<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss'><id>tag:blogger.com,1999:blog-6898673550088047104</id><updated>2009-12-31T23:38:47.899+05:30</updated><title type='text'>गाहे-बगाहे</title><subtitle type='html'>.... जब हां जी सर कल्चर में दम घुटने लगे                 और मन करे कहने का-कर लो जो करना है ....</subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://taanabaana.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6898673550088047104/posts/default'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://taanabaana.blogspot.com/'/><link rel='hub' href='http://pubsubhubbub.appspot.com/'/><link rel='next' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6898673550088047104/posts/default?start-index=26&amp;max-results=25'/><author><name>विनीत कुमार</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09398848720758429099</uri><email>vineetdu@gmail.com</email></author><generator version='7.00' uri='http://www.blogger.com'>Blogger</generator><openSearch:totalResults>321</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>25</openSearch:itemsPerPage><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6898673550088047104.post-7975712022469565596</id><published>2009-12-31T22:07:00.009+05:30</published><updated>2009-12-31T22:32:22.222+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='पेंग्विन इंडिया'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='हिन्दी किताबें'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='यात्रा बुक्स'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='हैबिटेट सेंटर'/><title type='text'>रेडियो नाटक की याद दिला गए सुमन वैद्य</title><content type='html'>मूलतः प्रकाशित &lt;a href="http://mohallalive.com/2009/12/31/an-evening-of-dramatised-readings-in-hindi-and-urdu-2/"&gt; मोहल्लाlive&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://3.bp.blogspot.com/_uS1XY77Y4b8/SzzYcPnQzxI/AAAAAAAABbk/GxrIcwPkyvE/s1600-h/Picture+001.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 240px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_uS1XY77Y4b8/SzzYcPnQzxI/AAAAAAAABbk/GxrIcwPkyvE/s320/Picture+001.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5421446031186382610" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;पाठकों का रचना से सीधा रिश्ता कायम हो, इस क्रम में &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;यात्रा बुक्स&lt;/span&gt; और &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;पेंग्विन इंडिया&lt;/span&gt; का प्रयोग सफल रहा। दिल्ली की कंपकंपा देनेवाली ठंड में भी&lt;span style="font-weight:bold;"&gt; इंडिया हैबिटेट सेंटर&lt;/span&gt; का &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;गुलमोहर सभागार&lt;/span&gt; लगभग भरा हो तो आप अंदाजा लगा सकते हैं कि रचना पाठ को लेकर पाठक अब भी कितने उत्‍सुक हैं। एक प्रकाशक की हैसियत से &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;यात्रा बुक्स&lt;/span&gt; और &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;पेंग्विन इंडिया&lt;/span&gt; ने इस बात की पहल की है कि रचना और पाठक के बीच एक स्वाभाविक संबंध विकसित हो। एक ऐसा संबंध, जो कि अख़बारों की फॉर्मूलाबद्ध समीक्षाओं और आलोचकों की इजारेदारी के बीच विकल्प के तौर पर काम कर सके। यह संबंध पाठक की गरिमा को बनाये रखे, उसे विज्ञापनदार समीक्षा पढ़ कर ग्राहक बनने पर मजबूर न करे। इस दिशा में &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;यात्रा बुक्स&lt;/span&gt; और &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;पेंग्विन इंडिया&lt;/span&gt; ने “कुछ नया कुछ पुराना” नाम से साभिनय पाठ सीरीज़ की शुरुआत की है। इस प्रकाशन संस्थान की योजना है कि प्रत्येक महीने, नहीं तो दो महीने में कम से कम एक बार हिंदी-उर्दू और दूसरी भाषाओं से हिंदी में अनूदित रचनाओं का साभिनय पाठ हो और उस आधार पर पाठक रचना से जुड़ सके।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस सीरीज़ की शुरुआत होने से पहले ही पेंग्विन हिंदी के संपादक &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;एसएस निरुपम&lt;/span&gt; ने मंच संचालक की भूमिका निभाते हुए कहा कि आलम ये है कि किताबें पाठकों की बाट जोहती रह जाती हैं। इस तरह के कार्यक्रम किताबों के इस इंतज़ार को ख़त्म करने की दिशा में काम करेंगे। साभिनय पाठ की शुरुआत युवा रंगकर्मी &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;सुमन वैद्य &lt;/span&gt;ने की। &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;सुमन वैद्य&lt;/span&gt; जितना एक रंगकर्मी के तौर पर हमें प्रभावित करते आये हैं, रचनाओं का पाठ करते हुए उससे रत्तीभर भी कम प्रभावित नहीं करते। कहानियों का पाठ करते वक्त शब्दों के उतार-चढ़ाव के साथ जो भाव-योजना बनती है, वो रेडियो नाटक जैसा असर पैदा करती है। सभागार में बैठे हमें कई बार छुटपन में सुने रेडियो के हवामहल कार्यक्रम की याद दिला गया। इसके साथ ही पाठ के मिज़ाज के हिसाब से चेहरे पर बनते-बिगड़ते भाव, हाथों और शरीर की भंगिमाएं पाठ का विजुअल एडिशन तैयार करती है। &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;मोहल्लाlive&lt;/span&gt; पर इस कार्यक्रम की ख़बर को लेकर मुंबई की रंगकर्मी&lt;span style="font-weight:bold;"&gt; विभा रानी&lt;/span&gt; साहित्य को विजुअल कम्युनिकेशन फार्म में लाने की बात करती हैं। &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;सुमन वैद्य&lt;/span&gt; के साभिनय पाठ ने उसे पूरा किया। ऐसा होने से एक तो रचना से आस्वाद के स्तर का जुड़ाव बनता है, वहीं दूसरी ओर इस बात की भी परख हो जाती है कि किसी भी रचना में माध्यम रूपांतरण के बाद आस्वाद पैदा करने की ताकत कितनी है? भविष्य में ये प्रयोग किसी भी रचना को लेकर सीरियल या फिल्म बनाने के पहले की प्रक्रिया के तौर पर आजमाये जा सकते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ नया कुछ पुराना सीरीज़ के अंतर्गत कुल पांच रचनाओं के अंशों का पाठ किया गया, जिसमें आख़‍री मुग़ल को छोड़कर बाकी चार का पाठ सुमन वैद्य ने किया। आख़री मुग़ल का पाठ&lt;span style="font-weight:bold;"&gt; ज़किया ज़हीर&lt;/span&gt; ने किया। आख़‍री मुग़ल दरअसल विलियम डेलरिंपल की अंग्रेज़ी में लिखी द लास्ट मुग़ल का हिंदी रूपांतर है। खुद ज़किया ही इसे हिंदी और उर्दू में रूपांतरित कर रही हैं। राजी सेठ की रचना मार्था का देश के अंश को थोड़ा कम करके यदि ज़िदगी ज़िंदादिली का नाम है (ज़किया ज़हीर) संकलन से कुछ और रचनाओं का पाठ किया जाता, तो ऑडिएंस ज़्यादा बेहतर तरीके से जुड़ पाती। इस पूरे साभिनय पाठ में सबसे प्रभावी रचना रही चित्रा मुदगल की बच्चों पर केंद्रित कहानियों के संकलन से पढ़ी गयी लघुकथा – दूध। इस रचना ने मुश्किल से दो से तीन मिनट का समय लिया, लेकिन सबसे ज़्यादा असर पैदा किया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-style:italic;"&gt;एक औसत दर्जे के भारतीय परिवार में दूध घर के मर्द पीते हैं। स्त्री या लड़की का काम है दूध के गुनगुने गिलास को सावधानीपूर्वक उन तक पहुंचाना। एक दिन लड़की चोरी से दूध पीती है। उसकी मां उस पर बरसती है – दूध पी रही थी कमीनी?&lt;br /&gt;लड़की का सवाल होता है – एक बात पूछूं मां? मैं जब जनमी तो दूध उतरा था तेरी छातियों में?&lt;br /&gt;हां… खूब। पर… पर तू कहना क्या चाहती है?&lt;br /&gt;तब भी मेरे हिस्से का दूध क्या तूने घर के मर्दों को पिला दिया था?&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;और कहानी ख़त्म हो जाती है। इस आधार पर समझें तो साभिनय पाठ की सफलता का बड़ा हिस्सा इस बात से जुड़ता है कि पाठ के लिए किस रचना का चयन किया गया है। कई बार ऐसा होता है कि कई रचनाएं पढ़ने के लिहाज से बहुत ही बेहतर हुआ करती हैं लेकिन साभिनय पाठ के दौरान उतना मज़ा नहीं आता जबकि कुछ में दोनों स्तरों पर मज़ा आता है। इसलिए साभिनय पाठ के लिए रचनाओं पर अधिक से अधिक होमवर्क करने की ज़रूरत है जो कि इस कार्यक्रम के दौरान समझने को मिला।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बहरहाल यात्रा बुक्स और पेंग्विन इंडिया का ये प्रयोग प्रभावित तो ज़रूर करता है। इसे हम इस रूप में भी समझ सकते हैं कि जहां दिल्ली की बड़ी आबादी नये साल की तैयारियों में जुटी है, शहरभर के स्कूल-कॉलेज बंद हैं और छुट्टी के मूड में हैं, ऐसे में शहर के पुस्तक प्रेमी इस कार्यक्रम में शामिल हुए। अशोक वाजपेयी, हिमांशु जोशी, मृदुला गर्ग, राजेंद्र धोड़पकर, कृष्णदत्त पालीवाल, राजी सेठ, चित्रा मुदगल, रवींद्र त्रिपाठी, मुरली मनोहर प्रसाद सिंह, रेखा अवस्‍थी,अभिसार शर्मा, क़ुर्बान अली सहित कई गणमान्‍य लोग रचना पाठ सुनने के लिए आये। इनमें से अधिकांश अंत-अंत तक बने रहे। कार्यक्रम के अंत की घोषणा और धन्यवाद ज्ञापन करते हुए यात्रा बुक्स की प्रकाशक &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;नीता गुप्ता &lt;/span&gt;ने कहा कि “कुछ नया कुछ पुराना” कार्यक्रम ने साहित्य और अभिनय को जोड़ने का काम किया है। इसे हम आगे भी जारी रखेंगे। नीता गुप्ता की बात को आगे ले जाकर कहा जाए तो ऐसे कार्यक्रमों को न केवल जारी रखने की ज़रूरत है बल्कि पाठकों की अलग-अलग पहुंच औऱ हैसियत के हिसाब से अलग-अलग जगहों पर आयोजित किया जाना ज़रूरी है, जिससे कि खुले तौर पर ज़्यादा से ज़्यादा लोग इसमें शामिल हो सकें। बेहतर हो कि यात्रा बुक्स और पेंग्विन इंडिया की इस पहल की देखादेखी ही सही, बाकी के प्रकाशन भी इस दिशा में आगे आएं। क्योंकि लोकार्पण और भाषणबाजी से हटकर ये अकेला कार्यक्रम है, जिसमें मुनाफे के पाले में पाठक का हिस्सा ज़्यादा है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6898673550088047104-7975712022469565596?l=taanabaana.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://taanabaana.blogspot.com/feeds/7975712022469565596/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.blogger.com/comment.g?blogID=6898673550088047104&amp;postID=7975712022469565596' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6898673550088047104/posts/default/7975712022469565596'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6898673550088047104/posts/default/7975712022469565596'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://taanabaana.blogspot.com/2009/12/blog-post_31.html' title='रेडियो नाटक की याद दिला गए सुमन वैद्य'/><author><name>विनीत कुमार</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09398848720758429099</uri><email>vineetdu@gmail.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' name='OpenSocialUserId' value='01281586745461734077'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_uS1XY77Y4b8/SzzYcPnQzxI/AAAAAAAABbk/GxrIcwPkyvE/s72-c/Picture+001.jpg' height='72' width='72'/><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6898673550088047104.post-4497518640504031781</id><published>2009-12-30T01:16:00.015+05:30</published><updated>2009-12-30T11:08:28.320+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='suman vaidya'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='hindi critic'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='penguin books'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='hindi literature'/><title type='text'>ताकि पाठकों के बीच सांस ले सके रचनाएं..</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://3.bp.blogspot.com/_uS1XY77Y4b8/SzpxaM4-EkI/AAAAAAAABbc/WJQBcX3gqcM/s1600-h/pen.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 222px; height: 320px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_uS1XY77Y4b8/SzpxaM4-EkI/AAAAAAAABbc/WJQBcX3gqcM/s320/pen.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5420769796444525122" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज की तारीख में रचना और पाठक के बीच इतनी एजेंसियां उग आयीं हैं कि पाठक और रचना के बीच सीधा और स्वाभाविक रिश्ता नहीं रह गया है। एक पाठक हालिया प्रकाशित रचनाओं को जिन माध्यमों के जरिए जान पाता है वो विश्वस्नीय नहीं रह गए हैं। अखबारों में थोक के भाव में जो पुस्तक परिचय,किताबों की समीक्षाएं छपती है वो पाठकों के बीच रुचि पैदा करने से कहीं ज्यादा मार्केटिंग करते नजर आते हैं। दुनियाभर के हिन्दी के आलोचक बाजारवाद और छोटे-मोटे स्वार्थों के विरोध में दिन-रात लिखते हैं,भाषण देते हैं जबकि रचना को लेकर पाठक के प्रति ईमानदार नहीं रह पाते। आपसी संबंधों,जुगाड़ों और मिली भगत की राजनीति के तहत रचना और किताबों को चढ़ाने और गिराने का काम करते हैं। उनका ये रवैया किताबों के बारे में लिखते समय साफ तौर पर झलकता है। नतीजा हमारे सामने है- रचना के बारे में आलोचकीय समझ के साथ लिखने के बजाय विज्ञापन करने में देश का तथाकथित महान से महान आलोचक अपनी ताकत झोंक दे रहा है। इधर रचनाकार से लेकर प्रकाशक तक नहीं चाहते कि उनकी छपी किताब या रचना की निर्मम किन्तु सच्ची आलोचना करे। इसलिए तटस्थ होकर लिखनेवालों की खेप लगातार घटती चली जा रही है और जो हैं उन्हें हाशिए पर धकेल देने में ही भलाई समझा जाता है। इस पूरे गुणा-गणित के बीच पाठक और रचना के बीच जो संबंध बनते हैं वो ग्राहक और उत्पाद का संबंध होता है जिसमें आस्वाद से कहीं ज्यादा बाजार के अधीन होकर पढ़ने और खरीदने का फार्मूला काम कर रहा होता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;पेंग्विन इंडिया&lt;/span&gt; और&lt;span style="font-weight:bold;"&gt; यात्रा बुक्स&lt;/span&gt; ने प्रकाशक की हैसियत से पाठक और रचना के बीच सीधा संबंध कायम हो,इस गरज से पहल की है। "कुछ नया कुछ पुराना" नाम से शुरु किए जानेवाले सीरिज में रचनाओं का साभिनय पाठ होगा। इसके पीछे मकसद है कि उन पुरानी रचनाओं को पाठकों के सामने एक बार फिर से सामने लाए जाएं जो कि स्थायी महत्व रखते हों। दूसरी तरफ नयी रचनाओं का साभिनय पाठ के आधार पर पाठक किसी एजेंसी के आधार पर राय कायम करने के बजाय सीधे रचना से गुजरकर राय बना सकें। ऐसा होने से आलोचकों की विश्वसनीयता को जांचने-परखने का सही मौका मिल सकेगा और रचना को बेहतर और बदतर करार दिए जाने की उनकी इजारेदारी एक हद तक टूटेगी। यह संभव है कि &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;पेंग्विन&lt;/span&gt; और &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;यात्रा बुक्स&lt;/span&gt; का ये प्रयास काफी हद तक मार्केटिंग का हिस्सा हो लेकिन इतना जरुर है कि पाठक को रचना और राय के बीच एक विकल्प मिल सकेगा। सीधे संवाद के पैटर्न पर &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;राजकमल प्रकाशन&lt;/span&gt; की भी अपनी सीरिज है लेकिन वो लेखकों से संवाद है,सीधे-सीधे रचना से नहीं।&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;पेंग्विन&lt;/span&gt; और &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;यात्रा बुक्स&lt;/span&gt; ने इस पहल के तहत साभिनय पाठ के लिए इस बार हिन्दी-उर्दू के मशहूर रचनाकारों-&lt;span style="font-weight:bold;"&gt; मोहसिन हामिद&lt;/span&gt;,&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;ज़किया ज़हीर&lt;/span&gt;,&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;राजी सेठ&lt;/span&gt;,&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;चित्रा मुद्गल&lt;/span&gt; और &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;विलियम डेलरिम्पल&lt;/span&gt; की रचानाओं को चुना है। इन रचनाओं का साभिनय पाठ के लिए एनएसडी से पासआउट प्रसिद्ध रंगकर्मी &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;सुमन वैद्य&lt;/span&gt; को विशेष तौर पर आमंत्रित किया है। आपलोगों में जिनलोगों ने भी &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;एम.के.रैना&lt;/span&gt; द्वारा निर्देशित "बाणभट्ट की आत्मकथा" देखी है वो &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;बाणभट्ट&lt;/span&gt; यानी &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;सुमन वैद्य&lt;/span&gt; की अदाकारी पर जरुर फिदा हुए होंगे। राजेन्द्र नाथ के निर्देशन में घासीराम बने सुमन वैद्य को जरुर सराह रहे होंगे। आज एक बार फिर उन्हें नए अंदाज में देखने-सुनने का मौका मिलेगा। पेंग्विन और यात्रा बुक्स ने इस साभिनय पाठ की स्थायी योजना तय की है जिसके तहत महीने में एक बार इस कार्यक्रम का आयोजन करेगी। हर बार पुरानी औऱ नयी रचनाओं का पाठ होगा। हम उम्मीद करते हैं कि इससे रचना और पाठक के बीच नए सिरे से गर्माहट पैदा होगी।&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;नोट&lt;/span&gt;- कार्यक्रम को लेकर डिटेल कार्ड में दिया गया है जिसे कि आप क्लिक करके बड़े साइज में देख सकते हैं।     &lt;br /&gt; &lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://4.bp.blogspot.com/_uS1XY77Y4b8/SzpqMdOaCSI/AAAAAAAABbM/hg1q8WqpCNM/s1600-h/su.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 111px; height: 166px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_uS1XY77Y4b8/SzpqMdOaCSI/AAAAAAAABbM/hg1q8WqpCNM/s400/su.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5420761863729842466" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;नाटकों में भूमिका के तौर पर सुमन वैद्य का परिचय-&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;Play Name Role         Director&lt;br /&gt;Short cut Arun Bakshi Sh. Ranjeet Kapoor&lt;br /&gt;Antral   Kumar(Mohan Rakesh) Sh. Ranjeet Kapoor&lt;br /&gt;Janeman         Panna Nayak     Sh.Waman Kendre&lt;br /&gt;Ban Bhatt Ban Bhatt Sh. M.K. Raina&lt;br /&gt;Batohi Batohi(Bhikari Thakur) Sh. D.R.Ankur&lt;br /&gt;Gunda     Gunda Nanku Singh Sh.Chittranjan Giri&lt;br /&gt;Ghasiram Kotwal  Ghasiram Sh. Rajender Nath&lt;br /&gt;Chanakya Vishnugupt Chandragupt Sh Souti Chakraborty&lt;br /&gt;1857 Ek Safarnama Shamsuddin Ms Nadira Zaheer Babbar&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;निर्देशन-&lt;/span&gt;&lt;br /&gt; Death Watch in Hindi written by Jian Genet in Nainital (1992)&lt;br /&gt; * Kajirangat Hahakar (Assamese) with Children in Nagaon&lt;br /&gt; Assam (2007),and in TIE Company(NSD)’s Children Theatre Festival 2009&lt;br /&gt; * Kaath Gharat Bhagwan (Assamese Translation of a Hindi&lt;br /&gt; Play written by Shri Krishna) in Nagaon Assam.(2008).&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6898673550088047104-4497518640504031781?l=taanabaana.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://taanabaana.blogspot.com/feeds/4497518640504031781/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.blogger.com/comment.g?blogID=6898673550088047104&amp;postID=4497518640504031781' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6898673550088047104/posts/default/4497518640504031781'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6898673550088047104/posts/default/4497518640504031781'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://taanabaana.blogspot.com/2009/12/blog-post_30.html' title='ताकि पाठकों के बीच सांस ले सके रचनाएं..'/><author><name>विनीत कुमार</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09398848720758429099</uri><email>vineetdu@gmail.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' name='OpenSocialUserId' value='01281586745461734077'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_uS1XY77Y4b8/SzpxaM4-EkI/AAAAAAAABbc/WJQBcX3gqcM/s72-c/pen.jpg' height='72' width='72'/><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6898673550088047104.post-8346287068750234809</id><published>2009-12-22T09:32:00.008+05:30</published><updated>2009-12-22T17:54:08.830+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='convent culture'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='hindi politics'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='ranchi'/><title type='text'>कॉन्वेंट स्कूलों के बीच आत्मनिर्भर समोसा चाट</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://3.bp.blogspot.com/_uS1XY77Y4b8/SzBMThT6K7I/AAAAAAAABbA/Yt69wezLA48/s1600-h/DSCF9619.JPG"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 240px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_uS1XY77Y4b8/SzBMThT6K7I/AAAAAAAABbA/Yt69wezLA48/s320/DSCF9619.JPG" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5417914249969806258" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चाट-समोसे के ठेले का नाम "आत्मनिर्भर समोसा चाट" देखकर मैं एकदम से&lt;a href="http://gap-shapkakona.blogspot.com/"&gt; प्रभात&lt;/a&gt; की स्कूटी से कूद गया। जल्दी से कैमरा ऑन किया और दो-तीन तस्वीरें खींच ली। मेरा मन इतने से नहीं माना। मैं जानना चाह रहा था कि आमतौर पर चाट,समोसे,फास्ट फूड और मोमोज जैसी चीजें बेचनेवाले ठेलों के नाम हिंग्लिश में हुआ करते है,फिर इसने इतना टिपिकल नाम क्यों रखा है? गरम-गरम समोसे तल रहे हमउम्र साथी से मैंने आखिर पूछ ही लिया-ये बताओ दोस्त,आपने ठेले का नाम आत्मनिर्भर चाट भंडार क्यों रखा है? उसने पीछे की तरफ इशारा करते हुए बताया कि वो भइया बताएंगे। मैंने पीछे की तरफ देखा। उस दूकान के दो दरवाजे खुलते हैं-एक पुरुलिया रोड की तरफ जहां कि संत जेवियर्स कॉलेज,उर्सूलाइन कॉन्वेंट से लेकर रांची शहर के तमाम स्कूल-कॉलेज हैं और दूसरा दरवाजा संत जॉन्स स्कूल के अंदर की ओर। आगे के दरवाजे से हम जैसे राह चलते लोग सामान खरीद सकते हैं जबकि पीछे के दरवाजे से सिर्फ स्कूल के बच्चे ही चॉकलेट,पेटिज,कोलड्रिंक,चिप्स वगैरह खरीदते हैं। पूरे पुरुलिया रोड में जहां कि एक से एक अंग्रेजी नाम से स्कूल,कॉलेज और संस्थान हैं ऐसे में सत्य भारती के बाद ये ठेला ही है जो होर्डिंग्स और दूकानों के नाम को लेकर किसी भी हिन्दी-अंग्रेजी के मसले पर सोचनेवाले को अपनी ओर बरबस खींचता है।&lt;br /&gt;ठेले के इस टिपिकल हिन्दी नाम के पीछे की कहानी बताते हुए संजय तिर्की ने कहा कि हमलोगों के एक भैइया है-धनीजीत रामसाथ। वो भइया समाज के विकलांगों के लिए कुछ करना चाहते हैं। इसलिए पहले उन्होंने प्रेस खोला। लेकिन बाद में कई अलग-अलग चीजों पर भी विचार करने लगे। अब देखिए-विकलांगों के लिए सरकारी नौकरी में कई तरह की सुविधाएं और छूट है। लेकिन ये फायदा तो उसी को मिलेगा न जो कि पढ़ा-लिखा है या फिर सरकारी नौकरी की तरफ जाना चाहता है। समाज विकलांगों का एक बड़ा वर्ग है जो कि इस नौकरी लायक नहीं है। उसे हर-हाल में छोटी-मोटी प्राइवेट नौकरी करने गुजारा करना होता है। ये लोग जब किसी दूकान वगैरह में काम मांगने जाते हैं तो सब यही कहता है कि-ये तो अपाहिज है,ये भला क्या काम करेगा। इसलिए भइया ने सोचा कि ऐसा कुछ शुरु किया जाए जिसमें कि इनलोगों को भी काम में लगाया जाए। ऐसे ही इस तरह से चाट के ठेले की शुरुआत हुई। संजय तिर्की संत जॉन्स स्कूल की जमीन पर बनी जिस दूकान को चलाते हैं उसका भी नाम आत्मनिर्भर स्टोर है जिसे कि रोमन लिपि में लिखा गया है। इसलिए एकबारगी वो अंग्रेजी लगता है लेकिन दूकान के आगे के ठेले का नाम देवनागरी लिपि में है।&lt;br /&gt;मेरे इस सवाल पर कि आज तो इतने सारे अंग्रेजी के अच्छे-अच्छे नाम है जो कि सुनने में ज्यादा स्टैण्डर्ड और बोलने में ज्यादा सहज लगते हैं फिर आपने इतना टिपिकल नाम क्यों रखा? संजय तिर्की ने जबाब दिया कि ये सिर्फ एक ठेले का नाम नहीं है,एक संस्था है जिसके तहत हम विकलांगों के लिए काम करते हैं। हम सब आत्मनिर्भर होना चाहते हैं औरों को भी करना चाहते हैं इसलिए यही नाम रखा। दूसरे नाम रख देने पर वो चीज नहीं हो पाती।&lt;br /&gt; एक टिपिकल हिन्दी नाम के पीछे संजय का तर्क मुझे बहुत ही साफ लगा। ये किसी भी भाषाई दुराग्रहों से अलग है। इस नाम के पीछे कोशिश सिर्फ इतनी भर है कि संदर्भ जिंदा रहे। इसके भीतर अंग्रेजी-हिन्दी की कोई भी बहस शामिल नहीं है। नहीं तो अकादमिक बहसों की तो छोड़िए,आम आदमी को समझाने और बताने के लिए जिस हिन्दी का प्रयोग किया जाता है उसमें दुनियाभर की पॉलिटिक्स,बेहूदापन और चोचलेबाजी शामिल है।&lt;br /&gt;कल अंबेडकर कॉलेज से गुजरते हुए मैंने सीलमपुर के इलाके में बने डस्टबिन के लिए 'डलाव'शब्द बहुत ही बड़े-बड़े अक्षर में लिखा देखा। पहले तो कुछ समझ ही नहीं आया। लगा कि कुछ मात्रा छूट गयी है लेकिन बाद में उल्टी तरफ अंग्रेजी में डस्टबिन लिखा देख समझ पाया। नई दिल्ली रेलवे स्टेशन में नए-नए बोर्ड लगे हैं। वहां की कहानी और भी दिलचस्प है। उपर से नीचे की तरफ उतरने वाली सीढ़ी के पास एक बोर्ड लगा है। एक तरफ लाइन से हिन्दी में लिखा है और तीर के निशान दिए गए हैं। दूसरी तरफ अंग्रेजी में नाम लिखा है और तीर के निशान दिए गए हैं। जिधर हिन्दी लिखा है उधर हिन्दी के ऐरो दिए गए हैं और जिधर अंग्रेजी लिखी गयी है वहां हिन्दी से उल्टी दिशा में तीर के निशान दिए गए हैं। मतलब ये कि अगर आप हिन्दी के निर्देश का पालन करते हैं तो कहीं और उतरेंगे और अंग्रेजी का फॉलो करने पर कहीं और। भाषा के बदलने के साथ ही आपका गंतव्य बदल जाएगा।&lt;br /&gt;देशभर के दर्जनों एनजीओ हैं जो कि बहुत ही चमत्कारिक ढंग से नाम रखते हैं। उनका शार्ट फार्म टिपिकल हिन्दी में होता है। लेकिन उसके फुल फार्म अंग्रेजी में होते हैं। लोगों की जुबान पर वो हिन्दी नाम हो और सांस्थानिक तौर पर अंग्रेजी में उसकी व्याख्या। नामों की इस तरह की चोचलेबाजी के बीच बहुत तरह के पचड़े,फैशन,सुविधा है।&lt;a href="http://naisadak.blogspot.com/search?updated-max=2009-11-28T18:31:00%2B06:00&amp;max-results=10"&gt; रवीश कुमार&lt;/a&gt; मोबाईल पत्रकारिता के जरिए इसे लगातार बता रहे हैं लेकिन संजय तिर्की के सादगी से दिए गए जबाब पर गौर करना जरुरी है कि- बाकी नाम में वो बात नहीं होती। यानी दूकानो,ठेलों,निर्देशों के नाम और शब्द के पीछे संदर्भों का जिंदा रहना जरुरी है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6898673550088047104-8346287068750234809?l=taanabaana.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://taanabaana.blogspot.com/feeds/8346287068750234809/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.blogger.com/comment.g?blogID=6898673550088047104&amp;postID=8346287068750234809' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6898673550088047104/posts/default/8346287068750234809'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6898673550088047104/posts/default/8346287068750234809'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://taanabaana.blogspot.com/2009/12/blog-post_22.html' title='कॉन्वेंट स्कूलों के बीच आत्मनिर्भर समोसा चाट'/><author><name>विनीत कुमार</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09398848720758429099</uri><email>vineetdu@gmail.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' name='OpenSocialUserId' value='01281586745461734077'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_uS1XY77Y4b8/SzBMThT6K7I/AAAAAAAABbA/Yt69wezLA48/s72-c/DSCF9619.JPG' height='72' width='72'/><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6898673550088047104.post-4476153148547580366</id><published>2009-12-16T11:31:00.008+05:30</published><updated>2009-12-16T12:13:44.443+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='indian marriage'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='indian society'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='feminism'/><title type='text'>अस्मिता को चाहिए योग्य वर, उर्फ बंद दिमाग पर एक चोट</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://1.bp.blogspot.com/_uS1XY77Y4b8/Syh-bBNeEnI/AAAAAAAABaQ/He2BfHo7k6M/s1600-h/Asmita-Raj-image2.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 244px; height: 320px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_uS1XY77Y4b8/Syh-bBNeEnI/AAAAAAAABaQ/He2BfHo7k6M/s320/Asmita-Raj-image2.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5415717554559521394" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;चैटबॉक्स में नीलिमा ने मुझसे कहा कि राजकिशोर ने अपनी बेटी अस्मिता का बायोडाटा मेरे पास भेजा तो मुझे आपका ध्यान आ गया। मैंने पूछा- क्यों? नीलिमा ने कहा-योग्य वर के लिए। मैंने फिर कहा-आप मजाक क्यों करती हैं? उसने कहा- सच्ची। फिर एक मिनट बाद ही उसने वायोडाटा फार्वर्ड कर दिया। मैंने बहुत ही जल्दी में अस्मिता राज का बायोडाटा देखा.फिर जब अपने शहर टाटानगर पहुंचा तो देखा कि &lt;a href="http://mohallalive.com/2009/12/11/looking-for-suitable-groom/"&gt;मोहल्लालाइव &lt;/a&gt;पर ये वायोडाटा सार्वजनिक कर दी गयी है। इस पर रवीश कुमार से लेकर बाकी लोगों के भी कमेंट हैं। अस्मिता ने अपने बायोडाटा में कई ऐसी बातें लिखी है जिससे साफ हो जाता है कि विवाह संस्था के भीतर रहकर भी नए जमाने की लड़कियां किस तरह इसके ढांचे को ध्वस्त करने में जुटी है। लकीर का फकीर और कठमुल्लेपन की धज्जियां उड़ाने में जुटी हैं। मैंने भी कमेंट किया और अस्मिता को इस काम के लिए शुभकामनाएं दी। फिर घर में अवसाद के क्षणों में भी अपने भैय्या की शादी में कुछ रंगत पैदा करने में जुट गया। बात आयी गयी हो गयी।&lt;br /&gt;लेकिन जिस टिपिकल तरीके से हिन्दू रीति-रिवाज के तहत शादी की तैयारियां और नेम धर्म शुरु हुआ,मुझे अस्मिता का बायोडाटा बार-बार ध्यान आने आने लगा। मैंने कुछ लोगों को इसे पढ़वाया,इस बारे में चर्चा की। मेरे दिमाग में बस एक ही चीज बार-बार घूमने लगी। इस देश में हजारों लड़कियां ऐश्वर्या राय बनने की होड़ में है,हजार के करीब रानी मुखर्जी भी बनना चाहती है,सानिया मिर्जा और सुनिधि चौहान भी इसके आस-पास ही बनना चाहती है। लेकिन इस बीच अस्मिता राज कहां से आ गयी? ये उन लड़कियों के खांचे में नहीं है जो बचपन के राजकुमार को अब घोड़ी पर चढ़ना देखना चाहती है। ये उन लड़कियों से अलग है जो कि अफेयर को संबंध का नाम देने के लिए जी-जान लगाती है। हर औसत दर्जे के समाज के बीच खत्तम लड़की होने की बदनामी झेलती है। ये इतनी माइक्रो समझ है कि न तो वो विवाह संस्था का खुल्लम-खुल्ला चैलेंज करती है और न ही उसके बाहर जाकर कोई क्रांति की बात करती है। अगर कुछ नया और अलग है तो वो ये कि इसके भीतर ही रहकर उसके ढांचे को ध्वस्त करती है। मुझे लगता है कि अगर इस देश की तमाम लड़कियों ने गाय पर लेख लिखने के लिए अपने सीनियर की कॉपी देखी हैं,शादी के पहले मोहल्ले की लड़कियों से स्वेटर,टेबुल क्लाथ,कुशन के पैटर्न उधार लिए हैं तो अब उसे बायोडाटा बनाते समय एक बार अस्मिता के बायोडाटा से जरुर गुजरना चाहिए।&lt;br /&gt;कहने को बायोडाटा के जरिए शादी एक प्रोग्रेसिव नजरिया का हिस्सा लगता है लेकिन अगर आप इनके एक-एक शब्दों पर गौर करें तो आपको इसके कई हिस्से मानव-विरोधी लगेंगे। ये सबकुछ स्त्री के विरोध में जाता है। रंगों का वर्णन,जाति का बारीकी से वर्णन,खानदाननामा और ऐसी ही कई सूचनाएं जो एक ही झटके में एहसास कराती है कि शादी के नाम पर हम कितना बड़ा गैरमानवीय समाज रचते हैं? बंद दिमाग को संभव है कि अस्मिता का बायोडाटा परेशान करे,जबरदस्ती की चोचलेबाजी लगे लेकिन इसे चालू पैटर्न के लड़कियों के बायोडाटा से मिलान करके देखें तो एक घड़ी को इससे असहमत होते हुए भी अपनी बेटियों,अपनी बहनों,भतिजियों के लिए बनाए गए बायोडाटा पर नफरत होगी।..होनी भी चाहिए।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6898673550088047104-4476153148547580366?l=taanabaana.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://taanabaana.blogspot.com/feeds/4476153148547580366/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.blogger.com/comment.g?blogID=6898673550088047104&amp;postID=4476153148547580366' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6898673550088047104/posts/default/4476153148547580366'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6898673550088047104/posts/default/4476153148547580366'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://taanabaana.blogspot.com/2009/12/blog-post_16.html' title='अस्मिता को चाहिए योग्य वर, उर्फ बंद दिमाग पर एक चोट'/><author><name>विनीत कुमार</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09398848720758429099</uri><email>vineetdu@gmail.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' name='OpenSocialUserId' value='01281586745461734077'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_uS1XY77Y4b8/Syh-bBNeEnI/AAAAAAAABaQ/He2BfHo7k6M/s72-c/Asmita-Raj-image2.jpg' height='72' width='72'/><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6898673550088047104.post-7758586408736844455</id><published>2009-12-02T08:36:00.003+05:30</published><updated>2009-12-02T08:38:38.516+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='hindi media'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='indian television'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='tv culture'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='audience'/><title type='text'>टेलीविजन पर मेरा लेक्चर आज</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/_uS1XY77Y4b8/SxXaLmtUaWI/AAAAAAAABZ8/LkAkenLNCVc/s1600-h/tv.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 130px; height: 126px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_uS1XY77Y4b8/SxXaLmtUaWI/AAAAAAAABZ8/LkAkenLNCVc/s400/tv.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5410470420259563874" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;साभारः&lt;a href=""&gt; &lt;a href="http://mohallalive.com/2009/12/02/watching-television-from-passive-consumption-of-sounds-and-images-to-an-active-prosumeraudience/"&gt;मोहल्लाlive&lt;/a&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;टेलीविजन विमर्श के साथ एक दिलचस्प विरोधाभास है। पहले तो आलोचकों ने पूरी ताक़त से इसे इडियट बॉक्स घोषित कर दिया। उसके बाद इस बात की संभावना की तलाश करने में जुट गये कि इससे सामाजिक विकास किस हद तक संभव हैं। इन दोनों स्थितियों में टेलीविजन की भूमिका और उसके चरित्र पर बहुत बारीकी से शायद ही बात हो पा रही हो। बदलती परिस्थितियों के बीच भी विमर्श का एक बड़ा हिस्सा जहां टेलीविजन को पहले से औऱ अधिक इडियट साबित करने में जुटा है, वहीं इसमें संभावना की बात करने वाले लोग जबरदस्ती का तर्क गढ़ने में कोई कोर-कसर छोड़ना नहीं चाहते। नतीजा हमारे सामने है, अपनी-अपनी डफली, अपना-अपना राग। लेकिन विमर्श के नाम पर अपने-अपने पाले में तर्क गढ़ने की कवायदों के बीच ऑडिएंस क्या सोचता है, उसकी समझ किस तरह से बदल रही है, इस पर बहुत गंभीरता से बात नहीं होने पाती है। मार्शल मैक्लूहान ने साठ के दर्शक में एक बार जो कह दिया कि टेलीविजन ठंडा माध्यम है, इससे कल्पना और विचार पैदा नहीं होते – वो आज भी किसी न किसी रूप में कायम है। हिंदी में इस मान्यता को इतना विस्तार मिला कि टेलीविजन पर बात करने का मतलब ही हो गया कि ये हमें निष्क्रिय बनाता है, हमारी समझ को कुंद करता है। हम उदासीन होते चले जाते हैं। इसलिए बेहतर है कि देश भर के टेलीविजन को गंगा में विसर्जित कर दिए जाएं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दूसरी तरफ मार्केटिंग और कनज्‍यूमरिज्म के भीतर ये बहस जोरों पर है कि अब कनज्‍यूमर चीज़ों का सिर्फ उपभोग ही नहीं करता बल्कि वो इसका उत्पादक भी है। अब वो तय करता है कि वस्तुओं का उत्पादन किस तरह से हो। टेलीविजन में संभावना बतानेवाले लोगों ने इस तर्क को अपनाते हुए ऑडिएंस को निष्क्रिय और उदासीन बताने के बजाय इसे टेलीविजन का डिसाइडिंग फैक्टर बताते हैं। टेलीविजन की पूरी बहस, जो टीआरपी के गले में जाकर अटक जाती है वो एक नये मुहावरे को जन्म देती है – लोग जो देखना चाहते हैं, टेलीविज़न वही दिखाता है। इसमें कोई क्या करे? ऑडिएंस अगर निष्क्रिय नहीं है, तो टीआरपी के भीतर उसकी सक्रियता किस हद तक है, इस पर नये सिरे से विचार करने की ज़रूरत है। इसके साथ ही ये सवाल भी कि टेलीविज़न का कोई सचमुच एक्टिव ऑडिएंस हो सकता है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दिल्ली विश्वविद्यालय से टेलीविजन की भाषिक संस्कृति पर शोध कर रहे विनीत कुमार सफर और सीएसडीएस सराय के संयुक्त प्रयास से हो रहे वैकल्पिक मीडिया वर्कशॉप (दिसंबर 01-03) में इन्हीं सवालों के आसपास अपनी बात रखेंगे। Watching Television : From Passive Consumption Of Sounds And Images To An Active Prosumer/Audience? विषय के तहत बातचीत के जरिये वो उन संभावनाओं की तरफ इशारा करेंगे जहां एक ऑडिएंस की हैसियत से टेलीविजन में भागीदारी की जा सके। इससे पहले इस वर्कशॉप में प्रिंट मीडिया के सत्र में वैकल्पिक मीडिया पर आलोचनात्मक निगाह पर अभय कुमार दुबे, Do Activism And Development Journalism Have To Be Boring? पर शिवम विज, Marginalised And Media पर दिलीप मंडल अपनी बात रख चुके हैं। टेलीविजन के साथ कल वेब जर्नलिज्म पर भी एक सत्र होगा। तीसरे यानी कि अंतिम दिन कम्युनिटी रेडियो पर विस्तार से चर्चा होगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;समय 10.30 बजे&lt;br /&gt;स्थान सीएसडीएस-सराय, 26, राजपुर रोड, दिल्ली&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6898673550088047104-7758586408736844455?l=taanabaana.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://taanabaana.blogspot.com/feeds/7758586408736844455/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.blogger.com/comment.g?blogID=6898673550088047104&amp;postID=7758586408736844455' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6898673550088047104/posts/default/7758586408736844455'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6898673550088047104/posts/default/7758586408736844455'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://taanabaana.blogspot.com/2009/12/blog-post.html' title='टेलीविजन पर मेरा लेक्चर आज'/><author><name>विनीत कुमार</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09398848720758429099</uri><email>vineetdu@gmail.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' name='OpenSocialUserId' value='01281586745461734077'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_uS1XY77Y4b8/SxXaLmtUaWI/AAAAAAAABZ8/LkAkenLNCVc/s72-c/tv.jpg' height='72' width='72'/><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6898673550088047104.post-2381038729775701765</id><published>2009-11-30T11:04:00.010+05:30</published><updated>2009-11-30T15:37:21.775+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='COMMUNALISM'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='MUSLIM IDENTITY'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='IBN7'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='HINDI NOVEL'/><title type='text'>दोज़ख़ पर आज बात करेंगे IBN7 के आशुतोष</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://4.bp.blogspot.com/_uS1XY77Y4b8/SxNlDFvCr1I/AAAAAAAABZs/9_m-EjJAM-s/s1600/DO.JPG"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 147px; height: 200px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_uS1XY77Y4b8/SxNlDFvCr1I/AAAAAAAABZs/9_m-EjJAM-s/s200/DO.JPG" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5409778681155596114" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सैयद ज़ैग़म इमाम मीडिया इन्डस्ट्री के भीतर उन-गिने चुने लोगों में से हैं जो न्यूज रुम के तनावों और हील-हुज्जतों के बीच भी अपनी रचनाधर्मिता को बचाए हुए हैं। मेनस्ट्रीम मीडिया के फार्मूलाबद्ध पैकजों से बाहर जाकर समाज,सरोकार और पक्षधरता के सवालों पर लगातार सोचने-जाननेवाले लोगों में से हैं। राजकमल से प्रकाशित उनका पहला उपन्यास दोज़ख़ उनकी इस रचनाधर्मिता और लेखन के बीच की संभावना को स्थापित करती है। वैसे तो दोज़ख़ की कहानी चंदौली जैसे छोटे से कस्बे के छोटे से अल्लन के पास घूमती है। लेकिन उसकी मासूम ख्वाहिशों और सपनों के बीच दोज़ख़ की जो शृंखला बनती है वो मासूम अल्लन की अकेली श्रृंखला न होकर उन तमाम लोगों की श्रृंखला बन जाती है जिनके लिए मजहबों और मान्यतों के बीच से गुजरकर अपने पक्ष में इंसानियत को चुनकर जीना आसान नहीं रह जाता। इंसानियत का दामन थामकर न तो अल्लन जैसे मासूम के लिए जीना संभव है और न ही इंसानियत का पक्ष लेते हुए आम लोगों के लिए।&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/_uS1XY77Y4b8/SxNklJgosgI/AAAAAAAABZk/80v7o5cQl-Y/s1600/invitation.JPG"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 160px; height: 320px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_uS1XY77Y4b8/SxNklJgosgI/AAAAAAAABZk/80v7o5cQl-Y/s320/invitation.JPG" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5409778166772838914" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;यह उपन्यास मज़हब और इंसानियत के बीच चलने वाली एक अजीबो गरीब कशमकश की कहानी है। एक ऐसे लड़के कि दास्तान जिसके हिंदू या फिर मुसलमान होने का मतलब ठीक से नहीं पता। मालूम है तो सिर्फ इतना कि वो एक इंसान है जिसकी सोच और समझ किसी मजहबी गाइडलाइन की मोहताज नहीं है।&lt;br /&gt;&lt;span style="font-style:italic;"&gt;असल में इस उपन्यास की कहानी के बहाने भारतीय समाज के उस धार्मिक ताने बाने को उकेरने की कोशिश की गई है जो मजहब और नफरत की राजनीति से उभरने से पहले देश के शहरों और कस्बों की विरासत था, जहां मुसलमान अपने धर्म के प्रति सजग रहते हुए भी इस तरह के बचाव की मुद्रा में नहीं होते थे जैसे आज हैं।&lt;br /&gt;उपन्यास का नायक अलीम अहमद उर्फ अल्लन उसी माहौल का रुपक रचता है और अपनी सहज और स्वत स्फूर्त धार्मिकता के साथ हिंदू और मुसलमान दोनों धर्मों की सीमाओं से परे चला जाता है। उपन्यास में कम उम्र में होने वाले प्रेम की तीव्रता, एक मुस्लिम परिवार की आर्थिक तंगी, पीढ़ियों के टकराव और एक बच्चे के मनोविज्ञान का भी बखूबी अंकन हुआ है।(&lt;/span&gt;फ्लैप से)&lt;br /&gt;अल्लन के सपनों पर सामाजिक बंदिशों और रंजिशों की जो परतें चढ़ती है वो आगे चलकर दोज़ख़ में पड़े इंसान के संस्करण बनने की प्रक्रिया का उदाहरण पेश करती है। मिहिर कुमार जो कि आजतक में एसोसिएट प्रोड्यूसर हैं,उन्होंने भी इसी सवाल को उठाया है कि-&lt;br /&gt;&lt;span style="font-style:italic;"&gt;छोटा सा अल्लन...छोटे सपने-ललचाने वाले सपने...मचलने वाले अरमान...हहराती गंगा की लहरों में कूदने की ख्वाहिश...पतंगों और कंचों में बसी दुनिया...सख्त अब्बा और मुलायम मिजाज अम्मा की दुनिया..इस मासूम सी दुनिया में क्या कोई दोजख भी हो सकता है...क्या जन्नतों में भी नर्क की गुंजाइश है....ये सब सवाल जैगम चकित करने वाले भोलेपन के साथ उठाते हैं..ठीक उसी भोलेपन से जैसे वो पीली धूप के पेड़ों की तलाश में नज्म लिखते हैं.... &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;कई सवालों के बीच आज इस उपन्यास का लोकार्पण है जिस पर कि आइबीएन7 के&lt;span style="font-weight:bold;"&gt; आशुतोष&lt;/span&gt; मुस्लिम मामलों से जुड़ी शोधकर्ता &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;शीबा असलम फहमी&lt;/span&gt; और प्रसिद्ध कवयित्री&lt;span style="font-weight:bold;"&gt; अनामिका&lt;/span&gt; विस्तार से चर्चा करेगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;सैयद ज़ैग़म इमाम&lt;/span&gt; का औपचारिक परिचय-&lt;br /&gt;2 जनवरी 1982 को बनारस में जन्म। शुरूआती पढ़ाई लिखाई बनारस के कस्बे चंदौली (अब जिला) में। 2002 में इलाहाबाद यूनिवर्सिटी इलाहाबाद से हिंदी साहित्य और प्राचीन इतिहास में स्नातक। 2004 में माखनलाल चतुर्वेदी नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ जर्नलिज्म (भोपाल, नोएडा) से मास्टर ऑफ जर्नलिज्म की डिग्री। 2004 से पत्रकारिता में। अमर उजाला अखबार और न्यूज 24 चैनल के बाद फिलहाल टीवी टुडे नेटवर्क (नई दिल्ली) के साथ। सराय सीएसडीएस (सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज) की ओर से 2007 में इंडिपेंडेंट फेलोशिप। फिलहाल प्रेम पर आधारित अपने दूसरे को उपन्यास को पूरा करने में व्यस्त। उपन्यास के अलावा कविता, गजल, व्यंग्य और कहानियों में विशेष रुचि। कई व्यंग्य कवितएं और कहांनियां प्रकाशित।&lt;br /&gt;संपर्कः zaighamimam@gmail.com&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6898673550088047104-2381038729775701765?l=taanabaana.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://taanabaana.blogspot.com/feeds/2381038729775701765/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.blogger.com/comment.g?blogID=6898673550088047104&amp;postID=2381038729775701765' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6898673550088047104/posts/default/2381038729775701765'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6898673550088047104/posts/default/2381038729775701765'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://taanabaana.blogspot.com/2009/11/ibn7_30.html' title='दोज़ख़ पर आज बात करेंगे IBN7 के आशुतोष'/><author><name>विनीत कुमार</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09398848720758429099</uri><email>vineetdu@gmail.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' name='OpenSocialUserId' value='01281586745461734077'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_uS1XY77Y4b8/SxNlDFvCr1I/AAAAAAAABZs/9_m-EjJAM-s/s72-c/DO.JPG' height='72' width='72'/><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6898673550088047104.post-1099918198741822710</id><published>2009-11-27T11:11:00.006+05:30</published><updated>2009-11-27T12:26:06.342+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='civil society'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='terrorism'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='26/11'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='mumbai'/><title type='text'>शहीदों की शहादत महज एक मीडिया इवेंट नहीं है ?</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/_uS1XY77Y4b8/Sw93GqluN0I/AAAAAAAABZU/E25-Ggi7h80/s1600/star.bmp"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 256px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_uS1XY77Y4b8/Sw93GqluN0I/AAAAAAAABZU/E25-Ggi7h80/s320/star.bmp" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5408672633890682690" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;आठ-आठ रुपये लेकर स्कूली बच्चों को सदभावना अभिव्यक्ति के स्टीकर बांटे जा रहे हैं। &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;रूपनगर (दिल्ली)&lt;/span&gt; के सरकारी स्कूल से निकलनेवाली लड़कियों से रुक कर जब हमने पूछा कि इसे अपनी आइडी पर क्यों चिपकाया है – उसका जवाब था, &lt;span style="font-style:italic;"&gt;टीचर ने कहा है लगाने के लिए।&lt;/span&gt; स्टीकर की कीमत भी उसी ने बतायी। कैंपस में कुछ लड़के हमें इसे दस रुपये में ले लेने का अनुरोध कर रहे थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;डीयू कैंपस&lt;/span&gt; की आर्ट्स फैकल्टी के मेन गेट के आगे बहुत भीड़ है। किसी छात्र राजनीतिक पार्टी के लोग जमा होकर वहां मोमबत्तियां जलाने का काम करने जा रहे हैं। हवन की तरह लकड़ियां पहले से जल रही है। देश के कई मीडिया चैनल पहले से तैनात हैं। पीछे से एक बंदा दूसरे बंदे को धक्का देता है – भैनचो… बार-बार आगे आ जा रहा है,टीवीवाले क्या तुम्हारे… की फोटो खींचेंगे…&lt;br /&gt;अबे सुन, ये ले, इतने में जितनी कैंडिल आ जाए, ले लियो।&lt;br /&gt;चैनल की माइक लिये लोगों के पास ही बंदे मंडरा रहे हैं। कुछ को इसका फल भी मिला है और उसकी बाइट ली जा रही है। चारों तरफ &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;दैनिक जागरण&lt;/span&gt; के बैनर पाट दिये गये हैं। बैनर टांगता हुआ एक बंदा कहता है- अबे भोसड़ी के हंसा मत, ठीक से बंध नहीं रहा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ये सब कुछ देश के उन शहीदों को याद करने के लिए किया जा रहा है, जिन्होंने शायद ही कभी सोचा होगा कि मेरे शहीद होने के साथ ही किसी खास पार्टी के खांचे और रंगों की लकीरों से बने बैनरों के बीच फिट कर दिया जाएगा?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दो दिन पहले मुंबई के &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;लियोपोल्ड कैफे&lt;/span&gt; ने 26/11 के चिन्हों और शहीदों की याद में &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;300 रुपये के पैग &lt;/span&gt;की सेवा शुरू की। पैग मग पर शहीदों की तस्वीरें और धमाके और खून के धब्बों को प्रतीक के तौर पर मग पर छपवाया। अफ़सोस कि &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;एनडीटीवी इंडिया &lt;/span&gt;ने कैफे की समझ को पहल बताया। कल रात एनडीटीवी के फुटेज में 26/11 के शहीदों को याद करने के लिए क्या तैयारियां चल रही हैं, इसके बारे में विस्तार से बताया गया। एंकर रुचि डोंगरे ने बताया कि शहीदों को श्रद्धांजलि देने के लिए कॉलेजों के स्टूडेंट सड़कों पर उतर आये हैं। कुछ &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;एमटीवी टच&lt;/span&gt; के स्टूडेंट्स अंग्रेज़ी में स्लोगन लिख रहे थे, एंकर हम हिंदी समझनेवाली ऑडिएंस को उसका हिंदी तर्जुमा करके बता रही थी। इस फुटेज को देखते हुए &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;मुझे रंग दे बसंती&lt;/span&gt; का पूरा का पूरा डीजे ग्रुप याद आ जा रहा था। वो भी ऐसे ही स्प्रे पेंट करते हैं। गृहमंत्री की लापरवाही और दलाली के चलते फ्लाइट &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;लेफ्टीनेंट अजय राठौर&lt;/span&gt; की मौत पर इंडिया गेट पर कैंडल जलाते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं ये बिल्कुल भी नहीं कहता कि इस दिन ऐसा नहीं किया जाना चाहिए। लेकिन इस फिल्म का मीडिया पार्टनर एनडीटीवी इंडिया, 26/11 के मौके को सिनेमाई अंदाज़ में पेश करता है। सवाल है कि हम इस रवैये को मीडिया मैटर मानकर चलता कर जाएं या फिर इससे आगे भी सोचने की ज़रूरत है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;26/11 को लेकर टेलीविजन चैनलों ने लाइव कवरेज के नाम पर जो कुछ भी दिखाया, उसकी कई स्तरों पर समीक्षा हुई है। इस बार के &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;इंडिया टुडे&lt;/span&gt; ने इस पर विशेषांक निकाला है। पिछले साल &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;मीडिया मंत्र&lt;/span&gt; ने कैमरे में 26/11 पर विशेषांक निकाले हैं। टेलीविजन चैनलों ने जिस तरह इसके कवरेज दिखाये, उसकी जमकर आलोचना हुई। एक साल होने पर सप्ताह भर पहले से ही टीवी चैनलों ने जिस तरह के महौल बनाने शुरू किये, उसे देखते हुए संयमित होकर प्रसारण का (23 नवंबर) सरकारी फरमान जारी किया गया। ये सारी बातें ठीक है कि मीडिया किसी भी घटना को एक कन्जप्शन मोड तक ले जाता है। वो उसे सिर्फ सूचना और देखे जाने तक का हिस्सा बनने नहीं रहने देना चाहता। वो एक दर्शक को बाज़ार के दरवाजे तक लाकर पटक देना चाहता है। इस पूरी अवधारणा को समझने के लिए ऑर्थर असा बर्जर की किताब मैनुफैक्चरिंग डिजायर पढ़ना दिलचस्प होगा। यहां आकर देश के चैनलों से हम ये सवाल कर सकते हैं कि क्या 26/11 का आतंकवादी हमला मीडिया इवेंट भर है? ऐसा पूछा जाना इसलिए भी ज़रूरी है कि जिस तरह के मैलोड्रामा और मैनुपुलेशन जारी हैं, उसमें मानवीय संवेदना की सही समझ ग़ायब हो जाती है। छवि के जरिये यथार्थ के दावे को लेकर सूसन सौंटगै की पूरी अवधारणा है, इस पर बात होनी चाहिए। लेकिन इसके साथ ही कुछ सवाल और हैं कि&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;♦ 26/11 को लेकर बच्चों के बीच आठ रुपये के सदभावना टिकट बेचा जाना क्यों ज़रूरी है?&lt;br /&gt;♦ इसके पीछे के सांकेतिक अर्थे क्या हैं?&lt;br /&gt;♦ क्या ये आतंकवादी घटनाएं दो कौमों के बीच की पैदाइश है?&lt;br /&gt;♦ ये किसने शुरू किया कि आज के दिन इस तरह के टिकट जारी किए जाएं और बच्चों के बीच सद्भावना बनाये रखने के पाठ पढ़ाये जाएं। ये समाज में किस तरह के असर पैदा करेंगे, इस पर चर्चा ज़रूरी है।&lt;br /&gt;♦ दूसरी बात कि आठ रुपये के इस टिकट से जो पैसे आएंगे, उसके पीछे का क्या हिसाब है? ये काम तो आइडिया मोबाइल फोन भी करने जा रहा है। हम आतंकवाद से बचने के लिए कोई और पाठ और महौल तो तैयार नहीं कर रहे?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जगह-जगह संगठनों और पार्टियों की ओर से कैंडिल जलाये जा रहे हैं। चैनलों ने एक लौ जलाने का कॉन्सेप्ट ईजाद किया है। क्या ये देश के किसी भी शहीद को याद करने का सही तरीका है, जब इसमें ताम-झाम पैदा करके शहर के हर चौक को जाम कर दें। लौ जल जाने के बाद भी कैमरे के चूक जाने पर दोबारा जलाएं… हम चाहते क्या हैं?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दरअसल हमारा देश कर्मकांडों को इतनी तवज्‍जो देता आया है कि हर घटना को एक कर्मकांड में बदल देने के लिए हम बेचैन हो उठते हैं। हम अपनी भावनाओं का, संवेदना और अनुभूतियों का एक &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;मूर्त रूप &lt;/span&gt;(physical form) चाहते हैं। हम इन अनुभूतियों को निराकार रूप में संजोने के अभ्यस्त नहीं हैं। हमारी इसी मानसिक कमज़ोरी से कर्मकांड के विस्तार की गुंजाइश बढ़ जाती है। समाज की हर घटना कर्मकांडों का हिस्सा बन जाती है। उसके बाद एक पैटर्न हमारे सामने तैयार होता है कि हमें किसी के शहीद होने पर या मर जाने पर क्या करना है। यहां पर आकर कर्मकांड और बाज़ार के बीच एकरूपता कायम होती है। कर्मकांड का काम है हमारी हर भावनाओं और अनुभूतियों को एक जड़ रूप देना और बाज़ार का काम है हमारी इन अनुभूतियों को &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;वस्तु &lt;/span&gt;(comodity) के आगे रिप्लेस करके कर्मकांड के साथ गंठजोड़ कर लेना। शायद यही वजह है कि इस देश में कभी और आज भी हर मुसीबत को लेकर एक नया देवता पैदा होता जाता है और उसे खुश करने की पूजन विधि, तो दूसरी तरह हर घटना के पीछे सैकड़ों &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;सिंबॉलिक प्रोडक्ट&lt;/span&gt;स और बाज़ार की हरकतें। उसके बाद हमारी भावनाएं हवा हो जाती हैं, सब कुछ इस कर्मकांड और वस्तुओं में रिप्लेस हो जाता है। दुर्भाग्य से देश का टेलीविजन इसी के बीच अपनी भूमिका खोजता नज़र आता है। इससे आगे वो कभी नहीं जाता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ये सच है कि टेलीविजन अपने मतलब की बात करता है, लेकिन आखिर क्यों शहीदों को याद किये जाने की घटना, समाज को मदद करने के तरीके, हाशिये पर के समाज की सुध लेने के अंदाज़ मीडिया स्ट्रक्चर में रह कर ही किये जाते हैं। हम ये सब कुछ इसी अंदाज़ में फॉर्मेट करते हैं, जिससे कि मीडिया कवरेज में आसानी हो। इस नज़रिये से अगर आप सोचें तो दिन-रात मीडिया को कोसने, गरियाने और कोसनेवाली संस्थाएं, विचार और लोग काम करने के तरीके में उसी के स्ट्रक्चर को फॉलो करते हैं। इसलिए सवाल सिर्फ इस बात का नहीं है कि मीडिया किसी भी बात को हायपरबॉलिक बना देता है, सवाल इस बात का भी है कि हम मीडिया के फॉर्मेट में रह कर क्यों एक्ट करना शुरू कर देते हैं, सोचना शुरू करते हैं? सिविल सोसायटी में शहीदों के नाम पर एक मोमबत्ती जला देने और टीवी के फ्रेम के आ जाने से उन माओं की आंखों के आंसू थम जाते हैं, उन विधवाओं के दर्द ख़त्म हो जाते हैं, जिसके जवान बेटे और पति ने अपनी जान गंवायी? सवाल इस बात का है कि संवेदना के स्तर पर समाज इस दर्द को किस हद तक महसूस करता है? क्या कोई भी इसलिए शहीद होता है कि उसके नाम पर कर्मकांडों के जाल बिछाये जाएं और शहादत को एक ब्रैंड में तब्दील करके बाज़ार पैदा किये जाएं।..&lt;br /&gt;मूलतः प्रकाशित-&lt;a href="http://mohallalive.com/2009/11/27/vineet-kumar-react-on-media-coverage-of-26-11-one-year-later/"&gt; मोहल्लाlive&lt;/a&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6898673550088047104-1099918198741822710?l=taanabaana.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://taanabaana.blogspot.com/feeds/1099918198741822710/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.blogger.com/comment.g?blogID=6898673550088047104&amp;postID=1099918198741822710' title='7 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6898673550088047104/posts/default/1099918198741822710'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6898673550088047104/posts/default/1099918198741822710'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://taanabaana.blogspot.com/2009/11/r.html' title='शहीदों की शहादत महज एक मीडिया इवेंट नहीं है ?'/><author><name>विनीत कुमार</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09398848720758429099</uri><email>vineetdu@gmail.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' name='OpenSocialUserId' value='01281586745461734077'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_uS1XY77Y4b8/Sw93GqluN0I/AAAAAAAABZU/E25-Ggi7h80/s72-c/star.bmp' height='72' width='72'/><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>7</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6898673550088047104.post-3667290306139039186</id><published>2009-11-25T12:28:00.008+05:30</published><updated>2009-11-25T13:13:27.983+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='shiv sena'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='26/11'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='ndtv india'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='mumbai'/><title type='text'>शहीदों के नाम पर बीयर मग,एनडीटीवी का मिला समर्थन</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://3.bp.blogspot.com/_uS1XY77Y4b8/SwzdUlKezkI/AAAAAAAABY0/QyWPPS7PtwY/s1600/liopold-cafe-ndtv.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 190px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_uS1XY77Y4b8/SwzdUlKezkI/AAAAAAAABY0/QyWPPS7PtwY/s320/liopold-cafe-ndtv.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5407940598208319042" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;26/11 के  जिन शहीदों की तस्वीरों को देखकर उनके बच्चे,पाल-पोसकर बड़ा करनेवाली माएं और उनकी विधवा हो चुकी पत्नी अब भी बिलख रही हैं,देश का तथाकथित संभ्रांत समाज उन तस्वीरों के शराब के मग पर छापे जाने से खुश है। वो उस मग में  में बीयर और शराब पीकर उन्हें याद कर रहा है। ये अलग और नए किस्म से शहीदों को याद करना है। इसके लिए उन्हें &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;तीन सौ रुपये&lt;/span&gt; देने पड़ रहे हैं। &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;एनडीटीवी इंडिया&lt;/span&gt; ने मुंबई के &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;लियोपोल्ड कैफे&lt;/span&gt; की इस पहल का विरोध करने के बजाय सराहा है। &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;शिव सेना&lt;/span&gt; के खिलाफ स्टोरी एंगिल लेने के चक्कर में इसके खिलाफ एक लाइन भी बोलना-बताना जरुरी नहीं समझा।..और तो और उसके पक्ष में कसीदे पढ़ने का काम किया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शराब के लिए ड्रिंक मग पर &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;26/11 के चिन्हों और शहीदों की फोटो&lt;/span&gt; छापे जाने और तीन सौ रुपये पैग बेचे जाने पर &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;शिव सैनिकों&lt;/span&gt; ने एक बार फिर हंगामा किया। मुंबई के 26/11 आतंकवादी हमले में मुंबई का &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;लियोपाल्ड कैफे&lt;/span&gt; भी हमले का शिकार रहा है। उसकी दीवारों पर आज भी आतंकवादियों की गोलियों के निशान  मौजूद है। मैनेजमेंट उसे याद के तौर पर बचाकर रखना चाहता है। इसी क्रम में उसने ड्रिंक मग के पर इस घटना के कुछ चिन्ह प्रिंट करवाकर ग्राहकों के लिए उपलब्ध करवाए। टेलीविजन फुटेज पर &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;कोका कोला&lt;/span&gt; के डिश पेपर के उपर रखे ये मग धमाके और खून के धब्बे के तौर पर दिखाई दे रहे थे। शिव सैनिकों ने इसका विरोध इस आधार पर किया कि रेस्तरां याद के नाम पर शहीदों की शहादत को भुनाना चाह रहा है। उसका भी बाजारीकरण किया जा रहा है। जाहिर है ये देश की संस्कृति के खिलाफ है। ये संभव था कि अगर शिव सेना इस पर विरोध नहीं जताती और मीडिया से जुड़े लोगों ने इसकी नोटिस ली होती तो वो भी इससे असहमति जताते हुए इसके खिलाफ स्टोरी बनाते,दिखाते।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन&lt;span style="font-weight:bold;"&gt; एनडीटीवी इंडिया&lt;/span&gt; में &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;सात बजे के शो&lt;/span&gt; में पहले एंकर &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;रुचि डोंगरे &lt;/span&gt;ने इसे चुनावी हार की बौखलाहट से जोड़कर दिखाया,बताया उसी बात को &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;विनोद दुआ&lt;/span&gt; ने अपने खास कार्यक्रम &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;विनोद दुआ लाइव&lt;/span&gt; में भी इसी अंदाज में पेश किया। उन्होंने तो इस हमले का ऐतिहासिक विकासक्रम बताते हुए विधान सभा हंगामा,एक निजी चैनल पर हमला तक ले गए। स्थिति साफ है कि शिव सेना अब चाहे जो कुछ भी कर ले,जिस भी मुद्दे की बात कर लें,मीडिया उसके खिलाफ आग उगलने का फार्मूला गढ़ लिया है। मीडिया का ऐसा करना जरुरी भी है क्योंकि जब तो वो विरोध के तरीकों में बदलाव नहीं लाती है,उसका विरोध करना अनिवार्य है। शिव सेना ने इतिहास से कुछ भी नहीं सीखा। &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;मीडिया और कांसीराम&lt;/span&gt; के प्रकरण को कभी याद नहीं किया कि मीडिया से पंगा लेने का क्या अंजाम होता है? लेकिन एक सवाल तो बनता ही है कि क्या &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;एनडीटीवी इंडिया&lt;/span&gt; जैसा चैनल लियोपोर्ड के इस तीन सौ रुपये के  पैग और मग का विरोध इसलिए नहीं करता कि वो शिव सेना को उत्पाती दिखाना चाहता है? अगर उसने भी इसके विरोध में एक लाइन भी कहा होता तो शिव सेना के समर्थन में खड़ा नजर आता?  मामला चाहे जो भी हो लेकिन लियोपोर्ड का समर्थन इसलिए ज्यादा जरुरी और बाजिब है क्योंकि वो भी वही कर रहा है जो कि चैनल के लोग कर रहे हैं। अपने-अपने स्तर से भुनाने की कोशिश। ऐसे में निष्पक्ष होकर बात करने की गुंजाइश ही कहां बच जाती है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;स्टिल फोटो- &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;&lt;a href="http://mediakhabar.com/"&gt;पुष्कर पुष्प&lt;/a&gt;&lt;/span&gt; के सौजन्य से&lt;br /&gt;मूलतः प्रकाशित- &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;&lt;a href="http://mediakhabar.com/english/index.php?option=com_content&amp;view=article&amp;id=385:2009-11-25-06-53-27&amp;catid=55:2009-11-05-18-35-14"&gt;मीडिया मंत्र&lt;/a&gt;&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6898673550088047104-3667290306139039186?l=taanabaana.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://taanabaana.blogspot.com/feeds/3667290306139039186/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.blogger.com/comment.g?blogID=6898673550088047104&amp;postID=3667290306139039186' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6898673550088047104/posts/default/3667290306139039186'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6898673550088047104/posts/default/3667290306139039186'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://taanabaana.blogspot.com/2009/11/blog-post_25.html' title='शहीदों के नाम पर बीयर मग,एनडीटीवी का मिला समर्थन'/><author><name>विनीत कुमार</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09398848720758429099</uri><email>vineetdu@gmail.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' name='OpenSocialUserId' value='01281586745461734077'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_uS1XY77Y4b8/SwzdUlKezkI/AAAAAAAABY0/QyWPPS7PtwY/s72-c/liopold-cafe-ndtv.jpg' height='72' width='72'/><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6898673550088047104.post-7457536811581970592</id><published>2009-11-23T10:44:00.007+05:30</published><updated>2009-11-23T10:58:38.882+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='hindi channels'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='hindi media'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='IBN7'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='indian tv'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='democracy'/><title type='text'>IBN7 पर हमला लोकतंत्र पर हमला नहीं है</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://1.bp.blogspot.com/_uS1XY77Y4b8/SwodT4mx9bI/AAAAAAAABYs/P8qdoUwtdMU/s1600/IBN.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 300px; height: 188px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_uS1XY77Y4b8/SwodT4mx9bI/AAAAAAAABYs/P8qdoUwtdMU/s320/IBN.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5407166530061465010" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मूलतः प्रकाशित &lt;a href="http://mohallalive.com/2009/11/22/vineet-kumar-view-on-shiv-sena-attack-on-ibn7/"&gt;मोहल्लाLIVE&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;पोस्टर- साभारः&lt;a href="http://mediakhabar.com/topicdetails.aspx?mid=106&amp;tid=1712"&gt; मीडियाखबर डॉट कॉम&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;IBN7&lt;/span&gt; और &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;IBN7 लोकमत&lt;/span&gt; के मुंबई और पुणे दफ्तर में &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;शिवसेना के गुर्गे &lt;span style="font-style:italic;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;ने जो कुछ भी किया, वेब लेखन के जरिये हम उसका विरोध करते हैं। दफ्तर के अंदर घुसकर शिव सैनिकों ने महिला मीडियाकर्मियों के साथ जो दुर्व्यवहार किया, हम उसके ख़‍िलाफ़ न्याय की मांग करते हैं। लोकतांत्रिक प्रक्रिया के भीतर गुंडई और जाहिलपने को लेकर आये दिन किये जानेवाले प्रयोग और पेश किये जानेवाले नमूनों का हम पुरज़ोर विरोध करते हैं। पिछले 15 दिनों के भीतर और उससे भी पहले &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;शिवसेना &lt;span style="font-style:italic;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;और उसी की कोख से पैदा हुआ&lt;span style="font-weight:bold;"&gt; मनसे&lt;span style="font-style:italic;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt; ने लोकतंत्र के दो स्तंभों – विधायिका और मीडिया को कुचलने और ध्वस्त करने की जो कोशिशें की है, हम उसका विरोध करते हैं। &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;संजय राउत &lt;/span&gt;जैसे देश के उन तमाम संपादकों और पत्रकारों को धिक्कारते हैं, जिनकी औकात रहनुमाओं के पक्ष तक जाकर ख़त्म हो जाती है। दिमाग़़ी तौर पर सड़ चुके लोगों के लेखन को फर्जी करार देते हैं जिनके भीतर तर्क करने की ताक़त नहीं रह गयी है। हम चाहते हैं कि ऐसे लोगों को पत्रकारिता बिरादरी से तत्काल बेदखल किया जाए। हमारे इस विरोध के बावजूद अगर मुंबई सरकार इस दिशा में सक्रिय होकर कार्यवाही नहीं करती है तो हम अपनी आवाज़ और तेज़ करेंगे। हम मीडिया की आवाज़ को किसी भी स्तर पर दबने नहीं देंगे। हम अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को किसी के हाथों का खिलौना बनने नहीं देंगे। हम देश की मीडिया को किसी भी रूप में तहस-नहस नहीं होने देंगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अपनी बात कहने और सच बयान करने की इच्छा रखनेवाले देश के बाकी पत्रकारों और मानव अधिकारों के पक्ष में बात करनेवालों की तरह मैं भी शिवसेना की बर्बरता का विरोध करता हूं। हम सबों को अपने-अपने स्तर से इस तरह की गतिविधियों को रोका जाना चाहिए। लेकिन ये सब लिखते-कहते हुए मैं उन शब्दों, अभिव्यक्तियों और मेटाफर पर थोड़ा इत्‍मीनान होकर सोचना चाहता हूं, जिसे कि मीडिया के लोग इस्तेमाल करते हैं। इस मामले में मैं समर्थन के स्तर पर जज़्बाती होते हुए भी अभिव्यक्ति के स्तर पर तटस्थ होना चाहता हूं। मुझे लगता है कि ऐसा करना शिवसेना जैसी बवाल मचाने वाली पार्टी के समर्थन में जाने के बजाए मीडिया और खुद को देखने-समझने की कोशिश होगी। इसलिए तोड़फोड़ की घटना का लगातार दो दिनों तक विरोध किये जाने के बाद अब इस स्तर पर विचार करें कि हम किस लोकतंत्र पर हमले की बात कर रहे हैं? लोकतंत्र के पर्याय के तौर पर बतायी जानेवाली मीडिया के किस हिस्से पर हमला किये जाने का विरोध कर रहे हैं? मीडिया अपने ऊपर हुए हमले को लोकतंत्र पर किया जानेवाला हमला बता रहा है, इसे किस रूप में समझा जाए? कुल मिलाकर हम पहले तो लोकतंत्र को रिडिफाइन करना चाहते हैं और उसके बाद उसके खांचे में काम कर रही मीडिया को समझना चाहते हैं?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;एजेंडा &lt;/span&gt;(IBN7 का कार्यक्रम) में एंकर &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;संदीप चौधरी&lt;/span&gt; ने कहा कि आगे जब हिंदी पत्रकारिता का इतिहास लिखा जाएगा तो इसे &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;काला शुक्रवार&lt;/span&gt; के तौर पर समझा जाएगा। इसके पहले भी जो फ्लैश चलाये गये, उसमें बार-बार इस हमले को लोकतंत्र पर किया जानेवाला हमला बताया गया।&lt;span style="font-weight:bold;"&gt; संदीप चौधरी&lt;/span&gt; ने काला शुक्रवार शब्द&lt;span style="font-weight:bold;"&gt; रूस की बोल्शेविक क्रांति&lt;/span&gt; से उधार के तौर पर लिया। बाकी के न्यूज़ प्रोड्यूसरों और रिपोर्टरों ने भी &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;लोकतंत्र पर हमला या चौथे स्तंभ पर हमला &lt;span style="font-style:italic;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;जैसे शब्दों का प्रयोग कहीं न कहीं ऐतिहासिक संदर्भों से उठा कर किये। यहां दिक्कत इस बात की बिल्कुल भी नहीं है कि इतिहास से इस तरह के शब्द नहीं लिए जाने चाहिए। इतिहास के शब्दों और अभिव्यक्तियों को अगर मीडिया के लोग खींचकर वर्तमान तक लाते हैं तो हमें उसका स्वागत किया जाना चाहिए। लेकिन असल सवाल है कि क्या जिस लोकतंत्र पर हमले और उसे बचाने की बात की जा रही है, वो महज कुछ वैल्यू लोडेड शब्दों के प्रयोग कर दिए जानेभर से जिंदा रहेगा? क्या हम लोकतंत्र, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, आजादी इन सबों को सिर्फ शब्दों के तौर पर जिंदा रखना चाहते हैं? हम इसे बोलने के लिहाज से चटकीला भर बनाना चाहते हैं? क्या हम लोकतंत्र, सरोकार, मानवीयता और इस तरह के वैल्यू लोडेड शब्दों को पुतलों की शक्ल में बदलना चाहते हैं? ऐसे पुतले जिसे कि दागदार, धब्बे लगे, बदबूदार समाज और फ्रैक्चरड डेमोक्रेसी के बीच लाकर रख दिया जाए, तो सब कुछ अचानक से चमकीला हो जाए। चित्ते-चित्ते रंगों के बीच एकदम से चटकीले रंगों का प्रभाव पैदा हो जाए। क्या इन शब्दों का प्रयोग अपनी ज़ुबान को सिर्फ चटकीला बनाने भर के लिए है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;टेलीविजन मीडिया से ये सवाल पूछा जाना इसलिए भी ज़रूरी है कि लोकतंत्र कोई वैक्यूम में पैदा हुई चीज नहीं है। इसके भीतर हाड़-मांस, दिल-दिमाग़, जज़्बात और सोच लिये लोग मौजूद होते हैं। इसलिए जैसे ही आप लोकतंत्र शब्द का प्रयोग करते हैं, आपको लोकतंत्र को लोकेट तो करना ही होगा। पहले तो आपको और फिर हमें समझाना होगा कि आप लोकतंत्र से क्या समझ रहे हैं? आप जिस लोकतंत्र की बात कर रहे हैं, उसके भीतर कौन से लोग शामिल हैं? आप किसके वीहॉफ पर अपने को लोकतंत्र का पर्याय बता रहे हैं? क्या आप खुद से पैदा किये जानेवाले लोकतंत्र को संबोधित कर रहे हैं या फिर अभी भी देश के भीतर बहाल लोकतंत्र को लेकर बात कर रहे हैं? मुझे नहीं लगता कि मीडिया पर किये जानेवाले हर हमले को लंबे समय तक लोकतंत्र पर किया जानेवाला हमला बताया जाना आगे जाकर आसान होगा। तत्काल जज़्बाती होकर हम मीडिया के पक्ष में होते हुए भी इत्‍मीनान होने पर सवाल तो ज़रूर करेंगे कि हम किस मीडिया के पक्ष में खड़े हैं? उसके सालभर का चरित्र क्या है? हम न तो लोकतंत्र को मुहावरे की शक्ल देना चाहते हैं और न ही मीडिया को मुहावरे के तौर पर इस्तेमाल करने देना चाहते हैं? इसलिए ज़रूरी है कि हम ऐसे में हम मीडिया हमलों के बीच लोकतंत्र के संदर्भों को समझने की कोशिश करें।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक बात पर आप लगातार ग़ौर कर रहे होंगे कि पहले के मुकाबले निजी चैनलों पर राजनीतिक पार्टियों, धार्मिक संगठनों और संस्थाओं की ओर से हमले तेज़ हुए हैं। &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;नलिन मेहता &lt;/span&gt;ने अपनी किताब INDIA ON TELEVISION और &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;पुष्पराज &lt;/span&gt;ने अपनी किताब नंदीग्राम डायरी में सकी विस्तार से चर्चा की है। हाल ही में हमने देखा कि गुजरात में &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;नरेंद्र मोदी की सरकार&lt;span style="font-style:italic;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt; ने &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;आजतक &lt;/span&gt;को लंबे समय तक केबल पर आने से रोक लगा दी। &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;आसाराम बापू के चेले-चपाटियों ने&lt;span style="font-style:italic;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt; आजतक की संवाददाता पर हमले किये और घायल कर दिया। इसके पीछे की लंबी रणनीति हो सकती है। लेकिन एक समझ ये भी बनती है कि जिस तरह मीडिया और चैनलों के कार्पोरेट की शक्ल में तब्दील होने की प्रक्रिया तेज़ हुई है, राजनीतिक पार्टियों के प्रति उसकी निर्भरता पहले से कम हुई है। साधनों के स्तर पर तो कम से कम ज़रूर ही ऐसा हुआ है। दूसरी तरह कार्पोरेट और विश्व पूंजी की ताकत से इन चैनलों का मनोबल भी बढ़ा है। इसके आगे राजनीतिक पार्टियों की क्षमता का आकलन इनके लिए आसान हो गया है। इसलिए अब ये स्थिति बन जाती है कि कोई भी चैनल किसी राजनीतिक पार्टी, धार्मिक संगठन या संस्थानों पर बहुत ही साहसिक तरीके से स्टोरी कवर करता है, प्रसारित करता है। ऐसे में ये बिल्कुल नहीं होता कि राजनीति स्तर की निर्भरता उसकी एकदम से ख़त्म हो जाती है, लेकिन इतना ज़रूर होता है कि मैनेज कर पाना और संतुलन बना पाना पहले के मुकाबले आसान हो गया है। यहां राजनीति और मीडिया की ताक़त की आज़माइश होने के बजाय राजनीति और कार्पोरेट की आज़माइश होनी शुरु होती है। कार्पोरेट का पलड़ा मज़बूत होने की स्थिति में चैनल और मीडिया बहुत आगे तक राजनीतिक पार्टियों की धज्जियां उड़ाते हैं, धार्मिक संगठनों पर बरस पाते हैं। हमें ये सबकुछ लोकतंत्र का पक्षधर होने के स्तर पर दिखाया-बताया जाता है। एक हद तक सही भी है कि कम से कम राजनीतिक मामलों में &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;दूरदर्शनी दिनों &lt;/span&gt;के मुकाबले निजी चैनल ज़्यादा मुखर हुए हैं। चैनल की इस बुलंदी का स्वागत किया जाना चाहिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन दूसरी स्थिति पहली स्थिति से कहीं ज़्यादा ख़तरनाक हैं। अगर बारीकी से समझा जाए तो ये लोकतंत्र के नहीं बचे रहने से जितना नुक़सान नहीं है उससे कहीं ज़्यादा नुकसान टेलीविज़न की ओर से पैदा किये जानेवाले और तेज़ी से पनपनेवाले लोकतंत्र से है। टेलीविज़न का लोकतंत्र, जनता के लोकतंत्र को लील जाने की फिराक में है। इसके हाल के कुछ नमूनों पर गौर करें तो हमें अंदाजा लग जाएगा। तालिबान और आतंकवाद पर स्पेशल स्टोरी दिखाते हुए &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;एनडीटीवी इंडिया &lt;/span&gt;के &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;रवीश कुमार &lt;/span&gt;ने कहा कि तालिबान में देश का कोई भी रिपोर्टर नहीं है लेकिन वहां की ख़बरें रोज़ दिखायी जा रही है। ये खबरें यूट्यूब की खानों से फुटेज निकालकर बनायी जा रही है। &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;हंस&lt;/span&gt; के वार्षिक समारोह में &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;अरुंधति राय&lt;/span&gt; ने कहा कि &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;सलवाजुडूम&lt;/span&gt; इलाके में देश के किसी भी पत्रकार को जाने की इजाज़त नहीं है। &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;पाखी &lt;/span&gt;के वार्षिकोत्सव में &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;पुण्य प्रसून वाजपेयी&lt;/span&gt; ने कहा कि &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;विदर्भ&lt;/span&gt; को आइडियल शहर घोषित किया गया लेकिन वहां चालीस हज़ार किसानों ने आत्महत्याएं की। आज मीडिया में गांव नहीं है, मीडिया से जुड़े लोग गांव की स्थितियों को संवेदना के स्तर पर नहीं ला पा रहे हैं। 2 नवंबर को जब &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;शर्मिला इरोम&lt;/span&gt; को बर्बर प्रशासन के खिलाफ़ अनशन पर बैठे दस साल पूरे हो गये, देशभर के अनुभवी मीडियाकर्मी &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;शाहरुख खान&lt;/span&gt; के बर्थ केक काटने के फुटेज लेने के लिए बेकरार होते रहे। एक ही साथ नक्सलवाद और सरकारी कार्रवाइयों के ख़ौफ़ में&lt;span style="font-weight:bold;"&gt; झारखंड के आदिवासी &lt;/span&gt;आशंका के दिन खेप रहे होते हैं, देशभर के चैनल&lt;span style="font-weight:bold;"&gt; पी.चिदंबरम &lt;/span&gt;की बाइट को उलट-पुलट कर सुलझाने में जुटे रहे। देश के एक चैनल पर ताला लग जाने से करीब चार सौ मीडियाकर्मी रातोंरात सड़कों पर आ जाते हैं, वो कभी भी लोकतंत्र का हिस्सा नहीं बनने पाता। तो क्या ये मीडिया तय करेगा कि लोकतंत्र के भीतर का कौन सा हिस्सा टेलीविजन पर आकर लोकतंत्र की शक्ल लेगा और कौन सा नहीं? अगर सचमुच ऐसा है तो हमें मीडिया के लोकतंत्र पर नये सिरे से विचार करना होगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आप अगर चैनल की इन ख़बरों के बीच सरोकार से जुड़ी ख़बरों और हिस्सेदारी की मांग करेंगे तो टीआरपी का शैतान सामने आ जाएगा। इनमें से सारी घटनाएं टीआरपी पैदा करने के लिहाज से बांझ है। इसलिए टीआरपी तो उन्हीं ख़बरों से पैदा होती है, जिनमें कि मेट्रो और मध्यवर्ग की ऑडिएंस दिलचस्पी ले। संकेत साफ है। मंजर साफ है। फीदेल कास्त्रो के पद को उधार लेकर कहा जाए तो ये सांस्कृतिक संप्रभुता का संकट है। टेलीविज़न देश की संप्रभुता को बचाये रखने के दावे से लैस है। लेकिन उसके भीतर के ठोस के जार-जार हो जाने की चिंता बिल्कुल भी नहीं है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;देश की सत्तर फीसदी आबादी को जब पीने को पानी नहीं है, बच्चों के हाथों में स्लेट नहीं है, स्त्रियों की आंखों में सपने नहीं है – टेलीविजन पर कीनले है, विसलरी है, पॉकेमॉन है, बार्बी है, मानव रचना यूनिवर्सिटी है, लक्मे है, झुर्रियों को हटाने के लिए पॉन्डस है। एक धब्बेदार, बदबूदार और लाचार लोकतंत्र टेलीविज़न पर आते ही चमकीला हो उठता है। पिक्चर ट्यूब से गुज़रते ही देश का सारा मटमैलापन साफ हो जाता है। सवाल यहां बनते हैं कि टेलीविज़न के दम पर जो &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;आइस संस्कृति &lt;/span&gt;(information, entertainment, consumerism) एक ठंडी संस्कृति के बतौर पनप रही है, क्या उसी लोकतंत्र पर हमला हो रहा है और उसी को बचाये जाने की बात की जा रही है? हम वर्गहीन समाज जैसे मार्क्सवादी यूटोपिया से बाहर निकलकर भी सोचें तो क्या ज़रूरी है कि इस आइस संस्कृति के बूते देशभर के लोगों को खींच-खींचकर मध्यवर्गीय मानसिकता के खांचे में लाया जाए। ये मानसिकता चार रुपये लगा कर अपनी पसंद और नापसंद जाहिर करे। क्या हमें इस लोकतंत्र पर हमला किये जाने से अफ़सोस होगा? दुर्भाग्य से इस लोकतंत्र पर हमला कभी नहीं होना है लेकिन बदकिस्मती है कि जिस लोकतंत्र पर हमले हो रहे हैं उसे शायद ही कभी बचाया जा सकेगा। इसलिए लोकतंत्र के रैपर में मीडिया जिसे बचाना चाहती है, पहले उसे साफ कर दे, तो पक्षधरता कायम करने में आमलोगों को सहूलियतें होगी। क्योंकि जज़्बाती होने की वैलिडिटी जल्द ही ख़त्म होने जा रही है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6898673550088047104-7457536811581970592?l=taanabaana.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://taanabaana.blogspot.com/feeds/7457536811581970592/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.blogger.com/comment.g?blogID=6898673550088047104&amp;postID=7457536811581970592' title='8 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6898673550088047104/posts/default/7457536811581970592'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6898673550088047104/posts/default/7457536811581970592'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://taanabaana.blogspot.com/2009/11/ibn7.html' title='IBN7 पर हमला लोकतंत्र पर हमला नहीं है'/><author><name>विनीत कुमार</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09398848720758429099</uri><email>vineetdu@gmail.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' name='OpenSocialUserId' value='01281586745461734077'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_uS1XY77Y4b8/SwodT4mx9bI/AAAAAAAABYs/P8qdoUwtdMU/s72-c/IBN.jpg' height='72' width='72'/><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>8</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6898673550088047104.post-6138660143792141142</id><published>2009-11-21T12:12:00.006+05:30</published><updated>2009-11-21T12:32:48.222+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='indian society'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='mitu khurana'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='male doctor'/><title type='text'>एक पुरुष डॉक्टर का फरमान- बेटा दो या तलाक दो</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://1.bp.blogspot.com/_uS1XY77Y4b8/SwePJL1PrqI/AAAAAAAABYc/4Ry9GtAxHBU/s1600/mitu.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 214px; height: 320px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_uS1XY77Y4b8/SwePJL1PrqI/AAAAAAAABYc/4Ry9GtAxHBU/s320/mitu.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5406447265639280290" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;मीतू खुराना की जो कहानी है वो पितृसत्तात्मक समाज में लिंग-भेद और पुत्र कामना में अंधे हो चुके परिवार की कहानी से बिल्कुल भी अलग नहीं है। अलग है तो सिर्फ इतना भर कि मीतू खुराना खुद पेशे से डॉक्टर है,उसका पति भी डॉक्टर है। तथाकथित सभ्य समाज से ताल्लुक रखता है। लेकिन लड़का-बच्चा जनने और लड़की के पैदा होने की स्थिति में अपने परिवारे के लोगों के साथ वो खुद भी कितना बर्बर हो जाता है,ये हमारी उम्मीद को ध्वस्त करता है। उस कल्पना को चकनाचूर करता है जो कि साक्षरता को लेकर भारत सरकार की ओर से जारी किए गए विज्ञापनों में दिखाया-बताया जाता है। हम पढ़-लिखकर भी मानवीय नहीं हो सकते,संवेदनशील नहीं हो सकते। हम उसी बर्बर समाज का हिस्सा बने रहेंगे। ये सबकुछ सोचकर-जानकर कैसा लगता है?&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मीतू खुराना की दर्दनाक कहानी को झारखंड की चर्चित और जुझारु पत्रकार अनुपमा ने &lt;a href="http://mohallalive.com/2009/11/20/brave-story-of-meetu-khurana-by-anupama/"&gt;मोहल्लाlive&lt;/a&gt; पर पेश किया है। हम उसके एक हिस्से को साभार के साथ यहां पेश कर रहे हैं,बाकी आप सीधे लिंक के जरिए वहां जाकर पढ़ सकते हैं। पेश करने के पीछे सरोकार है कि हम अपने-अपने स्तर से मीतू की इस लड़ाई में समर्थन और सहयोग दे सकें।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हर लड़की यह सोचती है कि उसकी शादी अच्छे घर में हो। पति उसे चाहनेवाला हो और एक सपनों का घर हो। जिसे वह सजाये-संवारे और एक खुशहाल परिवार बनाये। मैंने भी कुछ ऐसे ही ख्‍़वाब बुने थे। अभी-अभी तो उसे संजोना और बुनना शुरू ही किया था मैंने। पर कब सब कुछ बिखरना शुरू हुआ, पता ही नहीं चला। खैर… सीधी-सीधी बात बताती हूं। शादी नवंबर 2004 में डॉ कमल खुराना से हुई। कहने को तो अच्छा घर था, पर यहां आते ही मुझे दहेज के लिए प्रताड़ित किया जाने लगा। मैं यह सब जुल्म चुपचाप सहती रही कि चलो कुछ दिनों में सब ठीक हो जाएगा। पर ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। शादी के दो महीने बाद ही यानी जनवरी 2005 में मैं गर्भवती हो गयी। गर्भ के साथ ही मेरे सपने भी आकार ले रहे थे। छठवें सप्‍ताह में मेरा अल्‍ट्रासाउंड हुआ और यह पता लगा कि मेरे गर्भ में एक नहीं बल्कि दो-दो ज़‍िंदगियां पल रही हैं। मेरा उत्साह दुगना हो गया। मैं बहुत खुश थी। परंतु मेरी सास मुझ पर सेक्‍स डिटर्मिनेशन करवाने के लिए दबाव डालने लगीं। मैंने इसके लिए मना कर दिया। ऐसा करने पर मुझे तरह-तरह से प्रताड़ित किया जाने लगा। इसमें मेरे पति की भूमिका भी कम नहीं थी। मेरा दाना-पानी बंद कर दिया गया और रोज़-रोज़ झगड़े होने लगे। मुझे जीवित रखने के लिए रात को मुझे एक बर्फी और एक गिलास पानी दिया जाता था। गर्भावस्था में ऐसी प्रताड़ना का दुख आप खुद समझ सकते हैं। इस मुश्किल घड़ी में भी मेरे मायके के लोग हमेशा मेरे साथ रहे। शायद इसी वजह से मैं आज जीवित भी हूं।....&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब मैं गर्भ चयन के लिए प्रताड़ना के बाद भी राज़ी नहीं हुई तो इन लोगों ने एक तरकीब निकाली। यह जानते हुए कि मुझे अंडे से एलर्जी है, उन्होंने मुझे अंडेवाला केक खिलाया। मेरे बार-बार पूछने पर कि इसमें अंडा तो नहीं है, मुझसे कहा गया कि नहीं, यह अंडारहित केक है। केक खाते ही मेरी तबीयत बिगड़ने लगी। मुझमें एलर्जी के लक्षण नजर आने लगे। मझे पेट में दर्द, उल्टी व दस्त होने लगा। ऐसी हालत में मुझे रात भर अकेले ही छोड़ दिया गया। दूसरे दिन पति और सास मुझे अस्पताल ले गये। लेकिन वो अस्पताल नहीं था। वहां मेरा एंटी नेटल टेस्ट हुआ था। मुझे लेबर रूम में ले जाया गया। यहां पर गायनेकेलॉजिस्ट (स्त्री रोग विशेषज्ञ) ने मेरी जांच कर केयूबी (किडनी, यूरेटर, ब्लैडर) अल्‍ट्रासाउंड करने की सलाह दी। लेकिन वहां मौजूद रेडियोलॉजिस्ट ने सिर्फ मेरा फीटल अल्‍ट्रासाउंड किया और कहा कि अब आप जाइए। जब मैंने देखा और कहा कि गायनेकेलॉजिस्ट ने तो केयूबी अल्‍ट्रासाउंड के लिए कहा था, आपने किया नहीं, तो उसने कहा कि ठीक है आप लेट जाइए और उसके बाद उसने केयूबी किया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस घटना के बाद तो प्रताड़नाओं का दौर और भी बढ़ गया। मेरे पति व ससुराल वाले मुझे गर्भ गिराने (एमटीपी) के लिए ज़ोर देने लगे। मेरी सास ने तो मुझसे कई बार यह कहा कि यदि दोनों गर्भ नहीं गिरवा सकती, तो कम से कम एक को तो गर्भ में ही ख़त्म करवा लो। दबाव बनाने के लिए मेरा खाना-पीना बंद कर दिया गया। मेरे पति मुझसे अब दूरी बरतने लगे और एक दिन तो उन्होंने रात के 10 बजे मुझे यह कह कर घर से निकाल दिया कि जा अपने बाप के घर जा। जब मैंने उनसे आग्रह किया कि मुझे मेरा मोबाइल और अपने कार की चाभी ले लेने दीजिए, क्‍योंकि गर्भावस्था में मैं खड़ी नहीं रह पाऊंगी तो उन्होंने कहा कि इस घर की किसी चीज़ को हाथ लगाया तो थप्पड़ लगेगा… मेरे ससुर ने हस्तक्षेप किया और कहा कि इसे रात भर रहने दो, सुबह मैं इसके घर छोड़ दूंगा। उनके कहने पर मुझे रात भर रहने दिया गया। सास की दलील थी कि दो-दो लड़कियां घर के लिए बोझ बन जाएंगी, इसलिए मैं गर्भ गिरवा लूं। अगर दोनों को नहीं मार सकती तो कम से कम एक को तो ज़रूर ख़त्म करवा लूं। जब मैं इसके लिए राज़ी नहीं हुई तो उन्होंने मुझसे कहा कि ठीक है यदि जन्म देना ही है, तो दो, लेकिन एक को किसी और को दे दो।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज भी मुझे वह भयानक रात याद है। तारीख थी 17 मई 2005… इतना गाली-गलौज और डांट के बाद मैं घबरा गयी थी और उस रात को ही मुझे ब्लीडिंग शुरू हो गयी। इतना खून बहने लगा कि एबॉर्शन का ख़तरा मंडराने लगा। खुद तो मदद करने की बात छोड़िए, चिकित्सकीय सहायता के लिए मेरे पिता को भी मुझे बुलाने की इजाज़त नहीं दी गयी। मैंने किसी तरह तड़पते-कराहते रात गुज़ारी और सुबह किसी तरह फोन कर पापा को बुला पायी। पापा के काफी देर तक मनुहार के बाद मेरे पति मुझे नर्सिंग होम ले जाने को तैयार हो गये। लेकिन खीज इतनी कि गाड़ी को सरसराती रफ्तार से रोहिणी से जनकपुरी तक ले आये। उस बीच मेरी जो दुर्गति हुई होगी, उसकी कल्पना आप खुद भी कर सकते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;आगे पढ़ने के लिए चटकाएं&lt;/span&gt;-&lt;a href="http://mohallalive.com/2009/11/20/brave-story-of-meetu-khurana-by-anupama/"&gt; बेटा दो या तलाक दो&lt;/a&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6898673550088047104-6138660143792141142?l=taanabaana.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://taanabaana.blogspot.com/feeds/6138660143792141142/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.blogger.com/comment.g?blogID=6898673550088047104&amp;postID=6138660143792141142' title='8 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6898673550088047104/posts/default/6138660143792141142'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6898673550088047104/posts/default/6138660143792141142'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://taanabaana.blogspot.com/2009/11/blog-post_21.html' title='एक पुरुष डॉक्टर का फरमान- बेटा दो या तलाक दो'/><author><name>विनीत कुमार</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09398848720758429099</uri><email>vineetdu@gmail.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' name='OpenSocialUserId' value='01281586745461734077'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_uS1XY77Y4b8/SwePJL1PrqI/AAAAAAAABYc/4Ry9GtAxHBU/s72-c/mitu.jpg' height='72' width='72'/><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>8</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6898673550088047104.post-3619660793759757126</id><published>2009-11-17T14:13:00.008+05:30</published><updated>2009-11-18T12:56:17.705+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='social changes'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='hindi poetry'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='yash maalviya'/><title type='text'>दुर्लभ प्रजाति का कविः यश मालवीय होंगे हमारे साथ</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/_uS1XY77Y4b8/SwOcrctjGLI/AAAAAAAABYA/74Kv5z5b2PU/s1600/yash-malveeya-in-DU.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 236px; height: 320px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_uS1XY77Y4b8/SwOcrctjGLI/AAAAAAAABYA/74Kv5z5b2PU/s320/yash-malveeya-in-DU.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5405336248030271666" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; कल करीब चार घंटे के लिए &lt;a href="http://www.kavitakosh.org/kk/index.php?title=%E0%A4%AF%E0%A4%B6_%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%B2%E0%A4%B5%E0%A5%80%E0%A4%AF"&gt;यश मालवीय&lt;/a&gt; हमारे साथ होंगे। यश मालवीय देश के दुर्लभ प्रजाति के कवि-गीतकार हैं। ऐसा बिल्कुल भी नहीं है कि इस देश में बेहतर लिखनेवाले कवि-गीतकार की कमी है।..और ऐसा भी नही है कि किसिम-किसिम की कविता और गीत बेचकर ठाठ से जीवन चलानेवाले कवि-गीतकारों की किल्लत है। इस मामले में बल्कि संख्या में लगातार इजाफा ही होता जा रहा है। बल्कि अगर आप इस जमात के कवियों की तुलना भारतीय क्रिकेटरों से करे तो एक सीरिज के खत्म होने के पहले ही दूसरे और तीसरे सीरिज की टिकट और आने-जाने के सारे इंतजाम तय होते है। शायद यही वजह है कि आजकल कवि सम्मेलनों में किसी कवि के सम्मान और परिचय में जब भी कुछ कहा जाता है तो साथ में ये जरुर बताया जाता है कि अभी टोरंटो,कनाडा, फिजी, जेनेवा से लौटे हैं और परसों फ्रैंक्फर्ट की रवानगी है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दर्शक दीर्घा में बैठा हिन्दी समाज और कई बार उससे इतर का भी समाज मुंह बाये ये सब सुनता है। कभी साहित्य के नाम पर आलोचना पढ़ने भर से परेशान हो उठता है। अपने भीतर कवि मिजाज को कुरेद-कुरेदकर संभावना की उस बीज की तलाश करता है जिससे कि तुकबंदी करने और हिन्दी शब्दों और लाइनों को फिट करने की पौध उग आए। इसलिए बाकी तो नहीं लेकिन एमए के दौरान मैंने देखा कि हिन्दू कॉलेज में हर तीन में से एक स्टूडेंट कवि हो जाता। एमबीए के लड़के को अकड़ के साथ बताया जाता है कि पता है ये जो कवि है न,दस हजार से नीचे पर तो आता ही नहीं है। देश में कुछ कवि तो ऐसे जरुर हैं जो तय रेट से नीचे पर आते ही नहीं हैं। बाकी उन कवियों की अच्छी-खासी जमात है जो शुरुआती दौर में तो पकड़-पकड़कर कविता सुनाते हैं लेकिन बहुत जल्द ही &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;संगत कल्चर के कवि समूहों&lt;/span&gt; में भर्ती होने के लिए बेचैन होने लग जाते हैं। &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;संगत कल्चर &lt;/span&gt;में एकमुश्त पैसे मिल जाते हैं और उस्ताद कवि उन्हें कुछ-कुछ बांट देते हैं। हर लाइन और हर शब्द के पीछे दाम लगाकर कविता को एक पैकेज में तब्दील करने की कला कि एक सफल और बेहतर कवि-गीतकार की असल पहचान बनती है।&lt;br /&gt;संभवतः यही वजह है कि देश के साहित्यिक रुझान और गंभीर किस्म के माने जानेवाले कवि इस तरह के मंचीय कवियों के नाम पर नाक-भौं सिकोड़ते हैं। उनके बारे में बात करते ही गंभीर कवियों का बुखार के वक्त की तरह मुंह का स्वाद बिगड़ जाता है। वो उन पर कविता को कोठे पर बिठा देने का आरोप लगाते हैं। ये कवि बुद्धिजीवी समाज के बीच हाथों-हाथ लिए जाते हैं। सेमिनारों में बोलते हैं,अकादमियों में कविता की रचना-प्रक्रिया पर विमर्श करते हैं। वो कविता की औसत समझ रखनेवाले लोगों के बीच नहीं जाते। वो कविता करने और मुजरे के लिए लिखे जानेवाले बोल में फर्क करना जानते हैं,शायद। जीवन दोनों तरह के कवियों का चलता है। सक्रिय और जागरुक रहने पर दोनों तरह के कवियों की गाड़ियों की बढ़ती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यहीं पर आकर यश मालवीय के कवि और गीतकार होने की प्रजाति होने की प्रजाति अलग और दुर्लभ है। हजारों लोगों के बीच ये कवि अपनी कविता पढ़ना शुरु करता है। लोगों को इनकी कविताएं अटपटी लगती है। वो शोर-शराबा करने की कोशिश करते हैं। &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;हरिवंश राय बच्चन&lt;/span&gt; हस्तक्षेप करते हैं कि आप ऐसा न करें। कली को खिलने का मौका तो दें। नवोदित कवि कविताएं सुनाता है और फिर अब के जमाने के वन्स मोर,वन्स मुहावरे में दोबारा पंक्तियों को सुनाने की फरमाइशें होती हैं। इस कवि को ये सब बिल्कुल भी अटपटा नहीं लगता। ये कवि कविता पाठ करने जाता है और लौटते हुए साथ में आटे की थैली लेकर घर घुसता है। उसे कभी भी कुंठा नहीं कि वो अपनी कविता को कोठे पर बेच आया है। उसने अपनी कविता की कीमत महज दो-तीन किलो के आटे का दाम लगाया। कभी कोई मलाल नहीं। कई बार किसी सम्मेलन में दस हजार तक मिल गए तो बड़ा और सिलेब्रेटी हो जाने का कोई गुरुर नहीं। सिर्फ आचमन पर ही घंटों रंग जमा देने के बाद इस बात पर कभी चिंता नहीं कि वो इस्तेमाल कर लिया गया है। फिल्म &lt;a href="http://entertainment.oneindia.in/bollywood/features/mazhar-kamran-mohandas-161007.html"&gt;मोहनदास&lt;/a&gt; के लिए गाने लिखे,&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;जगजीत सिंह&lt;/span&gt; के लिए गजल लिखा और फिल्म इंडस्ट्री से कई ऑफर मिले,ये सब कुछ बस रोजमर्रा के गपशप का हिस्साभर है। आपने इन गीतों के लिए बहुत ही कम पैसे लिए सर? मेरे ये कहे जाने पर उनका बहुत ही सपाट जबाब-हमसे मुंह ही नहीं खोला जाता। &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;अविनाश &lt;/span&gt;के ये कहने पर कि आप पीए रखिए और वही बात करेगा,वो इस तरह के सुझाव से घबरा जाते हैं। उनकी अपनी सादगी दफ्न होती नजर आती है। यश मालवीय ने कवि भी अपनी कविताओं और लिखी गयी पंक्तियों के आगे प्राइस टैग नहीं लगाया। शब्दों की बसूली अनुवादक और सफल कवियों की तरह नहीं की।&lt;br /&gt;मंच पर कविता करते हुए,बाइक चलाते हुए कविता सुनाते हुए,आचमन के लिए उत्साहित करते हुए इस कवि का सामाजिक सरोकार बुद्धिजीवी कवियों से रत्तीभर भी कम नहीं हुआ। कुछ नहीं तो &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;कहो सदाशिव&lt;/span&gt;, &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;उड़ान से पहले&lt;/span&gt;,&lt;span style="font-weight:bold;"&gt; राग-बोध के 2 भाग&lt;/span&gt; हाथ लग जाए तो पढ़िए,आपको अंदाजा लग जाएगा। कविता के दोनों पाटों पर रमनेवाला ये कवि एक जरा भी भयभीत नहीं होता कि अगर उसने मंच पर गमछा ओढ़ लोगों के साथ कविता पढ़ दिया तो उस पर नाक-भौं सिकोड़े जाएंगे। साहित्य अकादमी,हिन्दी अकादमी और विश्वविद्यालयों के मंचों से कविता पढ़ते हुए कभी इस बात का खतरा नहीं हुआ कि वो आम आदमी से दूर हो रहे हैं। ये सबकुछ उस आम आदमी के विकासक्रम के तौर पर बहुत ही सहज तरीके से चलता है। दरअसल यश मालवीय का क्लास फिक्स होने के बजाय रोटेट होता है,वो रोमिंग मोड में होता है। वो कभी भी बाकी कवियों की तरह फिक्स नहीं होता। अगर कुछ फिक्स या तय है तो कविता को लेकर तय किया गया उनका एजेंडा। कहीं से भी बोलो,किसी से भी बोलो,उनके सामने यही सवाल करो- &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;दरी बिछानेवाले रामसुभग का क्या हुआ?&lt;span style="font-style:italic;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt; &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;छप्पन तरह के पकवाने लाने और खुद गम खाने वाले रामसुभग को लेकर आपकी क्या राय है&lt;span style="font-style:italic;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;? परिवेश और मंच बदलने के साथ यश मालवीय का सवाल नहीं बदलता,मिजाज नहीं बदलता। संभवतः यही उन्हें बाकी के कवियों से अलग करता है। इसलिए वो सिलेब्रेटी मंचीय कवियों की पांत से अलग हैं और बुद्धिजीवी कवियों की पंक्तियों में अलग से देखे जानेवाले कवि हैं। वो कविता के जरिए पैसा नहीं आदमी कमाते हैं। वो कविता के जरिए विचार नहीं सक्रियता पैदा करते हैं। इसलिए यश मालवीय दुर्लभ प्रजाति के कवि-गीतकार हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;नोट&lt;/span&gt;- कार्यक्रम की पूरी जानकारी के लिए पोस्ट पर चटकाकर बड़े साइज में देखें या फिर नीचे के लिए पर चटकाएं-&lt;br /&gt;&lt;a href="http://mohallalive.com/2009/11/17/yash-malviya-in-du/"&gt;सफर का आयोजनः आमने-सामने में यश मालवीय&lt;/a&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6898673550088047104-3619660793759757126?l=taanabaana.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://taanabaana.blogspot.com/feeds/3619660793759757126/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.blogger.com/comment.g?blogID=6898673550088047104&amp;postID=3619660793759757126' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6898673550088047104/posts/default/3619660793759757126'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6898673550088047104/posts/default/3619660793759757126'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://taanabaana.blogspot.com/2009/11/blog-post_17.html' title='दुर्लभ प्रजाति का कविः यश मालवीय होंगे हमारे साथ'/><author><name>विनीत कुमार</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09398848720758429099</uri><email>vineetdu@gmail.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' name='OpenSocialUserId' value='01281586745461734077'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_uS1XY77Y4b8/SwOcrctjGLI/AAAAAAAABYA/74Kv5z5b2PU/s72-c/yash-malveeya-in-DU.jpg' height='72' width='72'/><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6898673550088047104.post-8652750462138767975</id><published>2009-11-08T01:32:00.010+05:30</published><updated>2009-11-08T19:24:22.065+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='navbharat times'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='hindi newspaper'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='prabhash joshi'/><title type='text'>प्रभाष जोशी का जाना जिस अखबार के लिए खबर नहीं</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://3.bp.blogspot.com/_uS1XY77Y4b8/SvbNhlMwo7I/AAAAAAAABXw/bqnAGtV4uFg/s1600-h/joshi.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 300px; height: 188px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_uS1XY77Y4b8/SvbNhlMwo7I/AAAAAAAABXw/bqnAGtV4uFg/s320/joshi.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5401730779882496946" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;7 नवम्बर&lt;/span&gt; के &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;नवभारत टाइम्स&lt;/span&gt; ने &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;प्रभाष जोशी &lt;/span&gt;के निधन पर एक लाइन की भी खबर छापना जरुरी नहीं समझा। इसी प्रकाशन समूह का अखबार&lt;span style="font-weight:bold;"&gt; The Times Of India&lt;/span&gt; ने&lt;span style="font-weight:bold;"&gt; action on pitch cut short his acerbic pen &lt;/span&gt;शीर्षक से तस्वीर सहित करीब 600 शब्दों में खबर छापा है। &lt;a href="http://blogs.navbharattimes.indiatimes.com/Akathya/entry/%E0%A4%95_%E0%A4%9B_%E0%A4%AC_%E0%A4%A4_%E0%A4%AC"&gt;नवभारत टाइम्स डॉट कॉम&lt;/a&gt; के ब्लॉग कोना में &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;पूजा प्रसाद&lt;/span&gt; ने कितने सीधे थे प्रभाष जोशी शीर्षक से पोस्ट लिखी है। &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;दैनिक जागरण&lt;/span&gt; ने उनके लिए साइड में वमुश्किल से सौ शब्द छापे। ये दोनों देश के प्रमुख अखबारों में से है। रीडरशिप की दौड़ में रेस लगानेवाले हैं। अपनी ब्रांडिंग के लिए लाखों रुपये खर्च करते आए हैं। लेकिन आज ऐसा करते हुए जरा भी अपनी ब्रांड इमेज की चिंता नहीं की। कहने को कहा जा सकता है कि नहीं छापा तो नहीं छापा इसमें कौन-सा पहाड़ टूट गया? लेकिन सवाल है कि क्या देश की पत्रकारिता इसी तरह की किसी व्यक्तिगत पसंद-नापसंद के बूते चलती रहेगी ? हिन्दी पत्रकारिता में इसी तरह की बर्बरता बनी रहेगी?&lt;br /&gt;यहां सवाल सिर्फ &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;प्रभाष जोशी&lt;/span&gt; की खबर छापने या नहीं छापने भर से नहीं है। ये तो फिर भी मीडिया,पाठकों और &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;प्रभाष जोशी&lt;/span&gt; को जानने-समझनेवाले लोगों के लिए बड़ी खबर है। हम जैसे देश के हजारों पाठक रोज कमरे तक न्यूजपेपर पहुंचाने वाले भैय्या के आने का इंतजार बर्दाश्त नहीं कर पाने की स्थिति में संभवतः खुद ही नजदीकी स्टॉल से चले गए होंगे। रोज एक या दो अखबार पढ़ने के अभ्यस्त आज सारे अखबारों को देखना-खरीदना चाह रहे होगें और पन्ने पलटते गए  होंगे गए। तब जाकर पता चला होगा कि इन दोनों अखबारों ने इस तरह का खेल किया है। नहीं तो कहां पता चलनेवाला था कि कोई अखबार ऐसा भी कर सकता है? &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;प्रभाष जोशी&lt;/span&gt; की खबर की तरह ही बाकी की कितनी खबरों के प्रति इतने संवेदनशील होते हैं,जानने-समझने के उत्सुक होते हैं। कितनी घटनाओं के प्रति हमारा सरोकार होता है? कितनी खबरों को लेकर हम एक ही दिन कई-कई अखबार पलटते हैं? मुझे नहीं लगता कि एक औसत पाठक दो-तीन अखबार से ज्यादा देख पाता होगा। तो क्या ऐसे में अखबार में काम करनेवाले मीडियाकर्मियों के पसंद-नापसंद के फार्मूले पर कई खबरें न छपने की बलि चढ़ जाती होगी? &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;क्या यहां से हमें अखबारों के चरित्र को समझने के कोई सूत्र मिलते हैं&lt;/span&gt;? मास की बात करनेवाला अखबार,व्यावहारिक स्तर पर इतना इन्डीविजुअल हो सकता है? खबरों को दबाए औऱ कुचले जाने का काम व्यक्तिगत इच्छा-अनिच्छा की चीज बनती आयी है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मीडिया के अलग-अलग मसलों पर लिखते हुए इधऱ कुछ दिनों से मैंने तय किया है कि इसकी समीक्षा इन्हीं की शर्तों पर की जाए। हमें मीडिया में सरोकारों के सवाल पर न तो हाथ में कम्युनिस्ट मैनिफेस्टो लेकर बात करनी है। न ही अपनी तरफ से कोई फार्मूला फिट करके मीडिया को देखने-परखने की जुगत भिड़ानी है। हमें मौजूदा मीडिया को उसी नजरिए से देख-समझकर बात करनी है,जिस नजरिए से मीडिया से जुड़े लोग हमें समझने का तर्क देते हैं। देखते हैं,इससे किस तरह के निष्कर्ष निकलकर सामने आते हैं? अभी चार दिन पहले ही देखिए, शाहरुख के केक काटने की लाइव कवरेज के नाम पर चैनलों ने बुजुर्ग पत्रकारों के टकले सिर दिखाए,पत्रकारों की पिछाड़ी दिखाए। ये अपने ही फार्मूल पर नहीं टिके रह सके। इधर अखबारों से जब आप खबरों की हिस्सेदारी की बात करेंगे,सामाजिक सरोकारों की बात करेंगे तो आपसे सीधा सवाल करेंगे कि जो चीजें पढ़ी ही नहीं जाती,उस पर लिखने-छापने से क्या फायदा? साहित्य,संस्कृति और कला से जुड़ी खबरें इसी तर्क के आधार पर अब प्रमुखता से खबर का हिस्सा नहीं रहा। हमें तो बाजार देखना होता है,हम क्या कर सकते हैं? मतलब साफ है कि वो उन्हीं खबरों को छापेंगे जो उन्हें रिटर्न देने की ताकत रखते हों। अब इसी फार्मूले से आप &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;नवभारत टाइम्स&lt;/span&gt; और &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;दैनिक जागरण &lt;/span&gt;से सवाल करें कि क्या &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;प्रभाष जोशी&lt;/span&gt; की खबर बिकाउ नहीं है, मीडिया,खासकर अखबारों के लिए सेलेबुल आइटम नहीं रहा।(&lt;span style="font-style:italic;"&gt;प्रभाष जोशी के निधन की खबर के लिए इस तरह की भाषा का इस्तेमाल करने के लिए माफ करेंगे,लेकिन अखबार शायद इस तरह की भाषा ज्यादा आसानी से समझते हैं,बस इसलिए&lt;/span&gt;)।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;सुबह उठकर&lt;span style="font-weight:bold;"&gt; पुष्कर&lt;/span&gt; जब &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;समाचार अपार्टमेंट&lt;/span&gt; के पास के स्टॉल वाले से जनसत्ता की मांग करता है तो उसका जबाब होता है-नहीं है। आप से पहले पचासों लोग जनसत्ता खोजने आ चुके हैं। पता नहीं आज लोग क्यों इस अखबार को ज्यादा खोज रहे हैं? वैसे तो ये इतवार को ज्यादा बिकता है। देर रात जागने के बाद सुबह उठते ही सारे अखबार खरीदने के लिए &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;पटेल चेस्ट&lt;/span&gt; की तरफ भागता हूं तो देखता हूं छात्रों की एक बड़ी जमात वहां पहले से मौजूद है जो कि फ्रंट पर खोजते हुए अंदर तक अखबारों में घुसती है,सिर्फ और सिर्फ &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;प्रभाष जोशी&lt;/span&gt; की खबर को पढ़ने के लिए।..और दिनों के मुकाबले कल लोगों ने एक से ज्यादा अखबार पढ़े होंगे,खरीदे होंगे। मेरा ऐसा अनुमान है। ऐसे में अखबारों का सेलेबुल होने के आधार पर खबर को छापने वाला फार्मूला &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;प्रभाष जोशी&lt;/span&gt; की खबर के साथ क्यों नहीं लागू किया गया? दिन-रात बाजार के दबाब का रोना रोनेवाले ये अखबार हमेशा बाजार को ध्यान में रखकर खबरें नहीं छापते हैं। इस घटना के आधार पर तो यही समझ बनती है कि अखबार संभवतः कई मौके पर व्यक्तिगत खुन्नस,जातीय,क्षेत्रीय और भाषाई स्तर के दुराग्रह की वजह से भी कई खबरों को नहीं छापता होगा। प्रभाष जोशी ने जीते-जी पैसे लेकर खबरें छापने और नहीं देने पर नहीं छापने की बात कही थी। उसे अपनी लेखनी से लगातार अभियान का रुप देने जा रहे थे। इस घटना में पैसे के फार्मूले के आगे व्यक्तिगत स्तर का पसंद-नापसंद वाला फार्मूला ज्यादा हावी नजर आया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रभाष जोशी की खबर को नहीं छापने की घटना से हमारे सामने एक ही साथ कई सवाल खड़े हो जाते हैं? क्या अखबारों में खबरों को छापने और न छापने का आधार जाति,समुदाय,क्षेत्र,संप्रदाय और धर्म को लेकर पसंद और नापसंद भी होता है? अखबार में बहुसंख्यक समुदाय,जाति और विचारधारा के पसंद-नापसंद से खबरें प्रमुखता पाती है? क्या गुजरात का नरसंहार, 1984 के सिख विरोधी दंगे,बाबरी मस्जिद जैसे दर्जनों मनहूस घटनाएं होंगी जिसमें इसी पैटर्न को फॉलो करते हुए खबरें छापीं गयी होगीं,खारिज की गयी होगी? ऐसा सोचते ही सिहरन सी होने लग जा रही है?&lt;br /&gt;मुझे नहीं पता कि प्रभाष जोशी को लेकर दैनिक जागरण औऱ &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;नवभारत टाइम्स &lt;/span&gt;के शीर्ष पर बैठे लोगों के साथ क्या असहमति और रंजिशें रही होंगी। लेकिन तीन-साढ़े तीन रुपये देकर अखबार खरीदनेवाले ग्राहक के साथ न्याय तो कर देते। आप मीडिया एथिक्स तो दूर सही तरीके से प्रोफेशनल एथिक्स को भी फॉलो करने में यकीन नहीं रखते। प्रभाष जोशी का इससे तो कुछ हुआ नहीं,कम से कम अपनी साख में बट्टा लगने से तो अपने को बचा लिया होता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;नोटः-&lt;/span&gt; 7 नवम्बर के नवभारत टाइम्स ने प्रभाष जोशी को याद करते हुआ अभय कुमार दुबे का संस्मरण छापा है- &lt;a href="http://navbharattimes.indiatimes.com/articleshow/5204172.cms"&gt;वह खनक अभी भी बजती है&lt;/a&gt;। अब सवाल है कि क्या इसे ही खबर के तौर पर पढ़ा-समझा जाना चाहिए और इस बात का संतोष कर लिया जाना चाहिए कि,कोई बात नहीं चाहे किसी भी रुप में हो,याद तो किया।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6898673550088047104-8652750462138767975?l=taanabaana.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://taanabaana.blogspot.com/feeds/8652750462138767975/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.blogger.com/comment.g?blogID=6898673550088047104&amp;postID=8652750462138767975' title='13 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6898673550088047104/posts/default/8652750462138767975'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6898673550088047104/posts/default/8652750462138767975'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://taanabaana.blogspot.com/2009/11/blog-post_08.html' title='प्रभाष जोशी का जाना जिस अखबार के लिए खबर नहीं'/><author><name>विनीत कुमार</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09398848720758429099</uri><email>vineetdu@gmail.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' name='OpenSocialUserId' value='01281586745461734077'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_uS1XY77Y4b8/SvbNhlMwo7I/AAAAAAAABXw/bqnAGtV4uFg/s72-c/joshi.jpg' height='72' width='72'/><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>13</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6898673550088047104.post-4088190872359915607</id><published>2009-11-07T10:52:00.007+05:30</published><updated>2009-11-07T23:50:10.305+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='kab kategi chaurasi'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='jairnail singh'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='84 danga'/><title type='text'>सरकार को देना होगा- कब कटेगी चौरासी का जवाब</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://3.bp.blogspot.com/_uS1XY77Y4b8/SvUElZ5WJ8I/AAAAAAAABXg/max4dFLDSDY/s1600-h/Picture+017.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 240px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_uS1XY77Y4b8/SvUElZ5WJ8I/AAAAAAAABXg/max4dFLDSDY/s320/Picture+017.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5401228368753862594" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt; मूलत: प्रकाशित- &lt;a href="http://mohallalive.com/2009/11/07/release-ceremony-report-of-jarnail-book/"&gt;मोहल्लाlive&lt;/a&gt;&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;1984 के सिख दंगे के बारे में जिसे कि मैं दंगा नहीं नरसंहार मानता हूं, देश के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहीं कहा है कि हमें इसे भूल जाना चाहिए। मैं मानता हूं कि इतिहास भूलने की चीज़ नहीं होती। आज से पता नहीं कितने हज़ार साल पहले रावण ने ग़लती की और हम आज तक उसे जलाते हैं। बाबर ने कई सालों पहले जो किया, वो आज भी संदर्भ के तौर पर हम याद करते हैं। भारतीय कभी इतिहास को भूलते नहीं है। वो किसी न किसी रूप में दूसरे जेनरेशन और उसके बाद अगले से अगले जेनरेशन में जाता ही है। 1984 में सिक्खों के साथ जो कुछ भी हुआ, वो आगे के जेनरेशन में भी जाएगा और ये शायद ज़्यादा ख़तरनाक रूप में जाए। इसलिए इसे करेक्ट करने की ज़रूरत है। सिर्फ जस्टिस के जरिये ही इतिहास की इस भूल को करेक्ट किया जा सकता है।&lt;/span&gt; &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;जरनैल सिंह&lt;/span&gt; ने ये बातें अपने किताब के लोकार्पण के मौके पर ज़ुबान की प्रकाशक और चर्चित लेखिका &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;उर्वशी बुटालिया&lt;/span&gt; से पूछे गये सवालों का जबाब देते हुए कहीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पेंग्विन ने 84 के दंगे को लेकर जरनैल सिंह की लिखी किताब को &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;कब कटेगी चौरासी : सिख क़त्लेआम का सच&lt;/span&gt; नाम से प्रकाशित किया है। मूलतः हिंदी में लिखी गयी इसी किताब को उसने अंग्रेजी अनुवाद &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;I ACCUSE… The Anti-Sikh Violence Of 1984&lt;/span&gt; से प्रकाशित किया गया है। 6 नवंबर को दिल्ली के कांस्टीट्यूशन क्लब में इस किताब का लोकार्पण किया गया। लोकार्पण के पहले जरनैल सिंह ने अपनी किताब, 84 के दंगे और &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;पी चिदंबरम&lt;/span&gt; पर जूता फेंकने वाले प्रकरण को लेकर वक्तव्य दिया। किताब का लोकार्पण हो जाने के बाद जरनैल सिंह और उर्वशी बुटालिया के बीच एक संवाद सत्र रखा गया, जिसमें उर्वशी बुटालिया की ओर से किताब और 84 के दंगे से जुड़े कई सवाल किये गये। बाद में ऑडिएंस के तौर पर मौजूद लोगों ने भी कई सवाल किये। इस तरह स्वतंत्र वक्तव्य और लोगों के सवाल-जबाब को मिला कर जरनैल सिंह ने किताब के लिखे जाने की वजह से लेकर न्याय, सरकार के रवैये, प्रशासन व्यवस्था और सामाजिक ज़‍िम्‍मेदारी जैसे मसलों पर विस्तारपूर्वक अपना पक्ष रखा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अपने शुरुआती वक्तव्य में जरनैल सिंह ने कहा कि इस किताब में उन लोगों की दिल दहला देनेवाली कहानियां हैं, जिन्हें कि 25 साल बाद भी न्याय नहीं मिला। दो महीने के बच्चे को चूल्हे पर रखकर जला दिया गया, लोगों को टायर में फंसा कर आग लगा दी गयी। यह किताब उन सबों को पढ़ने के लिए है, जो कि इंसानियत के साथ खड़े होने में यक़ीन रखते हैं। हम अपने को दुनिया के सबसे सभ्य और संस्कृति वाले देश के लोग के तौर पर मानते हैं लेकिन ये कितनी बड़ी बिडंबना है, कितना बड़ा मजाक है कि इसी देश में 3000 लोगों को सरेआम कत्ल कर दिया गया लेकिन आज पच्चीस साल बाद भी उन्हें न्याय नहीं मिला है। कहीं न कहीं हमारे देश की आत्मा मर गयी है, जो दोषी लोगों को सज़ा देने के बजाय उन्‍हें संसद में भेज देती है। किताब की प्रस्तावना में&lt;span style="font-weight:bold;"&gt; खुशवंत सिंह&lt;/span&gt; ने लिखा है कि जिन लोगों ने दंगाइयों की भीड़ का सक्रिय संचालन किया और गुरुद्वारों और सिख मोहल्लों पर हमला करवाया, उनकी करतूतों के लिए सज़ा देना तो दूर, उन्हें प्रधानमंत्री राजीव गांधी से इनाम के तौर पर मंत्रिमंडल में शामिल होने का अवसर मिला। (पेज नं-XIII)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जरनैल सिंह ने स्वीकार किया कि मेरे विरोध करने का जो तरीक़ा था वो ग़लत था लेकिन जिस बात के विरोध में मैं खड़ा हूं, उस पर मुझे आज भी गर्व है। विरोध का तरीक़ा ग़लत होने क बावजूद विरोध का कारण महत्वपूर्ण है। आखिर क्या वजह है कि 11 साल बाद इस घटना का एफआईआर दर्ज हुआ? इस घटना के 25 साल हो गये, न्याय मिलने की बात तो दूर देश का कोई भी प्रधानमंत्री एक बार भी उस विडोज़ कॉलोनी में क्यों नहीं गया?&lt;span style="font-weight:bold;"&gt; दर्शन कौर &lt;/span&gt;जो इस किताब का लोकार्पण कर रही हैं, उन्‍हें बार-बार क्यों धमकाया गया? उनके सामने क्यों 25 लाख रुपये का ऑफर दिया गया और बयान बदलने की बात कही गयी? (दर्शन कौर, 1984 के दंगों से प्रभावित और जीवित बच पायीं एक पीड़िता हैं।)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ये किताब इसलिए लिखी गयी कि उस समय मीडिया ने अपनी ज़‍िम्मेदारी नहीं निभायी। उसे सही तरीके से कवर नहीं किया गया। इस घटना में पीड़ितों का पक्ष संवेदनशील तरीके से नहीं रखा गया। इस मामले में दूरदर्शन का रवैया संदिग्ध रहा है। दूरदर्शन के चरित्र की चर्चा जरनैल ने किताब में भी की है। उन्होंने लिखा है कि दूरदर्शन नरसंहार भड़काने में अपनी भूमिका पूरी शिद्दत से निभा रहा था। लगातार&lt;span style="font-weight:bold;"&gt; इंदिरा गांधी का शव &lt;/span&gt;और उसके आसपास खून का बदला खून के लग रहे नारों को प्रसारित किया जा रहा था। &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;नानवटी आयोग&lt;/span&gt; को दिये गये अपने हलफ़नामे में अवतार सिंह बीर ने इस बात का जिक्र किया है। दूरदर्शन बार-बार सिख सुरक्षाकर्मियों’ द्वारा हत्या की बात दोहरा रहा था, जबकि आमतौर पर दंगों में भी दो वर्गों की बात कही जाती है, किसी वर्ग का नाम नहीं लिया जाता। दूरदर्शन पर सिख क़त्लेआम की एक भी खबर नहीं दिखायी गयी। अख़बार भी सही खबर देने के अपने धर्म को भूल चुके थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;जरनैल सिंह&lt;/span&gt; का मानना है कि ये दंगा न होकर सुनियोजित तरीके से सरकारी कत्लेआम था। खुलेआम सिखों की हत्या की जा रही थी। इसे रोकना क्या प्रशासन की ज़‍िम्मेदारी नहीं थी? इस किताब ने कत्लेआम के दौरान खाकी वर्दी, प्रशासन, सरकार और राजनीति से जुड़े लोगों के रवैयों की विस्तार से चर्चा की गयी है। 31 अक्टूबर की रात बाकायदा कांग्रेस नेताओं की बैठक&lt;span style="font-weight:bold;"&gt; कांग्रेसी विधायक रामपाल सरोज&lt;/span&gt; के घर पर हुई, जहां ये निर्देश जारी हुए कि अब पूरी सिख कौम को सबक सिखाना है। &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;सिखों और उनके घरों को जलाने के लिए &lt;/span&gt;रसायनिक कारखानों से सफेद पाउडर की बोरियां मंगवा पूरी दिल्ली में बंटवायी गयीं। (पेज नं 103)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अन्यायकर्ता और न्यायकर्ता नाम से एक शीर्षक है, जिसके भीतर सिरों की कीमत, भगत से बदला, कत्लेआम और सत्ता की सीढ़ी, सदियों के भाईचारे पर दाग़, दंगाई खाकी, देखती रही फौज, वर्दी ही कफन बन गयी, असहाय राष्ट्रपति, मौन गृहमंत्री और दंगे नहीं उपसंहार नाम से उपशीर्षक हैं। इन उपशीर्षकों के भीतर दिल दहला देनेवाली घटनाओं की चर्चा है। नानावटी आयोग की रिपोर्ट में पेज नंबर 87 पर सुल्तानपुरी के बयान दर्ज है, जिसमें कहा गया है, “&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;सज्जन कुमार &lt;/span&gt;ने वहां एकत्रित भीड़ को संबोधित करते हुए कहा कि जिसने भी रोशन सिंह और भाग सिंह की हत्या की है, उन्हें 5000 रूपये इनाम दिया जाएगा। जो बाकी सिखों को मारेंगे, उन्हें प्रति व्यक्ति 1000 रुपये का इनाम दिया जाएगा” (पेज नं-61)।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दंगे के सामाजिक स्तर की सक्रियता के सवाल पर &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;जरनैल सिंह &lt;/span&gt;ने स्पष्ट किया कि आमतौर पर भारतीय तेवर इस तरह की गतिविधियों में सक्रिय होने का पक्षधर नहीं है। लेकिन इस घटना के विरोध में लोग खुलकर सामने नहीं आये, उसे रोका नहीं। आखिर क्या कारण है कि इस घटना को अपनी आंखों से देखनेवाले कई गैर-सिखों में से एक भी गवाह के तौर पर सामने नहीं आया? यह पूरी तरह पॉलिटिकल कॉन्‍सपीरेसी रही है। &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;उर्वशी&lt;/span&gt; के पूछे गये इस सवाल पर कि आप हिंदू-सिख को घुले-मिले रूप में देखते हैं। ऐसे में आप सोचते हैं कि एक संवाद की गुंजाइश है? जरनैल सिंह का सीधा जबाब रहा कि भाईचारे को सिर्फ और सिर्फ जस्टिस के जरिये ही कायम किया जा सकता है।&lt;br /&gt;किताब का एक बड़ा हिस्सा उन लोगों की दास्तान को दर्ज करता है, जिन्होंने अपनी आंखों के सामने अपने पति और बच्चे खो दिये, जिनके परिवार उजड़ गये। जो किसी भी हालत में इस सदमे से उबर नहीं पाये हैं। जज जब दर्शन कौर से भगत को पहचानने की बात करता है, तब भगत का एक-एक लफ्ज उसे याद आ रहा था। &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;भगत&lt;/span&gt; कह रहा था, &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;“किसी सरदार को मत छोड़ो। ये गद्दार हैं। मिट्टी का तेल, हथियार सब कुछ है, पुलिस तुम्हारे साथ है। सरदारों को कुचल डालो।”&lt;/span&gt; (पेज नं-68)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अपने परिवार के लोगों को कत्लेआम में गंवाने वाले &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;सुरजीत सिंह&lt;/span&gt; का कहना है कि जिलाधिकारी ब्रजेंद्र पूरी तरह से दंगाइयों के साथ मिले हुए थे। (पेज नं-94)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;1984 में दिल्ली के मशहूर वेंकेटेश्वर कॉलेज में बीएससी (द्वितीय वर्ष) में पढ़ते हुए फर्राटेदार अंग्रेजी बोलने वाली भोली-भाली &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;निरप्रीत&lt;/span&gt; को नहीं मालूम था कि एक दिन वो इस तरह अपनी मां से तिहाड़ के अंदर मिलेगी। लेकिन 1984 के सिख कत्लेआम में पिता को दंगाइयों के हाथों तड़पते हुए मरता देख वह बागी हो चुकी थी। (पेज नं-51)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लोगों के सवालों का जवाब देते हुए जरनैल सिंह ने एक बार फिर कहा कि उनके विरोध करने का तरीक़ा ग़लत था लेकिन यह सच है कि उस प्रकरण के बाद ही ये मुद्दा फिर से हाइलाइट हुआ। जब सबने अपनी मर्यादा का उल्लंघन किया, तो हमें भी करना पड़ा। आखिर इस घटना के बाद ही सरकार को ये क्यों याद आया? हमारा कोई राजनीतिक मक़सद नहीं है, मैं किसी भी राजनीतिक दल से जुड़ा हुआ नहीं हूं। हम गृहमंत्री के विरोध में नहीं हैं। मैं इसके जरिये ऐसा दबाव बनाना चाहता हूं कि लोगों की सोयी हुई आत्मा जागे। दोषियों को सज़ा मिले, जिससे कि आनेवाले समय में दोबारा ऐसी हिम्मत नहीं करे। इस मामले में वो ये भी मानते हैं कि अगर 1984 के दोषियों को सज़ा मिल गयी होती तो संभव है गुजरात में जो कुछ भी हुआ, वो करने की हिम्मत लोग नहीं जुटा पाते। हम इसके जरिये नागरिक अधिकारों को सामने लाने की बात कर रहे हैं। एक महिला श्रोता की ओर से उठाये गये इस सवाल पर कि इससे पंजाबियों को क्यों अलग-थलग रखा जाता है? जरनैल सिंह ने जबाब दिया कि ये मसला सिर्फ सिखों से जुड़ा हुआ नहीं है। ये देश के उन तमाम लोगों से जुड़ा है, जिनके साथ इस तरह की घटनाएं हुई हैं और होती है।&lt;span style="font-weight:bold;"&gt; उर्वशी बुटालिया&lt;/span&gt; ने जरनैल सिंह के इस काम को एक बड़ा कमिटमेंट करार दिया और इस दिशा में लगातार आगे बढ़ते रहने की शुभकामनाएं दी। इस प्रयास का असर बताते हुए सभागार में मौजूद एक पत्रकार ने सूचना दी कि आज हम जिस जगदीश टाइटलर के विरोध में बात कर रहे हैं, ये जानकर खुशी हो रही है कि यूके ने 84 के दंगे में शामिल होने के आरोप में उन्‍हें वीज़ा देने से इनक़ार कर दिया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सवालों के दौर ख़त्‍म होने के साथ ही लोगों ने इच्‍छा जतायी कि जरनैल सिंह ने किताब के जरिये जिस मुद्दे को उठाया है, वो एक सही दिशा में जाकर विस्तार पाये। ये किसी भी रूप में न तो महज विवाद का हिस्सा बन कर रह जाए और न ही एक कौम की प्रतिक्रिया के तौर पर लोगों के सामने आये। ये व्यवस्था के आगे दबाव बनाने के माध्यम के तौर पर काम करे जिससे कि न्याय की प्रक्रिया तेज़ और सही दिशा में हो सके। इस मौके पर यात्रा प्रकाशन की संपादक&lt;span style="font-weight:bold;"&gt; नीता गुप्ता&lt;/span&gt; ने कहा कि जरनैल सिंह ने जो काम किया है, उसके लिए उनकी हिम्मत की दाद देनी होगी। हमें उम्मीद है कि किताब के प्रकाशन से आपके प्रयासों को मज़बूती मिलेगी। पूरे कार्यक्रम के दौरान रंजना(सीनियर कमिशनिंग एडिटर,पेंग्विन) वैशाली माथुर (सीनियर कमिशनिंग एडिटर, पेंग्विन), एसएस निरुपम (हिंदी एडीटर,पेंग्विन)के सक्रिय रहने के लिए धन्‍यवाद दिया। सभागार में मौजूद श्रोताओं और विशेष रूप से उर्वशी बुटालिया का शुक्रिया अदा करते हुए कहा कि हम सबकी की ये नैतिक ज़‍िम्मेदारी है कि अपने-अपने स्तर से इस काम को आगे बढ़ाएं। उम्मीद की जानी चाहिए कि जरनैल सिंह की ये किताब 1984 में सिख कत्लेआम के प्रति संवेदनशील होने और इसकी आड़ में होनेवाली राजनीति को समझने में एक नयी खिड़की का काम करेगी। कार्यक्रम के दौरान जितनी तेज़ी से इस किताब की बिक्री शुरू हुई, उससे ये साफ झलकता है कि लोग इस घटना के प्रति संवेदनशील हैं। बकौल जरनैल सिंह पंजाबी में छपी इसी किताब की अब तक 3000 प्रति निकल चुकी है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लोगों के बीच किताबों की पहुंच के साथ अन्याय के खिलाफ, न्याय के पक्ष में लोगों के स्वर मज़बूत होंगे.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6898673550088047104-4088190872359915607?l=taanabaana.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://taanabaana.blogspot.com/feeds/4088190872359915607/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.blogger.com/comment.g?blogID=6898673550088047104&amp;postID=4088190872359915607' title='7 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6898673550088047104/posts/default/4088190872359915607'/><link rel='self' type='application/atom+xml' 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उनका निधन हो गया। अफसोसनाक है कि जिस मैच को लेकर देर रात तक हॉस्टल में हो-हुडदंग होता रहा,उसी मैच के दौरान देश का एक बुद्धिजीवी पत्रकार हमेशा के लिए खामोश हो गया। पटना से &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;जसवंत सिंह&lt;/span&gt; की लिखी विवादित किताब के लोकार्पण कार्यक्रम से करीब 11 बजे रात लौटने के बाद जोशी थकान महसूस कर रहे थे। घर के लोगों ने भी सलाह दी कि डॉ. से सम्पर्क करना चाहिए लेकिन मैच देखकर उस पर कुछ लिखने का लोभ वो रोक नहीं पाए।.. लेकिन दोनों में से कोई भी काम पूरा किए बगैर हमसे विदा हो लिए। जोशी ने जिस &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;कागद-कारे&lt;/span&gt; स्तंभ से अपनी अलग पहचान बनायी उसका पहला लेख क्रिकेट पर ही था। अंत-अंत तक क्रिकेट उऩके जीवन के साथ जुड़ा रहा और एक हद तक क्रिकेट ही उनके मौत का कारण भी बना।&lt;br /&gt;कहना न होगा कि प्रभाष जोशी उन गिने-चुने पत्रकारों में से रहे हैं जिनकी लोकप्रियता सिर्फ पठन-लेखन के स्तर पर नहीं रही है,उन्हें चाहने और माननेवालों की एक लंबी फेहरिस्त है। मीडिया इन्डस्ट्री के भीतर सैकड़ों मीडियाकर्मी और पत्रकार ये कहते हुए आसानी से मिल जाएंगे कि आज वो जो कुछ भी है प्रभाषजी की बदौलत हैं। 12 सालों तक &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;जनसत्ता&lt;/span&gt; अखबार का संपादन करते हुए उन्होंने एक खास तरह की पत्रकारिता का विस्तार किया। शिमला में उनसे जुड़े प्रसंगों को याद करते हुए &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;अभय कुमार दुबे&lt;/span&gt;,संपादक सीएसडीएस ने हमें तब बताया था कि वो अकेले ऐसे संपादक थे जो किसी भी खबर के छप जाने के बाद माफी मांगने में यकीन नहीं रखते,छप गया सो छप गया। इसके साथ ही वो एक ऐसे संपादक थे जिन्होंने मालिक के आगे संपादक की कुर्सी को कभी भी छोटा नहीं होने दिया। बतौर बरिष्ठ पत्रकार &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;राम बहादुर राय&lt;/span&gt;, प्रभाष जोशी एक ऐसे पत्रकार रहे हैं जिनका भरोसा था कि पत्रकारिता के जरिए राजनीतिक स्थिति को भी बदला जा सकता है। वो पत्रकारिता को सामाजिक परिवर्तन का माध्यम मानते थे। इसलिए उन्होंने जितना लिखा उतना ही सामाजिक मसलों पर जाकर लोगों के सामने अपनी बात भी रखी। लोग उन्हें सुनने के लिए बुलाते थे।(एनडीटीवी इंडिया 9.20 बजे 6 नवम्बर 09)। आज से करीब एक साल पहले जब राजकमल की ओर से एक ही साथ पांच किताबों का लोकार्पण किया जा रहा था उस समय दिल्ली के त्रिवेणी सभाकार को  मैंने इस तरह के कार्रयम में पहली बार खचाखाच भरा हुआ देखा था। इतना खचाखच कि देश के नामचीन पत्रकार से लेकर साहित्यकार सीढ़ियों पर बैठे नजर आए। स्वयं प्रभाष जोशी के शब्दों में आज चार पीढ़ी के लोग मौजूद हैं। कुछेक पत्रकारों को छोड़ दे तो सभागार में जनसत्ता-परंपरा के अधिकांश पत्रकार पहली बार वहां मौजूद नजर आए।&lt;br /&gt;सत्ता में गहरी पैठ रखनेवाले पत्रकार प्रभाष जोशी जितने लोकप्रिय रहे हैं,अपने जीवनकाल उतने ही विवादों में बने रहनेवाले पत्रकार भी। बाबरी मस्जिद के दौरान जनसत्ता में छपनेवाली खबरों,उसकी प्रस्तुति को लेकर वो विवादों में आए,सती-प्रथा को लेकर छपे संपादकीय का लेकर वबेला मचा और हाल ही में एक साइट को दिए गए इंटरव्यू में आलोचना के शिकार हुए। प्रभाष जोशी की ऑइडियोलॉजी को लेकर भी काफी विवाद रहा है।अकादमिक क्षेत्र में राजकमल से प्रकाशित &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;हिन्दू होने का धर्म&lt;/span&gt; उनकी लोकप्रिय किताबों में से है। लेकिन इधर पिछले दो सालों से &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;हिन्दी स्वराज&lt;/span&gt; के पुर्नपाठ और विमर्श को लेकर काफी सक्रिय नजर आए। वो &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;हिन्द स्वराज &lt;/span&gt;और&lt;span style="font-weight:bold;"&gt; गांधी&lt;/span&gt; के मार्ग के महत्वों की चर्चा करते हुए उनकी विचारधारा का विस्तार करने की बात करते रहे। बीते लोकसभा चुनावों में पैसे देकर पेड खबरें छापने और राजनीति का पिछलग्गू बन जानेवाले अखबारों को लेकर प्रभाष जोशी ने विरोध में एक मोर्चा खोल रखा था और उसे वो राष्ट्रीय स्तर पर एक अभियान का रुप देने जा रहे थे जिसके चिन्ह हमें हाल के लिखे गए उनके लेखों में साफ तौर पर दिखाई देने लगे थे। उनके इस अभियान में &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;कुलदीप नैय्यर&lt;/span&gt; और &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;हरिवंश&lt;/span&gt; जैसे वरिष्ठ पत्रकार भी शामिल रहे हैं।&lt;br /&gt;इन सबके वाबजूद&lt;span style="font-weight:bold;"&gt; प्रभाष जोशी&lt;/span&gt; को एक ऐसे कर्मठ पत्रकार के तौर पर जाना जाएगा जो कि अपनी जिदों को व्यावहारिक रुप देता है,नई पीढ़ी के लोगों को गलत या असहमत होने पर खुल्लम-खुल्ला चैलेंज करता है,अपनी बात ठसक के साथ रखता है और सक्रियता को पूजा और अराधना को पर्याय मानता है। आज प्रभाष जोशी के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी कि अगर हम उनके लेखन का पुनर्विश्लेषण करते हैं,पठन-पाठन के दौरान असहमति का स्वर जाहिर करते हैं,सहमति को व्यवहार के तौर पर अपनाते हैं और पैर पसारती कार्पोरेट मीडिया का प्रतिरोध करते हुए हिन्दी पत्रकारिता को सामाजिक परिवर्तन के माध्यम के तौर पर आगे ले जाते हैं। व्यक्तिगत तौर पर मुझे उनका खास अंदाज में क्रिकेट पर लिखना,इनने,उनने और अपन जैसे शब्दों का प्रयोग अब तक एक खास किस्म की इन्डीविजुअलिटी को बनाए रखने के तौर पर लगा,कई बार इससे असहमत भी रहा लेकिन आगे से जनसत्ता में इन शब्दों के नहीं होने की कमी जरुर खलेगी। गरम खून के पत्रकारों के बीच कोई तो था जिसे बार-बार पटकनी देने की मंशा से लड़ते-भिड़ते और अपना कद बड़ा होने की खुशफहमी से फैल जाते। आज हमसे लड़ने-भिड़ने वाला नहीं रहा,फच्चर मत डालो को लिखकर चैलेंज करनेवाला नहीं रहा। अब बार-बार याद आएगा कागद-कारे..&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6898673550088047104-534235105541241819?l=taanabaana.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://taanabaana.blogspot.com/feeds/534235105541241819/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.blogger.com/comment.g?blogID=6898673550088047104&amp;postID=534235105541241819' title='10 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6898673550088047104/posts/default/534235105541241819'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6898673550088047104/posts/default/534235105541241819'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://taanabaana.blogspot.com/2009/11/blog-post_06.html' title='बुजुर्ग पत्रकार प्रभाष जोशी नहीं रहे'/><author><name>विनीत कुमार</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09398848720758429099</uri><email>vineetdu@gmail.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' name='OpenSocialUserId' value='01281586745461734077'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_uS1XY77Y4b8/SvOkxWFjdHI/AAAAAAAABXY/DxuKfb0cVwM/s72-c/p1.jpg' height='72' width='72'/><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>10</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6898673550088047104.post-716558798430418429</id><published>2009-11-05T13:13:00.005+05:30</published><updated>2009-11-05T14:13:07.901+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='1984'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='jairnail singh'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='sikh danga'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='media'/><title type='text'>जरनैल सिंह की किताब का कल होगा लोकार्पण</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://3.bp.blogspot.com/_uS1XY77Y4b8/SvKN4WE1wBI/AAAAAAAABXQ/xCeXmlt9NkY/s1600-h/pee.png"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 226px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_uS1XY77Y4b8/SvKN4WE1wBI/AAAAAAAABXQ/xCeXmlt9NkY/s320/pee.png" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5400534902308716562" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक पत्रकार की हैसियत से अपने लंबे मीडिया करियर के दौरान&lt;span style="font-weight:bold;"&gt; जरनैल सिंह &lt;/span&gt;ने क्या किया,किन-किन मसलों और मुद्दों को रिपोर्टिंग के दौरान लोगों के सामने लाने की कोशिश की,ये बताने की जरुरत शायद ही किसी न्यूज चैनल या अखबारों ने की हो। हमें सिर्फ इतना भर बताया गया कि &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;जरनैल सिंह&lt;/span&gt; ने मौजूदा गृहमंत्री पर जूते फेंकने का काम किया और रातोंरात वो इसी काम को लेकर चर्चित कर दिए गए। इस हिसाब से पेंगुइन से प्रकाशित होनेवाली उनकी किताब &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;कब कटेगी चौरासीः  सिख क़त्लेआम का सच&lt;/span&gt; जिसका कि कल लोकार्पण होना है,जरनैल सिंह की कोशिश से ये दोतरफी कारवायी है। सिंह इस किताब के जरिए अपनी उस छवि को स्थापित करना चाहते हैं जिसमें कि उनके लंबे समय का लेखन और रिपोर्टिंग के अनुभव शामिल हैं,एक पत्रकार की हैसियत से राजनीतिक संदर्भों को विश्लेषित करने की कोशिश है और दूसरा अपनी उस छवि को ध्वस्त करना चाहते है जिसमें कि एक बेकाबू हो गए एक नागरिक/पत्रकार का सत्ता में बैठे लोगों के सामने गलत ही सही लेकिन अपने स्तर से विरोध दर्ज करना है। खासकर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया शुरु से उस फार्मूले पर काम करता आया है कि जो व्यक्ति जिस काम के लिए चर्चित हुआ है उसे उसी रुप में हायपरवॉलिक तरीके से ऑडिएंस/दर्शक के सामने पेश करे लेकिन ये फार्मूला कितना वाजिब है,इत्मिनान होकर सोचने की मांग करता है। बहरहाल,&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;जरनैल सिंह&lt;/span&gt; की बनी नयी पहचान उन्हें किस हद तक परेशान करती है और अब तक के किए गए सारे काम,हालिया के एक काम के आगे कैसे फीका पड़ जाता है, ये सबकुछ शिद्दत से महसूस करने और उसे पाटने की कोशिश में ये किताब हमारे सामने है। ऐसे में अपनी रचनाधर्मिता और तार्किक समझ को इस जद्दोजहद के बीच बचाए रखना,जरनैल सिंह की उपलब्धि ही समझी जाएगी।&lt;br /&gt;पेंग्विन से प्रकाशित,जरनैल सिंह की किताब &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;कब कटेगी चौरासीः सिख क़त्लेआम का सच&lt;/span&gt; मूलतः हिन्दी में लिखी गयी है। इस किताब का अंग्रेजी अनुवाद वैशाली माथुर ने &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;I Accuse : The anti sikh voilence 0f 1984&lt;/span&gt; नाम से किया है. लेखक/प्रकाशक के हिसाब से &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;यह किताब 1984 के सिख क़त्लेआम से जुड़ी सच्चाईयों और सरकार की संवेदनशून्यता का एक सशक्त दस्तावेज़ है। क्योंकि 1884 का हुआ दंगा सिर्फ सिखों पर हुआ हमला नहीं था,बल्कि यह लोकतंत्र और इंसानियत पर हुआ हमला था।&lt;/span&gt; इस किताब के बारे में लिखते हुए मशहर कॉलमिस्ट और ट्रेन टू पाकिस्तान के लेखक&lt;span style="font-weight:bold;"&gt; खुशवंत सिंह&lt;/span&gt; का मानना है कि-'&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;कब कटेगी चौरासी ऐसे घावों को हरा करती है जो आज तक नहीं भरे हैं। यह किताब उन सभी लोगों को पढ़नी चाहिए जो चाहते हैं कि ऐसे भयानक अपराध दोबारा न हो। &lt;br /&gt;&lt;/span&gt;। जाहिर है किताब जिस सबूतों और संदर्भों को हमारे सामने पेश करती है और स्वयं लेखक जिस रुप में उसका विश्लेषण करता है उसके सामने इस दंगे में हताहत लोगों को दिया गया मुआवजा तुष्टिकरण की नीति का हिस्साभर है। ऐसा करके सरकार ने अपने विद्रूप चेहरे को ढंकने का भरसक प्रयास किया है। लेकिन उम्मीद की जानी चाहिए कि यह किताब महज विवाद का हिस्सा बनने के बजाय उन कारवाईयों पर फिर से विचार करने का स्पेस पैदा करेगी जो कि लोकतंत्र की बहाली के नाम पर अंदुरुनी तौर पर उसका गला रेतने का काम करती है। जूता प्रकरण के हो-हंगामे के बीच जरनैल के जो सवाल दब गए वो सवाल उस किताब में फिर से सरकार के लिए एक चुनौती पैदा करते हैं- &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;अब तक दोषियों का सजा क्या नहीं मिली? &lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;क्या प्रशासन तंत्र न्याय होने देगा? कब मिलेगा पीड़ितों को न्याय और कब कटेगी चौरासी?&lt;/span&gt; सरकार को इन सवालों को गंभीरता से लेने होंगे और इस किताब के जरिए 84 पर नए सिरे से बात होने की गुंजाइश पैदा हो सकेगी। इसके साथ ही हम उम्मीद करते है कि आनेवाले समय में जरनैल सिंह की पहचान केवल और केवल पी.चिदमबरम पर जूता फेंकनेवाले पत्रकार के तौर पर न होकर एक संवेदनशील और रिस्क कवर करते हुए तल्खी से अपनी बात रखनेवाले लेखक के तौर पर चिन्हित किया जा सकेगा।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6898673550088047104-716558798430418429?l=taanabaana.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://taanabaana.blogspot.com/feeds/716558798430418429/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.blogger.com/comment.g?blogID=6898673550088047104&amp;postID=716558798430418429' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6898673550088047104/posts/default/716558798430418429'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6898673550088047104/posts/default/716558798430418429'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://taanabaana.blogspot.com/2009/11/blog-post_05.html' title='जरनैल सिंह की किताब का कल होगा लोकार्पण'/><author><name>विनीत कुमार</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09398848720758429099</uri><email>vineetdu@gmail.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' name='OpenSocialUserId' value='01281586745461734077'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_uS1XY77Y4b8/SvKN4WE1wBI/AAAAAAAABXQ/xCeXmlt9NkY/s72-c/pee.png' height='72' width='72'/><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6898673550088047104.post-3775755161214523010</id><published>2009-11-04T10:04:00.006+05:30</published><updated>2009-11-04T11:12:34.825+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='media mantra'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='khabaron ki khabar'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='media khabar'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='pushkar'/><title type='text'>संघर्ष के दो साल पर संपादकीय</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://3.bp.blogspot.com/_uS1XY77Y4b8/SvEUQno1dUI/AAAAAAAABXA/zEAU1mSYiR8/s1600-h/pushkar+pushp.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 287px; height: 320px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_uS1XY77Y4b8/SvEUQno1dUI/AAAAAAAABXA/zEAU1mSYiR8/s320/pushkar+pushp.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5400119703944656194" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-style:italic;"&gt;जामिया मीलिया इस्लामिया से मीडिया की पढ़ाई,जी न्यूज से इन्टर्नशिप,दूरदर्शन के लिए रिपोर्टिंग और TV9 के मुंबई ब्यूरों के लिए सर्वेसर्वा के तौर पर काम करनेवाले तेजतर्रार युवा मीडियाकर्मी&lt;span style="font-weight:bold;"&gt; पुष्कर पुष्प&lt;/span&gt; चाहते तो आज अपने दौर के बाकी मीडियाकर्मियों की तरह एक फार्मूला लाइफ जी सकते थे। उनकी गर्दन पर भी आज किसी चैनल के प्रोड्यूसर का पट्टा टंगा होता,एक गाड़ी होती जिसके लोन अब तक चुक गए होते और दिल्ली एनसीआर में एक फ्लैट होता। लेकिन पुष्कर पुष्प ने एक मीडियाकर्मी की उलब्धियों और विकासक्रम को इस रुप में देखने के बजाय कुछ अलग,मौलिक और रचनात्मक काम की ओर अपने को लगाया। सबकुछ छोड़कर नौकरी करते हुए जो भी थोड़े पैसे जोड़े उसे लेकर एक दिन सबकी खबर लेनेवाले मीडिया की ही खबर लेने के इरादे से &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;मीडिया मंत्र&lt;/span&gt; नाम से पत्रिका शुरु कर दी। साधनों की सहजता और खबरों के इस बाढ़ में आज चाहे तो कोई भी ऐसा कर सकता है लेकिन आज से दो साल पहले की बात सोचिए जब ये बात कॉन्सेप्ट के तौर पर बाकी पत्रिकाओं से बिल्कुल जुदा रहा है कि मीडिया की खबरों को लेकर भी पत्रकारिता की जा सकती है? &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;मीडिया मंत्र की निगाह में इडियट बॉक्स&lt;/span&gt; के ताजा अंक के साथ &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;मीडिया मंत्र&lt;/span&gt; पत्रिका ने दो साल पूरे कर लिए। इस पत्रिका को जिंदा रखने के लिए &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;पुष्कर पुष्प&lt;/span&gt; को किस-किस स्तर की परेशानियों को झेलना पड़ा है,इसके कुछ हिस्से को मैंने भी बहुत ही नजदीक से महसूस किया है। पत्रकारिता के तोड़-जोड़ का संड़ाध धंधा बन जाने के बीच विज्ञापन मिलने से कहीं ज्यादा मिले हुए विज्ञापनों पर की जानेवाली ओछी राजनीति का शिकार &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;मीडिया मंत्र&lt;/span&gt; अचानक से कैसे लड़खड़ा जाता है,ये सबकुछ एक झटके में हमारे सामने घूम जाता है जिसकी विस्तार से चर्चा करते हुए उन्होंने &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;संघर्ष के दो साल &lt;/span&gt;नाम से संपादकीय में लिखा है। संपादकीय का एक हिस्सा भावुक अभिव्यक्तियों से भरा है,संभवतः इसलिए हम जैसे लोगों के मामूली सहयोग को उन्होंने अपनी नजर से बहुत बड़ा करके पेश कर दिया है। वाबजूद इसके इस संपादकीय को इसलिए पढ़ा जाना चाहिए क्योंकि पत्रकारिता के जिस क्लासरुम में पत्रकार के तौर पर समाज प्रहरी बनने की ट्रेनिंग दी जाती है,जोश में ही सही ये पत्रिका कैसे उसे व्यवहार के तौर पर अपनाने की कोशिश करती है,परेशान होती है,कई बार लगता है कि ये सब छायावादी नजरिए को ढोते हुए जीने औऱ पत्रकारिता करने की कोशिश भर है लेकिन फिर से अपने को रिवाइव करती है। सिद्धस्थ मीडियाकर्मियों और समीक्षकों की निगाह में ये वावलापन है क्योंकि बिना बाजार की गोद में बैठकर,छोटे-मोटे समझौते करने की चिंता किए बगैर ये संभव नहीं है,कार्पोरेट मीडिया के आगे जबरदस्ती पीपीहीआ बाजा बजाने जैसा काम है। उनके ऐसा कहने से संपादक का मनोबल टूटता है,वो घबराता है लेकिन फिर सवाल करता है कि आपको तो विरासत में एक बेहतरीन पत्रकारिता पूर्वज मिल गए लेकिन आप आनेवाली पीढ़ी को क्या देने जा रहे है? संपादकीय में उठाया गया यही सवाल सिद्धस्थ मीडियाकर्मियों की बौद्धिकता पर कई गुना भारी पड़ता है और यहीं पर आकर पुष्कर पुष्प तमाम तरह की मानिसक और साधनगत परेशानियों के वाबजूद मन का रेडियो बजने देने पर खुश नजर आते हैं। उन्हे मीडिया मंत्र को लेकर इस बात का गुमान है कि उन्होंने बाकी मंचों की तरह दबाब बनाकर विज्ञापन नहीं जुटाए,धमिकयां देने और फिर मांग न पूरे किए जाने पर निगेटिव खबरें का खेल नहीं किया. पांच हजार-दस हजार के विज्ञापन के लिए अपनी पहचान और आत्म सम्मान को गिरवी नहीं रख दिया। हम चाहेंगे कि इस संपादकीय पर एक नजर आप भी दें और विरासत में मिलनेवाली मीडिया की समीक्षा की नाप-तौल शुरु क&lt;/span&gt;रें-&lt;br /&gt;मीडिया मंत्र ने अपने दो साल पूरे कर लिए. पिछले अंक में ही इसके दो साल पूरे हो गए. लेकिन समय पर पत्रिका नहीं निकल पाने की वजह से पाठकों तक नहीं पहुँच पायी. इसलिए मीडिया मंत्र से जुड़े अपने अनुभवों और उससे जुडी कई बातों को हम पाठकों से नहीं बाँट सकें. इस कमी को इस अंक में पूरा करने की हम कोशिश कर रहे हैं. आगे हमारी कोशिश रहेगी कि तमाम मुश्किलों के बावजूद दुबारा ऐसा नहीं हो और समय पर पत्रिका पाठकों तक पहुंचे.यह अंक निकालने की स्थिति में हम नहीं थे. लेकिन ईटी हिंदी.कॉम के संपादक दिलीप मंडल, न्यूज़ 24 के मैनेजिंग एडिटर अजित अंजुम और दिल्ली विश्विद्यालय से मनोरंजन चैनलों की भाषिक संस्कृति पर पीएचडी कर रहे विनीत कुमार के नैतिक समर्थन, उत्साहवर्धन और सहयोग की वजह से पत्रिका को जारी रखने में सक्षम हो सके.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह दो साल बेहद संघर्षपूर्ण रहे. हर महीने पत्रिका के लिए कंटेंट से लेकर उसके लिए पैसे जुटाने का काम बदस्तूर जारी रहा. पत्रिका के बंद होने की तलवार हमेशा लटकी रही. कई बार ऐसी नौबत भी आई कि लगा पत्रिका बंद हो जायेगी. लेकिन हर बार कोई-न-कोई रास्ता निकल आया. शायद यह मीडिया मंत्र के पाठकों और शुभचिंतकों की दुआओं का असर था. सच मानिये तो इतनी दूर निकल आयेंगे, ऐसा कभी सोंचा नहीं था. साल 2007 में दिल्ली के प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में पत्रिका का विमोचन प्रभाष जोशी, मार्क टली, अजित भट्टाचार्य, अशोक वाजपेयी और आनंद प्रधान जैसे अपने - अपने क्षेत्र के दिग्गजों के हाथों हुआ. प्रेस क्लब खचाखच भरा हुआ था. एक ऐसी पत्रिका का विमोचन हो रहा था, जिसके पीछे कोई कारपोरेट नहीं था. शुद्ध रूप से कुछ जोशीले नौजवान पत्रकारों द्वारा एक नया जोखिम भरा वैकल्पिक मीडिया का प्रयोग होने जा रहा था. एक ऐसा प्रयोग जिसके शुरुआत से ही इसके बंद होने के कयास लगाये जा रहे थे. ज्यादातर लोगों को उम्मीद नहीं थी कि पत्रिका लम्बे समय तक चल पाएगी, . दो साल की बात दूर दो महीने भी चल पाएगी कि नहीं, इसपर लोगों को शक था. यह सोंच गलत भी नहीं थी. सुना था कठिन काम है. बिना कारपोरेट के मदद के या बिना जुगाड़ फिट किये मामला आगे चल नहीं सकता. इन दोनों में से कुछ भी हमारे पास नहीं था. यदि कुछ था तो बस ढेर सारा उत्साह, थोडी सी जिद्द और थोडी सी हिम्मत. यही हमारी वास्तविक पूंजी थी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दो-ढाई साल तक टेलीविजन की नौकरी करने के बाद जो थोडी बहुत बचत हुई थी, उस पूरी बचत को पत्रिका को शुरू करने में इस अतिशय उम्मीद के साथ लगा दिया कि आगे बढ़ते हैं कोई-न-कोई रास्ता जरूर निकेलगा. पत्रिका तो निकल गयी लेकिन दो अंक बाद ही इसके बंद होने का संकट सामने आ गया. पत्रिका के साथ जुड़े कई दोस्त किसी-न-किसी कारणवश दूर होते चले गए.  अब सवाल सामने था कि पत्रिका को आगे चलाया जाए या नहीं. यदि चलाया जाए तो कैसे ? संसाधनों के नाम पर बहुत सीमित चीजें थी. आखिरकार निश्चय किया कि अंतिम दम तक पत्रिका को चलाने की कोशिश की जाए. ताकि जिंदगी में कभी इस बात का मलाल न रहे कि हमने अपनी तरफ से पूरी कोशिश नहीं की और संघर्ष किये बिना ही मैदान छोड़कर चले गए.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिर एक नए संघर्ष की शुरुआत हुई. पत्रिका को बचाने और उसे चलाने की जद्दोजहद. पत्रिका की कीमत को कम करने के लिए खुद ही सारे काम करना शुरू किया. संपादक, रिपोर्टर, टाइपिस्ट, कुरियर वाला, प्रूफ़ रीडर, आर्ट डिजाइनर, डिस्ट्रीब्यूटर सबकी भूमिका एक ही व्यक्ति निभा रहा था. चिलचिलाती धूप में फिल्म सिटी और न्यूज़ चैनलों के सामने स्टाल लगाकर पत्रिका को बेचना शुरू किया.वह अपने आप में एक बेहद अच्छा और सिखाने वाला अनुभव था. पत्रिका के संपादक को खुद स्टाल लगाकर अपनी पत्रिका को बेचते देखना कई पत्रकारों के लिए आश्चर्य की बात थी. स्टाल पर आकर कई पत्रकार मुझसे लगातार बात कर रहे थे. ऐसे प्रयास की दाद दे रहे थे. मुझे बिना किसी झिझक के ऐसा करते देखना उनके लिए आश्चर्य की बात थी. ऐसा आज भी भी कोई कर सकता है सहसा इसपर कई पत्रकार विश्वास नहीं कर पा रहे थे. रवींद्र, हरिश्चंद्र बर्णवाल, राजीव रंजन, निमिष कुमार, राजकमल चौधरी, राजेश राय, ओम प्रकाश,  मुकेश चौरसिया, आशुतोष चौधरी जैसे कई ऐसे पत्रकार मित्र थे जो लगातार मेरे इस काम में मदद कर रहे थे. यह ऐसे मित्र हैं जिन्हें मेरी चिंता हैं और जो मीडिया मंत्र के साथ भावनात्मक स्तर पर जुड़े हुए हैं. यह ऐसे मित्र हैं जिनका शुक्रिया भी अदा नहीं किया जा सकता.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन यह सब करने के बावजूद पत्रिका को आगे बढ़ाना मुश्किल हो रहा था. यह ऐसा समाज है जहाँ हौसला बढ़ाने वाले से ज्यादा हौसला तोड़ने वाले लोग मौजूद हैं. आपके कदम जरा डगमगाए नहीं कि ऐसे लोग आपको लताड़ना शुरू कर देते हैं. बिना पल गवाएं ये आपको निकम्मा, नाकाबिल और असफल करार देते हैं. ऐसा ही कुछ उस वक़्त मेरे साथ हो रहा था. ऐसे मोड़ पर दो ऐसे लोग आये जिन्होंने पत्रिका को फिर से खडा करने में अहम भूमिका निभाई. इनमें से एक ईटी हिंदी.कॉम के संपादक दिलीप मंडल और दूसरे टोटल टीवी के निदेशक विनोद मेहता. दिलीप मंडल ने उस वक्त न मेरा केवल हौसला बढाया, बल्कि आर्थिक मदद करने की भी पेशकश की. उनका सम्मान करते हुए मैंने मीडिया मंत्र के लिए 500 रुपये की राशि स्वीकार कर ली. वे हर महीने मीडिया मंत्र के लिए कुछ आर्थिक मदद देना चाहते थे. लेकिन मैंने उसे अस्वीकार करते हुए कहा कि अनुदान के आधार पर मीडिया मंत्र को मैं नहीं चलाना चाहता. कोशिश करते हैं, असफल रहे तो आपसे मदद जरूर मांगेंगे. उस वक़्त वह 500 रुपये का नोट मेरे लिए बेहद अहम था. हालाँकि आर्थिक रूप से वह कोई बड़ी मदद नहीं थी और न ही उससे पत्रिका को फिर से पटरी पर लाया जा सकता था. लेकिन नैतिक तौर पर बड़ा संबल था. एक संघर्षरत पत्रकार अपने से वरिष्ठ पत्रकार से इससे ज्यादा और क्या चाहेगा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसे ही कठिन परिस्थितियों में टोटल टीवी के निदेशक विनोद मेहता मदद करने के लिए सामने आये, जो शायद नहीं आते तो मीडिया मंत्र का सफर आगे नहीं बढ़ पाता. उस वक़्त उनसे कोई गहरी जान-पहचान नहीं थी. तीसरी   ही मुलाकात थी. उस मुलाकात में जैसे ही वे परिस्थितियों से वाकिफ हुए तो उसी वक़्त उन्होंने एक चेक काटकर और साथ में टोटल टीवी का विज्ञापन देकर कहा कि यह एक बेहतर प्रयास है और इसे आगे जारी रखना जरूरी है. आप ईमानदारी से अपना काम करते रहिए और कभी ऐसा लगे कि अब कोई रास्ता नहीं बचा है तो मुझसे मदद मांगने में हिचकिचाना नहीं. आगे अपने इस वादे को उन्होंने निभाया भी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मीडिया मंत्र का आगे का सफर शायद और भी कठिन था. सवाल अब अपनी साख और ईमानदारी को बचाए रखते हुए आगे बढ़ने का था. कई ऐसे प्रस्ताव मिले जिन्हें स्वीकार कर आसानी से तमाम आर्थिक समस्याओं से छूटकारा पाया जा सकता था. लेकिन इन प्रस्तावों को स्वीकार करने का मतलब था, अपनी साख और ईमानदारी को गवां देना. इस दौरान कई लोगों के दोहरे चेहरे देखने का मौका भी मिला. ये वो लोग थे जो हरेक दूसरे मंच पर सच्ची पत्रकारिता और उससे जुडी बड़ी - बड़ी बातें करते नहीं थकते. लेकिन शायद यही लोग सबसे ज्यादा पत्रकारिता का बेजा इस्तेमाल कर रहे हैं. पत्रकारिता का एक तरह से गला घोंट रहे हैं. ऐसे लोगों की कथनी और करनी में बहुत बड़ा अंतर है. ये लोग बेहद ताक़तवर हैं. लेकिन अपनी ताकत का इस्तेमाल अपनी स्वार्थसिद्धि में कर रहे हैं. इन्हें नए पत्रकारों से चरणवंदना की अपेक्षा है और जो यह नहीं करता उनकी नजर में वे पत्रकार बनने के लायक नहीं. यही लोग सबसे ज्यादा नयी पीढी के पत्रकारों को पानी पी-पी कर कोसते हैं. लेकिन यदि नयी पीढी के पत्रकार इस पीढी के पत्रकारों से सवाल पूछे कि आपने हमें क्या दिया है? आपको पत्रकारिता की एक शानदार विरासत मिली थी. लेकिन नयी पीढी के लिए आप कैसी विरासत छोड़कर जा रहे हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पत्रकारीय विचार - विमर्श की दृष्टि से इस साल जून-जुलाई का महीना काफी गहमागहमी भरा रहा। ऐसे मौके कम ही आते हैं जब एक ही समयावधि में कई जगहों पर पत्रकारिता से जुड़े अलग-अलग मुद्दों पर लगातार चर्चा हो रही हो. जून - जुलाई महीने में तीन महत्वपूर्ण संगोष्ठियाँ हुई. पहली संगोष्ठी टेलीविजन पत्रकार स्व.शैलेन्द्र सिंह की स्मृति में हुई. हालाँकि यह एक शोकसभा थी, लेकिन न्यूज रूम के टेंशन को लेकर भी ऐसी बातें उठी, जो बेहद गंभीर है. बकौल आईबीएन-7 के एडिटर (स्पेशल एसाइनमेंट) प्रभात शुंगलू - 'हमलोग जिस न्यूज रूम में काम करते हैं वह नर्क बन चुका है'. प्रभात शुंगलू का यह बयान अपने आप में बेहद महत्वपूर्ण है. इस मुद्दे पर प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में इतना खुलकर बोलने की हिम्मत जुटा लेना अपने आप में बड़ी बात थी. दूसरे टेलीविजन पत्रकार इतनी खुलकर बोलने की हिम्मत तो नहीं जुटा पाए, लेकिन इशारा जरूर कर गए. दूसरी संगोष्ठी स्व.एस.पी.सिंह की 12 वीं पुण्यतिथि के मौके पर हुई. इसमें भी एस.पी.सिंह की पत्रकारिता और अब हो रही पत्रकारिता के संदर्भ में बात हुई. लेकिन 11 जुलाई को हुई तीसरी संगोष्ठी सर्वाधिक चर्चा और विवादों में रही. यह संगोष्ठी स्व.उदयन शर्मा के स्मृति में हुई. हरेक साल उदयन शर्मा मेमोरियल ट्रस्ट उनके जन्मदिन वाले दिन यानि 11 जुलाई को एक स्मृति सभा का आयोजन करती है. इस मौके पर रफी मार्ग स्थित कॉन्सटीट्यूशन क्लब प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया के संपादकों और पत्रकारों से खचाखच भरा हुआ था. संगोष्ठी में 'लोकसभा चुनाव और मीडिया को सबक' विषय पर परिचर्चा हुई और इस दौरान काफी गरमा - गर्मी भी हुई. अपनी - अपनी बारी आने पर वरिष्ठ पत्रकारों ने अपनी बात रखी. ज्यादातर वरिष्ठ पत्रकारों और संपादकों ने वर्तमान में हो रही पत्रकारिता पर चिंता व्यक्त की और वर्तमान पत्रकारिता को जी भर कर के कोसा.  हम जैसे युवा पत्रकारों के लिए बड़े आर्श्चय की बात थी कि आखिर इस सभागार में पत्रकारिता के नाम पर जो आलाप किया जा रहा है, उसके लिए दोषी कौन है. पिछले 10-15 साल से यही लोग भारतीय पत्रकारिता का नेतृत्व कर रहे हैं. फिर दोष किसे दिया जा रहा है. चौथी दुनिया के संपादक संतोष भारतीय ने इसी सभा में एक बड़ी मार्के की बात कही - 'आज के कई संपादक एडिट पेज पर लिखकर नैतिकता की दुहाई देते हैं. लेकिन क्या अपने संस्थान में फैले अनैतिकता के खिलाफ आवाज उठाते हैं. हमको खुद को गालियाँ देनी चाहिए. अपने अंदर झाँकने की जरूरत है.' यह बात जितनी शिद्दत से कही गयी, काश उसको व्यवहार में भी लाया जा सकता तो पत्रकारिता के नाम पर आलाप करने की जरूरत ही नहीं पड़ती. उसी संगोष्ठी में एक दोहरा मापदंड भी देखने को मिला. संगोष्ठी के दौरान दो ऐसे बयान आये जिसपर वहां मौजूद कई पत्रकारों को कड़ी आपत्ति थी. एक बयान आईबीएन-7 के मैंनेजिंग एडिटर आशुतोष और दूसरा बयान केन्द्रीय मंत्री कपिल सिब्बल की तरफ से आया. आशुतोष ने आज के हालात में हो रही पत्रकारिता को कुछ जस्टिफाय करने की कोशिश करते हुए कहा कि क्या 1977 में ऐसा नहीं होता था.  क्या उस समय प्रायोजित खबरें नहीं छपते थे. क्या उस समय ऐसे भ्रष्ट पत्रकार नहीं थे. यह बात वहां बैठे कुछ पत्रकारों को इतनी नागवार गुजरी और इतना शोर मचाया गया कि आशुतोष को अपनी बात अधूरी ही छोड़कर मंच से उतरना पड़ा. दूसरा बयान कपिल सिब्बल की तरफ से आया. कपिल सिब्बल पत्रकारों को ठेंगा दिखाते हुए कहते हैं कि आप क्या लिखते हैं, इससे हमें कोई फर्क नहीं पड़ता. इसपर भी वहां बैठे पत्रकारों को आपत्ति होती है. लेकिन विरोध कपिल सिब्बल के सभागार से चले जाने के बाद दर्ज कराया जाता है. यह वही पत्रकार थे जो आशुतोष की आवाज को शोर में दबा चुके थे. ऐसा नहीं है कि आशुतोष की बात से मैं पूरी तरह से सहमत हूँ. लेकिन यहाँ सवाल दोहरे मापदंड का है. ऐसे सभागार में जहाँ पत्रकारिता और नैतिकता की बड़ी - बड़ी बातें की जा रही थी वहीँ पर एक सी परिस्थिति में दो तरह के मापदंड अपनाएं जा रहे थे. ऐसे में पत्रकारिता में सुधार की गुंजाईश की आप परिकल्पना भी आप कैसे कर सकते हैं. वैसे मेरा अपना मानना है कि बाहर ऐसा बहुत कुछ हो रहा है जिसे आप पत्रकारिता के लिए शुभ संकेत मान सकते है. अच्छे और सच्चे पत्रकारों की कमी नहीं है. यदि जरूरत है तो सिर्फ इनको बढ़ावा देने की. पत्रकारिता की दुनिया अपने आप ही बदल जायेगी।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6898673550088047104-3775755161214523010?l=taanabaana.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://taanabaana.blogspot.com/feeds/3775755161214523010/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.blogger.com/comment.g?blogID=6898673550088047104&amp;postID=3775755161214523010' title='9 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6898673550088047104/posts/default/3775755161214523010'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6898673550088047104/posts/default/3775755161214523010'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://taanabaana.blogspot.com/2009/11/blog-post.html' title='संघर्ष के दो साल पर संपादकीय'/><author><name>विनीत कुमार</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09398848720758429099</uri><email>vineetdu@gmail.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' name='OpenSocialUserId' value='01281586745461734077'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_uS1XY77Y4b8/SvEUQno1dUI/AAAAAAAABXA/zEAU1mSYiR8/s72-c/pushkar+pushp.jpg' height='72' width='72'/><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>9</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6898673550088047104.post-8643230144075928444</id><published>2009-10-28T10:58:00.004+05:30</published><updated>2009-10-28T11:01:56.698+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='colors'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='utran'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='tv serials'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='balika badhu'/><title type='text'>नए टीवी सीरियलः स्त्री-चिंता या छलना का पुनर्पाठ</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/_uS1XY77Y4b8/SufW14ShFgI/AAAAAAAABVg/zlLfjiYNFUQ/s1600-h/hans+photo+vineet+(1).JPG"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 237px; height: 320px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_uS1XY77Y4b8/SufW14ShFgI/AAAAAAAABVg/zlLfjiYNFUQ/s320/hans+photo+vineet+(1).JPG" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5397518899558290946" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;मूलतः प्रकाशितः&lt;span style="font-weight:bold;"&gt; हंस&lt;/span&gt;,&lt;span style="font-style:italic;"&gt;स्त्री विमर्शः अगला दौर स्मृति प्रभा खेतान&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;संपादकः &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;राजेन्द्र यादव&lt;/span&gt;,अतिथि संपादकः &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;अर्चना वर्मा&lt;/span&gt;,&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;बलवंत कौर&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;मूल्यः35 रुपये/&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-style:italic;"&gt;भारतीय टेलीविजन में पिक्चर ट्यूब के दम पर पैदा की जानेवाली उत्सवधर्मिता के बीच पहले&lt;span style="font-style:italic;"&gt; बालिका वधू&lt;/span&gt; और फिर उसका अनुसरण करते हुए &lt;span style="font-style:italic;"&gt;उतरन&lt;/span&gt;,&lt;span style="font-style:italic;"&gt;लाडो न आना इस देश में&lt;/span&gt; और &lt;span style="font-style:italic;"&gt;अगले जनम मोहे बीटिया ही कीजौ&lt;/span&gt; जैसे दर्जनों समस्यामूलक सीरियलों के प्रसारण ने मौजूदा टेलीविजन विश्लेषण के लिए एक नया संदर्भ पैदा किया है। हालांकि समाज विज्ञान के लिहाज से इन संदर्भों में नया कुछ भी नहीं है लेकिन पिछले सात-आठ सालों में टीवी सीरियलों में सास-बहू चरित्रों की अतिशयता ने जहां इसे सास-बहू के प्रतिशोध,घरेलू झगड़ों औऱ विवाहेतर संबधों का पर्याय बना दिया,उच्च मध्यवर्ग के चरित्रों के बीच आए दिन की बदलती जीवन शैली ,जूलरी और पोशाकों ने इसे स्त्री-फैशन का संदर्भ कोश भर बनाकर छोड़ दिया,ऐसे में ये संदर्भ अपने आप ही अप्रासंगिक होते चले गए। इन सीरियलों से गुजरते हुए आप कभी भी स्त्री के वर्गीय चरित्र,घरेलू हिंसा एवं श्रम और बदलती सामाजिक संरचना के बीच स्त्री जैसे सवालों पर सोच नहीं सकते। सास-बहू सीरियलों ने स्त्री की छवि और उसकी उपस्थिति के दायरे को जितना सीमित किया है उसी अनुपात में विश्लेषण के दरवाजे भी छोटे होते चले गए। लेकिन पिछले एक साल में सास-बहू सीरियलों से अलग स्त्री-चिंता पर आधारित सीरियलों की जो नयी खेप आयी है,उसे देखते हुए इन  सारे सवालों से गुजरना अनिवार्य लगता है। यहां से टेलीविजन के नए संदर्भ पैदा होते हैं।&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;मुख्यधारा की मीडिया का अनुसरण करते हुए अगर समस्यामूलक इन सीरियलों को सामाजिक विकास का माध्यम मान लिया जाए तो टेलीविजन फिर से उन एजेंडे की तरफ लौटता नजर आता है जिसे कि &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;दूरदर्शन&lt;/span&gt; ने शुरु से अपनी प्रसारण नीति के लिए तय कर रखा है। स्त्री और सामाजिक समस्याओं को लेकर सीरियल प्रसारित करनेवाले निजी चैनल &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;बिल्बर श्रैम&lt;/span&gt; के उन निर्देशों को पालन करते नजर आते हैं जिनके अनुसार विकासशील देशों में टेलीविजन का अर्थ अनिवार्य रुप से सामाजिक विकास करना है। लेकिन इतना तो हम भी जानते हैं कि निम्नवर्गीय स्त्रियों पर फीचर दिखाते हुए भी दूरदर्शन ने भी अपने घाटे की भरपाई के लिए &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;शांति&lt;/span&gt; &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;,स्वाभिमान&lt;/span&gt; और &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;वक्त की रफ्तार&lt;/span&gt; जैसे सीरियलों का प्रसारण किया और दूसरी तरफ उपभोक्ता संस्कृति और बाजारवाद के बीच करीब आठ-नौ सालों से टीवी सीरियल को ‘वूमेन स्पेस’ बनानेवाले चैनल इसे सामाजिक विकास का माध्यम के तौर पर क्यों प्रसारित करना चाहते हैं? फिर इन दोनों स्थितियों को जानते-समझते हुए भी मौजूदा टीवी सीरियलों में ऐसा क्या है जो कि इसे सामाजिक विकास का माध्यम और स्त्री दुनिया को समस्यामूलक विमर्शों के तहत विश्लेषित करने की ओर से जाते हैं?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पहली बात  तो यह कि पिछले सात-आठ सालों  में सास-बहू सीरियलों के जरिए टेलीविजन ने स्त्री की जिस छवि को स्थापित करने की कोशिश की है,जिन घटनाओं को समस्या के तौर पर उठाने का प्रयास किया है,समस्यामूलक सीरियलों ने उनके बरक्स कहीं बड़ी समस्याओं को लेकर दर्शकों को बांधने की कोशिश की है। &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;उतरन&lt;/span&gt; के भरोसे पल रही &lt;span style="font-style:italic;"&gt;इच्छा&lt;/span&gt;,शादी के झूठे दिलासे में ठाकुर के हाथों चंद रुपयों में बेच दी जानेवाली &lt;span style="font-style:italic;"&gt;अगले जनम मोहे बीटिया ही कीजौ&lt;/span&gt; की ललिया, लड़का-बच्चा नहीं जनने की वजह से अम्मां के घर बहू बनकर रहने का सपना लिए और अब नौकरानी बनकर रहनेवाली &lt;span style="font-style:italic;"&gt;न आना लाडो इस देश में &lt;/span&gt;की &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;चंदा&lt;/span&gt;(चंदा-इस घर में बहू बनकर आना एक धोखा था और आज इस घर में नौकरानी बनकर रहना सच है) और &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;बिरजू &lt;/span&gt;के नीची जाति की होने की वजह से  प्रेम से बेदखल कर दी जानेवाली &lt;span style="font-style:italic;"&gt;मितवा दो फूल कमल &lt;/span&gt;के की &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;बेला&lt;/span&gt;,ऐसे दर्जनों चरित्र हैं जो कि दर्शकों की ओर से संवेदना बटोरने के स्तर पर सास के षड्यंत्रों की शिकार &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;पार्वती&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;,&lt;span style="font-weight:bold;"&gt; रानी&lt;/span&gt;, &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;वैदेही&lt;/span&gt;, &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;काकुल&lt;/span&gt; और &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;आंचल&lt;/span&gt; को बहुत पीछे धकेल देती है। &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;ललिया &lt;/span&gt;के मां-बाप और छोटे-छोटे भाई-बहनों सहित पूरे-पूरे दिन भूखे पेट काटने के आगे,अदना दो ठेकुए के लिए ‘हमहुं तो छोट जात हैं,हम कहां बामन-पंडित है’ बोलकर अपनी जाति बताने के आगे,पन्द्रह साल में ही&lt;span style="font-weight:bold;"&gt; सुगना&lt;/span&gt; के विधवा हो जाने के आगे, भरी महफिल में सात साल की&lt;span style="font-weight:bold;"&gt; हिचकी&lt;/span&gt; और बाद में अठारह साल की हो जानेवाली &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;इच्छा &lt;/span&gt;के जलील किए जाने के आगे और हरियाणा के बीरपुर में अभी-अभी जन्मी बच्ची को जहरीले दूध के हवाले करनेवाली हजारों मांओं के आगे इन सारी सास-बहू सीरियलों के चरित्रों की तकलीफ दर्शकों के लिए बहुत स्वाभाविक नहीं रह जाते। जाति,वर्गीय-चरित्र,सामाजिक हैसियत,लिंग-भेद और सामाजिक कुप्रथा की शिकार इन स्त्री-चरित्रों के आगे, सात-सात,आठ-आठ सालों से आदर्श बहू,परिवार और विवाह संस्था को बचानेवाली स्त्री-चरित्र दर्शकों के भीतर संवेदना पैदा करने की ताकत खो देते हैं। अब की ये स्त्री चरित्र टेलीविजन दर्शकों के लिए ज्यादा स्वाभाविक लगते हैं। सास-बहू सीरियलों को ये चरित्र मेलोड्रामा करार देते हैं। यहां पर आकर टेलीविजन अपनी आलोचना स्वयं करता नजर आता है। ऐसे में उत्सवधर्मी सास-बहू सीरियलों और समस्यामूलक सीरियलों के बीच एक तुलनात्मक स्थिति बनती है जो यह बताती है कि स्त्रियों की समस्याओं का वर्गीय चरित्र होता है,देश की सारी स्त्रियों को देखने-समझने के एक ही आधार बिंदु तय नहीं किए जा सकते,स्त्री की पहले बुनियादी चिंता पेट,लिंग-भेद और जातिगत स्तर पर किए जानेवाले भेदभाव को लेकर है। पहले इसे समझना जरुरी है।   &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;  कुछेक हजार में ठाकुर के हाथों बेच दी गयी &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;ललिया &lt;/span&gt;अब दक्खिन टोला के बजाय महल में रहती है लेकिन लाखों रुपये दहेज में देने के वाबजूद सास लीलावती के कुचक्र की शिकार हुई वो रहनेवाली महलों की की रानी के  झोपड़पट्टी में रहने के दर्द पर&lt;span style="font-weight:bold;"&gt; ललिया&lt;/span&gt; के महल में रहने का दर्द कितना गुना भारी पड़ता है,यहां स्त्री के वर्गीय चरित्र और जातिगत समस्याओं को देखने का एक नया संदर्भ बनता है। स्त्री-छवि के सवाल पर यहां दोनों तरह के सीरियलों को शामिल करें तो वायनरी ऑपोजिशन का फार्मूला चरित्रों के बजाय परिस्थितियों पर आकर लागू होता है और समस्या का दायरा परिवार से बढ़कर समाज तक जाता है। सास-बहू सीरियलों के लगभग सारे स्त्री-चरित्र  घरेलू कुचक्र की शिकार होती हैं। ये सारे चरित्र उच्च मध्यवर्ग से आते हैं,खाने-पीने और पहनने के स्तर पर कहीं कोई परेशानी नहीं है। भौतिक स्तर का अभाव नहीं है। आंसुओं को ढोती हुई भी वो गहनों और कीमती पोशाकों से लदी-फदी स्त्रियां है जो बौद्धिक क्षमता और शिक्षा के स्तर पर यह देश की औसत स्त्रियों से कई गुना आगे है लेकिन सास की कारवाईयों के आगे घुटने टेक देती हैं। पति के विवाहेतर संबंधों को चुपचाप बर्दाश्त करती है और कई जगहों पर उसके प्रति सहानुभूति भी व्यक्त करती है लेकिन कहीं भी किसी भी बात के लिए प्रतिरोध जाहिर नहीं करती और दिलचस्प है कि करीब सात-आठ सालों तक इन चरित्रों पर आदर्श बहू का लेबल चस्पाया जाता रहा। मीहान इस तरह की स्त्रियों का विस्तार से चर्चा करती हैं और स्पष्ट करती हैं कि सीरियल ऐसे चरित्रों को अच्छी स्त्री का दर्जा देता है। दूसरी तरफ ललिया सास-बहू सीरियलों की चरित्रों- &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;काकुल&lt;/span&gt;(जिया जले),&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;रानी&lt;/span&gt;(वो रहनेवाली महलों की) और &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;वैष्णवी&lt;/span&gt;(माता की चौकी सजा के रखना) जैसी चरित्रों की हैसियत के आगे कुछ भी नहीं है। उसके गले में पीतल की ताबीज से लटकी लाल सूत भर है, निपट है,समाज जिसे सामाजिक तौर पर साक्षर मानता है वो नहीं है लेकिन सामाजिक तौर पर पितृसत्ता से लगातार टकराती है। &lt;span style="font-style:italic;"&gt;उतरन&lt;/span&gt; की &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;हिचकी&lt;/span&gt;, &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;अम्मो&lt;/span&gt; के दर्द को समझते हुए चमकी के साथ काम करती है,बड़ी होकर स्कूल में पढ़ाती है। पन्द्रह साल में ही वैधव्य धारण करनेवाली &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;सुगना&lt;/span&gt;(बालिका वधू),&lt;span style="font-weight:bold;"&gt; श्याम &lt;/span&gt;से पहले प्रेम और फिर पुर्नविवाह करने का साहस जुटाती है। &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;बसंत&lt;/span&gt; की तीसरी पत्नी बनकर आयी&lt;span style="font-weight:bold;"&gt; गहना&lt;/span&gt;(बालिका वधू) बसंत की इच्छाओं का प्रतिरोध करती है। ये चरित्र स्त्री-मुक्ति की संभावनाओं का विस्तार करती नजर आती है जिसे कि स्त्री-विमर्श की मान्यताओं को भी समर्थन प्राप्त है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;समस्यामूलक  सीरियलों के ये वो संदर्भ हैं  जो कि भारत सरकार की ओर से सामाजिक न्याय,पुनर्विवाह,स्त्री अधिकार और साक्षरता मिशन के अधिनियमों को मजबूती प्रदान करते हैं।  सास-बहू सीरियलों के चरित्र जहां परंपरा और संस्कार के नाम पर विवाह और परिवार संस्था को बचाने की कोशिश में लगे रहे,स्त्री-मुक्ति के नाम पर अपने को मन का पहनने और शॉपिंग करने तक सीमित कर दिया वहीं समस्यामूलक सीरियलों के चरित्र जमीनी स्तर पर बदलाव करते नजर आते हैं। टेलीविजन की स्त्री-दर्शक मूलतः नागरिक हैं और उनके लिए इसी हैसियत से कार्यक्रम प्रसारित किए जाने चाहिए,इस भरोसे के साथ प्रसारित किए जानेवाले इन नए सीरियलों ने अपने को सामाजिक विकास के साथ जोड़कर देखने की गुंजिश पैदा की है। इन सीरियलों ने स्त्री के स्टेटस के सवाल को स्त्री अधिकारों पर लाकर खड़ा किया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन सामाजिक  कुरीतियों और समस्याओं को आधार बनाकर दिखाए जानेवाले सीरियलों पर दूसरे पक्ष से विचार करें तो कुछ अलग ही समझ बनती है। पहली बात तो यह कि &lt;span style="font-style:italic;"&gt;हमें यह ठीक से समझ लेना होगा सास-बहू सीरियलों के एक-एक करके बंद होते जाने के पीछे टीवी समीक्षकों के प्रयासों के बजाय स्वयं टेलीविजन का अर्थशास्त्र है जिसने उसे आगे चलने की स्थिति में नहीं रहने दिया और दूसरा समस्यामूलक सीरियलों के लगातार लोकप्रिय होते रहने की बड़ी वजह टेलीविजन की स्वाभाविकता के संदर्भ बिन्दु बदल जाने की घटना है।&lt;/span&gt; जब हम इन दोनों बातों पर गौर करते हैं तो समस्यामूलक सीरियलों को सामाजिक विकास का पर्याय मानने में थोड़ी परेशानी जरुर होती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; टेलीविजन  का एक सर्वभौम फार्मूला है कि वह संदर्भों और  घटनाओं को स्वाभाविक बनाने का काम करे। सास-बहू की लोकप्रियता के जो भी आधार बने और जिसने सीरियल देखने की संस्कृति को स्थापित किया उसके पीछे भी टेलीविजन का यही फार्मूला काम करता रहा। करवाचौथ में सारी स्त्रियां उसी तरह से व्रत रखती हैं,उसी तरह से सजती-संवरती हैं,परिवार को बचाए रखने के लिए उसी रानी की तरह घुट-घुटकर जीती है जैसा कि &lt;span style="font-style:italic;"&gt;क्योंकि सास भी कभी बहू थी&lt;/span&gt;,&lt;span style="font-style:italic;"&gt;कहानी घर-घर की&lt;/span&gt; और &lt;span style="font-style:italic;"&gt;वो रहनेवाली महलों की &lt;/span&gt;जैसे सीरियलों में दिखाया जाता है। नतीजा यह होता है कि इसके जरिए एक नए ढंग की टेलीविजन की प्रस्तावित संस्कृति तो जरुर पनपने लग जाती है जो कि हमें बदलते फैशन और व्यवहार के तौर पर दिखाई देते हैं लेकिन इससे समाजे के भीतर के अन्तर्विरोध कम नहीं होते और संभावनाओं  के दरवाजे हमेशा के लिए बंद हो जाते हैं। ऐसे में टेलीविजन समाज की अच्छाई और बुराईयों का विभाजन करने और उसे रेखांकित करने के बजाय उसे स्वाभाविक करार देता नजर आता है। सास-बहू सीरियलों की अधिकांश स्थापनाएं स्त्री के विरोध में है लेकिन वो इतनी स्वाभाविक है कि दर्शकों की ओर से इसे लंबे समय तक स्वीकृति मिल जाती है। इसके ठीक बाद समस्यामूलक सीरियलों की प्रासंगिकता बढ़ती है तो उसके पीछे भी टेलीविजन द्वारा स्वाभाविकता के संदर्भ बिन्दु तलाशने का ही फार्मूला काम आता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-style:italic;"&gt;बालिका वधू&lt;/span&gt; एक सामाजिक और स्वाभाविक  सच है,&lt;span style="font-style:italic;"&gt;उतरन&lt;/span&gt; के भरोसे सपने बुननेवाले बच्चों की दुनिया एक स्वाभाविक सच है,शादी-ब्याह  में छोटी जाति की स्त्रियों  की जरुरत एक स्वाभाविक  सच  है(ठकुराइन-धनिया,लड़की को नहाने का पानी डालने के लिए किसी छोट जात की औरत को लेकर आ..अगले जनम मोहे बीटिया ही कीजौ) और स्त्री के बच्चा नहीं जनने पर उसे छोड़कर बच्चा पैदा करनेवाली स्त्री के तौर पर दूसरे खिलौने को लाना स्वाभाविक सच है,( अम्मां- तू बस पुराने खिलौने की जिद पकड़कर बैठ गया। म तो तनै नया खिलौना दे रही थी।..लाडो न आना इस देश में) समस्यामूलक सीरियलों में ये सारी स्वाभाविकता शामिल हैं और शुरुआत के एपिसोड को देखकर इसके प्रतिरोध में कारवाई होने की गुंजाईश बनती नजर आती है। लेकिन तीस-पैंतीस एपिसोड तक समस्याओं के स्वाभाविक तौर पर उठाए जाने के बाद अतिरेकीपन-आनंदी,ललिया,अम्मो की व्यथा और दादी सा,अम्माजी और ठकुराइन जैसे चरित्रों के अतिशय क्रूरता के बीच उलझकर रह जाते हैं। किसी भी स्तर पर प्रतिरोध के बजाय उस संरचना के भीतर जीने की स्वाभाविकता ज्यादा प्रभावी हो जाती है। ऐसे में स्त्रियों की ये छवि वास्तविकता को खत्म कर देती हैं और औसत यथार्थ में बदल जाती है। &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;सूसन सौंटगै &lt;/span&gt;छवियों के जरिए व्यक्त वास्तविकता को इसी रुप में विश्लेषित करती हैं। इसके साथ ही यहां आकर ये सीरियल सास-बहू सीरियलों की स्वाभाकिता की राह पकड़ लेते हैं जहां आकर दर्शक इन सीरियलों को सिर्फ परिधान,परिवेश और संदर्भों के स्तर पर इसे अलग पाता है नहीं तो यहां भी उत्सवधर्मिता है, हरेक मौके पर ईश्वर के आगे जाने का रिवाज यहां भी कायम है, मुसीबत में भगवान भरोसे छोड़ देने की आदतें है और अपनी बेहतरी का अंतिम विकल्प पुरुषों की छत्रछाया ही साबित होती है।&lt;span style="font-weight:bold;"&gt; टश्मान &lt;/span&gt;के शब्दों में इस तरह घिसी-पिटी छवियों को स्थापित करके उसके सांकेतिक विनाश(symbolic annihilation of women) का काम किया जाता है। यहां भी स्त्री की कोई स्वतंत्र छवि नहीं बनने पाती है और पुनर्विवाह के लिए हिम्मत जुटानेवाली &lt;span style="font-style:italic;"&gt;बालिका वधू&lt;/span&gt; की&lt;span style="font-weight:bold;"&gt; सुगना &lt;/span&gt;भी ‘मेरी वजह से मायकेवालों का सिर कभी नीचा न होगा’ के संकल्प के साथ घर से विदा लेती है। यही पर आकर इन नए समस्यामूलक सीरियलों के लिए जज्बात के बदलते रंग,टीआरपी का नया फार्मूला और स्त्री समस्याओं को ‘प्लेजर मोड’ में बदल देने जैसे पदबंधों के इस्तेमाल शुरु हो जाते हैं। शुरुआती एपीसोड में सीरियलों के लैंडस्केप बदलने के साथ ही इसके कस्बाई,झुग्गियों और टोलों में स्त्री चरित्र को समझने की जो उम्मीद बंधती है वो पन्द्रह से बीस एपीसोड तक आते-आते शहर और महलों के सेंट्रिक होकर रह जाते हैं। यहीं पर आकर सामाजिक विकास के फार्मूले पर सीरियलों की बात करना बेमानी लगने लग जाते हैं। हां इन सबके वाबजूद इतना जरुर होता है कि स्त्री-दर्शकों का दायरा बढ़ता है,पुरुष दर्शकों की सीरियल देखने के प्रति मरी इच्छाएं फिर से जन्म लेने लग जाती है और छद्म ही सही, व्यापक स्तर पर टेलीविजन मनोरंजन के जरिए जागरुकता पैदा करने का काम करता है,यह भ्रम व्यापक स्तर पर प्रसारित होता है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6898673550088047104-8643230144075928444?l=taanabaana.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://taanabaana.blogspot.com/feeds/8643230144075928444/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.blogger.com/comment.g?blogID=6898673550088047104&amp;postID=8643230144075928444' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6898673550088047104/posts/default/8643230144075928444'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6898673550088047104/posts/default/8643230144075928444'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://taanabaana.blogspot.com/2009/10/blog-post_28.html' title='नए टीवी सीरियलः स्त्री-चिंता या छलना का पुनर्पाठ'/><author><name>विनीत कुमार</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09398848720758429099</uri><email>vineetdu@gmail.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' name='OpenSocialUserId' value='01281586745461734077'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_uS1XY77Y4b8/SufW14ShFgI/AAAAAAAABVg/zlLfjiYNFUQ/s72-c/hans+photo+vineet+(1).JPG' height='72' width='72'/><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6898673550088047104.post-8716668046332089614</id><published>2009-10-25T11:11:00.018+05:30</published><updated>2009-11-03T23:48:13.243+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='chittajagat'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='allahabad'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='hindi bloggers'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='au'/><title type='text'>तो इस तरह खत्म हुआ इलाहाबाद का ब्लॉग मंथन</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://1.bp.blogspot.com/_uS1XY77Y4b8/SuQP4ApC9UI/AAAAAAAABUw/0kpLw1dnabU/s1600-h/session.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 240px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_uS1XY77Y4b8/SuQP4ApC9UI/AAAAAAAABUw/0kpLw1dnabU/s320/session.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5396455708415948098" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-style:italic;"&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;ब्लॉग-विमर्श&lt;/span&gt; के लिहाज से पहले दिन के मुकाबले दूसरे दिन के सत्र ज्यादा कारगार साबित हुए। इसकी एक वजह तो समय से सत्र का शुरु होना रहा,अधिक वक्ताओं के विचार आए। इसके साथ ही तकनीकी सत्र में जिस बारीकी से &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;रविरतलामी&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;, &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;मसिजीवी&lt;/span&gt;, &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;ज्ञानदत्त पांडेय&lt;/span&gt; और &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;संजय तिवारी&lt;/span&gt; ने सूचना,तकनीक औऱ अभिव्यक्ति के बीच के अन्तर्संबंधों को बताया वो नॉन-ब्लॉगरों के लिए ज्यादा महत्वपूर्ण रहे। लेकिन पहले दिन वक्ताओं को बोलने देने में जितनी दरियादिली दिखायी गयी अगले दिन उसकी गाज &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;भाषा,साहित्य और संप्रेषणियता&lt;/span&gt; के सवाल पर बोलने आए वक्ताओं पर गिरी। जाहिर तौर पर उसका शिकार मैं भी हुआ। विश्वविद्यालय की ओर से जो न्योता हमें भेजा गया था उसमें ये साफ तौर पर लिखा था कि आप जो भी बातचीत करेंगे उसे प्रकाशित किया जाएगा इसलिए हमनें अपने स्तर से बीस मिनट बोलने के लिहाज से तैयारी की थी जबकि  हमें पांच मिनट,सात मिनट के भीतर,गहरे दबाबों के बीच अपनी बात खत्म करनी पड़ी। मैंने तो फिर भी पांच मिनट के निर्धारित समय होने पर भी हील-हुज्जत करके ढाई मिनट आगे तक जारी रहा लेकिन बाद के वक्ताओं से कहा गया कि आप एक-एक मिनट में अपनी बात रखें। दिल्ली से चलते हुए सोचकर ही कितना अच्छा लग रहा था कि हम देश में पहली बार राष्ट्रीय स्तर पर आयोजित होनेवाली चिट्ठाकारी संगोष्ठी में विमर्श करने जा रहे हैं जिसे कि पाठ के रुप में तैयार किया जाएगा लेकिन आप समझ सकते हैं कि बोलते वक्त हमने ऐसा महसूस किया कि खून,पेशाब,थूक और खखार की तरह यहां अपने विचारों की सैम्पलिंग भर देने आए हैं। वहां मौजूद कुछ लोगों ने ये तर्क दिया कि जब आप पांच मिनट में पढ़नेवाली पोस्ट लिख सकते हैं तो फिर अपनी बात क्यों नहीं रख सकते। पांच मिनट ही क्यों भई,टेलीविजन के हिसाब से सोचें तो 25-30 सेकेंड काफी हैं,इससे ज्यादा की बाइट तो चलती भी नहीं। लेकिन क्या चिट्ठाकारी को जब हम विमर्श और अकादमिक दुनिया में शामिल कर रहे हैं तो उसे निपटाने के अंदाज में ही बात करनी होगी। अब बिडंबना देखिए कि &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;रियाजउल हक&lt;/span&gt; जैसा गंभीर ब्लॉगर वक्ता जब ये कह रहा है कि आप हिन्दी ब्लॉग्स पर नजर डालें तो कहीं से इस बात का अंदाजा नहीं लगेगा कि ये उसी देश की अभिव्यक्ति है जहां हजारों किसानों ने कर्ज के बोझ से आत्महत्या कर ली,दलित समाज का एक तबका आज भी पचास साल पहले के भारत में जीने के लिए अभिशप्त है। हिन्दी ब्लॉगिंग करते हुए जो खतरे हमें उठाने चाहिए,अभी तक हम नहीं उठा रहे हैं और उसके बाद वो पूरी बातचीत को सामाजिक सरोकार और प्रतिबद्ध लेखन की ओर मोड़ना चाह रहे थे,महज दो मिनट के भीतर उन्हे दबाब में आकर बात खत्म करनी पड़ गयी लेकिन वही दूसरे सत्र में इलाहाबाद विश्वविद्यालय के हिन्दी प्रोफेसर &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;राजेन्द्र कुमार&lt;/span&gt; इस बात की घोषणा करते हुए भी कि उन्हें ब्लॉग के बारे में कुछ भी नहीं पता है,करीब पच्चीस मिनट तक बोल गए। इस पच्चीस मिनट में ऐसा कुछ भी नहीं था जो कि ब्लॉग को लेकर चलनेवाली बहस को आगे ले जाता हो,विमर्श के दायरे का विस्तार करता हो,वही सब जिम्मेदारी का एहसास,लेखन में विवेक का प्रयोग और दुनियाभर के नैतिक आग्रह जिसकी चर्चा पहले दिन ही विस्तार से की गयी। ब्लॉगरों की भाषा में इसे नामवर सिंह की पायरेसी करार दिया गया। औपचारिकता,हिन्दी साहित्य-समाज से आक्रांत दोनों दिनों की इस संगोष्ठी ने ब्लॉग विमर्श के स्पेस को बहुत ही संकुचित कर दिया। हमें बार-बार इस बात का एहसास कराया गया कि हम हिन्दी साहित्य-समाज के लोगों के बीच रहकर अपनी बात कर रहे हैं तभी तो कुलपति,विभागाध्यक्ष से लेकर एमए तक के स्टूडेंट ने हमें आगाह किया कि आप अनुशासित बनिए। &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;संतोष &lt;/span&gt;नाम के एक स्टूडेंट ने जब मुझे मंच से अनुशासित होने और धैर्य से दस मिनट नहीं बैठने लायक करार दिया तो हमें इस बात का यकीन हो गया कि आनेवाले समय में हिन्दी साहित्य से जुड़ी संस्थाएं और विभाग अगर चिट्ठाकारी पर किसी भी तरह का आयोजन करती है तो इसका बंटाधार कर देगी। मैंने उन्हें बस इतना ही कि हम यहां योग और साधना शिविर में नहीं आएं हैं कि हिलना-डुलना बंद कर दें,हम विचलन की स्थिति में जी रहे हैं और उन्हीं सबके बीच अपनी बात रखनी है। हिन्दी समाज में चिट्ठाकारी को साहित्यिक मापदंड़ों के खांचे में फिट करने की इतनी अधिक छटपटाहट है कि वो ब्लॉग की तकनीकी, सुविधाओं, शर्तों और शैलियों को उसी रुप में अपनाए जाने के वाबजूद जिस रुप में दुनिया अपना रही है महज ब्लॉग की जगह चिट्ठाकारी शब्द प्रयोग कर थै-थै नाच रहे हैं। &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;नामवर सिंह&lt;/span&gt; इस शब्द के प्रयोग को एतिहासिक करार देते हुए इसका श्रेय &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;म.गां.अं.विश्वविद्यालय&lt;/span&gt; को देते हैं। हमें तो ब्लॉग के बजाए चिट्ठाकारी टाइप करने में असुविधा हो रही है। आते समय डेस्क पर पड़ी एक रिपोर्ट पर नजर गयी,शीर्षक था- &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;चिट्ठाकारी से साहित्य को कोई खतरा नहीं। &lt;span style="font-style:italic;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;अब बताइए चिट्ठाकारी को साहित्य के बरक्स खड़ी करने की क्यों जरुरत पड़ गयी? इस पर गंभीरता से चर्चा की जानी चाहिए। बहरहा&lt;/span&gt;&lt;span style="font-style:italic;"&gt;ल&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://4.bp.blogspot.com/_uS1XY77Y4b8/SuQOOFthQ8I/AAAAAAAABUY/3twSG7tEhh8/s1600-h/allahabad+108.JPG"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 240px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_uS1XY77Y4b8/SuQOOFthQ8I/AAAAAAAABUY/3twSG7tEhh8/s320/allahabad+108.JPG" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5396453888710755266" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दूसरे दिन के पहले सत्र &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;चिट्ठाकारीः भाषा और साहित्य&lt;/span&gt; के सवाल पर प्रथम वक्ता के तौर पर &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;मसिजीवी &lt;/span&gt;नाम से मशहूर ब्लॉगर &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;विजेन्द्र सिंह चौहान&lt;/span&gt; ने अपनी बात रखी। उन्होंने स्पष्ट किया कि कई बार हमें लगता है कि चिट्ठाकारी की बिल्कुल कोई नयी और अलग भाषा है। लेकिन क्या सचमुच ऐसा है? ये उसी रुप में नयी है जिस रुप में ये &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;हंस&lt;/span&gt; में नहीं आती,&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;कथादेश&lt;/span&gt; में नहीं आती,साहित्य की किताबों में नहीं आता। लेकिन गंभीरता से विचार करें तो ब्लॉग की कोई नयी भाषा नहीं है। ये बोली जानेवाली भाषा,कई अलग-अलग जगहों पर बोली जानेवाली भाषा का ही रुप है। इसलिए भाषा के सवाल पर हमें इस लिहाज से भी सोचना होगा। उन्होंने कहा कि हम चिट्ठाकारी में टाइप करते हुए छोटी-मोटी गलतियां करते हैं लेकिन ये कोई बड़ी बात नहीं है। हां,दिक्कत तब है जब हम इस पर गर्व करने लग जाते हैं। &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;मसिजीवी &lt;/span&gt;ने 2.0 भाषा फार्मूले के हिसाब को भी समझना जरुरी बताया। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;गिरिजेश राव&lt;/span&gt; ने स्पष्ट किया कि मैं साहित्य से नहीं हूं,पेशे से इंजीनियर हूं लेकिन मैं जुनूनी तौर पर चिट्ठाकारिता से जुड़ा हूं। मेरे जैसे कई लोग जिनका कि साहित्य से कुछ भी लेना-देना नहीं है वो भी ये काम कर रहे हैं। इसलिए सवाल ये है कि क्या ब्लॉगिंग पर जब हम बात कर रहे हैं तो उन तथ्यों को ध्यान में नहीं रखा जाना चाहिए। ब्लॉगरी को सर्व समावेशी है जहाँ सबके लिए जगह है। &lt;br /&gt;(2) ब्लॉगरी और साहित्य के विवाद को बेमानी बताया । ब्लॉगरी अभिव्यक्ति का एक माध्यम है जिससे साहित्य भी कहा जा सकता है।&lt;br /&gt;(3) हिन्दी की जातीयता के कारण भाषा स्रोत के रूप में मैंने संस्कृत की महत्ता बताई। अंग्रेजी को भी स्वीकारा।&lt;br /&gt;(4) आम जीवन से ही शब्दों को लेकर बात कहने की वकालत की - टेलीफोन धुन में हँसने वाली....&lt;br /&gt;(5) एस एम एस भाषा की बात भी की ।&lt;br /&gt;(6) ब्लॉगरी के भीतर से ही इसकी भाषा विकसित होने की बात की । खड़ी बोली से हिन्दी बनने में महावीर प्रसाद द्विवेदी के योगदान की बात की । यह भी कहा  कि अब कोई द्विवेदी ब्लॉगरी के लिए नहीं होगा, हमें खुद अनुशासन रखते हुए विकसित होना होगा... महावीर प्रसाद के नाम लेने पर बाद में कुछ जुमले भी आए ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;हिमांशु &lt;/span&gt;को चिट्ठाकारी में कविता और उसकी भाषा के संदर्भ में बातचीत करने के लिए आमंत्रित किया गया। उन्होंने चिट्ठाकारी पर मौजूद कविताओं का पाठ भी किया लेकिन &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;मनीषा पांडेय &lt;/span&gt;के ये कहे जाने पर कि आप अपनी बात कीजिए,सिर्फ कविता क्यों सुना रहे हैं तो उन्होंने कहा कि मैं अभी इसे समझ ही रहा हूं इसलिए सीधे-सीधे इस पर बात नहीं कर सकता। मनीषा को उनका ये नॉनसीरियस रवैया पसंद नहीं आया। ये अलग बात है कि अंत तक हिमांशु का कविता सुनाना जारी रहा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वक्ता के तौर पर &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;चिट्ठाकारीः भाषा और संप्रेषणीयता&lt;/span&gt; के सवाल पर मुझे बोलने के लिए बुलाया गया। भाषा पर बातचीत करने के पहले मैंने स्पष्ट करने की कोशिश की कि- मैं हिन्दी चिट्ठाकारी को बनाम की जुमलेबाजी से अलग करके देखना चाहता हूं। मैं न तो इसे साहित्य बनाम ब्लॉग,न तो मीडिया बनाम ब्लॉग और न ही समाज सेवा बनाम ब्लॉग के तौर पर देख रहा हूं। मैं इसे इसी रुप में देख रहा हूं जिस रुप में देख रहा हूं। हिमांश का इस संबंध में मानना रहा कि मैं अलग से ब्लॉग को नहीं लेता। अगर वो कहीं छप गयी तो कविता है,कहानी है,नहीं छपी है,नेट पर है तो वही पोस्ट है। दूसरी बात जो कि मुझे लगी वो ये कि हमें हिन्दी चिट्ठाकारी पर बात करते हुए संदर्भों की तलाश करनी चाहिए। सिर्फ सतहीपन,अनर्गल और कुंठासुर जैसे सरलीकृत नजरिए को पेश करके हम इस पर बात नहीं कर सकते। दूसरे दिन में अब तक की बहस पर स्त्री के सवालों पर लिखी जानेवाली पोस्टों पर किसी ने कुछ नहीं कहा। &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;रियाजउल&lt;/span&gt;,&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;अशोक पांडेय&lt;/span&gt;,&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;गिरीन्द्र&lt;/span&gt;,&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;राकेश कुमार सिंह&lt;/span&gt; जैसे लोग समाज औऱ सरोकार पर जो कुछ भी लिख रहे हैं,उसकी कहीं कोई चर्चा नहीं की गयी। ऐसा न किया जाना भी एक राजनीति का हिस्सा हो सकता है। संभव है इस तरह के आयोजन हमारे भीतर एक लोभ पैदा करते हों कि आप अगर चीजों को एक खास संदर्भ में देखते हैं तो आपके पक्ष में कई संभावनाएं हैं। आज ब्लॉगिंग ने मीडिया औऱ टेलीविजन आलोचना के लिए जितना बड़ा स्पेस तैयार किया है उतना शायद ही अखबारों औऱ किताबों के जरिए हुआ होगा। &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;रवीश कुमार&lt;/span&gt; इस पेशे से जुड़कर भी मीडिया और टेलीविजन की सीमा औऱ संभावनाओं पर लगातार बात कर रहे हैं,उन्हें टीवी अखबार लगने लगा है। बड़े स्तर पर नास्टॉलजिक राइटिंग की जा रही है,स्ट्रैटजी के साथ लेखन किया जा रहा है, &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;रविरतलामी&lt;/span&gt; जैसे लोग भाषा-प्रौद्योगिकी का पाठ तैयार कर रहे हैं,उस पर आप बात ही नहीं कर रहे। हमें भाषा को इसी सिरे से पकड़ने की जरुरत है कि इन संदर्भों के बीच ब्लॉग की भाषा किस रुप में निर्मित हो रही है? &lt;br /&gt;साइंस की भाषा पर बात करने के लिए &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;अरविंद मिश्रा &lt;/span&gt;को आमंत्रित किया गया है। उऩके बारे में फुरसतिया ने लिखा कि-&lt;span style="font-style:italic;"&gt;अरविन्दजी ने अपने ब्लाग का प्रचार किया केवल कि हमारे साइंस ब्लाग में ये किया जा रहा है, वो किया जा रहा है&lt;/span&gt;। मैं&lt;span style="font-weight:bold;"&gt; फुरसतिया&lt;/span&gt; के'प्रचार'शब्द से असहमति जताते हुए कहूंगा कि &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;अरविंद&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;मिश्रा&lt;/span&gt; ने ये बात विस्तार से बताने की कोशिश की कि विज्ञान की दुनिया में जो कुछ भी नया चल रहा है हिन्दी में वो साइंस ब्लॉग में मौजूद है। ये बात काफी हद तक सही भी है कि हिन्दी में साइंस पर का लेखन बहुत कम दिखाई देते हैं। हां इस लेखन की चर्चा करते हुए अरविंद मिश्रा ने बाकी ब्लॉगरों के नाम लेने के वाबजूद लगभग सारे उदाहरण अपने साइंस ब्लॉग से दिए। &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;गिरिजेश राव &lt;/span&gt;बोल रहे थे कि मैं अपने खोए हुए रिकार्डर की ताकीद में ऑफिस के लोगों से बीतचीत में उलझ गया और वापस आने पर &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;संतोष &lt;/span&gt;की ओर से मेरे लिए की गयी व्यक्तिगत टिप्पणी को लेकर उत्तेजित औऱ परेशान हो गया। &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;विपिन&lt;/span&gt; की बात को मैं सुन नहीं पाया इसके लिए माफ करेंगे। आप वहां मौजूद ब्लॉगरों से अपील है कि इनके साथ जो छूट गए हैं उनकी बात कमेंट कर दें ताकि हम उन्हें भी पोस्ट में शामिल कर सकें। इस पूरे सत्र की अध्यक्षता &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;प्रियंकर पालीवाल&lt;/span&gt; ने की और पूरे सत्र तक जमे रहे जबकि &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;इरफान&lt;/span&gt; ने मंच संचालन करते हुए,अपनी खूबसूरत आवाज से हमारे भीतर चल रहे उठापटक को लगातार संतुलित करने का काम किया।&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://1.bp.blogspot.com/_uS1XY77Y4b8/SuQSA8QjKaI/AAAAAAAABVI/2sy9pirhMmk/s1600-h/allahabad+112.JPG"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 240px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_uS1XY77Y4b8/SuQSA8QjKaI/AAAAAAAABVI/2sy9pirhMmk/s320/allahabad+112.JPG" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5396458060881537442" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;भोजन अवकाश के बाद गांव को लेकर एक किस्म की जो फैंटेसी शहर के लोगों के बीच होती है और शहरी मानसिकता पनपनी शुरु होती है,इस गंभीर सच की थीम पर बनी फिल्म &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;सरपत &lt;span style="font-style:italic;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;की स्क्रीनिंग की गयी। &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;अभय तिवारी&lt;/span&gt; ने इस फिल्म के जरिए गांव को एक परिभाषा में बदल दिए जाने की कवायद को शिद्दत के साथ देखने की कोशिश की है। 18 मिनट की इस फिल्म के दिखाए जाने के बाद &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;चिट्ठाकारीः तकनीकी पक्ष&lt;/span&gt; का सत्र शुरु होता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दोनों दिनों के कुल सत्रों को अगर हम मिलाकर तुलना करें तो ये सबसे ज्यादा गंभीर सत्र रहा। ये अलग बात है कि इस सत्र के हिस्से मैं मैं स्वयं 15 मिनट के लिए एजी ऑफिस के पास जूस पीने चला गया,&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;यशवंत&lt;/span&gt; सिविल लाइन्स के लिए रिक्शा खोजने निकले,&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;मनीषा&lt;/span&gt; चायवाले बाबा के साथ कटबहसी कर रही थी,&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;इरफान&lt;/span&gt; मैं जिंदगी का साथ निभाता चला गया,सेमिनार की थकान,धुएं में उड़ाता गया के अंदाज में बाहर दिखे, मेरी ओर से &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;मनीषा&lt;/span&gt; को दी गयी किताब &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;भूपेन &lt;/span&gt;को इतनी जरुरी लगी कि बाहर फोटोकॉपी की मशीन ढूंढने में व्यस्त नजर आए,&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;अविनाश&lt;/span&gt; देखते ही देखते अलोप हो गए,&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;समरेन्द्र &lt;/span&gt;मामू लोग से मिलने निकल पड़े। ब्लॉगरों ने इस सत्र को ट्यूटोरियल क्लास की तरह लिया,मनो हो तो रहो नहीं तो निकल लो। लेकिन जूस पीने के बाद जब मैं अंदर आकर बैठा तो महसूस किया कि चिट्ठाकारी के नाम पर जो हम बौद्धिक बहसें कर रहे हैं,अपनी बौद्धिकता झाड़ रहे हैं,उन सबसे हटकर हम ब्लॉगरों को एक साल तक लगातार देश के अलग-अलग हिस्सों में जाकर &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;ब्लॉग-शिविर&lt;/span&gt; लगाने चाहिए। क्योंकि ब्लॉगरों के नदारद होने के वाबजूद भी इस सत्र में कुर्सी लगभग भरी हुई थी। लोग चीजों को गौर से सुन रहे थे और नहीं समझ में आने पर सवाल भी कर रहे थे। हां ऐसे मौके पर &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;अफलातून&lt;/span&gt; जो कि हमारे हीरो करार दिए गए,थोड़ा उन्हें बर्दाश्त करना चाहिए था और तकनीकी मसले के बीच में भावुक प्रसंग छेड़ने से अपने को रोकना चाहिए था। मंच से उनका रोना हमें अचानक से दूसरी दुनिया की तरफ खींच ले गया और मन भारी हो गया। खैर,&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस सत्र में &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;रविरतलामी&lt;/span&gt; ने यूनीकोड को लेकर विस्तार से बताया,फांट को लेकर सुझाव दिए और हमें हिन्दी की वर्तनी को किस तरह से चेक करें,दिल्ली में उस सॉफ्टवेयर को कहां से खरीदें,ये सबकुछ बताया। &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;ज्ञानदत्त पांडेय&lt;/span&gt; ने ब्लॉगिंग में समय प्रबंधन के महत्व और उसके तरीके को सटीक तौर पर बताया। मसिजीवी के लिखने औप पढ़ने के बीच के समय-अनुपात को समझाया। &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;मसिजीवी&lt;/span&gt; ने स्टेप वाइज स्टेप ब्लॉग बनाने,नियंत्रित किए जाने और उसे जिंदा रखने के तरीकों पर चर्चा की और डेमो के जरिए इसे प्रयोग करके बताया। इस सत्र में &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;संजय तिवारी&lt;/span&gt; की ओर से इंटरनेट के चालीस साल होने और उसके विविध पड़ावों से गुजरने की घटना को गंभीरता से देखने-समझने को अनिवार्य बताया। &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;संजय तिवारी&lt;/span&gt; ने यह कहते हुए कि हम बुरे दौर से गुजर रहे हैं जिसे कि इन्होंने पहले सत्र में भी कहा था इसके विकल्पों की तलाश करने की प्रक्रिया पर भी अपनी बात रखी। एक ब्लॉग के बना लेने के बाद हम तीसमार खां नहीं हो जाते,हमें इंटरनेट की दुनिया को बारीकी से समझने की जरुरत है,&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;संजय तिवारी&lt;/span&gt; की बात से ये पक्ष बार-बार उभरकर सामने आया। ब्लॉग-तकनीक से जुड़े करीब 8 सवालों(मेरी मौजूदगी में)के पूछे जाने और वक्ताओं की ओर से विस्तार से चर्चा किए जाने के बाद सत्र समाप्ति की औपचारिक घोषणा की जाती है। उसके बाद हिन्दी के प्रोफेसर &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;राजेन्द्र कुमार&lt;/span&gt; फिर से उन सारे हिदायतों को दोहराते हैं जिसे कि &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;नामवर सिंह&lt;/span&gt; ने उद्घाटन सत्र के दौरान हमें दिए थे। यहां मुझे नब्बे साल से&lt;span style="font-weight:bold;"&gt; पंडितजी &lt;/span&gt;नाम से मशहूर उस गोलगप्पा और चाट खिलानेवाले बाबा की याद आ जाती है,जब मैंने पांच गोलगप्पे खाने के बाद पूछा कि हो गया बाबा? बाबा ने जबाब दिया था कि जहां से शुरु किए हैं वहीं से खत्म करेंगे न बेटा। उन्होंने खट्टे पानी से खिलाना शुरु किया था,बीच में मीठा पानी,फिर घुघनी भरके,फिर दही डालकर..मैंने तभी सवाल किया था और उन्होंने वापस खट्टे पानी पर लौटने की बात की थी।&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/_uS1XY77Y4b8/SuQMiqMR2kI/AAAAAAAABUA/zYo75meHfFg/s1600-h/allahabad+118.JPG"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 240px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_uS1XY77Y4b8/SuQMiqMR2kI/AAAAAAAABUA/zYo75meHfFg/s320/allahabad+118.JPG" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5396452043077573186" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दूसरे सत्र की समाप्ति के बाद हम ब्लॉगरों को स्मृति चिन्ह और प्रशस्ति पत्र लेने के लिए बारी-बारी से मंच पर बुलाया गया। इस कार्यक्रम के सह-संयोजक&lt;span style="font-weight:bold;"&gt; सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी &lt;/span&gt;ने एक बार फिर से हम ब्लॉगरों के बारे में परिचय दिया। ये परिचय ब्लॉग और लिंक के परिचय से अलग था। इन दोनों के भीतर जो भी अपनी पहचान बनी थी,उससे लोगों को अवगत कराया। हमने अपनी-अपनी कमाई बटोरी और कार्यक्रम खत्म होने की घोषणा के साथ ही बाहर आए।&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://3.bp.blogspot.com/_uS1XY77Y4b8/SuQM-bnjJyI/AAAAAAAABUI/Jdl_CfvIVHA/s1600-h/allahabad+131.JPG"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 200px; height: 150px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_uS1XY77Y4b8/SuQM-bnjJyI/AAAAAAAABUI/Jdl_CfvIVHA/s200/allahabad+131.JPG" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5396452520201758498" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बाहर आकर एक अजीब किस्म की भावुकता से मैं भर गया। लग रहा था कि पता नहीं अब कब किससे मिलना हो। &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;रवि रतलामी&lt;/span&gt; के साथ तस्वीर खींचावाने की इच्छा थी जो कि मैंने उन्हें पहले से ही जता दी थी। उनकी गाड़ी स्टार्ट हो चुकी थी,मुझे देखकर उन्हें मेरी बात याद आ गयी और एक-एक करके सब उतर गए। बांह में भरकर उन्होंने तस्वीर खिंचायी...और फिर सबों ने साथ-साथ। फिर विदा हुए।&lt;br /&gt;इधर ब्लॉगरों की एक गैंग&lt;span style="font-weight:bold;"&gt; सीनेट&lt;/span&gt; हॉल में होनेवाले मुशायरे में घुसपैठ के लिए बेताब नजर आया। हम भी उनके साथ हो लिए। साढ़े नौ बजे &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;प्रयागराज&lt;/span&gt; से लौटना था..लेकिन अभी छ ही बजे थे। रास्ते में&lt;span style="font-weight:bold;"&gt; मसिजीवी&lt;/span&gt; इस बात पर अफसोस कर रहे थे कि एक दिन और क्यों रुकना पड़ गया और मैं अफसोस कर रहा था कि मैं क्यो नहीं रुक गया? कल को कोई पूछे कि इलाहाबाद में क्या देखा तो कुछ भी नहीं बता पाउंगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;इलाहाबाद विश्वविद्यालय &lt;/span&gt;देखकर आंखें चौंधिया गयी। &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;मसिजीवी&lt;/span&gt; ने मेरी तस्वीरें लीं। फिर अंदर दाखिल हुए। मुशायरा शुरु हो चला था। नजर के सामने नाचता रिकार्डर,लोगों से अलग होने पर एक बाजिब किस्म की भावुकता और लंबी थकान के बीच मुशायरे ने मुझ पर कोई असर नहीं किया। मन उचट गया। उधर से &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;अविनाश &lt;/span&gt;और &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;यश मालवीय &lt;/span&gt;भी बाहर जाते दिखे। उन्होंने भी कहा कि मजा नहीं आया चट गए। मैंने कहा- चट गए हैं तो क्यों न फिर चाट खाने चलें। &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;अजय ब्रह्मात्मज &lt;/span&gt;ने कहा था कि इलाहाबाद में चाट जरुर खाना। बिना हैलमेट के यश भाई की बाइक पर हम दोनों लग गए। नब्बे साल की पुरानी&lt;span style="font-weight:bold;"&gt; पंडितजी की चाट दूकान&lt;/span&gt; पहुंचने तक यश भाई की कविताओं और हाथ लहरा-लहराकर गीत गाने का सिलसिला जारी रहा-            &lt;span style="font-style:italic;"&gt;पिंजरा में देखो बोले,राम नाम टुइयां&lt;br /&gt;शहरों से भलो हमरो गांव मोरी गुइयां.&lt;/span&gt;.&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://3.bp.blogspot.com/_uS1XY77Y4b8/SuQNa_0JnzI/AAAAAAAABUQ/fHOipcyfE0s/s1600-h/allahabad+151.JPG"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 200px; height: 150px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_uS1XY77Y4b8/SuQNa_0JnzI/AAAAAAAABUQ/fHOipcyfE0s/s200/allahabad+151.JPG" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5396453010954624818" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;  &lt;br /&gt;चाट खाने के बाद हम मस्त हो गए फिर&lt;span style="font-weight:bold;"&gt; विश्राम होटल &lt;/span&gt;तक &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;यश भाई&lt;/span&gt; और उनके गीतों के साथ। होटल पहुंचने पर एक घंटे के लिए क्या शुरु किया जाए..सुनने-सुनाने का दौर? लेकिन ऐसे ही सूखा-सूखी। &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;यश भाई&lt;/span&gt; ने कहा कि आपलोग यात्रा पर जा रहे हैं,आचमन करना ठीक नहीं होगा। लेकिन बीयर तो चल ही सकती है इस संकल्प के साथ..&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;हेस्टी-टेस्टी&lt;/span&gt; पर धावा। आधा से ज्यादा चखना मैं ही खा गया,अदने एक सेवेन अप को पचाने के लिए। बाहर आकर यश भाई को भाभी का हवाला देकर हम उन्हें विदा होने की बात करते हैं,वो हमें स्टेशन तक छोड़ने की जिद करते हैं। फिर कई कविताओं के टुकड़े एक के बाद एक। वो कहते हैं-दुनिया पैसे कमाती है,हम कहते हैं आदमी कमाते हैं।..उनसे विदा होते वक्त मेरी आंखों के कोर भींग जाते हैं।&lt;br /&gt;वापस आकर दस मिनट के भीतर समान समेटते हैं,&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;समरेन्द्र भाई&lt;/span&gt; के दोस्त की गाड़ी पर लदते हैं और फिर इलाहाबाद स्टेशन। तीन थाली पैक कराकर फिर &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;प्रयागराज&lt;/span&gt; के भीतर। बातचीत का दौर,आसपास की लड़कियों से थोड़ा भी सट जाने पर टोका-टोकी का दौर शुरु। हम बातें करना चाहते हैं लोग सोना चाहते हैं। हम ठहाके लगाना चाहते हैं,वो खर्राटे लगाने लग जाते हैं। हम तीनों ट्वॉयलेट के पास खड़े होकर देर रात तक बातें करते हैं। रेलवे के कर्मचारी के साथ गप्पें मारते हैं और फिर वापस आकर अपने-अपने बिस्तर में दुबक जाते हैं।&lt;br /&gt;अपने हॉस्टल के कमरे के सामने पांच अखबार पड़े हैं। ओह..आज तो संडे है,तभी तो पांच अखबार। इन चार दिनों में दिल्ली में क्या हुआ,नहीं मालूम,हॉस्टल में क्या हुआ नहीं पता..तब से लेकर अब तक तो इस पोस्ट को लेकर ही भिड़ा रहा।..पुरानी दुनिया में वापस।।।..आगे ब्लॉगिंग की दुनिया में इस संगोष्ठी से निकलकर आए सवालों पर विमर्श जारी रहेगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;डिस्क्लेमर&lt;/span&gt;- &lt;span style="font-style:italic;"&gt;ये रिपोर्ट पूरी तरह स्मृति पर आधारित हैं। नोट की गयी फाइल अचानक सिस्टम के बंद हो जाने से सेव नहीं हो पायी। ऐसे में जरुरी नहीं कि वक्ता के शब्दशः प्रयोग यहां पर मौजूद हों लेकिन कोशिश है उन संदर्भों और भावों की जो कि वो व्यक्त करना चाह रहे थे। वाबजूद इसके अगर कहीं कोई गलती और अलग अर्थ प्रेषित हो रहे हों तो आप सबसे,खासकर वहां मौजूद ब्लॉगरों से अनुरोध है कि आप कमेंट करें जिसे पढ़कर हम तत्काल दुरुस्त कर देंगे।&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6898673550088047104-8716668046332089614?l=taanabaana.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://taanabaana.blogspot.com/feeds/8716668046332089614/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.blogger.com/comment.g?blogID=6898673550088047104&amp;postID=8716668046332089614' title='33 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6898673550088047104/posts/default/8716668046332089614'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6898673550088047104/posts/default/8716668046332089614'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://taanabaana.blogspot.com/2009/10/blog-post_25.html' title='तो इस तरह खत्म हुआ इलाहाबाद का ब्लॉग मंथन'/><author><name>विनीत कुमार</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09398848720758429099</uri><email>vineetdu@gmail.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' name='OpenSocialUserId' value='01281586745461734077'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_uS1XY77Y4b8/SuQP4ApC9UI/AAAAAAAABUw/0kpLw1dnabU/s72-c/session.jpg' height='72' 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alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5395906191112295458" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-style:italic;"&gt;अचानक पाबंदियों के टूटने से भी दम घुटने लगता है,अनंत आजादी कई बार अराजक स्थिति पैदा करते हैं। इसलिए चिट्ठाकारी पर जब भी हम बात करते हैं तो स्वतंत्रता और स्वच्छंदता के बीच के फर्क को समझना होगा। चिट्ठाकारी में जो कुछ भी कर रहे हैं उसके साथ हर हाल में जिम्मेदारी का एहसास भी होना चाहिए। आदमी जब बोलता है तो कुछ भी बक देता है लेकिन लिखते वक्त हम ऐसा नहीं कर सकते। बोलने से जीभ नहीं कटती लेकिन लिखने से हाथ कट जाता है। हमें ये बात नहीं भूलनी चाहिए कि आजाद अभिव्यक्ति के नाम पर जो कुछ भी चिट्ठाकारी की दुनिया में लिखा जा रहा है,इसके बीच एक स्टेट मशीनरी भी है। आनेवाले समय में ये राज्य लिखने के मामले में दखल करे इससे पहले ही चिठ्ठाकारों को चाहिए की वो अपनी जिम्मेदारी को समझते हुए स्वयं अनुशासित हों। इलाहाबाद में &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;चिठ्ठाकारी की दुनिया&lt;/span&gt; विषय पर आयोजित दो दिनों की राष्ट्रीय संगोष्ठी का उद्घाटन करते हुए &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;नामवर सिंह&lt;/span&gt; ने ब्लॉगिंग को आजादी की अनंत दुनिया मानकर सिलेब्रेट करनेवाले ब्लॉगर समाज को इस पक्ष से भी सोचना जरुरी बताया। नामवर ने इस मौके पर इस शहर को ऐतिहासिक करार दिया कि कभी इसी शहर से हिन्दी के आंदोलन की शुरुआत हुई थी और आज फिर इसी शहर ने हिन्दी के नए रुप चिठ्ठाकारिता पर पहली बार राष्ट्रीय स्तर की संगोष्ठी आयोजित की है। &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;नामवर सिंह&lt;/span&gt; की ही बात को आगे बढ़ाते हुए &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;महात्मा गांधी अन्तर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय &lt;/span&gt;के कुलपति &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;विभूति नारायण राय &lt;/span&gt;ने कहा कि-हमें पता है कि जब स्टेट इस तरह के किसी भी मामले में दखल करती है तो उसका रवैया किस तरह का होता है? ऐसे मसले में ब्यूरोक्रेसी नियंत्रण के नाम पर किस तरह का व्यवहार करती है,ये सब हमें समझना होगा। उन्होंने इन्टरनेट के जरिए अपार सूचना प्रसारित किए जाने के सवाल पर कहा कि जो भी इन्फार्मेशन आ रहे हैं उनमें नॉलेज एलीमेंट कितना है,इस सिरे से भी सोचने की जरुरत है? शुरुआत में जिस तरह टेलीविजन के आने से लगा कि अखबार और पत्रिकाएं अपना महत्व खो देंगी वैसी ही चर्चा ब्लॉग के बारे में की जा रही है लेकिन ऐसा नहीं है। मंच पर आसीन लोग जब बारी-बारी से ब्लॉग के जरिए अराजक स्थिति पैदा करने की बात कर रहे थे,ऐसे में &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;संतोष भदौरिया&lt;/span&gt; ने स्पष्ट किया कि इसके लिए ब्लॉगर या मॉडरेटर कम दोषी है। इसके लिए दोषी वो कुंठासुर बेनामी टिप्पणीकार जिम्मेदार हैं जो कि बेतुकी बातें करके निकल लेते हैं। अभिव्यक्ति के नाम पर अराजकता और छिछोरेपन के सवाल को पूरे दिन तक ब्लॉगर और गैर-ब्लॉगर मौके-बेमौके प्रमुखता से उठाते रहे।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/_uS1XY77Y4b8/SuIgC8_eo2I/AAAAAAAABTw/m5PYpkXAO2A/s1600-h/raviratlami.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 244px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_uS1XY77Y4b8/SuIgC8_eo2I/AAAAAAAABTw/m5PYpkXAO2A/s320/raviratlami.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5395910538647479138" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;प्रथम सत्र में आकादमिक मिजाज की औपचारिकता पूरे होने के बाद हिन्दी ब्लॉगिंग के गुरु कहे जानेवाले &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;रवि रतलामी&lt;/span&gt; ने पॉवर प्वाइंट प्रजेंटेशन के जरिए ब्लॉग से जुड़े विविध मसलों पर अपनी बात रखी। उन्होंने ग्राफिक्स के जरिए स्पष्ट किया कि आनेवाला समय इंटरनेट का है और ब्लॉगिंग में अनंत संभावनाएं हैं। लेकिन उन्होंने ये भी स्पष्ट किया कि ब्लॉगिंग के कई तरह के नुकसान भी है और हमें इससे सतर्क रहने की जरुरत है। &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;रवि रतलामी&lt;/span&gt; कल ब्लॉगिंग के तकनीकी पक्षों पर विस्तार से चर्चा करेंगे। प्रथम सत्र का एक महत्वपूर्ण पहलू रहा कि इसमें &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;हिन्दुस्तानी एकेडमी&lt;/span&gt; की ओर से प्रकाशित,&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी&lt;/span&gt; की किताब &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;ब्लॉग जगत का एक झरोखा सत्यार्थमित्र&lt;span style="font-style:italic;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt; का लोकार्पण भी किया गया।  इस किताब में उनके ब्लॉग की चुनी हुई पोस्टें शामिल हैं। इस किताब पर मशहूर ब्लॉगर &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;ज्ञानदत्त पाण्डेय&lt;/span&gt; ने ब्राउसर के जरिए प्रेषित किया कि-अगर आपके पास पहले से उपलब्ध अनुभव,भाषा पर पकड़ और नैसर्गिक रुप में'कम से अधिक'अभिव्य्त करने की क्षमता नहीं है तो आप सफल ब्लॉगर नहीं हो सकते। &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;सिद्धार्थ&lt;/span&gt; को हिन्दी ब्लॉगिंग में सफलता में सफलता,शंका की कोई गुंजाइश नहीं छोड़ती। कुल मिलाकर  ब्लॉगरों के बीच ये सत्र गैर-ब्लॉगरों की ओर से नैतिक निर्देश का एहसास कराने और सांकेतिक रुप से संस्कारित किए जाने की कोशिशों के तौर पर याद किया जाएगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दूसरे सत्र में &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;विचार अभिव्यक्ति का नया आयाम&lt;/span&gt; पर विमर्श करने के लिए हम &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;हिन्दुस्तानी अकादमी&lt;/span&gt; की बिल्डिंग से दूरस्त &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;महात्मा गांधी अन्तर्राष्ट्रीय विश्वविद्यालय &lt;/span&gt;के इलाहाबाद सेंटर पर जमा हुए।। इस सत्र में देश के अलग-अलग हिस्सों से आए करीब 35 ब्लॉगरों ने शिरकत की और इलाहाबाद के करीब 12 ब्लॉगर मौजूद थे।  ब्लॉगरों के औपचारिक परिचय के दौर ने काफी समय ले लिया। शोर-शराबे के बीच इस परिचय का शायद ही बहुत लोगों को लाभ मिला होगा। खराब ऑडियो क्वालिटी, लोगों की आपसी कानाफूसी और लगातार आवाजाही के बीच विमर्श के लिए जो माहौल बनने चाहिए वो नहीं बन पाया। इसी माहौल में बारी-बारी से आज के ब्लॉगर-वक्ताओं ने अपनी बातें रखीं। इस दूसरे सत्र का संचालन &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;फुरसतिया&lt;/span&gt; नाम से मशहूर ब्लॉगर &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;अनूप शुक्ल&lt;/span&gt; ने किया। &lt;br /&gt;पहले वक्ता के तौर पर चर्चित पोर्टल &lt;span style="font-style:italic;"&gt;भड़ास4मीडिया&lt;/span&gt; के मॉडरेटर &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;यशवंत सिंह&lt;/span&gt; ने ब्लॉगिंग में &lt;span style="font-style:italic;"&gt;अभिव्यक्ति के खतरे&lt;/span&gt; पर बातचीत करते हुए कहा कि शुरुआत में जब भड़ास को लेकर शिकायतें आनी शुरु हुई तब हमने व्यवस्थित तरीके से &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;भड़ास4मीडिया&lt;/span&gt; शुरु किया और उसके बाद गाय समझी जानेवाली मीडिया के भीतर के सफेद-स्याह को सामने लाने की कोशिशें की। बड़ी मीडिया जिस तरह से बड़ी खबरों को दबाने का काम करती है,हमारी कोशिश होती है कि हम उन पक्षों को सामने लाएं। हमें कई तरह से लोग सलाह देने का काम करते हैं किसी की इच्छाएं भली होती है तो किसी का बहुत ही खतरनाक लेकिन मेरा मानना है कि हम अगर अपना काम ईमानदारी से कर रहे हैं तो किसी भी तरह का फर्क नहीं पड़ता। &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;यशवंत&lt;/span&gt; ने ब्लॉग के मॉनिटरी पहलूओं को बहस के बीच शामिल किया जाना अनिवार्य बताया। उन्होंने कहा कि पैसे पर बात करने के मामले में हिन्दी समाज पिछड़ा रहा है औऱ इस पर गंभीरता से बीत होनी चाहिए।&lt;br /&gt; &lt;span style="font-style:italic;"&gt;अभिव्यक्ति के नए माध्यम&lt;/span&gt; पर बात करने आयी &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;मीनू खरे&lt;/span&gt; ने अपना पूरा समय ब्लॉग के इतिहास,अभिव्यक्ति के संवैधानिक प्रावधानों के वर्णन में खपा दिया। उनकी प्रस्तुति से ब्लॉग-इतिहास की एक अच्छी समझ बनने की संभावना हो सकती थी लेकिन एक तो विषय से भटक जाने औऱ दूसरा कि &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;रवि रतलामी&lt;/span&gt; की ओर से पहले ही सत्र में इन सब बातों पर चर्चा कर दिए जाने की वजह से ऑडिएंस ने कोई दिलचस्पी नहीं दिखायी और कुछ भी निकलकर सामने नहीं आने सका। जबकि मीनू ने आते ही घोषणा की थी कि बात निकली है तो बहुत दूर तलक जाएगी।&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;बोधिसत्व&lt;/span&gt; ने ब्लॉग के मुद्दे पर अपनी बात रखते हुई ये स्वीकार जरुर किया कि इसके जरिए हमारे परिचय का दायरा बढ़ा है लेकिन ब्लॉग में बहस की गुंजाइश है,इस बात से वो साफ इन्कार करते हैं। उनका मानना है कि ब्लॉग बहस का प्लेटफार्म नहीं है। आप कुछ भी लिख लो,बात करना चाहो लेकिन वो कमेंट के जरिए पर्सनल छींटाकशी में उलझकर रह जाता है। इसलिए मैं संस्मरण लिखता हूं,ब्लॉग बहुत ही अघाए हुए लोगों के हाथ में फंसा हुआ नजर आता रहा है जिनके हाथ में ब्लॉग के लिए हाथ में कम से कम 1000 रुपये हैं। खिले हुए चेहरे ही अधिक शामिल होता जा रहा है। इसे मैं अच्छे दिनों को याद करने का माध्यम मानता हूं और इसे अपनी निजी डायरी के तौर पर देखता हूं।&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;मोहल्ला&lt;/span&gt; के मॉडरेटर &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;अविनाश&lt;/span&gt; के ये कहने पर कि मैं अनामी टिप्पणीकारों का समर्थन करता हूं,एक तरह से पूरे सदन में हंगामा मच गया। आगे बैठे कुछ लोगों ने व्यक्तिगत तौर पर बातें करनी शुरु कर दी। उन्होंने कहा कि महौल इतनी अनौपचारिक हो जाएगी इसी उम्मीद नहीं थी। इतने वेपरवाह हो जाएंगे इसकी उम्मीद नहीं थी। यहां उद्घाटन सत्र से लेकर विषय से फोकस्ड सत्र में भी कक्षा की तरह से बात कर रहे हैं. मुझे लगता है कि &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;बोधिसत्व&lt;/span&gt; ने कहा कि खाए-पीए-अघाए लोगों के बीच फंसा हुआ है,वो फंसा हुआ है भले ही लेकिन पीपुल्स का मीडियम है। ये पूंजी का माध्यम नहीं है।&lt;br /&gt;हिन्दी में ब्लॉगिंग की कवायद पारिवारिक की तरह रही है। ये पीपुल्स मीडियम है,इसी हिसाब से उसे बात करनी चाहिए। सही नाम से बात करने से कई तरह की परेशानी हो सकती है। स्टेट से सुरक्षित रहते हुए अपनी बात करनी होती है। मैं बेनामी का समर्थक हूं। ट्रेडिशनल मीडिया के पास पूरे वाक्य है,उसके पास पूरा व्याकरण है। ये कानाफुसियों को दर्ज करने का माध्यम है। मैं इसमें डिक्टेट करने के पक्ष में नहीं हूं। मुद्दे की बात हो ही नहीं रही है। &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;अविनाश&lt;/span&gt; ने पूरे सत्र को लेकर निराशा जाहिर करते हुए कहा कि मेरे सामने &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;जनतंत्र डॉट कॉम&lt;/span&gt; के मॉडरेटर &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;समरेन्द्र &lt;/span&gt;मौजूद हैं,मैं चाहता हूं वो ब्लॉगजगत के कुंठासुर पर मेरी तरफ से शुरु की गयी बातचीत को आगे बढाएं।&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;समरेन्द्र&lt;/span&gt; ने अपनी बातचीत की शुरुआत प्रथम सत्र में विद्वानों की ओर से दिए गए वक्तव्यों को शामिल करते हुए की। उन्होंने कहा कि- &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;विभूति&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt; नारायण राय&lt;/span&gt; ने कहा कि जिम्मेदारी बहुत जरुरी है,राज्य जब दखल देगी तो आपलोग बहुत परेशान हो जाएंगे। सिस्टम हमेशा डराने-धमकाने का काम करते हैं। &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;नामवर&lt;/span&gt; ने कहा कि आप जिम्मेदार बनिए। क्या कोई चैनल जिम्मेदार है,आम आदमी की बात करता है। दूरदर्शन के पचास साल हो गए वो भी जिम्मेदार भी नहीं बन पाया।..क्यों नहीं कहेंगे हम? क्या उंगलियां नहीं उठेगी? आम आदमी नाम के साथ नहीं आएगा। हमें जिम्मेदार बनने की हिदायतें दी जा रही है। ऐसे कई उदाहरण हैं जिससे ये साफ होता है कि बेनामी ने अगर अपनी पहचान जारी कर दी तो स्टेट और मशीनरी शिकंजे कसना शुरु कर देती है। आम ब्लॉगर के लिए ये संभव ही नहीं है कि वो ये सबकुछ झेल पाए। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;समरेन्द्र &lt;/span&gt;की बात से असहमति जताते हुए &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;हर्षवर्धन&lt;/span&gt; ने कहा कि- मैं ब्लॉगिंग को वैकल्पिक मीडिया के तरह से देख रहा हूं। अनामी दस कदम आकर जाकर लड़खड़ा जाएगा। अगर ब्लॉग व्यक्तिगत होने लग जा रहा है तो माफ कीजिए इसका मुझे कोई बहुत बड़ा भविष्य नहीं दिखता है। हम मीडिया के बीच से एक रास्ता निकालने का काम कर रहे हैं। अगर हम इस ब्लॉग को सरोकार की मीडिया बनाना चाहते हैं तो हम उसके मददगार बने। एक बड़ा माध्यम बनने वाला है और मैं इस मुहिम के साथ हूं।&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;कॉफी हाउस&lt;/span&gt; नाम से ब्लॉग चलानेवाले &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;भूपेन&lt;/span&gt; ने अब तक की हुई बातचीत पर अपनी प्रतिक्रिया जाहिर करते हुए ब्लॉगिंग को थ्योराइज करने की जरुरत पर बल दिया। उन्होंने कहा कि-किस दिशा में ब्लॉग जाए इस पर बात करनी चाहिए।&lt;br /&gt;अविनाश ने मॉडरेटर की जरुरत को नकारा। ब्लॉग न्यू मीडिया का हिस्सा है। मेनस्ट्रीम मीडिया का क्या हाल है ये हमसे छिपा नहीं है। इसका मालिक कौन है इस पर भी हमें सोचना होगा। इसके रिच पर हमें बाक सोचनी होगी। अगर आप आजादी की बात कर रहे हैं तो आप गलतफहमी के शिकार हैं। किसने आपको स्पेस दिया,उसके पीछे की इकॉनमी को समझना पड़ेगा। किस क्लास की ऑडिएंस है इसे भी हमें समझना है। झारखंड के लोगों के लिए डेमोक्रेसी का मतलब अलग है और दिल्ली के लोगों के लिए डेमोक्रसी का अलग मतलब है। पीपुल्स मीडिया अभी नहीं हुआ है।&lt;span style="font-weight:bold;"&gt; समरेन्द्र&lt;/span&gt; ने कहा कि चाइल्डहुड में है लेकिन ये तर्क सही नहीं है। ये झूठ ठूंसा हुआ है। क्या वो वाकई चाइल्डहुड में है। उन्होंने इस संदर्भ में नोम चॉमस्की का भी रेफरेंस दिया और बताया कि किस तरह से पूंजीवाद माध्यम अपने पक्ष में माहौल बनाने का काम करते हैं,हमें इस बात को हमें समझना होगा। नए मीडिया को लेकर हमेशा शक रहा है। क्या ये राष्ट्रीय ब्लॉगिंग है,इन्टरनेशनल है,इस पर समझने की जरुरत है,ट्रांसनेशनल हैं,ये समझना है। हमे इसकी ऑनरशिप पर भी बात करनी होगी। ये मीडिया के कैरेक्टर को डिफाइन करता है। हमारे राष्ट्रीय मीडिया का चरित्र क्या होगा,इस पर बात करनी चाहिए। अंत में...मॉडरेटर पूरी आजादी नहीं देनी होगी,मॉडरेटर को अपनी जिम्मेदारी लेनी होगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;अपना घर&lt;/span&gt; की आभा मिश्रा ने पहले तो हताशा मगर बाद में उम्मीद जताते हुए कहा कि-लोग बहस नहीं करते,फैसले सुनाते हैं। मैं सही और तू गलत। बहस एकतरफा हो रही है.. लोग अपनी खुन्नस निकाल रहे हैं। सामनेवाले ब्लॉग की हत्या की कोशिश में लगे हैं लेकिन हमें उम्मीद है कि आनेवाला समय ऐसा नहीं होगा।&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;बेदखल की डायरी&lt;/span&gt; नाम से मशहूर ब्लॉग की संचालक &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;मनीषा पाण्डेय &lt;/span&gt;ने कहा कि-खास बात कहने को बची नहीं है।&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt; भूपेन&lt;/span&gt; की ही बात से कई गुत्थियां सुलझ गयी। एक हिन्दी समाज का प्रॉब्लम है। ब्लॉग में वही हो रहा है जो कि समाज में हो रहा है। जैसे घरों में बात हो रही है वैसी ही बात हो रही है। हमारी लड़ाई रचनात्मक होनी चाहिए। अच्छे इरादे होनी चाहिए. अभिव्कयक्ति के स्तर पर कई तरह की गहराई होनी चाहिए। सही इरादों से विरोध होने चाहिए जिससे कि कुछ लोगों की जुबान चुप हो सकें।..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अनामी को लेकर &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;मसीजीवी&lt;/span&gt; नाम से मशहूर ब्लॉगर &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;विजेन्द्र सिंह चौहान&lt;/span&gt; ने अपना खुला समर्थन दिया। उन्होंने कहा कि-&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;भूपेन&lt;/span&gt; ने जो सैद्धांतिक पृष्ठभूमि की बात की है उस पर बात करना जरुरी है। सैद्धांतिक आधार का होना अनिवार्य है। इससे पहले कि हमारे लिए कोई और सिद्धांत गढ़ने लगे इससे पहले जरुरी है कि हम खुद ही सिद्धांत गढ़ लें। बेनामी से बाहर जाकर सिद्धांत नहीं गढ़े जा सकते। मैंने भी इन गालियों को झेला है लेकिन फिर भी ब्लॉगिंग की परिभाषा में ये निहित है कि हम उसे शामिल है। बेनामी को जब हम बहिष्कृत कर देगें तो शिकंजा हमारा गले में हैं। कौन होता है बेनामी- सबसे बड़ा कारण स्वयं से डर। हम लगातार पॉलिटिकली करेक्ट होने का दावा झूठा करते हैं। एक भी मर्द नहीं है जो स्वीकार करे कि हम अपनी पत्नी को पीटते हैं। दूसरी बात,हम मानें या न माने लेकिन ये अर्थतंत्र हैं,हम इससे कमाएं या नहीं लेकिन हम कंटेट को कॉमोडिटी बनाते हैं। वो खरीदा जा रहा है बेचा जा रहा है। इंटरनेट पर जाकर हमारी पोस्ट प्रोडक्ट बन जाती है। तीसरा,हमने अब तक की सारी लड़ाइयां इकठ्ठे होकर लड़ी हैं। इस नयी व्यवस्था में इन्डीविजुअलिटी को सिलेब्रेट किया जा रहा है। जैसे ही हम ब्लॉगिंग को ब्लॉगिंग के नहीं रहने देने के पक्ष में जाकर खड़े हो जाते हैं,तभी तक हम राज्य की कठपुतलियों के शिकार हो जाते हैं।&lt;br /&gt;मशहूर ब्लॉगर&lt;span style="font-weight:bold;"&gt; इरफान&lt;/span&gt; का मानना रहा कि- ब्लॉग समाज का आइना है। कोई एक स्टिकयार्ड नहीं हो सकता है,हर को अपनी बात कहने की आजादी है।. आखिरकार एक रचना एक प्रयास की मांग करता है। सिर्फ वर्णमाला औऱ वाक्य रचना को जानकर आप लेखक नहीं बन सकते। बहुत दिलचस्प माध्यम है जिसमें मल्टीमीडिया का इस्तेमाल होता । ये अद्भुत माध्यम है। सवाल बहुत है लेकिन हम बद्ध होकर,व्यवस्थित तरीके से बात नहीं कर रहे हैं।&lt;span style="font-weight:bold;"&gt; सहारा चैनल &lt;/span&gt;के मालिक को सारा जगत सहारा लगने लगा है। छूकर मेरे दिल को किया तूने क्या इशारा, बदला ये मौसम लगे सहारा जग सारा,ये गीत गाते हैं।&lt;br /&gt;क्यों बंद किया गाने को अपलोड़ करने का काम टूटी हुई बिखरी हुई पर?मैं दूसरे के मजे के लिए अपने अर्काइव नहीं उपलब्ध करा सकता। लोग टीप करके अपनी बात कर देते। मेरे एक लोड़ किए गए गाने को 16 हजार लोगों ने डाउनलोड किया। सस्ता शेर की शायरी को उठा-उठाकर मोबाईल कंपनियां एसएमएस जोक बनाकर बाजार में बेच रही है। हम इस तरह अपने ह्यूमन पॉवर को क्यों जाया होने दें? मेरे पास एक रफ आइडिया है चेक करने के,आत्म नियंत्रण के समय मिला तो कल इसकी विस्तार से चर्चा करुंगा।&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;अफलातून&lt;/span&gt; ने खुले अंदाज में अपनी बात रखते हुए कहा कि- खुले विश्व के बंद होत दरवाजे- हिन्दुस्तान में मैंने एक लेख लिखा। कल हमसे सवाल-जबाब किए जाएंगे कि कहां से पैसा आ रहा है। विदेशों में ये काम शुरु हो गयी है। एक अंश में हम आत्म-मुग्धता के शिकार हैं।&lt;span style="font-weight:bold;"&gt; मसिजीवी&lt;/span&gt; ने जो पर्सनल होने की बात कही है,ये बहुत खतरनाक बात है। इमरजेंस एक ग्रंथ है इंटरनेट और चीतों को लेकर अध्ययन पक्षियों को लेकर जो व्यवहार है,वही व्यवहार है इंटरनेट की दुनिया में।। चींटे का व्यवहार और झुण्ड का व्यवहार वैसे ही इन्टरनेट पर एक प्रयोक्ता का व्यवहार है। हमें सही दिशा में बातों को ले जाएं ये बहुत जरुरी है।&lt;span style="font-weight:bold;"&gt; इ-स्वामी&lt;/span&gt;,&lt;span style="font-weight:bold;"&gt; इ-पंडित&lt;/span&gt; की चर्चा इन्होंने भी अनामी थे...हमें इनके योगदान को भी नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। बेनामी टिप्पणियां अगर सकारात्मक तौर पर हो तो फिर उसमें क्या आपत्ति हो सकती है। अभी ब्लॉगिंग हम कोई क्रांतिकारी नजरिया नहीं आ रहा है। टेक्नीकली सीख लिए और निपट दिए। जरुरी है कि एक सामूहिक घोषणा जारी हो..इलाहाबाद से एक घोषणा जारी हो।&lt;span style="font-weight:bold;"&gt; वीकीपीडिया&lt;/span&gt; में योगदान करने की जरुरत  है। इसे हिन्दू वीकीपिडिया या मुस्लिम वीकिपीडिया नहीं बनने दें। हमें जिम्मेदारी तो हर हाल में निभानी होगी।&lt;br /&gt; अब ब्लॉग पर कायदें की बहसें नहीं होती। जब तक पहुंचता हूं तब तक धूल उड़ती नजर आती है। मेरे ब्लॉग पर ऐसा कुछ नहीं होता कि बेनामी कमेंट किए जाएं लेकिन करते हैं और भद्दे तरीके से करते हैं। ब्लॉगिंग ने भाषा का कोई नया मुहावरा नहीं रचा है। &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;अजीत वडनेरकर&lt;/span&gt; को आज ही गाड़ी से दिल्ली जाना था इसलिए उन्होंने बहुत ही संक्षेप में अपनी बात रखते हुए संभावनाओं की तरह बढ़ने पर जोर दिया।&lt;br /&gt;कलकत्ता से आए &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;प्रियंकर &lt;/span&gt;ने कहा कि- मैं बेनामी पर कहना चाहूंगा। किसी से हर समय नाम की उम्मीद करना सही नहीं है। ये अतिरिक्त मांग है। पचास प्रतिशत यानी आधे ब्लॉगर्स को एक जन्म और लेना पड़ेगा&lt;span style="font-weight:bold;"&gt; अनामदास&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;,सृजनशिल्पी&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;,ई-स्वामी &lt;/span&gt;और&lt;span style="font-weight:bold;"&gt; घुघूती बासुती&lt;/span&gt; जैसा लिखने के लिए  ये अपनी पहचान नहीं बताना चाहते तो क्या दिक्कत है? इन्होंने बहुत ही बेहतर तरीके से लिखा है। बेनामी कोई बहुत बड़ा मुद्दा नहीं है। असल चीज है कि कंटेंट पर बात होनी चाहिए। अगर वो छद्म नाम से लिखते हों तो क्या दिक्कत है।&lt;br /&gt;ब्लॉगरों के अतिरिक्त इस सत्र में इसी विश्वविद्यालय के पत्रकारिता विभाग से एम.फिल कर रही एक स्टूडेंट &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;उमा साह&lt;/span&gt; ने बताया कि उसने ब्लॉग की भाषा पर रिसर्च किया है और वो इस नाते अपनी बात रखना चाहती है। उन्होंने कहा कि ब्लॉग में अभी भी किसी भी तरह की सेंसरशिप नहीं है इसलिए इसमें मुख्यधारा की मीडिया से बहुत आगे जाने की गुंजाइश है और इसे भी हमें चौथे खंभे के तौर पर विकसित किए जाने चाहिए।&lt;br /&gt;अलग-अलग मौके पर उठापटक के बीच ये सत्र यहीं समाप्त होता है। रातभर की यात्रा की वजह से बुरी तरह थका हूं। कल  &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;ब्लॉगःभाषा और संप्रेषणीयता&lt;/span&gt; के सवाल पर मुझे अपनी बात रखनी है। &lt;span style="font-style:italic;"&gt;आपसे माफी मांगते हुए कि मैंने कई जगह बिना बारीकी से पढ़ते हुए सत्र के दौरान टाइप की गई लाइनों को चस्पा दिया है। आप उन्हें सुधारकर पढ़ लेंगे। मैं और मेहनत करने की स्थिति में बिल्कुल नहीं हूं। इन सबके बीच दुखद पहलू है कि जिस डिजिटल रिकार्डर से मैं अब तक आपके लिए संगोष्ठियों के ऑडियो वर्जन उपलब्ध कराता रहा वो सभागार की डेस्क पर से सत्र खत्म होने के साथ ही गायब हो गया। एक भावनात्मक जुड़ाव और आर्थिक क्षति की वजह से परेशान हूं। मूड़ खराब है,खुश होने के लिए इतना है कि इलाहाबाद में खाने की व्यवस्था बड़ी दुरुस्त है,मेरे हॉस्टल मेस से कई गुना बेहतर।..&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6898673550088047104-7706901911867425910?l=taanabaana.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://taanabaana.blogspot.com/feeds/7706901911867425910/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.blogger.com/comment.g?blogID=6898673550088047104&amp;postID=7706901911867425910' title='36 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6898673550088047104/posts/default/7706901911867425910'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6898673550088047104/posts/default/7706901911867425910'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://taanabaana.blogspot.com/2009/10/blog-post_23.html' title='इलाहाबाद में ब्लॉग मंथन  शुरु'/><author><name>विनीत कुमार</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09398848720758429099</uri><email>vineetdu@gmail.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' name='OpenSocialUserId' value='01281586745461734077'/></author><media:thumbnail 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height: 320px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_uS1XY77Y4b8/SuAwAiWFUdI/AAAAAAAABS4/BZG6WE1xsw0/s320/dd1.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5395365139367416274" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/_uS1XY77Y4b8/SuAv2A-DM5I/AAAAAAAABSw/WiApkIWRNwY/s1600-h/ddd2.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 282px; height: 320px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_uS1XY77Y4b8/SuAv2A-DM5I/AAAAAAAABSw/WiApkIWRNwY/s320/ddd2.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5395364958609552274" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;महात्मा गांधी अन्तर्राष्ट्रीय विश्वविद्यालय की ओर से &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;चिठ्ठाकारी की दुनिया&lt;/span&gt; पर दो दिनों की आयोजित(अक्टू 23-24)की जानेवाली राष्ट्रीय संगोष्ठी में शामिल होनेवाले ब्लॉगरों की सूची इलाहाबाद के आयोजकों की ओर से भेजी गयी है। ये सूची फोटो फार्मेट में है जिसे कि समय की कमी की वजह से हम स्कैन करके लगा दे रहे हैं। मेरी इच्छा थी की सभी ब्लॉगरों के ब्लॉग लिंक भी साथ में डाल दें ताकि आप एक नजर में उनके ब्लॉग को भी देख सकें। लेकिन हमें खुद भी पैकिंग करनी है और समय भी कम है इसलिए माफ करेंगे,हम ऐसा नहीं कर पा रहे हैं। इंटरनेट ने साथ दिया तो हम इलाहाबाद से ही लाइव ब्लॉगिंग करते रहेंगे जिससे कि आपको वहां होनेवाले विमर्शों की खबर तत्काल मिलती रहे।.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6898673550088047104-4796806912891393386?l=taanabaana.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://taanabaana.blogspot.com/feeds/4796806912891393386/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.blogger.com/comment.g?blogID=6898673550088047104&amp;postID=4796806912891393386' title='9 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6898673550088047104/posts/default/4796806912891393386'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6898673550088047104/posts/default/4796806912891393386'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://taanabaana.blogspot.com/2009/10/blog-post_9206.html' title='इलाहाबाद से भेजी गयी ब्लॉगर्स सूची।'/><author><name>विनीत कुमार</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09398848720758429099</uri><email>vineetdu@gmail.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' name='OpenSocialUserId' value='01281586745461734077'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_uS1XY77Y4b8/SuAwAiWFUdI/AAAAAAAABS4/BZG6WE1xsw0/s72-c/dd1.jpg' height='72' width='72'/><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>9</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6898673550088047104.post-8966499093619802888</id><published>2009-10-22T09:39:00.005+05:30</published><updated>2009-10-22T10:39:54.764+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='allahabad'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='hindi bhasha'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='hindi blogging'/><title type='text'>कल देशभर के ब्लॉगरों का,इलाहाबाद में होगा संगम</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://1.bp.blogspot.com/_uS1XY77Y4b8/St_l19xUXOI/AAAAAAAABSg/gIQDq8Wg8Qc/s1600-h/blogging.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 214px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_uS1XY77Y4b8/St_l19xUXOI/AAAAAAAABSg/gIQDq8Wg8Qc/s320/blogging.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5395283593890389218" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-style:italic;"&gt;हम जैसे हजारों ब्लॉगर जो कि महीनों-सालों से कीबोर्ड पर किचिर-पिचिर करते आ रहे हैं, जो कि बौद्धिक समाज के लिए लेखन के नाम पर गंध फैलाने का काम है, आज उसे देश के एक अकादमिक संस्थान ने हिंदी की सेवा करने का नाम दिया है। कल से इलाहाबाद में महात्मा गांधी अंतर्राष्‍ट्रीय विश्वविद्यालय की ओर से हिंदी चिट्ठाकारी की दुनिया पर आयोजित दो दिनों की (23-24 अक्टूबर) होनेवाली राष्ट्रीय संगोष्ठी का मेल के जरिये जो हमें न्योता मिला है, उसमें लिखा एक वाक्य है कि – इस आयोजन की सफलता ब्‍लॉग लेखन के माध्यम से हिंदी की सेवा कर रहे आप जैसे सक्रिय चिट्ठाकारों की सहभागिता पर निर्भर करती है। इस एक लाइन को पढ़कर थोड़ा इमोशनल हो गया और कुछ लाइनें लिख मारी है। आप भी पढ़ें और अपनी राय दें-&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वैसे तो मेरी तरह हिंदी ब्लॉग समाज का शायद ही कोई ब्लॉगर हो जो कि अपने ऊपर किसी भी तरह के धर्मार्थ का लेबल लगाये जाने का मोहताज रहा है, इस मुगालते में जी रहा हो कि दिनभर खटने के बाद घंटे-आध घंटे के लिए जो कीबोर्ड खटखटाने का काम कर रहा है, उसके बूते उसे हिंदीसेवी होने का तमगा मिल जाए लेकिन हमारे इस काम को अगर कोई सेवा का नाम दे रहा है तो इसे हम घलुए में मिली हुई चीज़ मानकर थोड़ी देर के लिए तो ज़रूर खुश हो सकते हैं। सच कहूं, हम अब भी यही मानते हैं कि हमने कभी भी इस एजेंडे के तहत नहीं लिखना शुरू किया कि हम कोई सेवा का काम करने जा रहे हैं। बल्कि हमने तो सिर्फ इसलिए लिखना शुरू किया कि लिखते नहीं तो और क्या करते? मूंछ उगने के बाद से सात-आठ साल तक साहित्य और मीडिया के जरिये जिन भावों, शब्दों, अनुभूतियों और स्थितियों को जाना-समझा, उसे कहां फेंक आते। जिस बात को कभी मजाक में कहता रहा कि कब तक हम दूसरों का लिखा पढ़ते रहेंगे, उसे आज शिद्दत से महसूस करता हूं। हिंदी में रहकर सिर्फ लिख कर तो लेखक होने से रहे। फिर हम जैसे लफुआ की बात को छापनेवाला कौन सा कोई प्रकाशक मिल जाएगा? न्यूज रूम में हमारे साथ जो भी हुआ, अभावग्रस्त बचपन, नकारे हुए टीन एज और पानी खाती जाती जवानी जो बाकी साथियों के साथ अब भी जारी है, उसकी भड़ास लिखकर नहीं निकालते तो और क्या करते। अपने को नैतिक न भी मानें तो हम उस हैसियत तक कब तक पहुंचते कि रंगीन पानी पीकर बकना शुरू कर देते और फिर उस पर बौद्धिकता का मुलम्‍मा चढ़ाने में कामायाब हो जाते, हम कब उतना बड़ा कद हासिल करते कि नामी बनिया का मैल भी बिकता है के तहत लिखे जानेवाले साहित्य को अनर्गल करार देते। यकीन मानिए, तब तक तो हम बुढ़ा जाते। इसलिए हमने कभी भी कागजों पर अपनी हिस्सेदारी की मांग नहीं की। अलाय-बलाय (उल्टी-सीधी) लिख-छापकर नामचीन लोग महान होने के दावे करते रहे, हमने कभी भी उसका प्रतिकार नहीं किया। हम उनके महान होने में कभी भी अड़चन बनकर सामने नहीं आये। हमने बस इतना किया कि किसी तरह से काट-कपटकर पैसे जमा किये, लिखने का औज़ार ख़रीदा और अब पान-बीड़ी की लत न पालकर, मुंह में लेई लगाकर महीने में सात सौ-आठ सौ रुपये इंटरनेट का बिल भर रहे हैं और अपने एक-एक एहसासों को कंप्‍यूटर की कुंजियों पर पटकते जा रहे हैं। इसे आप हमारी कुंठा कहिए, फ्रस्ट्रेशन कहिए, बौड़ाहापन कहिए… जो जी में आये कहिए, न जी में आये मत कहिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ब्लॉगिंग करते हुए हमने कभी नहीं सोचा कि हम कोई गंभीर काम कर रहे हैं। वैसे भी अपने छुटपन को याद करना, मां की यादों में नास्टॉल्जिक हो जाना, हिंदी समाज पर लिखना और फिर जूते खाना, मीडिया संस्थानों की कमज़ोर नब्ज पर लिखकर धमकियां झेलना, ऑफिस में आप बलत्कार करते हैं या फिर सुहागरात मनाते हैं – पुरुष समाज से एक स्त्री का सवाल करना और प्राइम टाइम में आनेवाले एंकर का टेलीविजन को खुद ही गोबर का पहाड़ बताना… ये सब बौद्धिक समाज के लिए कब से गंभीर काम होने लगा? हमारे भाषाई स्तर के बेहयापन (जिसे कि अभी-अभी चैट बॉक्स पर अजय ब्रह्मात्मज ने कहा कि हम दो जुबान के लोग नहीं है, लिखने और बोलने के अलग-अलग) ने हमें बौद्धिक समाज के आगे और नीचा गिरा दिया। हमने चपर-चपर करना नहीं छोड़ा और सभ्य कहलाने से रह गये। हम भाषा के स्तर पर मोहल्लेपन के शिकार हो गये। हम चौराहे पर की जुबान में लिखने लग गये, इसलिए उनके बीच लील लिये गये। अब हवन जैसे पवित्र काम में जसधारी लोग एक-एक मुठ्ठी होम डालते हैं, वैसे ही सब कूड़ा है सब कूड़ा है कहते हुए इस समाज ने हमारे ऊपर लानते-मलानतें डाली। हम और कूड़ा लिखने लग गये। इस भाषाई कूड़ापन के बीच हमारे अनुभव, तेवर, समझ, खरा-खरा और सच्चापन दब गये। एक शब्द और वाक्य को पकड़कर ऐसे बैठ गये कि करतल ध्वनि से हमें वाहियात, बेकार, बकवास करार देने में बहुत अधिक मेहनत नहीं करनी पड़ी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन, जब आयोजकों की ओर से हमें प्रस्तावित विषय भेजे गये तो हमें ही नहीं शायद औरों को भी ताज्जुब हो रहा होगा कि क्या हमने रोज़मर्रा की किचिर-पिचिर के बीच सोचने और विचार करने के इतने संदर्भ बिंदु पैदा कर दिये? यक़ीन न हो तो आप ही देखिए न कि किस तरह से ये प्रस्तावित विषय सूची इस बात का इशारा करती है कि देश के औसत समझ के पढ़े-लिखे लोगों ने सिर्फ पांच-छह सालों में विमर्श के इतने आधार खड़े कर दिये कि इस पर महीनों बहस चल सकती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;1. हिंदी चिट्ठाकारी : इतिहास, स्वरूप और तकनीक&lt;br /&gt;2. अंतर्जाल पर हिंदी भाषा : कुशल प्रयोग के औजार, ब्‍लॉग बनाने की तकनीक और प्रबंधन&lt;br /&gt;3. हिंदी चिट्ठाकारी पर बहस के मुद्दे&lt;br /&gt;4. चिट्ठाकारी की भाषा बनाम संप्रेषणीयता&lt;br /&gt;5. अंतर्जाल पर हिंदी साहित्य और पठनीयता&lt;br /&gt;6. चिट्ठाकारी : समय प्रबंधन एवं उपादेयता&lt;br /&gt;7. अभिव्यक्ति की उन्मुक्तता एवं इसमें निहित खतरे&lt;br /&gt;8. ब्‍लॉग जगत के कुंठासुर/बेनामी या छद्मनामी टिप्पणीकार।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और अंत में, देर रात संतोष भदौरिया ने फोन करके बताया कि हमने टिकट मेल कर दी है, तो अपने उतावलेपन का शिकार होते हुए पूछ बैठा – और कौन-कौन आ रहे हैं सर? वो प्रदेश के क्रम से गिनाने लग गये। दिल्ली से अविनाश, मसिजीवी, यशवंत, समरेंद्र, रियाज़ुल हक़, इरफान, भोपाल से मनीषा पांडे, मुंबई से यूनुस खान, कानपुर से अनूप शुक्ल… तभी मैंने कहा – रुकिए सर मैं एक-एक करके नोट करता हूं। तब उन्होंने इस वायदे के साथ कि कल वो ऑफिस पहुंचते ही पूरी सूची मेल करेंगे, कहा कि हम चाहते हैं कि पूरी बातचीत बिना किसी औपचारिकता के हो। अभी-अभी पोस्ट लिखते समय जानकारी मिली है कि इस चिट्ठाकारी की दुनिया पर विमर्श के लिए नामवर सिंह स्टार एपियरेंस के तौर पर मौजूद होंगे। हम इस संकेत को किस रूप में लें कि अकादमिक संस्थान भी अगर ब्लॉग पर विमर्श के लिए अपने को तैयार कर रहा है और वो भी बिना औपचारिक हुए तो इसका मतलब ये है कि वो हिंदी में ज्ञान पैदा करने के लिए ब्लॉगिंग को अनिवार्य मानने लग गया है या फिर अब तक हमने जो कुछ लिखा उसे सामूहिक तौर पर मथकर वैचारिकी की एक नयी दुनिया की तलाश करना चाहता है… क्या ये इस बात का संकेत है कि आनेवाले समय में ज्ञान की खिड़कियां इनफॉर्मल राइटिंग और बौद्धिक चिंतन के बीच में जाकर खुलेगी और पढ़ने-पढ़ाने का एक नये किस्म का फ्यूजन वर्ल्ड पैदा होगा। आप क्या सोचते हैं, कुछ हमें भी तो बताएं।&lt;br /&gt;मूलतः प्रकाशित- &lt;a href="http://mohallalive.com/2009/10/22/vineet-kumar-writeup-on-blogging-seminar/"&gt;मोहल्लालाइव&lt;/a&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6898673550088047104-8966499093619802888?l=taanabaana.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://taanabaana.blogspot.com/feeds/8966499093619802888/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.blogger.com/comment.g?blogID=6898673550088047104&amp;postID=8966499093619802888' title='15 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6898673550088047104/posts/default/8966499093619802888'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6898673550088047104/posts/default/8966499093619802888'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://taanabaana.blogspot.com/2009/10/blog-post_22.html' title='कल देशभर के ब्लॉगरों का,इलाहाबाद में होगा संगम'/><author><name>विनीत कुमार</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09398848720758429099</uri><email>vineetdu@gmail.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' name='OpenSocialUserId' value='01281586745461734077'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_uS1XY77Y4b8/St_l19xUXOI/AAAAAAAABSg/gIQDq8Wg8Qc/s72-c/blogging.jpg' height='72' width='72'/><thr:total 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src="http://2.bp.blogspot.com/_uS1XY77Y4b8/St1eRzPbBWI/AAAAAAAABSY/cHWf0yumiX4/s400/%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%A8+copy.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5394571588565402978" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-style:italic;"&gt;डीडीडीएलएज यानी दिलवाले दुल्हनियां ले जाएंगे,मां के साथ देखी गयी मेरी आखिरी फिल्म। आज इस फिल्म के रिलीज हुए चौदह साल हो गए। इस फिल्म के बहाने अगर हम पिछले चौदह साल को देखना-समझना चाहें तो कितना कुछ बदल गया,कितनी यादें,कितनी बातें,बस यों समझिए कि अपने सीने में संस्मरणों का एक पूरा का पूरा पैकेज दबाए इस दिल्ली शहर में जद्दोजहद की जिंदगी खेप रहे हैं। पर्सनली इसे मैं अपनी लाइफ का टर्निंग प्वाइंट मानता हूं।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;मां के साथ देखी गयी ये आखिरी फिल्म थी जिसे कि मैंने रत्तीभर भी इन्ज्वॉय नहीं किया। आमतौर पर जिस भी सिनेमा को मैंने मां के साथ देखा उसमें सिनेमा के कथानक से सटकर ही मां के साथ के संस्मरण एक-दूसरे के समानांतर याद आते हैं। कई बार तो मां के साथ की यादें इतनी हावी हो जाया करतीं हैं कि सिनेमा की कहानी धुंधली पड़ जाती है लेकिन डीडीएलजे के साथ मामला दूसरा ही बनता है। इतनी अच्छी फिल्म जिसे कि मैंने बाद में महसूस किया,मां के साथ देखने के दौरान मैंने तब तीन बार कहा था-चलो न मां,बुरी तरह चट रहे हैं। वो बार-बार कहती कि अब एतना तरद्दुत करके,पैसा लगाके आए हैं त बीच में कैसे उठ के चल जाएं और जब शंभूआ को पता चलेगा कि चाची के चक्कर में टिकट के लिए बुशट फडवा दिए और उ है कि बीचै में चल आई उठकर त क्या सोचेगा,बढ़िया नय लग रहा है त आंख मूंदकर सुस्ता लो हीये पर? सिनेमा में सिमरन और राज के बीच टूर के दौरान जो भी लीला-कीर्तन हो रहा था,ये सब मां को भी अच्छा नहीं लग रहा था लेकिन उसके बाद वो ऐसे रम गयी कि एक बार मेरी तरफ ताकना भी जरुरी नहीं समझा। हम थे कि कूदकर सिनेमा हॉल से भागना चाह रहे थे। हमारे लिए ये सिनेमा जले पर नमक छिड़कने जैसा था जिसकी जलन को मां के शब्दों में परपराना कहते हैं।&lt;br /&gt;सिनेमा रिलीज होने के दो दिन पहले हमलोग सात दिनों की ट्रिप से झारखंड के अलग-अलग जगहों से घूमकर वापस लौटे थे। पूरे स्कूली जीवन में मेरी ये पहली और आखिरी ट्रिप थी। इसके पहले भी बाकी लोग गए थे लेकिन मैं नहीं गया था। सबने हमें मनाया कि तुम्हें चलना ही होगा,तुम रहोगे तो टीचर लोग भी मान जाएंगे। बोर्ड परीक्षा के पहले स्कूल में ही प्रीबोर्ड की परीक्षा खत्म हुई थी। उसके बाद हमलोगों ने टीचरों को ठेल-ठेलकर कहा था कि सर अब तो हमलोग हमेशा के लिए आपलोगों से अलग हो रहे हैं,हमारी क्यों न हमलोग कुछ दिनों के लिए साथ बाहर घूमने जाएं? लेकिन टीचरों के पहले हमें क्लास की लड़कियों को सेंटी करना था जो कि आसान काम नहीं था। शुरुआत मैंने ही की-अब कौन किससे मिलेगा वर्षा,मोनालिसा,शैली,मनीषा,कनिका,सुजाता..अपनी यादें बनी रहे,चलो न एक बार।.और वैसे भी तुमलोग साइंस पढोगी,संभव है एक ही जगह जाओ लेकिन मुझे तो आर्ट्स की पढ़ाई करनी है,लिटरेचर,समझ रही हो न। फिर हमलोगों ने एक-दूसरे की गर्लफ्रैंड को कन्विंस करना शुरु किया। देखो-राजकमल के साथ ये तुम्हारा आखिरी मौका है,चल लो न। फिर पता नहीं तुम पटना और वो कोटा। मामला जम गया। अब बारी टीचरों की थी जिसका जिम्मा कन्विंस हो चुकी लड़कियों पर था। चलिए न मैम,इतने सारे लड़कों के बीच हमलोग सेप फी नहीं करेंगे.. सर,प्लीज और अंत में चार मैम के मान जाने पर सात टीचर भी मान गए।&lt;br /&gt;सात दिनों तक हमलोग क्लास की 18 लड़कियों और 27 लड़कों एक साथ रहे। साथ में घूमना,एक-दूसरे पर कमेंट करना।  पहली बार किसी लड़की का हाथ पकड़कर बनफुटकुन खोजने के बहाने झाडियों में घुसे,पहली बार चलते-चलते किसी के शू-शू आने पर कहां,हम यहां खड़े हैं कोई नहीं आएगा..जाओ कहा। पहली बार किसी लड़की के हाथ छू जाने से झुरझुरी होती है महसूस किया। पहली बार ये बयान सुना कि किस करते समय लड़कियां आंखें इसलिए बंद कर लेती है कि वो सुंदर चीजें देखना पसंद नहीं करती। टीनएज की कई बेतुकी बातें,लड़कियों से दूसरों के बहाने अपने मन की बातें धर देने की कला,सबकी आजमाइश इन सात दिनों में हमने की।जिस लड़की को हमारा दोस्त पसंद करता उसके सामने तारीफों के पुल बांध देना कि फलां तो जीनियस है,मैंने केमेस्ट्री तो श्रवण के नोट्स पढ़कर समझा है,अतुल की इंग्लिश है माइ गॉड। मामला एकतरफा ही था इसलिए हमें किसी भी लड़की की तारीफ करने की जरुरत महसूस नहीं हुई। हम जैसे कुछ लोग फ्लोटेड आशिक थे जो कि आजमा रहे थे कि कहां मामला सेट हो सकता है इसलिए औरों के मुकाबले ज्यादा चौकस रहते।  कसप,बसंती,सूरज का सातवां घोड़ा,गुनाहो का देवता,पचपन खंभे लाल दीवारों के चरित्रों के टुकड़े को जहां से मन किया वहां  उठाकर इन सात दिनों में जीना शुरु कर दिया लेकिन तब हमें कहां पता था कि हमारा ये जीना हिन्दी के महान उपन्यासों का क्रफ्ट का हिस्सा है।&lt;br /&gt;सात दिनों के बाद जब हम अपने शहर बिहारशरीफ लौटे तो ऐसा लग रहा था कि हम सबों के भीतर से कुछ निकालकर करुणाबाग वाले चौराहे पर लाकर पटक दिया हो। तीन बजे रात हम अपने एक दोस्त के घर रुक गए और फिर अगले दिन से लेकर चार दिनों तक बस ट्रिप की ही चर्चा करते रहे. किसी को भी पढञाई में मन नहीं लग रहा था,सब खोए-खोए से,न भूख लगती,न प्यास। मां कहती- हमको जैसे ही पता चला कि लड़की लोग भी जा रही है तबहीए समझ गए थे कि हुआं से जब लौटेगा तो सनककर लौटेगा। मेरे दोस्त दिनभर में चार बार मेरे घर का चक्कर लगाते- आंटी विनीत है,मां कहती-आजकल घर में रहता कहां है? कुछ काम था? वो कहता-नहीं बस मन नहीं लग रहा था सो चले आए? मां भड़क जाती,दू महीना बाद बोर्ड परीक्षा है औ तुम सबको नय मन लगने का बेमारी एके साथ लग गया है,उसका भी नय मन लग रहा था त सुजीत के यहां गया है?  हम इन दिनों जब भी मिलते,कभी पढ़ाई की बातें नहीं करते। हम सारे सातों-आठों दोस्त जो कि जुबानी थ्योरम प्रूव करते,अब एक-दूसरे से सवाल करते- बता न विद्या-हम कैसे क्या करें,कैसे शिल्पी को बताएं कि तुम्हारे बिना मर जाएंगे। बोल न ज्ञान-उसके बाप को जब पता चलेगा कि राजपूत लड़का से हमरी बेटी का चक्कर है तो उसको हलाल नहीं कर देगा? बोलती है कि आइआइटी निकाल लोगे तो सोचेंगे तुम्हारे बारे-अब हम कैसे एश्योर करें। हमने तय किया था कि ट्रिप से लौटकर सेट्स बनाएंगे लेकिन छ दिन हो गए,हमने किताब को हाथ तक नहीं लगाया। सबों के घर के लोग परेशान थे कि इन पढ़ने-लिखनेवाले लड़के को क्या हो गया? सबसे ज्यादा हैरानी मुझे लेकर थी,घरवालों को और दोस्तों को भी। वो कहते कि स्साला तुझे तो किसी पर्टिकुलर लड़की के साथ कुछ नहीं हुआ है फिर हमलोगों के सात काहे सेंटिया रहे हो? घरवाले उस लड़की के बारे में जानना चाहते लेकिन अपना तो केस ही अलग था। मैं एक ही साथ पांच-छ लड़कियों के साथ बिताए गए अलग-अलग लम्हों को याद करता,झुमरी तिलैया के बस स्टॉप पर सबसे हटकर ऑमलेट खाना,सैनिक स्कूल में जब दुनिया अस्तबल देख रही थी तो हमने कहा कि सबके सब लड़बहेर हैं,आओ इधर बैठते हैं,मैम और टीचर के बीच का..स्टिंग ऑपरेशन सब याद आता। दीदी लोग कहती-चलो,तुम्हारी इस हालत पर पापा को कोई एतराज नहीं है,अच्छा है यही हाल रहा तो फेल तो हो ही जाओगे और पापा को समझाने की भी जरुरत नहीं रहेगी कि बाप के साथ दूकान में बैठने के अलावे जवान होते बेटे के लिए और दूसरा कोई पुण्य काम नहीं है। सच में नानीघर से लौटते हुए जब पापा बिचली अड़ान के पास मिले तो हुलसकर बोले,स्कूल में रिजल्ट टंग गया है-सुजीत बता रहा था कि तुम्हारा पास होनेवाले में कहीं नाम ही नहीं है,जाओ बेग रखो और दूकान पर आ जाना,कुछ जरुरी बात करनी है। मेरे बाकी के दोस्त कहते-तुम्हारा क्या आर्ट्स पढ़ोगे बेटे,केतना भी नंबर आए,काम बन जाएगा। उपर से लड़कियों की झुंड रहेगी,ट्रिप का रहा-सहा कसर वहां पूरा हो जाएगा,फटेगी तो हम सबकी,साइंस नहीं मिला तो फिर कहीं के नहीं रहेंगे।&lt;br /&gt;मेरी इसी हालत को देखकर मां हमें सिनेमा दिखाने ले गयी थी। उसे पता था कि सिनेमा का असर इस पर इतना ज्यादा होता है कि बाकी की चीजें अपने-आप भूल जाएगा। दिलचस्प है कि मां इस सिनेमा को ये समझकर देखने गयी थी कि इसमें अरेंज मैरिज को आदर्श बताया जाएगा। वो दुल्हनिया को समझ पायी लेकिन दिलवाले शब्द को इग्नोर कर गयी। मैं इस सिनेमा से अपने को जोड़ नहीं पाया। बस दो लाइन ही याद रह गयी- तूझे देखा तो ये जाना सनम,प्यार होता है दीवाना सनम। अब इधर से किधर जाएं हम,तेरी बांहों में मर जाएं हम।..मौके वे मौके हम इस लाइन को घर में दुहराते और दीदी लोग मजे लेती-दुलहन मांगे दहेज,अरे नहीं दुल्हा मांगे दुल्हनियां हा हा हा हा ...&lt;br /&gt;मूड बदलने के लिए मेरी मां ने जिस दिलवाले दुल्हनियां का सहारा लिया था,मेरे दोस्तों को भी एक घड़ी के लिए वही सहारा नजर आया। तय किया गया कि जब सब अधकपारी के शिकार हुए हैं तो काहे नहीं सब एक साथ ही इलाज कराएं। मां से सिनेमा जाने के पैसे मांगे तो बिना कुछ कहे पचास का नोट पकड़ा दिया,उसे अफसोस हो रहा था कि मेरे साथ देखते समय बाहर निकलना चाह रहा था लेकिन खुश भी थी कि चलो इसी बहाने कुछ सुमति जगे।&lt;br /&gt;अबकी बार हम सिनेमा से पूरी तरह बंध गए। एक-एक सीन जैसे फातमा डॉक्टर की दवाई की फक्की के तौर पर लगने लगा। संवाद,सिचुएशन,गानों से ऐसे जुड़े कि लगा कि हमारे सात दिनों की बितायी जिंदगी को किसी ने छुप-छुपकर देखा है और फिर उसे कैमरे में कैद कर लिया है। सिमरन की विदेश में ट्रेन छूटी थी और गुंजा की कोडरमा के दीपक होटल के पास छूटते-छूटते बची। एकदम डीटो सीन। हम सबों को लड़कियों का बाप अमरीश पुरी जैसा लगता जो कबूतरों को दाना तो खिलाता लेकिन हमें देखते ही भड़क जाता,इस गली में दुबारा न दिखने की सख्त हिदायत देता। आप ही सोचिए न किसी भी मोहल्ले में एक ही साथ आठ-दस लड़के साइकिल से चक्कर काटने लगें तो लड़की के बाप पर क्या गुजरेगी? हम उस कल्पना में खो गए कि काश गुंजा की बस मिस हो जाती और हम एक-दो दिन रुककर तिलैया पहुंचते,अपने मन की बात कहते। हम उस गाने को सीमा,शिप्रा से जोड़कर देखते- जरा-सा झूम लूं मैं,अरे न रे बाबा न,जरा सा घूम लूं मैं..अरे न रे बाबा न,आ तूझे चूम लूं मैं अरे न रे बाबा न। वो भी तो ऐसे ही मना करती थी और कहती-अभी हमारी ये सब करने की उम्र नहीं है।&lt;br /&gt;सिनेमा देखने के दौरान हमें अपने सात दिन की ट्रिप भूल जानी चाहिए थी लेकिन एक-एक सीन के साथ वो कुछ इस तरह से जुड़ गयी जैसे लड़कियों के झीने कपड़े से सब कुछ झांक न जाए तो उसी रंग के स्तर लगा दिए जाते हैं। डीडीएलजे हमारी मनःस्थिति के साथ उस स्तर की तरह काम किया। दूसरी बार इस फिल्म को देखने का असर हुआ कि हम ट्रिप के साथ सिनेमाई हो गए और जो पल हमने बिताए उसे सिनेमा से जोड़कर देखने लगे। जिन वास्तविक क्षणों को जीकर मरे जा रहे थे उस पर अब कल्पना की लेप चढ़ाने लग गए कि अगर सिमरन की तरह गुंजा भी वेलकम वाला घंटा खरीदती तो, अगर मेरे भी बाबूजी अनुपम खेर जैसा बड़ा दिल रखते तो,अगर सबकी मां सिमरन की मां जैसी होती तो...इस तो के असर में हम सिनेमाई तरीके से ज्यादा सोचने लग गए और अपने सात दिनों को धुंधला करते चले गए,इस उम्मीद में कि स्साला जब अमरीश पुरी जैसे आदमी का दिल पसीज जाता है तो फिर ये शिल्पी,शिप्रा,मोना,सीमा के बाप की क्या औकात है और फिर एक बार आइआइटी निकल जाए,प्रीमेडिकल में हो जाए तो घर आएगा गिड़गिड़ाने। इस स्तर पर मैं अब भी दीन-हीन था कि आर्ट्स पढ़कर क्या कर लेंगे?  लेकिन यकीन मानिए कि सिमरन और राज की कहानी के बीच हमारी सात दिन की कहानी कुछ ऐसे गड्डमड्ड हो गयी कि हम इसे एक फैंटेसी का हिस्सा मानकर भूलने लग गए। वैसे भी सिनेमा देखने के तीन दिनों बाद जब हम नानीघर के लिए रवाना हुए तब हम उस महौल से लगभग बाहर हो गए। इधर बाजार में हर पांच में से तीन लड़की सिमरन सूट पहने घूम रही थी,जाड़े में भी भाई लोग धूप चश्मा लगाए फिर रहे थे,जो लौंडें भौजी बोलकर लड़कियों पर कमेंट पास करते रहे,अब हे सैनोरिटा बोलकर ठहाके लगाते। आती हुई लड़कियों को देखकर कहते,अरे तेरी कि देख..देख सिमरन आ रही है। चौडे मुंह और मोटे तलबे वाले जूते से बाजार पट गयी थी। बिसेसरा की दूकान पर अलग-अलग पोज में सिमरान और राज की प्रेम कहानी के पोस्टर अठ-अठ आना में धडल्ले से बिकने लग गए थे। इसी समय नानी ने लौटते समय मेरी बहन के लिए सिमरन सूट भिजवाए थे जिसे कि मां ने किसी को शादी में दौरा पर भेज दी थी।&lt;br /&gt;किसान सिनेमा के पर्दे पर तब ये फिल्म दोबारा लगी रही,जब हमने बोर्ड की परीक्षा दे दी,इंटरमीडिएट के लिए पटना कॉलेज का चक्कर लगाया और अंत में रांची जाने पर मुहर लग गयी। पैर छूते वक्त पापा ने मुंह फेर लिया था,मां ने बिलखकर कलेजे से लगाकर लड़कियों के साथ ट्रिप पर न जाने की प्रार्थना की थी। रिक्शा पर सामान लादे,सर्फ एक्सेल में फ्री में मिली बाल्टी को बिहारशरीफ से रांची ले जाते हुए जब मैं किसान सिनेमा की ओर से गुजर रहा था..तब ये मेरे बचपन का शहर हमेशा के लिए छूट रहा था,मां छूट रही थी,पापा तो एकदम से छूट रहे थे,दोस्तों का साथ छूट रहा था, शिप्रा    ,मोना,शिल्पी,वर्षा,स्वीटी सब छूट रही थी,मैं रोने-रोने को हो रहा था जबकि पोस्टर का राज हमसे बार-बार कहता..हे हे हे हे..हमारी फिल्में देखनेवाले बच्चे कभी रोते नहीं,आगे बढ़ते हैं,पास होते हैं और डियर बुरा मत मानना लड़कियों के साथ ट्रिप पर न जाने की तुम्हारी मां ने बहुत गलत सलाह दी,मेरी खातिर उसे इग्नोर कर जाना,समझे।..&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6898673550088047104-1998061411822918299?l=taanabaana.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://taanabaana.blogspot.com/feeds/1998061411822918299/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.blogger.com/comment.g?blogID=6898673550088047104&amp;postID=1998061411822918299' title='10 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6898673550088047104/posts/default/1998061411822918299'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6898673550088047104/posts/default/1998061411822918299'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://taanabaana.blogspot.com/2009/10/blog-post_20.html' title='आज चौदह की हुई दिलवाले दुल्हनियां'/><author><name>विनीत कुमार</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09398848720758429099</uri><email>vineetdu@gmail.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' name='OpenSocialUserId' value='01281586745461734077'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_uS1XY77Y4b8/St1eRzPbBWI/AAAAAAAABSY/cHWf0yumiX4/s72-c/%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%A8+copy.jpg' height='72' width='72'/><thr:total 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/&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-style:italic;"&gt;दीवाली के मौके पर मां मेरे लिए खास तौर से &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;दीयाबरनी&lt;/span&gt; खरीदती। आपको शायद ये शब्द ही नया लगे लेकिन इसे समझना मुश्किल नहीं है। एक ऐसी लड़की जो दीया बारने यानी जलाने का काम करती है,जो पूरी दुनिया को रौशन करती है। प्रतीक के तौर पर उसके सिर पर तीन दीये होते और जिसे कि रात में रुई की बाती,तीसी का तेल डालकर हम जलाते। मां के शब्दों में कहें तो हमारी बहू भी बिल्कुल ऐसी ही होगी जो कि पूरी दुनिया को रौशन करेगी। आज मां दीयाबरनी खरीदे तो जरुर पूछूंगा कि कि क्या माथे पर दीया लादकर पूरी दुनिया को रौशन करने का ठेका तुम्हारी बहू ने ही ले रखी है?&lt;br /&gt; खैर,&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;दीदी और मोहल्ले भर की लड़कियां जिसे कि मां के डर से बहन मानकर व्यवहार करता,इस दिन घरौंदे बनाती। ये घरौंदे अमूमन तीन तरीके के बनाए जाते। एक तो आंगन की दीवारों पर,दूसरा लकड़ी का बना बनाया और तीसरा अब के जमाने के घरौंदे थर्माकॉल और फेबीकॉल के दम पर चिपकाए गए। दीदी लोग सिर्फ दीवार पर ही घरौंदे बनाती। आंगन का एक हिस्सा अपने कब्जे में कर लेती और बड़ा-सा वर्ग घेरकर उसे अपने काम में लाती। दीवारों पर अलग-अलग किस्म की तस्वीरें बनाती। मोर,पेड़,मटके भरकर जाती हुई रतें,झोपड़ी औ नारियल के पेड बगैरह..बगैरह। कुल मिलाकर इस घरौंदे में खुशहाल गृहस्थ की कल्पना होती। इन चित्रों को रंगने के लिए बड़े ही प्राकृतिक तरीके से रंगों का इस्तेमाल किया जाता। पीले रंग के लिए हल्दी,ब्लू रंग के लिए कपड़े में डाला जानेवाला आरती मार्का नील,हरे रंग के लिए चूर-चूरकर पत्तियों से निकाला गया रस। सिर्फ गुलाबी रंग बना-बनाया बाजार से मंगवाती। मोहल्ले की कुछ लड़कियां इस दीवारवाले घरौंदे पर अपने-अपने पसंद के भगवान की तस्वीरें भी चिपकाने लगी। ऐसे घरौंदे मैंने चार साल पहले देखें हैं जिस पर लड़कियों ने ऐश्वर्या,माधुरी,सलमान खान की भी तस्वीरें चिपकानी शुरु कर दी है। इस घरौंदे के नीचे दीदी लोग मिट्टी के बर्तन जिसे कि वनचुकड़ी कहा करती,लाइन से सजाती। यही पर आकर मुझे उनकी चिरौरी करनी पड़ जाती। मैं कहता- ये मां ने अकेले हमें दीयाबरनी थमा दिया है,अब अपने घरौंदे में इसे भी जगह दे दो। वो कहती कि अभी रुको,पहले बर्तन सज जाने दो। फिर वो साइड में लगा देती,मैं कहता बीच में रखो,वो मना करती। फिर उलाहने देती,तुम एतना सेंटिया काहे जाते हो इसको लेकर,तुम तो ऐसा करने लगते हो कि ये सही मे तुम्हारी पत्नी है,एक बार मां ने कह क्या दिया कि एकदम से पगला जा रहे हो। मैं सचमुच इमोशनल हो जाता। मैं तब तक दीदियों के आगे-पीछे करता,जब तक वो उसे मेरे बन मुताबिक जगह न दे दे। लेकिन एक बात है कि रात में जब दीयाबरनी के सिर पर तीन रखे दीए को जलाते तो दीदी कहती- तुमरी दीयाबरनिया तो बड़ी फब रही है छोटे। देखो तो पीयर ब्लॉउज रोशनी में कैसे चमचमा रहा है,सच में बियाह कर लायो इसको क्या छोटू? दीदी के साथ उसकी सहेलियां होतीं औऱ साथ में  उसकी छोटी बहन भी। मैं उसे देखता और फिर शर्माता,मुस्कराता। दीदी कहती-देखो तो कैसे लखैरा जैसा मुस्करा रहा है,भीतरिया खचड़ा है और फिर पुचकारने लग जाती। रक्षाबंधन से कहीं ज्यादा आज के दिन दीदी लोगों का प्यार मिलता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रात में सिर पर रखे दीया के जलने से सुबह तक तेल की धार और बाती की कालिख से दीयाबरनी की शक्ल बिगड़ जाती। वो एकदम से थकी-हारी सी विद्रूप लगने लग जाती। मैं तो अपनी दीयाबरनी की इस शक्ल को देखकर एक-दो बार रोया भी हूं,एक दो-बार इसे दीदी के घरौंदे में रखा भी नहीं है कि खराब न हो जाए। दीदी के घरौंदे में रखने की शर्त होती कि हम इसे मुंह देखने के लिए नहीं रखेंगे,अगर तुम इसे हमारे यहां रखना चाहते हो तो इसके सिर पर के रखे दीयों को जलाना ही होगा। दीयाबरनी को लेकर दीदी और मेरे बीच जो संवाद होते थे,आज वो मेरी शादी को लेकर लड़की चुनने के मामले में मजाक-मजाक में ही सही आ जाते हैं कि सिर्फ शक्ल पर मत चले जाना,थोड़ा घर का काम-काज भी करे। इतना रगड़कर घर से बाहर रहकर पढ़-लिख रहे हो तो कम से कम शादी के बाद तो सुख मिले। दीयाबरनी का दीया जलाएं तो ठीक नहीं तो वो दीदी के लिए सिर्फ डाह की चीज होती। कई घरों में ननद और भोजाई को लेकर ऐेसे ही संबंध हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दीवाली के बाद हम विद्रूप दीयाबरनी को मां के हवाले कर देते। मां उसे लक्ष्मी-गणेश की पुरानी मूर्ति के साथ नदी में प्रवाह कर आती। मैं स्कूल न खुलने के समय तक उदास रहता,प्रेम औऱ संवेदना को लेकर जितने भी भाव उठते वो इस दीयाबरनी के चारो और छल्ले बनकर घिर जाते। फिर निक्की,सुरेखा,साक्षी,प्रियंका की बातों में खो जाता औऱ दीयाबरनी की बात भूल जाता। दीयाबरनी के कोरी रह जाने पर भी पागलों-सा उसे अपने साथ लिए फिरता और दिनभर में दस बार हाथ से फिसलने से थोड़ी सी नाक-थोड़ा चेहरा टूट जाता। दीदी लोग मजे लेती- क्या छोटू,बहुरिया का नाक-मुंह काहे तोड़ दिए हो,एकदम से और साथ की सहेलियों के साथ जोर से ठहाके लगाती। मैं उससे बहुत छोटा होने की वजह से कुछ भी नहीं समझ पाता।&lt;br /&gt;शुरुआती दौर में मां जो दीयाबरनी लाती वो अब के मिलनेवाली दीयाबरनियों से अलग होता। उसकी चुनरी का रंग अलग होता,ब्लॉउज का अलग,चेहरा ऐसा कि एक बार देख लें तो किस करने का मन करे,बहुत छोटी-सी बिंदी,बहुत ही सलोना सा मुखड़ा। अब खुशी के लिए जो दीयाबरनी लाती है,वो उपर से लेकर नीचे तक एक ही रंग की होती है-पूरी गुलाबी,पूरी लाल,पूरी पीली या फिर पूरी स्लेटी रंग की। इक्का-दुक्का मिल जाए कई रंगों में तो अलग बात है। आज की दीयाबरनियों को देखकर लगता है कि बाजार के दबाब में,हड़बड़ी में,मिट्टी के लोंदे को उठाकर एक रंग में रंग दिया गया हो,कोई यूनिकनेस नहीं,आत्मिक रुप से कोई जुड़ाव नहीं बनता और जिसे देखकर अब के लौंडे बौराएंगे क्या सात साल के अंकुर ने कहा कि ये मेरी मौसी है। ये अलग बात है कि इसी दीयाबरनी को याद करते हुए आज मैंने फेसबुक पर लिखा-&lt;span style="font-style:italic;"&gt; दीवाली के दिन मां मेरे लिए दीयाबरनी खरीदती। मिट्टी की बनी बहुत ही सुंदर लड़की जिसके सिर पर तीन दीए होते। रात में तेल भरकर उन दीयों को जलाते। मां उसे अपनी बहू की तरह ट्रीट करती,ऐसे में कोई उसे छू भी देता तो मार हो जाती। लड़कियों से प्यार करने की आदत वहीं से पड़ी।..&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6898673550088047104-7651622069648505348?l=taanabaana.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://taanabaana.blogspot.com/feeds/7651622069648505348/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.blogger.com/comment.g?blogID=6898673550088047104&amp;postID=7651622069648505348' title='12 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6898673550088047104/posts/default/7651622069648505348'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6898673550088047104/posts/default/7651622069648505348'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://taanabaana.blogspot.com/2009/10/blog-post.html' title='और दीयाबरनी से प्यार हो जाता'/><author><name>विनीत कुमार</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09398848720758429099</uri><email>vineetdu@gmail.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' name='OpenSocialUserId' value='01281586745461734077'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_uS1XY77Y4b8/Stl0i8GjhVI/AAAAAAAABRA/bY4yiPdQys4/s72-c/Diwali_Celebration.gif' height='72' width='72'/><thr:total 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alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5386003218954157346" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;हिंदी का मार्क्सवाद पर बात करते हुए युवा मार्क्सवादी आलोचक संजीव ने जब इसे जात्याभिमानी आलोचना नाम दिया तो राष्ट्रपति निवास (भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान) शिमला में मानो एक और ‘इतिहास’ दर्ज हो गया। संजीव ने मार्क्सवादी हिंदी आलोचना के बीच के अंतर्विरोधों को जिस विस्तार और तथ्यात्मक रूप से रखा उससे एकबारगी तो ताज्जुब जरूर हुआ कि स्वयं एक मार्क्सवादी इसके भीतर की गड़बड़ियों और मार्क्सवाद के नाम पर किये जानेवाले विचारात्मक और जातिवादी खेलों को कैसे हमारे सामने उघाड़ कर रख रहा है? इससे हिंदी साहित्य और समाज के बीच की जानेवाली साजिशों के नये सिरे से दर्शन होते हैं। दलित, जाति और वर्ण व्यवस्था को लेकर उठनेवाले सवालों को थोड़ा और विस्तार मिल जाता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पिछले दो दिनों से शिमला में हिंदी की आधुनिकता : एक पुनर्विचार (सितंबर 23 से 29) पर होनेवाली बहसों में ये बात बार-बार खुल कर सामने आ रही है कि आखिर दलित विमर्श हिंदी की मुख्यधारा का साहित्य क्यों नहीं बन पा रहा है? दलित के सवाल को एक गैरदलित उतनी तल्खी से क्यों नहीं उठाता? पत्रिकाओं को इस विमर्श के विस्तार के नाम पर अलग से विशेषांक क्यों निकाले जाते हैं? इसी दौरान शिमला में चल रही इस कार्यशाला में तुलसी, प्रेमचंद सहित हिंदी के उन तमाम नामचीन रचनाकारों और आलोचकों के नाम सामने आने लग जाते हैं, उनके प्रसंगों पर ज़ोरदार बहस होती है और उन्हें वर्ण-व्यवस्था का समर्थक और विरोधी मानने और न मानने के सबूत जुटाये जाते हैं। इन बहसों के बीच दिलचस्प बात है कि लगभग रोज विमल थोरात की ओर से नामवर सिंह के दलित विरोधी रवैयों को पुख्ता प्रमाण के तौर पर रखा जाता है। बहरहाल, नामवर सिंह बकौल विमल थोरात दलित साहित्य को इग्नू के पाठ्यक्रम में न आने देने के लिए एड़ी-चोटी एक कर देते हैं, इसे अपरिपक्व करार देते हैं, साहित्य के नाम पर ‘जूठन’ का नाम सुनते ही मैनेजर पांडेय जैसे आलोचक बौखलाहट में कुर्सी से गिर पड़ते हैं, निर्मला जैन जैसी तथाकथित प्रबुद्ध और वरिष्ठ आलोचक दलित विमर्श के साथ ही स्त्री विमर्श को बेमतलब करार देती हैं। थोरात ने इसी क्रम में अपना एक और संस्मरण सुनाते हुए कहा कि – ये वही मार्क्सवादी आलोचक नामवर सिंह हैं, जिन्होंने एमफिल के दौरान निर्धारित बीस सीटों की फाइनल लिस्ट आ जाने के बावजूद दस लोगों को ही कोर्स में शामिल किया। 11 वां मेरा नंबर था और मैं लिस्ट से कत्ल कर दी गयी। आपको जानकर हैरानी होगी कि ये एकेडमिक कौंसिल का नहीं बल्कि जनपक्षधरता का समर्थन करनेवाले नामवर सिंह का फैसला था। तत्कालीन वीसी केआर नारायणन की ओर से छह महीने गुज़र जाने के बाद क्लास ज्वायन करने का लेटर जब हमें मिला, तो व्यक्तिगत स्तर पर शिक्षा से वंचित करने का नामवर सिंह का रवैया हमारे सामने साफ हो गया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;संजीव का पर्चा और विमल थोरात का संस्मरण सुनते हुए हमें यह सब केवल हिंदी साहित्य की दुनिया के कारनामे और साज़‍िशें नहीं लगतीं बल्कि साहित्य को परंपरा के विकास के आधार पर पढ़ने-पढ़ाने के अभ्यस्त होने की तरह ही हम इन कारनामों को भी एक लंबी परंपरा का ही विस्तार मानने की स्थिति में अपने को खड़ा पाते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;संजीव ने अपने पर्चे में कई ऐसी स्थापनाएं रखीं, जिनके आलोक में इन नामवरों की एक भरी-पूरी परंपरा दिखाई देती है। उन्होंने तदभव में छपे बजरंग बिहारी के उस लेख की चर्चा की है, जिसमें तर्कपूर्ण ढंग से स्थापित किया गया है कि ब्राह्मणों की ओर से इस्लाम का विरोध इसलिए नहीं किया गया कि वो यहां आकर हमारी संस्कृति को भ्रष्ट कर रहे हैं बल्कि उन्होंने इसका विरोध बहुत ही निजी स्वार्थ को साधने के एंजेंडे के तहत किया। इस्लाम के आने के 200-300 सालों तक कहीं कोई विरोध नहीं हुआ लेकिन जैसे ही उनकी सुविधाओं में कटौती की जाने लगी, वे विरोध पर उतर आये। इतना ही नहीं, ब्राह्मणों ने दलितों के शिक्षित होने पर आपत्ति जतायी और बादशाह की ओर से आदेश जारी करवाया कि उनके लिए शिक्षा व्यव्स्था रोक दी जाए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;संजीव का कहना रहा कि इन सबके बावजूद मार्क्सवादी आलोचकों के लिए उस दौरान लिखा जानेवाला ‘भक्तिकाव्य महान है, तुलसी महान हैं’ और सिर्फ महान ही नहीं बल्कि हर नामचीन आलोचकों और कवियों के प्रिय कवि तुलसीदास हैं। यहां पर ठहर कर हम सोचें तो संजीव ने मार्क्सवादी हिंदी आलोचना की जो व्याख्या की, उसमें एक स्पष्ट नज़रिया सामने आता है कि हम अक्सर प्रदत्त संस्कारों के साथ तालमेल बिठाने की कोशिश करते हैं इसलिए हम या तो तथ्यों को दबाते हैं या फिर उसे ज़बरदस्ती प्रगतिशील बताने की कोशिश करते हैं। तुलसीदास की व्याख्या करने के क्रम में रामविलास शर्मा सहित विश्वनाथ त्रिपाठी आदि की परंपरा वालों ने यही काम किया है। दूसरी ओर रांघेय राघव और शिवदान सिंह चौहान जैसे आलोचकों ने वास्तविक मार्क्सवादी आलोचना को विस्तार देने की कोशिश की तो उसे दबा दिया गया। उसका विस्तार आज हिंदी आलोचना में दिखाई नहीं देता। इतना ही नहीं, अपने दौर में रांघेय राघव को हाशिया पर धकेल दिया गया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;संजीव का मानना है कि हिंदी की पूरी मार्क्सवादी आलोचना, रामविलास शर्मा के अनुयायी के तौर पर आगे बढ़ी है। रामविलास शर्मा से आगे और अलग मार्क्सवादी आलोचना के विकास की संभावनाओं की तलाश नहीं की गयी। संजीव ने यहां तक कहा कि भले ही रामविलास शर्मा ने करीब 75 मौलिक किताबें लिख दी हों और जिसे सुन कर एक झटके में श्रद्धा पैदा होने की गुंजाइश बन जाती है लेकिन हिंदी जाति के नाम पर गौरव करने के जो औज़ार हिंदी समाज के पाठकों को उन्‍होंने थमाये, वो तार्किक नहीं हैं – इसे नवजागरण के संदर्भ में विशेष तौर पर देखा जा सकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;संजीव के पर्चे पर हस्तक्षेप करते हुए प्रमोद रंजन अरुण कमल की कविता दस जन की पंक्ति – फेंका है उन्होंने रोटी का टुकड़ा/और टूट पड़े गली के भूखे कुत्ते – की याद दिलाते हुए कहा कि सिर्फ रामविलास शर्मा आदि आलोचकों की ही नहीं बल्कि मौजूदा समय में रचनारत मार्क्सवादियों की प्रतिबद्धताओं की भी पड़ताल की जानी चाहिए। उन्होंने बताया कि अरुण कमल ने यह कविता यह कविता 1978 में उस समय लिखी जब उत्तर भारत में पहली बार समाज के कुछ पिछड़े सामाजिक समूहों के लिए आरक्षण की व्यवस्था की गयी। ये गली के कुत्ते कौन हैं, आप समझ सकते हैं। इसी कविता में अरुण कमल की ही पंक्ति है – मारे गये दस जन/ मरेंगे और भी…/ बज रहा जोरों से ढोल/ बज रहा जोरों से ढोल/ ढोल… कौन हैं ये दस जन? मरेंगे और भी पर ध्यान देने पर पता चलता है कि वाग्जाल के भीतर यह दस जन नब्बे जनों के विरुद्ध एक रूपक है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;संजीव का पर्चा, विमल थोरात का मार्क्सवादी आलोचक नामवर सिंह को लेकर सुनाये गये संदर्भ और संस्मरण और प्रमोद रंजन की ओर से अरुण कमल की याद दिलायी जानेवाली कविता सचमुच मार्क्सवादी हिंदी आलोचना और रचना के बीच पसरे अंतर्विरोंधों को पेश करती है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6898673550088047104-6979551500443437991?l=taanabaana.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://taanabaana.blogspot.com/feeds/6979551500443437991/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.blogger.com/comment.g?blogID=6898673550088047104&amp;postID=6979551500443437991' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6898673550088047104/posts/default/6979551500443437991'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6898673550088047104/posts/default/6979551500443437991'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://taanabaana.blogspot.com/2009/09/blog-post_27.html' title='अन्तर्विरोधों के बीच फंसी मार्क्सवादी हिन्दी आलोचना,शिमला रिपोर्ट-3'/><author><name>विनीत कुमार</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09398848720758429099</uri><email>vineetdu@gmail.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' name='OpenSocialUserId' value='01281586745461734077'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_uS1XY77Y4b8/Sr7tZDDffSI/AAAAAAAABPk/HmTcR1nKBBo/s72-c/060.JPG' height='72' width='72'/><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6898673550088047104.post-1613220580893793154</id><published>2009-09-25T10:04:00.009+05:30</published><updated>2009-09-25T10:41:57.719+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अनामिका'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='सविता सिंह'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='स्त्री विमर्श'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='शिमला'/><title type='text'>स्त्री विमर्श पर अनामिका और सविता सिंह ,शिमला रिपोर्ट-2</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/_uS1XY77Y4b8/SrxN8XB-YaI/AAAAAAAABPE/569MM2cWVng/s1600-h/004.JPG"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 200px; height: 150px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_uS1XY77Y4b8/SrxN8XB-YaI/AAAAAAAABPE/569MM2cWVng/s200/004.JPG" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5385264953798058402" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;मशहूर कवयित्री औऱ लेखिका &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;अनामिका&lt;/span&gt; का ये कथन कि &lt;span style="font-style:italic;"&gt;इंटरनेट ने स्त्रियों के बीच के संदर्भकीलित चुप्पियां दूर करने का काम किया है। स्त्री-भाषा जो कि अपने मूल रुप में ही संवादधर्मी भाषा है,जो बोलती-बतियाती हुई विकसित हुई है,एक-दूसरे के घर आती-जाती हुई,बहनापे के तौर पर विकसित हुई है,इंटरनेट पर स्त्रियों द्वारा लेखन,स्त्री सवालों पर की जा रही रचनाएं उसकी इस भाषा-संभावना को और विस्तार देती है,स्त्री-मुक्ति और संवादधर्मिता के स्पेस के विस्तार में इंटरनेट की भूमिका को नये सिरे से परिभाषित करती है। &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;हिन्दी के हिटलर,भाषिक बमबारियाःस्त्री का भाषा-घर&lt;/span&gt; विषय पर अपना पर्चा पढ़ते हुए अनामिका ने स्त्री-भाषा को पुरुषों की वर्चस्वकारी भाषा से अलगाने के क्रम में चोखेरबाली जैसे ब्लॉग, फेसबुक, एफ.एम.रेडियो ममा म्याउं 104.8 और इमेल को साहित्य के पार नयी भाषिक कनातों के तन जाने के रुप में विश्लेषित किया।&lt;/span&gt; अनामिका का मानना है कि &lt;span style="font-style:italic;"&gt;किसी भी मनोवैज्ञानिक युद्ध में भाषा हथियार का काम करती है। जिसको भी हाशिये पर धकेल दिया जाता है,पता नहीं किस क्षतिपूर्ति सिद्धांत के तहत उसकी भाषा ओजपूर्ण हो जाती है,जिसका मुकाबला शास्त्रीय भाषा नहीं कर सकती। स्त्री-भाषा अपना विकास इसी रुप में कर पाती है। लेकिन स्त्री-भाषा, पुरुषों की भाषा की तरह हिंसक भाषा बनने के बजाय प्रतिपक्ष के बीच नैतिक विश्वास की तलाश करती है।&lt;/span&gt; इसलिए वो हमेशा झकझोरने वाली भाषा के तौर पर काम करती है,हमले करने और धराशायी करने के रुप में नहीं। हिन्दी  में स्त्री-भाषा के इस रुप की तलाश के क्रम में अनामिका उन चार संदर्भों को रेखांकित करती है जहां से कि लेखन के स्तर पर स्त्री-भाषा के रुप विकसित होते हैं-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;1.विद्याविनोदी परीक्षा की शुरुआत।यहां से चिठ्ठी-पतरी के लिखने के क्रम में स्त्रियों की भाषा बनती-बदलती है। 2.महादेवी वर्मा के चांद का संपादकीय 3.बिहार में जेपी आंदोलन के दौरान जेएनयू,डीयू,पटना यूनिवर्सिटी जैसे अभ्यारण्यों में स्त्रियों के आने के बाद भाषा का एक नया रुप दिखायी देता है। इसी समय यहां पढ़नेवाली लड़कियां मजाक में ही सही,पुरुषों के प्रेम-पत्र पर अश्लील शब्दों पर गोले लगाती हैं और नॉट क्वालिफॉयड का लेबल लगाती है। दरअसल एक तरह से वो पुरुष-भाषा के औचित्य-अनौचित्य पर सवालिया निशान पैदा करने का काम शुरु कर देती है। इस तरह के शिक्षण संस्थानों और उसके आस-पास के लॉज और हॉस्टलों में रहकर एक स्त्री जो भाषा पाती है,प्रयोग करती है और उसका विस्तार करती है उसकी अभिव्यक्ति हमें पचपन खंभें लाल दीवारें और मित्रो मरजानी जैसी हिन्दी रचनाओं की याद दिलाते हैं। अनामिका का मानना है कि इन सबके वाबजूद यहां तक आते-आते स्त्री भाषायी स्तर पर अकेली पड़ जाती है इसलिए स्त्री-भाषा के चौथे संदर्भ या पड़ाव के तौर पर इंटरनेट और ब्लॉग पर बननेवाली स्त्री-भाषा का जिक्र करती है। अनामिका पूरे पर्चे में गांव से लेकर हॉस्टल/लॉज के दबड़ेनुमा कमरे में बनने और बरती जानेवाली उस भाषा को प्रमुखता से पकड़ती हैं जो कि संवादधर्मिता की प्रवृत्ति को मजबूत करते हैं। इसलिए शब्दों,शैलियों और कहने के अंदाज के स्तर पर एक-दूसरे से अलग होने के वाबजूद वो एक-दूसरे के विकासक्रम का ही हिस्सा मानती है। इसी क्रम में भूमंडलीकरण के बाद के बलात् विस्थापन में फुटपाथओं पर चूल्हा-चौका जोड़नेवाली मजदूरनी आपस में जिस भाषा में बतियाती है या बच्चों को,जिस खिचड़ी भाषा में नयी उठान की लोककथाएं सुनाती है या लोकगीत,उसकी भी छव बिल्कुल निराली है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस प्रस्तुति के दौरान अनामिका की दो प्रमुख स्थापनाएं रहीं जिसे कि स्त्री-भाषा के दो प्रमुख अवदान के तौर पर विश्लेषित करती हैं- 1. जिस तरह अच्छी कविता इंद्रियों का पदानुक्रम नहीं मानती-दिल-दिमाग और देह को एक ही धरातल पर अवस्थित करती हुई तीनों को एक-दूसरे के घर आना-जाना कायम रखती है,स्त्री-भाषा पर्सनल-पॉलिटिकल,कॉस्मिक-कॉमनप्लेस,सेक्रेड-प्रोफेन,रैशनल-सुप्रारैशनल के बीच के पदानुक्रम तोड़ती हुई उद्देश्य स्थान-विधेय स्थान के बीच म्यूजिकल चेयर सा खेल आयोजित करती है जिससे कि बहिरौ सुनै मूक पुनि बोलै/अन्धरो को सबकुछ दरसाई का सही प्रजातांत्रिक महोत्सव घटित होता है।&lt;br /&gt;2. स्त्री-भाषा ने आधुनिकता का कठमुल्लापन झाड़कर उसके तीन प्रेमियों का दायरा बड़ा कर दिया है-शुष्क तार्किकता का स्थानापन्न वहां सरस परा-तार्किता है,परातार्किकता जो बुद्धि को भाव से समृद्ध करती है। प्रस्तरकीलित धर्मनिरपेक्षता का स्थानापन्न वहां है इगैलिटेरियन किस्म का अध्यात्म,अध्यात्म,अध्यात्म जो कि मानव-मूल्यों को स्पेक्ट्रम ही है-और क्या? आधुनिकता के तीसरे प्रमेय,सतर्क वैयक्तियन का स्थानापन्न स्त्री-भाषा में है। सर्वसमावेशी हंसमुख दोस्त-दृष्टि जो यह अच्छी तरह समझती है कि मनुष्य की बनावट ही ऐसी है कि वह लगातार न सर्वजनीनता को समर्पित रह सकता है,न निरभ्र एकांत को। उसे पढ़ने-लिखने,सोचने-सोने और प्यार करने का एकांत चाहिए तो चिंतन और प्रेम के सारे निष्कर्ष साझा करने का सार्वजनिक स्पेस भी? एक सांस भीतर गयी नहीं कि उल्टे पांव वापस लौट आती है। लेकिन बाहर भी उससे बहुत देर ठहरा नहीं जाता,सारे अनुभव,बिम्ब,अनुभूतियां और संवाद समेटकर फिर से चली जाती है भीतर-गुनने,समझने,मनन करने। स्त्री-भाषा ये समझती है- इसलिए उसके यहां कोई मनाही नहीं। सब तरह के उच्छल भावों की खातिर उसके दरवाजे खुले हुए हैं। वह किसी से कुछ भी बतिया सकती है-संवादधर्मी है स्त्री-भाषा। पुरुषों की मुच्छड़ भाषाधर्मिता उसमें नहीं के बराबर है।&lt;br /&gt;अनामिका के पर्चे के उपर कई तरह के सवाल उठाए गए। स्त्री-विमर्श से जुड़े संदर्भ को लेकर,पीछे लौटकर महादेवी वर्मा में इस विमर्श के संदर्भ खोजने को लेकर,जेपी आंदोलन और स्त्रियों के घर से बाहर आकर भाषा बरतने को लेकर लेकिन इन सबसे अलग जो सबसे अहम सवाल उठे वो ये कि क्या स्त्री-विमर्श की यही भाषा होगी जो अनामिका प्रयोग कर रही है? अभय कुमार दुबे स्त्री विमर्श की बिल्कुल नयी भाषा रचने के लिए अनामिका को बधाई देते हैं।&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://1.bp.blogspot.com/_uS1XY77Y4b8/SrxORZ_FK9I/AAAAAAAABPM/0mcjb66gTAA/s1600-h/012.JPG"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 200px; height: 150px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_uS1XY77Y4b8/SrxORZ_FK9I/AAAAAAAABPM/0mcjb66gTAA/s200/012.JPG" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5385265315368479698" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;स्त्री-भाषा और विमर्श को लेकर &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;अनामिका&lt;/span&gt; ने जो स्थापनाएं दी सोशल फेमिनिस्ट और कवयित्री &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;सविता सिंह&lt;/span&gt; उससे सहमत नहीं है। उन्हें स्त्री विमर्श के लिए बार-बार इतिहास औऱ परंपरा की ओर लौटना अनिवार्य नहीं लगता,वो इस नास्टॉल्जिक और रोमैंटिक हो जाने से ज्यादा कुछ नहीं मानती। &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;घरेलू आधुनिकता का प्रश्न &lt;/span&gt;पर अपना पर्चा पढ़ते हुए सविता सिंह ने इसे पॉलिटिकल इकॉनमी के तहत विश्लेषित करने की घोषणा की और इसलिए पर्चे के शुरुआत में इसकी सैद्धांतिकी की विस्तार से चर्चा करते हुए घरेलू आधुनिकता के सवाल और अपने यहां इसके मौजूदा संदर्भों का विश्लेषण किया।&lt;br /&gt;सविता सिंह की मान्यता है कि ये सच है कि मार्क्स के यहां स्त्री के सवाल बहुत ही विकसित रुप में हैं लेकिन उनके यहां वर्ग इतना प्रमुख रहा है कि वो इसके विस्तार में नहीं जाते। सोशल फेमिनिस्ट की जिम्मेदारी यहीं पर आकर बढ़ती है। सविता सिंह इससे पहले भी दिल्ली में आयोजित एक संगोष्ठी में कात्यायनी की स्त्री-विमर्श की समझ पर असहमति जताते हुए घोषणा कर चुकी है कि स्त्री-विमर्श को समझने के लिए मार्क्सवाद के टूल्स पर्याप्त नहीं हैं। सविता सिंह बताती है कि मार्क्स के यहां घरेलू श्रम को बारीकी से समझने की कोशिश नहीं की गयी जबकि घरेलू श्रम,श्रम से बिल्कुल अलग चीज है। घरेलू श्रम को कभी भी प्रोडक्टिव लेवर के तौर पर विश्लेषित ही नहीं किया गया जबकि यह श्रम का वह स्वरुप है जो कि बाजार और फ्रैक्ट्री में उत्पादन करने के लिए मनुष्य को तैयार करती है। &lt;span style="font-style:italic;"&gt;एक स्त्री दिनभर घर में काम करके,एक पुरुष को इस लायक बनाती है कि वो बाहर जाकर काम कर सके। लेकिन इस श्रम शक्ति का कोई मूल्य नहीं है, इसके साथ स्लेव लेबर का रवैया अपनाया जाता है। इस श्रम को बारीकी से समझने की जरुरत है. फ्रैक्टी जो कि लेबर पॉवर खरीदता है वो कैसे बनते हैं,इस पर विस्तार से चर्चा करनी जरुरी है।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;सविता सिंह&lt;/span&gt; जब घरेलू श्रम की बात करती है तो उसे बाजार में बेचे जानेवाले श्रम से बिल्कुल अलग करती है। ये सचमुच ही बहुत पेंचीदा मामला है कि घरेलू स्तर पर स्त्री जो श्रम करती है उसके मूल्य का निर्धारण किस तरह से हो? एक तरीका तो ये बनता है कि वो जितने घंटे काम करती है उसे मॉनिटरी वैल्यू में बदलकर देखा जाए। लेकिन क्या सिर्फ ऐसा किए जाने से काम बन जाएगा। इस तरह का मूल्य निर्धारण किसी भी रुप में न्यायसंगत नहीं है। &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;सविता स