tag:blogger.com,1999:blog-7203744.post-1131112977931550942005-11-04T08:55:00.000-05:002005-11-04T09:02:57.943-05:00जल रहे हैं दीप, जलती है जवानी (२)तुम मनाते हो जिसे कहकर दिवाली<br />यह नहीं कोई प्रथा नूतन निराली<br />आज भी जग में अमा की रात काली<br />स्नेह से नव मृत्तिका के पात्र खाली<br /><br />अधर सूखे, गाल पिचके, दीन कोटरलीन आँखें<br />शलभ बेसुध छटपटाते क्लिन्न मन विछिन्न पाँखें<br />मुर्दनी वातावरण में धुएँ की घूर्णित घुटन-सी<br />दर-ब-दर फैली हुई, बदबू विकट शव के सड़न-सी<br />उग रहीं कीटाणु की फसलें<br />प्रलय-अणुबम बरसता<br />खो गयी मानव-हृदय की सब सरसता<br />और जीने के लिए जीवन तरसता<br /><br />युगों पहले एक दिन यों ही अँधेरा हो गया था<br />सूर्य, शनि, तारे छिपे सहसा, सवेरा खो गया था<br />एक काला हाथ ऊषा की ललाई धो गया था<br />गरज यह, जो कुछ न होना चाहिए वह हो गया था<br /><br />दौर नव कृषि सभ्यता का राम बन कर रम रहा था<br />कारवाँ यायावरों का बस रहा था, जम रहा था<br />झोंपड़ों में ज्योति जीवन का प्रदीप जला गयी थी<br />धरा की बेटी मनुज की ब्याहता बन आ गयी थी<br /><br />कि जिसके जनक ने धरती स्वयं जोती, स्वयं बोयी<br />कि हल की नोक में लक्ष्मी उलझ उभरी, रही खोयी<br /><br />ज़माना बाहुबल का था, स्वयंवर का बहाना था<br />जिसे पाना पिनाकी के धनुष पर ज्या चढ़ाना था<br />धनुष जो झिल न सकता था, धनुष जो हिल न सकता था<br />बिना अच्युत हुए जिसका निशाना मिल न सकता था<br /><br />धनुष को राम ने तोड़ा घने घनश्याम ने तोड़ा<br />नया निर्माण करना था पुराना तो पुराना था<br /><br />हुई आश्वस्त भयभीता<br />खिली धरती, मिली सीता<br />कि दिशि-दिशि दुंदुभी दमकी<br />वही जीता, वही जीता<br />किया जिसने अहल्या-सी शिला<br />को प्रीति-परिणीता<br /><br />धरा की आत्मजा कर में लिए वरमाल चलती थी<br />कि स्वर्णिम दीप की चल लौ अँधेरे में बिछलती थी<br />त्रियामा में किसी घनश्याम की छाती मचलती थी<br /><br />गड़ा धन पा गया मानव कि खेती लहलहाती थी<br />कि गेहूँ गहगहाता था, कि मक्का महमहाती थी<br />कि अरहर सरसराती थी, कि बजरा हरहराता था<br />कि अलसी आँख मलती थी, कि जौ में ज्वार आता था<br /><br />नयन में स्वप्न ढलते थे, हृदय में प्यार आता था<br />फसल उठती जवानी में लहरती झूम जाती थी<br />हवा दो हाथ आगे बढ़ उसे झुककर उठाती थी<br />लिपटते ही खुदी ख़ुद बेख़ुदी को चूम जाती थी<br /><br />हृदय से हृदय मिलते थे, अधर से अधर मिलते थे<br />नयी कोंपल निकलती थी, हँसी के फूल खिलते थे<br />निकट जब आग आती थी तो लज्जा भाग जाती थी<br /><br />गरज या दीपमाला सी जला करती थी धरती पर<br />नये अंकुर किलकते शुष्क बंजर, ख़ुश्क परती पर<br />मरुस्थल लहलहाता था कि चाहा चहचहाता था<br />अँधेरी रात में कोई खड़ा खेतों की मेड़ों पर<br />विकल विरहा सुनाता था<br /><br />फड़कते होंठ, सूखे तालुओं से<br />फिर तरी की माँग उठती थी<br />अचानक दिल धड़कता था<br />निशा भी जाग उठती थी<br /><br />न फिर सोने का लेती नाम थी<br />जो धुर सवेरे तक<br />कई संसार बनते ओ' बिगड़ते थे<br />अँधेरे से उजेले तक<br /><br />सहम-सी साँस जाती थी<br />शिथिल अंचल उठाती थी<br />उनींदी रात आँखों में नये सपने बसाती थी<br /><br />उभरती साँस छाती में<br />कि चोली कसमसाती थी<br />कहीं से धान की बाली<br />खड़ी चुप-चुप बुलाती थी<br /><br />चढ़ी स्वर की लहर में<br />भावना सी दौड़ जाती थी<br />रवानी खून की बढ़ कर<br />समुन्दर को सुखाती थी<br /><br />हवा में पेंग भरती थी<br />हिमालय को गलाती थी,<br />स्वयं मिटकर नयी हस्ती<br />नयी हस्ती बनाती थी<br /><br />कि नव-निर्माण की बेला<br />विधाता को लजाती थी<br />बदलते दीप थे पर<br />स्नेह लौ को खो न पाता था<br /><br />कि ब्रह्मानन्द का आनन्द<br />बासी हो न पाता था<br />क्षितिज से मेघ फटते थे<br />उषा भी खिलखिलाती थी<br />नये पत्तों पँखुरियों पर<br />नये मोती ढलाती थी<br /><br />कि दिन में दीप जलते थे<br />कि तन में दीप जलते थे<br />कि मन में दीप जलते थे<br />निशा में दीप जलते थे<br />दिशा में दीप जलते थे<br /><br />कि दीपों का नया त्यौहार घर-घर जगमगाता था<br />छलकता स्नेह पग-पग पर नयी धुन गुनगुनाता था<br />पवन नद नदी निर्झर में रवानी ही रवानी थी<br />कलि-अलि तरू-लता सब में जवानी ही जवानी थी<br /><br />नये ज्योतिष्क पिण्डों से तमस की कुछ न चलती थी<br />कहत या महामारी की न कुछ भी दाल गलती थी<br />विषमता दैन्य करूणा भूख सिर धुन-धुन के रोती थी<br />जगाजग ज्योति से उनके हृदय में जलन होती थी<br /><br />कि जो जग को रूलाने के लिए रावण बुला लायीं<br />अधमतम क्रूरकर्मा ध्वंस का धावन बुला लायीं<br />हरी खेती भरी बस्ती में जल-प्लावन बुला लायीं<br /><br />कि जिसने भव-विभवमय स्वर्ण की लंका बनायी थी<br />हजारों घर उजाड़े थे दीवाली खुद मनायी थी<br />चमकते स्वर्ण-कलशों में गरीबों की कमायी थी<br /><br />कुबेर ओ' इन्द्र जिसके द्वार पै दरबानी करते थे<br />पवन पंखा झला करता था पानी मेघ भरते थे<br />स्वयं यमराज चौखट से बँधे सब जुल्म सहते थे<br />विलासी देवगण को जिस तरह रखता था रहते थे<br /><br />प्रकृति की शक्तियाँ जिसकी सलामी निज बजाती थीं<br />हज़ारों तारिकाएँ दीपमालाएँ सजाती थीं<br />करोड़ों शव के अम्बारों पै सिंहासन बनाया था<br />धरा की नन्दिनी को बन्दिनी जिसने बनाया था<br /><br />दहलकर दम्भ से जिसको सभी दशशीश कहते थे<br />प्रबल आतंक से दो बाहुओं को बीस कहते थे<br />हवाओं की हवा उड़ती समुन्दर थरथराता था<br />जिसे लखकर खड़ी खेती को पाला मार जाता था<br /><br />ककहरा ज़ुल्म का बच्चों को बचपन से सिखाता था<br />कि वेदों और शास्त्रों की सदा होली जलाता था<br />मनन करते हुए मुनियों की खालें खींच लेता था<br />घरौंदे खेलते बच्चों की टाँगें चीर देता था<br /><br />पिताओं की सहेजी थातियों को छीन लेता था<br />किसानों के घरों के शेष दाने बीन लेता था<br />श्रमिक की रक्तमज्जा से रँगी जिसकी हवेली थी<br />धरा ने बड़े धीरज से दमन की धमक झेली थी<br /><br />- <a href="http://hindipoetry.blogspot.com/2005/02/blog-post_110884530638308877.html">शिवमंगल सिंह सुमन </a><br /><br /><a href="http://static.flickr.com/29/54366413_58b12ef116_o.png" title="Image of this post"><img src="http://static.flickr.com/26/54330484_0d7054981f_o.png" style="border-style: none" width="15" height="16"/></a>Munishhttp://www.blogger.com/profile/01237020444765003132noreply@blogger.com