से निकला और करीब चार घंटे तक धक्के खाकर लौटने वाला वोटर या फिर ऐसी व्यवस्था देनेवाला सिस्टम? (साभार-देशकाल डॉट कॉम)<div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8343209256361202787-5632012295074928710?l=rex-aashiyana.blogspot.com'/></div>रवीन्द्र रंजनhttp://www.blogger.com/profile/09390660446989029892ravindraranjan@hotmail.com4tag:blogger.com,1999:blog-8343209256361202787.post-71913557602622315372009-04-26T13:46:00.000-07:002009-05-10T07:14:06.682-07:00राज ठाकरे के समर्थन में...<a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/_ekflEAbWemw/SfTG_Ubm1FI/AAAAAAAAAx0/nuTWTru70A0/s1600-h/raj.jpg"><img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 251px; height: 300px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_ekflEAbWemw/SfTG_Ubm1FI/AAAAAAAAAx0/nuTWTru70A0/s320/raj.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5329103050204697682" /></a>कुछ दिन पहले मुझे एक ईमेल प्राप्त हुआ। यह ईमेल मेरे <span style="font-weight:bold;">एक अजीज</span> दोस्त ने भेजा था। फारवर्डेड मेल था लिहाजा यह नहीं पता चल पाया कि इसका जनक कौन है। लेकिन यह जरूर बताना चाहूंगा कि जिस दोस्त ने मुझे यह मेल भेजा वह मराठी है। मेल अंग्रेजी में था। मेरा ब्लॉग हिंदी में है। इसलिए मैंने पूरे मेल को हिंदी में हूबहू ट्रांसलेट करने की कोशिश की है। ईमेल इस प्रकार है....<span style="font-weight:bold;">अगर आप राज ठाकरे के समर्थक हैं तो कृपया निम्नलिखित बातों का ध्यान रखें...</span><br /><br /><span style="font-weight:bold;">1.</span> अगर आपका बच्चा मेहनत के बावजूद क्लास में फर्स्ट नहीं आ पाता तो उसे सिखाइये कि ज्यादा मेहनत करने की जरूरत नहीं। बल्कि जो बच्चा पढ़ने में तुमसे तेज है उसे पीटो और क्लास से बाहर कर दो। तुम अपने आप फर्स्ट हो जाओगे। <br /><br /><span style="font-weight:bold;">2.</span> संसद सिर्फ दिल्लीवालों के लिए है क्योंकि वह दिल्ली में स्थित है।<br /><span style="font-weight:bold;">3.</span> राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और केंद्र सरकार के दूसरे सभी नेता दिल्ली के होने चाहिए। <br /><span style="font-weight:bold;">4.</span> मुंबई में हिंदी फिल्में नहीं सिर्फ मराठी फिल्में बनाई जानी चाहिए। <br /><span style="font-weight:bold;">5.</span> राज्य की बसों, ट्रेनों और फ्लाइट्स पर सिर्फ लोकल लोगों की भर्ती होनी चाहिए और दूसरे राज्यों की बसों, ट्रेनें और फ्लाइट्स महाराष्ट्र आने पर रोक लगा दी जानी चाहिए। <br /><span style="font-weight:bold;">6.</span> विदेशों में और भारत के दूसरे राज्यों में काम करने वाले मराठियों को वापस बुला लेना चाहिए, ताकि वो लोकल रोजगार पर कब्जा जमा सकें और बाहरी लोगों को खदेड़ सकें। <br /><span style="font-weight:bold;">7.</span> महाराष्ट्र में शंकर, गणेश और पार्वती की पूजा नहीं होनी चाहिए क्योंकि ये देवता उत्तर (हिमालय) के हैं। <br /><span style="font-weight:bold;">8.</span> ताजमहल देखने पर रोक होनी चाहिए क्योंकि वह सिर्फ उत्तर-प्रदेश वालों के लिए है। <br /><span style="font-weight:bold;">9.</span> महाराष्ट्र के किसानों को केंद्र से मिलने वाली मदद नहीं दी जानी चाहिए क्योंकि यह पैसा पूरे देश से टैक्स के रूप में इकट्ठा किया जाता है। इसलिए कोई मराठी इस पैसे को हाथ कैसे लगा सकता है? <br /><span style="font-weight:bold;">10.</span> हमें कश्मीर में आतंकवादियों का समर्थन करना चाहिए क्योंकि वह अपने 'राज्य की आजादी' के नाम पर बेकसूरों को मार रहे हैं। यह सब वो अपने राज्य की आजादी के लिए कर रहे हैं। <br /><span style="font-weight:bold;">11.</span> महाराष्ट्र से सभी मल्टीनेशनल कंपनियों को निकाल फेंकना चाहिए। भला वो हमारे राज्य में मुनाफा क्यों कमायें? हमें अपनी लोकल माइक्रोसाफ्ट शुरू करनी चाहिए। महाराष्ट्र पेप्सी और महाराष्ट्र मारुति जैसे प्रोडक्ट लांच करने चाहिए। <br /><span style="font-weight:bold;">12.</span> विदेश में या दूसरे राज्यों में बनाए गए सेलफोन, दूसरे राज्य या देश की कंपनी की ईमेल सर्विस, टीवी आदि नहीं इस्तेमाल करने चाहिए। विदेशी फिल्में और विदेशी नाटक भी नहीं देखने चाहिए। <br /><span style="font-weight:bold;">13.</span> हमें भूखों मरना कबूल है। दस गुना महंगा सामान खरीदना मंजूर है। लेकिन विदेशी चीजें खरीदना, दूसरे राज्यों की कंपनियों का सामान खरीदना और आयात करना कबूल नहीं। <br /><span style="font-weight:bold;">14.</span> महाराष्ट्र में किसी भी दूसरे राज्य के व्यक्ति को उद्योग स्थापित करने की इजाजत नहीं होनी चाहिए। <br /><span style="font-weight:bold;">15.</span> मराठियों को सिर्फ लोकल ट्रेनों का उपयोग करना चाहिए। गाड़ियों को मराठी नहीं बनाते और रेलमंत्री भी बिहारी है। इसलिए इनका प्रयोग नहीं करना चाहिए। <br /><span style="font-weight:bold;">16.</span> सभी मराठी यह सुनिश्चित करें कि उनके बच्चे महाराष्ट्र में ही जन्म लें, वहीं पढ़ें-लिखें और वहीं बूढ़े होकर मृत्यु को प्राप्त हों। तभी वह एक सच्चे मराठी कहलाएंगे।<div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8343209256361202787-7191355760262231537?l=rex-aashiyana.blogspot.com'/></div>रवीन्द्र रंजनhttp://www.blogger.com/profile/09390660446989029892ravindraranjan@hotmail.com8tag:blogger.com,1999:blog-8343209256361202787.post-38026587728361354862009-04-22T06:53:00.000-07:002009-06-14T15:47:40.088-07:00द ग्रेट सर्कस आफ न्यूजरूम-8<strong>सर्कस की पिछली कड़ियां पढ़ें- </strong><a href="http://rex-aashiyana.blogspot.com/2009/03/blog-post.html"><strong>एक</strong></a><strong> </strong><a href="http://rex-aashiyana.blogspot.com/2009/03/2.html"><strong>दो</strong></a><strong> </strong><a href="http://rex-aashiyana.blogspot.com/2009/03/3.html"><strong>तीन</strong></a><strong> </strong><a href="http://rex-aashiyana.blogspot.com/2009/03/4.html"><strong>चार</strong></a><strong> </strong><a href="http://rex-aashiyana.blogspot.com/2009/03/5.html"><strong>पांच</strong></a><strong> </strong><a href="http://rex-aashiyana.blogspot.com/2009/03/6.html"><strong>छह</strong></a><strong> </strong><a href="http://rex-aashiyana.blogspot.com/2009/04/7.html"><strong>सात</strong></a><br /><strong>_________________________________________</strong><br />लोमड़ी बेहद चालाक है। सर्कस की पुरानी कलाकार है। नए-नए शो करती रहती है। शो आते हैं। फ्लाप होते हैं। बंद हो जाते हैं। लोमड़ी हार नहीं मानती। डटी रहती है। भिड़ी रहती है। हिट होने की कोशिश में जुटी रहती है। नए-नए शो के जरिए। हर नए शो में नई-नई स्टाइल मारती है। हुनर दिखाने की कोशिश करती है। लेकिन अफसोस दर्शकों को मजा नहीं आता। दर्शक उसे नकार देते हैं। जोकर उसे देखकर हंसते हैं।<br /><br />लोमड़ी खूब मेकअप करती है। बिल्ली, मोरनी, मुर्गी और कबूतरी से कंपटीशन की कोशिश करती है। उनके जैसा दिखना चाहती है। कभी कबूतरी बनने के लिए हाथ-पांव मारती है। कभी बिल्ली जैसी स्मार्ट दिखने की कोशिश करती है। यह जताने की कोशिश करती है कि उसमें अभी बहुत हुनर बाकी है। वह बहुत से खेल कर सकती है। लेकिन मोरनी-कबूतरी बनने की कोशिश उसे फूहड़ बना देती है।<br /><br /><a href="http://2.bp.blogspot.com/_ekflEAbWemw/Se8iKRELkGI/AAAAAAAAAxk/4uxRDamyd7Y/s1600-h/fox.jpg"><img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5327514443977560162" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 320px; CURSOR: hand; HEIGHT: 240px" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_ekflEAbWemw/Se8iKRELkGI/AAAAAAAAAxk/4uxRDamyd7Y/s320/fox.jpg" border="0" /></a>लोमड़ी सपने बहुत देखती है। सोचती भी बहुत है। हर नए शो से पहले वह सोचती है कि नया उसे उसे हिट करा देगा। स्टार बना देगा। चमका देगा। लेकिन ऎसा होता नहीं। न शो चलता है। न लोमड़ी हिट होती है। लोमड़ी मायूस हो जाती है। उसके 'शुभचिंतक' उसे दिलासा देते हैं। अगले शो में हिट होने का ख्वाब दिखाते हैं। उसे भी ख्वाब देखने से कोई गुरेज नहीं। वह ख्वाब देखती है। सुपर स्टार बनने का। उसके बाद अगले शो की जुगत में लग जाती है।<br /><br />लोमड़ियां बहुत पहुंच वाली होती हैं। सर्कस में लोमड़ी के बहुत खैरख्वाह हैं। ये खैरख्वाह उसकी खुशफहमी को बढ़ाते रहते हैं। लेकिन लोमड़ी की कई परेशानियां हैं। हिट होने में कई बाधाएं हैं। दिक्कते हैं। जो उसके स्टार बनने की राह का रोड़ा बन जाती हैं। बढ़ती उम्र भी उसका साथ नहीं देती। लोमड़ी परेशान रहती है। वह न तो मुर्गी और कबूतरी की तरह फुदक पाती है। न ही मोरनी की तरह नाच पाती है। न ही स्मार्ट बिल्ली की तरह कैटवॉक कर पाती है। सच तो यह है कि वह मुर्गी, कबूतरी, मोरनी और बिल्ली के सामने कहीं नहीं ठहरती। यही हकीकत है। इस हकीकत को लोमड़ी पचा नहीं पाती। स्वीकार नहीं कर पाती। या फिर स्वीकार करना नहीं चाहती। वह जुटी रहती है। एक न एक दिन कामयाब होने की आस में। उम्मीद में।<br /><br />लोमड़ी वरिष्ठ कलाकारों में शुमार होती है। लेकिन उसका कंपटीशन हर वक्त नई मुर्गियों, मोरनियों, कबूतरियों और बिल्लियों से रहता है। वह उनके जैसा दिखने की कोशिश करती है। इसके लिए लोमड़ी तरह-तरह के जतन करती है। फैशनेबल परिधान पहनती है। स्टाइल मारती है। मोरनी की तरह मटक-मटक कर चलने की कोशिश करती है। फिर भी उसकी अदा पर कोई कोई फिदा नहीं होता। कोई उसकी अदा को कातिल नहीं बताता। कोई उसे देखकर आहें नहीं भरता। दर्शक उसके खेल पर तालियां नहीं बजाते। लोमड़ भी उसे देखना पसंद नहीं करते। चूहे उसे देखकर मुंह बनाते हैं। उसका मजाक उड़ाते हैं। कई बार वह समझ जाती है। कई बार न समझने का नाटक करती है। सियार भी उसे पसंद नहीं करता। वह तो नई मुर्गी और मोरनी में ज्यादा दिलचस्पी दिखाता है।<br /><br />लोमड़ी सूत्रधार बनना चाहती है। मोरनी की तरह लोकप्रिय होना चाहती है। कबूतरी की तरह दिखना चाहती है। सर्कस में छा जाना चाहती है। सर्कस की दुनिया में मशहूर हो जाना चाहती है। शक्ल नहीं तो क्या हुआ? अक्ल नहीं तो क्या हुआ? मोरनी और मुर्गी जैसी नजाकत नहीं तो क्या हुआ? पहुंच तो है। सिफारिश तो है। सिफारिश से ही रास्ता निकलता है। रास्ते 'और' भी हैं। स्मार्ट कलाकार उसे 'रास्ते' पर लाने की कोशिश करते हैं। सारे ख्वाब सच होने का ख्वाब दिखाते हैं। लोमड़ी असमंजस में रहती है। कौन सी डगर चुने। कौन सा रास्ता अख्तियार करे। हिट तो होना ही है। स्टार तो बनना ही है। किसी भी कीमत पर। सब स्टार को नमस्कार जो करते हैं।<br /><a href="http://3.bp.blogspot.com/_ekflEAbWemw/Se8iaSj83yI/AAAAAAAAAxs/AQidlXHw0zE/s1600-h/colage.bmp"><img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5327514719257157410" style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; WIDTH: 172px; CURSOR: hand; HEIGHT: 200px" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_ekflEAbWemw/Se8iaSj83yI/AAAAAAAAAxs/AQidlXHw0zE/s200/colage.bmp" border="0" /></a><br />लोमड़ी बहुत 'मेहनत' से वरिष्ठ कलाकार के ओहदे तक पहुंची है। वह और आगे बढ़ना चाहती है। ऊंचाइयों तक पहुंचना चाहती है। उसके साथ या उसके बाद सर्कस में आईं बिल्लियों, मुर्गियों, कबूतरियों और मोरनियों की कामयाबी उसे परेशान करती है। लोमड़ी ओहदे में उनसे सीनियर है। उम्र में उनसे बड़ी है। फिर भी लोमड़ी को उनसे जलन होती है। उन्हें देखकर कुढ़न होती है। यह कुढ़न कई बार लोमड़ी को आक्रामक बना देती है। वह हिंसक हो उठती है। पैर फटकने लगती है। चीखने लगती है। चिल्लाने लगती है। यह प्रचार करने लगती है कि नई मुर्गियां किसी काम की नहीं। नई मुर्गियों में कोई हुनर नहीं। लोमड़ी की पूरी कोशिश होती है कि कोई नई मुर्गी, मोरनी, बिल्ली और कबूतरी सर्कस में न आने पाएं। आएं भी तो सर्कस के स्लम में पड़ी रहें। किसी डैनी बॉयल की नजर उन पर नहीं पड़नी चाहिए। उन्हें चमकना नहीं चाहिए। सूत्रधार नहीं बनना चाहिए। स्टार नहीं बनना चाहिए। उन सबसे लोमड़ी खुद को असुरक्षित महसूस करती है। इसके बावजूद मोरनियां और मुर्गियां हमेशा बाजी मार ले जाती हैं। सबकी चहेती बन जाती हैं। चीफ रिंग मास्टर से लेकर सीनियर-जूनियर रिंग मास्टर तक उन्हें पसंद करते हैं। लोमड़ी को कोई पसंद नहीं करता। यही हकीकत है। यही सर्कस है। <strong>(जारी...)</strong><div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8343209256361202787-3802658772836135486?l=rex-aashiyana.blogspot.com'/></div>रवीन्द्र रंजनhttp://www.blogger.com/profile/09390660446989029892ravindraranjan@hotmail.com18tag:blogger.com,1999:blog-8343209256361202787.post-27774925932028512592009-04-18T14:04:00.000-07:002009-04-18T14:10:30.879-07:00इधर से गुजरा था सोचा सलाम करता चलूं...चुनाव के मौसम पर गर्मी का मौसम भारी पड़ने लगा है। मतदान की तारीख तेजी से नजदीक आती जा रही है, लेकिन चुनाव प्रचार उतनी गति नहीं पकड़ रहा है। वजह, मौसम की मार। हिम्मत जुटाकर, कार्यकर्ताओं को जोश दिलाकर उम्मीदवार मैदान में निकलते भी हैं तो जनता इतनी 'आलसी' है कि ऎसी चिलचिलाती गर्मी में घर से बाहर ही नहीं निकलना चाहती। लिहाजा जनसभाओं में भीड़ जुटे भी तो कैसे? बड़ी मुसीबत है। जनसभा में भीड़ न जुटी तो क्या 'मैसेज' जाएगा? विरोधी तो मजाक उड़ाएंगे ही, लोगों को भी लगेगा कि इन जनाब के पक्ष में जनसमर्थन नहीं है।<br /><br />भीषण गर्मी की वजह से सब कुछ ठंडा है। तो क्या करें? किसी कार्यकर्ता ने सुझाया कि पब्लिक नहीं आ रही तो क्या हुआ, क्यों न हम ही पब्लिक के पास चलें? मतलब डोर टू डोर जनसंपर्क? हां वहीं! यह ठीक रहेगा। इसी बहाने नाराज मतदाताओं से भी वोट मांग लेंगे और कह देंगे कि यहां से गुजर रहा था, सोचा आपसे भी मिलता चलूं। इस नाचीज का भी खयाल रखिएगा।<br /><br /><a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://1.bp.blogspot.com/_ekflEAbWemw/SepA9AD4d1I/AAAAAAAAAxc/IpcIGFxx4H8/s1600-h/indian_election.jpg"><img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 400px; height: 272px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_ekflEAbWemw/SepA9AD4d1I/AAAAAAAAAxc/IpcIGFxx4H8/s400/indian_election.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5326140926051514194" /></a>बात जमने लायक थी। नेता जी खुश हो गए। यही ठीक रहेगा। ठीक है, आज से ही शुरू करते हैं। नेता जी उत्साहित थे। इसी बीच एक समझदार से दिखने वाले कार्यकर्ता ने सुझाया...लेकिन सर, ध्यान रखिएगा, किसी के दुखड़े से ज्यादा द्रवित न हो जाइएगा। उसकी 'हेल्प' करने की कोशिश तो बिल्कुल न करिएगा वर्ना कहीं आचार संहिता उल्लंघन के लफड़े में न फंस जाएं। लालू और शिवराज तो बच निकले लेकिन यह दिल्ली है। तभी एक और कार्यकर्ता ने अपना कुछ 'प्रैक्टिकल' सा सुझाव रखा। अरे सर, कह दीजिएगा जिसकी जो भी समस्या है, जीतने के बाद सुलझाई जाएगी। अभी तो हम सिर्फ आप लोगों की समस्याएं सुनने आए हैं। समस्याएं सुलझाने के लिए तो 'पॉलिटिकल पॉवर' चाहिए। वह तो जीतने के बाद ही मिलेगा न? अभी आप हमारा ध्यान रखिए। जीतने के बाद हम आपका ध्यान रखेंगे। हां अगर कोई मतदाता अपना दुखड़ा कुछ ज्यादा ही रोने लगे तो उसे सांत्वना देकर ही वहां से खिसक लीजिएगा। उसके दुख में ज्यादा 'इन्वाल्व' होने की जरूरत नहीं है। नहीं तो हमारा दुख बढ़ सकता है।<br /><br />बहरहाल, चिलचिलाती गर्मी में डोर टू डोर जनसंपर्क के अलावा कोई रास्ता नहीं है। प्यासे को कुएं के पास जाना ही पड़ता है। लिहाजा नेता जी निकल पड़े हैं, अपने सहयोगियों (दरअसल चमचों) के साथ। कृपया दरवाजा खुला रखें, हो सकता है वह आपकी गली से भी गुजरें।<div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8343209256361202787-2777492593202851259?l=rex-aashiyana.blogspot.com'/></div>रवीन्द्र रंजनhttp://www.blogger.com/profile/09390660446989029892ravindraranjan@hotmail.com3tag:blogger.com,1999:blog-8343209256361202787.post-32963174913039285642009-04-08T03:32:00.000-07:002009-06-14T15:49:17.921-07:00द ग्रेट सर्कस आफ न्यूजरूम-7<strong>सर्कस की पिछली कड़ियां पढ़ें- </strong><a href="http://rex-aashiyana.blogspot.com/2009/03/blog-post.html"><strong>एक</strong></a><strong> </strong><a href="http://rex-aashiyana.blogspot.com/2009/03/2.html"><strong>दो</strong></a><strong> </strong><a href="http://rex-aashiyana.blogspot.com/2009/03/3.html"><strong>तीन</strong></a><strong> </strong><a href="http://rex-aashiyana.blogspot.com/2009/03/4.html"><strong>चार</strong></a><strong> </strong><a href="http://rex-aashiyana.blogspot.com/2009/03/5.html"><strong>पांच</strong></a><strong> </strong><a href="http://rex-aashiyana.blogspot.com/2009/03/6.html"><strong>छह</strong></a> _________________________________________<br /><br />सर्कस का सियार बहुत फैशनेबल है। रंगा सियार है। बूढ़ा हो चुका है। जवान दिखने की हसरत है। यह हसरत हर वक्त उसके दिल में हिलोरें मारती रहती है। कई बार तो छलक कर बाहर तक आ जाती है। पूरे रिंग पर बिखर जाती है। हसरतें उससे बहुत कुछ कराती हैं। रंगा सियार खुद को रोज अलग-अलग रंग में रंगता है। कभी लाल-हरा-गुलाबी। कभी नीला-पीला। चटकीला। भड़कीला। नया रंग उसे रंगीला बना देता है। ऎसा वह मानता है। चटकीले-भड़कीले रंगों के पीछे उसकी असलियत छिप जाती है। बुजुर्गियत का एहसास दब जाता है। उम्र की लकीरें ढक जाती है। बूढ़ा सियार जवां नजर आने लगता है। मुर्गियां धोखा खा जाती हैं। बिल्ली, लोमड़ी, कबूतरी और मोरनी धोखा खाने का दिखावा करने लगती हैं। वह खुश हो जाता है। अपने मकसद में कामयाब होकर। गोया खुदा मिल गया।<br /><br /><a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://3.bp.blogspot.com/_ekflEAbWemw/SdyAYpaeZTI/AAAAAAAAAvU/DlNErNGJMZw/s1600-h/wolves.jpg"><img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5322270020567196978" style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; WIDTH: 200px; CURSOR: hand; HEIGHT: 142px" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_ekflEAbWemw/SdyAYpaeZTI/AAAAAAAAAvU/DlNErNGJMZw/s200/wolves.jpg" border="0" /></a>वह खुश होकर कबूतरियों, मोरनियों, मुर्गियों को नजदीक बुलाता है। मोरनियां नहीं, मुर्गियां तो आ ही जाती हैं। कभी मजबूरीवश। कभी स्वार्थवश। उनके आते ही सियार सर्कस के शो में 'बिजी' हो जाता है। जब तक आसपास मुर्गिया रहती हैं। मोरनियां रहती हैं। कबूतरियां रहती हैं। वह बिजी रहता है। लोमड़ियों को वह खास पसंद नहीं करता। वह चालाक होती हैं। उसके झांसे में नहीं आतीं। मोरनियां उसे 'मांस' नहीं डालतीं। इसी चक्कर में वह कई बार नकली पंख लगाकर मोर बन जाता है। नाच दिखाता है। मोरनी को लुभाने की कोशिश करता है। रिंग के बाहर-भीतर, आसपास स्टाइल से मंडराने लगता है। खुद को जन्मजात मोर समझने लगता है। लेकिन इस सबसे मोरनियां इंप्रेस नहीं होती। सियार की ये हरकत उसके लिए उपहास का सबब बन जाती है।<br /><br />बिल्लियां उसे खासी पसंद हैं। शायद उनसे रंगे सियार को नए-पुराने शो को और चमकाने की प्रेरणा मिलती है। आयडिया मिलता है। या फिर पता नहीं 'क्या' मिलता है। कई बार धोखा खाने का नाटक करना मुर्गियों और मोरनियों की मजबूरी होती है। क्योंकि मोरनी और मुर्गी पास हो तो सियार को बाकी कुछ याद नहीं रहता। शो का वक्त भी भूल जाता है। उसकी यह कमजोरी मुर्गियों के लिए मुफीद है। यही सच है।<br /><br />कभी-कभी सियार के पास सजने-संवरने का वक्त नहीं होता। तब वह खाल ओढ़कर भी सर्कस में चला आता है। कभी शेर की तो कभी चीते की। तब उसे लगता है कि वह चीफ रिंग मास्टर बन गया है। लेकिन खाल के पीछे छिपी उसकी "असलियत" बाहर आ ही जाती है। उसकी हरकतों से। उसके हाव-भाव से। उसकी आंखों से। हाथों से। बातों से। कभी-कभार कुछ नई मुर्गियां और मोरनियां सचमुच धोखा खा जाती हैं। रंगे सियार को पहचान नहीं पातीं। सियार इसका पूरा फायदा उठाता है। आंखों से। हाथों से। बातों से। इसके बावजूद अगर वह अपनी असलियत छिपाने में कामयाब हो गया तो जैसे ही वह बिल्लियों, मोरनियों और मुर्गियों के सामने पूंछ हिलाता है, लार टपकाता है, उसकी हकीकत बेपर्दा हो जाती है। खूबसूरत रंग के पीछे छिपा स्याह रंग सबको दिख जाता है। यही उसकी विडंबना है। यही उसकी परेशानी है।<br /><br /><a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://4.bp.blogspot.com/_ekflEAbWemw/SdyAxKzBUWI/AAAAAAAAAvc/zlY_6gVXGoQ/s1600-h/colage.bmp"><img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5322270441845379426" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 172px; CURSOR: hand; HEIGHT: 200px" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_ekflEAbWemw/SdyAxKzBUWI/AAAAAAAAAvc/zlY_6gVXGoQ/s200/colage.bmp" border="0" /></a>सर्कस का कोई शो वक्त पर शुरू हो या न हो। कोई कलाकार अपनी कला दिखाए या न दिखाए। किसी कलाकार का हुनर जाया हो, होता रहे। सियार को कोई फर्क नहीं पड़ता। वह अपनी दुनिया में मगन रहता है। मुर्गियों और मोरनियों के बीच खुश रहता है। वह बहुत 'खुशमिजाज' है। लेकिन ऎसा नहीं है कि सियार को गुस्सा नहीं आता है। वह भी गुस्सा हो जाता है। खासकर तब, जब वह 'बिजी' हो और कोई बंदर, लोमड़, कौवा, चूहा, भालू उसे 'डिस्टर्ब' करने की हिमाकत कर दे। चूहों से वह बहुत चिढ़ता है। चूहों की तादाद भी ज्यादा है और वह जब-तब उसके सिर पर सवार रहते हैं। इससे सियार के "खेल" में खलल पड़ता है। तब वह जोर से हुआं-हुआं करता है। सब डर जाते हैं। खामोश हो जाते हैं। मुर्गियां दड़बों में दुबक जाती हैं।<br /><br />बाज, चील, गिद्ध। सब सियार के अच्छे दोस्त हैं। उनसे सियार की बहुत पटती है। शायद इसलिए कि सब 'मांसाहारी' हैं। खाने-पीने के शौकीन हैं। 'फितरत' भी मिलती-जुलती है। मिल-बांट कर खाते हैं। सियार सीनियर है। सर्कस का पुराना कलाकार है। वरिष्ठ रिंग मास्टर है। उसे बहुत सी कलाएं आती हैं। वैसे सर्कस के शो में उसकी दिलचस्पी कम ही होती है। सूत्रधार कौन है। कबूतरी कौन है। यह जानने में वह ज्यादा वक्त बिताता है। सबको लगता है। उम्मीद होती है। सियार सर्कस के सभी शो को चमका देगा। हर शो को हिट करा देगा। लेकिन वह ऎसा नहीं सोचता। वह अपनी स्टाइल में काम करता है। मुर्गियों और मोरनियों से घिरा रहना उसे सबसे ज्यादा पसंद है। यह उसकी प्रथम वरीयता है। शायद उसका जन्मजात गुण है। वह इसे बदल नहीं सकता। या फिर बदलना नहीं चाहता। यही हकीकत है। यही सर्कस है। <span style="FONT-WEIGHT: bold">(जारी...)</span><div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8343209256361202787-3296317491303928564?l=rex-aashiyana.blogspot.com'/></div>रवीन्द्र रंजनhttp://www.blogger.com/profile/09390660446989029892ravindraranjan@hotmail.com17tag:blogger.com,1999:blog-8343209256361202787.post-89479098031223584482009-03-25T10:23:00.000-07:002009-06-14T15:50:09.255-07:00द ग्रेट सर्कस आफ न्यूजरूम-6<strong>सर्कस की पिछली कड़ियां पढ़ें- </strong><a href="http://rex-aashiyana.blogspot.com/2009/03/blog-post.html"><strong>एक</strong></a><strong> </strong><a href="http://rex-aashiyana.blogspot.com/2009/03/2.html"><strong>दो</strong></a><strong> </strong><a href="http://rex-aashiyana.blogspot.com/2009/03/3.html"><strong>तीन</strong></a><strong> </strong><a href="http://rex-aashiyana.blogspot.com/2009/03/4.html"><strong>चार</strong></a><strong> </strong><a href="http://rex-aashiyana.blogspot.com/2009/03/5.html"><strong>पांच</strong></a><strong> </strong><br /><strong>___________________________________</strong><br /><br />सर्कस में कलाकारों का आना-जाना लगा रहता है। पुराने जाते हैं। नए आते हैं। नए जाते हैं। पुराने आते हैं। कुछ धूनी रमाकर एक ही सर्कस में जम जाते हैं। गोया वहीं से रिटायर होंगे। वहीं से जनाजा उठेगा। वैसे आजकल सर्कस के स्मार्ट कलाकार एक को छोड़कर दूसरा-तीसरा-चौथा सर्कस ज्वाइन करते रहते हैं। यह सिलसिला निरंतर चलता रहता है। किसी नए कलाकार का एक सर्कस को छोड़कर दूसरे में आना-जाना सर्कस के दूसरे कलाकारों के लिए बेहद उत्सुकता का सबब होता है। चूहे से लेकर गीदड़, सियार, भालू, बंदर सब उस नए कलाकार का इतिहास खंगालने में लग जाते हैं।<br /><br />सर्कस के कई कलाकारों का यही काम होता है। वह दूसरे कलाकारों पर 'नजर' रखते हैं। कौन कहां जा रहा है। जाना चाहता है। पता रखते हैं। सबके बारे में। चूहा हो या लोमड़ी। कबूतर हो या कबूतरी। मोर हो या मोरनी। इन जासूस कलाकारों को 'नजर' रखने में महारत हासिल होती है। जैसे ही कोई कलाकार दूसरे सर्कस का रुख करता है, इन्हें खबर लग जाती है। मोरनियां, मुर्गियां और कबूतरियां खासतौर पर इनके निशाने पर होती हैं। कई बार तो यह जासूस उन पर नजर रखने के चक्कर में दूसरे सर्कस तक 'झांक' आते हैं....<br /><span class="fullpost"><br />अगर कोई नई मुर्गी, कबूतरी या मोरनी सर्कस में भर्ती हो जाए तब तो कहने ही क्या। चूहे, गीदड़, भालू, सियार से लेकर सीनियर, जूनियर रिंग मास्टर तक वह सभी के आकर्षण का केंद्र बन जाती है। कोई उसकी 'चाल' पर नजर रखता है। कोई उसकी 'ढाल' पर। कोई उसके हुनर की बात करता है। तो कोई बेवजह तारीफ कर उसके नजदीक पहुंचना चाहता है। वह कहां रहती हैं। किसके साथ रहती है। कहां से आती है। कितने बजे आती है। कितने बजे जाती है। सर्कस में उसका शो कितने बजे है। सर्कस के 'स्मार्ट' कलाकारों को सब पता रहता है। वह पल-पल पर नजर रखते हैं। जैसे कोई शिकारी अपने 'शिकार' पर नजर रखता है।<br /><br /><a href="http://3.bp.blogspot.com/_ekflEAbWemw/Scpo_HU-MGI/AAAAAAAAAuQ/rHqmjZQ40Go/s1600-h/colage.bmp"><img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5317177743572349026" style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; WIDTH: 275px; CURSOR: hand; HEIGHT: 320px" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_ekflEAbWemw/Scpo_HU-MGI/AAAAAAAAAuQ/rHqmjZQ40Go/s320/colage.bmp" border="0" /></a>सर्कस में नई मुर्गी, कबूतरी या मोरनी आने से पुरानी को परेशानी हो जाती है। वह फौरन पता करती है, नई मुर्गी कितने पानी में है। किस ओहदे पर आई है। पुराने सर्कस में कौन सा शो करती थी। कौन सा खेल दिखाती थी। यहां कौन सा हुनर दिखाएगी। कौन सा खेल करेगी। आदि-आदि। सब जानने के बाद पुरानी मुर्गी यह प्रचार करने में जुट जाती हैं कि उसके हुनर के सामने नई कुछ भी नहीं। उसकी अदा जितनी कातिल है, नई की कहां। उसकी चाल जितनी मदमस्त है, नई की कहां। वह जितनी खूबसूरत है, नई कहां। जितने फन उसे आते हैं, नई को कहां आते होंगे। उसे आता ही क्या है। जरूर सिफारिश से आई होगी। या फिर...पता नहीं 'कैसे' आई होगी।<br /><br />चूहे, गीदड़, सियार, भालू की अपनी ही दिक्कतें हैं। अपना खेल छोड़कर वह नई मुर्गी के पीछे पड़ जाते हैं। उनका एक ही काम होता है शिकारी की तरह नई चिड़िया फांसना। इसके लिए जरूरी है उसके बारे में सब कुछ जानना। वो यह तक पता लगा डालते हैं कि नई मुर्गी, मोरनी या फिर कबूतरी किस जंगल में पैदा हुई। कैसे किस सर्कस तक पहुंची। कैसे इस सर्कस तक पहुंची। कितने सर्कस का पानी पीकर आई है। कैसे आई है। कहां से आई है। कितनी पहुंच वाली है। कौन-कौन से हुनर जानती है। किसको-किसको पहचानती है। कौन उसका खास है। वह किसकी खास है। चूहे से लेकर गीदड़, सियार, भालू, चीता, शेर तक सभी की नजरें हर वक्त उसी को घूरती रहती हैं। बेचारी ! सर्कस के बोझ की मारी। चील, बाज, गिद्ध जैसे 'कलाकार' तो हर वक्त उस पर नजरें गड़ाए रहते हैं। कब मौका मिले और झपट पड़ें। वैसे मुर्गी, मोरनी, कबूतरी सब उनके इन खतरनाक इरादों से वाकिफ रहती हैं। उन्हें हर वक्त चील, बाज औऱ गिद्ध से खुद को बचाए रखना पड़ता है। यही उनकी कला है। यही उनका हुनर है।<br /><br />सर्कस में हर कोई कोशिशों में लगा रहता है। आखिरी वक्त तक। उम्मीदें हर वक्त कायम रहती हैं। चूहे, गीदड़, सियार, शेर, चीता, भालू, चील, बाज, गिद्ध सब भिड़े रहते हैं। पता नहीं कब किसका तीर निशाने पर लग जाए। मुर्गी फंस जाए। मुर्गी भी इस बात को अच्छी तरह समझती है। कई बार वह दिखावे के लिए फंस जाने का नाटक भी करती है। कई बार वाकई फंस जाती है। कभी मर्जी से। कभी धोखे से। कभी मजबूरीवश।<br /><br />सर्कस में नई मुर्गी औऱ मोरनी के आते ही पुरानी की कीमत कम हो जाती है। चूहे से लेकर चीफ तक के लिए उसका हुनर पुराना हो जाता है। कल तक उसकी तारीफों के पुल बांधे जाते थे। अब सबको उसके फन में खामियां नजर आने लगती हैं। पुरानी मोरनी की चाल भी अच्छी नहीं लगती और ढाल भी। तब पुरानी मुर्गी पहले से ज्यादा लीपना-पोतना शुरू कर देती है। ज्यादा स्टाइल मारना शुरू कर देती है। उसे गुस्सा भी ज्यादा आने लगता है। जरा-जरा सी बात पर। वह हर बात पर अपने जूनियर कलाकारों पर भड़कने लगती है। चिल्लाने लगती है। यही हकीकत है।<br /><br />एक न एक दिन सर्कस के हर कलाकार को इस कड़वी हकीकत का एहसास होता है। तब वह अपने सर्कस को छोड़कर किसी दूसरे सर्कस का रुख कर लेता है। कभी फायदे के लिए। कभी मजबूरीवश। एक सर्कस से दूसरे-तीसरे-चौथे सर्कस जाने के फंडे पर नए कलाकार ज्यादा यकीन रखते हैं। जब तब इधर-उधर ट्राई मारते रहते हैं। मौका मिलते ही उड़ लेते हैं। नए सर्कस के नए-नए खेलों का हिस्सा बन जाते हैं। इससे उनका रुतबा बढ़ जाता है। वह बड़े कलाकार बन जाते हैं। जूनियर-सीनियर रिंग मास्टर बन जाते हैं। रातों रात। नया सर्कस नया ओहदा। सब कुछ बदला-बदला। नए से अलग पुराने से जुदा। <strong>(जारी...)</strong></span><div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8343209256361202787-8947909803122358448?l=rex-aashiyana.blogspot.com'/></div>रवीन्द्र रंजनhttp://www.blogger.com/profile/09390660446989029892ravindraranjan@hotmail.com10tag:blogger.com,1999:blog-8343209256361202787.post-37328559047944114552009-03-15T07:32:00.000-07:002009-03-17T06:03:27.296-07:00स्टोव! मेरे सवालों का जवाब दोस्टोव तुम ससुराल में ही क्यों फटा करते हो?<br />मायके में क्यों नहीं ?<br /><br />स्टोव तुम्हारी शिकार बहुएं ही क्यों होती हैं?<br />बेटियां क्यों नहीं ?<br /><br />स्टोव तुम इतना भेदभाव क्यों करते हो ?<br />समझते क्यों नहीं ?<br /><br />स्टोव कहां से पाई है तुमने ये फितरत ?<br />बताते क्यों नहीं ?<br /><br />स्टोव तुम भीतर से इतने कमजोर क्यों हो ?<br />अक्सर फट जाते हो ?<br /><br />स्टोव तुम हमेशा विस्फोट की ही भाषा क्यों बोलते हो ?<br />क्या तुम्हारे पास आंखें भी हैं ?<br /><br />स्टोव तुम कैसे देख लेते हो किचन में बहू ही है ?<br />फटने का फैसला कर लेते हो ?<br /><br />स्टोव तुम कैसे पहचान लेते हो अपने शिकार को ?<br />कौन बन जाता है तुम्हारी आंखें ?<br /><br />स्टोव अब तुम इस कदर खामोश क्यों हो ?<br />बोलते क्यो नहीं ?<br /><br />स्टोव यह तो बताओ तुम कब फटना बंद करोगे ?<br />कुछ तो जवाब दो ?<br /><br />स्टोव बरसों से पूछ रहा हूं यह सवाल अब तो बोलो ?<br />अब तो यह राज खोलो ?<br /><br />(बरसों पहले लिखीं थीं यह पंक्तियां। आज अचानक वह मुड़ा-तुड़ा कागज मिल गया। मेरे इन सवालों का जवाब अब भी नहीं मिला है। हां, कुछ फर्क जरूर आया है। अब स्टोव की जगह गैस सिलेंडर फटने लगे हैं)<div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8343209256361202787-3732855904794411455?l=rex-aashiyana.blogspot.com'/></div>रवीन्द्र रंजनhttp://www.blogger.com/profile/09390660446989029892ravindraranjan@hotmail.com9tag:blogger.com,1999:blog-8343209256361202787.post-19560420365793328872009-03-14T09:12:00.000-07:002009-06-14T15:50:56.688-07:00द ग्रेट सर्कस आफ न्यूजरूम-5<strong>सर्कस की पिछली कड़ियां पढ़ें- </strong><a href="http://rex-aashiyana.blogspot.com/2009/03/blog-post.html"><strong>एक</strong></a><strong> </strong><a href="http://rex-aashiyana.blogspot.com/2009/03/2.html"><strong>दो</strong></a><strong> </strong><a href="http://rex-aashiyana.blogspot.com/2009/03/3.html"><strong>तीन</strong></a><strong> </strong><a href="http://rex-aashiyana.blogspot.com/2009/03/4.html"><strong>चार</strong></a><strong> </strong><strong>_______________________________</strong><br /><br />सर्कस में 'पूछ' का बड़ा महत्व है। पूछ जितनी 'लंबी' होती है कलाकार का रुतबा भी उसी हिसाब से बढ़ जाता है। चीफ रिंग मास्टर के बाद सर्कस में सबसे ज्यादा पूछ होती है 'सूत्रधार' की। तीसरे नंबर पर आते हैं कबूतर। कबूतरों औऱ सूत्रधारों की कला को चीफ रिंग मास्टर से भी ज्यादा वाहवाही मिलती है। जब यह दोनों चीफ रिंग मास्टर के हिस्से की वाहवाही तक बटोर ले जाते हैं, तो जरा सोचिए, चूहों की बिसात ही क्या है? जो दिखता है वो बिकता है। यही सर्कस है। सर्कस में सूत्रधार दिखता है। कबूतर दिखता है। कबूतरी दिखती हैं। मोरनी दिखती है। मुर्गी दिखती है। इसलिए वह बिकती हैं। लोग उन्हें देखते हैं। वाह-वाह करते हैं। बहुत बड़ा कलाकार समझते हैं। स्टार समझते हैं। होशियार समझते हैं। शो के दौरान कई बार सूत्रधार और कबूतर एक साथ रिंग में दिखते हैं। कई बार तीनों भी शो में नजर आ जाते हैं। साथ-साथ। चीफ, सूत्रधार औऱ कबूतर।<br /><br />चूहों के बाद सर्कस में सबसे ज्यादा तादाद कबूतरों की ही होती है। लेकिन पूछ सूत्रधार की ही सबसे ज्यादा है। सबसे 'लंबी' है। वह चीफ रिंग मास्टर के साथ उठता-बैठता है। खाता-पीता है। दावत उड़ाता है। हंसी-मजाक करता है। बहस करता है। कई बार घूमने भी जाता है। चीफ रिंग मास्टर की सूत्रधार पर 'विशेष' कृपा होती है। चीफ की कृपा न हो तो कोई सूत्रधार नहीं बन सकता। भले ही वह रिंग में कितने ही जोर-जोर से कुलांचे भरे। भले ही उसका टेलेंट बाहर निकलकर पूरे रिंग में बिखर जाए। चीफ को कोई फर्क नहीं पड़ता। यह चीफ की च्वाइस का मामला है। यह अंदर की बात है।<br /><br /><a href="http://2.bp.blogspot.com/_ekflEAbWemw/Sb0FCVXthGI/AAAAAAAAAtc/bFaM0VfUGqw/s1600-h/0602_sonam.jpg"><img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5313408673021527138" style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; WIDTH: 248px; CURSOR: hand; HEIGHT: 178px" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_ekflEAbWemw/Sb0FCVXthGI/AAAAAAAAAtc/bFaM0VfUGqw/s400/0602_sonam.jpg" border="0" /></a>अलग-अलग सर्कस में सूत्रधार बनने के अपने-अपने 'मापदंड' हैं। कुछ नियम सबके सामने होते हैं। कुछ 'दबे-ढके-छिपे' होते हैं। एक बात सब सर्कस में समान है। चीफ की कृपा। अलग-अलग सर्कसों के चीफ रिंग मास्टर की अपनी-अपनी च्वाइस होती है। सूत्रधार बनना है। सर्कस में चमकना है। तो 'कोशिश' करनी ही पड़ेगी। 'मेहनत' करनी ही होगी। वक्त के साथ-साथ साथ कोशिश और मेहनत का अंदाज बदल गया है। मायने भी बदल गए हैं। हमेशा से ऎसा ही होता आया है। कई सर्कसों में कुछ वरिष्ठ सूत्रधार हैं। वह वाकई में खास हैं। उन्हें उनके टेलेंट ने सूत्रधार बनाया है। अब भी वह जब कभी-कभार रिंग पर उतरते हैं तो दर्शक सांस रोककर उनका खेल देखते हैं। वह बहुत संघर्ष करके आए हैं। पहले कबूतर-कबूतरी के तौर पर काम किया। फिर सूत्रधार बनने का मौका मिला। सर्कस में मौका बहुत अहम है। जिसे हुनर दिखाने का मौका मिला वह छा गया। लेकिन अब सूत्रधार संघर्ष से नहीं बनते। मेहनत से नहीं बनते। कृपा से बनते हैं। जुगाड़ से बनते हैं। चीफ रिंग मास्टर को 'खुश' करके बनते हैं। रातोंरात छा जाते हैं। चीफ खुश तो गारंटी है। हंड्रेट परसेंट। चूहे से लेकर लोमड़ी, बिल्ली, गीदड़, सियार, भालू, बंदर, मोर, मोरनी, मुर्गी कोई भी बन सकता है सर्कस का सूत्रधार।<br /><br />दर्शक भी यही मानता है कि सूत्रधार ही 'सबसे बड़ा खिलाड़ी' है। सूत्रधार सारी कलाएं जानता है। वह बहुत हुनरमंद माना जाता है। वह सर्कस की पहचान होता है। इसीलिए ध्यान रखा जाता है कि उसकी शक्ल-ओ-सूरत अच्छी हो। अगर कोई कलाकार खूबसूरत नहीं होता। टेलेंटेड नहीं होता। इसके बावजूद चीफ उसे सूत्रधार बनाना चाहता है, तो उसे लीप-पोतकर दर्शकों के सामने पेश किया जाता है। रिंग के बीचों-बीच खड़े ऎसे सूत्रधार के चेहरे पर जब चारों तरफ से तेज रोशनी पड़ती है तो वह बेहद खूबसूरत नजर आता है। आती है। दर्शक धोखा खा जाते हैं। यही सर्कस है।<br /><a href="http://4.bp.blogspot.com/_ekflEAbWemw/SbvfIte4mmI/AAAAAAAAAtU/HlQLPZQrp3A/s1600-h/Cartoon_compere.jpg"><img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5313085526154713698" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 244px; CURSOR: hand; HEIGHT: 235px" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_ekflEAbWemw/SbvfIte4mmI/AAAAAAAAAtU/HlQLPZQrp3A/s400/Cartoon_compere.jpg" border="0" /></a>सूत्रधार के पद पर आमतौर पर लोमड़ियों, बिल्लियों, मोरनियों और मुर्गियों को वरीयता दी जाती है। बंदरियों के भाग्य से भी कभी-कभी छींका टूट जाता है। कभी-कभार कबूतरियों को भी मौका मिल जाता है। शायद इसलिए क्योंकि वो खूबसूरत होती हैं। स्मार्ट होती हैं। चतुर होती हैं। चपल होती हैं। आजकल के नए-नए सूत्रधारों के लिए तो दिमाग की भी जरूरत नहीं होती। कला की भी जरूरत नहीं होती। बस लीप-पोतकर रिंग में खड़ा कर दिया जाता है। कह दिया जाता है, दिखाओ खेल। नतीजा यह होता है कि ऎसे सूत्रधार रिंग पर खड़े होकर जो मन में आता है वही करते हैं। ऊट-पटांग हरकतें करते हैं। बकबक करते हैं। दर्शक सोचते हैं यही कला है। यही सर्कस है। दर्शकों को धोखा देना बहुत आसान है। ऎसा सर्कस में हर कोई मानता है। कलाकार से लेकर सूत्रधार औऱ चीफ रिंग मास्टर तक सभी।<br /><br />सूत्रधार के बाद कबूतरों की पूछ सबसे ज्यादा है। कबूतरों में भी कबूतरी की पूछ ज्यादा है। ये कबूतर और कबूतरी दिन भर इधर-उधर उड़ते रहते हैं। नई-नई कलाएं ईजाद करने में लगे रहते हैं। नई-नई कलाएं खोजने में लगे रहते हैं। इनकी सूंघने की शक्ति बहुत तेज होती है। जहां कोई नए खेल की गुंजाइश होती है। फौरन पहुंच जाते हैं। सूंघते-सूंघते। अगर कोई नए खेल का आयडिया मिल गया तो इन कबूतरों के चेहरे पर चमक आ जाती है।<br /><br />वैसे ज्यादातर कलाकार सर्कस में कबूतर या फिर सूत्रधार बनने की तमन्ना लेकर ही आते हैं। खासकर सर्कस में काम करने वाले बिल्ली, लोमड़ी, मोरनी, मुर्गी और कबूतरी जैसे कलाकार तो खुद को जन्मजात सूत्रधार समझते हैं। लेकिन सूत्रधार और कबूतर बन पाना आसान नहीं है। खुशनसीब होते हैं वह जो सूत्रधार बनते हैं। कबूतर बनते हैं। कबूतरी बनते हैं। यह गली है स्टार बनने की। जो आगे जरूर मुड़ती है। यह गली है जल्दी चमकने की। छा जाने की। कलाकार बनने में खास फायदा नहीं। स्टार बनने में फायदा है। यही सर्कस है। यही सच है। <strong>(जारी...)</strong><div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8343209256361202787-1956042036579332887?l=rex-aashiyana.blogspot.com'/></div>रवीन्द्र रंजनhttp://www.blogger.com/profile/09390660446989029892ravindraranjan@hotmail.com7tag:blogger.com,1999:blog-8343209256361202787.post-48772068555054953672009-03-11T04:23:00.000-07:002009-06-14T15:51:29.325-07:00द ग्रेट सर्कस आफ न्यूजरूम-4<strong>सर्कस की पिछली कड़ियां पढ़ें- </strong><a href="http://rex-aashiyana.blogspot.com/2009/03/blog-post.html"><strong>एक</strong></a><strong> </strong><a href="http://rex-aashiyana.blogspot.com/2009/03/2.html"><strong>दो</strong></a><strong> </strong><a href="http://rex-aashiyana.blogspot.com/2009/03/3.html"><strong>तीन</strong></a><strong> </strong><br /><strong>____________________________</strong><br /><br />सर्कस के इस खेल में कभी-कभी चीफ रिंग मास्टर को भी अपना हुनर दिखाने का शौक चढ़ता है। तब वह चीफ रिंग मास्टर नहीं रहता। कलाकार बन जाता है। चीफ को अपनी कला दिखाने में कोई परेशानी ना आए इसलिए सारे छोटे-मोटे कलाकार से लेकर जूनियर-सीनियर रिंग मास्टर तक एक पैर पर खड़े हो जाते हैं। स्मार्ट कलाकार हमेशा की तरह इधर-उधर भागते नजर आने लगते हैं। छोटे-मोटे कलाकारों पर चीखने-चिल्लाने लगते हैं। यही उनकी कला है। यही उनका हुनर है।<br />चीफ रिंग मास्टर की कला हमेशा खास होती है। जब भी वह रिंग पर उतरता है उसे खूब वाहवाही मिलती है। चूहे से लेकर लोमड़ी, भालू, गीदड़, सियार सभी उसकी वाहवाही में लग जाते हैं। चारों तरफ सिर्फ और सिर्फ वाह-वाह ही सुनने को मिलता है। किसी की क्या मजाल कि चीफ की कला में कोई मीन-मेख निकालने की गुस्ताखी कर दे। चीफ तो आखिर चीफ है। वैसे चीफ जब अपना हुनर दिखाता है तो यह मौका सर्कस के किसी खास आयोजन से कम नहीं होता। चीफ का खेल दमदार होता है। मजेदार होता है।<br /><br /><a href="http://4.bp.blogspot.com/_ekflEAbWemw/Sbefu6gLk9I/AAAAAAAAAsQ/9FKKUM9inaI/s1600-h/ringmaster.jpg"><img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5311889913833821138" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 170px; CURSOR: hand; HEIGHT: 200px" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_ekflEAbWemw/Sbefu6gLk9I/AAAAAAAAAsQ/9FKKUM9inaI/s200/ringmaster.jpg" border="0" /></a>इसमें दो राय नहीं कि चीफ रिंग मास्टर बहुत अनुभवी और अक्लमंद है। वह जानता है कि सारे कलाकार उसकी चमचागिरी कर रहे हैं। इसीलिए वह जानबूझकर कई बार अपने ही हुनर में कई खामियां निकाल देता है। इसके बावजूद सब कलाकार एक सुर में यही दोहराते हैं कि वाह चीफ साहब, आपने तो कमाल ही कर दिया। इससे पहले किसी भी सर्कस के कलाकार ने ऎसी कला नहीं दिखाई। आप तो छा गए। चीफ जब अपना हुनर दिखाता है तो सबके हुनर, सबके आइटम, सबके खेल फीके पड़ जाते हैं। चीफ का हुनर वाकई खास होता है। तभी तो वह चीफ है। बाकी सब उसकी नकल करते ही नजर आते हैं। कुछ कामयाब होते हैं। कुछ मुंह की खाते हैं। फिर भी लगे रहते हैं। भिड़े रहते हैं। कुछ भी हो चीफ रिंग मास्टर बन कर ही दम लेंगे।<br />चीफ रिंग मास्टर से सब बहुत डरते हैं। जब उसे गुस्सा आता है तो अच्छे-अच्छों की बोलती बंद हो जाती है। चूहे-सियार-गीदड़-बंदर जैसे कलाकार तो कोने में दुबक जाते हैं। बिल वाले चूहे बिल में घुस जाते हैं। स्लम वाले चूहे कबाड़ के बीच खुद को छिपा लेते हैं। कुछ तितर-बितर हो जाते हैं। कुछ स्मार्ट टाइप के कलाकार या तो रिंग के आसपास तेजी से दौड़ने-भागने और चीखने चिल्लाने लगते हैं या फिर वहां से गायब हो जाते हैं। बिल्लियां, लोमड़ियां, मोरनियां, मुर्गियां और बंदरियां तो आसपास भी नजर नहीं आतीं।<br />चीफ रिंग मास्टर भी यह देखकर खुश होता है कि सब उससे कितना डरते हैं। खौफ खाते हैं। यह खौफ कायम रहना जरूरी भी है। वर्ना चूहे भी खुद को चीफ समझने में देर नहीं लगाते। जूनियर रिंग मास्टरों और चूहों को चीफ की तरह पेश आने का बहुत शौक होता है। बहुत हसरत होती है कि लोग उससे भी चीफ की तरह खौफ खाएं। उसकी भी चमचागिरी करें। लेकिन चीफ का खौफ उनकी हसरतों पर लगाम लगाए रहता है। वह चाहकर भी चीफ रिंग मास्टर की तरह नहीं बन पाते। उसकी गैर मौजूदगी में भी। सच तो यह है कि चीफ सर्कस में मौजूद हो या न हो। सर्कस की हवा में उसका खौफ हर वक्त तारी रहता है। यही तो चीफ का जलवा है। यही सर्कस है।<br />चीफ बनना भी आसान नहीं है। बहुत तरह के पापड़ बेलने पड़ते हैं। चीफ बनने के बाद मुश्किलें और बढ़ जाती हैं। इतने सारे कलाकारों को कंट्रोल में रखना होता है। सही कलाकार की पहचान करनी होती है। कई बार धोखा भी हो जाता है। जिस कलाकार को चीफ दूसरे सर्कस से मोटी तहख्वाह देकर लाता है, वही किसी काम का नहीं निकलता। कलाकार अच्छा हो तो चीफ को वाहवाही मिलती है। चीफ भी दूसरे सर्कस वालों के सामने ऎंठा रहता है कि उसके पास बहुत अच्छे कलाकार हैं। कलाकार दोयम दर्जे का हो तो भी चीफ ही जिम्मेदार होता है। इसलिए हर कलाकार के लिए जरूरी है कि पहले हुनरमंद बने उसके बाद तो वह रिंग में कुंलाचे भरते-भरते एक न एक दिन चीफ की कुर्सी तक पहुंच ही जाएगा। आमीन। <strong>(जारी...)</strong><div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8343209256361202787-4877206855505495367?l=rex-aashiyana.blogspot.com'/></div>रवीन्द्र रंजनhttp://www.blogger.com/profile/09390660446989029892ravindraranjan@hotmail.com6tag:blogger.com,1999:blog-8343209256361202787.post-9739354345147287002009-03-09T08:15:00.001-07:002009-06-14T15:52:04.096-07:00द ग्रेट सर्कस आफ न्यूजरूम-3<strong>सर्कस की पिछली कड़ियां पढ़ें- </strong><a href="http://rex-aashiyana.blogspot.com/2009/03/blog-post.html"><strong>एक</strong></a><strong> </strong><a href="http://rex-aashiyana.blogspot.com/2009/03/2.html"><strong>दो</strong></a><strong> </strong><br /><strong>_________________________</strong><br /><br />इस सर्कस में चूहों की तादाद सबसे ज्यादा है। बिल्लियों, लोमड़ियों मोरनी और मुर्गियों की तादाद भी ठीक-ठाक है। लेकिन चूहों का कोई जवाब नहीं। तरह-तरह की कलाओं के साथ-साथ चूहों को चमचागिरी में भी महारत हासिल है। लोमड़ियों, बिल्लियों, मोरनी और मुर्गियों को थोड़ा अलग तरह का हुनर दिखाना पड़ता है। उनके हुनर की सर्कस में काफी पूछ है। उनके बारें में विस्तार से चर्चा फिर कभी करेंगे। फिलहाल बात चूहों पर ही केंद्रित रखते हैं।<br /><br />चूहे हर तरह का खेल दिखाने में माहिर हैं। बस उन्हें जूनियर या सीनियर रिंग मास्टर के आदेश का इंतजार रहता है। हलांकि इन चूहों को एक सीमित दायरे में ही हुनर दिखाने का मौका मिलता है। यह चूहे दिन-रात यहां से वहां भागते रहते हैं। जूनियर औऱ सीनियर रिंग मास्टर का आदेश बजाते रहते हैं। बिना किसी उफ के। उफ करने का हक इन्हें नहीं है। वर्ना बाहर का रास्ता भी देखना पड़ सकता है। चूहों की सर्कस के बाजार में कोई कमी नहीं है। थोक के भाव मिलते हैं। गधे की तरह काम करते हैं। चूहे हैं औऱ हकीकत में भी चूहे बनकर ही रहते हैं। कला दिखाने का सबसे ज्यादा मौका इन चूहों को ही मिलता है। लेकिन मुश्किल यह है कि इनकी कला देखने की फुर्सत किसी को नहीं होती। कई कलाकार ऎसे हैं जो रोज काम पर आते हैं। चुपचाप अपना हुनर दिखाते हैं और अपने पिंजरे में चले जाते हैं। ऎसे कलाकारों को कोई नोटिस नहीं करता। यह कलाकार 'स्मार्ट कलाकार' की गिनती में नहीं आते।<br /><br />चूहे दुबले-पतले हैं। जो दुबले हैं वह और दुबले होते जाते हैं। यही इन चूहों की नियति है। इक्का-दुक्का चूहे मोटे भी हैं। जो मोटे हैं वह और मोटे होते जाते हैं। यही सर्कस की हकीकत है। इसके बावजूद चूहे उम्मीद नहीं छोड़ते। जी-जान से अपनी कला दिखाने में जुटे रहते हैं। इस उम्मीद में कि वह भी एक दिन मोटे होंगे। वह भी एक दिन चीफ रिंग मास्टर बनेंगे। सीनियर रिंग मास्टर बनेंगे। जैसे हर छिपकली का बच्चा यह सोचता है कि वह बड़ा होकर डॉयनासोर बनेगा।<br /><br /><a href="http://4.bp.blogspot.com/_ekflEAbWemw/SbU1DGr0eeI/AAAAAAAAArk/YZRNk7sWBEE/s1600-h/cat-and-rat-poster.jpg"><img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5311209663003654626" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 320px; CURSOR: hand; HEIGHT: 234px" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_ekflEAbWemw/SbU1DGr0eeI/AAAAAAAAArk/YZRNk7sWBEE/s320/cat-and-rat-poster.jpg" border="0" /></a>सर्कस है तो उम्मीदे हैं। किसी को चीफ रिंग मास्टर बन जाने की उम्मीद है। किसी को वाहवाही पाने औऱ सर्कस की दुनिया में छा जाने की उम्मीद है। तो किसी कलाकार को रातोंरात स्टार बन जाने की उम्मीद है। उम्मीद पर सर्कस कायम है। लेकिन हकीकत यही है कि स्टार वही बनता है जिस पर चीफ रिंग मास्टर की कृपा दृष्टि होती है। इसीलिए दिन-रात बहुत से कलाकार चीफ रिंग मास्टर के आसपास मंडराते रहते हैं। लाइन लगाए रहते हैं। शायद उनकी कृपा हो जाए। सर्कस के बाजार में उनकी भी गाड़ी चल निकले। कई कलाकार बेहद ढीठ होते हैं। दुत्कारने पर भी कोई फर्क नहीं पड़ता। अपनी कलाएं दिखाने में जुटे रहते हैं। इस उम्मीद में कि एक ना एक दिन चीफ की नजर उन पर पड़ेगी ही। एक न एक दिन चीफ की कृपा जरूर होगी। एक न एक दिन उनके भी दिन फिरेंगे। वह भी स्टार बनकर चमकेंगे। तब सर्कस के सारे कलाकार उन्हें हसरत भरी निगाहों से देखेंगे। तब वह बड़ी ही स्टाइल से पूरे रिंग में घूमेंगे। सीना तानकर। रिंग मास्टर की तरह।<br /><br />चूहों की भी कई श्रेणियां हैं। वीआईपी चूहे। वीवीआईपी चूहे। बिल वाले चूहे। स्लम वाले चूहे। वीआईपी और वीवीआईपी चूहों को रिंग में ही कला दिखाने का अवसर मिलता है। कोशिश की जाती है कि इन चूहों का शो ज्यादा से ज्यादा दर्शक देखें। वीवीआईपी चूहे की ज्यादा वैल्यू होती है। उसको खास समय पर कला दिखाने का अवसर दिया जाता है। इस वक्त में ज्यादा से ज्यादा दर्शक सर्कस देखते हैं। वीवीआईपी चूहों का टशन भी किसी जूनियर रिंग मास्टर से कम नहीं होता। कई बार तो यह चूहे खुद को चीफ रिंग मास्टर भी समझने लगते हैं। इन वीवीआईपी चूहों की सुविधाओं का भी खयाल रखा जाता है। ऎसे चूहों पर चीफ रिंग मास्टर की भी काफी कृपा होती है। वैसे चीफ रिंग मास्टर की कृपा के बिना कुछ नहीं होता। सर्कस का एक शो भी नहीं चलता।<br /><br />बिल वाले चूहे और स्लम वाले चूहे भी किसी से कम नहीं। यह सच है। सर्कस के स्लम में रहने वाला चूहा भी योग्यता में किसी से कम नहीं होता। इसके बावजूद जूनियर औऱ सीनियर रिंग मास्टर उसे हर वक्त उसके छोटेपन का एहसास दिलाने की कोशिश करते रहते हैं। यह जताते रहते हैं कि सर्कस के खेल में उनकी अहमियत जर्रे के बराबर भी नहीं है। इसके बावजूद बिल में और स्लम में रहकर कला दिखाने वाले चूहे अपनी कला से कोई समझौता नहीं करते। स्लम में रहने वाला हर चूह यह सोचता है कि वह भी एक दिन स्लमडॉग बनेगा। सर्कस का ऑस्कर जीतेगा। सर्कस की दुनिया में छा जाएगा। लेकिन उनकी काबिलियत को कोई नहीं पहचानता। पहचानता भी है तो स्वीकार नहीं करता। उनकी योग्यता याद भी आती है तो तब जब सर्कस की दुनिया के ये दलित चूहे किसी दूसरे सर्कस में पहुंच जाते हैं। कई तो रिंग मास्टर तक बन जाते हैं। इसमें अचरज कुछ भी नहीं है।<br /><br />यह चूहे ही भविष्य के रिंग मास्टर हैं। इन्हीं चूहों पर सर्कस टिका है। यही चूहे सर्कस का भविष्य हैं। इसलिए इन चूहों को हल्के में लेने की गुस्ताखी खतरनाक हो सकती है। वह इसलिए क्योंकि यह सर्कस एक खेल है। इस खेल में कौन चूहा कब चीफ रिंग मास्टर बन जाए कोई नहीं जानता। इस सर्कस में चूहे को शेर बनने में देर नहीं लगती। इसलिए बेहतर यही होगा कि हर कलाकार चुपचाप अपना खेल अपना हुनर दिखाता रहे औऱ ओढ़े रहे खामोशी की चादर। इसी में उसका भला है। इसी में शायद सर्कस का भी भला है। <strong>(जारी...)</strong><div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8343209256361202787-973935434514728700?l=rex-aashiyana.blogspot.com'/></div>रवीन्द्र रंजनhttp://www.blogger.com/profile/09390660446989029892ravindraranjan@hotmail.com5tag:blogger.com,1999:blog-8343209256361202787.post-33546962208845310142009-03-02T06:02:00.000-08:002009-03-14T06:28:43.150-07:00द ग्रेट सर्कस आफ न्यूजरूम-2यह नए जमाने का सर्कस है। फटे-पुराने और पैबंद लगाए गये टेंट में नहीं चलता। मल्टी स्टोरी बिल्डिंग में चलता है। बिल्डिंग भी बहुत शानदार है। जितनी खूबसूरत बाहर से है उससे भी ज्यादा चमकदार अंदर से है। रात भर रोशनी से जगमगाती रहती है इस सर्कस की बिल्डिंग। हर वक्त चमचमाने और जगमागाने वाली इस बिल्डिंग से कुछ भी छिपा नहीं है। रोशनी से नहाई रहने वाली यह बिल्डिंग ये भी जानती है कि किस कलाकार की जिंदगी में कितना अंधेरा है। वह यह भी समझती है कि कौन सा कलाकार वाकई में कितना हुनरमंद है। किसके हुनर में कितनी गहराई है। लेकिन बिल्डिंग बोल नहीं सकती। इसलिए खामोशी से सब कुछ देखती रहती है। लोमड़ी की चतुराई। सियार की धूर्तता। गीदड़ की शेरगिरी। चूहे की चमचागिरी। सर्कस की बिल्डिंग सब जानती है। सबकी असलियत से वाकिफ है सर्कस की बिल्डिंग। कौन सा कलाकार किस हुनर के बूते कहां पहुंचा, उसे सब कुछ पता है।<br /><br />सर्कस का शो भी दिनभर-रातभर चलता रहता है। 24 घंटे। कई फ्लोर हैं जहां कलाकार अपना हुनर दिखाने में चौबीस घंटे जुटे रहते हैं। कुछ वाकई में बहुत व्यस्त होते हैं और कुछ व्यस्त होने का दिखावा करते रहते हैं। उन्हें देखकर हर बार यही लगता है, गोया वह कोई बहुत बड़ी कला का आविष्कार करने वाले हैं, जिसे देखते ही सर्कस के दर्शक वाह-वाह कर उठेंगे। <br /><a href="http://1.bp.blogspot.com/_ekflEAbWemw/SavnflCF98I/AAAAAAAAAq4/8OPhIFJO37g/s1600-h/ringmaster.gif"><img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 289px; height: 264px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_ekflEAbWemw/SavnflCF98I/AAAAAAAAAq4/8OPhIFJO37g/s320/ringmaster.gif" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5308591115489114050" /></a>वैसे इस सर्कस में हर कलाकार को लगता है कि उसने वाह-वाह करने वाला हुनर ही दिखाया है। कई कलाकार ऎसे हैं जिन्हें हर वक्त वाहवाही की दरकार होती है लेकिन वाहवाही मिलती नहीं। कई ऎसे हैं कि अपनी कला का प्रदर्शन करने के बाद खुद ही पूरे रिंग में वाह-वाह करते घूमते हैं। कई ऎसे भी हैं जो सिर्फ वाहवाही के लिए ही अपना हुनर दिखाते हैं। कुछ कलाकार तो इतने ज्यादा स्मार्ट हैं कि दूसरे की कला को अपनी बताकर वाहवाही लूट लेते हैं। चीफ रिंग मास्टर भी ऎसे स्मार्ट कलाकारों से बहुत खुश रहता है। यह सोचकर कि उसके सर्कस में बहुत अच्छे कलाकार हैं। पता नहीं वह उनकी 'असलियत' से वाकिफ रहता भी है या नहीं? <br /><br />सच तो यह है कि कोई भी रिंग मास्टर इन कलाकारों की तारीफ करना नहीं चाहता। चीफ रिंग मास्टर तो बिल्कुल भी नहीं। यह उसकी पेशागत मजबूरी भी है। अगर किसी कलाकार की ज्यादा तारीफ कर दी तो वह खुद को बड़ा तीसमार खां समझने लगेगा। उसका कॉन्फीडेंस पूरे रिंग में हिरन की तरह कुलांचे भरने लगेगा। भले ही वह गधा ही क्यों न हो। ज्यादा तारीफ से उसे खुद के हिरन होने की 'खुशफहमी' हो सकती है। सर्कस में खुशफहमी का खतरा हमेशा बना रहता है। डर तो इस बात का भी रहता है कि खुशफहमी का मारा वह कलाकार रिंग में कुलांचे भरते-भरते कहीं 'दूसरे' सर्कस तक न पहुंच जाए। इसलिए हर कलाकार को उसकी औकात में रखना जरूरी होता है। यह बात जूनियर औऱ सीनियर सभी लेवल के रिंग मास्टर को भी अच्छी तरह पता है। ऎसा इसलिए भी है क्योंकि ऎसे हुनरमंद और होनहार कलाकारों की दरकार हर सर्कस को रहती है। इनके लिए छोटे-बड़े सभी सर्कस में पोस्ट हमेशा खाली रहती है। नहीं होती तो हो जाती है। या फिर नई पोस्ट बना ली जाती है। जैसे डिप्टी रिंग मास्टर। डिप्टी उप रिंग मास्टर। वरिष्ठ कलाकार। सहायक वरिष्ठ रिंग मास्टर। आदि-आदि। <br /><br />अब तो सर्कस का बिजनेस भी अच्छा चल रहा है। कई सर्कस शुरू हो गए हैं। कई शुरू होने वाले हैं। मंदी ने कई सर्कस के मालिकों की योजनाएं गड़बड़ जरूर कर दी हैं। लेकिन मौका मिलते ही अभी कई नए-नए सर्कस शुरू होंगे। वह नए-नए खेल दिखाएंगे। पुराने कलाकारों को चुनौती देंगे। नई-नई कलाएं औऱ नए-नए हुनर ईजाद करेंगे। हो सकता है आने वाले वक्त में सर्कस की रंगत ही बदल जाए। इसलिए सर्कस का स्मार्ट कलाकार बनना बड़ा फायदेमंद है। सभी कलाकार यह बात जितनी जल्दी समझ लें उनके लिए उतना ही अच्छा। <strong>(जारी...)</strong><div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8343209256361202787-3354696220884531014?l=rex-aashiyana.blogspot.com'/></div>रवीन्द्र रंजनhttp://www.blogger.com/profile/09390660446989029892ravindraranjan@hotmail.com6tag:blogger.com,1999:blog-8343209256361202787.post-41121491227971789002009-03-01T06:36:00.000-08:002009-03-14T06:29:21.976-07:00द ग्रेट सर्कस आफ न्यूजरूम-1आज कमेंटरी का मूड है। मैं कमेटरी करूंगा एक सर्कस की। यह एक ऎसा सर्कस है जिसका शो रोज होता है। 24 घंटे चलता है यह सर्कस। यहां भी एक रिंग है। रिंग के अंदर कई कलाकार हैं। चीफ रिंग मास्टर भी है। चीफ रिंग मास्टर अच्छा आदमी है। लेकिन कभी-कभी उसे भी गुस्सा आ जाता है। उसे सर्कस का पुराना अनुभव है। उसे सर्कस का हर खेल अच्छी तरह आता है। वह बहुत समय से खेल रहा है। लेकिन अब वह वरिष्ठ हो चुका है। अब वह खेलता नहीं, खिलाता है। रिंग मे हंटर फटकारता है। अच्छे-अच्छों को काबू में रखता है। टेढ़ों को सीधा रखता है। <br /><br /><a href="http://4.bp.blogspot.com/_ekflEAbWemw/Saqfh2xAXnI/AAAAAAAAAqw/nZ3UD_rYrZc/s1600-h/newsroom.jpg"><img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 200px; height: 134px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_ekflEAbWemw/Saqfh2xAXnI/AAAAAAAAAqw/nZ3UD_rYrZc/s200/newsroom.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5308230514795110002" /></a>सर्कस के इस रिंग में अपने फन का कमाल दिखाने वाले कलाकार तो एक से बढ़कर एक हैं। हर कोई कई-कई फन में माहिर है। हर किसी के भीतर से उसकी योग्यता बाहर निकलने को बेताब रहती है। बस चले तो हर कलाकार की योग्यता बाहर निकलकर पूरे रिंग में कुलांचे भरने लगे। लेकिन ऎसा मौका कम ही आता है। जूनियर रिंग मास्टर सबको काबू में रखता है। <br />कोई सर्कस के इस खेल में अकेला नहीं है। सीनियर रिंग मास्टर भी कई हैं। सीनियर रिंग मास्टर के पीछे भी कई लोग हैं जो खुद को सीनियर रिंग मास्टर से कम नहीं समझते। कुछ तो ऎसे हैं जो सिर्फ मौके की फिराक में हैं। मौका मिलते ही धकियाकर चीफ रिंग मास्टर की कुर्सी तक कब्जा लेंगे। देखते हैं उन्हें कब मौका मिलता है।<br />सर्कस का यह खेल ऎसा है कि हर कोई अपनी कुर्सी बचाने की फिराक में लगा रहता है। जूनियर और सीनियर रिंग मास्टर के ऊपर भी कई मास्टर हैं। अभी-कभी चीफ मास्टर को भी गुस्सा आ जाता है। वह सीनियर औऱ जूनियर रिंग मास्टर पर अपना हंटर फटकारने लगते हैं। तब उन रिंग मास्टर को भी गुस्सा आता है और वह अपना गुस्सा बेचारे कलाकारों पर उतारता है। <br />इस सर्कस में चूहा, लोमड़ी, गीदड़, शेर, भालू, बंदर, बिल्ली, चीता सभी शरीक हैं। सियार तो सबसे ज्यादा हैं। उनमें से ज्यादातर रंगे हुए सियार हैं।<br />सबकी अपनी-अपनी अहमियत है। सबकी अपनी-अपनी खासियत है। लेकिन एक बात सबमें समान है। हेड रिंग मास्टर से सब खौफ खाते हैं। जैसे ही सर्कस में उसका रोल शुरू होता है। चूहा-बिल्ली जैसे छोटे-मोटे कलाकार तो कोने में दुबक जाते हैं औऱ कई <a href="http://rex-aashiyana.blogspot.com/2008/12/blog-post.html">कलाकार</a> ऎसे हैं, जो ऊल-जलूल हरकतें करके यह जताने लगते है कि उन्होंने एक नया फन सीखा है। नई कला ईजाद की है। लिहाजा वह बड़े अहम हैं। वह बड़े बिजी हैं। सर्कस के लिए वह बहुत अहम हैं। ऎसे कलाकार कई बार चीफ रिंग मास्टर को धोखा देने में कामयाब भी हो जाते हैं। आखिर कलाकार जो हैं। कला का जादू तो चलाएंगे ही। उनकी कला के लिए ही तो सर्कस का मालिक उन्हें पैसे देता है। मोटी तरख्वाह देता है। <strong> (जारी...) </strong><div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8343209256361202787-4112149122797178900?l=rex-aashiyana.blogspot.com'/></div>रवीन्द्र रंजनhttp://www.blogger.com/profile/09390660446989029892ravindraranjan@hotmail.com3tag:blogger.com,1999:blog-8343209256361202787.post-19276058725473750162009-02-28T06:18:00.000-08:002009-02-28T06:30:40.626-08:00कुत्ता कहीं का...2009 कब का आ चुका है। दो महीने गुजर भी चुके हैं। अचानक याद आया कि इस साल अभी तक हमने कुछ लिखा ही नहीं। सोच रहा हूं कहीं लिक्खाड़ लोग मुझे बिरादरी से बाहर न कर दें। इसीलिए कुछ तो लिख ही डालता हूं। नए साल के दो महीने गुजर चुके हैं। सब ठीक ही चल रहा है। मंदी अब भी बरकरार है। एक नई बात हुई मेरी कॉलोनी की ऊबड़-खाबड़ सड़क बन गई है। पता नहीं क्यों बन गई। अभी तो चुनाव भी दूर है। सड़क के किनारे गंदी सी जमीन को खोदकर जो नींव डाली गई थी वहां अब ऊंची इमारत खड़ी हो गई है। इतनी ऊंची कि सिर उठाकर देखने पर गर्दन दर्द करने लगती है। <br /><a href="http://1.bp.blogspot.com/_ekflEAbWemw/SalIx8IeaEI/AAAAAAAAAqg/uO6wC0l9jD0/s1600-h/dogbarking.jpg"><img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 250px; height: 230px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_ekflEAbWemw/SalIx8IeaEI/AAAAAAAAAqg/uO6wC0l9jD0/s320/dogbarking.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5307853658625304642" /></a>मेरी गली का कुत्ता अब भी आदमियों पर भोंकता है। वह नहीं बदलेगा। कुत्ता कहीं का। बिल्लियां अब कम ही नजर आती हैं। कौवे और तोते भी नजर नहीं आते। कभी कभार कबूतर दिख जाते हैं लेकिन वह भी अब गुटुर-गुटुर की बजाय डरावनी आवाज निकालते हैं। पता नहीं क्यों? शायद नाराज हैं हम सबसे। हमने ही तो छीना है परिंदों का आशियाना। गेट का चौकीदार अब भी चार हजार महीने में खर्च चलाता है। मंदी न होती तो भी उसका खर्च इतने से ही चलता। <br />पड़ोसी ने कार ले ली है बड़ी वाली। ख्वाहिशें भी अजीब चीज हैं। छोटे घर में रहता हूं तो बड़ा घर लेने की तमन्ना है। जो छोटी गाड़ी मे चलता है उसे बड़ी गाड़ी की हसरत है। जो 10 हजार की नौकरी करता है उसे 20 हजार की हसरत है। फिलहाल तो मंदी ने सबकी हसरतों पर विराम लगा रखा है। लोगों ने सपने देखने भी कम कर दिए हैं। बंद नहीं किए। करना भी नहीं चाहिए। सपने देखेंगे नहीं तो सच कैसे होंगे। कई दोस्तों ने नौकरी बदल ली है। मेरे आफिस के पास घूमने वाला कुत्ता अब मोटा हो गया है। उसने अपना परिवार भी बढ़ा लिया है। शायद उसे पता नहीं कि मंदी चल रही है। कुत्ता कहीं का। <br />प्रेस वाले ने रेट बढ़ा दिए हैं। सोसायटी के टेक्नीशियन ने भी अपना चार्ज बढ़ा दिया है। शुक्र है सोसायटी वालों ने अपना चार्ज नहीं बढ़ाया। शायद उन्हें पता है कि मंदी का मौसम है। मैं बहुत मंदी-मंदी रट रहा हूं ना? क्या करूं मंदी का ही तो जमाना है। मंदी कई लोगों के लिए तो बड़ी काम की चीज है। कई लोगों ने इसी का सहारा लेकर अपने दुश्मनों का सफाया करवा दिया। जिससे डर था कुर्सी छिनने का उसी को नौकरी से निकलवा दिया। <br />एक बात बड़ी अच्छी हुई कई चीजें सस्ती हो गईं। अभी एक दिन कोई न्यूज चैनल ढिंढोरा पीट रहा था कि अब सब कुछ सस्ता हो गया। जो चाहे ले आओ। ऎसे बता रहा था जैसे लूट मच गई हो। आओ-आओ लूट लो। अभी तो दो महीने ही गुजरे हैं। अभी तो बहुत कुछ बाकी है। अरे हां, आज वह गली का कुत्ता फिर मिल गया था। लौटते वक्त। भोंकने लगा। पता नहीं उसे क्या परेशानी है? शायद उसे यह भी नहीं पता कि महंगाई कम हो गई है। वर्ना भोंकने में वक्त क्यों बर्बाद करता। वह भी कहीं जाकर सस्ता माल लूट रहा होता। पता नहीं कब स्मार्टनेस आएगी इसमें। कब सीखेगा। कुत्ता कहीं का।<div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8343209256361202787-1927605872547375016?l=rex-aashiyana.blogspot.com'/></div>रवीन्द्र रंजनhttp://www.blogger.com/profile/09390660446989029892ravindraranjan@hotmail.com1tag:blogger.com,1999:blog-8343209256361202787.post-47164115650940181512008-12-24T05:31:00.000-08:002009-01-11T13:58:05.651-08:00गधे का गुस्सा<a href="http://rex-aashiyana.blogspot.com/2007/07/1993.html">बचपन</a> में एक अखबार में पढ़ी थी यह बाल कविता। कविता लंबी थी और अच्छी भी। लेखक का नाम तो नहीं याद लेकिन उसकी कुछ पंक्तियां मुझे अब भी याद हैं। आपसे यह सुंदर कविता इसलिए बांट रहा हूं कि अगर किसी को लेखक का नाम पता हो तो जरूर बताएं साथ ही पूरी कविता मिल जाए तो और भी अच्छा। तो पढ़िये यह कविता। <br /><br />एक <a href="http://rex-aashiyana.blogspot.com/2008/05/blog-post_06.html">गधा</a> चुपचाप खड़ा था<br />एक पेड़ के नीचे<br />पड़ गए कुछ दुष्ट लड़के उसके पीछे<br />एक ने पकड़ा कान <br />दूसरे ने पीठ पर जोर जमाया <br />और तीसरे ने उस पर <br />कस कर डंडा बरसाया<br />आया गुस्सा गधे को<br />दी दुलत्ती झाड़<br />फौरन लड़के भागे <br />खाकर उसकी मार।<div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8343209256361202787-4716411565094018151?l=rex-aashiyana.blogspot.com'/></div>रवीन्द्र रंजनhttp://www.blogger.com/profile/09390660446989029892ravindraranjan@hotmail.com4tag:blogger.com,1999:blog-8343209256361202787.post-39843745725820545722008-12-02T06:20:00.001-08:002009-04-04T09:52:02.014-07:00वह न्यूज चैनल का प्रोड्यूसर हैअचानक उसकी आवाज तेज हो जाती है। वह जोर-जोर से चिल्लाने लगता है। अभी तक विजुअल क्यों नहीं आए। रिपोर्टर ने स्क्रिप्ट क्यों नहीं भेजी। कैसे खबर चलेगी। फिर अचानक वह अपनी कुर्सी से उठकर इधर-उधर भागने लगता है। <br />यह देखते ही ऑफिस में सबको पता चल जाता है कि बॉस आ चुके हैं। जब भी बॉस न्यूज रूम में प्रवेश करते हैं कमोबेश ऎसा ही होता होता है। कभी कोई विजुअल नहीं चल पाता (?) कभी कोई पैकेज रुक जाता है। ऎसा लगता है जैसे सभी समस्याओं का बॉस से कोई नजदीकी रिश्ता है। <a href="http://3.bp.blogspot.com/_ekflEAbWemw/SaqXBEpCZcI/AAAAAAAAAqo/lImDlfx5QKs/s1600-h/pdg.jpg"><img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 314px; height: 222px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_ekflEAbWemw/SaqXBEpCZcI/AAAAAAAAAqo/lImDlfx5QKs/s320/pdg.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5308221155491079618" /></a>लेकिन न्यूज रूम में सबको पता है कि ऎसा क्यों होता है। अगर चुपचाप काम होता रहेगा तो बॉस को पता कैसे चलेगा कि काम हो रहा है। इसीलिए यह तरीका बड़ा कारगर है। बॉस को भी यही लगता है कि देखो बेचारा कितना टेंशन में है। कितना काम करता है। कितना बोझ उठाता है।<a href="http://rex-aashiyana.blogspot.com/2007/08/blog-post_13.html"> प्रोड्यूसर </a>न हुआ गधा हो गया। जब देखो तब पूरे चैनल का बोझ उठाए इधर से उधर भागता रहता है। अगर वह न हो तो शायद चैनल ही बंद हो जाए। इसलिए न्यूज रूम में उसकी मौजूदगी बहुत अहम है। अगर वह न चिल्लाए तो शायद कोई खबर ही न चल पाए। अगर वह न चीखे तो शायद उस चैनल में कभी कोई खबर ही ब्रेक न हो। वाकई वह बहुत काम का आदमी है। <br /><span class="fullpost"><br />बॉस को देखते ही वह बहुत व्यस्त हो जाता है। कभी फोन पर चीखता है। कभी जूनियर्स पर चिल्लाता है। कभी सिस्टम पर गुस्सा उतारता है। वह न्यूज चैनल का प्रोड्यूसर है। एक्टिव इस कदर है कि कई बार तो उसके लिए पूरा फ्लोर छोटा पड़ जाता है। जब वह भागता है तो लगता है कोई आसमान गिरने वाला है। <a href="http://rex-aashiyana.blogspot.com/2007/08/blog-post.html">कुछ लोग </a>उससे बहुत जलते हैं। कुछ इसलिए जलते हैं क्योंकि वह उसकी तरह नहीं भाग पाते। कुछ इसलिए जलते हैं क्योंकि मजबूरन उन्हें भी इधर-उधर भागने का नाटक करना पड़ता है। लेकिन भागना हमेशा फायदेमंद है। जो भागता है उसे एक्टिव प्रोड्यूसर माना जाता है। जो चिल्लाता है वह बॉस की नजरों में चढ़ जाता है। उसके नंबर बढ़ जाते हैं। जो चुपचाप की-बोर्ड पीटता रहता है या फिर कंप्यूटर पर आंख गड़ाए रहता है, उसे ढीले-ढाले प्रोड्यूसर के खिताब से नवाजा जाता है। <br /><br />वह सब जानता है इसीलिए थोड़ी-थोड़ी देर में यहां-वहां भागता रहता है। इससे ऎसा लगता है कि चैनल भाग रहा है, दौड़ रहा है। न्यूजरूम में खामोशी से ऎसा लगता है जैसे चैनल भी खामोश हो गया है। अचानक वह चीखता है और टीवी के सामने खड़ा हो जाता है। अरे, यह देखो फलां चैनल में क्या चल रहा है। यह खबर हमारे पास क्यों नहीं आई? उसके बाद ऎसा माहौल बन जाता है कि जैसे उस खबर के बिना चैनल बंद हो जाएगा। फोन खड़खड़ाए जाने शुरू हो जाते हैं। एक आदमी इंटरनेट पर खबर को खंगालना शुरू कर देता है। तो कोई यू ट्यूब पर विजुअल के जुगाड़ में लग जाता है और कोई रिपोर्टर को गरियाने में। बाद में पता चलता है कि वह खबर तो हमारे यहां तीन दिन पहले ही चल चुकी है।<br /><br /><a href="http://rex-aashiyana.blogspot.com/2007/07/2007_13.html">महेश</a> अभी चैनल में नया-नया आया है। जब भी स्मार्ट प्रोड्यूसर इधर से उधर भागता है तो वह हर बार बस यही सोचता है कि आज तो आसमान गिर ही जाएगा। लेकिन उसे मायूसी ही हाथ लगती है। आसमान कभी नहीं गिरता। स्मार्ट प्रोड्यूसर आसमान को हर बार अपने हाथों से थाम लेता है औऱ इस तरह हर बार एक मुश्किल टल जाती है। चैनल बच जाता है। चैनल उसी के दम पर तो चलता है। जिस दिन वह भागना औऱ चिल्लाना बंद कर देगा उसी दिन चैनल बंद हो जाएगा। इसलिए जरूरी है कि वह भागता रहे औऱ चैनल बदस्तूर चलता रहे। आमीन। </span><div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8343209256361202787-3984374572582054572?l=rex-aashiyana.blogspot.com'/></div>रवीन्द्र रंजनhttp://www.blogger.com/profile/09390660446989029892ravindraranjan@hotmail.com8tag:blogger.com,1999:blog-8343209256361202787.post-15695181483285629562008-10-11T12:21:00.000-07:002008-10-13T14:29:23.205-07:00कोफ्त<em>यह पोस्ट मुझे भेजी है मेरे दोस्त <strong>राजेश निरंजन </strong>ने। राजेश को मैं कई बरस से जानता हूं। वह सामाजिक मसलों को लेकर काफी संवेदनशील हैं। पेशे से पत्रकार हैं। लिहाजा व्यवस्थागत खामियों और तेजी से हो रहे समाजिक पतन को लेकर अक्सर उनकी कोफ्त सामने आ ही जाती है। एक पत्रकार होने के नाते ऐसा होना लाजिमी भी है। यहां ज्यादा महत्वपूर्ण वह दृश्य है जिसे <strong>राजेश निरंजन </strong>सबके सामने रखना चाहते हैं। आप भी पढ़ें और अपनी राय दें। </em><br /><br />दोपहर के करीब 12 बजे का वक्त था। मैं दिल्ली मयूर विहार फेज-1 की लालबत्ती से गुजर रहा था। तभी मेरी नजर फुटपाथ पर खड़ी एक अर्धनग्न सांवली सलोनी युवती पर पड़ी। वह कुर्ते से अपने तन को ढकने की कोशिश कर रही थी। चेहरे पर बेबसी का आलम था। आसपास से गुजर रही थीं गाड़ियां और कानों से टकरा रही थीं कुछ हल्की-फुल्की टिप्पणियां।<br />वह दृश्य देख मैं कुछ विचलित-सा हुआ। मन में एकबारगी सोचा क्यों न इसे एक सलवार लाकर दे दूं। फिर दूसरा विचार उठा। चलो छोड़ो आफिस के लिए पहले ही लेट हो चुके हैं और फिर सलवार खरीदने पर पैसे खर्च होंगे सो अलग। फिर मोटरसाइकिल को अंदर की तरफ मोड़ दिया। लेकिन नजरों के सामने बार-बार उसी युवती का चेहरा घूमने लगा। <a href="http://2.bp.blogspot.com/_ekflEAbWemw/SPD9m9YIgGI/AAAAAAAAAZ8/VJGbcO36zzc/s1600-h/lady%27.jpg"><img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://2.bp.blogspot.com/_ekflEAbWemw/SPD9m9YIgGI/AAAAAAAAAZ8/VJGbcO36zzc/s400/lady%27.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5255979610894008418" /></a>तभी बाजार के सामने मोड़ पर मुझे कुछ बैनर गिरे हुए दिखे। मन में कुछ सोचा... कुछ ठिठका.. सोचा समाज क्या कहेगा, फिर मन की उलझन व शर्म को एक तरफ रख मोटरसाइकिल रोकी... मोटरसाइकिल से उतरा... इधर-उधर देखा फिर बैनर उठा कर चुपचाप मोटरसाइकिल उठाई और वापस नोएडा-अक्षरधाम रोड़ की तरफ मुड़ गया। उस युवती के पास पहुंचा तो देखा... वह फुटपाथ पर बैठकर कंकड़-पत्थर उठा- उठाकर सड़क पर फेंक रही है... मैंने चुपचाप कपड़े के बैनर उस युवती के पास फेंके और वापस मोटरसाइकिल घुमाई... देखा युवती ने बैनर उठाकर अपने सिर के ऊपर चुन्नी की तरह रखा हुआ था और सड़क को छोड़ अपने ऊपर कक्कड़-पत्थर डाल रही थी। मन में उसकी स्थिति को लेकर एक टीस लिए मैं अपने आफिस की तरफ बढ़ गया... फिर भी मन था बार-बार उसकी दुर्दशा की तरफ जा रहा था.. मन में बार-बार ये विचार उठ रहे थे... क्या मैंने उसकी आधी-अधूरी मदद करके ठीक किया। <br />आज तो वह जैसे-तैसे अपना तन ढक रही है... कल क्या होगा, जब ये कपड़े भी नहीं रहेंगे... क्या उन जैसे लोगों को कपड़े देने या साफ कहें तो कपड़े का बैनर पकड़ा देना समस्या का हल होगा... नहीं! क्या ऐसे लोगों के लिए स्थायी निवास, सुरक्षा व इलाज की जरूरत नहीं है... क्या आज हम लोग इतने स्वार्थी हो गए हैं कि ऐसे लोगों की मदद के लिए कुछ भी नहीं कर सकते.... क्या आज मुझमें और एक जानवर में कोई अंतर नहीं रह गया? जो केवल अपने बारे में ही सोचता है... । ऐसे ढेर सारे प्रश्न लेकर मैं अपने आफिस पहुंच गया। थोड़ी देर में ही काम में इतना व्यस्त हो गया कि सब कुछ भूल बैठा.. आज खुद मैं और वह सब लोग मुझे संवदेनहीन नजर आए जो उस युवती की दुर्दशा देख उसे भगवान भरोसे छोड़ आगे बढ़ गए। क्या यही समाज रह गया है हमारा...मुझे कोफ्त हो रही है इस समाज पर अपने आप पर। <br /><strong>-राजेश निरंजन</strong><div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8343209256361202787-1569518148328562956?l=rex-aashiyana.blogspot.com'/></div>रवीन्द्र रंजनhttp://www.blogger.com/profile/09390660446989029892ravindraranjan@hotmail.com10tag:blogger.com,1999:blog-8343209256361202787.post-23953327835290973842008-09-21T06:44:00.000-07:002008-09-21T06:57:46.808-07:00लिटरेचर इंडिया का लोकार्पणमौका था सॉफ़्टवेयर फ्रीडम डे और हिंदी पखवाड़े का। इस मौके पर शनिवार को लिटरेचर इंडिया की हिन्दी वेब पत्रिका ( www.literatureindia.com/hindi/)का लोकार्पण हुआ। साहत्यिक एवं सांस्कृतिक पोर्टल लिटरेचर इंडिया दो भाषाओं में हैं अंग्रेजी और अब हिंदी। खास बात यह थी कि इस वेब पत्रिका का लोकार्पण पूरी तरह से इंटरनेट पर हुआ। यह पहला ऐसा कार्यक्रम था जिसके तहत किसी पोर्टल का लोकार्पण पूरी तरह ऑनलाइन हुआ। वेब पत्रिका का लोकार्पण शनिवार शाम irc.freenode.net सर्वर पर सराय सभागार में हुआ। सराय दिल्ली की मशहूर संस्था सराय (www.sarai.net) का आईआरसी फ्रीनोड पर पंजीकृत चैट रुम है। कवि, पत्रकार एवं अऩुवादक नीलाभ ने इस पोर्टल का लोकार्पण किया। इतिहासकार एवं लेखक रविकांत ने इस अवसर पर पत्रिका के कांसेप्ट को सामने रखा। आईआरसी पर हुए इस कार्यक्रम में कई जाने-माने लोगों ने शिरकत की। संचालन व्यंग्यकार एवं तकनीकी अनुवादक रवि रतलामी ने किया। <br /><br /><a href="http://2.bp.blogspot.com/_ekflEAbWemw/SNZQFvb_JnI/AAAAAAAAAZ0/Up-kcWm4_Ig/s1600-h/Sfdlogo.jpg"><img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://2.bp.blogspot.com/_ekflEAbWemw/SNZQFvb_JnI/AAAAAAAAAZ0/Up-kcWm4_Ig/s400/Sfdlogo.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5248470475310311026" /></a> इस मौके नीलाभ ने खासतौर पर तकनीक एवं भाषा के अंतर्विरोधों को रेखांकित किया। नीलाभ ने कहा कि तकनीक के धुरंधर जहां भाषाई ज्ञान से अछूते हैं, वहीं हिन्दी के बुद्धिजीवी तकनीक से दूर भागते नजर आते हैं। उन्होंने आगे कहा कि अंग्रेजीदां लोगों को हिन्दी की उन दिक्कतों से रू-ब-रू होना होगा जो तकनीक को लेकर पैदा होती हैं। उदाहरण के तौर पर हँसना हंस से अलग है और हमें मानकीकरण की इन दिक्कतों से लड़ने की जरूरत है। नीलाभ का कहना था कि महज एक ऐतिहासिक संयोग की वजह से हम अंग्रेजी में काम करते हैं। हिन्दी किसी से पीछे नहीं है। हमें खुद ताकत हासिल करनी होगी।<br />रविकांत ने कहा कि इस पोर्टल का द्विभाषी होना अपने आप में खास बात है। अंग्रेजी में हिन्दी भाषी लोग कम लिखते हैं और अगर यह पोर्टल वह सेतु बन सके जो दोनों भाषाओं के बीच संवाद को बढ़ा सके तो काफी बेहतर होगा। जहां लोग हिन्दी की दुनिया की खबरों से वाकिफ हो सकें। उन्होंने आगे कहा कि अंग्रेजी में हिन्दी साहित्यकारों के नाम से सर्च करें तो आप काफी कम हासिल कर पाएंगे। हमें उम्मीद है कि यह पोर्टल इस कमी को पूरा कर पाएगी।<br />स्वागत वक्तव्य में लिटरेचर इंडिया की संपादिक संगीता ने कहा कि अभी पितृ-पक्ष चल रहा है, लिहाजा हम अपने साहित्य पित्तरों को लिटरेचर इंडिया तर्पण करते हैं। आखिर में शैलेश एवं अभिव्यक्ति व अनुभूति जैसी सफल वेब पत्रिका हिन्दी में चलाने वाली पूर्णिमा ने कविता पाठ किया। इस बीच प्रश्नोत्तर का भी दौर चला। इसमें सार्वजनिक रूप से कंटेंट निर्माण की ओर आगे बढ़ने की बात की गई। चैट पर यह कार्यक्रम करीब पौने दो घंटे चलता रहा। इस कार्यक्रम में करूणाकर, पूर्णिमा, गोरा, देवाशीष, मसिजीवी, संजय बेगाणी, सदन, शैलेश, उमेश चतुर्वेदी, राकेश, जितेन, अमनप्रीत, राजेश सहित कई लोग शामिल हुए।<div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8343209256361202787-2395332783529097384?l=rex-aashiyana.blogspot.com'/></div>रवीन्द्र रंजनhttp://www.blogger.com/profile/09390660446989029892ravindraranjan@hotmail.com5tag:blogger.com,1999:blog-8343209256361202787.post-53404936578418853902008-08-25T02:08:00.001-07:002008-10-13T14:29:53.628-07:00अफसोस बंटी, तुम नहीं रहे<a href="http://4.bp.blogspot.com/_ekflEAbWemw/SPO9ZM1yj6I/AAAAAAAAAaU/KOMArZzTuPU/s1600-h/Bunty,+delhi.JPG"><img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://4.bp.blogspot.com/_ekflEAbWemw/SPO9ZM1yj6I/AAAAAAAAAaU/KOMArZzTuPU/s200/Bunty,+delhi.JPG" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5256753430712717218" /></a><br /><br /><br /><br /><br /><br /><br /><br /><br /><br /><br />अफसोस बंटी<br />तुम नहीं रहे<br />आखिरकार <br />दिल्ली पुलिस ने<br />तुम्हारी जान ले ही ली<br />पता नहीं कैसे<br />इस बार <br />कामयाब हो गई पुलिस<br />वर्ना हर बार तो <br />तुम ही जीतते थे बाजी<br /><br />अफसोस बंटी<br />तुम नहीं रहे<br />अब टीवी चैनलों का क्या होगा?<br />वो किसे बताएंगे <br />बाइकर्स गैंग का सरगना<br />सड़क पर हुई <br />हर वारदात के लिए<br />किसे ठहराएंगे जिम्मेदार<br />हर राह चलते लुटेरो को<br />अब कैसे बताएंगे<br />बंटी गैंग का गुर्गा?<br />कैसे कहेंगे <br />जवाब दो दिल्ली पुलिस?<br /><br />अफसोस बंटी<br />तुम नहीं रहे<br />गोली तो तुमने भी चलाई थी?<br />फिर कोई पुलिसवाले पर क्यों नहीं लगी<br />तुम्हारा निशाना तो बहुत सटीक है<br />फिर कैसे चूक गए तुम<br />कैसे हार गए तुम<br />अब टीवी चैनल वाले <br />किसके नाम पर फैलाएंगे दहशत<br />कैसे बताएंगे कि <br />रहने लायक नहीं रही दिल्ली<br />कैसे कहेंगे<br />दिल्ली में बढ़ रहे हैं अपराध<br />कैसे कहेंगे <br />घर से बाहर मत निकलिए<br />वर्ना लुट जाएंगे<br /><br />अफसोस बंटी<br />तुम नहीं रहे<br />हमेशा याद आओगे तुम <br />खासतौर पर<br />चैनल वाले तो<br />तुम्हें भूल नहीं पाएंगे <br />जब भी कोई झपटमार पकड़ जाएगा<br />जब भी कोई लुटेरा धरा जाएगा<br />तो टीवी चैनल वालों को<br />खलेगी तुम्हारी कमी<br />वो बस यही बोलेंगे<br />काश! बंटी तुम होते<br />तो हम फौरन ये कह देते<br />खत्म नहीं हो रहा बंटी का खौफ<br />हाथ पर हाथ धरे बैठी है<br />दिल्ली पुलिस <br />कौन बचाएगा दिल्ली को<br /><br />लेकिन... <br />अब ऐसा नहीं होगा<br />अब चैनलों पर नहीं गूंजेगे<br />तुम्हारी बादशाहत के किस्से<br />अब नहीं होगी<br />तुम्हारे खौफ की बात <br />अफसोस बंटी<br />तुम नहीं रहे<br /><br />सचमुच बहुत याद आओगे बंटी...<div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8343209256361202787-5340493657841885390?l=rex-aashiyana.blogspot.com'/></div>रवीन्द्र रंजनhttp://www.blogger.com/profile/09390660446989029892ravindraranjan@hotmail.com2tag:blogger.com,1999:blog-8343209256361202787.post-90351905757734491662008-06-10T03:52:00.000-07:002008-06-26T18:35:33.482-07:00तुम्हारा नाम क्या है?<a href="http://1.bp.blogspot.com/_ekflEAbWemw/SE5eZ9NxudI/AAAAAAAAAYA/kTRfCqOZ_MI/s1600-h/350074933_8357d6e1e0.jpg"><img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://1.bp.blogspot.com/_ekflEAbWemw/SE5eZ9NxudI/AAAAAAAAAYA/kTRfCqOZ_MI/s400/350074933_8357d6e1e0.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5210205618936330706" /></a>अभी तक बस नहीं आई। लगता है आज फिर बॉस की डांट खानी पड़ेगी। ये बस भी तो रोज लेट हो जाती है। मैंने तुमसे पहले ही कहा था जल्दी करो लेकिन तुम हो कि तुम्हें सजने-संवरने से ही फुर्सत नहीं मिलती। पता नहीं कौन बैठा है वहां तुम्हारी खूबसूरती पर मर-मिटने के लिए। वो बुड्ढा खूसट बॉस...। नेहा बोले जा रही थी और प्रिया चुपचाप सुनती जा रही थी। उसे मालूम था कि यह गुस्सा लेट होने का नहीं है। यह गुस्सा बॉस की डांट खाने का भी नहीं है। वह बचपन से जानती है नेहा को। तब से जब दोनों स्कूल में साथ पढ़ती थीं। अब दोनो साथ-साथ नौकरी भी कर रही थीं।<br />शुक्र है आज सीट तो मिल गई ! <br />कहते हुए नेहा बस के दायीं वाली सीट पर बैठ गई और साथ ही बैठ गई प्रिया। नेहा की सबसे अजीज दोस्त।<br />यह रोज का किस्सा था। कभी बस लेट हो जाती तो कभी वो दोनों लेट हो जातीं। <br />दरअसल असली किस्सा तो उनके बस में सवार होने के बाद शुरू होता था। जब अगले ही स्टाप पर वह लड़का उसी बस में सवार होता था। करीब दो हफ्ते से उसने नेहा की नाक में दम कर रखा था। जब तक वह बस में चढ़ता बस पूरी तरह भर चुकी होती थी। <br />जिस सीट पर नेहा बैठी होती थी वो लड़का भी वहीं आकर खड़ा हो जाता। कई बार तो भीड़ के कारण नेहा और प्रिया को भी सीट नहीं मिल पाती तब तो उसे बर्दाश्त करना मुश्किल हो जाता था। वह जानबूझकर वहीं खड़ा होता जहां प्रिया खड़ी होती।<br />तभी नेहा को लगा शायद कोई सवाल उसके कान से टकराया। अभी वह इस हकीकत को समझने की कोशिश कर ही रही थी कि वो सवाल एक बार फिर उसके सामने था।<br />क्या नाम है आपका? उस लड़के ने नेहा से सवाल किया था। वो भी इस अंदाज में जैसे वह नेहा को बहुत पहले से जानता है।<br />नेहा आवाक रह गई। जान न पहचान बड़ा आया मेरा नाम जानने चला। वह मन ही मन बुदबुदाई।<br />मैंने पूछा क्या नाम है तुम्हारा? वह तो जैसे नेहा के पीछे ही पड़ गया। <br />कोई नाम नहीं है मेरा, तुमसे मतलब? नेहा ने चिढ़कर जवाब दिया।<br />देखो मुझे अपना नाम बताओ, मैं नाम पूछ रहा हूं न। उसने इस तरह सवाल दागा जैसे नेहा उसका जवाब देने के लिये मजबूर हो।<br />कहा ना, कोई नाम नहीं है मेरा।<br />तुम्हारे मां-बाप ने कोई तो नाम रखा होगा तुम्हारा?<br />नहीं कोई नाम नहीं रखा।<br />बस में किसी ने उसे कुछ नहीं कहा। किसी ने उसे रोकने की कोशिश भी नहीं की। सारे यात्री बुत की तरह बैठे रहे। कई लोगों को तो उसकी हरकतों आनंद का अनुभव हो रहा था। उनके चेहरे पर मुस्कुराहट तैर रही थी।<br />नेहा ने तो जैसे होठ सी लिये। उसकी आंखें अब भी नेहा को घूर रही थीं। लेकिन इसके आगे वह कुछ बोल पाता कि नेहा का स्टाप आ गया। <br />वह और प्रिया बस से उतर लीं। बस आगे बढ़ गई।<br />उफ्फ जान छूटी। किस पागल से पाला पड़ गया है। नेहा चिल्लाई। <br />प्रिया ने कोई प्रतिक्रिया नहीं जाहिर की। आखिर वो कहती भी क्या। वह भी इसी उधेड़बुन में लगी थी कि उससे कैसे छुटकारा पाया जाए। अगर रूट बदलना है तो नेहा को यह नौकरी भी बदलनी पड़ेगी। इतनी आसानी से तो मिलती नहीं नौकरी। यहां तो स्टाफ भी अच्छा है। सैलरी भी अच्छी है। <br />कुछ और सोचना पड़ेगा। प्रिया ने दिमाग पर जोर डाला। लेकिन कुछ न सोच पाने की झुंझलाहट उसके चेहरे पर साफ नजर आ रही थी। <br />नेहा भी खामोश थी। बोलती भी क्या? <br />दोनों आफिस पहुंच चुकी थीं।<br />शुक्र है अभी बॉस नहीं आया। आज तो बच गये। नेहा ने प्रिया की ओर देखते हुए कहा और जल्द से जल्द अपने कंप्यूटर को लॉग-इन करने में जुट गई। <br />नेहा और प्रिया दो साल से एक गर्ल्स हास्टल में साथ-साथ रह रही थीं। पहले प्रिया दूसरी जगह नौकरी करती थी। लेकिन आठ महीने पहले उसे भी नेहा के आफिस में नौकरी मिल गई। उस पब्लिकेशन हाउस में प्रिया के आने से नेहा को तो जैसे मन मांगी मुराद मिल गई। अब दोनों ही एक साथ आफिस के लिये निकलतीं। एक साथ लौटतीं। दोनों ने अपना वीकली आफ भी एक ही दिन करवा लिया था। शनिवार। सब कुछ तो अच्छा चल रहा था। पता नहीं वो लड़का कहां से पीछे पड़ गया।<br />कहीं लौटते वक्त भी न मिल जाए। आफिस से निकलते हुए नेहा ने अपनी आशंका प्रिया के सामने रखी।<br />अरे नहीं यार, क्यों इतना टेंशन लेती है। प्रिया ने उसकी आशंका को निर्मूल बताते हुए कहा। <br />और मिल भी जाएगा तो क्या हुआ। लगता है बहुत पसंद करता है तुझे। तेरे पर दिल आ गया है बेचारे का। वैसे दिखने में तो बड़ा स्मार्ट है। प्रिया ने चुहलबाजी की।<br />चुप हो जा। बकवास मत कर। चुपचाप चल। नहीं तो घंटा भर खड़े रहना पड़ेगा बस स्टाप पर।<br />हां-हां, चल तो रही हूं। उड़ने तो नहीं लग जाउंगी। प्रिया ने पलटकर जवाब दिया।<br />नेहा को प्रिया की चुहलबाजी बिल्कुल अच्छी नहीं लग रही थी। रह-रह कर नेहा के सामने उसी लड़के का चेहरा आ जाता था। कहीं फिर मिल गया तो सबके सामने तमाशा बना देगा। पता नहीं क्यों मेरे पीछे पड़ा हुआ है। स्साला..प्रिया को गुस्सा आ रहा था।<br />अरे, भई! जब मिलेगा तब देखा जाएगा। अभी से क्यों दिमाग खराब कर रही है। प्रिया ने उसे समझाने की कोशिश की। आफिस से बस स्टाप चंद कदम की दूरी पर ही था। <br />अब नेहा और प्रिया बस स्टाप पर थीं। चुपचाप। खामोश।<br />शुक्र है आज बस जल्दी आ गई। प्रिया ने खामोशी तोड़ी और बस की तरफ बढ़ने लगी। <br />बस रुकी। प्रिया और नेहा उस पर चढ़ गईं। <br />बस में ज्यादा भीड़ नहीं थी। दोनों को सीट भी मिल गई।<br />नेहा चुपचाप थी। प्रिया भी चुपचाप उसके चेहरे के हावभाव पढ़ने की कोशिश कर रही थी। <br />प्रिया बहुत देर तक चुप नहीं रह सकती थी। चुप्पी तो जैसे उसे खाने को दौड़ती थी।<br />क्या हुआ यार, ऐसे चुप रहेगी तो मैं बस से कूद जाउंगी। कुछ तो बोल। यह कहते हुए प्रिया खिलखिला कर हंस दी।<br />नेहा के होठों पर भी मुस्कान तैर गई।<br />यही तो खूबी थी प्रिया की। हमेशा मुस्कराना और सामने वाले को भी हंसने के लिये मजबूर कर देना।<br />देखो हमारा स्टॉप आने वाला है और अब तक वो नहीं आया। अब तो खुश? प्रिया फिर चुहलबाजी के मूड में थीं।<br />हां खुश। नेहा ने भी हंसकर जवाब दिया।<br />अब वो आएगा भी नहीं। आज तो बच गये। कल की कल देखी जाएगी। नेहा का मूड अच्छा होते देखकर प्रिया चहक उठी।<br />बस स्टाप आ गया। दोनों नीचे उतर लीं और पैदल ही अपने हास्टल की तरफ चल पड़ीं। <br />अगला दिन और फिर वही डर। कहीं वह लड़का पीछे न पड़ जाए।<br />लगता है इस बस का इंतजार करने के सिवा उसके पास कोई काम-धाम ही नहीं है। नेहा ने प्रिया की राय जाननी चाही।<br />हां, बड़े बाप की बिगड़ैल औलाद लगता है। हां कर दे तेरी तो लाइफ बन जाएगी। प्रिया ने फिर चुहलबाजी की।<br />तू चुप रहेगी या दूं एक घुमा के। नेहा ने नकली गुस्सा दिखाते हुए कहा। क्योंकि यह बात कहते हुए उसके होठों पर भी हंसी तैर रही थी।<br />अभी तक बस नहीं आई...? लगता है आज जरूर लेट होंगे। कुछ देर चुप रहने के बाद नेहा ने आशंका जतायी।<br />इससे पहले कि प्रिया कुछ बोल पाती बस उनकी आंखों के सामने थी।<br />दोनों बिना एक पल गंवाए बस में सवार हो गईं।<br />लेकिन बस में दाखिल होते ही नेहा को जैसे सांप सूंघ गया। एक बार तो उसे लगा कि चलती बस से कूद जाए। वो चुपचाप आकर सीट पर बैठ गई। और प्रिया भी।<br />दरअसल वह लड़का आज पहले से ही बस में मौजूद था। नेहा को देखते ही वह उसके पास आकर खड़ा हो गया। नेहा लगातार खिड़की से बाहर की ओर देखे जा रही थी। उसका दिल तेजी से धड़क रहा था। एक बार तो उसे लगा कि वह आज उसे फटकार ही दे। लेकिन कुछ सोचकर वह चुप रह गई। नेहा चुप थी। प्रिया भी चुप थी। वह लड़का भी चुप था।<br />तभी खामोशी टूटी। <br />आज तुमने वो पिंक वाला सूट क्यों नहीं पहना? वह तुम पर बहुत फबता है। उस लड़के ने सवाल किया जिसमें उसकी राय भी शामिल थी।<br />नेहा मन ही मन बुदबुदाई। ये तो हद हो गई। वह आज अपना गुस्सा रोक नहीं पाई। सीट छोड़कर खड़ी हो गई। <br />तुम होते कौन हो, यह पूछने वाले कि मैंने ये क्यों नहीं पहना वो क्यों नहीं पहना। मेरी जो मर्जी मैं पहनूं। तुम यहां से जाते हो या....? प्रिया ने उसे बीच में ही रोक दिया। अरे यार, दिमाग खराब कर रखा है इतने दिनों से। कंटक्टर गाड़ी रुकवाओ। मैंने कहा न, गाड़ी रुकवाओ अभी। हमें यहीं उतरना है। नेहा की आवाज में गुस्सा था और रोष भी।<br />बस में शोर-शराबा देख ड्राइवर ने गाड़ी रोक दी। नेहा तुरंत नीचे उतरी। प्रिया भी उसके पीछे दौड़ी...और वो लड़का भी। <br />मेरी बात तो सुनो, मैं तुम्हें अपने मम्मी-पापा से मिलवाना चाहता हूं।<br />तुम एक बार उनसे मिल तो लो। प्लीज।<br />प्रिया ने उसकी बात को अनसुना कर दिया।<br />बस के यात्री अभी भी उनकी ओर ही ताक रहे थे। कोई हंस रहा था कोई चुपचाप देख रहा था तो कई लोग कमेंट करने से भी बाज नहीं आ रहे थे।<br />'भाभी को मना लेना' भाई, तभी किसी की आवाज आई। <br />बस चल पड़ी थी। नेहा का वश करता तो उस कमेंट करने वाले को नीचे खींचकर चप्पल से मारती। लेकिन गाड़ी जा चुकी थी।<br />बड़े बेशर्म हो तुम। मैंने कह दिया न मुझे तुमसे कोई लेना देना नहीं है। फिर क्यों मेरे पीछे पड़े हो। प्लीज, मुझे बख्श दो और मुझे अपने रास्ते जाने दो। तुम अपने रास्ते जाओ। नेहा ने खीझते हुए कहा।<br />मैं चला जाउंगा। लेकिन मेरे सवाल का जवाब तो दो। लड़के ने बड़े ही शांतिपूर्ण तरीके से सवाल किया। <br />मुझे तुम्हारे किसी सवाल का जवाब नहीं देना।<br />चलो प्रिया। जल्दी करो। आज तो इस पागल ने सबके सामने हमारा तमाशा बना दिया। पता नहीं किस जनम की दुश्मनी निकाल रहा है। हाथ धोकर पीछे पड़ गया है।<br />नेहा इतने तेज कदमों से चलने की कोशिश कर रही थी कि उसके कदम भी उसका साथ नहीं दे पा रहे थे। प्रिया उसे रुकने की आवाज देकर उसके पीछे-पीछे भाग रही थी। <br />आसपास के लोगों की नजरें नेहा और प्रिया पर ही थीं। लोगों को भी मुफ्त में अच्छा-खासा तमाशा जो देखने को मिल गया था।<br />प्रिया ने एक बार पीछे मुड़कर देखा। वह लड़का अब भी वहीं पर खड़े होकर उन्हें घूरे जा रहा था।<br />अब शायद प्रिया को उससे कुछ सहानुभूति होने लगी थी।<br />मन ही मन प्रिया ने पिछली सारी बातें दोबारा याद करने की कोशिश कीं।...नाम ही तो पूछ रहा था बेचारा। कोई उल्टी-सीधी बात तो नहीं की। कहीं होटल या क्लब में ले जाने की बात तो कर नहीं रहा था। मम्मी-पापा से ही तो मिलवाना चाहता है। तो क्या शादी...? यानी उसकी इरादा नेक है। लेकिन वो नहीं जानता कि...<br />अचानक प्रिया ने अपनी सोच पर विराम लाग दिया। इसके बावजूद वह लगातार सब कुछ समझने की पूरी कोशिश कर रही थी।<br />वहीं नेहा के कदम अब भी रुकने का नाम नहीं ले रहे थे।<br />प्रिया ने उसे आवाज दी, नेहा ने पीछे मुड़कर देखा और उसके कदम रुक गये।<br />प्रिया भाग कर गई और उससे लिपट गई। अब चलो भी। नेहा ने फिर दोहराया। उसका मूड अब भी ठीक नहीं हुआ था। <br />क्या बेशर्मी है। रोज का तमाशा हो गया है। पीछा ही नहीं छोड़ रहा है। लगता है मुझे यह नौकरी ही छोड़नी पड़ेगी। नेहा ने निराशा भरे स्वर में कहा।<br />नौकरी क्यों छोड़ेगी। तेरे लिये दूसरी नौकरी रक्खी है क्या? फिर घूमना इस कंपनी से उस कंपनी, दूसरी नौकरी की तलाश में। घर में तो बैठेगी नहीं? इतना तो मैं भी जानती हूं। <br />तेज कदमों की आवाज के सिवा अब नेहा और प्रिया के बीच कुछ नहीं था।<br />दोनों खामोश थीं। <br />हास्टल नजदीक ही था कि नेहा ने खामोशी तोड़ी। छुट्टी ले लेती हूं एक हफ्ते की।<br />उससे क्या होगा?<br />अरे, दो-तीन दिन बाद वो भी अपना रास्ता बदल देगा।<br />हां, ऐसा हो सकता है। लेट्स ट्राई! प्रिया को नेहा का यह आइडिया जंच गया। <br />लेकिन मैं अकेले तो आफिस में बोर हो जाउंगी और रास्ते में भी। <br />वो मेरे पीछे पड़ जाएगा। तुम्हारे बारे में पूछने लगेगा। तब मैं अकेली क्या करूंगी? <br />हमममम...ऐसा कर तू भी छुट्टी कर ले। नेहा यूं बोली जैसे उसके दिमाग में कोई शानदार आइडिया आ गया हो। <br />ठीक है ! मैं कल ही बॉस से बात करती हूं। दोनों छुट्टी कर लेते हैं। वैसे मुझे नहीं लगता छुट्टी मिलने में कोई प्राब्लम आएगी। <br />हां, वो तो है। देख लो बात करके। प्रिया ने उदासीन लहजे में जवाब दिया। <br />हर दिन की तरह अगले दिन भी नेहा और प्रिया सुबह आफिस के लिये तैयार होने में जुटी थीं। हमेशा की तरह तैयार होने में देरी के लिये प्रिया ने नेहा की डांट खायी। हमेशा की तरह प्रिया ने उसकी बात एक कान से सुनी और दूसरे कान से निकाल दी। <br />अरे, इस लड़की ने तो मेरी जिंदगी का कबाड़ा कर दिया है। जब देखो आर्डर झाड़ती रहती है। एक पल को चैन नहीं लेने देती। आफिस में तो हैं ही सब बॉस बनने के लिये और कमरे पर आकर यह मेरी बॉस बन जाती है। जल्दी करो-जल्दी करो!! पता नहीं कौन सा तीर मारना है जल्दी पहुंचकर। <br />ज्यादा से ज्यादा वो रोहन यही ताना मारेगा न कि आज फिर लेट हो। बॉस के पास थोड़े चला जाएगा। अगर उसने ज्यादा स्मार्ट बनने की कोशिश की न तो मैं उसे एक ही दिन में सीधा कर दूंगी। तू चिंता मत कर और मुझे अपने तरीके से तैयार होने दे। प्रिया बोलती जा रही थी और नेहा सुने जा रही थी।<br />नेहा ने प्रिया को घूर कर देखा और प्रिया खिलखिलाकर हंस दी। नेहा के होठों पर भी मुस्कुराहट तैर गई। <br />अच्छा अब कमरा बंद करो और चलो। बकवास मत करो। <br />ठीक है बबा ! चल तो रही हूं। क्यों किसी और का गुस्सा मेरे ऊपर निकालने में जुटी हो। यह कहते हुये प्रिया की आखों में शरारत साफ नजर आ रही थी। <br />प्रिया का इशारा नेहा अच्छी तरह समझ गई थी। शायद इसीलिये उसने खामोशी ओढ़ ली।<br />बस आई, दोनों उस पर चढ़ गईं। सीट भी मिल गई। लेकिन नेहा ने एक शब्द भी नहीं बोला। प्रिया भी शायद उसे टोकने की हिम्मत नहीं कर पाई। <br />नेहा की यह चुप्पी ज्यादा देर तक कायम नहीं रह सकी। <br />अगले बस स्टाप पर वो लड़का एक बार फिर उसकी नजरों के सामने था। उस पर नजर पड़ते ही नेहा का तो जैसे खून खौल गया। <br />उस लड़के को देखते ही नेहा का ब्लडप्रेशर बढ़ जाता था। <br />हालांकि अभी तक उसने नेहा से कभी कोई ऐसी बात नहीं कही थी जिससे उस पर बदमाश या लफंगा लड़का होने का लेबल लगाया जा सके। <br />'आज आप लेट हो गईं?' उस लड़के ने नेहा की सीट पर आकर पूछा।<br />नेहा ने कोई जवाब नहीं दिया। <br />प्रिया की नजरें दोनों को चुपके से घूर रहीं थी। शायद उसे इंतजार था नेहा के कुछ बोलने का। <br />आपने कोई जवाब नहीं दिया....<br />अच्छा आज तो अपना नाम बता दीजिये...<br />अच्छा मैं अपना नाम तो बता ही देता हूं....<br />मेरा नाम है मनीष और आपका...?<br />'मैंने तुमसे कहा था न कोई नाम नहीं है मेरा।' नेहा ने चुप्पी तोड़ी।<br />नाराज क्यों होती हो। नाम ही तो पूछा है। कोई गाली तो नहीं दे दी।<br />क्यों मेरा नाम जानना चाहते हो? <br />बताओ क्यों जानना चाहते हो मेरा नाम?<br />जवाब दो...<br />अब उस लड़के ने खामोशी ओढ़ ली।<br />अब चुप क्यों हो? बताओ क्यों पूछना चाहते हो मेरा नाम? नेहा ने खीझकर अपना सवाल रिपीट किया। <br />अभी नहीं, पहले वादा करो तुम मेरे साथ मेरे घर चलोगी।<br />दिमाग खराब हैं क्या? <br />क्यों चलूंगी तुम्हारे घर....तुम कोई मेरे रिश्तेदार लगते हो?<br />नहीं, मैंने कहा था न, मैं तुम्हें अपने मम्मी-पापा से मिलाना चाहता हूं।<br />किसलिए? मुझे न तुममे कोई इंट्रेस्ट है औऱ न ही तुम्हारे मम्मी-पापा में। बस मेरा पीछ छोड़ दो।<br />इतना कहकर नेहा ने फिर खामोशी ओढ़ ली। <br />बस में बैठे सारे लोगों की निगाहें नेहा की तरफ ही टिकी थीं। <br />रोज आने-जाने वाले यात्री तो नेहा और उस लड़के से अच्छी तरह वाकिफ हो चुके थे।<br />इसके बावजूद आज तक किसी ने उस लड़के को एक शब्द नहीं बोला।<br />शायद बस यात्रियों के लिये भी वो दोनों टाइम पास का साधन बन चुके थे। <br />नेहा का मूड बहुत खराब हो चुका था। वह उस लड़के से बुरी तरह तंग आ चुकी थी। समझ नहीं पा रही थी क्या करे? ऊपर से यह प्रिया, जब देखो तब इसे मजाक सूझता रहता है। पता नहीं मेरी दोस्त है या दुश्मन? <br />बस से उतर कर प्रिया और नेहा ऑफिस की तरफ चल दीं। आज तो दफ्तर के बाहर ही महेश मिल गया। <br />हाय! महेश ने हाथ हिलाया। <br />नेहा और प्रिया ने इशारे में ही उसके हाय का जवाब दिया और दफ्तर में दाखिल हो गईं।<br />क्या हुआ, आज तुम दोनों फिर लेट हो गईं। बॉस ने घूरते हुए सवाल किया।<br />क्या बताऊं सर, वो बस में.....<br />बस में क्या...?<br />साफ-साफ बताओ। बास ने जरा कड़क आवाज में पूछा।<br />बेवजह की डांट खाना नेहा को कतई पसंद नहीं था। उसी पल उसने तय कर लिया कि आज बॉस को सब बता देगी।<br />सर वो बस में रोज हमें....प्रिया ने कुहनी मारकर उसे रोकने की कोशिश की....<br />नेहा ने उस पर कोई ध्यान नहीं दिया और बोलना जारी रखा...<br />सर एक लड़का हमें काफी दिनों से तंग कर रहा है। रोज बस में मिल जाता है। पीछे ही पड़ गया है। कहता है शादी करना चाहता हूं तुमसे....<br />हां, तो प्राब्लम क्या है? <br />क्या सर....?<br />अरे मेरा मतलब है कौन है वह लड़का, क्या नाम है उसका? नाम तो सर मुझे नहीं मालूम।<br />मनीष नाम है सर उसका, प्रिया ने बीच में ही जवाब दिया।<br />अच्छा, प्रिया तुम्हें तो उसका नाम भी मालूम है। औऱ क्या मालूम है उसके बारे में...बताओ मुझे। प्रिया बॉस से मुखातिब थी और नेहा लगातार उसे घूरे जा रही थी।<br />आखिर प्रिया चुप हो गई। <br />नेहा ने बोलना शुरू किया। शुरू से लेकर आखिर तक सब बता दिया। <br />इसी बीच महेश भी पीछे आ खड़ा हुआ था..उसने भी सारी बातें सुन लीं। <br />थोड़ी ही देर में पूरे ऑफिस में यह बात फैल गई। <br />हर कोई नेहा और प्रिया से मनीष के बारे में पूछने लगा।<br />कहो तो स्साले के हाथ-पैर तुड़वा दूं? आकाश बोला।<br />उसके लिए तो मैं अकेला काफी हूं। नरेश ने भी हीरो बनने की कोशिश की।<br />चुप रहो। तुम लोगों ने ये सब क्या लगा रखा है। जाओ अपना-अपना काम करो। आशीष सर ने सबको डांटने के लहजे में कहा। सब चुपचाप वहां से खिसक लिए। <br />तुम दोनों फिक्र मत करो। कल अगर वो बस में नजर भी आए तो बस मुझे एक फोन कर देना। मैं सब संभाल लूंगा। आशीष सर ने कहा। <br />अच्छा अब जाओ, कुछ काम कर लो। उसके बारे में सोचकर परेशान होने की जरूरत नहीं है।<br />नेहा चुपचाप अपनी चेयर पर जाकर बैठ गई। प्रिया के लिए तो जैसे कुछ हुआ ही नहीं था। उसके होठों पर अब भी मुस्कान तैर रही थी। <br />इतने लोगों की बातें और हाव-भाव देखकर नेहा समझ चुकी थी उसका तमाशा बन चुका है। किसी को कुछ करने की जरूरत नहीं है मेरी प्राब्लम है, मैं खुद निबट लूंगी...नेहा मन ही मन बुदबुदाई।<br />आज नेहा को आफिस में पल-पल काटना मुश्किल हो रहा था। उसे बस यही लग रहा था कि जाकर कमरे में सो जाए और बस सोती ही रहे। <br />किसी तरह छह बजे। ऑफिस से निकलने का वक्त हो गया। चलो अभी तुम फ्री नहीं हुई। चलो अब निकलते हैं। बाकी काम कल देख लेना। मुझे बहुत नींद आ रही है। चलती हूं बस पांच मिनट। प्रिया ने नेहा को रुकने के लिए कहा और कंप्यूटर शट डाउन करने लगी। कुछ कागजात टेबल से उठाकर ड्रार में रखे और लॉक करने के बाद वो अपना टुपट्टा संभालती हुई खड़ी हो गई। चलो। <br />एक मिनट रुको, जरा मैं आशीष सर को बता दूं कि कल मैं छुट्टी पर हूं। अचानक छुट्टी क्यों? प्रिया ने सवाल किया। लेकिन उसके सवाल का जवाब दिए बिना ही नेहा आशीष सर के केबिन में गई और छुट्टी की बात कर बाहर आ गई। उसके चेहरा बता रहा था कि आशीष सर ने उसे छुट्टी दे दी है। <br />चलो अब, नेहा ने कहा। चल तो रही हूं, लेकिन बता तो कल छुट्टी लेकर क्या कर रही है? कुछ नहीं, बस है न कुछ जरूरी काम। चल तो तू भी सब समझ जाएगी। <br />शायद नेहा के दिमाग में कुछ चल रहा था, जिससे उसकी बेस्ट फ्रैंड प्रिया भी नहीं पढ़ पा रही थी। दोनों बस स्टाप की तरफ बढ़ रहीं थीं। सुबह की तरह ही खामोशी से..कुछ सुनाई दे रहा था तो सिर्फ उनके पैरों की आवाज और ट्रैफिक का शोर। लेकिन नेहा के कानों तक शायद ये आवाजें नहीं जा रही थीं। वो चुपचाप थी, लेकिन दिमाग लगातार सोच रहा था। <br />क्या बात है कुछ तो बता..? <br />नेहा ने प्रिया के सवाल को कोई तवज्जो नहीं दिया। वो चुपचाप चली जा रही थी। वो जल्द से जल्द बस स्टॉप पहुंचना चाहती थी। बस स्टॉप आ गया। नेहा और प्रिया चुपचाप बस का इंतजार करने लगीं।<br />आधा घंटा इंतजार के बाद बस नहीं आई। बहुत भीड़ थी बस में। प्रिया ने कहा थोड़ा रुक लेते हैं अलगी बस में चलेंगे। लेकिन नेहा उसकी बात को अनसुना कर बस में चढ़ने लगी। वास्तव में बस में काफी भीड़ थी। नेहा और प्रिया बस के गेट पर ही अटक गईं। अचानक किसी ने हाथ बढ़ाया और नेहा को बस में खींच लिया। उसके बाद प्रिया के साथ भी ऎसा ही हुआ।<br />बस में मौजूद वह व्यक्ति मनीष ही था। वह चुपचाप खड़ा थी। बस में इस कदर भीड़ थी कि उसके लिए कुछ बोलना मुनासिब भी नहीं था। अगले स्टॉप में ही बस की भी़ काफी कम हो गई। नेहा और प्रिया बाईं तरफ वाली सीट मिल गई। मनीष अब भी खड़ा था। नेहा ने उसे इशारे से बुलाया और अपनी सीट पर बैठने के इशारा किया।<br />यह देखकर प्रिया की आंखें फटी की फटी रह गईं। मनीष को भी नेहा के इस व्यवहार पर आश्चर्य हो रहा था...वह चुपचाप सीट पर आकर नेहा के बगल में बैठ गया। खिड़की की तरफ प्रिया थी और बीच में नेहा। <br />लोगों की आंखें अब नेहा को घूर रही थीं। किसी को अपनी आंखों पर यकीन नहीं हो रहा था। <br />'भाभी मान गईं.....'<br />'लड़की पट गई भाई.....'<br />'मुबारक हो, भाईजान! मेहनत रंग लाई'<br />पीछे से कुछ लोगों ने कमेंट पास किए। ये वही लोग थे जिनका रोज इस बस से आना-जाना होता था। ये लोग नेहा और मनीष की कहानी से अच्छी तरह वाकिफ थे।<br />मनीष! तुम मेरा नाम जानना चाहते हो न? मेरा नाम नेहा है। मैं इलाहाबाद की रहने वाली हूं। यह लो मेरा मोबाइल नंबर। कल सुबह नौ बजे मुझे फोन करना। मनीष बुत की तरह उसकी बात सुन रहा था। उसने हां में सिर हिलाया और अपने मोबाइल में नेहा का नंबर स्टोर कर लिया। खुशी उसके चेहरे से झलक रही थी। <br />शायद आज बोलने की बारी नेहा की थी। यह देखकर प्रिया की परेशानी बढ़ती ही जा रही थी। अचानक इसे यह क्या हो गया? जिससे सीधे मुंह बात नहीं करती थी, उसे खुद अपना नाम बता रही है। मोबाइल नंबर भी दे दिया। क्या कर रही है यह लड़की? कल की छुट्टी भी ले रखी है.....। बताती भी तो नहीं। पता नहीं क्या करने जा रही है? <br />मनीष हतप्रभ था। हमेशा नेहा पर हावी होने की कोशिश करने वाला मनीष अच्छे बच्चों की तरह चुपचाप बैठा था। उसकी तो बोलती ही बंद हो चुकी थी। न उसने कुछ पूछा और न ही उसकी जुबान से कोई लब्ज फूटा। हां, वह खुश बेहद था। जैसे सारे जहां की खुशियां उसे मिल गई हों। यह साफ हो चुका था कि मनीष जैसा खुद को दिखाता था असल में वैसा नहीं था। <br />बस तेज रफ्तार से दौड़ रही थी। प्रिया का दिल तेजी से धड़क रहा था। मनीष का दिल भी तेजी से धड़क रहा था। लेकिन नेहा बिल्कुल नार्मल दिख रही थी। बेफिक्र। बेखौफ। शांत। आज तो लग ही नहीं रहा था कि यह वही नेहा है जिसका ब्लडप्रेशर मनीष को देखते ही बढ़ जाता था। <br />अचानक बस रुकी और मनीष चुपचाप अपनी सीट से उठा। एक बार मुड़कर नेहा की तरफ देखकर बॉय किया और नीचे उतर गया। नेहा ने आंखों ने उससे क्या कहा, ये सिर्फ वही जान पाया। प्रिया बस दोनों को देखे ही जा रही थी। उसके दिमाग में सैकड़ों सवाल उठ रहे थे। प्रिया ने फिर उससे कुछ पूछने की कोशिश की, लेकिन नेहा ने उसे चुप रहने का इशारा किया।<br />थोड़ी देर में उनका भी स्टॉप आ गया। दस पंद्रह मिनट बाद नेहा और प्रिया अपने कमरे में थीं।<br />अब तो बता क्या खिचड़ी पका रही है तू अपने दिमाग में? <br />कुछ नहीं। तू चेंज कर ले। फिर आराम से बात करते हैं न। नेहा ने कहा।<br />अब तो प्रिया यंत्रवत नेहा की हर बात मान रही थी। बिना एक पल गवांए ही वो कपड़े चेंज करके उसके पास फिर आ धमकी।<br />अब बता। बताती हूं। जरा सांस तो लेने दे। तू तो हाथ धोकर मेरे पीछे ही पड़ गई है। नेहा का मूड अच्छा नजर आ रहा था। <br />उसे अपना मोबाइल नंबर क्यों दिया। फोन करने को क्यों कहा? <br />'मैं कल उससे मिल रही हूं'<br />क्या...? प्रिया को लगा कि शायद उसके कान कुछ गलत सुन रहे हैं।<br />हां, मैं कल मनीष से मिल रही हूं। <br />क्या करेगी उससे मिलकर? मुझे तो बहुत डर लग रहा है। मैं भी साथ चलूंगे तेरे। <br />तू क्यों डरी जा रही है मैं हूं न सब देख लूंगी। मिल ही तो रही हूं उससे कोई शादी थोड़े कर रही हूं। और हां, तुझे मेरे साथ चलने की कोई जरूरत नहीं है। नेहा ने खीझकर कहा।<br />तो क्या उसकी मम्मी से मिलने उसके घर भी जाएगी?<br />प्रिया ने ताना मारने वाले अंदाज में सवाल किया? <br />हां, जाऊंगी। तुझसे मतलब? नेहा ने तुनक कर जवाब दिया। <br />प्रिया चुप हो गई। <br />थोड़ी देर के लिए कमरे में खामोशी छा गई।<br />इस खामोशी को नेहा ने ही तोड़ा। अरे, बाबा इतना परेशान होने की जरूरत नहीं है। अच्छा ठीक है तू भी चलना साथ में। अब तो ठीक। खुश...?<br />दोनों खिलखिलाकर हंस पड़ीं। कमरे का जो माहौल थोड़ी देर पहले बोझिल हो रहा था उसे दोनों की हंसी ने खुशगवार बना दिया।<br />ध्यान से सुन, तू मेरे साथ तो जाएगी, लेकिन मेरे साथ नहीं रहेगी। मैं उससे अकेले ही मिलूंगी। समझी। तू कहीं आसपास रहना। ओके?<br />ओके, बॉस! प्रिया ने चहकते हुए कहा। लेकिन प्लानिंग क्या है तेरी ये तो बता।<br />बस मैं उससे मिल रही हूं और क्या। अब मिलूंगी तो बात भी करूंगी। <br />क्या बात करेगी तू उससे? यही तो पूछ रही हूं तुझसे। <br />तेरी शादी की बात करूंगी।<br />देख मसखरी मत कर। मैं सीरियसली पूछ रही हूं। बता न।<br />पहले बात कर लूं फिर बताऊंगी। चल अब खान खाने चलते हैं वर्ना कैंटीन बंद हो जाएगी। दोनों को बात करते-करते काफी देर हो चुकी थी।<br />नेहा और प्रिया कैंटीन से खाना खाकर लौटीं तो घड़ी रात के नौ बजा रही थी। नौ बजे की बात से फिर प्रिया की आंखों के सामने मनीष का चेहरे घूमने लगा। सुबह नौ बजे ही तो फोन करने वाला हो वो प्रिया को। पता नहीं क्या करने वाली है प्रिया? यही सोचते-सोचते प्रिया ने नेहा की तरफ देखा, नेहा सो चुकी थी। <br />देखो महारानी को कैसे बेफिक्र होकर सो रही है और एक मैं हूं जो इसके बारे में सोच-सोच कर अपना दिमाग खाली कर रहूं हूं। <br />प्रिया एक मैगजीन उठाकर पढ़ने की कोशिश करने लगी। लेकिन दिमाग में नेहा और मनीष ही घूमते रहे। इसी तरह प्रिया की भी आंख लग गई। <br />आंख तब खुली जब सुबह नेहा ने उसे झिंझोड़ा कितना सोएगी? उठ चलना नहीं है क्या?<br />कहां? अरे मनीष से मिलने औऱ कहां?<br />बड़ी बेताब हो रही है उससे मिलने के लिए....कहीं तेरा दिल तो नहीं आ गया उस पर। प्रिया ने चुहलाबजी करते हुए नेहा के गाल पर किस कर लिया। <br />चल-चल उठ ज्यादा प्यार मत दिखा। तैयार हो नहीं तो देर हो जाएगी।<br />अरे, अभी तो उसका फोन भी नहीं आया?<br />आएगा बबा आएगा। नौ बजे फोन करेगा न।<br />तू इतने दावे के साथ कैसे कह सकती है कि वह फोन करेगा ही? प्रिया को सब कुछ बड़ा आश्चर्यजनक लग रहा था।<br />कह रही हूं न कि करेगा तो करेगा। नौ तो बजने दे।<br />प्रिया जल्दी-जल्दी तैयार होने लगी। उसकी नजर घड़ी पर ही टिकी हुई थी। कब नौ बजे और कब मनीष का फोन आए। वह भी तो सुने क्या बात करती है नेहा उससे, कहां मिलने को कहती है उसे। <br />तभी नेहा के मोबाइल की घंटी बजी। नेहा ने फोन उठाया। <br />अरे, तू क्यों परेशान हो रही है, उसका फोन नहीं है मकान मालिक का। कह रहा था कि कल टंकी का नल खुला छोड़ दिया था।<br />अभी तो नौ नहीं बजे हैं। इंतजार कर थोड़ा। <br />कहां हो मैडम? नौ बज चुके हैं। जरा घड़ी पर नजर तो डालो।<br />इधर नेहा ने घड़ी की तरफ देखा और उधर उसके मोबाइल की घंटी फिर बज उठी।<br />नेहा ने फोन रिसीव किया। फोन मनीष का ही था।<br />उड्डपी में आ जाओ। कितनी देर में पहुंचोगे?<br />ठीक है। 11 बजे मैं भी पहुंच जाउंगी।<br />नेहा और प्रिया तय वक्त पर उड्डपी पहुंच गईं। नेहा अंदर चली गई और प्रिया बाहर ही उसका इंतजार करने लगी।<br />नेहा ने अंदर प्रवेश किया तो देखा कि एक टेबल पर मनीष पहले से उसका इंतजार कर रहा है। नेहा जाकर निसंकोच उसके पास बैठ गई। <br />'अब बताओ क्या बात करना चाहते हो मुझसे' नेहा ने कहा। <br />'मैं तुमसे प्यार करता हूं' <br />तुमसे शादी करना चाहता हूं<br />लेकिन मैं तो तुमसे प्यार नहीं करती?<br />'क्या कमी है मुझमें? मेरा विश्वास करो, मैं तुम्हें बहुत खुश रखूंगा।' <br />विश्वास-अविश्वास की कोई बात ही नहीं है मनीष। मैंने कहा न मैं तुमसे प्यार नहीं करती। तो तुम ही बताओ...शादी जैसा फैसला मैं कैसे कर सकती हूं? <br />मनीष चुप हो गया। <br />अगर तुम मुझे नहीं मिली तो मैं जी नहीं पाऊंगा।<br />लगता है तुम फिल्में बहुत देखते हो। फिल्म और हकीकत में फर्क होता है मनीष। समझने की कोशिश करो। <br />मैं जानता हूं कि फर्क होता है लेकिन मैं जो कह रहा हूं वह हकीकत है। <br />अगर मैं कहूं कि मैं किसी और से प्यार करती हूं तो?<br />मैं कैसे यकीन कर लूं? मुझे नहीं लगता तुम्हारी जिंदगी में कोई है<br />क्यों तुम्हे ऎसा क्यों लगता है। क्या मेरा कोई ब्वायफ्रैंड नहीं हो सकता?<br />नहीं, मेरे कहने का यह मतलब नहीं है।<br />मेरा मतलब है कि इतने दिनों में मैंने तो कभी तुम्हारे साथ किसी लड़के को नहीं देखा। <br />तुम्हें क्या मालूम, तुमने मुझे आफिस के रास्ते और बस में ही तो देखा है।<br />नहीं, मैंने तुम्हें तुम्हारे हॉस्टल तक देखा है।<br />अच्छा, तो तुम मेरा पीछा भी कर चुके हो?<br />मनीष थोड़ी देर चुप रहा। फिर बोला, मैं समझ रहा हूं तुम मुझसे पीछा छुड़ाने के लिए ऎसा कह रही हो।<br />आखिर क्या कमी है मुझमें?<br />तुममें कोई कमी नहीं है मनीष। लेकिन आई एम ऑलरेडी इंगेज्ड। <br />कौन है वो?<br />वो बचपन में मेरे साथ पढ़ता था। परसों रात पांच साल बाद उसने मुझे फोन किया और पहली बार में ही प्रपोज कर दिया। <br />और तुमने उसे हां भी कह दिया।<br />हां, <br />क्या तुम भी उसे प्यार करती हो। <br />हां, हम दोनों अच्छे दोस्त थे, लेकिन मैंने उससे कभी नहीं कहा। <br />तुम्हें मेरा खयाल नहीं आया?<br />आया था, लेकिन मेरे लिए इससे बड़ी बात क्या हो सकती है कि मैं जिसे बचपन से पसंद करती हूं वह मुझे मिल गया। <br />अभी कहां है वो?<br />वो बनारस में रहता है। थोडी देर में वो यहां पहुंचने वाला है। खुद ही मिल लेना उससे। <br />तुम सच कह रही हो? मनीष को नेहा की बातों पर यकीन नहीं हो रहा था।<br />हां मैं सच कह रही हूं। <br />मनीष फिर चुप हो गया।<br />नेहा ने अपने मोबाइल से प्रिया को कॉल किया। <br />प्रिया अंदर आकर उनके साथ बैठ गई।<br />तुम दोनों साथ आई थी?<br />हां, प्रिया ने जवाब दिया।<br />अच्छा प्रिया तुम बताओ, क्या नेहा सच कह रही है, क्या इसका कोई ब्वायफ्रैंड है।<br />प्रिया ने नेहा की तरफ घूरकर देखा....लेकिन इससे पहले कि वो कुछ बोल पाती नेहा ने ही बोल पड़ी, अरे प्रिया उसके बारे में कुछ नहीं जानती।<br />ऎसा कैसे हो सकता है? मनीष उसकी बातों पर विश्वास करने को तैयार ही नहीं था।<br />तभी एक लड़का उनकी टेबल की तरफ आया। उसे देखते ही नेहा खड़ी हो गई और उछलकर उसके गले से लिपट गई। <br />मनीष और प्रिया दोनों के लिए यह वक्त सरप्राइज्ड होने का था। <br />नेहा ने उस लड़के से पहले मनीष का परिचय कराया...मनीष यह है राजेश..और राजेश यह है मनीष और यह है मेरी प्यारी सहेली प्रिया।<br />प्रिया ने रूठने के अंदाज में नेहा की तरफ देखा। जैसे आंखों ही आखों में कहना चाहती हो कि तुमने राजेश के बारे में मुझे नहीं बताया। अपनी सबसे पक्की सहेली को नहीं बताया।<br />मुझे पता है मनीष तुम्हें मुझसे मिलकर खुशी नहीं हुई होगी, क्योंकि मैं तुम्हारी फीलिंग समझ सकता हूं। मैं तुम्हें नेहा तो नहीं दे सकता लेकिन हम दोनों अच्छे दोस्त तो बन ही सकते हैं। राजेश सब कुछ एक ही सांस में बोल गया। <br />ओके, राजेश। ओके प्रिया। अब मैं चलता हूं। अब मैं तुम्हें कभी परेशान नहीं करूंगा। बॉय नेहा, बॉय राजेश, बॉय प्रिया। यह कहकर मनीष वहां से निकल गया। किसी ने उसे रोकने की कोशिश नहीं की।<br />अब चलें प्रिया? नेहा ने पूछा।<br />हां, चलो। अभी तो मुझे तुमसे बहुत सारी बातें करनी हैं<br />'मैं जानती हूं तुम्हें क्या बातें करनी है'<br />आज तो सारी रात तू झगड़ने ही वाली है मुझसे।<br />झगड़े वाली बात ही है। इतनी बड़ी बात तुमने मुझे नहीं बताई। राजेश के बारे में मुझे नहीं बताया। <br />अरे, बबा! कल तक ऎसा कुछ था ही नहीं तो क्या बताती खाक?<br />अच्छा अब चल, कमरे में चलकर झगड़ लेना जितना झगड़ना हो। चलो राजेश, तुम्हें तो आज ही बनारस लौटना भी है। <br />हां, चलो! तीनों साथ चल दिए। प्रिया की आंखों में मनीष का मायूस चेहरा घूम रहा था। लेकिन क्या हो सकता है...यही तो जिंदगी है। प्रिया ने खुद को समझाने की कोशिश की और उनसे साथ अपने भी कदम बढ़ा दिए। <strong>(समाप्त)</strong><div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8343209256361202787-9035190575773449166?l=rex-aashiyana.blogspot.com'/></div>रवीन्द्र रंजनhttp://www.blogger.com/profile/09390660446989029892ravindraranjan@hotmail.com11tag:blogger.com,1999:blog-8343209256361202787.post-27068747706267958282008-05-20T08:21:00.000-07:002008-05-20T08:27:01.185-07:00अलगौझा*<a href="http://2.bp.blogspot.com/_ekflEAbWemw/SDLtPC-J88I/AAAAAAAAAX4/TZdexIN1Eu4/s1600-h/indian_child.jpg"><img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://2.bp.blogspot.com/_ekflEAbWemw/SDLtPC-J88I/AAAAAAAAAX4/TZdexIN1Eu4/s200/indian_child.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5202481362317734850" /></a>चाचा आप क्यों गुस्सा हो गए?<br />आप तो मुझे रोज चूमा करते थे<br />अब कटे-कटे से क्यों रहते हैं?<br />आपने चुन्नू भैया को डांटा क्यों नहीं?<br />उसने आपकी लाई मिठाई मुझे नहीं दी।<br />मुन्नी दीदी भी अब मेरे साथ लूडो नहीं खेलतीं<br />कहती हैं जाओ-अपने भाई के साथ खेलो<br />बताओ चाचा, तुम मुन्नी दीदी को डांटोगे न?<br /><br />भला चाचा तुम्हें याद है कितने दिन हो गए<br />मुझे कंधे पर बिठाकर हाट घुमाए हुए<br />कोने वाले कमरे में अब ताला क्यों बंद रहता है?<br />वह तो हमारे खेलने का कमरा था<br />चाची तो मुझे गोद पर सुलाया करती थीं<br />उस दिन दुखते सिर को दबाने को कहा<br />तो क्यों झिड़क दीं?<br />जानते हो चाचा, <br />चाची के कमरे में जाने पर <br />सब मुझे सहमी-सहमी निगाह से देखते हैं<br />बताओ न चाचा, ऎसा क्यों हो रहा है?<br />मुझे बहुत डर लगता है।<br />**********************<br />बच्चा केवल सवाल करता है<br />वह नहीं जानता कि <br />आंगन वाली दीवार की ऊंचाई <br />कब दिलों को पार कर गई<br />(मेरे अजीज दोस्त प्रमोद कुमार की कविता जो प्रमोद ने मुझे 16-11-1998 को अपनी पाती के साथ वाराणसी से भेजी थी)<br /><strong>*विभाजन</strong><div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8343209256361202787-2706874770626795828?l=rex-aashiyana.blogspot.com'/></div>रवीन्द्र रंजनhttp://www.blogger.com/profile/09390660446989029892ravindraranjan@hotmail.com4