tag:blogger.com,1999:blog-8231814.post-1094564335401404652004-09-07T19:01:00.000+05:302004-09-07T19:08:55.400+05:30बातें, कही अनकहीबातें, कही अनकही <br /> पड़ी रह जाती हैं । <br /> <br />जैसे सुबह की नर्म दूब पर पड़ी <br /> ओस की बूंदें । <br /> <br />जब कभी पाँव पड़ जाये <br /> तो गुदगुदी सी होती है । <br /> <br />या फिर डायरी के पन्नों पर पड़े <br /> स्याही के कुछ छींटे । <br /> <br />पीले पड़ते पन्नों पर, <br /> चमक कभी नहीं जाती । <br /> <br />बातें, <br /> बस वही तो रह जाती हैं । <br /> <br /> - आनन्द जैन <br /> <br /><div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8231814-109456433540140465?l=anandkjain.blogspot.com'/></div>कृतिकारnoreply@blogger.com4