tag:blogger.com,1999:blog-81444298292918614802008-08-17T10:10:18.743-07:00Bhavya's WorldBhavyahttp://www.blogger.com/profile/04680506436181806470noreply@blogger.comBlogger21125tag:blogger.com,1999:blog-8144429829291861480.post-89290231251812677332008-08-17T10:03:00.000-07:002008-08-17T10:10:18.753-07:00हे भारतमाता!<strong>हे भारतमाता। <br />अजर, अमर, अटल देश हो, हे भाग्यविधाता <br />खिले हर कोख में एक दूर दृष्टिदाता <br />प्रेम, माधुर्य, भाईचारे बनी रहे ये अविरल गाथा <br />हे भारत माता हे भारत माता। <br /><br />बनी पड़ी मिसाल है, अखंड कथा निहाल है। <br />धरा पर बिखरा तेज है, ये संस्कृति की सेज है। <br />नदी की धार सार है, यहां भूमि आधार है। <br />हर नजर में स्वप्न है, कर्म यहां धर्म है। <br />हर बात में दर्शन है, हर साथ में समर्पण है। <br />हर ओर छाया उजाला है, हर पंथ यहां निराला है। <br /><br />आशाओं के विस्तार में व्यक्ति की पहचान है। <br />इस देश की बात में हर अर्थ बस महान है। <br />जन मन गण, भारत भाग्य विधाता <br />हे भारत माता, हे भारत माता। <br /><br />एक राह का सफर, चल रहे कई डगर। <br />एक चाह का नगर, खोज रहे सभी मगर। <br />एक धर्म का चौराहा, हर किसी के लिए दोराहा। <br />एक जीवन का सत्य, न मिले तो लगे सूर्य अस्त। <br />एक सच का रहे भान, देश के साथ मिलें है प्राण। <br /><br />एक भूमिका रहे हमेशा, छोड़ जाएं कुछ अनोखा। <br />दो इस बात का वरदान, रहे हमें देशभक्ति का भान। <br /><br />हे भारत माता। हे भारत माता। हे भारत माता।</strong><div class="blogger-post-footer">मैं foryou2005@gmail.com पर मौजदू हूं...</div>Bhavyahttp://www.blogger.com/profile/04680506436181806470noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-8144429829291861480.post-27618485194197185852008-05-20T06:39:00.000-07:002008-05-20T06:40:48.470-07:00ब्लागों का कट-कापी-पेस्टबहुत दिनों से ब्लागों की दुनिया से दूरी रही। पता नहीं क्यो। मन नहीं करता था कि किसी एग्रीगेटर पर जाकर तलाशूं कि क्या पढ़ू, क्या छोड़ू। ये अजीब सा समय है। सुबह अखबार की खबरों से लेकर टीवी समाचार तक पसरी सूचनाओं की भीड़ में खुद को तलाशना कठिन है। अखबारों के पन्ने ज्यादा होते है। वजन ही पचास से सौ ग्राम होता है। अपितु हिंदी अखबारों के पन्ने हल्के होने लगे है। टीवी पर दौ सौ चैनलों में समरूपता हावी है। खबरें, फिल्में, सीरीयल्स सब एक ही पन्नी में लपेटे लगते है। ब्लाग पर लेखन से एक विविधता के दर्शन होते थे। लेकिन क्लिकर्स की भीड़ खींचने के लिए यहां भी लेख, कविता, विश्लेषण के नामों को लेकर एक्सक्सूजिविटी दिखने लगी है। ये बीमारी है। हर कोई भीड़ खींचने के लिए अनोखे, विडंबना भरे शीर्षकों को चेप रहा है। ये कट कापी पेस्ट जैसा लगता है। <br /><br />ब्लाग की ताकत भाषा है। यानि कि वो आधार जिसके बल पर उसे रचा जा रहा है। हिंदी एक व्यावसायिक भाषा नहीं है। इसका अंदाजा साहित्यधर्मियों से लेकर आईटी प्रबंधकों को बेहतर है। आज ही पढ़ा कि देश में पांच करोड़ इंटरनेट उपभोक्ता है। इनमें से चार करोड़ शहर में, नब्बे लाख गांवों में। इसी सर्वेक्षण में था कि अंग्रेजी के इस्तेमाल में इसमें 23 से 49 फीसदी लोग जुटे है। यानि कि इंटरनेट की भाषा है अंग्रेजी। <br /><br />अंग्रेजी भाषा में जो ब्लाग अति लोकप्रिय रहे, वो किसी न किसी माहौल के कारण जाने जाते रहे। चाहे चीन की एक अभिनेत्री का ब्लाग हो या अफ्गानिस्तान के एक भुक्तभोगी का ब्लाग। इनमें रहस्य और प्रस्तुति के पूरे साजोसामान थे। और था मानव उत्सुकता का इंतजाम। ये बात अभी तक हिंदी ब्लागरों में नजर नहीं आती। वो किसी प्रकार से विश्व को कुछ अनोखा नहीं बता रहे है। मैं रामचरितमानस, और अपने प्राचीन वांग्मय के लिए हिंदी ब्लागरों को साधुवाद देता हूं। लेकिन क्या तकनीकी के इस्तेमाल से उन्हे आडियो प्रस्तुति के लिए तैयार करने की जरूरत पर जल्द से जल्द विचार नहीं होना चाहिए। जिससे वो पढ़ने की जहमत के बचने वालों के लिए भी लुभावने हो। <br /><br />आज भी हम इंटरनेट को नया अनोखा, तात्कालिक शोध, खोज और व्यक्तिगत सूचना के लिए ही ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल करते है। ऐसे समय में जब समय देने के लिए एक मूल्य चुकाना पड़े, तो किसी का सामान्य लिखा पढ़ना समय और पैसे दोनों की फिजूलखर्ची सरीखा होगा। ये ध्यान रखें कि मध्यमवर्गीय शहरों में साइबर कैफे पर वक्त बिताने वाला युवक चाहता है अनोखा और मनोरंजक। <br /><br />एक ट्रेंड का पीछा करके बीते वक्त में कई अनुत्पादक ब्लगों की एक झड़ी सी देखने को मिलती है। मीडिया की कलई खोलते, अपनी मन की पुकार वाली कविताएं, कई समस्याओं पर बहुकेन्द्रित ब्लाग, अनावश्यक सूचनाओं वाले ब्लाग, ऐसे तमाम प्रयासों की सचाई है कि वे आज भी तलाश रहे है पाठक। पाठक की रूचि को भांपना शायद सबसे बड़ी चुनौती है। सभी माध्यमों के लिए। <br /><br />जारी रहूंगा.... <br /><br />'भव्य'<div class="blogger-post-footer">मैं foryou2005@gmail.com पर मौजदू हूं...</div>Bhavyahttp://www.blogger.com/profile/04680506436181806470noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-8144429829291861480.post-14692441614849043382008-01-11T07:26:00.000-08:002008-01-11T07:33:42.566-08:00"चजइ"- "क्या खुद को जानना है"?अपने को जानने समझने के लिए अब तक भारतीय परंपरा में ध्यान ही सबसे बड़े माध्यम के तौर पर देखा जाता रहा है। लेकिन हाल के सालों में बाजार में आ गई है स्व-विकास, स्व- मूल्यांकन और लाइफ और प्रोफेशनल मैनेजमैंट की हजारों किताबें। तो क्या है इन किताबों में, जो दिखा रहा है हर सफल-असफल इंसान को एक सपना। थोड़ा पीछे चलना होगा। व्यक्ति को उसके व्यवहार में कुशल और आसपास ज्यादा चर्चा दिलाने के लिए 1937 में <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Dale_Carnegie">डेल कार्नेगी</a> ने लिखी एक किताब। <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/How_to_Win_Friends_and_Influence_People">हाऊ टू विन फ्रेंड्स एंड इंफ्लूएंस पीपुल्स। </a>इस किताब को पढ़कर आप ये जानेंगे कि कुछ चीजों को अपनाकर आप कैसे जीततें है अपने का मन। और कुछ चीजों को बरत कर आप हो जाते है चर्चित।<br /><br />ये तो महज एक शुरूआत थी। इस किताब की अपार सफलता के बाद, तो मानो इंसान की सबसे बड़ी ललक को भुनाने के लिए छपीं थड़ाथड़ किताबें। वैसे पश्चिमी देशो में लोगों को अमीर बनाने वाली नेपेलियन हिल और स्वेट मार्टिन की किताबें मौजूद थी। लेकिन इंसान को अमीर बनाने की चाहत को भुनाने की इस कड़ी के बाद जोर व्यक्तित्व विकास को बेहतर बनाने पर रहा। भारत में इसे लेकर जो चर्चा छिड़ी, वो <a href="http://www.blonnet.com/2001/11/12/stories/211209dm.htm">यू कैन विन</a> से परवान चढ़ी। इस किताब में सैकड़ों किस्से थे, जो इंसान की क्षमता और चाहत के बीच एक पुल बना रहे थे। इसने वो कर दिखाया, जो तब वक्त की जरूरत थी। यानि कि जागरूकता। अपने अंदर छुपे गुणों की। उनको खोजने की। और ये एक हद तक नैतिक ज्यादा रही।<br /><br />लेकिन ये खोज ज्यादा आगे नहीं बढ़ पाई। किताब में किस्सागो बेहतर था, लेकिन आज के युवा और व्यस्त भारत ने इसे पढ़कर किनारे रख दिया। नैतिकता से क्षमता के नाते को समझाने में ये किताब नाकामाब रही। मैनेजमेंट शायद सबसे बड़ी रूकावट थी। हर कहीं ऐसा कारीगरों, या कहें कि प्रोफेशनल्स की जरूरत थी, जो प्रबंधन कर सकें। लेकिन भारतीय विकसित कामगारों के पास निजी जीवन से व्यवसायिक जीवन तक किसी तरह का खास प्रबंधन नहीं था। वे अनुशासित या अनुशासित तो थे, पर विचारों की गढ़ी-पढ़ी श्रंख्ला से कैद नहीं। वे नियम बनाने में यकीन तो रखते है, लेकिन जरूरत पर उन्हे तोड़ने में गुरेज नहीं करते। सो अमीर बनाने के ख्वाब, नैतिकता के क्षमतावान सबक, सब पीछे छूटे रह गए। नया मंत्र था मैनेजमेंट।<br /><br />हर संभव कोशिश की बड़े पदों पर बैठे, प्रबंधन स्कूलों में पढ़ाने वाले अध्यापकों और पालिसी के क्रियांवित करवने वालों ने। इस तरह की किताब छापी जाए कि वो किसी तरह माहौल को बनाए। एक ऐसा माहौल जो अपने आप कारीगर पैदा कर दे। कठिन सोच। लेकिन <a href="http://harvardbusinessonline.hbsp.harvard.edu/hbsp/index.jsp;jsessionid=OH3GX3GINGIE2AKRGWDR5VQBKE0YIISW?_requestid=14179">हार्वर्ड बिजनेस रिव्यू </a> <a href="http://www.gallup.com/">गैलप</a> जैसी तमाम बड़ी शोध संस्थओं ने समय समय पर शोध के बाद मैनेजमेंट से जुड़ा अपने अपने निष्कर्ष दिए। ये कहीं न कहीं किसी एजेंडा को फैलाने या एक निजी शोध के बखाने वाले रहे। मैनेडमेंट के जमीनी सिद्धांतों को या तो किसी कंपनी की सफलता के बाद या किसी नई कंपनी में किसी फार्मूले को अपनाने के बाद कारगर माना जाता है। तो ऐसे में किसी नए उद्यमी के लिए इनके बल पर निवेश की कोशिश हमेशा से कमजोर दांव मानी गई। <br /><br />लेकिन मैनेजमैंट के खिलाड़ी इसे तोड़ तोड़ कर हर अंग को पेश करने लगे। अंग। यानि स्ट्रक्टर, इंफ्रास्ट्रक्टर, ह्यूमन रिसोर्स, वर्किंग एनवायरमेंट, पालिसी, और किसी भी कंपनी की रीढ़ यानि कि इम्प्लाई के स्ट्रेंथ को बढ़ाने के फार्मूले। आज जिस चीज पर सबसे ज्यादा फोकस है वो है आपकी क्षमता। इसके लिए ये जरूरी है कि आप जानें कि आप में क्या क्या गुण है, आप की अच्छाईयां और बुराईयां क्या है। और क्या आप अपनी क्षमता का पूरा उपयोग कर पा रहे हैं। इसके लिए बीते सालों में कई किताबें छपी। लेकिन जिस सीरीज को <a href="http://www.economist.com/">द इकानामिस्ट</a> ने भी सबसे बेहतरीन माना है, वो है गैलप के साथ <a href="https://www.strengthsfinder.com/">स्ट्रेंथ फाइंडर</a> की। इस सीरिज के तहत बाजार में छह किताबें उतर चुकी है। और अगर गौर करें तो इनमें सबसे ज्यादा प्रभावी रही <a href="http://www.marcusbuckingham.com/books/discover-strengths.php">नाऊ डिस्कवर योर स्ट्रेंथ</a>। मार्कस बकिंघम की इस किताब में वो सब लिखा है, जिसका आपको निजी और व्यवसायिक जीवन में काम पड़ता है। <br /><br />लेकिन क्या पढ़ कर और कभी कभी उसे अपनाकर आप सफल हो सकते है। ये इसपर भी निर्भर करता है कि सफलता आपके लिए क्या मायने रखती है। कभी कभी पद या पैसा वो सब नहीं देता, जो मन का काम करना देता है। ज्यादा जरूरी है कि आप ये जाने कि आप कैसे वयक्ति है। इसके लिए तमामा शोध हुए। जिस एक <a href="http://www.authentichappiness.sas.upenn.edu/Default.aspx">शोध को आप अपना सकते है</a>, वो किया है यूनिवर्सिटी ऑफ पेंसिल्वेनिया ने। आथेंटिक हैपिनस सिरीज के तहत इसे नाम दिया गया <a href="http://www.authentichappiness.sas.upenn.edu/Default.aspx">वाया सिग्नेचर स्ट्रेंथ क्वेश्चनेयर</a>। आप यहां पर जाकर, अपने आप को एनराल कराकर पा सकते है वो चौबीस गुण, जो 240 सवाल के मल्टिपल जबाव के बाद आता है। ये मानक तो हो ही सकता है। दरअसल कई सालों के बाद की रिसर्च के बाद ये सवाल आपको ये बता पाने में सफल होते है कि आपके पांच प्रभावी गुण क्या है और इक्कीस अन्य गुण।<br /><br />खैर। खुद को मानसिक और व्यावहारिक तौर पर संवारने की इस कवायद में हम आप न भी लगे हो, तो भी खुश रह सकते है। क्योंकि किसी न किसी तौर पर हम आप करते वहीं है, जो हमें थोड़ा बहुत संतुष्टि देता है। <br /><br />---------------<br /><strong>भव्य </strong>foryou2005@gmail.com<br /><br /><a href="http://chittha.chitthajagat.in/2007/12/blog-post_31.html">"चजइ"</a><div class="blogger-post-footer">मैं foryou2005@gmail.com पर मौजदू हूं...</div>Bhavyahttp://www.blogger.com/profile/04680506436181806470noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-8144429829291861480.post-84580262596674422142007-08-23T06:00:00.000-07:002007-08-23T06:07:07.922-07:00A chapter on Media Law & Ethics.Hello, <br /><br />Big things happen rarely! It’s a big achievement for me to be on paper! I wrote a “chapter on electronic media ethical issues” and it got published in a book, it’s a dream come true for me……I share the Preface and Content with u all….Need your insights for a future, which is very dedicated to electronic media.<br /><br />Bhavya<br /><br />http://cyberjournalist.org.in/medialaw.html<br /><br />http://bhavyakiduniya.blogspot.com/<br /><br />Books<br /><a href="http://bp0.blogger.com/_m7ljgYpywK0/Rs2FskNPcxI/AAAAAAAAABc/HYiLpbWgGe0/s1600-h/media+law.bmp"><img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://bp0.blogger.com/_m7ljgYpywK0/Rs2FskNPcxI/AAAAAAAAABc/HYiLpbWgGe0/s200/media+law.bmp" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5101880953560593170" /></a><br /><br /><strong>Media Law and Ethics: Readings in Communication Regulation</strong><br /><br />Edited by<br />Kiran Prasad<br /><br /><br />2007; ISBN 81-7646-604-2; Pp xxviii + 457; Rs. 1200 (HB)<br />B.R. Publishing Corporation, BRPC (India) Ltd,4737 A/23, Main Ansari Road, Darya Ganj, New Delhi – 110002.<br /><br />There are many books on media law and communication ethics, but today journalism and communication studies are being transformed by new media and communication convergence. This book tries to unravel the complication<br />and updates the curriculum on communication regulations. This book is designed keeping in mind the UGC Core Curriculum for the course Media Law and Ethics offered at the Masters Degree for students of Journalism, Mass Communication, Electronic Media, Public Relations and Advertising Studies in the Indian Universities. <br /><br />Every journalist and journalism student - from the traditional print media to the modern convergent media - should know the legal and ethical aspects of publishing a story. There are two main aspects of media regulations: 1) media laws about the publication of a story which may relate to libel and defamation; and 2) media laws about permissible comments on legal proceedings which include contempt of court. <br /><br />A journalist must also make ethical choices about each story apart from its possible legal implications. This book examines not only the laws governing the media but also ethical issues in everyday journalism. The chapters in the book have focused on the existing challenges in communication regulations and also throw light on the emerging ethical concerns in the global media environment.<br /><br />BACK Home <br /><br />Content<br /><br />Preface<br />Editor and Contributors<br /><br />Theoretical Foundations of Communication Regulations<br /><br />1. Freedom, Regulation and Ethics: Market, State and Media Accountability System - Claude-Jean Bertrand <br />2. Communication and Values - Kiran Prasad<br />3. A Theory of Media Ethics: Foundation and Key Issues - Kiran Prasad<br />4. Satellite Broadcasting Regulation and Cultural Exception: An Arab Islamic View of Communication <br />- Basyouni Ibrahim Hamada<br /><br />Press and Broadcasting Regulations<br /><br />5. Laws and Regulations Governing Press Freedom in India<br />- P. E. Thomas<br />6. Laws and Regulations in Indian Broadcasting<br />- G. Nagamallika<br />7. Foreign Direct Investment in Print Media: Legal and Ethical Issues –<br />- Roy Mathew <br />8. Freedom, Individualism and Ethical Behaviour: A Comparative Study of Print and Electronic Media Journalists <br />- Kiran Prasad<br /><br /><strong>9. Electronic News Media and Emerging Ethical Issues -<a href="http://foryou2005.googlepages.com/">Bhavya Srivastava </a<a href="http://foryou2005.googlepages.com/">>(http://foryou2005.googlepages.com/)</a></strong>New Media and Content Regulations<br /><br />10. The Legal Capture of New Media Technology<br />- Lawrence Liang<br />11. Indian Cyber Laws<br />- Umesh Arya<br />12. Cyber Journalism: Legal and Ethical Issues<br />- Pradeep Nair<br />13. All Rights Reserved?: Cultural Monopoly and the Troubles with Copyright in the Age of the Internet <br />- Michael Geist <br />14. Pornography and Women’s Sexuality in the Legal Web <br />- Kamayani Bali Mahabal <br />15. Protecting Minors against Harmful New Media Content: Perspectives on Content Regulation in the Digital Media <br />- Eva Lievens<br /><br />Regulations in Functional Communication<br /><br />16. Emergency and Censorship: The dark side of Indian Democracy<br />- Shaju P.P<br />17. Media and Legislative Privileges: A Case Study<br />- Nirmaldasan<br />18. Regulatory Challenges and Ethical Issues in Public Relations and Advertising <br />- Waheeda Sultana <br />19. Right to Information and Communication Regulations in India <br />- Kiran Prasad<br /><br />About the Editor: Kiran Prasad is Associate Professor in Communication and Journalism, Sri Padmavati Mahila University, Tirupati, India. Recently she was awarded the Commonwealth Academic Staff Fellowship and was Visiting Research Fellow at the Institute of Communication Studies, University of Leeds, UK. She was Canadian Studies Research Fellow at the School of Journalism and Communication, Carleton University, Ottawa, Canada. She is also the youngest ever recipient of the ‘State Best Teacher Award’ for university teachers from the Government of Andhra Pradesh, India. A prolific writer and well known Indian communication philosopher, she is author/editor of over fifteen books. Her theoretical contributions include a conceptual model of Ethics Affecting Variables (EAV) in Communication; an analytical framework and conceptual model on Media Policy Affecting Variables for the implementation of media policy in the developing countries; and a conceptual model on Voting Behaviour Affecting Variables in Political Communication Campaign. She has specialized in several branches of communication and has successfully guided doctoral degrees in communication and journalism. She can be reached at kiranrn_prasad@hotmail.com; kiranrn.prasad@gmail.com<br /><br />Also from the same author: Information and Communication Technology-Recasting Development<div class="blogger-post-footer">मैं foryou2005@gmail.com पर मौजदू हूं...</div>Bhavyahttp://www.blogger.com/profile/04680506436181806470noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-8144429829291861480.post-35755418064013644322007-08-22T06:00:00.000-07:002007-08-22T06:02:49.537-07:00नगर नगर एक सफर - भाग 2अलीगढ़ में रूकना कुछ ही घण्टे रहा। सो जानने समझने का पूरा वक्त मिल नहीं पाया ।आगे एक ऐसे शहर को जाना था, जहां रेल नहीं जाती है। मैं पूर्वोत्तर राज्यों या जम्मूकश्मीर में नहीं, अपने राज्य उत्तर प्रदेश के एक नगर की बात बता रहा हूं, जहां रेल नहीं जाती। <br /><br />एटा। एक ऐसा शहर जिसके बारे में आप किसी भी पूर्वी उत्तर प्रदेश के बाशिंदे से पूछेंगे तो वो कहेगा, हां एटा, वो तो इटावा के पास है कहीं। जैसे शहर का दूसरा मोहल्ला हो। लेकिन वो ये भी बताने में सक्षम नहीं होगा कि इटावा कहां है। <br /><br />एटा, जिला है। जो आगरा डिवीजन में आता है। इसके उत्तर में बदायूं, पश्चिम में अलीगढ़, हाथरस, मशुरा और आगरा, दक्षिण में मैनपुरी और फिरोजाबाद और पूर्व में फर्रूखाबाद बसा है। तो मैं एटा जा रहा था, पश्चिम में बसे अलीगढ़ से। यहां से एटा जाने के लिए कई साधन थे। सभी सड़को पर चलने वाले। जाहिर है एक जागरूक नागरिक के तौर पर मैने सरकारी बस को ही चुना। क्योंकि दस बीस मिनट की जल्दी के लिए मैं किसी जीप या गाड़ी में दब कुचलकर सौ की गति से उड़ते वाहन में बैठने का जोखिम नहीं लेना चाहता था। <br /><br />बस ड्राइवर के पीछे की सीट पर बैठा। और गाड़ी ने गति पकड़ी। रोड़ काफी खराब थी। लेकिन मन खिड़की से आती हवा के साथ बहने लगा। रास्ते में एक ढाबे पर बस रूकी। अनाधिकृत तौर पर। पर ये चलता है साहब। आप भारत में सुविधा से ज्यादा चलने को तरजीह देते है। सो हम उतरे। लघुशंका आदि के बाद जो चाय सुड़की गई, वो भारत में बनी बढ़िया चाय को मात देती मालूम होती थी। चाय पीने का शौक है। सो दो गिलास पी ली। केवल चार रूपए में। वैसे दिल्ली की सैकडों की चाय भी अब मंहगी नहीं लगती। शौक जो है।<br /><br />बस चली। ग्रांड ट्रंक रोड। जिसे शेरशाह सूरी ने बनावाया। सोलहवीं शताब्दी में बनी एक विशाल पथ। जो बंगाल के सोनारगांव से आगरा के सासाराम तक बनी थी। शेरसाह सूरी के गुजर जाने के बाद इसका विस्तार हुआ। आज ग्रांड ट्रंक रोड ढाई हजार किलोमीटर की दूरी पर पसरी है। <br /><br />पर जिस ग्रांड ट्रंक रोड पर ये बस गुजर रही थी, वो देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश से गुजर रही थी। यानि कि इसे भी इसका गुमान होना ही था। सो बड़े गड्ढ़ो, सड़क हिचकोले खाती बस में हमें रास्ते का अहसास हो गया। बेहद ही खराब थी ये सत्तर किलोमीटर का रास्ता। <br /><br />खैर एटा पहुंचा। एटा में छह तहसीलें है। तहसील यानि जिले को प्रशासनिक तौर पर नियंत्रित करने के लिए एक ईकाई। हर तहसील का एक प्रशासनिक प्रभारी होता है, जो राज्य लोकसेवा आयोग से चुना जाता है। जिसे उत्तर प्रदेश में पीसीएस कहते है। वो तहसील का प्रशासनिक काम देखता है और उपजिलाधिकारी होता है। <br /><br />एटा में जो सबसे प्रचलित शब्द है, वो है पकड़। यानि माल जब्त करना नहीं। बल्कि आपका अपहरण। उत्तर प्रदेश के पश्चिमी जिलों में अपराध ज्यादा है। वजह जमीन और राजनौतिक हस्तियों की दखल है। मैने एक जानने वाले से जाना कि पकड़ की कीमत क्या है। यानि फिरौती का हिसाब क्या है। <br /><br />चौंकिएगा नहीं। क्योंकि ये आपके जीडीपी या पर कैपिटा इनकम से नहीं समझ आएगा। आपको इसके लिए देश के गांवों में जाकर एक समय का राशन खरीद कर खाना होगा। या शहर में दिहाड़ी पर जीते लोगों का जीवन समझना होगा। पकड़ एटा में आए दिन का बात है और पकड़ से छूटने की कीमत भी आम दिन की जद्दोदजहद के बराबर। यानि किसी पकड़ की कीमत दो हजार है तो किसी की एक साइकिल या भैंस।<br /><br />लेकिन ये काफी है देश के हालात को समझने के लिए। जहां मुबई में एक जवान की मौत के पीछे दो करोड़ की फिरौती की बात है तो, भारत के एक जिले में उसकी जान की कीमत है मात्र दो हजार रूपए। ये असंतुलन बताता है कि देश में दरार कितनी बड़ी है। <br /><br />मैं एटा दो दिन रहा। निजी काम था। हो गया। आगे का सफर करना था। आगरा पहुंचना था। आगरा गए सालों हो गए थे। ताजमहल को देखने की तमन्ना थी। सो रहिएगा साथ। दिखाता हूं आपको ताज का एक नया चेहरा।<div class="blogger-post-footer">मैं foryou2005@gmail.com पर मौजदू हूं...</div>Bhavyahttp://www.blogger.com/profile/04680506436181806470noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-8144429829291861480.post-67188805684516239922007-08-17T08:50:00.000-07:002007-08-17T08:52:49.835-07:00नगर नगर एक सफर....बीते दिनों पश्चिमी उत्तरप्रदेश के कुछ शहरों में जाना हुआ। खासकर आगरा। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जिले उतनी ही दूरी पर बसते है जितनी दूरी पर द्वारका से आनंदविहार या कल्याण से छत्रपति शिवाजी टर्मिनल आने में लगते है। यानि एक घण्टे में एक जिले में तो दूसरे घण्टे में दूसरे जिले में। शुरूआत अलीगढ़ से हुई। <br /><br />सुबह के चार बजे है। दिन पंद्रह अगस्त। मैं अलीगढ़ में हूं। ये शहर अपनी संजीदगी और सरगोशी के लिए पहचाना जाता है। यहां के माहौल में तनाव बना रहता है। कुछ बना बनाया तनाव। लेकिन अलस्सुबह आजादी की साठवीं वर्षगांठ पर शहर की सड़को पर एक परछाई थी। ज्यादातर घरों, दुकानों पर झालर लटकी थी। जिससे चकमक चकमक रोशनी सड़को पर उजाला और अंधेरा कर रही थी। अलीगढ़ के स्वभाव की तरह। <br /><br />सुबह सुबह मुझे जो दिखा, वो हर छोटे शहर में सुबह देखा जा सकता है। रेलवे स्टेशन के बाहर जिंदगी जिंदा थी। चाय पी कर आगे बढ़ा। तो देखा कि दिन की ही तरह हर निकलने वाले को अपनी ओर खींचने वाले रिक्शेचालक पूछ रहे थे कि कहां जाएंगे। मन खट्टा हो चला है। क्या हर शहर में पता होना जरूरी है। मेरा सफर लम्बा था।<br /><br />मैं बाहर आकर, रिक्शों वालों को छोड़ता हुआ। पैदल ही बढ़ गया। रेलवे स्टेशन के आगे से बाई तरफ जाकर मैं चलता गया। सड़को सूनसान थी। मकानों, दुकानों पर सजे झालर रोशनी की आंखमिचौली खेल रहे थे। मैं भी आंख ही मिचमिचा रहा था।<br /><br />जैसा अलीगढ़ के बारे में हमेशा सुनता आया था, उससे अलग अहसास हो रहा था। शांत और सुकून भरा। आज के दिन का अहसास भी माहौल को अलह बना रहा था। पन्द्रह अगस्त। देश को आजाद हुए आज साठ साल हो गए। और अगर इस चीज को समझना हो तो अलीगढ़ से बेहतर क्या होगा।<br /><br />दिन आगे था। मेरे पास केवल कुछ समय था, शहर समझने को। एक खुलती दुकान पर बैठकर मैने चाय की इच्छा जताई। उसने कसमसाते हुए कहा कि थोड़ी देर लगेगी। मैने कहां कोई बात नहीं। बैठा रहा। फिर चाय वाले ने कहां कहां से आए है। मेरे हाथ में बैग था। और भारत में ये यात्री होने की पहचान है। <br /><br />बात आगे बढ़ी। पता चला कि चायवाला अलीगढ़ की मूल निवासी है। पिता की परंपरा को आगे बढ़ा रहा है। अलीगढ़ के इतिहास से लेकर आज तक सब बताया। मैने पाया कि भले ही इस शहर में सांप्रदायिक तनाव रह रह कर आता जाता रहता हो, लेकिन सदभाव की मिसाल इस शहर ने भी कायम कर रखी है। राजनैतिक तौर पर तो ये साफ दिखता है। अलीगढ़ की सात विधानसभा सीटों में से छह पर हिंदू प्रतिनिधि चुने गए है। जिनमें से दो तो भाजपा है। ये अलग बात है कि शहर की कमान समाजवादी पार्टी के पास है। <br /><br />चाय पक चुकी थी। छानी जा रही थी। तलब बढ़ गई थी। अमर उजाला अखबार आ चुका था। देश की आजादी की साठवीं वर्षगांठ की खबरें थी। लोकल पन्नों में हिंसा भी खबरों में थी।<br /><br />मेरा सफर आगे बढ़ना था। सो इस शहर में मेरा समय पूरा हो चुका था। <br /><br />आगे जारी रहेगा....<div class="blogger-post-footer">मैं foryou2005@gmail.com पर मौजदू हूं...</div>Bhavyahttp://www.blogger.com/profile/04680506436181806470noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-8144429829291861480.post-48673312110415856792007-07-03T06:55:00.000-07:002007-07-04T01:56:25.603-07:00नीली पीली बसों का खौफ<a href="http://bp3.blogger.com/_m7ljgYpywK0/RopV41Y4sCI/AAAAAAAAAA8/-2hOfYt_uPY/s1600-h/Buses-Delhi.jpg"><img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://bp3.blogger.com/_m7ljgYpywK0/RopV41Y4sCI/AAAAAAAAAA8/-2hOfYt_uPY/s200/Buses-Delhi.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5082969564333518882" /></a><br />दिल्ली में चलना है तो सभंलना जरूरी है। और अगर सड़क पर किसी ब्लूलाइन बस के आस पास है तो दूरी जरूरी है। सरकार भी दूरी के फार्मूले को अपना रही है। आज ही दिल्ली सरकार की मुखिया ने कहा कि धीरे धीरे सड़कों पर से साढ़े चार हजार ब्लू लाइन बसों को हटा दिया जाएगा। तो मुसाफिर चलेंगे कैसे। इसके लिए होंगी। हाई कैपेसिटी लो फ्लोर बसों को इनकी जगह लगाया जाएगा। तो यानि दिल्ली को इस रौंदती आफत से निजात दिलाने के लिए करोड़ो खर्च होंगे। <br /><br />क्यों ब्लू लाइन बस वाले नहीं मानते कि उनसे ऊपर सड़क पर कोई है। क्यों वे एक चक्कर को कम समय में पूरा करना चाहते है। इस देश में करोड़ों लोगों को दिल्ली की इस खतरनाक पीली नीली बस में सफर करने का मौका नहीं मिला होगा।<br /> <br />दरअसल सड़को पर नम्बर रूटों से दौड़ने वाली ब्लू लाइन बसों को एक दिन में चार से पांच चक्कर लगाने की अनुमति होती है। लेकिन इससे न तो रोजाना का खर्चा निकलता है और न ही थानों में दी जाने वाला सुविधा शुल्क।<br /><br />तीन हजार बसें रोजाना लाखों लोग को दिल्ली के एक कोने से दूसरे कोने तक ले जाती, ले आती है। इनका किराया भी दो, पांच सात और दस रूपए। एक ऐसे शहर में जहां रहने के लिए मकान हजारों में हो, महीने के दौड़ भाग का किराया दौ सौ के करीब हो तो, बात अखरती नहीं है।<br /><br />दिल्ली के हर चौक से गुजरने वाली इस पीली नीला बसों के मालिक सफेद कपड़े वाले लोग है। या उनके गुमनाम रिश्तेदार। एक एक मालिक के पास 20-40 गाड़िया है। और है हर रूट के थानेदार का पर्सनल नम्बर।<br /><br />तो सुप्रीम कोर्ट की फटकार के बाद जिन चौराहों पर धड़ाधड़ चालान कट रहे थे, उनपर ही कैसे बसें लोगों पर चढ़ रही है। क्या सरकार इसे जान बूझकर बर्दाश्त कर रही है। जिससे मंहगी हाई कैपेसिटी लो फ्लोर बसों के लिए आधार बनाया जा सके।<br /> <br />ब्लू लाइन बसों के रोडाना रवैये को सुधारने के तरीके अभी भी सरकार के पास है। बशर्ते अधिकारियो की जेब में अब कागज ज्यादा और पैसे कम हो। हर ब्लू लाइन पर सरकारी ट्रेंड स्टाफ और स्पीड गवर्नर, एक ऐसी मशीन जो गति को नियंत्रित करती है, लगाकर बसों को समझदार बनाया जा सकता है।<br /><br />रही बात ट्रैफिक नियमों के पालन की तो डर अभी भी बरकरार है। लेकिन सड़कों पर नाचती ब्लू लाइन बसों का डर इस नियम के डर से ज्यादा महसूस होने लगा है।<div class="blogger-post-footer">मैं foryou2005@gmail.com पर मौजदू हूं...</div>Bhavyahttp://www.blogger.com/profile/04680506436181806470noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-8144429829291861480.post-4424195150359699482007-06-28T07:28:00.000-07:002007-06-28T07:33:47.337-07:00ब्लॉगों की एजेंसी<!--chitthajagat claim code--><br /><a href="http://www.chitthajagat.in/?claim=lzlkyl0ydonx" title="चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी"><img src="http://www.chitthajagat.in/images/claim.gif" border="0" alt="चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी" title="चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी";></a><br /><!--chitthajagat claim code--><br />क्या आपको लगता है कि ब्लाग को बाजार के करीब लाने के लिए किसी नियामक या एजेंसी की जरूरत है।<br />आपकी प्रतिक्रियाएं एक रास्ता सुझा सकती है।<div class="blogger-post-footer">मैं foryou2005@gmail.com पर मौजदू हूं...</div>Bhavyahttp://www.blogger.com/profile/04680506436181806470noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-8144429829291861480.post-28028079108849162902007-06-25T09:39:00.000-07:002007-06-25T09:43:50.504-07:00गाड़ियों के बीच दिल्ली शहर<a href="http://bp3.blogger.com/_m7ljgYpywK0/Rn_wUNHmPvI/AAAAAAAAAA0/9Ny-tn1upWQ/s1600-h/trafficlongroad.jpg"><img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://bp3.blogger.com/_m7ljgYpywK0/Rn_wUNHmPvI/AAAAAAAAAA0/9Ny-tn1upWQ/s200/trafficlongroad.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5080043134606786290" /></a><br /><br />दिल्ली में रहना है तो आपको किसी न किसी दिन जरूरत पड़ेगी रेजिडेंस प्रूफ की। रेजिडेंस प्रूफ। एक ऐसा प्रमाण पत्र जो ये बताता है कि आप भला जगह के निवासी है। इसके होने से अपने आप एक सर्वाधिकारवाद के शिकार हो जाते है। ये ऐसा पेपर है जो आपको ये बताता है आप भले ही पैदा कहीं हुए हो, पर आप अब इस शहर में कुछ भी खरीद सकते है। <strong>ये खुले बाजार में एक तरह का नियंत्रण है। ऐसा नियंत्रण जो आपको याद दिलाता है कि आप भारत के नागरिक है। </strong>नागरिक होने के भले ही एक भी कर्तव्य आप न निभा रहे हो, पर आप है एक अरब बीस तीस करोड़ के देश के एक कागजी नागरिक। <br /><br />आज सुबह से शाम के बीच दिल्ली के कई चौराहों पर भयंकर जाम मे फसने के बाद महसूस हुआ कि सच में इस शहर में बहुत गाड़ियां है। महसूस करने के लिए एक भाव की जरूरत होती है। जो संजोग से आज जगा। तो कैसे दौड़ रही है ये गाड़िया। अगर यहां रहने वाले बाशिंदे की जनसंख्या पचास लाख मानी जाए, हालांकि कहा जाता है कि दिल्ली का कोई नहीं। सब बाहर से आकर बसे है। बंटवारे के बाद पंजाबी आए, तो काम के लिहाज से बिहार और यूपी वाले। तो भी जो पिछले पचास साल से यहां है, उन्हे बाशिंदा मान ही लें, तो भी इस एक करोड़ बीस लाख वाले शहर में बाहरी जगहों से बसे है एक करोड़ के करीब लोग। ज्यादातर बीस से तीस साल के करीब से। <strong>पुराने लोगों के पास पीढ़ियों के हिसाब से गाड़ियां है। फिएट, एम्बैसडर और मारूति वाले।</strong> लेकिन जिन लोगों ने पिछले दस साल में यहां अपनी बसेरा बसाया है, वे छोटी गाड़ियों के साथ रखते है एक बड़ी गाडी़। <br /><br />इस राजधानी में कई ऐसे लोग है जिनके पास सौ पचास गाड़िया भी है। मैने सुना था कि दिल्ली में कहा जाता है कि जिससे आपकी दुश्मनी हो, उसे ट्रांसपोर्टर बनने की सलाह दे दो। सो यहां दुश्मन बहुत है। देश के इस उत्तरी शहर से कही भी जाने के लिए सड़के अच्छी है। और मुनाफा भी। <br /><br />लौटते है मूल मुद्दे पर। गाड़ी खरीदने के लिए चाहिए होता है रेजिंडेस प्रूफ। अगर मेरी जानकारी अधूरी नहीं है तो आप अगर एनसीआर, गाजियाबाद, नोएडा, गुड़गाव, फरीदाबाद, में रहते है, तो आप दिल्ली की गाड़ी रख तो सकते है, खरीद नहीं। प्राब्लम है रेजिडेस प्रूफ। तो कैसे लोग सड़को पर गाड़ियों मे अटे पड़े है। कैसे आपको आंकड़े बताते है कि इस शहर में पचास लाख गाड़ियां है। मैने कई लोगों से पूछा कि इस शहर से ज्यादा पैसा तो मुंबई और अहमदाबाद में है। तो क्या इतना बम्बार्डमेंट क्यों हैं। <br /><br />जवाब खोज रहा हूं। मैने अपनी गाड़ी खरीदी, माफ करिएगा, पेशागत मजबूरी है, पचास लाख एक होने का। हां तो गाड़ी खरीदी तो प्रूफ का पेपर कंपनी ने दिया। और दोस्तों के घर के एग्रीमेंट कागज पर गाड़ी मिल गई। शायद पत्रकार होना कभी कभी काम आता है। खैर सवाल का जवाब जानना बाकी है। आपमें में से कोई साथी या पत्रकार कुछ नया बताए तो अच्छा लगेगा। रही बात मेरी तो, वादा है कि मैं जल्द ही आपको बताऊंगा कि क्यों दिल्ली के गाड़ियों की राजधानी।<div class="blogger-post-footer">मैं foryou2005@gmail.com पर मौजदू हूं...</div>Bhavyahttp://www.blogger.com/profile/04680506436181806470noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-8144429829291861480.post-52136577300192174562007-06-21T15:11:00.000-07:002007-06-21T15:12:22.559-07:00बाजार में बिकने के लिए तैयार ब्लाग-2क्या किया जाए। कैसे बिना हाथ पांव मारे ही ब्लाग में प्रचारों की झड़ी लग जाए। रोजाना आप दो से चार घण्टे इंटरनेट से जूझते रहते है। दो चार लेखों को पढ़ते है। एक दो लिखकर छाप मारते है। और एक सामान्य ब्लागर हर घंटे ये देखने में ही बिता देता है कि कितने हिट आए औऱ कितने कमेंट। सारा फसाना इसी रूझान का है। मतलब आप अपने ब्लाग पर तो लोगों को देखना चाहते है, लेकिन आप कितना दूसरों के ब्लाग पर समय बिताते है। क्या रह रह कर आपको अपनी ओर खींचने वाले ब्लाग आपको कभी नीरस तो कभी बेकार से लगते है। क्यों। क्योंकि ज्यादातर ब्लाग चलाने वाले भी आपकी ही भावना से लिख लिखा रहे है। यानि ब्लाग चला रहे है। <br /><br />एक ऐसा ब्लाग जो आपकी रूचि से ज्यादा किसी खास वर्ग, विशेष या उत्पाद पर टिका हो, निश्चित ही सीमित होगा। लेकिन ये सीमितता मल्टीप्लेक्स वाले दर्शक जैसी है। जो अमीर है और खर्चने वाला भी। मानिए आप साफ्टवेयर इंफार्मेशन का एक ब्लाग चला रहे है, तो आपको देखना होगा कि आपकी जानकारी साफ्टवेयर जगत तक कैसे पहुंचे। इंटरनेट के संजाल पर ये आसान है। लेकिन ब्लाग की दुनिया में मुश्किल। <br /><br />दूसरा जो सबसे कारगर उपाय होगा ब्लाग को आगे बढ़ाने का वो होगा, जुड़ाव। जुड़ाव, सुविधाओं से। सुविधा, बिल जमा करने की, कर जमा करने की, टिकट लेने की, गैस की पर्ची की, और मोहल्ले की समस्या को उठाने की।<br /><br />मानिए आपके मोहल्ले में कई जन सुविधाओं की समस्या है। तो ऐसे में अगर एक ऐसा ब्लाग हो, जो रोजना किसी न किसी नागरिक की समस्या को लिख रहा हो, और इससे आप अपने शहर की नगरपालिका को अवगत कराएं कि वो कागजों के रखरखाव से ऊपर उटकर वर्चुअल सरोकार पर आ गया है। तो क्या आपको नहीं लगता कि ये सामुदायिक होगा, और मोहल्ले के छोटे दुकानदार शायद इसके लिए विग्यापन भी मुहैय्या कराएं।<br /><br />देखिए आसमान को बड़ा मत बनाइए। किसी मेट्रिमोनियल साइट, नौकरी की वेबसाइट और बड़े उत्पाद के लिंक को खोदने की चाह न आपमें है और न ही किसी नवोचर चिट्ठेकार में। सो वहां से शुरू किया जाए, जहां जगह बनानी आसान है। और इसके लिए आपका नगर, मोहल्ला, चौराहा और रिश्तेदार सबसे करीबी जरिया है, जो आपको बिन झिझके स्वीकारते है। <br /><br />दूध, सब्जी, ब्रेड, अखबार, अंडे ऐसी वस्तुए है जो आप रोज खरीदते है। और रोज की खरीदारी से जुड़ा है आपका समय। तो क्या इनके मोल तोल और इनकी मौजूदगी के बारे में बताकर आप लोगों का सीधा ध्यान नहीं खींच सकते। मुश्किल है। पर इंसानी दिमाग के आगे कुछ नहीं है जनाब।<br /><br />खैर मैं हर दिन अपने दिमाग को खोद खोद कर सोच में लगा हूं कि कैसे। कैसे हम किसी रचनात्मक अवधारणा को एक बाजार में बदल सकते है। क्या बाजार सत्य है। नहीं, दरअसल बाजार की कीमत से तय होता है आपका मूल्यांकन। और मूल्यांकन ही सत्य है।<div class="blogger-post-footer">मैं foryou2005@gmail.com पर मौजदू हूं...</div>Bhavyahttp://www.blogger.com/profile/04680506436181806470noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-8144429829291861480.post-57140941898067890912007-06-20T05:06:00.000-07:002007-06-20T05:08:50.712-07:00बाज़ार में बिकने के लिए तैयार ब्लाग-1सवाल उठता है कि ब्लाग को बाजार में बेचा कैसे जाए। क्या प्रचार की बाट जोही जाए। कि गूगल के जरिए ये इंतजार किया जाए कि वो कमाए तो हम पाएं। आज जितने भी जनसंचार माध्यम है वे अपनी कमाई के लिए बाजार के प्रचार पर पूरी तौर पर निर्भर है। और जो सीमित जनसंचार के माध्यम है, जैसे सामुदायिक रेडियो, वे केवल स्वांतह सुखाय जन हिताय से गुजारा करते है। देखा जाए तो उद्देश्य दोनों के पास है। जनसंचार के बड़े माध्यम, अखबार, रेडियो और टीवी रोजमर्रा के लिए जो पैदा करते है, उनका जीवन चलाने में जो योगदान है, वहीं सामुदायिक माध्यम का छोटे इलाकों में अनाज, पशु व्यापार और मौसम में है। तो ब्लाग का उपयोग किस लिए है। जरा खुद से पूछिए कि आप क्यों चला रहे है ब्लाग।<br /><br />जबाव आते ही आपको पता लगेगा कि आप किसी व्यवसाय के लिए ये जद्दोजहद कर ही नहीं रहे है। इसीलिए इसे कैसे बेचा जाए, ये आपको पता ही नहीं है। हां देखादेखी में आपने भी गूगल और अन्य प्रचार स्रोत लगा रखें है। आज हिंदी में ऐसे कई ब्लाग है, जो रोजाना सैकड़ों हिट पाते है। लेकिन बाजार इन सूचकांको को तव्वजों नहीं दे रहा। क्यों।<br /><strong><br />वजह है अनियंत्रित विकास। तकनीकी और बाजार में बिकने वाले उत्पादों से दूरी। और सबसे बड़ी नैतिक दिक्कत है भाषा की क्लिष्टता औऱ दुरूहता। एक एक करके आता हूं।</strong><br /><br />क्या आपने ऐसा कोई ब्लाग देखा है, जिसे आप अनोखा या विशेष कह सकें। मैं जानता हूं कि आप कहेंगे, कई है। लेकिन समझे। कविता, कहानी, किस्से,. रचनाए और तरह तरह की लेखनी को कैसे बाजार मिल सकते है, जब इस देश में हिंदी साहित्य को स्वांतह सुखाय के लिए आगे बढ़ाया जा रहा है। ब्लाग में कंटेंट क्या हो। ये तय करने से पहले ये जाने कि क्या जरूरत है आपके आसपास। आप खुद के सुख और दुख के लिए जो चाहे रचें, लेकिन बेचने के लिए चुना गया विषय ऐसा हो जिसमें आपकी रूचि कम, खरीदार की ज्यादा हो। जैसे आपके मुहल्ले में बिजली जाती रहती है। तो क्यों न आप एक स्थानीय इनवर्टर कंपनी से बात करके उसके उत्पाद के लिए और देश को बताने के लिए लिखें। ये एडवर्टोरियल जैसा होगा। लेकिन आप कहेंगे कि ये तो दलाली जैसा है। मैं विस्तार से बताता हूं। <br /><br />देश में बिजली बड़ी समस्या है। और इसके लिए गैर परंपरागत ऊर्जा सोत्रो पर निर्भरता की बात बार बार कही जाती है। आपने क्या किसी को ये बताया है कि इस नान कंवेंनशनल उर्जा के फायदे औऱ नुकसान क्या क्या है। और क्या आपने ये सोचा है कि आप केवल इस विषय पर अगर एक महीने तक लिखते रहे और फिऱ इस और किसी सरकारी या निजी कंपनी ने ध्यान दिया, तो वो आपको अपना प्रचारक मान सकती है। और फिर आप उनके लिए एक ब्लाग चला सकते है। कंपनियों की वेबसाइटें होती है। लेकिन आपके ब्लाग की लोकप्रियता औऱ आपकी सस्ती प्रस्तुति किसी भी छोटे निवेश को आकर्षित कर सकता है। <br /><br />ये सारे प्रयोग उन सभी विषयों पर किए जा सकते है, जो आपके आस पास से जुड़े है। केवल ध्यान इतना रखना होगा कि आपको पढने वाले लोकल लोग ज्यादा हो। इसके लिए सीधा सा जरिया है लोकल प्रचार। आप किसी भी दिन किसी अखबार में ढ़ाई सौ रूपए खर्च करके अपने ब्लाग को सौ पचास लोगों में पहुंचा सकते है। बाकी काम आपके ब्लाग पर मौजूद सामग्री और वर्ड आफ माउथ से हो जाएगा।<br /><br />आगे आने वाले दिनों में मैं कोशिश करूंगा कि आपको तथ्यो से अवगत करा सकूं। आपके सुझाव और सलाह इस हिंदी ब्लाग जगत को उत्पादक और उर्वरा बना सकते है। सो जारी रहिए। एक सूचनात्मक ब्लाग के साथ।<div class="blogger-post-footer">मैं foryou2005@gmail.com पर मौजदू हूं...</div>Bhavyahttp://www.blogger.com/profile/04680506436181806470noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-8144429829291861480.post-27261873115166111122007-06-19T07:19:00.000-07:002007-06-19T07:26:11.915-07:00कूड़े में ब्लाग की पेशकश बंद करिएमीडिया की नई सीमित विधा के पेंच जगजाहिर हो रहे हैं। <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Blog">ब्लाग</a>। एक ऐसा माध्यम जो यूटोपिया में ज्यादा जीता है, अपने विस्तार से पहले अनजानी व्यक्तिगत बहसों में सिमटता जा रहा है। जानते हैं क्यों। क्योंकि संवाद के जिस माध्यम को ब्लाग की दुनिया सर्वव्यापक मानती है, वो नितांत अव्यवहारिक और असंचारी है। टीवी, रेडियो या अखबार के सामने वो केवल एक दिन के विग्यापन के बराबर ठहरता है। और इंटरनेट की दुनिया में वो केवल हलचली झटके जैसा है। <br /><br />विकसित देशों के ब्लागों की अहमियत इस वजह है, क्योंकि उनके पाठक वर्ग तय है। यहां ऐसा होने के पहले ही खींचतान मची हुई है। व्यक्तिगत दुराग्रहों पर। दुनिया के सबसे मशहूर ब्लाग या तो तकनीकी पर केंद्रित है या तो वे इंसान की व्यक्तिगत जीवन की डायरी है। ऐसे में विचारधारा पर शब्दों की बर्बादी का तुक कहां ठहरता है। जिन समाजों में ब्लाग बहुत खुली हवा में नहीं लिखे जा रहे हैं, वहां भी लिखने वाले दिन प्रतिदिन की हरकतों को दर्ज करके जगह बना रहे हैं। हमने उनकी सीखी कम, किनारा ज्यादा कसा है। एक जमाना था, जब इंटरनेट पर केवल ईमेल चेक किए जाते थे। आज शहरों में ये पोर्नोग्राफी से आगे बढ़कर एकाउंट्स और मनोरंजक वेबसाइटों तक आ पहुंचा है। आज कम्प्यूटर के विश्व पन्ने पर <a href="http://www.bbc.co.uk/hindi/">बीबीसी </a>और <a href="http://ind.jagran.com/">जागरण</a> है तो <a href="http://zapak.com/">जपाक</a> और <a href="http://www.nintendo.com/">निनटेंडों</a> भी समान दखल रखते है। हमें जागना होगा। बिकता वो है जो उत्पादक होता है। यहां से उठाकर, वहां से कापी करके खबरों को चेपते रहने से कोई नया उत्पाद नहीं बनता भई। <br /><br />खैर। जिस रचनात्मकता की जरूरत आज भारत में ब्लाग को थी, वो नदारद है। आज भी सारे ब्लाग प्रचारक यंत्र या <a href="http://technorati.com/">विजेट्स</a> विदेशी कंपनियों की देन है। आज भी हमारे पास वो सामग्री नहीं है जो बाजार के सामने बिकने लायक हो। आज भी हम कविता, कहानी या बेहद जाया माने जाने वाली बहसो में पड़ है। और दुनिया में लोगों ने ब्लाग से जुड़ा एक बड़ा व्यवसाय खड़ा कर लिया। मैं बाजार के साथ खड़ा हूं। अमिताभ बिकते है, क्योंकि बाजार के उत्पादों में वे मौजूद है। आप अखरते है, तो आप रचते ही मिट जाने के लिए हैं। <br /><br />मानिए आज जो भी हिंदी ब्लाग के साथ है, वो बाजार के साथ नहीं है। क्यों। क्योंकि आपने मुफ्त में मिलने वाली एक विधा को केवल अनुत्पादक पैदा करने में लगाया है। उत्पाद वो होता है, जिसपर बाजार विमर्श करें। आपसे कहे कि ऐसा रचो यार। आप अपनी क्रियात्मकता के साथ साथ जगह भी बना पाते। लेकिन अफसोस जिससे थी नाम की कामना, वो मिट गया नाम ही नाम में।<br /><br />खैर, अभी केवल एक अर्सा ही गुजरा है। अभी तो दौर बाकी है। ब्लाग को प्रचलित करने की बजाय उसे अपने संपर्को से बेचिए। ये बेचना जमीर या ईमान बेचने जैसा नहीं है। उसे अपनी रचनात्मकता की कीमत मिलनी चाहिए। हर रचना की एक हैसियत और कीमत होती है। और फिर एक ऐसा वर्ग ढूंढिए जो आपको देखना और पढना चाहे। छोटे शहरों में ब्लाग केवल एक शब्द है। और इन्ही शहरों के लोगों को बड़े शहरों में आना है। तो क्या आपके वो जानकारी नहीं है, जो इन्हे मदद कर सके। फोकस हो करके ही आप जान सकते है कि क्या पेश किया जाए। बाकी शब्दों से रचना है तो महाभारत और रामायण रचिए। कूड़े में शब्दों को लपेटकर परोसना बंद ही करें तो बेहतर।<div class="blogger-post-footer">मैं foryou2005@gmail.com पर मौजदू हूं...</div>Bhavyahttp://www.blogger.com/profile/04680506436181806470noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-8144429829291861480.post-539089653751154192007-06-08T10:52:00.000-07:002007-06-08T10:55:42.789-07:00मैं एक पत्रकार हूं<strong>मुझे जिंदा रहना है</strong><br />मुझे नौकरी करनी है।<br />एक बार किसी बात में<br />मां ने कहा कि जीवन में ऐसा<br />करना जो नाम रोशन करने जैसा हो<br />मैने छोड़ दी एक चैन की सरकारी नौकरी<br /><br /><strong>और<br /></strong><br />अब हूं एक मोर्चे पर।<br /><br /><strong>मैं सैनिक नहीं हूं।<br /></strong>होता तो घरवाले हर हादसे पर सिहर जाते<br />पत्नी और बच्चे एक आम सी जिंदगी में बिसर जाते<br /><br /><strong>मैं अधिकारी भी नहीं।<br /></strong>होता तो घूसखोर होकर सो जाता<br />देश का खाकर परिवार को भागी बनाता<br /><br /><strong>मैं नेता भी नहीं<br /></strong>होता तो सफेदी से कालिख छुपाता<br />रोजाना वादों से दुनिया को बहलाता<br /><br /><strong>मैं अभिनेता भी नहीं<br /></strong>रोज एक किरदार में जीता<br />रोज एक किरदार को सीता<br />लेकिन रहता बिना भाव के<br />होता किसी के लिए राह का कांटा<br /><br /><strong>मैं वैज्ञानिक भी नहीं<br /></strong>सोचता और बनाता देश के लिए<br />लेकिन मेरी अहमियत खुद के लिए<br />केवल एक सामान्य समर्पित गुमनाम<br />शख्स की होती, मैं खुश न होता।<br /><br /><strong>मैं क्या हूं।<br />मैं क्यों हूं।<br />मैं कैसा हूं। </strong><br /><strong><br /></strong>पर जानते है मैं खुश हूं।<br /><br /></strong><strong><span style="font-size:130%;">मैं एक पत्रकार हूं।<br /></span></strong><br />जो, सबके लिए सोता जागता है<br />जो, आपकी चिंता को अपना बनाता है<br />जो, सबसे आपके लिए लड़ने को तैयार है<br />जो, नाम से शुरू होकर काम में खो जाता है<br />रोजाना, खास होकर मैं अब भी आम हूं।<br /><br /><strong>मैं पत्रकार हूं।</strong><div class="blogger-post-footer">मैं foryou2005@gmail.com पर मौजदू हूं...</div>Bhavyahttp://www.blogger.com/profile/04680506436181806470noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-8144429829291861480.post-3885378721143865692007-06-04T01:50:00.000-07:002007-06-04T01:57:03.823-07:00मजूर चाहिए का हजूरआज सुबह की बात है। नोएडा का लेबर चौराहा। मैं बेल के शर्बत के लिए अपनी गाड़ी चौराहे पर लगे एक ठेले पर रोकता हूं। इधर उधर देखता हूं। बेल वाले को एक गिलास देने को कहता हूं। कि अचानक एक भीड़ मुझे घेर लेती है।<br /><br />मैं नोएडा से गाजियाबाद हाइवे पर बने लेबर चौराहे, जिसका नाम ही इस वजह से पड़ा है, क्योंकि यहां रोजाना सुबह सुबह मजदूर एक लाइन में भीड़ लगाकर खड़े हो जाता है। रोजाना। ये वे मजदूर है, जो रोज कमाते है, रोज खरीदते है, खाते है, सो जाते है और दोबारा सुबह इसी चौराहे पर पाए जाते है। ये एक गुमनाम भीड़ है। जो हर शहर में मौजूद है। लेकिन सूरज ढलने के बाद से शहर की रोशनी में गायब हो जाती है। ये भवनों को बनाती है और बनने तक उसी में रहबसेरा करती है। और बनने के बाद ये उजड़ जाती है। उजड़ना, बसना इनकी फितरत नहीं, मजबूरी है। ये घुमंतु प्रजाति के भी नहीं है। ये शहरों में आसपास के गावों से आते है। कुछ अपनी जमीन से एक हजार किमी दूर है। तो कुछ एक सौ किमी। लेकिन रोजाना कमाना और उस दिन का जीवन उसी दिन बिसार देना इनकी किस्मत है।<br /><br />मैंने अपनी दोपहिया से इधर उधर देखा। अचानक भीड़ का दायरा बढ़ गया। आवाजें एक थी। मजूर चाहिए का। साहब कहां जाना है। चलिए अभी चलते है। किस एरिया में। मजूर का जरूरत है का। मैं अवाक। मैने अभी इस शहर में घर बनाने को नहीं सोचा है। सोचता हूं तो अपनी तनख्वाह और ईएमआई के जाल में घुटा महसूस करता हूं। मैने पूछा, कितना लोगे। आवाजे आई कितना लोग चाहिए। मैने कहां रेट का है। किसी ने अस्सी कहा किसी ने धीरे से पिचहत्तर कहा। मैने कहा अब तो दिन का ग्यारह बज गया है। तो भी इतना। मैं भी पूंजी औऱ श्रम के रिश्ते की जोड़ने लगा है। अरे साहब देर तक काम भी तो करेंगे।<br /><br />ये वो मजूर है, जो सुबह छह बजे से खड़े है, आज काम नहीं मिला है। घर खाली जाने से घर में चूल्हा नहीं जल पाएगा। या जलेगा भी तो बर्तन में पानी ज्यादा होगा। खाना कम। वे पेट काटना सीख चुके है। पर जेब काटना नहीं चाहते है। मेहनत करते है। पर पैसा नहीं पाते।<br /><br />क्या हम सोच रहे है। क्या हम देख रहे है। शहर के विकास ने अब बने बनाए घर खरीदने की चाहत को परवान चढ़ाया है। कौन बनवाए याऱ। या बनवाना भी है तो, ठेकेदार को दे दो। ठेकेदार, जो एक बीच का जीव है, आपके मकान और मजूर के बीच का। और बीच वाला इस देश में अमीर बहुत हो चला है।<br /><br />मैंने सबसे हाथ जोड़ा और कहां नहीं मैं तो बेल का शर्बत पीने रूका था। अभी मजूर नहीं चाहिए। आउंगा किसी दिन। एक ऐसा वायदा जो मैं पूरा नहीं करना चाहूंगा। और अगर पूरा कर पाया, तो मैं मजूर से मोल तोल नहीं करूगां।<div class="blogger-post-footer">मैं foryou2005@gmail.com पर मौजदू हूं...</div>Bhavyahttp://www.blogger.com/profile/04680506436181806470noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-8144429829291861480.post-30621687370563597192007-05-22T02:54:00.000-07:002007-05-22T03:31:49.027-07:00चिल्लर की अर्थव्यवस्थाफुटकर नहीं है। कहां से लाए चिल्लर। भईया टाफी दे दें। देश में फुटकर की एक अर्थव्यवस्था है। रेजगारी के तौर पर सिक्कों को लोग जेब में रखना पसंद नहीं करते। सो चौराहों पर खड़े हाथ फैलाए भिखारियों की चांदी होती है। भिखारी शब्द भीख मांगने से बना। लेकिन बीते दिनों पता चाला कि वे हमसे ज्यादा कमाते है, उनके फ्लैट है और वे बिन दिखाएं लखपति है। भला हो। ये भी एक तरह का सामाजिक असंतुलन है। खैर। मैं फुटकर सिक्कों पर आता हूं। गोरखपुर में आप पैंतीस रूपयों के सिक्कों के बदले पचास रूपए पा सकते है। मैं प्राचीन सिक्कों की बात नहीं कर रहा। एक रूपए और दो रूपए के नए सिक्कों को लेकर आप एक नया विनिमय का धंधा चला सकते है। आज की तारीख में जब एक और दो रूपए के नोट नजर नहीं आते, ऐसे में सिक्कों की तंगी ने शहर गोरखपुर और शायद आसपास के इलाकों में हाहाकार मचा रखा है। मैने सोचा वजह तलाशी जाए। मैने फुटकर दुकानदारों से लेकर रेस्तरां तक पता किया, सबका ये मानना था कि रेजकारी गायब हो गई है। पहले भिखारी और छोटा सौदा करने वाले सिक्कों को बड़े दुकानदारों को देकर नोट ले जाते थे, अब वे कहां अपना फुटकर सुपुर्द कर रहे है। ये रहस्य है।<br /><br />एक दिन घण्टाघर के पास मौजूद आभूषण बाजार में जाना हुआ। बीच में एक खबर में पता चला कि जब ब्यूरो आफ इंडियन स्टैण्डर्स ने देश के सैकड़ों दुकानों में सोने के सैम्पल लिए, तो केवल कुछ ही खरा सोना बेचने वाले निकले। मैने अपने घर वालो को समझाया कि वे बीआईएस छाप वाले गहने ही खऱीदे। सो मैं भी ये देखने में लगा था कि कितना सोना खरा है इस बाजार में। अचानक देखा एक ओर एक फटीचर सा आदमी एक भारी झोले के साथ बैठा था। लगा कि कोई गांव का सौदागर है बेटी की शादी के लिए जेवर खरीदने आया होगा। और झोले में सत्तू या पगड़ी रखी होगी। पर झोला बड़ा ही बेमेल सा नजर आ रहा था। फिर उसने झोले में हाथ डाला और पालीथीन के बंडल निकालने चालू किए। हर बंडल में सिक्के के ठेर थे। तकीबन पांच सौ से एक हजार की रेजगारी। मैने उत्सुकतावश दुकानदार से पूछा कि इन सिक्कों का क्या करेंगे। उसने कहा मेरी और चीजों की दुकाने है, वहां काम आएगी। मुझे यकीन न हुआ। सौ दो सौ के सिक्के समझ आते है। मैं वापस चला आया।<br /><br />मन में कौतुहल मचा हुआ था, सो शाम को अपनी दोपहिया उठाकर फिर दुकान बंद होने के समय उसी बाजार में चला आया। दुकानें बंद हो रही थी, और कारीगर वापस जा रहे थे। एक चाय की दुकान पर देखा कुछ कारीगर बतिया रहे थे। मैने अपनी गाड़ी पहले लगा दी, और धीरे से वहां पहुंचा। बातों बातों में मैने चाय वाले से कहा कि चाय पिला दो, लेकिन सौ का नोट है। उसने कहा अरे बाबू छुट्टा कहां है, सारा छुट्टा तो सोनार बटोर ले रहे है। उसने कारीगरों की ओर देखकर फींकी सी हंसी दी। मैने कहां मतलब। तो एक कारीगर जो ज्यादा बड़बोला था, बोल पड़ा। देखिए भईया सौ सोनार की एक लौहार की। पर लोहार कहां है, ई पता नहीं। मैने कहां मेरे पास तो एक हजार का रेजगारी गुल्लक में पड़ी है। उसने कहा कल लेते आइएगा, मैं सौदा करवा दूंगा। मैने कहा कैसा सौदा। उसने मुझे किनारे ले जाकर कहा कि सेठ जी लोगों को सिक्के चाहिए और आपको इसके बदले ज्यादा रकम मिल जाएगी। मेरा संशय बढ़ता जा रहा था। मैने कहां क्यों। उसने कहां किसी से कहिएगा नहीं। दरअसल सोनार लोग चांदी और सोने के आभूषणों में मिलावट कर रहे हैं। मैने कहां ये को हमेशा होता आया है। नया क्या है। उसने कहां कि वे गिलण्ट के सिक्को को गलाकर आभूषणों में मिला रहे है। ये सबसे सस्ता पड़ता है। मैने पूछा किस मात्रा में। वो बिदक पड़ा। आप सोनार है क्या। मैने कहां नहीं मैं जानना चाहता था। तभी कारीगरों ने इस कारीगर को आवाज लगा दी। और मात्रा का सवाल ठहर गया।<br /><br />लेकिन एक खुलासा मेरे सामने था। तो सोने और चांदी के बाजार में ये नई मिलावट का किस्सा था। अब आप ही तय करें कि कौन ज्यादा ईमानदार सड़क पर हाथ फैलाने वाला लखपति भिखारी या सोने चांदी में सिक्को की मिलावट वाला व्यापारी। दोनों नें सिक्कों की कालाबाजारी शुरू कर दी है। अब देखना है कि ग्राहक का सिक्का किस काम आता है।<div class="blogger-post-footer">मैं foryou2005@gmail.com पर मौजदू हूं...</div>Bhavyahttp://www.blogger.com/profile/04680506436181806470noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-8144429829291861480.post-18793205348169438502007-05-21T00:24:00.000-07:002007-05-21T00:27:26.869-07:00हाजमोला की चाय, गोरखपुर से - 2चाय मेरे हाथ में थी। नमकीन काली चाय। मन में कई तरह के स्वाद पनप रहे थे। कैसी होगी ये सड़कछाप चाय। वैसे भारत में जो सबसे शानदार चाय बनती और पी जाती है, वो सड़क के किनारे ही बनती और पकती है। तो मैने चाय वाले युवक को बिना पैसे दिए एक नया स्वाद चखने का मन बना लिया। और यकीन जानिए इस नए इरादे के लिए न तो मन तैयार था न तो जबान। खैर युवक इस बीच में अपनी बातें बताता रहा कि कैसे इस चाय से दिन की शुरूआत करने से हाजमा और गैस की दिक्कत नहीं रहती। और तो और आपका दिन भर पेट हल्का बना रहता है। अपने ग्राहकों का हवाला भी उसने दिया। वैसे जिस भी ग्राहक के बारे में वो बता रहा था, वो न तो ब्राण्ड थे और न ही अमीर। हमारे मुहल्ले में सड़क किनारे सब्जी का एक बड़ा बाजार लगता है। और उसके ग्राहक वही सब्जी वाले थे। बातों बातों में चाय वाला अपनी इस इजाद की कहानी भी बता गया कि किस तरह उसने नया सोचा और उसे बेचने में सफल रहा। हालांकि इसके पेटेण्ट के बारे में उसने सोचा भी न होगा। मैने प्लास्टिक के कप को मुंह से लगाया। मध्यम गर्म चाय का पहला स्वाद मेरे होठों से टकराया। और जबान में तीखापन छा गया। लगा जैसे आमपना को गर्म करके पिलाया जा रहा हो। लेकिन ये अनोखा था। दूसरा, तीसरा और चौथे सिप तक ये स्वाद भाता जा रहा था। कुल आठ घूंटों में चाय खत्म थी। और मैं हतप्रभ भाव से चाय वाले को देख रहा था। शिव खेड़ा की मशहूर किताब-यू कैन विन- में एक उदाहरण है। एक ठण्डी चाय बनाने और उसे प्रचलित करने की जद्दोजदह का। आज हर कैफै में कोल्ड टी बिकती है। मैं सोच रहा था कि अगर इस चटपटी चाय को उद्योग में परिवर्तित किया जाए तो बुरा न होगा। पर सवाल यही था। चाय वाले ने मुझे बताया कि पहले पहल उसने ये चाय खुद पी, परिवार को पिलाई और फिर ग्राहकों को, इस विश्वास के साथ कि, ये दवा है, पेट की चटपटी दवा। और धंधा चल निकला। अब उसे कम्पटीशन झेलना पड़ा रहा है। हमारे मुहल्ले में अब तकरीबन चार से पांच चाय वाले है। वैसे वो चाय बनाने की सामग्री नहीं बताता और चाय को हाजमोला की चाय बताकर बेचता है। लेकिन ये सच नहीं लगता। स्वाद से एकबारगी लगता है कि ये काली चाय में हाजमोला डालकर बनाई गई चाय होगी। लेकिन कुछ ऐसा मसाला भी है, जो वो नहीं बताता। ये कोक और पेप्सी जैसा राज है। उघोगधर्मिता का स्पष्ट उदाहरण वो चाय वाला अभी मेरे मुहल्ले तक सीमित है। लेकिन उसका स्वाद आज मेरी जुबान पर है। और पता नहीं कल ये हाजमोला की नई खोज न बन जाए। वैसे मैं जानता हूं कि स्वाद को बता पाना शब्दों में मुश्किल है। लेकिन यकीन जानिए चटपटी चाय का स्वाद अनोखा और अलग जरूर था।<div class="blogger-post-footer">मैं foryou2005@gmail.com पर मौजदू हूं...</div>Bhavyahttp://www.blogger.com/profile/04680506436181806470noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-8144429829291861480.post-32417711544720762022007-05-18T07:47:00.000-07:002007-05-18T07:51:03.969-07:00हाजमोला की चाय, गोरखपुर सेचाय गरम चाय। नमकीन चाय। पेट को दुरूस्त रखे चाय। हाजमोला की चाय। चौदह मई की शाम। अपने शहर गोरखपुर में शाम को सब्जी मंडी में हरियाली देख रहा था। कान में ये आवाजें पड़ी। चौंका। देखा एक मध्यम साइज की केटली में एक बीस बाइस साल का लड़का ये पुकार लगा रहा था। चलिए ये बात तो आम है। लेकिन जो शब्द वो कह रहा था, उसका चाय से नाता जोड़ना मुश्किन लगा। पेट को दुरूस्त रखे चाय। कहां बचपन से चाय पीने से गैस, कब्ज और एसिडिटी की शिकायत का राग, कहां पेट को दुरूस्त रखने वाली नमकीन चाय। हाजमोला की चाय। दिल्ली में आने के बाद, पहले हैदराबाद में था, मैने कई किस्म की चाय चखी। अपने शहर में पढ़ाई के दौरान भी कुछ मुस्लिम दोस्तों के घर नमकीन चाय भी पी। सुना गले में खराश हो तो चाय में नमक डालने से राहत मिलती है। दिल्ली में बाराखम्भा, कनाट प्लेस पर आक्सफोर्ड में बैठकर कई किस्म की चाय का लुत्फ उठाने के बाद ये नई नमकीन पाचक चाय के बारे में सुनकर कौतुहल हुआ। खैर। खासियत और भी थी। मैने कहा। एक कप पिलाओ तो। कप। कभी शहर की सड़क पर चलती बिकती दुकानों में कप मिलता है। पर आदतन कहा। नमकीन चायवाले ने भी अपने काले हो चुके झोले से एक प्लास्टिक का लम्बी थैली निकाली। तकरीबन बीस से तीस प्लास्टिक के गिलास दिखे। मानो मदारी का खेल चल रहा हो, और मैं तमाशबीन बनकर हर हरकत को जादू भरी नजरों से देख रहा था। इस सारे चाय फसाने में मैने उससे इस नमकीन चाय का इतिहास पूछ डाला। पता चला बंगाल की देन है। ऐसा वो कहता है। मैने माना तो नहीं। क्योंकि दार्जिलिंग की चाय किसने न सुनी होगी। और उसे नमकीन बनाकर पीने की कौन सोचे। खैर चाय बेचने वाला बंगाली था। या बांग्लादेशी। चाय के जिस कप या गिलास को उसने निकाला वो महज उतने ही प्लास्टिक से बना होगा जितना रोजाना इस्तेमाल की जाने आधा किलो की पालिथीन में लगता होता। वो डेढ़ इंच का गिलास था, गहराई रही होगी आपकी बीच वाली ऊंगली का आधा। यानि अगर आपने इधर पूजा के बाद प्रसाद के तौर पर चरणामृत खाया, होगा, तो आपको बताए गए गिलास या कप का अंदाजा होगा। खैर चाय दो घूंट थी। क्या ये बेचने की रणनीति थी। कि अगर किसी को न भी पसंद आए तो वो मुंह भी न बिचका पाए। हाथ में चाय का कप थामने के बाद एक पंच सितारा रेस्तरां में करीने से पेश की जाने वाली शराब के पैग का ध्यान आया। एक सौ दस मिली एक पैग में शीशे के गिलास से। और काकटेल में तीन या चार तरह के पेय। वैसी ही गिलास से मिलाए जाते है। वो पेश करने की तरीका ही आपकी प्यास और ललक बढ़ा दे। लेकिन गोरखपुर के मोहद्दीपुर मोहल्ले के इस युवा के हाथों से पकड़ी चाय थामने में और हलक से उतारने दोनों में कठिनता महसूस हो रही थी। दिमाग में तरह तरह के संशय। और चाय के पिछले लिए गए स्वादों की महक और याद। लेकिन सोचा, नया लेकर तो देखा जाए। मैने सारी सोच को किनारे रखते हुए पहला सिप लिया। एक अजब सा स्वाद। ये बताना जरूरी है कि ये आपकी लाल या धूसर रंग की चाय नहीं थी। ये काली चाय थी। शुद्ध असमी चाय जैसी। यानि मेरे हाथ में थी, एक नमकीन काली चाय। ज्यादा लिख गया। लेकिन मेरे पास लिखने को अभी काफी कुछ है। लेकिन इस सबके बारे में कल...तब तक आप अपनी प्रतिक्रियाओं से ये बताइए क