tag:blogger.com,1999:blog-7845169987975672699.post-19152025268011429212007-06-18T06:38:00.001-07:002007-06-18T06:38:16.690-07:00शुक्रियाचोटों पे चोट देते ही जाने का शुक्रियापत्थर को बुत की शक्ल में लाने का शुक्रिया जागा रहा तो मैंने नए काम कर लिएऐ नींद आज तेरे न आने का शुक्रिया सूखा पुराना जख्म नए को जगह मिलीस्वागत नए का और पुराने का शुक्रिया आती न तुम तो क्यों मैं बनाता ये सीढ़ियाँदीवारों, मेरी राह में आने का शुक्रिया आँसू-सा माँ की गोद में आकर सिमट गयानजरों से अपनी मुझको गिराने का शुक्रिया अब यह हुआ कि दुनिया ही बोगटी सरोजhttp://www.blogger.com/profile/07885196120027936275noreply@blogger.com