tag:blogger.com,1999:blog-7203744.post-1131821632006504182005-11-12T13:50:00.000-05:002005-11-12T13:59:37.640-05:00अजनबी देश है यहअजनबी देश है यह, जी यहाँ घबराता है<br />कोई आता है यहाँ पर न कोई जाता है<br /><br />जागिए तो यहाँ मिलती नहीं आहट कोई,<br />नींद में जैसे कोई लौट-लौट जाता है<br /><br />होश अपने का भी रहता नहीं मुझे जिस वक्त<br />द्वार मेरा कोई उस वक्त खटखटाता है<br /><br />शोर उठता है कहीं दूर क़ाफिलों का-सा<br />कोई सहमी हुई आवाज़ में बुलाता है<br /><br />देखिए तो वही बहकी हुई हवाएँ हैं,<br />फिर वही रात है, फिर-फिर वही सन्नाटा है<br /><br />हम कहीं और चले जाते हैं अपनी धुन में<br />रास्ता है कि कहीं और चला जाता है<br /><br />दिल को नासेह की ज़रूरत है न चारागर की<br />आप ही रोता है औ आप ही समझाता है ।<br /><br />- <a href="http://hindipoetry.blogspot.com/2005/04/blog-post_111437501248784718.html">सर्वेश्वरदयाल सक्सेना</a><br /><br /><a href="http://static.flickr.com/30/62508358_bafa33dd51_o.png" title="Image of this post"><img src="http://static.flickr.com/26/54330484_0d7054981f_o.png" style="border-style: none;" height="16" width="15" /></a>Munishhttp://www.blogger.com/profile/01237020444765003132noreply@blogger.com