tag:blogger.com,1999:blog-82318142008-07-17T08:33:10.493+05:30मेरी कविताएंकृतिकारnoreply@blogger.comBlogger5125tag:blogger.com,1999:blog-8231814.post-62139177254914710342007-04-14T01:19:00.001+05:302007-04-14T01:19:08.368+05:30आज लिखे कुछ नये शब्द तुम्हारे लिये<span style="font-size:100%;">क्यों न छूटता चलूं मैं<br />जड़ संवादों की<br />अंतहीन बेड़ियों से<br /><br />क्यों न मैं विचरूं मुक्त<br />सह-सार की खोज में<br />इंकार के<br />ऊंचे दरख्तों के पीछे<br /><br />क्यों न परछाई बन<br />मैं साथ हो जाऊं,<br />तु्म्हारी आंखों के सामने<br />हर क्षण<br /><br />तुम्हारा अस्तित्व<br />तु्म्हारा अहसास<br />अब परे है तुम से<br /><br />क्योंकि मेरे मन में<br />तुम्हारी<br />एक नई परिभाषा<br />जन्म लेती है हर सांझ</span>कृतिकारnoreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-8231814.post-1113288355753623172007-01-31T02:24:00.000+05:302007-01-31T02:24:36.896+05:30मांडूहर ओर टूटी इमारतें, खिरती दीवारें और दरकते मचान,<br />फिर भी मेरा यह शहर अपनी बुलंदियों पर इतराता फिर रहा है ।<br /><br />महलों को छोड़ बेगमें सड़क पर आ गई हैं,<br />हरम अब बांदियों और लौंडियों के सहारे ज़िंदा हैं ।<br /><br />रूपमती के झरोखे से अब नर्मदा नजर नहीं आती,<br />हरेक की नजर में कुहासा छा गया है ।<br /><br />मिट गये हैं जामा मस्ज़िद से अजान देने वाले,<br />अशर्फी महल की आयतें अब दुर्गति पढ़ रही हैं ।<br /><br />सब कुछ इतिहास, अब वर्तमान खत्म हो चला है,<br />मेरा ये शहर अब मांडू हो चला है ।कृतिकारnoreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-8231814.post-1095417576907638492004-09-17T16:06:00.000+05:302004-09-17T16:13:44.053+05:30रिश्तेरिश्ते, <br />जो तैयार होते हैं, <br />संबोधन की नींव से, <br />सामीप्य की दीवारों से । <br /> <br />हर साथ बिताया पल, <br />एक उस ईंट की तरह, <br />जो इमारत की बुनियाद बनती है । <br /> <br />फिर साथ रहते हुए, <br />हम इन्हें संभालने की कोशिश करते हैं । <br />ये बंट जाते हैं छोटे छोटे बक्सों में, <br />हरेक अपने प्रकोष्ठ में बंद । <br /> <br />प्रकोष्ठ, <br />जिसका एक ही दरवाजा होता है, <br />भीतर बाहर जाने के लिए । <br /> <br />रिश्ते जो भवन नजर आते हैं बाहर से, <br />किंतु भीतर से होते हैं रीते बक्से । <br />आओ हम तुम कोशिश करें, <br />इन बक्सों से बाहर रहने की । <br /> <br />वह मंजिल तैयार करें, <br />जहां कोई दीवार न हो. <br />न प्रकोष्ठ, न दरवाजा, <br />ताकि किसी रिश्ते के लिए <br />फिर सांकल न बजानी पड़े ।। <br /> <br />कृतिकारnoreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-8231814.post-1095417234616878542004-09-17T16:00:00.000+05:302004-09-17T16:03:54.616+05:30दुआहर लम्हा ज़िंदगी का एक कोरा सफहा है, <br />कूची ख्वाहिशों की लेकर तुम इसमें रंग भर लो । <br /> <br />लेकर सुबह से सिंदूरी लाल, <br /> आकृति नये जीवन की बनाना । <br />फिर ले प्रणयी बासंती पीला, <br /> नित नये तुम स्वप्न सजाना । <br /> <br />मेहंदी से लेकर हरा रंग, <br /> अपना सुंदर संसार रचाना । <br />और ले विराट अम्बर से उसका रंग, <br /> स्वयं को उसके साथ उठाना । <br /> <br />फिर शुभ्र एक किनारी देकर, <br /> नई उमंग की ज्योत जगाना । <br />देना श्याम छोड़ निशा पर, <br /> उसे है केवल हमें निभाना । <br /> <br /> - आनन्द जैन <br />कृतिकारnoreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-8231814.post-1094564335401404652004-09-07T19:01:00.000+05:302004-09-07T19:08:55.400+05:30बातें, कही अनकहीबातें, कही अनकही <br /> पड़ी रह जाती हैं । <br /> <br />जैसे सुबह की नर्म दूब पर पड़ी <br /> ओस की बूंदें । <br /> <br />जब कभी पाँव पड़ जाये <br /> तो गुदगुदी सी होती है । <br /> <br />या फिर डायरी के पन्नों पर पड़े <br /> स्याही के कुछ छींटे । <br /> <br />पीले पड़ते पन्नों पर, <br /> चमक कभी नहीं जाती । <br /> <br />बातें, <br /> बस वही तो रह जाती हैं । <br /> <br /> - आनन्द जैन <br /> <br />कृतिकारnoreply@blogger.com