tag:blogger.com,1999:blog-8231814.post-1118474117216335132005-06-11T12:45:00.000+05:302005-06-11T12:45:00.000+05:30बातें, कही अनकहीपड़ी रह जाती हैं ।जैसे सुबह की नर्...बातें, कही अनकही<BR/>पड़ी रह जाती हैं ।<BR/><BR/>जैसे सुबह की नर्म दूब पर पड़ी<BR/>ओस की बूंदें ।<BR/><BR/>जब कभी पाँव पड़ जाये<BR/>तो गुदगुदी सी होती है ।<BR/><BR/>या फिर डायरी के पन्नों पर पड़े<BR/>स्याही के कुछ छींटे ।<BR/><BR/>पीले पड़ते पन्नों पर,<BR/>चमक कभी नहीं जाती ।<BR/><BR/>बातें,<BR/>बस वही तो रह जाती हैं ।Anonymousnoreply@blogger.com