tag:blogger.com,1999:blog-72781375633636772712009-07-11T10:06:55.294-05:00bajaarराहुलnoreply@blogger.comBlogger92125tag:blogger.com,1999:blog-7278137563363677271.post-74865025723445110682008-12-07T23:52:00.003-06:002008-12-08T00:31:54.420-06:00क्या हिंदू और क्या मुसलमानhइंदु होने के फायदे- १०<br /><span class=""></span><br />अम्मा से दस रुपये लेकर मैंने पतारू का हाथ थामा और बढ़ लिया। अब हम लोगों की निगाह मे दो टारगेट थे। एक तो वो लड़की जो नदी मे नहा रही थी और दूसरी वो लड़की जो डम्पू के घर मे रहने आई थी। हमें पता था कि वो अपने पापा के साथ आई है और हम लोगों ने उसे बाग़ की दिवार फांदने से पहले देखा भी था। हमें नदी मे नहाने वाली लड़की नही दिखी। दरअसल सरयू पार करने के बाद परिक्रमा के दूसरे हिस्से मे रास्ता काफ़ी चौडा हो जाता है। इसलिए भीड़ भी तितर बितर हो जाती है। अब न तो हम लोग बदमाशी कर सकते थे और न ही कोई और। मजबूरन हमें सीधे सीधे चलना पड़ रहा था। खैर, लम्बी गहरी साँस लेकर मैंने पतारू और कल्लू ने एक साथ परिक्रमा पूरी कि। लेकिन अभी तो बधाइयों का सिलसिला चलना था। ये बधाइयाँ कुछ हैप्पी न्यू इयर के अंदाज़ मे दी जाती थी। जाल्पानाला से अमानीगंज तक हम लोग लड़कियों को बधाइयां देते हुए आए। घर पहुचे तो अम्मा और बाबू , जो हमसे पीछे पता नही कहाँ थे, पहले से ही पहुचे हुए थे। मम्मी परात मे नमक मिला गर्म पानी ले आई थी और बाबू और अम्मा उसमे अपना पैर सेंक रहे थे। मैंने बाबू को बताया कि मैंने पतारू और कल्लू ने कितना मजा लिया। फ़िर क्या था। अम्मा सुलग उठीं। उन्होंने पुछा, कल्लू काव करय गवा रहा तू लोगन की साथे ? ऊ तौ मुसलमान हुवे । मैं चुप। टुकुर टुकुर बाबू का मुह देख रहा था। शायद वो कोई जवाब देन। खैर बाबू खंखारे, और अम्मा से बोले, अब छोटे बच्चों मे क्या हिंदू और क्या मुसलमान। खाने खेलने की उम्र है इन लोगों की। और वैसे भी ये लोग हमेशा साथ मे ही रहते हैं। और तुम कल्लू को लेकर इसे बोल रही हो, तुम भी तो अली हुसैन की अम्मा के साथ सर से सर जोड़कर बतियाती रहती हो। तब नही याद आता कि क्या हिंदू और क्या मुसलमान?<div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7278137563363677271-7486502572344511068?l=bajaar.blogspot.com'/></div>राहुलnoreply@blogger.com3tag:blogger.com,1999:blog-7278137563363677271.post-63214973191610422662008-11-30T04:16:00.008-06:002008-11-30T09:37:55.896-06:00सवाल दस रुपये का<span style="color:#cc0000;">हिंदू होने के फायदे - ९<br /></span><p>राम की <span class="">पैडी </span>पर जब हम लोग समोसे खा रहे थे, तब मुझे याद आया की अम्मा ने तो सिर्फ़ दस रुपये ही दिए हैं। वो सारे तो वही ख़त्म हो गए। अब क्या करें। बड़ी मुसीबत। आगे आने वाले रास्ते पर एक अजीब तरह का ताना बिकता था। बेचने वालों का कहना था <span class="">कि </span>उसे भगवान् राम ने अपने वनवास के टाइम पर खाया था, और अक्सर खाते रहते थे। बहरहाल मुझे वो खाना अच्छा लगता था। उसका अजीब सा कसैला और मीठा स्वाद मुझे अभी तक याद है। यही सोच ही रहा था कि पतारू के बड़े भाई प्रेम परकास नजर आए। प्रेम ने बताया कि अम्मा बाबू और चचेरे मामा की चोटी बेटी अभी अभी आगे गए हैं। बड़ी हद चोटी छावनी तक पहुचे होंगे<span class="">।<a href="http://3.bp.blogspot.com/_l4k30fylmCc/STJrPh0cuzI/AAAAAAAAAdw/E1mUdtJ-Cv4/s1600-h/IndiaP60k-10Rupees-(1985-90)_f.jpg"><img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5274396028124838706" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 200px; CURSOR: hand; HEIGHT: 90px" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_l4k30fylmCc/STJrPh0cuzI/AAAAAAAAAdw/E1mUdtJ-Cv4/s200/IndiaP60k-10Rupees-(1985-90)_f.jpg" border="0" /></a></span> फ़िर क्या था। मैंने और पतारू ने वही से दौड़ लगनी शुरू की। परिक्रमा मे दौड़ लगानी काफ़ी मुश्किल होती है। हजरून लोगों की एक ही तरफ़ चलती भीड़ मे हमें दौड़ना था। और इतनी तेज़ कि आने वाले दस पन्द्रह मिनट मे अम्मा को पकड़ लिया जाय नही तो वो मिलने वाली ही नही थीं। आख़िर दस रुपये का सवाल जो था। ये तो पहले से ही पता था कि अम्मा वो लाल वाला गन्ना तो खरीदेंगी ही। सो लाल वाले गन्ने की चिंता नही थी। मैंने और पतारू ने एक दूसरे का हाथ पकड़ा और दौड़ना शुरू कर दिया। आख़िर मे चोटी छावनी के पास जहा मन्दिर के लिए पत्थर काटे जा रहे थे, वहां पर हमें आमा और बाबू दिख गए। चैन मिला। लम्बी साँस ली और पहुचे अम्मा के पास। खैर अम्मा ने डपटा नही और चुपचाप दस रुपये दे दिए। मैं भी सोच रहा था कि अभी कितनी चिरोरी करनी पड़ेगी। </p><p>जारी ....</p><p>देर से आने वालों के लिए पूरी कहानी यहाँ पढ़ें .... <a href="http://bajaar.blogspot.com/search/label/हिंदू%20होने%20के%20फायदे">हिंदू होने के फायदे </a></p><div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7278137563363677271-6321497319161042266?l=bajaar.blogspot.com'/></div>राहुलnoreply@blogger.com0tag:blogger.com,1999:blog-7278137563363677271.post-41221810171101784352008-11-29T10:28:00.002-06:002008-11-29T10:57:17.993-06:00रंग दे बसंतीमुंबई कांड से मुझे फ़िल्म रंग दे बसंती याद आ रही है। दिखने मे तो वो एकदम नौजवान ही तो थे। एक की तो फोटो, जो अखबार मे छापी है, उससे तो वो एकदम आमिर खान की तरह लग रहा है। बताते हैं की योजना किसी और की थी, और इसे कार्यान्वित दाउद किया था। दाउद पहले ही अलकायदा से मिल चुका है और उसके साथ काम भी कर चुका है। और समुद्र से मुंबई मे घुसने की इन लड़कों की जो स्टाइल थी, वो पूरी तरह से मुम्बैया दाउद स्टाइल ही थी। बड़े आराम से इनलोगों ने मोटर बोट पकड़ी, ज्यादा पैसे नही चाहिए थे क्योंकि सब कुछ का पहले से ही इंतजाम था। और होटल ताज मे , ऐसी स्थिति मे हथियार अन्दर पहुचाना कोई मुश्किल भी नही था। लेकिन फ़िर से इन लड़कों की रंग दे बसंती स्टाइल मे ये सब करना मुझे हजम नही हो रहा है। दरअसल कसूर इन लड़कों का नही है, कसूर तो उन लोगों का है जिन्होंने इन लड़कों को इस तरह से भड़काया की ये लोग अपनी मौत के लिए भी तैयार हो गए। इन्हे पता था की ये नही बचेंगे। लादेन ऐसे ही लड़कों को तैयार करता है। अगर ये लड़के पकिस्तान के भी थे, तो पढ़े लिखे सभ्य घर के लगने वाले .... अब तो ये बात पकिस्तान को भी समझ लेनी चाहिए की उसकी कौन सी नस्ल अब आतंकवाद का शिकार हो रही है। ये खतरे की घंटी है, सचमुच। मेरे तो रोंगटे ही खड़े हो जाते हैं ये सोच कर के दक्षिण एशिया के एक हिस्से मे कौन सी नस्ल बन्दूक की लडाई मे हिस्सा ले रही है। नोट करें, लादेन और उसके कई साथियों ने मिलकर इस्लामिक आतंकवाद के नाम पर ऐसे ही लड़कों की एक बड़ी फौज तैयार की है, और जो सबसे चिंता की बात है की उसमे पढ़े लिखे लोगों की संख्या काफ़ी ज्यादा है। ये मुगालते मे ना रहें के बन्दूक से निकला जहर हमारे देश मे नुक्सान नही करेगा , बिल्कुल करेगा और यहाँ भी नई उम्र के लड़के अपराध और बन्दूक की लडाई मे ही हिस्सा ले रहे हैं। यानि की नुक्सान होना शुरू हो गया है, मेरे ख्याल से मुंबई तो एक टेलर है, अभी तो इन लोगों से कायदे से जंग की शुरुआत की है। अमिताभ ने अच्छा किया जो तकिये के नीचे रिवाल्वेर रख कर सोये ।<br />जिसे हम आतंकवाद का नाम देते हैं, उसे ये लोग जंग का नाम देते हैं. चाहे इस्लामिक आतंकवाद हो या फ़िर हिंदू आतंकवाद.... नही, इसे हिंदू आतंकवाद न कह कर मेरे ख्याल से हिंदुत्व आतंकवाद कहना चाहिए। क्योंकि जो लोग जिन तरीकों से मुसलमान लड़कों को बरगलाते हैं, वैसे ही हिंदुत्व के आतंकवादी हिंदू होने के नाम पर फिदायीन दस्ते तैयार कर रहे हैं। कुल मिलकर जंग शुरू हो गई है, अमिताभी ने भी इशारा कर दिया है। अपनी सुरक्षा अपने हाथ। क्योंकि अब आप भी , भले ही उस दस्ते से सम्बन्ध नही रखते, तो भी , मारे जा सकते हैं। देखतें हैं की सी बार गाजिआबाद मे कितने नए हथियारों का रजिस्ट्रेशन होता है....<div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7278137563363677271-4122181017110178435?l=bajaar.blogspot.com'/></div>राहुलnoreply@blogger.com0tag:blogger.com,1999:blog-7278137563363677271.post-10433402141032993102008-10-23T10:14:00.003-05:002008-10-23T10:22:05.745-05:00एक मुलाकात वापसगुफरान मेरे बचपन के दोस्त हैं लेकिन इनके लिखने की क्षमता का मुझे काफ़ी बाद मे पता लगा। ये तो खैर उनकी एक कविता है जो मुझे अपने पुराने दिनों मे वापस लेकर जाती है, लेकिन अपने ब्लॉग <a href="http://awadhvasi.blogspot.com/">http://awadhvasi.blogspot.com/</a> पर गुफरान ने अपनी कलम के काफ़ी रंग बिखेरे हैं...<br /><br />याद आता है वो फैजाबाद<br />वो चौक का शमां, वो परम् की चाट<br />वो पार्लर की आइसक्रीम उसमें थी कुछ बात<br /> वो मधुर की मिठाई वो बंजारा का डोसा<br />वो जलेबी के साथ जाएके का समोसा<br />वो बाइक का सफर वो कम्पनी गार्डेन की हवा<br />वो गुलाबबाडी की रौनक वो बजाजा का शमां<br />वो जीआइसी में मैच हारने पर झगडा<br /> वो न जाना क्लास मैं कभी और रहना पढाई से दूर<br /> याद आता है वो फैजाबाद<br />वो जनवरी की कड़ाके की सर्दी ,वो बारिशों के महीने...<div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7278137563363677271-1043340214103299310?l=bajaar.blogspot.com'/></div>राहुलnoreply@blogger.com1tag:blogger.com,1999:blog-7278137563363677271.post-36246847028620189382008-08-22T02:56:00.005-05:002008-08-22T08:25:18.576-05:00कैसा सच और कैसी जीतएन डी टी वी के स्टिंग ऑपरेशन पर कोर्ट ने दो वकीलों पर जुरमाना लगाया, चार महीने तक उनकी प्रैक्टिस पर रोक लगा डी और चैनल ने इसे सच की जीत कहा, अपने रिपोर्टर की पीठ थपथपाई । वैसे रिपोर्टर के काम का असली फल होता भी यही है की उसके काम का कुछ तो नतीजा निकले। लेकिन इस पूरे मामले को सच की जीत कहना एक अदना से मामले को कुछ ज्यादा ही बढ़ा चढा का कहना लगता <span class="">है। </span>एसा लगने के अपने कारण <span class="">है </span>और इनकी अपनी एक कड़वी जमीनी हकीकत भी है। हमारे यहाँ , जहाँ तक मेरी समझ है, कोर्ट मे सिविल के मामले फौजदारी से कही ज्यादा होते हैं। हो सकता है कुछ एक ख़ास परिस्थितियों मे फौजदारी के मामले ज्यादा हो जाए, लेकिन ज्यादा होते सिविल के ही हैं। ये वही मामले होते हैं जिनमे या तो खेत की मेड काट ली जाती है, चकबंदी मे ग़लत नपाई हो जाती है, किसी के बाग़ के आम के पेड़ की कोई टहनी कोई काट ले जाता है तो कोई तालाब के किसी हिस्से पर जबरन कब्जा कर लेता है। या फ़िर इसी तरह के दर्जनों, सैकडों और हजारों मामले। छह महीने की फसल बोने के बाद किसान अपना खाली वक्त कचहरी मे गुजारना पसंद करता है जिसके लिए उसे एक मुकदमा चाहिए होता है। और मुकदमा लड़ने के लिए एक वकील। मुकदमा तो खेत का पानी कटा लेने से ही शुरू हो जाता हैलेकिन वकील अपनी सेटिंग की काबलियत से तय किया जाता है। कचहरी वकीलों की भेड़ मंडी होती है। मुकदमा करने वाले को इससे कोई मतलब नही होता है की वकील कितना पढ़ा लिखा है या फ़िर कितना जानकार है। उसे तो बस इस बात से मतलब है की वकील की कितने जजों से सेटिंग है , वह कितने जजों को पैसा पहुचता है और इसी दम पर वह कितने फैसले करवा ले जाता है । और सच मे, मैं माफ़ी के साथ नाम लेना चाहूँगा, मश हूर वकील चाहे वो प्रशांत जी हो या जेठमलानी जी, बगैर मिडिया और जज को बताये लोअर कोर्ट मे पहुच जाएँ , भले ही क़ानून के हिसाब से फैसला उनके पक्ष मे होता हो, लेकिन फ़ैसला करवा के दिखा देन तब तो मना जाएगा की सच की जीत हुई। लेकिन ऐसा होगा नही। क्यों ? क्योंकि वकील साहब ने जज को चढावा नही चढाया, मुंशी की मुठ्ठी मे दो चार बार बीस का नोट नही दिया। वी ओ आई के आर के सिंह ने अभी हाल मे ही एक इंटर व्यू मे कहा था की मिडिया ख़ुद की नही, ये जनता की है। जज भी ख़ुद के नही है हैं, ये जनता के हैं, जनता के लिए हैं, ऐसा मेरे मानना है। तो फ़िर अगर वकीलों पर स्टिंग हो सकता है तो इन जजों पर क्यों नही। शर्त लगा लीजिये, आधे से ज्यादा जज पैसे लेते हुए दिखाई देंगे। सच की जीत दिखाते हुए मिलेंगे।<div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7278137563363677271-3624684702862018938?l=bajaar.blogspot.com'/></div>राहुलnoreply@blogger.com3tag:blogger.com,1999:blog-7278137563363677271.post-21203197919831905322008-06-17T10:00:00.003-05:002008-06-17T10:05:41.942-05:00कहीं मेरा नाम ...क्या होते होंगे अनगढ़ कविता के मायने? क्या वो अपना संवाद नही कर पाती होगी? लेकिन क्या किसी कविता का संवाद करना इतना जरूरी है? आख़िर निकलती है वो ख़ुद से, किसी से संवाद करने की खातिर तो नही ही। बहरहाल, चुप से पड़े लोगों की खातिर ये कविता...<br /><br />सिगरेट के धुंए से<br />फुसफुसाती हुई<br />शराब के एक घूँट से<br />चीरती हुई<br />हवा के झोंके मे से<br />धूल को काटती हुई<br />चिपचिपाते पसीने से<br />कभी कभी<br />निकलती है<br />एक कविता,<br />चित्र से, नाटक से, कविता से<br />निकलते अहसास<br />बिकते अहसास<br />और....<br />मजबूरियां,<br />क्या कहीं मेरा नाम तो नही लेतीं ?<div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7278137563363677271-2120319791983190532?l=bajaar.blogspot.com'/></div>राहुलnoreply@blogger.com0tag:blogger.com,1999:blog-7278137563363677271.post-76210445029116151912008-06-01T04:47:00.006-05:002008-06-01T05:29:35.696-05:00जूताइंसान ने पहली बार कब जूता पहना होगा? जूता भी पहना होगा या वो सिर्फ़ चप्पल ही रही होगी। जाहिर सी बात है कि मोहल्ले के शिव परसाद जैसी हवाई चप्पल पहनते हैं , वैसी तो नही ही रही होगी। बहरहाल कब बनी होगी पहली चप्पल और किसने पहना होगा पहला जूता। बात अगर आदि काल से शुरू करते हैं । सबसे बड़े चप्पल घीसू तो नारद ही रहे होंगे। लेकिन एक बात समझ मे नही आती कि भगवानो मे चप्पल का कांसेप्ट कहाँ से आया। वो जमीन पर तो चलते नही थे, स्वर्ग मे रहते थे, कोई कमल पर बैठा हुआ तो कोई सांप पर पसरा हुआ। किसी को ज्यादा चढ़ गई तो बैल और भैंसे की सवारी करने लगा। फ़िर ये ससुरा चप्पल का कांसेप्ट आया कहा से । वैसे एक बार सपने मे किसी द्रविड़ नाम के भगवान् ने फूंक मारी थी के चप्पल तो पेड़ों की छाल रही होगी, लेकिन भइया, उसे पहनकर दौड़ते कैसे होंगे। मान लो दौड़ भी लेते होंगा, उसे निकालकर मारते कैसे होंगे। उस जमाने मे सैंडिल भी तो नही होते थे, तो क्या मान लिया जाय कि छेड़छाड़ की घटनाएं भी नही होती थी? लेकिन <span class=""><a href="http://bp3.blogger.com/_l4k30fylmCc/SEJ1_0zQCoI/AAAAAAAAAVM/InaW1r6nbRU/s1600-h/joota.jpg"><img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5206853858559527554" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" src="http://bp3.blogger.com/_l4k30fylmCc/SEJ1_0zQCoI/AAAAAAAAAVM/InaW1r6nbRU/s320/joota.jpg" border="0" /></a>सवाल</span> फ़िर से अपनी जगह पर कायम है, ससुरा जूता आया तो आया कहाँ से? अभी उस दिन नगर निगम मे घूम रहा था, दीवार पर जूते जैसे कुछ पुता देख तो दीवाल के बगल बैठने वाले <span class="">से </span>पूछा , कि भइया , ये कौन साहब है जिन्होंने जूते को इतनी शान से लगा रखा है, पता चला बड़े बवाली आदमी है, राष्ट्रिय जूता पार्टी बना ली है और अब आए दिन शहर मे जूता घुमाया करते हैं। बहरहाल सवाल उनसे भी मेरा यही था कि भइया, जूता आया कहाँ से ? जवाब उनके पास मिला, उन्होंने ने पूरा जूते का अर्थशास्त्र समझाया। दस रुपये किलो मे दो माला बन जाती है, जूता मिलता है कबाड़ी के यहाँ, दो माला मे तकरीबन दस एक हज़ार रुपये की कमाई हो जाती है, महीने मे दो चार किलो जूते आ ही जाते <span class="">हैं। </span>क्या जब जूते ने जन्म लिया होगा तो उसे अपने इस अर्थशास्त्र के बारे मे पता होगा ?<div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7278137563363677271-7621044502911615191?l=bajaar.blogspot.com'/></div>राहुलnoreply@blogger.com0tag:blogger.com,1999:blog-7278137563363677271.post-55836022104153098332008-05-06T01:38:00.002-05:002008-05-06T01:52:47.194-05:00रास्ता और घरये पुरानी है, पिछले साल जुलाई मे लिखी थी , पेश ऐ खिदमत है ...<br />१<br />रास्ता सबका एक ही था<br />लेकिन थोड़ा सा आगे जाने पर<br />पता चला<br />कि हम सबके रास्ते अलग थे<br />कोई पहली श्रेणी का चलने वाला था<br />जो चलने मे यकीन रखता था<br />कोई दूसरी...<br />जो छोटे रस्ते की तलाश कर रहा था<br />और कोई उड़ना चाहता था<br />इसी आस मे<br />हम सब चल रहे थे<br />२<br />हमने देखा<br />कि भूख से अंतड़ियाँ<br />कैसे ऐंठ्ती हैं<br />और फिर शुरू हो जाती है<br />तलाश एक ऐसे रास्ते की<br />जो भूख को ख़त्म कर सके<br />जो रास्ते की गरमी को भगा सके<br />जो हमे हमारे घर तक पंहुचा सके<br />३<br />घर<br />कब और किसलिये छोड़ा<br />ये तो सब जानते हैं<br />लेकिन<br />चुपके से<br />घर कब वापस गए<br />कब उसमे नई दीवारे खडी की<br />कब रंग रोगन हुआ<br />कब घर मे पूड़ी तरकारी बनी<br />ये कोई नही जानता<br />४<br />अब तो काफी लोग घर पर हैं<br />हम चंद लोग<br />उसी रास्ते पर हैं<br />हमने कोई छोटा रास्ता नही चुना<br />हमे घर जाने की बहुत इच्छा थी<br />हम चांदनी रात मे पुआलों पर लोटना चाहते थे<br />हम आम के पेड पर चढ़कर<br />सखपुतिया खेलना चाहते थे<br />लेकिन<br />हमे इससे ज्यादा अच्छा खेल<br />उस रास्ते पर चलना लगा<br />हम घर नही गए।<br />५<br />अभी भी हम<br />वैसे ही चल रहे हैं<br />और ....<br />घर गए लोग हमारे पीछे से<br />घंटियाँ बजा रहे हैं<br />रिझा रहे हैं।<div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7278137563363677271-5583602210415309833?l=bajaar.blogspot.com'/></div>राहुलnoreply@blogger.com0tag:blogger.com,1999:blog-7278137563363677271.post-42420294017413842092008-04-25T23:15:00.003-05:002008-04-26T00:01:06.356-05:00पान<div><span class=""><a href="http://bp0.blogger.com/_l4k30fylmCc/SBK2NlN6dNI/AAAAAAAAAU0/9bg1FVSUpds/s1600-h/paan.jpg"><img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5193413664756626642" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" src="http://bp0.blogger.com/_l4k30fylmCc/SBK2NlN6dNI/AAAAAAAAAU0/9bg1FVSUpds/s320/paan.jpg" border="0" /></a>कसम</span> से, क्या चीज़ है पान। खुदा की बनाई सबसे बड़ी नेमत है पान। हरे हरे देसी पान का पत्ता, उसपर बढ़िया चूना कत्था और भीगी डली। भोला बत्तीस तो अब जल्दी मिलता नही, तुलसी या बाबा मिल जाता है। और हाँ, किमाम इलायची भी जरूर होना चाहिए। पंडित जी लपेट कर जैसे ही दें, तुरंत मुह मे जाकर सेटिंग करने लगता है। और ये कोई आज से नही। दरअसल ब्रम्हा पान खाते थे। गिलौरी मुह मे रखकर ही सरस्वती को पढाते थे। बिना पान के हमारे प्राइमरी के मास्टर तक नही पढाते। वो तो खैर ब्रम्हा थे। सुना है, नारद को पान की आदत ब्रम्हा से ही लगी। तभी तो एक बार नारद ने विष्णु वाजपेयी के घर जाकर उन्हें पान की महिमा बताई थी। उन्होंने बताया था, सारे देश को पान की आदत डलवा दो, राजकोषीय घाटा कम हो जाएगा। पान खाने के बाद तो सुरती भी बेकार हो जाती है। कचहरी मे वकील भी तो पान खाते हैं, बिजली ऑफिस मे बैठे एस डी ओ भी तो पान खाते हैं। जितने भी भगवान् हैं, सब पान खाते हैं , चाहे आर टी ओ भगवान् को देखिये या फिर चाहे एस डी एम् भगवान् को देखिये, सब पान खाते हैं। तो भइया, पान की महिमा अपरम्पार है। एक बार नारद ने पान खाकर मुरली मनोहर के गमले मे थूक दिया। फ़िर क्या था, वहा से पान की जो बेल निकली, आज तक मुरली वाले के होठो का कोना लाल किए रहती है। और मुरली वाले ने बंसी छोड़ कर पानदान अपना लिया, कांख मे दबाये रहते हैं हमेशा। और तो और, पूरा देश पान की जुगाली मे व्यस्त है, आलू के दाम बढे, सब चिल्लाए, टमाटर सूरज की तरह लाल हो गया, सब घर छोड़ कर बाहर आ गए, लेकिन पिछले एक साल मे पान की कीमतों मे तीन बार इजाफा हुआ, मजाल है की पान की गिलौरी ने किसी के मुह से आवाज निकलने दी हो। मुह की आवाज दबानी हो तो पान खिलाइये, मुह से सुंदर सुंदर राग निकालने हो तो पान खाइए। पान पान पान ..... बस पान।</div><div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7278137563363677271-4242029401741384209?l=bajaar.blogspot.com'/></div>राहुलnoreply@blogger.com6tag:blogger.com,1999:blog-7278137563363677271.post-90417588667543984762008-04-02T22:50:00.007-05:002008-04-02T23:36:49.487-05:00सोचा न था ....मेरठ मे एक गुमनाम सी शख्सियत हैं मिथलेश आत्रे। और आइन्दा के दिनों मे <span class=""><a href="http://bp3.blogger.com/_l4k30fylmCc/R_RZAvhX9JI/AAAAAAAAAUU/8qJuDRDn7eU/s1600-h/DSC08123.jpg"><img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5184866940301603986" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" src="http://bp3.blogger.com/_l4k30fylmCc/R_RZAvhX9JI/AAAAAAAAAUU/8qJuDRDn7eU/s200/DSC08123.jpg" border="0" /></a>गुमनाम</span> ही रहना चाहती हैं। ऐसा इसलिए नही कि उन्हें नाम से कोई परेशानी होती हो, दरअसल वो अभी तक नाम के फायदे नही जान पाई हैं। मिथलेश से मिलने के बाद, खासकर उनके कारनामो के बारे मे जानने के बाद मेरे मन मे जो पहला सवाल आया वो ये कि मेरठ मे आत्रे कहाँ से ? पूछताछ की तो पता चला कि मेरठ मे कुल मिलकर २२ परिवार आत्रे हैं। ये लोग तकरीबन डेढ़ सौ या दो सौ साल पहले महाराष्ट्र से यह पर आकर बसे थे। आजादी की लड़ाई मे इन सभी लोगों ने हिस्सा लिया, शहर के साथ कदम से कदम मिलकर चले और शहर की धड़कन यानि कि घंटाघर पर भी इनका ठिकाना रहा और अब भी है। ये जानकारी मुझे जागरण मे काम करने वाले एक सीनिअर रिपोर्टर ने दी जो ख़ुद आत्रे हैं। बहरहाल, लौट कर मिथलेश के ही पास आते हैं। <a href="http://bp0.blogger.com/_l4k30fylmCc/R_RbB_hX9KI/AAAAAAAAAUc/8b6m_l8wF7k/s1600-h/DSC08121+copy.jpg"><img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5184869160799696034" style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; CURSOR: hand" alt="" src="http://bp0.blogger.com/_l4k30fylmCc/R_RbB_hX9KI/AAAAAAAAAUc/8b6m_l8wF7k/s200/DSC08121+copy.jpg" border="0" /></a>मिथलेश कुल मिलाकर आठवीं पास हैं। बुजुर्ग महिला हैं इसलिए उनका आठवीं पास होना या पढ़ा लिखा न होना एक बराबर है। हो सकता है कि उन्होंने घर पर ही पढ़ लिया <span class="">हो, </span>लेकिन इस बारे मे मुझे रत्ती भर भी शक नही कि मिथलेश ने जो कुछ भी पढ़ा , वो अब सबके काम आ रहा है। मिथलेश शताब्दी नगर मे रहती हैं और मेरठ विकास प्राधिकरण द्वारा बनाये गए एक मकान मे स्कूल चलाती हैं। वो मकान भी ऐसा मकान है, जिसके बनने के बाद अब तक कोई कब्ज़ा लेने नही आया। उसमे न तो खिड़की है और न ही कोई दरवाजा। बिजली का तो सवाल ही नही पैदा होता। एक तरह से वो खँडहर है। इसी खँडहर मे मिथलेश ने झुग्गी के ३५ बच्चों को पढाया है। सभी ने पहली क्लास का इम्तेहान दिया और रिजल्ट सौ प्रतिशत रहा है। और ये सौ प्रतिशत रिजल्ट भी किस तरह से? ना तो इन बच्चो को बैठने के लिए टाट पट्टी मिली है , ना ही पढ़ना सीखने के लिए ब्लैक <span class="">बोर्ड। </span>जमीन पर बैठ कर इन बच्चों ने पढ़ाई की है और दिवार को ही ब्लैक बोर्ड बनाया है। कमाल है। ऐसे जज्बे वाली महिला को मैं सलाम करता हूँ।<br />मिथलेश का स्कूल यह पर देखें - <a href="http://photobajaar.blogspot.com/">फोटो बजार </a><div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7278137563363677271-9041758866754398476?l=bajaar.blogspot.com'/></div>राहुलnoreply@blogger.com0tag:blogger.com,1999:blog-7278137563363677271.post-33323664068668744062008-03-11T09:17:00.007-05:002008-03-11T09:34:19.943-05:00ये कोई ज्यादा बड़ी कहानी नही है...ये कोई ज्यादा बड़ी कहानी नही है। मेरठ का एक इलाका है फिरोजनगर। ज्यादा नही, पिछले दो तीन दशक से यह पीने का पानी गन्दा आ रहा है। यहा रहने वाले बच्चों मे से एक दो बच्चा हर दूसरे तीसरे महीने मर जाता है। कारण, डायरिया, उलटी, दस्त। इन्ही की कुछ फोटो हैं। <img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5176488793833519938" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; CURSOR: hand; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://bp1.blogger.com/_l4k30fylmCc/R9aVIbw8u0I/AAAAAAAAATM/GHNMROj46gU/s320/DSC07210.JPG" border="0" /><br /><br /><p>इसका नाम इयत्ता है। फिरोज नगर मे ही रहती है। हो सकता है कुछ दिन बाद ये भी मर जाय । </p><img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5176489313524562770" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; CURSOR: hand; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://bp2.blogger.com/_l4k30fylmCc/R9aVmrw8u1I/AAAAAAAAATU/lrXqPIQ2IVc/s320/DSC07208.JPG" border="0" />ये मिस्बाह है। दो महीने पहले इसकी बहन डायरिया से मर <span class="">गई। </span>अब शायद इसकी बारी है। ये भी फिरोज नगर मे रहती है।<br /><img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5176490245532466018" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; CURSOR: hand; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://bp3.blogger.com/_l4k30fylmCc/R9aWc7w8u2I/AAAAAAAAATc/fDaYJYXwFVA/s320/DSC07213.JPG" border="0" />ये भूरा है. इसकी उम्र १६ साल है. पैदा होने के बाद से ही गन्दा पानी पीने की वजह से इसका विकास ही नही हो पाया.<br />और भी फोटो हैं, यहाँ क्लिक कीजिये- <a href="http://photobajaar.blogspot.com/">photobajaar</a><div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7278137563363677271-3332366406866874406?l=bajaar.blogspot.com'/></div>राहुलnoreply@blogger.com1tag:blogger.com,1999:blog-7278137563363677271.post-19469057226792077112008-03-09T23:46:00.003-05:002008-03-10T00:13:36.650-05:00बेल्कुल ठीयिकबेल्कुल ठीयिक ... असल मे है तो वैसे ये बिल्कुल ठीक लेकिन मेरठ मे आजकल ये लफ्ज एक बड़े तबके की जुबान पर कुछ ऐसे ही आ रहा है। बिल्कुल ठीक को ये तबका बेल्कुल ठीयिक बोल रहा है। हो सकता है की टाइपिंग मे वो बात ना आ रही हो, लेकिन बिल्कुल ठीक को कुछ उसी तरह से बोला जा रहा है। दरअसल इसके पीछे की जो कहानी है, लगता है प्रकाश झा की कोई फ़िल्म चल रही है। मेरठ के एस एस पी हैं ज्योति नारायण। बिहार से हैं, और उनके बोलने की टोन भी बिहारी ही है। यहाँ की कमाऊ और नॉन कमाऊ, दोनों तरह के रिपोर्टरों से एक बात सुनने को मिलती है की एस एस पी साहब बड़े इमानदार हैं। हो सकता है की वो ऐसे ही हो, लेकिन मुझे नही लगता की वो ठीक वैसे ही होनेगे जैसा की पुलिस वाले या फ़िर रिपोर्टर्स कहते हैं। ऐसा होना सम्भव ही नही है। आप नही खायेंगे तो आप बाहर कर दिए जायेंगे। ऐसा ही सिस्टम है। बहरहाल ये जो बेल्कुल ठीयिक है, ये उनका तकिया कलाम है। हफ्ते मे दो तीन दिन मुझे भी क्राइम देखना होता है तो एस एस पी से बात करनी पड़ती है। मुझसे भी वो यही तकिया कलाम बोला करते हैं। अब इन कप्तान साहब के तकिया कलाम की ये हालत है की पुलिस डिपार्टमेंट के बाकी लोगों मे जो लग हैं, वेस्ट यू पी के हैं । भाषा उनकी उसी तरह है जैसी की वेस्ट यू पी की होती है। लेकिन सब के सब आजकल बिहारी मे बात कर रहे हैं। कल रात मैं अपने क्राइम रिपोर्टर के साथ आबू लेन जा रहा था। रस्ते मे एस एस पी के घर के सामने उन्ही के एक हवलदार मिल गए। कोई उभास जैसा नाम था उनका। लगे बिहारी मे बात करने। आमतौर से फिल्म मे बिहारी स्टाइल की बोली का मजाक उड़ाया जाता है। लेकिन यहाँ तो बात कुछ और ही थी। हवलदार साहब बिहारी टोन मे बात करके ख़ुद को एस एस पी टाइप का कोई जीव मान रहे थे। ये मजाक नही था। ये था एक मोडल और उसके पीछे का असर। बात फ़िर से वही से शुरू हुई के एस एस पी इमानदार हैं और कुछ एक पुलिस वालों के लिए रोल मोडल भी । लेकिन फ़िर भी मैं कहता हूँ की एस एस पी इमानदार नही है, बेईमान भी नही । बस यू ही काट रहा है अपनी जिंदगी को। शायद ऐसी हो किसी बात ने हमारे क्राइम रिपोर्टर सचिन त्यागी पर कोई असर किया होगा और वो बुरी तरह से उनका फैन बन गया । लेकिन बात तो फ़िर से वही अटक जाती है ... ठाकरे परिवार बिहार और बिहारियों के पीछे हाथ पैर धोकर और नहाकर पडा हुआ है। एक बार <a href="http://indiancoffeehouse.blogspot.com/2007/06/blog-post_28.html">काफी हाउस पर भूपेन</a> ने लिखा था ....<br /><strong>भले ही अघाये हुए आलोचक </strong><br /><strong>इस भूमिका के लिए </strong><br /><strong>कोई पुरस्कार दे दे </strong><br /><strong><span class="">पर वो </span> शर्म कहां जायेगी </strong><br /><strong>जो अब चेहरे पर नहीं दिखती</strong><div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7278137563363677271-1946905722679207711?l=bajaar.blogspot.com'/></div>राहुलnoreply@blogger.com1tag:blogger.com,1999:blog-7278137563363677271.post-84169364560449495702008-03-07T01:26:00.002-06:002008-03-07T01:43:33.356-06:00बिहार को नरक मीडिया ने बनायाआज सुबह अखबारों की सुर्खी बने बाल ठाकरे के एक बयान पर नजर गई। लिखा था कि सामना मे छपे उनके सम्पादकीय मे उन्होंने लिखा कि बिहार को नरक से बदतर बना दिया गया है। मैं बिहारी नही। यू पी का हूँ। कभी सोचा नही कि बिहारी क्या और यू पी क्या..या फ़िर कुछ और ही क्या और क्यों। लोग अच्छे मिले और मिलते गए। बहरहाल, मुझे लगता है की बिहार को नरक बाल ठाकरे या नितीश या फ़िर लालू ने उतना बुरा नही बनाया जितना की मीडिया ने। यू पी मे इस वक्त मैं मेरठ मे काम कर रहा हूँ। हर रोज़ यहाँ पर क्राइम की दो बड़ी खबरें होती हैं। अपहरण , लूट, हत्या, डकैती तो यहा के लिए सामान्य बात है। एन सी आर बी की रिपोर्ट मे मुम्बई मे भी क्राइम कुछ कम नही दिखाया जाता। और ये क्राइम ना तो मुम्बई मे रह रहे बिहारी करते हैं और ना ही मेरठ मे रह रहे बिहारी। ये बात अलग है की मीडिया बिहार मे जरा सा भी कुछ होता है तो उसे कुछ ज्यादा ही बड़ा बनाकर दिखाता है। एक तरह से ट्रेंड चल पड़ा है ये कहने का की अगर ये बिहार मे हुआ होगा तो वहा तो ये सब चलता ही रहता है। सड़कें जैसी बिहार मे हैं वैसी दिल्ली मे भी हैं, मुम्बई मे भी हैं, उसी तरह से टूटी फूटी। सरकारी अस्पतालों की बिहार मे जो हालत है, यू पी मे उससे भी बुरी ही है, मुम्बई के सरकारी अस्पतालों मे शायद डॉक्टर एक मरीज को ज्यादा टाइम दे पाते होंगे...मुझे तो नही लगता। हाँ, मुझे ये जरूर लगता है की मिडिया का काम छिछला होता जा रहा है। या फ़िर आत्मकेंद्रित। आत्म मुग्ध । ये जो कर रहे हैं, सनसनी फैला रहे हैं, आज से नही, पिछले दस सालों से, अब उसका खामियाजा आम आदमी को भुगतना पड़ रहा है। और ये आक्रोश दिख भी जाता है। निठारी काण्ड मे तो लोकल मिडिया का एक पत्रकार मेरे सामने ही पिटा। पहाड़गंज बोम्ब ब्लास्ट मे भी एक बड़े चैनल का पर्त्रकार मे सामने पिटा। और लोग पिटते ही रहते हैं। अभी मेरठ मे भी कुछ एक पत्रकारों की पिटाई हुई थी। कारण जो भी रहे हों। बहरहाल, इस समय जो बिहारियों पर राजनीती हो रही है, मुझे लगता है कि ये सब मीडिया की नासमझी का ही परिणाम है।<div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7278137563363677271-8416936456044949570?l=bajaar.blogspot.com'/></div>राहुलnoreply@blogger.com0tag:blogger.com,1999:blog-7278137563363677271.post-6122043308101134992007-12-15T08:51:00.000-06:002007-12-15T09:09:56.861-06:00यहाँ कौन रहता है...पिछले महीने वर्ल्ड एड्स डे मनाया जा रहा था। मैं और मेरे साथी विपिन धनकड़ एक स्वयं सेवी संस्था मे एड्स रोगियों से मिलने और उनका हाल चाल लेने के लिए पहुचे। सबसे पहले आगरा से आये एक कपल के पास गए। उन लोगो की हिम्मत और जीने की आदमी अभिलाषा देख मुझे ये बिल्कुल नही लगा कि एड्स कोई ऐसी बहुत बड़ी बीमारी है जो आदमी को एकदम तोड़ देती है। पति घडी बनाने का काम करता था और हाई स्कूल पास था जबकि पत्नी एम् ए थी। वो भी समाजशास्त्र मे । उन लोगों ने बताया कि आगरा के जिस गाव से वो लोग आये हैं, काफी बड़ी संख्या मे उधर लोग एड्स के मरीज बन रहे हैं। मैंने पूछा कि क्या उधर सरकारी डिस्पेंसरी नही है या फिर अच्छे डॉक्टर नही है? उनका जवाब था कि एक तो डिस्पेंसरी कम है और दूसरे झोला छाप डॉक्टर वहाँ ज्यादा है । वो लोग बिना उबाले ही इंजेक्शन लगा देते हैं। बात आसान थी और पकड़ मे आ गई। हाँ, वहाँ दो चीज़ ऐसी पता चली जिसे जानकर मैं हिल गया । पहला तो ये कि उन लोगों ने अपनी बीमारी के बारे मे घर पर नही बताया था। दोनो की दो बेटियाँ थीं, पहली १२ वीं मे पढ़ती है और दूसरी आठवीं मे । <strong>(मैंने सोचा कि जब इन्हें पता चलेगा तो क्या होगा घर मे , कुछ भी हो, हम कितना भी कह लें, हमारे घर मे एड्स जैसी बिमारी हिला तो देती ही है )</strong> बहरहाल दूसरी बात ये थी कि उसकी पत्नी समाजसेवा का काम करती थी । बच्चों को पढाती थी, नगरनिगम से लड़कर मोहल्ले की सफाई भी करवाती थी।<br />ये सब नोट करके हमलोग वहाँ से निकले। बाहर हमे उसी मोहल्ले के एक अधेड़ उम्र के शख्स मिले। उम मुझसे पूछ रहे थे कि यहाँ क्या होता है। उनकी नज़रों मे कुछ शक सा झलक रहा था। उनने कहा कि मुझे लगता है कि यहाँ जरूर कोई गलत काम होता है। मैंने उन्हें बताया, यहाँ कोई गलत काम नही होता है। लेकिन वो मानने के लिए तैयार ही नही हो रहे थे। मैं और मेरे साथी उन्हें लगातार समझा ही रहे थे कि ये लोग बहुत बड़ी सेवा कर रहे हैं, कोई गलत काम नही। लेकिन वो थे कि समझें ही न । वो कह रहे थे कि इन लोगों को इस मोहल्ले से निकाल दिया जाय । मुझे लगी गुस्सा, मैंने उनसे कहा कि ऐसा है, ये लोग जो काम कर रहे हैं , ठीक कर रहे हैं। और अगर आपको कोई तकलीफ हो तो जाइए, जो आपसे बन पड़ता है, कर लीजिये। हम भी देखते हैं कि आप क्या करेंगे। मुझे गुस्सा इसलिए आया क्योंकि इन्ही लोगों को पहले भी तीन बार इसी मेरठ मे इन्ही कारणों से अपना आशियाना छोड़ना पड़ा था। बहरहाल तब तक मेडिकल कोंलेज मे रैगिंग की खबर मिली और हम लोग वहाँ भागे।<br />रास्ते भर मैं सोचता रहा, क्यों ये लोग ऐसा करते हैं। क्यों आदमी ही आदमी की जान का दुश्मन बन जाता है....और भी बहुत सारे सवाल....क्यों क्यों क्यों!!!<div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7278137563363677271-612204330810113499?l=bajaar.blogspot.com'/></div>राहुलnoreply@blogger.com2tag:blogger.com,1999:blog-7278137563363677271.post-41340822347120768182007-12-12T23:14:00.000-06:002007-12-12T23:16:43.857-06:00ये थी नीतू और ये रही उसकी बच्ची<img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5143321761125979058" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; CURSOR: hand; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://bp1.blogger.com/_l4k30fylmCc/R2C_5ClzU7I/AAAAAAAAARY/T39CcAObhcI/s320/123.jpg" border="0" /><br /><div><span class=""></span><a href="http://bp1.blogger.com/_l4k30fylmCc/R2C_5ClzU7I/AAAAAAAAARY/T39CcAObhcI/s1600-h/123.jpg"><img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5143321894269965250" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; CURSOR: hand; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://bp0.blogger.com/_l4k30fylmCc/R2DAAylzU8I/AAAAAAAAARg/ePwCWYYIvEc/s320/1234.jpg" border="0" /></a><br /><br /><div></div></div><div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7278137563363677271-4134082234712076818?l=bajaar.blogspot.com'/></div>राहुलnoreply@blogger.com1tag:blogger.com,1999:blog-7278137563363677271.post-21633319986332454522007-12-12T23:05:00.001-06:002007-12-13T08:58:40.415-06:00मेरी बीवी को बचा लो, वो मर जायेगीबात कल शाम की है, लेकिन लगता है कि जैसे अभी ये सब हो रहा हो। कल दोपहर तकरीबन तीन बजे मैं मेरठ के मेडिकल कालेज से निकल रहा था, मेरे मोबाइल पर एक काल आई। ये कोई राजू था जो बता रहा था कि उसकी बीवी काफी बीमार है, उसे बच्चा होने वाला है और अस्पताल वालों ने उसे मेडिकल कालेज ले जाने के लिए कहा है। बात सीधी थी, अस्पताल वालों ने उस केस को मेडिकल कालेज रेफर किया था। सो मैंने उससे कहा कि १०१ नंबर पर फोन करे और एम्बुलेंस मँगाए। वो फोन करेगा और उसे एम्बुलेंस मिल जायेगी, ये सोच कर मैं घर कि तरफ खाना खाने चल दिया। लेकिन बीच रस्ते मे ही फिर से उसका फोन आ गया कि कोई एम्बुलेंस नही मिली और उसकी बीवी मरने वाली है। इसके बाद वो फोन पर ही रोने लगा और कहने लगा कि मेरी बीवी को बचा लो, वो मर जायेगी।<br /><strong>मैं पंहुचा अस्पताल </strong><br />मैंने अपनी गाड़ी के टॉप गियर लगाए और बहुत तेजी से अस्पताल पंहुचा। ये सरकारी महिला अस्पताल था। वहाँ पहुच कर मैंने जो नज़ारा देखा, मेरे तो होश ही गायब हो गए। भयंकर लेबर पेन मे वो औरत अस्पताल के दरवाज़े के बाहर तड़प रही थी। मैंने तुरंत एक प्राइवेट नर्सिंग होम मे फोन किया और उनसे एम्बुलेंस भेजने को कहा। उन लोगो ने कहा कि वो एम्बुलेंस भेज रहे हैं। इसके बाद शुरू हुई मामले की तहकीकात। ये लोग मलियाना नाम के गाँव से आये थे । पति का नाम राजू था और पत्नी नीतू। पहले नीतू को तीन बच्चे हुए थे जिसमे दो मर गए थे। अस्पताल वालों का कहना था कि बच्चा प्री मेच्योर है और अस्पताल मे नर्सरी नही है, इसलिए वो लोग रिस्क नही लेंगे। लेकिन इस समय तक नीतू की हालत इतनी बिगड़ चुकी थी कि वही पर ओपरेशन करने के सिवा कोई दूसरा रास्ता नही था। खैर, ऑपरेशन से पहले कागजी कारवाही को लेकर भी डॉक्टरों से काफी झिकझिक हुई। राम राम कहकर ऑपरेशन शुरू हुआ और जैसे ही बच्चा पेट से बाहर निकला, उस प्राइवेट अस्पताल के एम्बुलेंस वाले उसे लेकर इन्क्युबेटर मे रखने के लिए भागे। अब अस्पताल वालों के मुह पर कालिख पुट गयी। जच्चा और बच्चा , जिसे वो कह रहे थे कि नही बचेंगे, दोनो को बचा लिया गया था। लेकिन कब तक ऐसे हर मरीज को मैंने मिलता रहूंगा.... कब तक, रोज़ ही ये लोग कोई न कोई खेल करते हैं।<div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7278137563363677271-2163331998633245452?l=bajaar.blogspot.com'/></div>राहुलnoreply@blogger.com3tag:blogger.com,1999:blog-7278137563363677271.post-20133371186280540232007-10-08T14:15:00.000-05:002007-10-08T14:15:49.896-05:00ये कूड़ा नही, इन्सान हैबात कल की है। कल सुबह तकरीबन दस बजे की। परसों रात मे देर से आया था इसलिये सुबह सोकर भी देर से ही उठा। वही दस बजे। बॉस का फोन आया कि जली कोठी के पास किसी आदमी को कूड़े मे फेंक दिया गया है, एक्सक्लूसिव है और जल्दी से कवर करना है। एक्सक्लूसिव के चक्कर मे मैं उठा , पैंट शर्ट डाली और दस मिनट मे जली कोठी पहुच गया। वहां जो कुछ भी देखा , मुझे नही पता कि दिल्ली या टी वी मे ये सब दिखाया गया होगा लेकिन इतना खराब था कि मानवीयता , इंसानियत या ऐसे किसी शब्द का प्रयोग करना उसके लिए बेकार है।<br /><br />जली कोठी मेरठ की वह जगह है जहाँ पर पूरे शहर का कूड़ा डाला जाता है। यही पर नशे की हालत मे एक लड़का बेहोश पड़ा था और लोगो ने उसपर और कूड़ा डाल दिया था जिससे उसका बदन पूरी तरह से ढँक गया था। नगर निगम की जे सी बी मशीन आई और कूड़े समेट उसे दूसरे कूड़े वाले ट्रक मे डाल दिया। आसपास के लोगो ने कूड़े मे हरकत होती देखी तो शोर मचा। पता चला कि कूड़े के ही साथ एक जिंदा इन्सान को फेंक दिया गया है। उसके सर मे गहरी चोट थी। तुरन्त उसे अस्पताल पहुचाया गया।<a href="http://bp3.blogger.com/_l4k30fylmCc/Rwp998_0oxI/AAAAAAAAAPc/gKR9LpSqYjI/s1600-h/kuda+copy.jpg"><img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5119042429759300370" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" src="http://bp3.blogger.com/_l4k30fylmCc/Rwp998_0oxI/AAAAAAAAAPc/gKR9LpSqYjI/s320/kuda+copy.jpg" border="0" /></a> अस्पताल मे इमरजेंसी मे जो डॉक्टर था , उसने पहले से ही नशे की गोलियां ले रखी थी और उसी हालत मे वह उसे देख रहा था। उस डॉक्टर ने उसे वार्ड मे भरती कर दिया। जब स्ट्रेचर से लोग उसे ले जा रहे थे तो एक आदमी ने उसके हाथ मे लगी ड्रिप नोची और उसे उसके मुह से लगा दिया। मैं फिर से उसी डॉक्टर के पास आया और उससे पूछा कि उसका इलाज क्यों नही कर रहे। उसने बताया कि उसने सर्जन और फिजिशियन को लिख दिया है। जब वो आएंगे तब उसे देखा जाएगा। मैंने उससे पूछा कि वो खुद क्यों नही देखता तो वह उल्टे मुझसे पूछने लगा कि क्या मैं पत्रकार हूँ ? मैंने कहा कि क्या मेरे पत्रकार होने की वजह से आप उसे देख लेंगे ? उसने कहा कि अगर आप पत्रकार हैं तो जाइए छाप दीजिए और अगर नही हैं तो इस कमरे से बाहर निकल जाइये। बहरहाल बहस तो ख़ूब हुई लेकिन उसका जिक्र यहाँ बेमानी है। एक घंटे तक मैं अस्पताल मे रहा लेकिन उसे देखने कोई नही आया। परसों ही दो बच्चियाँ डायरिया से उसी अस्पताल मे मरी और सिर्फ इसलिये क्योंकि रात भर उन्हें कोई डॉक्टर देखने नही आया। दोनो सगी बहने थी और उनके अलावा उनके घर मे कोई दूसरा बच्चा नही था। ठीक उसी तरह यहाँ मेरठ मे हर दूसरे दिन डेंगू से एक मौत हो रही है। अस्पताल के लोग मानने के लिए तैयार ही नही हो रहे हैं कि शहर मे डेंगू है। यहाँ तक कि कमला , जाकिर कालोनी , लाख्खिबाग, इस्लामाबाद और ऐसे कई सारे इलाक़े हैं जहाँ स्वास्थ्य विभाग के लोग रोज दावे करते हैं कि दवाईयां डाली जा रही है , फागिंग हो रही है लेकिन हकीकत मे कही कुछ भी नही हो रहा है। <br /><br />मैं परेशान हूँ क्योंकि अस्पताल के डॉक्टर कहते हैं कि वो बच्चियाँ पहले से ही बीमार थीं। मैं परेशान हूँ क्योंकि मुझे आये दिन यही सब देखना पड़ता है। मैं परेशान हूँ कि मैं कुछ भी नही कर पा रहा। क्या इस परेशानी से निकलने का कोई रास्ता है ?<br /><br /><strong>:- फोटो उसी आदमी की है। </strong><div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7278137563363677271-2013337118628054023?l=bajaar.blogspot.com'/></div>राहुलnoreply@blogger.com3tag:blogger.com,1999:blog-7278137563363677271.post-91541191856852276752007-09-29T13:57:00.000-05:002007-09-29T13:57:44.778-05:00घुघूती और अजित जी, वे जनता से कटे हुए लोग हैं...<span style="font-style: italic;">मेरे कटरा बी आर्ज़ू पर की गयी पोस्ट पर जो प्रतिक्रियाएं आयीं, मुझे लगा कि उनके जवाब में एक पोस्ट ही दे मारा जाये. हाज़िर है. पहले प्रतिक्रियाएं, जिनके जवाब देने की कोशिश की है मैंने.</span><br /><br /><dl id="comments-block"><dt id="c8088843622470620196"> <a href="http://ghughutibasuti.blogspot.com/" onclick="" rel="nofollow">Mired Mirage</a> said...</dt><dd><p>कोई भी तंत्र हो यदि जनता, विशेषकर पत्रकार सजग न रहें तो इससे पहले कि हम समझें और संभले हमारे अधिकार छीन लिए जाएँगे । ऐसे में लेखक हमें पहले से ही आगाह कर सकते हैं ।<br />यह पुस्तक पढ़ी नहीं है, अवसर मिलते ही पढ़ूँगी ।<br />घुघूती बासूती</p></dd></dl><br /><dl id="comments-block"><dt id="c6419839543503333408"> <a href="http://shabdavali.blogspot.com/" onclick="" rel="nofollow">अजित</a> said...</dt><dd><p>ठीक कहते हैं। मैं राही साहब के समूंचे गद्य साहित्य का भी प्रशंसक हूं। कटरा बी आर्ज़ू का जवाब नहीं। आपने जो जो बातें रेखांकित की हैं सब से सहमत हूं। कहां गए ऐसे लोग ? अब क्यों नहीं ऐसा लिखा जाता ?</p></dd></dl><span style="font-weight: bold;">आप सबकी प्रतिक्रियाएं जान कर अच्छा लगा. हां, मैं प्रतिक्रिया बहुत देर से दे रहा हूं.</span><br /><span style="font-style: italic; font-weight: bold;">घुघूती जी</span><br />लेखक-पत्रकार तभी घटनाओं के बारे में पहले से बता सकते हैं जबकि वे समाज के तमाम अंतर्द्वंद्वों को साफ़-साफ़ समझ सकते हों, चीज़ों को आपस में जोड़ कर देखने की उनके पास नज़र हो और घटनाओं का द्वंद्ववादी विश्लेषण करने की समझ हो. कई लेखक ऐसे रहे हैं कि उन्होंने कमाल की भविष्यवाणियां की हैं. नहीं मैं ज्योतिषवाली भविष्यवाणी की बात नहीं कर रहा, बल्कि भविष्य की दिशा के बारे में कह रहा हूं. इसमें <a href="http://www.marxists.org/archive/london/index.htm"><span style="font-weight: bold;">जैक लंडन</span> </a>का नाम शायद सबसे पहले लिया जायेगा. उन्होंने 1908 के अपने उपन्यास <a href="http://www.marxists.org/archive/london/ironheel/index.htm"><span style="font-weight: bold;">आयरन हील</span></a> में जिस तरह की घटनाओं का ज़िक्र किया है वे बाद में, 1936 तक और उसके बाद तक घटीं. अगर आप देखें तो सोवियत क्रांति, लेनिन जैसे नेता, हिटलर जैसे फ़ासिस्ट और अमेरिकी खुफ़िया पुलिस के गठन जैसी अनेक परिघटनाएं बाद में जो घटीं, उनके बारे में साफ़ साफ़ ज़िक्र आयरन हील में किया गया है. यह किसी चमत्कार के ज़रिये नहीं हुआ और न ही आयरन हील एक फैंटेसी है. यह बेहद यथार्थवादी उपन्यास है. एक कम्युनिस्ट क्रांति इसका विषय है. इसी तरह शोलोखोव के उपन्यास <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/And_Quiet_Flows_the_Don"><span style="font-weight: bold;">एंड क्वायट फ़्लोज़ द डोन</span></a> के बारे में भी कहा जा सकता है, जिसमें सोवियत संघ के विघटन के सूत्र आसानी से तलाशे जा सकते हैं.<br /><blockquote></blockquote><span style="font-weight: bold; font-style: italic;">अजित भाई<br /></span>आपके सवाल का जवाब भी शायद इसी में है. मुझे लगता है कि हमारे देश के अधिकतर समकालीन फ़िक्शन लेखकों के पास वह नज़र या समझ ही नहीं है, भले ही उनके साथ वामपंथी या प्रगतिशील या कम्युनिस्ट होने का टैग लगा हुआ हो. टैग लगा लेने से कोई वही नहीं हो जाता. एक और बात है कि हमारे यहां केवल सांप्रदायिक नहीं होने या इसका विरोधी होने भर से लेखक को वाम या प्रगतिशील लेखक मान लिया जाता, भले ही उसके सोच में सामंती तत्व बने हुए हों और वह उतनी सूक्ष्मता से न सोच-देख पाता हो. भ्रम इसलिए भी बनता है. इसके अलावा हिंदी लेखक जगत में एक बडी़ कमी यह है कि लेखक किसी आंदोलन से जुडे़ हुए नहीं हैं. वे पूरी तरह जनता के संघर्षों से कटे हुई हैं. उन्हें कई बार ज़मीनी हालात का पता भी नहीं होता और वे सिर्फ़ दिल्ली और दूसरे शहरों में बैठ कर बस लिखते रहने को अपने आप में एक महान कार्य समझते हैं. ऐसे में जो हो सकता है वही उनके साथ हो रहा है. न उनके पास वैसी रचनाएं हैं और पाठक.<div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7278137563363677271-9154119185685227675?l=bajaar.blogspot.com'/></div>Reyaz-ul-haquebeingred@gmail.com2tag:blogger.com,1999:blog-7278137563363677271.post-8640333583582518792007-09-29T13:22:00.000-05:002007-09-29T13:22:03.664-05:00हवा में रहेगी, मेरे ख्याल की बिजली : भगत सिंह और आज का भारत<a style="font-style: italic;" href="http://dakhalkiduniya.blogspot.com/">दखलवाले </a><span style="font-style: italic;">मित्र चंद्रिका ने हमें यह आलेख बहुत पहले भेजा था. हमने सोचा था कि इसे 28 को पोस्ट किया जायेगा. पर पटना में बारिश ने इस तरह के रंग दिखाये कि दिन-दिन भर या तो बिजली गायब रही याइंटरनेट कनेक्शन ठीक से काम नहीं कर पाया. इसलिए इसमें देर हुई. फिर भी, चंद्रिका ने जो सवाल उठाये हैं, वे मौजूं हैं और हमें उन पर सोचने की ज़रूरत है.</span><br /><br /><span style="font-size:130%;"><span style="font-weight: bold;">चंद्रिका</span></span><br /><span style="font-size:130%;"><span style="font-weight: bold;">हर </span></span>बार की तरह इस बार भी 28 सितंबर को भगत सिंह का जन्म दिवस मनाया जायेगा. स्कूलों में बच्चे भगत सिंह की तरह हैट पहन कर आयेंगे, जिस पर लिखा रहेगा 'आइ मिस यू भगत सिंह,! उनकी प्रतिमा के बगल में लाल झंडे टांग कर नेता चिल्लाते हुए बतायेंगे कि भगत सिंह ने संसद में बम क्यों फोड़ा, दूसरे दिन कुछ और सेज परियोजनाओं की मंजूरी पर हस्ताक्षर किये जायेगें. विचार-गोष्ठी में यह बताया जायेगा कि भगत सिंह आम जनता की आजादी चाहते थे, कुछ लोगों को नक्सली होने के आरोप में गिरफ्तार किया जायेगा, अखबारों में छपेगा कि भगत सिंह, छुआछूत, धर्म, जाति की संकीर्णता को दूर करना चाहते थे, नीचे के कालम में किसी दलित को मंदिर में घुसने के कारण पीट-पीट कर मार डालने की खबर रहेगी. जन्म दिवस मनाने के बाद भगत सिंह की प्रतिमा को किसी कमरे में रख दिया जायेगा और गांधी के जन्म दिवस की तैयारी शुरू कर दी जायेगी. यह एक परंपरा रही है.<br /> <blockquote></blockquote> दुनिया के सामने भगत सिंह का जो चेहरा जाने-अनजाने में रखा गया है वह किसी जुनूनी व मतवाले देशभक्त का है. भगत सिंह के विचार, उनके दर्शन को लोगों से दूर रखा गया पर वक्त ने देश को उस मुकाम पर ला खड़ा किया है जहां भगत सिंह के विचार और प्रासंगिक होते दिख रहे है. जिस आम जन की बात भगत सिंह करते थे वह मंहगाई, गरीबी, भूख से पीड़ित होकर अपने को हाशिये पर महसूस कर रहा है. वह देश में बनाये गये कानूनों, नियमों की पक्षधरता को देखते हुए उनके प्रतिरोध में खड़ा हो रहा है.<br /> <blockquote></blockquote>देश को अंगरेजी सत्ता से मुक्त होने के 60 साल बाद भी देश का आम जन उस आजादी को नहीं महसूस कर पर रहा है, जो भगत सिंह, पेरियार, आंबेडकर का सपना था. आज वे स्थितियां, जिनका भगत सिंह ने स्वतंत्रता आंदोलन के समय आकलन किया था, लोगों के सामने हैं. आंदोलन के चरित्र को देखते हुए भगत सिंह ने कहा था कि कांग्रेस के नेतृत्व में जो आजादी की लडाई लड़ी जा रही है, उसका लक्ष्य व्यापक जन का इस्तेमाल करके देशी धनिक वर्ग के लिए सत्ता हासिल करना है. यही कारण था कि देश का धनिक वर्ग गांधी के साथ था. उसे पता था कि जब तक देश को अंगरेज़ी सत्ता से मुक्ति नहीं मिलेगी, तब तक बाजार में उसका सिक्का जम नहीं सकेगा. आखिरकार हुआ भी वही, जिसे भगत सिंह गोरे अंगरेजों से मुक्ति व काले अंगरेजों के शासन की बात करते थे. आज आम आदमी इस शासन तंत्र में अपनी भागीदादी महसूस नहीं कर रहा है. उसके लिए आज भी अंगरेजों द्वारा दमन के लिए बने नियम-कानून नाम बदल कर या उसी स्थिति में लागू किये जा रहे हैं. आजादी के 60 वर्ष बाद सरकार को एफ़्स्पा, पोटा, राज्य जन सुरक्षा अधिनियम जैसे दमन कानूनों की जरूरत पड़ रही है, क्योंकि जन प्रतिरोध का उभार लगातार बढ़ रहा है.<br /> <blockquote></blockquote>आजादी के बाद कई मामलों में स्थितियां ओर भी विद्रूप हुई हैं. जहां 42 में केरल के वायनाड जिले में इक्का-दुक्का किसानों की मौतें होती थीं, वहां आज स्थिति यह है कि देश के विभिन्न राज्यों में हजारों हजार की संख्या में किसान आत्महत्याएं कर रहे हैं. आज भी देश में कालाहांडी जैसी जगह है, बल्कि काला हांडी से एक कदम ऊपर देश की एक बड़ी आबादी है, जो जीवन की मूलभूत जरूरतों से जूझ रही है. जो इसलिए भी जिंदा रखी गयी है ताकि अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिये वह सस्ते में श्रम को बेच सके. इसके बावजूद आज एक बड़े युवा वर्ग के लिए करने को काम नहीं है. इस कारण वह किसी भी तरह का अपराध करने को तैयार है. भारत एक बड़ी युवा संख्या की विकल्पहीन दुनिया है.<br /><blockquote></blockquote>ऐसी स्थिति में यह बात सच साबित होती है कि भगत सिंह जिस आजादी की तीमारदारी करते थे वह आजादी देश को नही मिल पायी है. भगत सिंह देश, दुनिया को लेकर एक मुकम्मल समाज बनाने का सपना देखते थे, जिसमें वे अंतिम आदमी को आगे नहीं लाना चाहते थे, बल्कि सबको बराबरी पर लाना चाहते थे. जहां जाति, धर्म, भाषा के आधार पर समाज का विभाजन न हो. वे शोषण व लूट-खसोट पर टिके समाज को खत्म करना चाहते थे, वे किसी प्रकार के भेदभाव को खारिज करते थे. उनका मानना था कि दुनिया में अधिकांश बुराइयों की जड़ निजी संपत्ति है. इस संपत्ति को शोषण व भ्रष्टाचार के जरिये जुटाया जाता है, जिसकी सुरक्षा के लिए शासन की जरूरत पड़ती है. यानी निजी संपत्ति के ही कारण समाज में शासन की जरूरत पड़ती है.<br /> <blockquote></blockquote> एक लंबे अरसे तक भगत सिंह को आतंकी की नजर से देखा जाता रहा, जिसको भगत सिंह ने अपने साथियों के साथ विचार-विमर्श करते हुए कहा कि मैं आतंकी नहीं हूं. आंतकी वे होते हैं, जिनके पास समस्या के समाधान की क्रांतिकारी चेतना नहीं होती. क्रांतिकारी चिंतन की पकड़ के अभाव की अभिव्यक्ति ही आतंकवाद है, पर क्रांतिकारी चेतना को हिंसा से कतई नहीं जोड़ा जाना चाहिए, हिंसा का प्रयोग विशेष परिस्थिति में ही करना जायज है, वरना किसी जन आंदोलन का मुख्य हथियार अहिंसा ही होनी चाहिए. हिंसा-अहिंसा से किसी व्यक्ति को आतंकी नही माना जा सकता. हमें उसकी नीयत को पहचानना होगा, क्योंकि यदि रावण का सीताहरण आतंक था तो क्या राम का रावण वध भी आतंक माना जाये? अपने अल्पकालिक जीवन के दौरान भगत सिंह ने कई विषयों पर लिखा, पढ़ा व सोचा समझा, और यह कहते गये कि-<br /> <span style="font-weight: bold;"> हवा में रहेगी, मेरे ख्याल की बिजली.</span><br /><span style="font-weight: bold;"> ये मुस्ते खाक है फानी रहे, रहे न रहे... </span><div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7278137563363677271-864033358358251879?l=bajaar.blogspot.com'/></div>Reyaz-ul-haquebeingred@gmail.com2tag:blogger.com,1999:blog-7278137563363677271.post-54964915137683656642007-09-20T12:27:00.000-05:002007-09-20T12:27:34.272-05:00मुम्बई से लौटते उदास चेहरों की दास्ताँ<strong>प्रभात</strong><br /><em>बीस साल हुए जब प्रभात बरेली मे अमर उजाला के दफ्तर गए फोटोग्राफर बनने और बन गए अखबारनवीस । बरेली संस्करण मे सम्पादकीय के सभी विभागों मे काम किया, रिपोर्टिंग से लेकर रविवारीय पन्ने के संपादन तक। लेकिन, फोटोग्राफी की लत थी कि बढती ही गई । जितना घूमा या फिर लिखा, उसके मूल मे वजह तसवीरें उतारना ही रहा। आजकल दैनिक जागरण के नए अखबार आई नेक्स्ट के लिए काम कर रहे हैं । बजार के लिए उन्होने ये लेख अपनी किताब "आज के दौर की अखबारनवीसी " से दिया है । </em><br /><br /><br /><br />मुम्बई से आने वाली रेलगाड़ियों मे इन दिनों फैज़ाबादियों की तादाद बढ़ गई है। गर्मियों की शुरुआत के साथ पूर्वांचल लौटने वाले यों भी ज्यादा होते हैं। ब्याह - गौने के दिन जो शुरू होने वाले हैं। मगर इन चेहरों पर उत्साह का कोई उल्लास नही, सफ़र की थकान भी नही, सब कुछ छीन लिए जाने की उदासी दिखती है। मुम्बई पुलिस इन दिनों नाईट क्लबों -बियर बार को लेकर अचानक सख्त हो गई है। रोज़ रोज़ छापे , गिरफ्तारियां , नए नए कायदे-निर्देश। इन बंधनों ने उनसे उनकी रोज़ी छीन ली। तारून के बेलगरा, तकमीनगंज,मामगंज, और रसूलाबाद जैसे इलाकों से मुम्बई गए तमाम कुनबे लॉट आये हैं। मुम्बई के नई 'नैतिकता' के मारे इंसानी चहरे , नाचने गाने के बहाने सनातन इंसानी फितरत मे अपनी बेहतरी तलाशते चिचुक गए चहरे। हाथ, गले और उँगलियों की सुनहरी चमक उनकी पेशानी की रेखाओं पर कोई असर नही डालती। कल क्या होगा, किसी को अंदाज़ नही। अब देखा जाएगा दो चार महीने बाद।<br /><br />बेलगरा बाज़ार से आगे जाती सड़क के किनारे खडे सेमल के उंचे पेड़ों से उतरकर आँचल फैलाती शाम , साईकिल के कैरियर पर बैठी वह युवती एक झटके से उतरकर घर के सामने पडी चारपाई पर बैठ जाती है। सवालिया निगाहों से ताकती है और फिर दूसरी तरफ मुह करके पान की पीक थूकती है। उस घर को देखकर एकबारगी किसी को अंदाज़ नही होगा कि मुम्बई की चकाचौंध भरी दुनिया से भी इसका कोई नाता हो सकता है। मगर सच तो यही है। माया मुम्बई मे रहती हैं अपनी बेटी खुशबु के साथ। गहनों से लदी स्थूलकाय महिला मीना हैं, उनकी बहन। थोड़े संकोच के साथ शुरू हुई पूरी बातचीत मे मुम्बई के कारोबार की असलियत अप्रत्यक्ष रुप से बनी रही। शुरुआत की माया की बुआ रामवती ने जो एक जमाने मे थियेटर कम्पनी मे अभिनय करती और गाती भी थी। बनारस मे बाकायदा उस्ताद शुकरुल्ला से तालीम और फिर थियेटर की बाइज़्ज़त नौकरी। मगर तब का ज़माना और था, रियासतें थीं , जमींदार थे सो ऎसी तंगी नही थी। माया मुम्बई मे हाजी अली के पास एक बियर बार मे काम करती थी। काम यानी डांस। पिछले महीने किसी होटल मे किसी नेता को पीट दिया गया और फिर तो ख़ूब हंगामा हुआ। कार्निवल बार, जहाँ वह काम करती थी, बंद हो गया। काम के बारे मे पूछने पर बताती हैं कि नाच गाना और क्या। कभी किसी ने पूछ लिया कि जूस पीने चलोगी तो चले जाते हैं। वहीँ हज़ार पांच सौ दे देता है। फिर होटल मे बुलाता है। यही है कुल जिंदगी। फारस रोड पर चिक्कलबाड़ा की एक चाल, जिसमे एक ही कमरे मे बाथरूम और रसोई सब कुछ और बार की जगमग रातें। यहाँ लौट आने पर मुम्बई बहुत याद आता है उन्हें। क्या मुम्बई की सुबह ! 'कहॉ का सवेरा बाबू। रात भर तो हाड तोड़ते -जागते हैं , कब सुबह हो जाती है पता ही नही चलता। फिर लौटकर दिन भर सोते हैं' बताती हैं माया। उन्हें अफ़सोस है कि अपनी बेटी के लिए कुछ नही कर पाई । फिरोजी रंग की पोशाक मे घर के अन्दर बाहर घूमती वह किशोरी भी उनके साथ बार मे जाने लगी थी। हाव भाव मे ग्राम्य परिवेश से अलग होने की अभिजात किस्म की झलक। पुलिस ने कह दिया है कि २१ साल से कम की युवतियाँ अब बार मे डांस नही करेंगी। सो उसका आसरा भी गया। यों और करे भी तो क्या, उसे पढ लिखा नही पाई। बेटा है जो यहीं रहकर पढता है।<br /><br />बताती हैं कि एक भाई को पढ़ाया लिखाया , दूसरे भाई-भाभी और बहन को भी देखती है। ये सब यहीं गाँव मे ही रहते हैं। कई बार मन करता है कि कुछ और जमीन खरीदकर यहीं गाँव मे ही रह जाएँ मगर हो नही पाता। यह मुम्बई की कशिश है जो बार बार खींच ले जाती है। माया को पछतावा है , मुम्बई से लौट आने का नही, इस पेशे मे आने का। कहती हैं कि अब न तो पैसा है और ना ही इज़्ज़त रह गई है इस पेशे मे। फिर भी यही क्यों ! माया का जवाब बाक़ी सारे सवालो को खामोश कर देता है। ' इस पेशे मे सबको तलाश है एक एसे शख्स की जो अपना लेगा, ढ़ेर सारा पैसा देगा और अपना नाम भी। इज़्ज़त की इसी जिंदगी की तलाश मे जाने कितनी जिंदगियां गर्क हो जाती हैं। मगर आस है कि पीछा ही नही छोडती।' यह सेलयुलायड का 'चांदनी बार' नही, जिंदगी है, जहाँ विडम्बनाएँ हैं , विद्रूपता है और विरोधाभास ऐसे कि फिल्मी कहानी फिस्स हो जाए ।<br /><br /><em></em><div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7278137563363677271-5496491513768365664?l=bajaar.blogspot.com'/></div>राहुलnoreply@blogger.com0tag:blogger.com,1999:blog-7278137563363677271.post-51173088257187996542007-09-01T10:09:00.000-05:002007-09-01T10:09:34.147-05:00कटरा बी आर्ज़ू और आज का लोकतंत्र<span style="font-family:arial;"><span style="font-weight: bold;"><span style="font-size:130%;">क</span></span>टरा बी आर्ज़ू जब पहली बार मैंने पढ़ना शुरू किया था तो यह मुझे साधारण से मुहल्ले की कहानी लगी थी-जैसा हर मुहल्ला होता है. राही साहब की पाठकों से सीधे एक रिश्ता बना लेने और अपने पाठ के बारे में एक विश्वसनीयता कायम कर लेने की खासियत के चलते मुझे उनके उपन्यास बेहद प्रिय रहे. इस उपन्यास के साथ भी यही हुआ. जैसे ही थोडा़ आगे बढे़, पाया कि हम एक कुचक्र के गवाह बनने जा रहे हैं-जो हमारे सामने कई दशकों से रचा जा रहा है. अंततः वह कुचक्र इमरजेंसी के रूप में हमारे सामने आया.</span><br /><span style="font-family:arial;"><blockquote></blockquote>कटरा बी आर्ज़ू शायद पहला हिंदी उपन्यास है जो देश की संसदीय प्रणाली और लोकतंत्र के बारे में भ्रमों को इतनी स्पष्टता से दूर करता है. अब भी अनेक लोग मिल जायेंगे, जो यह विश्वास करते हैं कि संसद के होते हुए, न्यायपालिका के होते हुए और फिर मीडिया के होते हुए हम पर फ़ासिज़्म थोपा नहीं जा सकता. मगर इमरजेंसी और कुछ नहीं थी सिवाय फ़ासिज़्म के. उन काले दिनों के बारे में बहुत कुछ कहा-लिखा जा चुका है. आपातकाल संसद के ज़रिये ही लगाया गया था. और तब न तो मीडिया और न न्यायपालिका की कुछ खास कर पाये थे.</span><br /><span style="font-family:arial;">आज भी वैसे ही हालात हैं. बल्कि उससे बदतर. और अब तो आपातकाल की भी कोई ज़रूरत नहीं रही. संसद चलती रहती है, अदालतों में रोज़ इजलास बैठती है, अखबार हैं, चैनल हैं और गुज़रात में हज़ारों अल्पसंख्यकों को कत्लेआम से नहीं बचाया जा सका, आदिवासियों को उनकी ज़मीनों से खदेडा़ जा रहा है और कोई उनकी नहीं सुनता, नर्मदा घाटी के हज़ारों परिवारों को उनके घरों से खदे़ड़ दिया गया है, उनके लिए पुनर्वास की कोई व्यवस्था किये बगैर उनके घर डुबा दिये गये हैं. विरोधियों के लिए जेलें और पुलिस की गोलियां हैं, दमन के तमाम उपाय हैं. क्या आपतकाल में इससे अलग कुछ होता है?</span><br /><span style="font-family:arial;"><blockquote></blockquote>और ऐसे में याद आता है ज़र्मनी का अतीत. हिटलर भी संसद के ज़रिये ही सत्ता में आया था. तो संसद ऐसी चीज़ नहीं है कि उससे आश्वस्त हुआ जाये, और अदालतें, और मीडिया...</span><br /><span style="font-family:arial;"><blockquote></blockquote>और ऐसे में राही मासूम रज़ा के कटरा बी आर्ज़ू की याद आती है... जो हमें बताता है कि सपने कैसे कुचल दिये जाते हैं, और लोगों के मुंह से रोटियां कैसे छीन ली जाती हैं, और यह कि एक जनविरोधी व्यवस्था कभी लोकतांत्रिक मूल्यों की वाहक नहीं हो सकती, भले ही वह लोकतंत्र के स्थूल उपादानों जैसे संसद, संविधान आदि को बने रहने दे. राही का यह उपन्यास इमरजेंसी के बहाने देश को मिली आज़ादी के छद्म को भी उजागर करता है.</span><div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7278137563363677271-5117308825718799654?l=bajaar.blogspot.com'/></div>Reyaz-ul-haquebeingred@gmail.com7tag:blogger.com,1999:blog-7278137563363677271.post-15008037203522584062007-08-17T23:19:00.000-05:002007-08-17T23:19:35.683-05:00वो काटा !!पन्द्रह अगस्त के दिन मैंने अपनी छत से नोयडा के आसमान मे न जाने कितनी रंग बिरंगी पतंगों को नाचते , इठलाते देखा और शायद पतंग से ज्यादा लोगों को। अच्छा लगा । मैंने इस पतंग बाजी को आज़ादी से जोड़ने की कोशिश की तो यही नतीजा हाथ <a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://bp0.blogger.com/_OVm826Hx4iM/RsZzNMVceWI/AAAAAAAAAAM/CKyUfjFkPpI/s1600-h/13sankrant.gif"><img style="margin: 0pt 10px 10px 0pt; float: left; cursor: pointer;" src="http://bp0.blogger.com/_OVm826Hx4iM/RsZzNMVceWI/AAAAAAAAAAM/CKyUfjFkPpI/s320/13sankrant.gif" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5099890298530330978" border="0" /></a><span><span>लगा</span></span> कि जैसे पतंग आज़ादी से उड़ रही है लेकिन डोर किसी और के हाथ मे है , उसी तरह कहने को तो हम आजाद हैं पर डोर किसी दूसरे देश के हाथ मे हैं। फर्क यही है कि १९४७ के पहले हम मजबूरन गुलाम थे , आज हमने अपनी गुलामी मोल ले ली है। खैर, इस देश की राजनीति को छोड़ कर मैं अपनी सीधी साधी बात पर आती हूँ। मैं एक छोटे से शहर रांची की लडकी हूँ। हालांकि है तो वो भी एक राजधानी ही लेकिन so called delhi वाले , मेरा मतलब है नोयडा वाले बिना किसी भावना का ख्याल किये मुझे गाँव का ठहरा देते हैं। या शायद चार महानगरों को छोड़कर बाक़ी जगह इनके लिए गाँव जैसा ही है।<br />बहरहाल , वहाँ ऎसी पतंगबाजी का नज़ारा रोज़ ही होता है। इसके लिए किसी दिन विशेष का इन्तजार करने की जरूरत नही। बस मौसम का ख्याल जरूर होता है। इसे एक काम कि तरह नही लिया जाता है कि आज उडाना है , उड़ा लिया। और ऐसा उड़ाये कि बीस-पच्चीस हादसे तो तय हैं। मैंने अपने शहर मे इसका जो आनंद लिया , यहाँ ऎसी बात ही नही दिखी। ये सच है कि पतंग कोई मंहगी चीज़ नही पर इसका मर्म तो समझिए । वहाँ किसी की पतंग हलकी सी फटी तो चिपका के उडाई जाती है। किसी के छत पर चली गई तो जब तक उससे ले ना लें , चैन कहॉ ? सीढ़ी के नीचे चाहे चार पतंगे छुपा के रखी हों लेकिन किसी की लूटी हुई पतंग को उड़ाने का मजा कि कुछ और है। पर यहाँ ऐसा कुछ नही कि । एक कटी तो रईसों की तरह दूसरी निकली , हलकी सी फटी तो फाड़ के फेंक दिया । हो सकता है एक दिन उडाना है तो इस सबका ख्याल नही रखा जाता है। हमारे यहाँ तो रोज़ उडाना है , सो बज़ट के बारे मे भी सोचना पड़ता है।<br />पहले हम सभी छत पर चढ़ जाते थे। भाई पतंग उडाता और हम पीछे पीछे हेल्पर बनके रहते । कभी कभी डोर हमारे हाथ मे आ जाती , बस फिर क्या था.....हम लगते थे पगलाने। धीरे धीरे ये सब छूटता गया। अब उड़ाना तो नही हो पाता पर सबको उड़ाते चिल्लाते देख बहुत मजा आता है। और अगर कोई पतंग मेरे छत पर आ जाती है तो मैं चुपचाप उसे छुपा देती हूँ और सड़क पर घूमने वाले बच्चों को बुलाकर दे देती हूँ , जिनके लिए ये बहुत कीमती होता है और उसको पाकर उनके चहरे की ख़ुशी मेरे लिए शायद सबसे कीमती है।<div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7278137563363677271-1500803720352258406?l=bajaar.blogspot.com'/></div>श्रुतिnoreply@blogger.com4tag:blogger.com,1999:blog-7278137563363677271.post-67823863085040701332007-08-17T05:02:00.001-05:002007-08-17T05:02:24.487-05:00कम्युनिस्ट मुसलमानों के बीच काम क्यों करेंबजार पर चढ़ी शाहनवाज आलम की पोस्ट आतंकवादी कौन बनाता है के जवाब में एक बेनामी टिप्पणी छपी है जिसमें कम्युनिस्टों के नाम लानत भेजी गई है- यह कहते हुए कि मुसलमानों के बीच इनका कोई काम नहीं है और यहां उनका जनाधार भाजपा से भी कम है। इस आक्रोश का कारण चाहे जो भी हो लेकिन बात यह तथ्य से परे है। देश के जिन-जिन इलाकों में कम्युनिस्टों का काम है वहां अन्य समुदायों की तरह ही आनुपातिक रूप से मुसलमानों के बीच भी उनका जनाधार मौजूद है, फिर चाहे वह केरल, बंगाल और त्रिपुरा हो, आंध्र प्रदेश और बिहार हो, या फिर उत्तर प्रदेश, पंजाब, महाराष्ट्र, तमिलनाडु और अन्य राज्यों के छिटपुट इलाके हों। यह बताने का मकसद सिर्फ एक तथ्य का हवाला देना है, इसमें आत्मसंतुष्टि जैसी कोई बात नहीं है। यह हकीकत अपनी जगह है कि मुसलमानों के बीच कम्युनिज्म तो क्या उदार-वाम या मध्यमार्गी सोच की भी अपनी कोई मुख्तलिफ धारा नहीं है। इसपर अलग से विचार करने की जरूरत है क्योंकि समाजवादियों से लेकर क्षेत्रीय दलों, और तो और कांग्रेंस तक, शायद ही देश की कोई राजनीतिक धारा दावे के साथ यह कह सके कि मुसलमानों के बीच एक स्वतंत्र सोच के रूप में उसकी मौजूदगी है और वहां जरूरत पड़ने पर वह किसी कट्टरपंथी अलोकतांत्रिक विचारधारा का डटकर मुकाबला कर सकती है। कोई दो पैसे के फायदे के लिए या अपनी किसी मजबूरीवश आपके चुनाव चिह्न पर मोहर मार देता है, इसका मतलब यह तो कतई नहीं लगाया जाना चाहिए कि वह आपकी विचारधारा से जुड़ा हुआ है। कम्युनिस्टों के लिए मुसलमानों को अपनी पार्टी या जनसंगठनों में शामिल करना और मुस्लिम समुदाय के भीतर अपनी स्वतंत्र धारा बनाना दो अलग-अलग काम हैं, जिनमें पहला काम वे अपनी समझ के मुताबिक पूरी ईमानदारी और मनोयोग से करते आए हैं। इसमें जो ढीलापोली हुई है उसका शिकार उनका पूरा जनाधार हुआ है, मुसलमानों के लिए इसमें अलग से कहने को कुछ नहीं है। जहां तक दूसरे काम का सवाल है, इस बारे में अलग से उनका कभी कोई एजेंडा नहीं रहा और इसे लेकर उनके बीच काफी कन्फ्यूजन भी देखने को मिलता रहा है। बुनियादी मुश्किल दर्शन और विचारधारा के स्तर पर आती है। एक समुदाय के रूप में मुसलमानों के बीच नास्तिकता के लिए कोई गुंजाइश नहीं है और कम्युनिस्ट उस सामूहिक धार्मिकता के साथ कोई तालमेल नहीं बिठा पाते जो किसी भी मुस्लिम जमावड़े में सहज ही जाहिर होने लगती है। पुराने कम्युनिस्टों का सामना इस मुश्किल से शायद उतना न हुआ हो लेकिन जिन कम्युनिस्टों ने पिछले बीस वर्षों में, यानी 1987 के बाद से मुसलमानों के बीच काम किया है, वे इससे काफी नजदीकी से जूझते रहे हैं। आक्रामक हुए हिंदुत्व ने इस समुदाय के भीतर जो असुरक्षा पैदा की उसमें इस समुदाय के उदार हिस्सों को कम्युनिस्ट अपने सबसे भरोसेमंद सहयोगी मालूम पड़े। लेकिन इस लगाव को कोई दीर्घकालिक स्वरूप नहीं दिया जा सका क्योंकि इसका कोई सांगठनिक या वैचारिक आधार खोजा या बनाया नहीं जा सका। नतीजा यह हुआ कि जो राजनीतिक-सामाजिक शक्तियां 1989 से 1992 तक लगभग लगातार ही मुसलमानों के खिलाफ चली सांप्रदायिक हिंसा में दुम दबाए घर में बैठी रहीं या वक्त-बेवक्त मुसलमानों के खिलाफ खड़ी रहीं, वे ही बाद में उनका नेतृत्व करने लगीं। जमीनी स्तर पर 1992 के बाद से एक समुदाय के रूप में मुसलमानों का जबर्दस्त अराजनीतिकरण हुआ। विधायिका, कार्यपालिका और न्यापालिका से लेकर मीडिया तक हर संस्था से अचानक हुए मोहभंग ने उनके पैरों के नीचे से जमीन खिसका दी। आत्मरक्षा के नाम पर वे चुनाव में किसी को भी वोट देने को तैयार होने लगे, मोहल्ले का सबसे कुंदजेहन कट्टरपंथी गुंडा उन्हें अपना रक्षक लगने लगा और घरों के भीतर लाल किले से लेकर ह्वाइट हाउस तक इस्लाम का हरा झंडा गाड़ देने का दावा करने वाले कैसेट और सीडी देखने-सुनने में उन्हें अपने-अपने से लगने लगे। सन् 2004 के अप्रत्याशित सत्ता परिवर्तन के बावजूद यह स्थिति आज भी रत्ती भर बदली नहीं है लिहाजा जो लोग मुसलमानों के बीच वामपंथी या उदारवादी विचारधाराओं की अनुपस्थिति से चिंतित हैं वे यह अच्छी तरह जान लें कि यह मामला बहुत गंभीर है और इस बारे में सिर्फ कम्युनिस्टों की लानत-मलामत करने का मतलब होम्योपैथी से ऐडवांस स्टेज कैंसर का इलाज करने जैसा है। इस बारे में मैं धनिए की छौंक की तरह थोड़ा सा अपना तजुर्बा बता सकता हूं जो हर मायने में किसी भी आम कम्युनिस्ट जैसा ही है। आरा शहर में मुस्लिम इलाकों में हमारा काम पेशा आधारित था। कुछ पेशे ऐसे थे जिसमें मुसलमान मजदूरों की बहुतायत थी। जैसे दर्जी का काम, बक्सा बनाना, कुछ खास तरह के चमड़े के काम, घोड़े की नाल ठोंकने जैसे छिटपुट काम, फुटपाथ की दुकानदारी या ठेले पर अंडा-आमलेट बेचना वगैरह। इन पेशों में हमारी पार्टी सीपीआई-एमएल का पुराना संगठन मौजूद था। काम के दौरान संपर्क में आए हमारे साथी सीधे-सादे जुझारू लोग थे। राजनीतिक आधार पर अपने समुदाय में काम करना या संगठन बनाना उनकी कल्पना से परे था। 1989-92 में इस दिशा में काम शुरू हुआ तो थोड़ी कामयाबी मिली। आरा के मुस्लिम इलाकों में कुल 32 बिरादरियों के लोग रहते थे जिनमें ज्यादातर के चौधरियों के यहां हमारी बैठकें हुईं। और तो और, जुमे के दिन हमें मस्जिदों में भाषण देने के लिए बुलाया गया। लेकिन उसके बाद मुस्लिम समाज के ताकतवर और रसूखदार लोगों को लगने लगा कि अब उनकी हैसियत इतनी ही रह गई है कि वे दर्जियों, बक्सा बनाने वालों और अंडे बेचने वालों के साथ मिलकर मीटिंग करें, नारा लगाएं। नतीजा यह हुआ कि जल्द ही वे लालू यादव की पार्टी के नजदीक चले गए और मुसलमानों के बीच हमारी पार्टी पुनर्मूषको भव वाली स्थिति में आ गई। इस बात को लेकर मैं आश्वस्त हूं कि कम्युनिस्टों के लिए मुसलमानों के बीच अपना प्रभावक्षेत्र बढ़ाने का रास्ता वर्गीय और तबकाई संगठनों के निर्माण से ही शुरू होता है लेकिन इसमें भी एक मुश्किल है कि खड्डी चलाने और दर्जीगिरी जैसे मेहनतकश पेशों में भी उनका दखल दिनोंदिन कम होता जा रहा है। जहां तक सामुदायिक पहलकदमी का सवाल है तो देश की तमाम उदार वाम धाराओं को इस बारे में मिलकर कोई पहलकदमी लेनी चाहिए- फिर चाहे वे समाजवादी हों, कम्युनिस्ट हों या गांधीवादी स्वयंसेवी संगठन हों। इस तरह की एक बुनियादी कोशिश राम मनोहर लोहिया ने जमायते उलेमा ए हिंद के जरिए की थी जो ज्यादा सिरे नहीं चढ़ी लेकिन उस कोशिश से जो कुछ भी सीखा जा सके उसे सीखा जाना चाहिए। माले की तरफ से इस दिशा में हुई इन्कलाबी मुस्लिम कॉन्फ्रेंस अपने संगठन का दायरा पार नहीं कर पाई लेकिन उस पहल से भी कुछ बचाया जरूर जाना चाहिए। विचार के स्तर पर इस मामले में कम्युनिस्टों को एक बड़े जोखिम के लिए तैयार होना होगा। आप सामूहिक धार्मिकता में यकीन करने वाले लोगों और नास्तिक दर्शन में भरोसा रखने वालों को दिल से एक कभी नहीं कर सकते। मेरे ख्याल से कम्युनिस्ट विचारधारा पर काम करने वालों को इन दोनों विचारधाराओं के बीच सैकड़ों या हजारों साल लंबे सह-अस्तित्व और बहस के लिए जगह तैयार करनी चाहिए। लेनिन जब अजरबैजान और उज्बेकिस्तान जैसे तुर्क-मुस्लिम देशों की कम्युनिस्ट क्रांति को ईरान, अफगानिस्तान और अरब मुल्कों तक फैलाने का सपना देखते थे उसके पीछे शायद उनकी कुछ ऐसी ही सोच रही हो। स्टालिन की सोच का टाइम-फ्रेम इतना लंबा नहीं था लिहाजा उन्होंने 15 आजाद समाजवादी मुल्कों के एक ढीले-ढाले लेनिनवादी जमावड़े को रूसी नेतृत्व और लौह दीवारों वाले एक अकेले देश सोवियत संघ में तब्दील कर दिया। इससे न सिर्फ एक लंबी क्रांति योजना का असमय गर्भपात हो गया बल्कि मुस्लिम समुदाय के भीतर कम्युनिस्टों को लेकर एक स्थायी संदेह का बीज भी पड़ गया। इसका सबसे पहला शिकार ईरान की तूदे पार्टी हुई, जिसे एशिया की पहली समाजवादी पार्टी होने का गौरव प्राप्त है। बाद में इसी प्रक्रिया की पूर्णाहुति स्टालिन के मानसपुत्र ब्रेज्नेव ने अफगानिस्तान में रूसी फौजें भेजकर कर दी। इस इतिहास को आज पोंछा तो नहीं जा सकता लेकिन मुसलमानों के बीच उदार-वाम विचारधारा के प्रसार को अगर सचमुच कम्युनिस्ट एजेंडा पर लाना है तो भविष्य के लिए सोच के स्तर पर बंद कुछ दरवाजे जरूर खोले जा सकते हैं।<div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7278137563363677271-6782386308504070133?l=bajaar.blogspot.com'/></div>चंद्रभूषणnoreply@blogger.com2tag:blogger.com,1999:blog-7278137563363677271.post-91186922753999966342007-08-14T02:12:00.000-05:002007-08-14T02:12:53.307-05:00कम्युनिस्टों का मुसलमानो के बीच क्या आधार है ?<span style="font-style: italic;"><!--chitthajagat claim code--><br /><a href="http://www.chitthajagat.in/?claim=6zgahtq77vva" title="चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी"><img src="http://www.chitthajagat.in/images/claim.gif" border="0" alt="चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी" title="चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी" /></a><br /><!--chitthajagat claim code--><br />अक्सर</span><span style="font-style: italic;"> </span><span style="font-style: italic;">बेनाम</span><span style="font-style: italic;"> </span><span style="font-style: italic;">लोग</span><span style="font-style: italic;"> </span><span style="font-style: italic;">गुमनाम</span><span style="font-style: italic;"> </span><span style="font-style: italic;">रहकर</span><span style="font-style: italic;"> </span><span style="font-style: italic;">कुछ</span><span style="font-style: italic;"> </span><span style="font-style: italic;">ऐसा</span><span style="font-style: italic;"> </span><span style="font-style: italic;">कर</span><span style="font-style: italic;"> </span><span style="font-style: italic;">जाते</span><span style="font-style: italic;"> </span><span style="font-style: italic;">हैं</span><span style="font-style: italic;"> </span><span style="font-style: italic;">जिसे</span><span style="font-style: italic;"> </span><span style="font-style: italic;">आसानी</span><span style="font-style: italic;"> </span><span style="font-style: italic;">से</span><span style="font-style: italic;"> </span><span style="font-style: italic;">नज़रअंदाज</span><span style="font-style: italic;"> </span><span style="font-style: italic;">नही</span><span style="font-style: italic;"> </span><span style="font-style: italic;">किया</span><span style="font-style: italic;"> </span><span style="font-style: italic;">जा</span><span style="font-style: italic;"> </span><span style="font-style: italic;">सकता</span><span style="font-style: italic;"> । </span><span style="font-style: italic;">हालांकि</span><span style="font-style: italic;"> </span><span style="font-style: italic;">ये</span><span style="font-style: italic;"> </span><span style="font-style: italic;">बेनाम</span><span style="font-style: italic;"> </span><span style="font-style: italic;">भाई</span><span style="font-style: italic;"> </span><span style="font-style: italic;">कि</span><span style="font-style: italic;"> </span><span style="font-style: italic;">एक</span><span style="font-style: italic;"> </span><span style="font-style: italic;">टिपण्णी</span><span style="font-style: italic;"> </span><span style="font-style: italic;">ही</span><span style="font-style: italic;"> </span><span style="font-style: italic;">थी</span><span style="font-style: italic;"> </span><span style="font-style: italic;">लेकिन</span><span style="font-style: italic;"> </span><span style="font-style: italic;">इसे</span><span style="font-style: italic;"> </span><span style="font-style: italic;">ऐसे</span><span style="font-style: italic;"> </span><span style="font-style: italic;">ही</span><span style="font-style: italic;"> </span><span style="font-style: italic;">जाने</span><span style="font-style: italic;"> </span><span style="font-style: italic;">देना</span><span style="font-style: italic;"> </span><span style="font-style: italic;">या</span><span style="font-style: italic;"> </span><span style="font-style: italic;">इस</span><span style="font-style: italic;"> </span><span style="font-style: italic;">पर</span><span style="font-style: italic;"> </span><span style="font-style: italic;">बहस</span><span style="font-style: italic;"> </span><span style="font-style: italic;">का</span><span style="font-style: italic;"> </span><span style="font-style: italic;">न</span><span style="font-style: italic;"> </span><span style="font-style: italic;">होना</span><span style="font-style: italic;"> </span><span style="font-style: italic;">खुद</span><span style="font-style: italic;"> </span><span style="font-style: italic;">मे</span><span style="font-style: italic;"> </span><span style="font-style: italic;">कई</span> <span style="font-style: italic;">सवाल</span><span style="font-style: italic;"> </span><span style="font-style: italic;">खडे</span><span style="font-style: italic;"> </span><span style="font-style: italic;">कर</span><span style="font-style: italic;"> </span><span style="font-style: italic;">देता</span><span style="font-style: italic;"> </span><span style="font-style: italic;">है</span><span style="font-style: italic;">। </span><span style="font-style: italic;">शाहनवाज़</span> <span style="font-style: italic;"> </span><span style="font-style: italic;">के</span><span style="font-style: italic;"> </span><span style="font-style: italic;">लेख</span><span style="font-style: italic;"> "</span><a href="http://bajaar.blogspot.com/2007/08/blog-post_1307.html"><span style="font-weight: bold;">कौन</span><span style="font-weight: bold;"> </span><span style="font-weight: bold;">बनाता</span><span style="font-weight: bold;"> </span><span style="font-weight: bold;">है</span><span style="font-weight: bold;"> </span><span style="font-weight: bold;">आतंकवादी</span><span style="font-weight: bold;"> </span></a><span style="font-style: italic;">" </span><span style="font-style: italic;">पर</span><span style="font-style: italic;"> </span><span style="font-style: italic;">आयी</span><span style="font-style: italic;"> </span><span style="font-style: italic;">इस</span><span style="font-style: italic;"> </span><span style="font-style: italic;">बेनाम</span><span style="font-style: italic;"> </span><span style="font-style: italic;">टिपण्णी</span><span style="font-style: italic;"> </span><span style="font-style: italic;">ने</span><span style="font-style: italic;"> </span><span style="font-style: italic;">भी</span><span style="font-style: italic;"> </span><span style="font-style: italic;">कई</span><span style="font-style: italic;"> </span><span style="font-style: italic;">सारे</span> <span style="font-style: italic;">सवाल</span><span style="font-style: italic;"> </span><span style="font-style: italic;">खडे</span><span style="font-style: italic;"> </span><span style="font-style: italic;">किये</span><span style="font-style: italic;"> </span><span style="font-style: italic;">हैं</span><span style="font-style: italic;">।<br /><br /></span><dl id="comments-block"><dt class="comment-author" id="comment-4680995678069606933"> बेनामी ने कहा… </dt><dd style="text-align: left;" class="comment-body"> <p>शाहनवाज़ भाई ,<br />आप ने जिस गहराई से पूरे घटनाक्रम का विश्लेषण किया है , वह कबीले तारीफ़ है| लेकिन मैं आपकी कुछ बातों से इत्तेफ़ाक नही रखता | मसलन अगर सांप्रदायिकता की बात आती है तो मैं कम्युनिस्टों को भी वही खड़ा देखता हूँ जहाँ भाजपा और कॉंग्रेस जैसी सांप्रदायिकता का समर्थन करने वाली पार्टियों को. फ़र्क बस इतना है कि वामपंथी अगर बाएँ हैं तो ये लोग दाहिने हैं | लेकिन हैं दोनो अगल बगल ही. दोनो की राजनीति की दुकान ही एक दूसरे के विरोध से चल रही है और वो भी सब हवा मे ही. अगर ज़मीने बात करें तो ज़रा मुझे बताइए कि कम्युनिस्टों का मुसलमानो के बीच कहाँ और कैसा आधार है ? क्या गुजरात मे आपका कोई आधार है ? क्या तमिलनाडु मे आपका संगठन मुसलमानो के बीच कोई आधार है ? अच्छा चलिए , ये बताइए कि आपका बिहार के मुसलमानो मे कितना आधार है ? कोई मुसलमान आपका कहा मानता है ? उनमे भी तो उसी तरह के अंतर्विरोध पाए जाते हैं जिस तरह हिंदुओं मे . बल्कि कभी कभी तो ज़्यादा ही पाए जाते हैं , कम नही. अब आप कहेंगे कि मुसलमान अल्पसंख्यक हैं , दबाए गये हैं इसलिए उनकी आवाज़ को प्राथमिकता दी जाएगी . तो भाई साहब कब तक ? और मुसलमानो की जनसंख्या मे भागीदारी पर ध्यान जाता है आपका ? 18 करोड़ से उपर ही हैं , कम नही हैं. इतने मुसलमान तो पाकिस्तान मे भी नही हैं जितने कि यहाँ , भारत मे . हैं. और इस 17 करोड़ मे भी वही हिंदुओं वाला हाल है . कुछ ऊँची जातियाँ सबसे ऊपर हैं उनके नीच फिर उनके नीचे और फिर उनके नीचे. कभी इस बेहाल हुए हाल को आपमे से किसी ने जानने की कोशिश की या उसे ठीक करने की ? जब आपका कोई जनाधार नही है उनके बीच , कोई काम नही है , सिर्फ़ चिल्लाना है तो पड़े चिल्लाते रहिए. कुछ संघ वाले सुनेगे , च्यूटपुटीया छोड़ेंगे , फूल झड़ी जलाएँगे और उसकी रोशनी मे आप भी हर किसी को दिखाई देंगे. लीजिए , आपकी राजनीतिक पहचान का संकट तो हल हो गया. लेकिन मुसलमानों का क्या हुआ ? वो तो हर दंगो मे वैसे ही मारे जाएँगे जैसे कि मारे जाते हैं.</p> </dd></dl><div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7278137563363677271-9118692275399996634?l=bajaar.blogspot.com'/></div>राहुलnoreply@blogger.com5tag:blogger.com,1999:blog-7278137563363677271.post-3145922874123830962007-08-12T23:41:00.000-05:002007-08-12T23:41:12.918-05:00कौन बनाता है आतंकवादी ?<span style="font-weight: bold; color: rgb(102, 0, 0);">शाहनवाज़</span><span style="font-weight: bold; color: rgb(102, 0, 0);"> </span><span style="font-weight: bold; color: rgb(102, 0, 0);">आलम</span><span style="font-weight: bold; color: rgb(102, 0, 0);"> </span><br /><span style="font-style: italic; color: rgb(102, 0, 0);">शाहनवाज़</span><span style="font-style: italic; color: rgb(102, 0, 0);"> </span><span style="font-style: italic; color: rgb(102, 0, 0);">का</span><span style="font-style: italic; color: rgb(102, 0, 0);"> </span><span style="font-style: italic; color: rgb(102, 0, 0);">यह</span><span style="font-style: italic; color: rgb(102, 0, 0);"> </span><span style="font-style: italic; color: rgb(102, 0, 0);">लेख</span><span style="font-style: italic; color: rgb(102, 0, 0);"> </span><span style="font-style: italic; color: rgb(102, 0, 0);">बजार</span><span style="font-style: italic; color: rgb(102, 0, 0);"> </span><span style="font-style: italic; color: rgb(102, 0, 0);">के</span><span style="font-style: italic; color: rgb(102, 0, 0);"> </span><span style="font-style: italic; color: rgb(102, 0, 0);">शुरूआती</span><span style="font-style: italic; color: rgb(102, 0, 0);"> </span><span style="font-style: italic; color: rgb(102, 0, 0);">दौर</span><span style="font-style: italic; color: rgb(102, 0, 0);"> </span><span style="font-style: italic; color: rgb(102, 0, 0);">मे</span><span style="font-style: italic; color: rgb(102, 0, 0);"> </span><span style="font-style: italic; color: rgb(102, 0, 0);">पोस्ट</span><span style="font-style: italic; color: rgb(102, 0, 0);"> </span><span style="font-style: italic; color: rgb(102, 0, 0);">किया</span><span style="font-style: italic; color: rgb(102, 0, 0);"> </span><span style="font-style: italic; color: rgb(102, 0, 0);">गया</span><span style="font-style: italic; color: rgb(102, 0, 0);"> </span><span style="font-style: italic; color: rgb(102, 0, 0);">था</span><span style="font-style: italic; color: rgb(102, 0, 0);">। </span><span style="font-style: italic; color: rgb(102, 0, 0);">मुम्बई</span><span style="font-style: italic; color: rgb(102, 0, 0);"> </span><span style="font-style: italic; color: rgb(102, 0, 0);">दंगो</span><span style="font-style: italic; color: rgb(102, 0, 0);"> </span><span style="font-style: italic; color: rgb(102, 0, 0);">को</span><span style="font-style: italic; color: rgb(102, 0, 0);"> </span><span style="font-style: italic; color: rgb(102, 0, 0);">ध्यान</span><span style="font-style: italic; color: rgb(102, 0, 0);"> </span><span style="font-style: italic; color: rgb(102, 0, 0);">मे</span><span style="font-style: italic; color: rgb(102, 0, 0);"> </span><span style="font-style: italic; color: rgb(102, 0, 0);">रखते</span><span style="font-style: italic; color: rgb(102, 0, 0);"> </span><span style="font-style: italic; color: rgb(102, 0, 0);">हुए</span><span style="font-style: italic; color: rgb(102, 0, 0);"> </span><span style="font-style: italic; color: rgb(102, 0, 0);">यह</span> <span style="font-style: italic; color: rgb(102, 0, 0);">आज</span><span style="font-style: italic; color: rgb(102, 0, 0);"> </span><span style="font-style: italic; color: rgb(102, 0, 0);">और</span><span style="font-style: italic; color: rgb(102, 0, 0);"> </span><span style="font-style: italic; color: rgb(102, 0, 0);">ज्यादा</span><span style="font-style: italic; color: rgb(102, 0, 0);"> </span><span style="font-style: italic; color: rgb(102, 0, 0);">प्रासंगिक</span><span style="font-style: italic; color: rgb(102, 0, 0);"> </span><span style="font-style: italic; color: rgb(102, 0, 0);">हो</span><span style="font-style: italic; color: rgb(102, 0, 0);"> </span><span style="font-style: italic; color: rgb(102, 0, 0);">गया</span><span style="font-style: italic; color: rgb(102, 0, 0);"> </span><span style="font-style: italic; color: rgb(102, 0, 0);">है</span><span style="font-style: italic; color: rgb(102, 0, 0);">। </span><span style="font-style: italic; color: rgb(102, 0, 0);">इसलिये</span><span style="font-style: italic; color: rgb(102, 0, 0);"> </span><span style="font-style: italic; color: rgb(102, 0, 0);">इसे</span><span style="font-style: italic; color: rgb(102, 0, 0);"> </span><span style="font-style: italic; color: rgb(102, 0, 0);">फिर</span><span style="font-style: italic; color: rgb(102, 0, 0);"> </span><span style="font-style: italic; color: rgb(102, 0, 0);">से</span><span style="font-style: italic; color: rgb(102, 0, 0);"> </span><span style="font-style: italic; color: rgb(102, 0, 0);">प्रकाशित</span><span style="font-style: italic; color: rgb(102, 0, 0);"> </span><span style="font-style: italic; color: rgb(102, 0, 0);">कर</span><span style="font-style: italic; color: rgb(102, 0, 0);"> </span><span style="font-style: italic; color: rgb(102, 0, 0);">रहा</span><span style="font-style: italic; color: rgb(102, 0, 0);"> </span><span style="font-style: italic; color: rgb(102, 0, 0);">हू</span><span style="font-style: italic; color: rgb(102, 0, 0);"> </span><span style="font-style: italic; color: rgb(102, 0, 0);">क्योंकि</span><span style="font-style: italic; color: rgb(102, 0, 0);"> </span><span style="font-style: italic; color: rgb(102, 0, 0);">जिन्होंने</span><span style="font-style: italic; color: rgb(102, 0, 0);"> </span><span style="font-style: italic; color: rgb(102, 0, 0);">इसे</span><span style="font-style: italic; color: rgb(102, 0, 0);"> </span><span style="font-style: italic; color: rgb(102, 0, 0);">नही</span><span style="font-style: italic; color: rgb(102, 0, 0);"> </span><span style="font-style: italic; color: rgb(102, 0, 0);">पढा</span><span style="font-style: italic; color: rgb(102, 0, 0);"> </span><span style="font-style: italic; color: rgb(102, 0, 0);">था</span> <span style="font-style: italic; color: rgb(102, 0, 0);">और</span><span style="font-style: italic; color: rgb(102, 0, 0);"> </span><span style="font-style: italic; color: rgb(102, 0, 0);">जिन्होंने</span><span style="font-style: italic; color: rgb(102, 0, 0);"> </span><span style="font-style: italic; color: rgb(102, 0, 0);">पढा</span><span style="font-style: italic; color: rgb(102, 0, 0);"> </span><span style="font-style: italic; color: rgb(102, 0, 0);">था</span><span style="font-style: italic; color: rgb(102, 0, 0);"> , </span><span style="font-style: italic; color: rgb(102, 0, 0);">उनके</span><span style="font-style: italic; color: rgb(102, 0, 0);"> </span><span style="font-style: italic; color: rgb(102, 0, 0);">लिए</span><span style="font-style: italic; color: rgb(102, 0, 0);"> </span><span style="font-style: italic; color: rgb(102, 0, 0);">ये</span><span style="font-style: italic; color: rgb(102, 0, 0);"> </span><span style="font-style: italic; color: rgb(102, 0, 0);">एक</span><span style="font-style: italic; color: rgb(102, 0, 0);"> </span><span style="font-style: italic; color: rgb(102, 0, 0);">अच्छा</span><span style="font-style: italic; color: rgb(102, 0, 0);"> </span><span style="font-style: italic; color: rgb(102, 0, 0);">मुद्दा</span><span style="font-style: italic; color: rgb(102, 0, 0);"> </span><span style="font-style: italic; color: rgb(102, 0, 0);">साबित</span><span style="font-style: italic; color: rgb(102, 0, 0);"> </span><span style="font-style: italic; color: rgb(102, 0, 0);">हो</span><span style="font-style: italic; color: rgb(102, 0, 0);"> </span><span style="font-style: italic; color: rgb(102, 0, 0);">सकता</span><span style="font-style: italic; color: rgb(102, 0, 0);"> </span><span style="font-style: italic; color: rgb(102, 0, 0);">है</span><span style="font-style: italic; color: rgb(102, 0, 0);"> ।</span><br /><br />न्यायालय द्वारा किसी जघन्य अपराधी को सज़ा सुनाए जाने के बाद उसकी कही गयी बातों को अमूमन नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है . आमतौर पर एसे मे अपराधी भी ख़ुद को बेक़सूर ही कहता है लेकिन 1993 के मुंब्ई बम धमाकों के एक प्रमुख आरोपी अब्दुल ग़नी तुर्क ने अपना जुर्म और सज़ा दोनो क़बूल करते हुए विशेष टाडा न्यायालय के सामने जो बाते कही उसे लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता मे आस्था रखने वाला कोई भी आदमी नज़रअंदाज़ नही कर सकता . तुर्क , जिसके द्वारा रखे गए बमों से उन धमाको मे मारे गाये कुल 273 लोगों मे से 113 लोग हताहत हुए थे , ने सज़ा सुनने के बाद कहा कि वो क़ानून व्यवस्था मे आस्था रखने वाला व्यक्ति था और गुज़र बसर के लिए टैक्सी चलाता था . लेकिन 1992 के बाबरी ध्वंस और उसके बाद हुए दंगो मे मारे गए उसके समुदाय के लोगो तथा सांप्रदायिक पुलिस द्वारा क़ी गयी ज़्यादतियों के कारण वह बहुत हताश और क्रोधित था . उसने अपना जुर्म स्वीकार करते हुए कहा क़ी अगर क़ानून उसे सज़ा देता है तो श्री कृष्ण आयोग द्वारा दंगो मे दोषी पाए गाये लोगों को भी सज़ा मिलनी चाहिए . तुर्क क़ी इन बातों को नज़रअंदाज़ करना इसलिए ख़तरनाक है क्योकि ये हमारे पूरे तंत्र और उसकी खोखली धर्मनिरपेक्षता पर सवालिया निशान खड़ा करती है तो वही इसकी पृष्टभूमि मे एक बिना किसी अपराधिक रिकॉर्ड वाले साधारण नागरिक के एक ख़तरनाक आतंकवादी बनने क़ी पूरी प्रक्रिया को भी दर्शाती है . जिसके केंद्र मे अपने देश मे किसी इस्लामी सत्ता क़ी स्थापना या शरिया क़ानून लागू करवाने जैसी जेहादी मंशा नही बल्कि न्याय न मिल पाने के कारण उपजी मायूसी है. बहरहाल , बात करते हैं उस श्री कृष्ण आयोग की जिसे दिसंबर 1992 और जनवरी 1993 के मुंब्ई दंगो तथा बम विस्फोटों की जाँच के लिए नियुक्त किया गया था . जिससे इन हादसों मे मारे गये लोगों के परिजन ने न्याय मिलने की उम्मीद की थी और जिसके पूरे न होने के कारण तुर्क जैसे कई और आतंकवाद के रास्ते पर भटकने के लिए मजबूर हुए. 6 दिसंबर,1992 को बाबरी मस्जिद के गिराए जाने के बाद मुंब्ई में भड़के सांप्रदायिक दंगो में, जिनमे सरकारी आँकड़ों के मुताबिक़ 900 लोग मारे गये थे, जिनमे 575 मुस्लिम ,275 हिंदू और 45 अज्ञात धर्म (ये वो लोग थे जिनकी लाशों के कमर के निचले हिस्से ग़ायब थे या सड़ चुके थे जिसके कारण हमारी धर्मनिरपेक्ष पुलिस उनके धर्मों का पता नही लगा पाई) व 5 अन्य धर्मों के लोग थे . इसकी जाँच के लिए तत्कालीन नरसिंहा राव सरकार ने 25 जनवरी 1993 को एक आयोग नियुक्त किया, जिसके कार्य क्षेत्र मे मुंब्ई बम धमाकों को भी बाद मे जोड़ दिया गया . आयोग ने 16 फ़रवरी 1998 को महाराष्ट्र सरकार को अपनी रिपोर्ट सौंप दी . श्री कृष्ण आयोग की ये रिपोर्ट आज तक दंगो पर नियुक्त किए गये तमाम आयोगों की अपेक्षा ज़्यादा गंभीर और तटस्थ थी , विश्लेसन मे भी और सुझावों मे भी . उसकी गंभीरता का अंदाज़ सिर्फ़ इससे लग जाता है की विभिन्न राजनैतिक व धार्मिक संगठनों की बातें तो सुनी ही गयीं , मुंब्ई के टाटा इन्चिट्युट ऑफ़ सोशल साइंसेज़ के विशेषज्ञों की एक समिति भी दंगो के पीछे के सामाजिक व आर्थिक कारणो की जाँच के लिए नियुक्त की । तो वंही पुलिस व्यवस्था का, जिसका सांप्रदायिक रुझान इन दंगो मे खुलकर दिखा पर अध्ययन करने की ज़िम्मेदारी सीमा सुरक्षा बल के पूर्व महासंचालक के.एफ़.रुसतमज़ी व महाराष्ट्र के पूर्व पुलिस महानिदेशक डी.रामचनद्रन को सौंपी . ज़ाहिर था कि ऐसी गंभीर जाँच से मुख्यधारा कि तमाम पार्टियों का चरित्र खुलकर जनता के सामने आ जाता . इसलिए इस आयोग के गठन के समय से ही इसे कई तरह से बाधित करने कि कोशिश सरकारें करने लगी नरसिंहा राव कि कांग्रेस सरकार,जिस पर न्यायमूर्ति श्री कृष्ण आयोग ने रिपोर्ट मे कई जगह तल्ख़ टिप्पड़ी की है , ने 23 जनवरी 1996 को इस जाँच मे अधिक समय लग जाने का बहाना बनाकर आयोग को समेट दिया . सरकार कि ओर से यह तर्क दिया गया कि आयोग की रिपोर्ट के कारण दंगो के पुराने ज़ख़्म हरे हो जाएँगे . आम जनता मे इस मुद्दे पर तीखी प्रतिक्रिया हुई . कई संगठन इस निर्णय के विरुढ़ अदालत मे भी गाये . अंत मे जन दबाव के कारण इन दंगो मे प्रमुख भूमिका निभाने वाली भाजपा की 13 दिनो वाली सरकार के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को 28 मई 1996 को आयोग कि पुनर्स्थापना करनी पड़ी . लेकिन जैसे जैसे आयोग अपने निष्कर्षों कि ओर बड़ रहा था , वैसे वैसे इसे लेकर विभिन्न राजनीतिक पार्टियों मे खलबली मचने लगी . हद तो तब हो गयी , जब बिना रिपोर्ट पढ़े ही शिवसेना - भाजपा गठबंधन सरकार ने इसे हिंदू विरोधी और मुस्लिम समर्थक घोषित करते हुए मानने से इनकार कर दिया . विपक्षी कॉंग्रेस भी रस्म अदायगी मे थोड़ा ही हो हल्ला मचाकर शांत हो गयी . आख़िर क्या था इस रिपोर्ट मे कि पक्ष-विपक्ष ने अपने तमाम दलगत विभेदों को मिटाकार इस रिपोर्ट को दबा जाने कि साझा कोशिशें की और अंततः इसमे वे सफल भी हुए . 700 पृष्ठों तथा दो हिस्सों मे विभाजित श्री कृष्ण आयोग कि रिपोर्ट ने 1992-93 के दंगो के लिए मुख्य रूप से शिवसेना-भाजपा को ज़िम्मेदार माना है . रिपोर्ट के पहले खंड के पृष्ठ 21 पर ठाकरे का उल्लेख किया है कि "8 जनवरी,1993 से शिवसेना और शिव सैनिकों ने मुसलमानों के जान माल पर संगठित हमले किए . एक शक्तिशाली सेनापति की तरह इन हमलों का नेतृत्व शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे ने किया. उनके मार्गदर्शन मे शाखा प्रमुखों से लेकर शिवसेना नेताओं तक , सभी ने दंगो मे भाग लिया." इसी तरह इस दंगो के समय शासन कर रही सुधाकर राव नाइक की कॉंग्रेस सरकार की दंगो को रोकने मे अक्षमता तथा पार्टी के अंदर इस मुद्दे पर नेताओं द्वारा एक दूसरे से पुराना हिसाब चुकाने की अवसरवादिता को भी रिपोर्ट ने बेनक़ाब किया है . श्री कृष्ण आयोग कि रिपोर्ट के दूसरे खंड के पेज 161 पर सुधाकर राव नाइक का बयान दर्ज है तो पेज 164 व 167 पर शरद पवार की गवाही है . ये दोनो बयान काफ़ी मुखर हैं . नाइक ने अपनी गवाही मे, शरद पवार जो उस समय केंद्र मे रक्षा मंत्री थे , पर दंगो को नियंत्रित करने मे सहयोग नही करने का आरोप लगाया है तो वंही शरद पवार ने अपने बयान मे नाइक के आरोपों का खंडन का उनके उपर ही अक्षमता का आरोप लगाया है . इससे साफ़ ज़ाहिर होता है कि कॉंग्रेसियों ने अपनी दलगत प्रतिस्पर्धा के लिए इस महत्वपूर्ण जाँच आयोग का उपयोग किस तरह किया . आयोग के समक्ष " दंगों को नियंत्रित करने के लिए सेना क्यू नही बुलाई गयी ? " के जवाब मे सुधाकर राव द्वारा दिया गया बयान हमारे तंत्र के संचालन कि ज़िम्मेदारी संभालने वाले लोगो कि योग्यता व क्षमता का भंडाफोड़ करता है न्यायमूर्ति ने पेज 164 पर दर्ज किया है कि " सेना की टुकड़ी को आदेश कौन देगा , इस बारे मे मुख्यमंत्री अनभिग्य थे ." दंगो के समय सुधाकर राव नाइक से वरिष्ठ नागरिकों के एक शिष्ट मंडल ने मुलाक़ात की और पुलिस पर मुसलमानों के विरुढ़ पक्षपातपूर्ण रवैये की शिकायत की तथा शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे को गिरफ़्तार करने की माँग की . लेकिन सरकार ने न तो पुलिस को फटकारा और ना ही ठाकरे या शिवसैनिकों पर कोई कार्यवाही करने का निर्णय लिया . जिसका कारण उन्होने आयोग के समक्ष " राजनीतिक" बताया . इन दंगों मे पुलिस की संदिग्ध भूमिका की जाँच पर आयोग ने अपनी रिपोर्ट का बड़ा हिस्सा ख़र्च किया और पाया की पुलिस की सांप्रदायिक मनोवृत्ति के कारण ही दंगो को नियंत्रित नही किया जा सका . तत्कालीन अपर पुलिस आयुक्त वी एन देशमुख की इस बात को आयोग ने स्वीकार किया है की " मुसलमानों के विरुद्द पुलिस वालों के मान मे एक गाँठ थी जो उनके व्यवहार मे दिखी " (पेज 12) पुलिस ने इन दंगो में कैसी भूमिका निभाई इसकी कुछ बानगी रिपोर्ट मे देखी जा सकती है " 9 जन वरी को माहिम मे रात 9 बजे शिवसेना नगर सेवक मिलिंद वैद्य के नेतृत्व मे हिंदुओं ने मुस्लिम बस्ती पर हमला किया . पुलिस हवलदार संजय गावदे भी हाथ मे तलवार लेकर इस हमले मे शामिल हो गाये " (पेज 14) तुर्क द्वारा न्यायलय में कही गयी बातों पर तो आयोग जैसे मुहर लगाता है . दंगो और बम विस्फोटों के परस्पर संबंधों को स्वीकार करते हुए आयोग कहता है की " बाबरी मस्जिद के ढहने और दिसंबर 1992 , जन वरी 1993 मे हुए दंगो का कारण मुंबई मे सांप्रदायिक फूट पड़ गयी , जिसके कारण मुसलमानों के मान मे असुरक्षा और क्रोध की भावना उपजी . राज्य सरकार और पुलिस उनकी निगाह मे दोषी थी . इन दोनो ने उनके हितों की रक्षा करने के बदले सांप्रदायिक दंगों का नेतृत्व करने वाले लोगों से हाथ मिलाया , ऐसा मुस्लिमों को पक्का विश्वास था . इन मुस्लिमों का उपयोग राष्ट्र विरोधी शक्तियों द्वारा किया गया . पाकिस्तान की गुप्तचर एजेंसी आई एस आई की मदद से उन लोगों ने क्रोधित मुस्लिमों को भड़का कर प्रतिशोध के लिए प्रेरित किया . दुबई के कुख्यात तस्कर दाउद इब्राहिम की मदद से एक बड़ा षडयंत्र रचा गया , जिसके अनुसार हिंदू बाहुल्य क्षेत्रों मे बम विस्फोट किए गये . जिनके लिए दंगों मे सताए गये मुस्लिम युवकों का इस्तेमाल किया गया . (प्रथम खंड , पेज 43 ) श्री कृष्ण आयोग के इन तथ्यों के आलोक मे देखा जाए तो स्पष्ट है की कुछ लोगों को कठोर से कठोर सज़ा देने पर भी आतंकवाद की समस्या हल नही होनी है . उल्टे अपने समुदाय मे तुर्क जैसे लोगों की छवि एक " शहीद " की ही बनेगी , जिसने न्याय न मिलने के कारण आतंक का रास्ता अपनाया . दरअसल हमारे देश के "मुस्लिम आतंकवाद" का किसी वैश्विक जेहादी मिशन से उतना संबंध नही है जितना कि हमारी अंदरूनी राजनीति से . जिसके केंद्र मे अपने ही देश मे न्याय न मिलने के कारण उपजी उपेक्षा बोध और आक्रोश है . लेकिन "सांप्रदायिक इंजीनियरिंग " पर ही पल बढ़ रही राजनीतिक पार्टियाँ इन उपेक्षितों के न्याय के दायरे मे लाकर अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मारेंगी , इसकी उम्मीद भी किसे है ?<div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7278137563363677271-314592287412383096?l=bajaar.blogspot.com'/></div>राहुलnoreply@blogger.com2