tag:blogger.com,1999:blog-7203744.post-1136775608649322272006-01-08T21:56:00.000-05:002006-01-08T22:00:08.986-05:00आज तुम मेरे लिए होप्राण, कह दो, आज तुम मेरे लिए हो ।<br /><br />मैं जगत के ताप से डरता नहीं अब,<br />मैं समय के शाप से डरता नहीं अब,<br />आज कुंतल छाँह मुझपर तुम किए हो<br />प्राण, कह दो, आज तुम मेरे लिए हो ।<br /><br />रात मेरी, रात का श्रृंगार मेरा,<br />आज आधे विश्व से अभिसार मेरा,<br />तुम मुझे अधिकार अधरों पर दिए हो<br />प्राण, कह दो, आज तुम मेरे लिए हो।<br /><br />वह सुरा के रूप से मोहे भला क्या,<br />वह सुधा के स्वाद से जाए छला क्या,<br />जो तुम्हारे होंठ का मधु-विष पिए हो<br />प्राण, कह दो, आज तुम मेरे लिए हो।<br /><br />मृत-सजीवन था तुम्हारा तो परस ही,<br />पा गया मैं बाहु का बंधन सरस भी,<br />मैं अमर अब, मत कहो केवल जिए हो<br />प्राण, कह दो, आज तुम मेरे लिए हो।<br /><br />- <a href="http://hindipoetry.blogspot.com/2005/02/blog-post_110884451797336310.html">हरिवंशराय बच्चन</a>Munishhttp://www.blogger.com/profile/01237020444765003132noreply@blogger.com