tag:blogger.com,1999:blog-7363067.post-1099138622854141572004-11-01T11:04:00.000+05:302004-11-01T12:17:24.206+05:30क्या देह ही है सब कुछ?उपभोक्तावाद और भौतिकतावाद के बढते साम्राज्य ने मनुष्य के दृष्टिकोण और सोच को बहुत ही छिछला बना दिया है। उसकी नज़रें इस चमडी की मोटाई को भेद कर अंदर की सम्पदा को देख नहीं पा रही है। <img src="http://pnarula.com/images/akshargram/anugunj.jpg" alt="Akshargram Anugunj" hspace="5" vspace="5" width="80" align="right" height="50"/>विज्ञापन एजेंसियों से लेकर फिल्मी दुनिया सभी जैसे देह तक सिमट गयी है। सभी चार्वाक दर्शन का अनुसरण कर रहे है।
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<br />विज्ञापनों में तो नारी देह का इतना जमकर उपयोग किया जा रहा है कि शेविंग क्रीम का विज्ञापन हो या किसी इनवर्टर का, हर जगह सुन्दर देह का होना अनावश्यक रूप से ज़रूरी होता जा रहा है। मैं इस प्रदर्शनवाद का केवल विरोधी भर नहीं हूँ अपितु मनुष्य के मनोवैज्ञानीक तलों के अध्ययन द्वारा इस विषय को समझने का पक्षधर भी हूँ।
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<br />मुझे लगता है कि मानव मन में सुन्दरता के प्रति सहज, स्वाभाविक आकर्षण इस गोरखधंधे का सबब रहा होगा। मैं कई बार सोचता हूँ कि हमारे सभी देवी देवता सुन्दर ही क्यों दर्शाये गये है? या हमारी दादी-नानी की कहानीयों का आगाज़ हमेंशा 'एक सुन्दर सी परी/राजकुमार... ' से ही क्यों होता है? शायद यही मुलभुत संस्कार बडे होकर, विवाहादि के समय एक सुंदर जीवन साथी की चाहत मन में जगाते है।
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<br />यहाँ तक तो ठीक है मगर प्रकृती ने पशु-पक्षीयों को भी सुंदरता के बोध से वंचित नहीं रखा है। 'डिस्कवरी' चैनल पर दिखाए जाने वाले कार्यक्रमों से मालूम पडता है कि मादाएँ नर का चुनाव इसी दैहिक सुंदरता के आधार पर ही करती है। एक छोटे से बच्चे को, जिसे भाषा तक का ज्ञान नहीं होता, सुंदरता का बोध ज़रूर होता है।
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<br />मेरे विचारों का मंथन मुझे एक पुराण वाक्य का स्मरण कराता है - 'अति सर्वत्र वर्जयते'; सुंदरता का सभ्य, सुसंस्कृत और सादगीपुर्ण प्रस्तुतिकरण, देह भुगोल के उच्छृंखल, अमर्यादित और असभ्य प्रदर्शन से सर्वथा ही भिन्न है। आज की फिल्मों मे जिस तरह से प्रेम को केवल दैहिक परिधी तक परिभाषित किया जा रहा है, उसने निम्न पंक्तियों के माध्यम से अभिव्यक्त भावनाओं की प्रासंगिकता पर प्रश्नचिन्ह लगा दिया है
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<br /><blockquote>प्यार का पहला खत लिखने में वक्त तो लगता है
<br />नये परिंदों को उडने में वक्त तो लगता है
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<br />जिस्म की बात नहीं थी उनके दिल तक जाना था
<br />लम्बी दुरी तय करने में वक्त तो लगता है
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<br />मेरी अपनी सोच है कि इस दुनिया में जो भी कुछ अस्तित्वगत है, सभी का अपने अपने तल पर महत्व है। ईश्वर ने कुछ भी गैर ज़रूरी नहीं बनाया। मगर मनुष्य की चार्वाक दृष्टि ने कुछ नश्वर चीज़ों को अतिमहत्वपुर्ण बना दिया। <strong>जहाँ हमारे पुर्वज इस शरीर को परमार्थ साधने का एक साधन भर माना करते थे, वहीं उनके वंशज इसे सर्वोपरी महत्व देकर इसके इर्द-गिर्द ही जीवन का ताना बाना बुन रहे है।</strong>
<br />Niravhttp://www.blogger.com/profile/14228479813276948484noreply@blogger.com