tag:blogger.com,1999:blog-7203744.post-1131825286913612542005-11-22T10:45:00.000-05:002005-12-22T11:37:23.386-05:00कफन फाड़कर मुर्दा बोलाचमड़ी मिली खुदा के घर से<br />दमड़ी नहीं समाज दे सका<br />गजभर भी न वसन ढँकने को<br />निर्दय उभरी लाज दे सका<br /><br />मुखड़ा सटक गया घुटनों में<br />अटक कंठ में प्राण रह गये<br />सिकुड़ गया तन जैसे मन में<br />सिकुड़े सब अरमान रह गये<br /><br />मिली आग लेकिन न भाग्य-सा<br />जलने को जुट पाया इन्जन<br />दाँतों के मिस प्रकट हो गया<br />मेरा कठिन शिशिर का क्रन्दन<br /><br />किन्तु अचानक लगा कि यह,<br />संसार बड़ा दिलदार हो गया<br />जीने पर दुत्कार मिली थी<br />मरने पर उपकार हो गया<br /><br />श्वेत माँग-सी विधवा की,<br />चदरी कोई इन्सान दे गया<br />और दूसरा बिन माँगे ही<br />ढेर लकड़ियाँ दान दे गया<br /><br />वस्त्र मिल गया, ठंड मिट गयी,<br />धन्य हुआ मानव का चोला<br />कफन फाड़कर मुर्दा बोला ।<br /><br />कहते मरे रहीम न लेकिन,<br />पेट-पीठ मिल एक हो सके<br />नहीं अश्रु से आज तलक हम,<br />अमिट क्षुधा का दाग धो सके<br /><br />खाने को कुछ मिला नहीं सो,<br />खाने को ग़म मिले हज़ारों<br />श्री-सम्पन्न नगर ग्रामों में<br />भूखे-बेदम मिले हज़ारों<br /><br />दाने-दाने पर पाने वाले<br />का सुनता नाम लिखा है<br />किन्तु देखता हूँ इन पर,<br />ऊँचा से ऊँचा दाम लिखा है<br /><br />दास मलूका से पूछो क्या,<br />'सबके दाता राम' लिखा है?<br />या कि गरीबों की खातिर,<br />भूखों मरना अन्जाम लिखा है?<br /><br />किन्तु अचानक लगा कि यह,<br />संसार बड़ा दिलदार हो गया<br />जीने पर दुत्कार मिली थी<br />मरने पर उपकार हो गया ।<br /><br />जुटा-जुटा कर रेजगारियाँ,<br />भोज मनाने बन्धु चल पड़े<br />जहाँ न कल थी बूँद दीखती,<br />वहाँ उमड़ते सिन्धु चल पड़े<br /><br />निर्धन के घर हाथ सुखाते,<br />नहीं किसी का अन्तर डोला<br />कफन फाड़कर मुर्दा बोला ।<br /><br />घरवालों से, आस-पास से,<br />मैंने केवल दो कण माँगा<br />किन्तु मिला कुछ नहीं और<br />मैं बे-पानी ही मरा अभागा<br /><br />जीते-जी तो नल के जल से,<br />भी अभिषेक किया न किसी ने<br />रहा अपेक्षित, सदा निरादृत<br />कुछ भी ध्यान दिया न किसी ने<br /><br />बाप तरसता रहा कि बेटा,<br />श्रद्धा से दो घूँट पिला दे<br />स्नेह-लता जो सूख रही है<br />ज़रा प्यार से उसे जिला दे<br /><br />कहाँ श्रवण? युग के दशरथ ने,<br />एक-एक को मार गिराया<br />मन-मृग भोला रहा भटकता,<br />निकली सब कुछ लू की माया<br /><br />किन्तु अचानक लगा कि यह,<br />घर-बार बड़ा दिलदार हो गया<br />जीने पर दुत्कार मिली थी,<br />मरने पर उपकार हो गया<br /><br />आश्चर्य वे बेटे देते,<br />पूर्व-पुरूष को नियमित तर्पण<br />नमक-तेल रोटी क्या देना,<br />कर न सके जो आत्म-समर्पण !<br /><br />जाऊँ कहाँ, न जगह नरक में,<br />और स्वर्ग के द्वार न खोला !<br />कफन फाड़कर मुर्दा बोला ।<br /><br />- <a href="http://hindipoetry.blogspot.com/2005/02/blog-post_110884638328792789.html">श्यामनन्दन किशोर</a><br /><br /><a href="http://static.flickr.com/42/76291906_2d0f2580ba_b.jpg" title="Image of this post"><img src="http://static.flickr.com/26/54330484_0d7054981f_o.png" style="border-style: none;" height="16" width="15" /></a>Munishhttp://www.blogger.com/profile/01237020444765003132noreply@blogger.com