tag:blogger.com,1999:blog-7846541619202827516.post-21027999919675027972007-05-26T19:58:00.000+05:302007-05-26T19:58:44.904+05:30चोरी करनी है!<a href="http://bp3.blogger.com/_-4i8e8NuuM4/RlhDbMOFL7I/AAAAAAAAAD8/414FBwC26IY/s1600-h/trek.palong3"><img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5068875515021307826" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" src="http://bp3.blogger.com/_-4i8e8NuuM4/RlhDbMOFL7I/AAAAAAAAAD8/414FBwC26IY/s200/trek.palong3" border="0" /></a><br /><div><br /><div><br /><div><br /><br /><div> </div><div> </div><div>यार कोई तरक़ीब बता</div><div>तरक़ीब बता,</div><div>पच्चीस पैसे की जुगाड़ की।</div><div>वो वाले पच्चीस पैसे,</div><div>जिसकी चार संतरे वाली गोलियाँ आती थीं।</div><div>तरक़ीब बता,</div><div>चोरी करनी है!</div><div>अपने ही घर में कटोरी भर अनाज की...।</div><div>आज सपने में भोंपू वाली बर्फ़ बिकी थी!</div><div>मुझे 'पीछे देखो मार खाई' वाले खेल </div><div>दोबारा खेलने हैं...</div><div>जानी-अनजानी गोदों को,</div><div>अंकल,आण्टी,चाचा, ताई,मौसी,</div><div>दीदी,मामा,नाना,दादा,दादी कहना है।</div><div>यार क्या इतना बड़ा हो गया हूँ,</div><div>कि रोज़ काम पर जाना पड़ेगा?</div><div>ट्यूशन वाले मास्टर जी का काम नहीं किया है,</div><div>' आज फिर पेट दर्द का बहाना बना लूँ॰॰॰'?</div><div>ये रोज़-रोज़ के प्रीतिभोज बेस्वादे हैं।</div><div>अगली रामनवमी का इंतज़ार करूँगा।</div><div>खूब घरों में जाऊँगा 'लांगुरा' बनकर।</div><div>खूब पैसे मिलेंगे तब...</div><div>शाकालाका वाली पेंसिल खरीदकर </div><div>चिढाऊँगा दोस्तों को।</div><div>वो 'जवान' है, </div><div>नज़रें चुरा लेती है।</div><div>चल उससे बचपन वाली होली खेलते हैं,</div><div>यार चल कुछ 'सद्दा' लूटें॰॰</div><div>मुझे पतंग उड़ानी है॰॰॰॰।</div><div> </div><div><a href="http://kaviparichay.blogspot.com/2007/05/blog-post_12.html">देवेश वशिष्ठ'खबरी'</a></div><div>9811852336</div><div><a href="http://merekavimitra.blogspot.com/2007/05/blog-post_13.html">यह कविता १३ मई २००७ को 'हिन्द-युग्म' पर प्रकाशित है।</a></div></div></div></div>देवेश वशिष्ठ ' खबरी 'http://www.blogger.com/profile/03089045465753357873noreply@blogger.com