tag:blogger.com,1999:blog-59346884002023638022008-07-26T12:43:27.256+05:30बाल किशन का ब्लॉगबाल किशनhttp://www.blogger.com/profile/18245891263227015744noreply@blogger.comBlogger54125tag:blogger.com,1999:blog-5934688400202363802.post-56207364980237063882008-07-25T09:29:00.001+05:302008-07-25T09:32:38.741+05:30एक आहट रोज आएआहट की आवाज़ सुनी<br />जैसे कह कह रहा हो;<br />मैं आ गया हूँ<br />आ गया हूँ तुम्हें डराने <br />तुम्हें एहसास दिलाने कि;<br />तुम अकेले नहीं हो<br />अकेले नहीं हो तुम <br />मैं भी तो हूँ<br />बस, आया था यही बताने<br /><br />हाँ, आहट ही तो है<br />एक आहट सुख की <br />और एक आहट दुःख की<br />एक उसके उसके आने की <br />और एक उसके जाने की <br />एक उसे पाने की <br />एक सब लुट जाने की<br /><br />आहटों की राह ताके <br />आहटों में मन है झांके <br />आहटों के साथ जीना <br />औ उन्ही के साथ मरना <br />आहटों का साथ हैं<br />आहटों का हाथ है<br /><br />क्या पता क्या ले के आए <br />क्या पता क्या ले के जाए <br />फिर भी आँखें खोजती हैं<br />एक आहट जो सताए <br />साथ लाये ज़िंदगी या <br />साथ लेकर मौत आए <br />किंतु दिल बोला है करता <br />एक आहट रोज आए <br /><br /><br />बाल किशन <br />२५-०७-२००८<br />प्रातः ९:३१बाल किशनhttp://www.blogger.com/profile/18245891263227015744noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-5934688400202363802.post-49331637389402416132008-07-24T09:24:00.001+05:302008-07-24T09:24:00.712+05:30लगता है जैसे उम्र बढ़ती जा रही हैकल सबेरे <br />एक कविता लिख दी थी मैंने<br />तुम्हारी लिपस्टिक से<br />उसे लिखकर <br />दीवार पर चिपका दिया था<br />धूल से सनी दीवार ने <br />कागज़ को गन्दा कर दिया <br />लेकिन <br />मुझे चिंता उस कागज़ की नहीं<br />मुझे चिंता थी उन शब्दों की<br />जो <br />मैंने तुम्हारी लिपस्टिक से लिक्खे थे <br />मुझे चिंता थी<br />लिपस्टिक के उस रंग की<br />जो आसमानी नीला था <br />शाम को कागज़ पर हाथ फेरा <br />कागज़ गीला था<br />शायद तुम्हारे आंसुओं की बूँदें <br />कागज़ को गीला कर गई <br />और मेरी भावना <br />पीली पड़ने लगी<br />आंसुओं से धुली रात <br />गीली पड़ने लगी<br /><br />क्या करूं?<br />और क्या है करने के लिए? <br />दोपहर तक जीता हूँ<br />मुई शाम आ जाती है<br />लगता है जैसे कह रही हो;<br />'चलो, तैयार हो जाओ<br />मरने के लिए'<br /> <br />दिल है<br />इसलिए यादें भी हैं<br />और इन्ही यादों ने <br />मौत का सामान <br />इकठ्ठा कर रक्खा है<br />बस रोज जीता हूँ<br />कविता लिखता हूँ<br />तुम्हारी लिपस्टिक से<br />लेकिन ये दीवार है कि;<br />हटती ही नहीं<br />लगता है जैसे उम्र बढ़ती जा रही है<br />जरा भी घटती नहीं<br /><br />बाल किशन <br />२४-०८-२००८<br />प्रातः: ९:२१बाल किशनhttp://www.blogger.com/profile/18245891263227015744noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-5934688400202363802.post-42845509218430694042008-07-23T09:17:00.001+05:302008-07-23T09:19:48.496+05:30अंतरात्मा की आवाज़मैंने कहा;<br />"एक रोटी और नहीं खा सकूंगा"<br />वे बोलीं; "अपनी अंतरात्मा की आवाज़ सुनो<br />और खा लो"<br />मैंने कहा "खाना तो पेट की आवाज़ पर निर्भर है"<br />वे बोलीं; "लेकिन वहां तो सब अंतरात्मा की आवाज़ सुनकर खा रहे हैं<br />मैंने कहा; "उनकी अंतरात्मा पेट में बसती होगी <br />वे बोलीं; "काश कि तुम्हारी भी वहीँ बसती"<br /><br />क्या करें <br />पेट तो बड़ा हो गया है<br />लेकिन वो तो उम्र का तकाजा है<br />हमारी इतनी कूबत कहाँ कि;<br />अंतरात्मा को वहां बसा दूँ<br />भगवान ने बड़ा जुलुम किया <br />हमारी भी अंतरात्मा ट्रांसफरेबल बनाते <br />ताकि हमें भी उसकी आवाज़ आती <br />और हम एक नहीं बल्कि दो रोटी ज्यादा खा पाते <br /><br /><br />बाल किशन<br />२३-०८-२००७<br />प्रातः ९:१९बाल किशनhttp://www.blogger.com/profile/18245891263227015744noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-5934688400202363802.post-77578652523824409432008-07-22T09:49:00.001+05:302008-07-22T09:51:32.350+05:30तुम ऐसा लिखना जो सबकी समझ में आए-तुम ऐसा लिखना जो सबकी समझ में आए.<br />-लेकिन मैं लिख नहीं सकता.<br />-तुम बोल तो सकते हो न?<br />-मैं बोलने की कोशिश की थी. लेकिन आवाज़ पेट से निकली.<br />-मुन्नू कह रहा था कि सबकुछ पापी पेट की वजह से है.<br />-पापी तो आंतें होती हैं. पेट तो बिल्कुल सीधा होता है.<br />-वो देखो तुम्हारे कुरते की कंधे पर नेवला चढ़ गया है.<br />-तुम चिंता मत करो. वो आस्तीन के सांपो को काट खायेगा. <br />-कहाँ जा रहे हो?<br />-चाकलेट खरीदने.<br />-चाकलेट मीठा होता है?<br />-नहीं, अब मिठास जाती रही.<br />-मूवी देखते-देखते सो गए?<br />-मैं सोते हुए जाग रहा हूँ.<br />-मूवी में समंदर है न.<br />-समंदर सूख चुका है. कल ग्लोबल वार्मिंग से एक धमाका हुआ था. इसलिए सूख गया.<br />-और मछलियाँ कहाँ गईं?<br />-मैंने उन्हें उड़ते हुए देखा. <br />-कमीज पहनी थी, मछलियों ने?<br />-कुरता पहन रखा था. लेकिन कुरते में बटन नहीं था.<br />-और टिटहरी कहाँ गई?<br />-टिटहरी उसी सूखे समंदर में समा गई.<br />-आज पालक की सब्जी खाई थी मैंने.<br />-तुम्हारी आवाज़ में हरियाली दिख रही है.<br />-लेकिन इस हरियाली में भी अमरुद पककर पीला हो गया है.<br />-अमरूद तो हरा ही अच्छा होता है न.<br />-अब तो आम हरे होते हैं.<br />-मैंने अपने किताब में एक आम छिपाकर रखा था. डब्लू खा गया.<br />-खाने की बातें अब आम हो गई हैं.<br />-हाँ, सच कहा तुमने. कल ही अखबार में देखा था.<br />-गावस्कर की स्ट्रेट ड्राइव देखी तुमने?<br />-कल तो उन्हें मैंने बीयर पीते देखा था.<br />-स्ट्रेट ड्राइव की खुशी मना रहे थे.<br />-और पापा?<br />-वे चूल्हे पर बैठे हाथ ताप रहे थे.<br />-चूल्हा बुझ गया होगा.<br />-हाथ बुझ गया. पाँव में उन्होंने एक अंगूठी पहन रखी थी.<br />-एक अंगूठी मेरी नाक में पहना दो न.<br />-तुम्हारी नाक बिल्कुल तोते के जैसी है.<br />-और तोता काला पड़ गया.<br />-काला तो घोड़ा था. बिक गया.<br />-हाँ, कल मैंने अखबार में पढा.<br />-अब तो अखबार भी बिकने लग गए.<br />-खरीदने का अरमान चाहिए. सब बिकता है.<br />-वो विज्ञापन देखा?<br />-हाँ, उसमें उस लड़की को देखा जो रो रही थी.<br />-वो तो लड़की की आँखें रो रही थीं.<br />-हाँ, रोते हुए लड़की प्यारी लग रही थी.<br />-मुझे वो पसंद है.<br />-और मैं?<br />-तुम तो बेहद पसंद हो.<br />-और मेरी चूडियाँ जो मैंने कान में पहन रखी हैं?<br />-चूडियाँ पसंद नहीं. मुझे बिंदी पसंद है.<br />-जो मैंने अपने गले पर लगा रखी है?<br />-नहीं जो तुमने अपने कानों में दाल रखी है.<br />-कालेज जाते हुए मैंने रास्ते पर घास देखी.<br />-हाँ मैंने भी देखी. तुमने उस घास में तिलचट्टे को देखा?<br />-हाँ, देखा. तिलचट्टा उछलकर मेरी जेब में बैठा.<br />-लेकिन तुम वो लिखना जो सबकी समझ में आए.<br />-लेकिन मुझे लिखना नहीं आता.<br />-बोलना तो आता है न.<br />-हाँ, लेकिन मेरी आवाज़ गले में अटक गई है.<br /><br /><br />- बालकिशन <br />२२.०७.२००८<br />प्रातः ९:३०बाल किशनhttp://www.blogger.com/profile/18245891263227015744noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-5934688400202363802.post-79688284412136139412008-07-12T18:30:00.001+05:302008-07-12T18:32:53.082+05:30अनामिका जी की कविता - चुटपुटिया बटनमेरा भाई मुझे समझाकर कहता था - "जानती है पूनम -<br />तारे हैं चुटपुटिया बटन<br />रात के अंगरखे में टंके हुए!"<br />मेरी तरफ़ 'प्रेस' बटन को <br />चुटपुटिया बटन कहा जाता था,<br />क्योंकि 'चुट' से केवल एक बार 'पुट' बजकर<br />एक-दूसरे में समां जाते थे वे.<br /><br />वे तभी तक होते थे काम के<br />जब तक उनका साथी<br />चारों खूंटों से बराबर<br />उनके बिल्कुल सामने रहे टंका हुआ!<br /><br />ऊँच-नीच के दर्शन में उनका कोई विश्वास नहीं था!<br />बराबरी के वे कायल थे!<br />फँसते थे, न फँसाते थे - चुपचाप सट जाते थे.<br /><br />मेरी तरफ़ प्रेस-बटन को चुटपुटिया बटन कहा जाता था,<br />लेकिन मेरी तरफ़ के लोग ख़ुद भी थे<br />चुटपुटिया बटन<br />'चुट' से 'पुट' बजकर सट जाने वाले.<br /><br />इस शहर में लेकिन 'चुटपुटिया' नज़र ही नहीं आते-<br />सतपुतिया झिगुनी की तरह यहाँ एक सिरे से गायब हैं<br />चुटपुटिया जन और बटन<br /><br />ब्लाऊज में भी दर्जी देते हैं टांक यहाँ वहां हुक ही हुक,<br />हर हुक के आगे विराजमान होता है फंदा<br />फंदे में फँसे हुए आपस में कितना सटेंगे-<br />कितना भी कीजिये जतन<br />'चुट' से 'पुट' नहीं बजेंगे<br /><br /><strong>अनामिका जी के काव्य-संग्रह दूब-धान से साभार</strong>बाल किशनhttp://www.blogger.com/profile/18245891263227015744noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-5934688400202363802.post-29349662956688814432008-06-18T10:36:00.002+05:302008-06-18T10:46:20.697+05:30पचासवीं पोस्ट कुछ ख़ास होनी चाहिए...इसलिए पुकारो मैराडोना को.बहुत दिनों से महान अंतर्राष्ट्रीय कवियों की एक भी कविता पोस्ट नहीं की. आज इच्छा हुई कि एक कविता किसी महान कवि की पेश करूं. मेरी कवितायें पढ़कर आप सब ने जिस साहस और धैर्य का परिचय दिया है, उसके लिए मैं आप सब का आभारी हूँ.<br /><br />ये कविता क्यूबा के महान कवि उजेल पास्त्रो की है. अपने बिस्तर पर लेटे इस महान कवि ने हाल में ये कविता कलमबद्ध की. आप भी पढ़िए. <br /><br />ईख के खेत में नहीं उपजती है, <br />ये मंहगाई<br />न ही निकलती है <br />कानों तक पहनी गई टोपी के ऊपर से<br />किसी ने इसे नही देखा <br />नहीं देखा <br />कि ये मंहगाई उछल आई हो <br />सिगार के धुंए से बनने वाले छल्ले से<br /><br />ये तो देन है उनकी<br />उस दयाहीन साम्राज्यवाद की <br />दुनियाँ को जिसने कर लिया है अगवा <br />जिसने मंहगा कर दिया बड़ा-पाव <br />जिसने आव देखा न ताव <br />बढ़ा दिया क्रूड आयल का भाव<br />डूब गई जिसकी वजह से <br />गरीबों की नाव<br /><br />एक बार करो प्रण<br />एक बार चलो रण<br />पुकारो मैराडोना को <br />लूट लो चांदी-सोना को <br />एक बार कहो कि हो जाए नाश <br />टूट जाए साम्राज्यवाद का बाहुपाश <br />रहो चाहे दूर या रहो पास<br /><br />जिसे है जरूरत<br />ढूढे मुहूरत <br />जाए काशी या जाए सूरत <br />जाए हवाना या फिर मकवाना <br />एक बार दे वचन कि;<br />कि प्राथमिकता है <br />इस साम्राज्यवाद को मिटाना <br />नहीं बच सकेगा<br />इसका ठिकाना<br />कोई उसे जाने<br />या हो अनजाना <br /><br />पुनश्च:<br /><br />कभी सोचा नहीं था कि चिट्ठाकारिता में इतना टिकूंगा कि पचास पोस्ट लिख डालूँगा. लेकिन जैसा कि कहा गया है, सत्य कभी-कभी कल्पना से ज्यादा आश्चर्यचकित कर देने वाला होता है.<br /><br />ये मेरी पचासवीं पोस्ट है.बाल किशनhttp://www.blogger.com/profile/18245891263227015744noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-5934688400202363802.post-18181409984191998192008-06-14T14:11:00.000+05:302008-06-14T14:11:26.879+05:30पेश है लाइव मुशायरे.एक तो बालकिशन ने सबको शायर बना दिया और सब है की उसी के पीछे पड़े है.<br />बहुत नाइंसाफी हो रही है ये. बालकिशन ने क्या कहा और क्या नही कहा वो बाद की बात है पर मुशायरों की बाढ़ आ गई है ब्लाग जगत मे.<br />खैर आप सब को क्या आप तो इन मुशायरे का आनंद उठाइए.<br />ये मुशायरा चल रहा है मिश्रा जी की और रोशन जी की कल की पोस्ट पर.<br />दृश्य एक :- .<a href="http://shiv-gyan.blogspot.com/2008/06/blog-post_13.html">मिश्रा जी की पोस्ट</a> से.<br />काकेश said... <br />देखिये जी आप ये मीर ग़ालिब करते करते हमारे केडीक़े साहब को क्यों भूल गये.चंद शेर मार कर भेजे हैं.<br /><br />ये शेर चचा ग़ालिब ने भी मार लिये थे ओरिजनली केडीक़े साहब के हैं.<br /><br />ये ना थी हमारी किस्मत,जरा ऐतबार होता<br />हम पोस्ट लिखते रहते, उन्हे इंतजार होता<br /><br />कहते ना खुद को ग़ालिब ना मीर ही बुलाते<br />ज़ो तीर ही चलाते तो जिगर के पार होता<br /><br />जो डायरी थी वो भी, अब मिल गयी है उनको<br />हम को मिल जो जाती तो बेड़ा-पार होता <br /><br />अब मीर साहब वाले शेर देखें.<br /><br />जो तू ही पोस्ट लिख कर बेज़ार होगा<br />तो हमको कुछ भी कहना दुश्वार होगा<br /><br />कैसे लिखते है डेली डेली, सुबह वह पोस्ट <br />कहते हैं लोग हमसे, कोई व्यौपार होगा<br /><br />दिन में भी जो ठेलते हैं कई कई पोस्ट<br />समझो कि वो तो कोई बीमार होगा.<br /><br />June 13, 2008 9:32 PM <br />Ghost Buster said... <br />कुछ लोग कलम से शेर लिखते हैं तो कुछ गोली से शेर मारते हैं. आपने कलम से शेर को ढेर किया.<br /><br />June 13, 2008 10:46 PM <br />anitakumar said... <br />हा हा शिव भाई मजा आ गया आप की पोस्ट का भी और काकेश जी की टिप्पणी का भी, इसे पढ़ मै तो असली शेर भी भूल रही हूँ अब तो ये काकेश जी के शेर घूमेगें दिमाग में।<br /><br />June 14, 2008 12:12 AM <br />Lavanyam - Antarman said... <br />मीर ना हुए अमीर,<br />चचा गालिब की रुह <br />हुई पशेमाँ ..<br />क्या कलजुग आयो है!! <br />- लावण्या<br /><br />June 14, 2008 12:52 AM <br />कमलेश 'बैरागी' said... <br />मीर के थे तीर और गालिब का भी था इक कमान<br />नाम लेकर इन्ही का चलती है कितनी ही दुकान<br /><br />क्यों नहीं ये सोचते जो मीर-गालिब थे तो क्या <br />लिख दिया 'कमलेश' ने भी एक मोटा सा दीवान<br /><br />मीर-गालिब ब्लॉग पर लिखते गजल की पोस्ट जो <br />गर न मिलती टिपण्णी तो लुट गया होता जहान<br /><br />ये समझ लो ब्लागिंग में भी कितने गालिब-मीर हैं <br />सब मिले तो उठ गया है, ब्लॉग का ऊंचा मचान <br /><br />है सदा 'रोशन' तुम्हीं से बुद्धि का दीपक यहाँ <br />और ऐसे दीपकों से जगमगाता है मकान <br /><br />कह दिया 'कमलेश' ने भी बात जो मन में रही <br />और कहकर दे गया अपना भी छोटा सा निशान<br /><br />---कमलेश 'बैरागी'<br /><br />June 14, 2008 10:44 AM <br />काकेश said... <br />कमलेश जी को केडीके का सलाम<br /><br />आपकी दोस्ती की खातिर कुछ फ़रमा रहा हूँ.<br /><br />जिन्दगी से दो चार होइये साहब<br />मुई ब्लॉगिग में टैम ना खोइये साहब<br /><br />टिप्पणी मिलती हैं उनको,तो ख़फा क्यों हैं<br />अपनी ग़जलों में यूं ना रोइये साहब<br /><br />क्यूँ सुबौ सुबौ उठके पोस्ट करते हैं ज़नाब<br />चादर में मँह घुसाकर खूब सोइये साहब<br /><br />पुरानी दोस्ती ऐसे न खोइए साहब<br />इज़ारबंद से बाहर न होइए साहब<br /><br />June 14, 2008 11:41 AM <br />काकेश said... <br />शेर मुंआ मुँह से फिसल गया.ऐसे पढ़ें<br /><br />क्यूँ सुबौ सुबौ उठके पोस्ट करते हैं ज़नाब<br />चादर में मुँह घुसाकर खूब सोइये साहब<br /><br />एक और बोनस<br /><br />क्या बदल लेंगे दुनिया लिख के ब्लॉग-पोस्ट <br />यह सोच के अपने होश ना खोइये साहब<br /><br />June 14, 2008 11:47 AM <br />कमलेश 'बैरागी' said... <br />जनाब केडीके साहब को इस नाचीज का आदाब. चाँद अश-आर हैं. आपकी खिदमत में पेश कर रहा हूँ..<br /><br />अब गजल की वाट लगने दीजिये<br />कुछ जरा मुझको भी कहने दीजिये<br /><br />जो भी था सो कह दिया है आपने<br />जो बचा है उसको रहने दीजिये<br /><br />क्यों भला रोकें जो गिरता है यहाँ <br />गजल के 'अस्तर' को ढहने दीजिये <br /><br />मुंह ढके चादर में तो ही ठीक है<br />औ हवा ऊपर से बहने दीजिये<br /><br />कह दिया 'कमलेश' ने भी दिल की बात <br />और गहे फिर से तो गहने दीजिये<br /><br />June 14, 2008 12:05 PM <br />बाल किशन said... <br />बहुत जबरदस्त मुशायरा जम रहा है.<br />जमाये रहिये जी.<br />हम भी एक आध शेर लेकर थोडी देर में हाजिर होते हैं.<br /><br />June 14, 2008 12:30 PM <br />नीरज गोस्वामी said... <br />मुशायरे में मेरा नंबर कब आएगा...ये लोग थमे तो कुछ हम भी कहें...अर्ज़ किया है...भाई बाल किशन हमें यूँ पीछे मत घसीटो यार....अमां एक आध तो शेर तो कहने दो...बड़ी दूर से आए हैं मियां...ये क्या माईक ही उठा के ले गए जनाब...अब शेर पढ़ें या चिल्लाएं? इन बाल किशन जी को समझाओ यार...कमलेश और काकेश भाई को कुछ नहीं कहते हमारे पीछे पड़े हैं..<br />नीरज<br /><br />June 14, 2008 1:07 PM <br />कमलेश 'बैरागी' said... <br />अमां बाल किशन..मियां ये क्या कर रिये हो?..जनाब नीरज साहब को मुशायरे में कुछ पेश करने का मौका दो...म्येने सुना था एक ज़माना था जब दाग़ साहब से शाइर लोग जलते थे...म्येने तो सुना है कि जनाब असद साहब से भी शाइर लोग जलते थे...क्या कहा? असद कौन? लाहौलबिलाकुव्वत...चचा असद का नाम नहीं मालूम? कैसे नामाकूल इंसान हो तुम?...हाँ तो मैं कह रिया था कि असद उर्फ़ गालिब से भी लोग जलते थे...एक बार एक शाइर ने उनके शेर सुनकर कह दिया;<br /><br />कलाम-ए-मीर समझे औ जुबान-ए-मीरजा समझे <br />मगर इनका कहा ये आप समझें, या ख़ुदा समझे<br /><br />और आप तो ऐसे नामाकूल शाइर से भी आगे निकल गए...माईक लेकर ही भाग लिए..उर्दू शायरी में कला दिना कहेंगे हम इसे..जनाब नीरज साहब, हम आपके लिए नया माईक लेकर आते हैं.<br /><br />June 14, 2008 1:18 PM <br />काकेश said... <br />ज़नाब आप ने कहा तो हम ग़ौर फ़रमा रहे हैं.आप भे फ़रमायें. <br /><br />जो बचा है उस्को रहने दे रहे हैं<br />अंडे हुए थे 'रोशन',अपन से रहे हैं<br /><br />कश्ती कहां से निकली,कहां पहुंच रही है <br />ये सोचते नहीं अपन तो बस खे रहे हैं <br /><br />चांद निकलता था तब,अब चांद निकल गयी है<br />सर के बाल रो रोकर, दुआ दे रहे हैं<br /><br />जो लिखते थे व्यंग्य,अब ग़जल लिख रहे हैं<br />वो जल रहे हैं फिर भी, मजे ले रहे हैं.<br /><br />June 14, 2008 1:34 PM <br />रंजना said... <br />वाह वाह वाह,क्या बात है.जबरदस्त मुशायरा है.<br />कृपया चलने दीजिये,<br />हम दर्शक दीर्घा मे कृतार्थ हो रहे हैं <br />कहीं से तीर कहीं से गोले आ रहे हैं..<br /><br />June 14, 2008 1:50 PM <br />कमलेश 'बैरागी' said... <br />जनाब नीरज साहब और जनाब केडीके साहब...गौर फरमाईये...जनाब बाल किशन...कान इधर दीजिये... अरे क्या करते हैं...कान उखाड़ कर नहीं देना है..मेरा मतलब सुनिए..<br /><br />बड़ी कोशिश की गजल में व्यंग कर दूँ<br />लिख के कुछ व्यंग उनको दंग कर दूँ <br /><br />जो लिखी ऐसी गजल भौचक्के हैं वो <br />मैंने ये सोचा उन्हें भी तंग कर दूँ <br /><br />दिख रही हैं सडियल सी घर की दीवारें<br />आज सोचा उनको मैं ही रंग कर दूँ <br /><br />और ख़ास तौर पर ये शेर सुनिए...अर्ज किया है..<br /><br />वो थे, मैं था, और था 'रोशन' समा ये <br />दिल में आया आज ही मैं जंग कर दूँ.<br /><br /><br />दृश्य दो :- <a href="http://rajeshroshan.com/2008/06/13/self-praising/">रोशन जी की पोस्ट</a> से<br /><br />कहां से आ गई दुनिया कहां, मगर देखो<br />कहां-कहां से अभी भी कारवां गुजरता है।<br />—————-<br />बहुत पहले से उन कदमों की आहट जान लेते हैं<br />तुझे ऐ जिंदगी, हम दूर से भान लेते हैं।<br /><br />Shiv Kumar Mishra on June 13th, 2008 at 5:36 am <br /><br />राजेश जी,<br />ये शेर लिखने से अच्छा होता कि आप पोस्ट ही लिख देते. पोस्ट पढ़कर शायद आपकी बात समझ में आ जाती. शेर पढ़कर तो नहीं आई.<br /><br />आपका फैन on June 13th, 2008 at 5:44 am <br /><br />शेर तो सही लिखो यार। <br /><br />आपके लिये दो लाइना<br /><br />शेरो का अब बन्द करो लूज मोशन<br />कुछ तो ढंग का लिखो राजेश रोशन<br /><br />Rajesh Roshan on June 13th, 2008 at 5:52 am <br /><br />@आपका फैन<br /><br />क्या मैंने जो शेर लिखा है, वो ग़लत है. जवाब मैं दे देता ह. नही है लेकिन फ़िर भी गलती बताने वाले को मेरे तरफ़ से पार्टी.<br /><br />एक बात और बड़ा अच्छा शेर लिखा है, क्या तुक बंदी है. मोशन और रोशन. बेहतरीन. लेकिन अपनी इस उर्जा को आप किसी अच्छे जगह लगाते तो दाद देने वाले कई लोग होते. इन छोटी छोटी बातो से मैं नाहक परेशां नही होता आपका फैन जी<br /><br />Dr.Anurag Arya on June 13th, 2008 at 9:01 am <br /><br />सुबह से तीसरी पोस्ट है आज ….मीर ओर ग़ालिब पर …..उम्मीद है रात तक चौथी ना हो जाये..<br /><br />समीर लाल on June 13th, 2008 at 9:43 am <br /><br />सब मीर मीर कह रहे हैं तो वही देखने आया था. यहाँ तो मेरे लिखा है, मीर कहाँ.<br /><br />Ghost Buster on June 13th, 2008 at 11:53 am <br /><br />बधाई हो राजेश जी, हर तरफ़ आप का चर्चा है जहाँ से सुनिए.<br /><br />Gyan Dutt Pandey on June 13th, 2008 at 12:02 pm <br /><br />वाह! मीर भी “मेरे” हैं। और हम तो मीर तो हो न सके, हो गये - अनुभवी!<br />शिव कहते हैं, पोस्ट लिख देते। मेरा विचार है - कमेण्ट लिख देते!<br /><br />neeraj on June 14th, 2008 at 2:01 am <br /><br />समीर जी<br />मीर खोपोली में है…आप को तो मालूम ही है और फ़िर भी पूछ रहे हैं… देखिये न ये सब लोग हमें कहाँ कहाँ ढूंढ रहे हैं….राजेश जी और शिव जी ने हमें कितना मशहूर कर दिया है…धन्यवाद बंधुओ हमें गुमनामी के अंधेरे से बाहर निकलने के लिए.<br />नीरज<br /><br />balkishan on June 14th, 2008 at 2:43 am <br /><br />गालिब said.<br />मैं एक दिन क्या अनुपस्थित हुआ सब ने मेरा और मरी शायरी का मजाक उड़ना शुरू कर दिया.<br />अब नहीं करूँगा कभी ब्लाग्बजी.<br />आप सब से नाराज हो गया हूँ.बाल किशनhttp://www.blogger.com/profile/18245891263227015744noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-5934688400202363802.post-46764331062981511982008-06-12T11:57:00.002+05:302008-06-12T14:37:46.148+05:30रोज पूछता है मेरा बच्चा ये सवाल मुझकोफ़िर वही किस्से मंदिरों-मस्जिद के हवाओं में है<br />लगता है ये पुराना सा साल मुझको<br /><br />खामोश जबां के ही सर बचते हैं यंहा सर कटने से पहले<br />ना जाने क्यूं ना आया ये ख्याल मुझको<br /><br />आज फ़िर खाली हाथ चले आए आज फ़िर मेरा खिलौना नही लाये<br />रोज पूछता है मेरा बच्चा ये सवाल मुझको.<br /><br />ना डर ना फरेब ना घात हो जंहा पे<br />ले चल मेरे यारा उस जँहा मे मुझको.<br /><br />हर तरफ़ झूठ बेईमानी मक्कारी इस कदर है छाई<br />लगती है ये जिंदगी अब तो बवाल मुझको.<br /><br />=====================================<br /><br /><strong>नोट:<br />मैं शेर या गजल लिखने की कोशिश नहीं कर रहा हूँ, जानता हूँ की नहीं लिख सकता. सिर्फ़ अपने विचारों को शब्दों का जामा पहनाने भर की कोशिश है. </strong>बाल किशनhttp://www.blogger.com/profile/18245891263227015744noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-5934688400202363802.post-79349904376264768662008-06-06T09:40:00.000+05:302008-06-06T09:40:35.461+05:30क्या ये चेहरा तुम्हारा है?<a href="http://bp1.blogger.com/_bBgj57Qb9Fg/SEhRJHXLf2I/AAAAAAAAAE0/8gdnCJnUMRA/s1600-h/mirror+face.jpg"><img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://bp1.blogger.com/_bBgj57Qb9Fg/SEhRJHXLf2I/AAAAAAAAAE0/8gdnCJnUMRA/s200/mirror+face.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5208502186090921826" /></a><br />कभी कभी <br />या......<br />जब कभी<br />आईने के सामने खड़ा होता हूँ<br />देखने को चेहरा अपना<br />मुझे नहीं दिखता चेहरा अपना.<br />मुझे दिखते है कई चेहरे.<br />एक दूसरे मे गड़मगड़ चेहरे,<br />एक दूसरे पर हँसते चेहरे,<br />कुछ वीभत्स चेहरे,<br />कुछ विद्रूप चेहरे,<br />हर चेहरा हँसता मुझपर <br />जैसे कहता हो मुझसे......<br />खोज सको तो खोज लो<br />हम सब मे चेहरा अपना.<br />हर चेहरा दिखलाकर..... <br />आइना भी जैसे पूछता हो मुझसे<br />क्या ये चेहरा तुम्हारा है?<br />क्या ये चेहरा तुम्हारा है?<br />तुम भी सवाल करते हो....<br />क्यों देखते हो आईना तुम?<br />पर क्या करूँ <br />मुझे अपना चेहरा पहचानना है<br />ताकि मैं जवाब दे सकूं<br />जब भी आईना पूछे मुझसे<br /><strong>क्या ये चेहरा तुम्हारा है?<br />क्या ये चेहरा तुम्हारा है?</strong>बाल किशनhttp://www.blogger.com/profile/18245891263227015744noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-5934688400202363802.post-63073604880254092882008-06-05T09:55:00.000+05:302008-06-05T09:55:00.962+05:30क्यूं?<a href="http://bp2.blogger.com/_bBgj57Qb9Fg/SEddJJYpObI/AAAAAAAAAEs/V-GwTyYnp8M/s1600-h/66722817.jpg"><img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://bp2.blogger.com/_bBgj57Qb9Fg/SEddJJYpObI/AAAAAAAAAEs/V-GwTyYnp8M/s200/66722817.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5208233905796757938" /></a><br />रे दुःख तू इतना हैरान परेशान क्यूं है<br />मेरे दिल के होते ढुढता दूसरा मकान क्यूं है<br /><br />किसने तोडे मन्दिर किसने तोडी मस्जिदें<br />जो ऊपर बैठा देखता सब वो खुदा क्यूं है<br /><br />सालता तो उसको भी होगा मेरा चुप रहना<br />उसकी बेवफाई मेरी चुप्पी का सबब क्यूं है <br /><br />ख़बर आती है जब भी किसी के दीवाना होने की<br />निगाहें उठ जाती सबकी जाने उनकी तरफ क्यूं है<br /><br />जो खंजर हुआ पैबस्त है सीने मे मेरे<br />उस पे निशां हाथ के मेरे दोस्तों के क्यूं है<br /><br />हँसी की बात करती दुनिया सारी तू आंसू की <br />नाचीज तुझे ये शौक अजीब सा जाने क्यूं हैबाल किशनhttp://www.blogger.com/profile/18245891263227015744noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-5934688400202363802.post-91533940631043691212008-06-04T09:17:00.000+05:302008-06-04T09:23:04.414+05:30मेरे ब्लाग पर कैसे आई पोस्ट?कल की पोस्ट मे लिखा था आपलोगों को बताऊंगा राज इस पोस्ट <a href="http://bal-kishan.blogspot.com/2008/05/blog-post_8291.html">जवाब</a> का.<br />ये करतूत है <a href="http://yash-musaddi.blogspot.com/">इन महाशय</a> की.<br /><br /><br />रिश्ते मे मेरे भतीजे हैं. मुझसे ही ब्लॉग बनाने और हिन्दी टाइप करने सम्बन्धी जानकारी ली. और मेरे ब्लॉग पर ही हाथ साफ कर लिया.<br />जब कभी मे घर से ब्लोग्बाजी करता हूँ ये कुर्सी डालकर बगल में बैठ जाते हैं और बड़े ध्यान से सब देखते हैं और इसी तरह मेरा लाग इन आईडी और पासवर्ड मालूम कर लिया और फ़िर अपने ब्लॉग पर पहली पोस्ट देने से पहले एक प्रयोग मेरे ब्लॉग पर कर लिया.<br /><br />इससे समस्या को सुलझाने मे आप सब ने भी मेरी मदद की.<a href="http://sanjeettripathi.blogspot.com/">संजीत जी</a> की बात मानकर हार्ड डिस्क फॉर्मेट करने की तयारी हो चुकी थी पर तभी <a href="http://techchittha.blogspot.com/">सागर जी</a> और <a href="http://kushkikalam.blogspot.com/">कुश</a> के कमेन्ट से ध्यान दूसरी तरफ गया.<br />और खोज-बीन करने से जो नतीजा निकला वो आप सबके सामने है.<br />===============================================<br /><br /><strong>लीजिये नीरज जी का ये शेर पढिये.<br />======================<br />"अब के सावन मे ये शरारत मेरे साथ हुई<br />मेरा घर छोड़कर सारे शहर मे बरसात हुई."</strong>बाल किशनhttp://www.blogger.com/profile/18245891263227015744noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-5934688400202363802.post-64046981961369868012008-06-03T09:15:00.002+05:302008-06-03T13:12:03.552+05:30जावेद अख्तर साहब की कलम से - १कौन सा शे'र सुनाऊं मैं तुम्हे, सोचता हूँ<br />नया <em>मुब्हम</em> है बहुत और पुराना मुश्किल <em>(उलझा हुआ)</em><br />================================== <br /><br />ऊँची इमारतों से मकां मेरा घिर गया<br />कुछ लोग मेरे हिस्से का सूरज भी खा गए<br /><br />==================================<br /><br />हमको उठना तो मुहं अंधेरे था<br />लेकिन इक ख्वाब हमको घेरे था<br /><br />==================================<br /><br />सब का खुशी से फासला एक कदम है<br />हर घर मे बस एक ही कमरा कम है<br /><br />===================================<br /><br />इस शहर में जीने के अंदाज निराले हैं<br />होठों पर लतीफे हैं आवाज में छाले हैं<br /><br />===================================<br /><br />सब हवाएं ले गया मेरे समंदर की कोई<br />और मुझको एक कश्ती बादबानी दे गया<br /><br /><em><strong>ये तीन शेर बहुत ही खास और मेरे दिल के करीब हैं.</strong></em><br />===================================<br /><br />आज की दुनिया मे जीने का <em>करीना</em> समझो <em>(तरीका)</em><br />जो मिले प्यार से उन लोगों को <em>जीना</em> समझो <em>(सीढ़ी)</em> <br />==================================<br /><br />वह शक्ल पिघली तो हर शय में ढल गई जैसे<br />अजीब बात हुई उसे भुलाने में<br /><br />=================================<br /><br />अपनी वजहें-बरबादी सुनिए तो मजे की है<br />जिंदगी से यूं खेले जैसे दूसरे की है<br /><br />==================================<br /><br /><br />अगली पोस्ट मे खुलेगा <a href="http://bal-kishan.blogspot.com/2008/05/blog-post_31.html"><strong>रहस्य</strong></a> मेरे ब्लॉग पर पोस्ट कैसे आई.बाल किशनhttp://www.blogger.com/profile/18245891263227015744noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-5934688400202363802.post-73368340555869510072008-06-01T04:21:00.000+05:302008-06-01T04:21:01.713+05:30क्या हम इनसे कुछ सीख सकते हैं?ये सच्ची घटना है कुछ बच्चों के बारे में जिन्हें हम मानसिक रूप से विकलांग कहते है.<br />हेदाराबाद मे ये एक खेल का मैदान था. <br /><a href="http://www.nimhans.kar.nic.in/"><strong>National Institute of mental Health</strong> </a>ने एक दौड़ प्रतियोगिता आयोजित की थी.<br /><br />आठ बच्चे दौड़ प्रतियोगिता मे भाग लेने के लिए ट्रेक पर खड़े थे.<br /><br /><em>* Ready! * Steady! * Bang!!!</em><br /><br />जैसे ही बंदूक गरजी आठों ने दौड़ना शुरू किया.<br />मुश्किल से दस या पन्द्रह कदम दौड़ते ही एक छोटी बच्ची फिसली और गिर पड़ी. पाँव और हाथ छिल गए और वो दर्द से रोने लगी.<br />जब दुसरे सात बच्चों ने ये देखा और उसका रोने सुना वे रुक गए, एक पल को थमे और पीछे मुड़ गए और फ़िर दौड़ के उस छोटी बच्ची के पास पंहुचे.<br /><em>फ़िर जो हुआ वो चमत्कार नहीं था पर..........</em><br />एक थोडी बड़ी लड़की ने उसे उठाया, सहलाया और एक पप्पी दी. फ़िर पूछा; "अब दर्द कुछ कम हुआ ना."<br />दो बच्चों ने उस छोटी बच्ची को मजबूती से पकड़ा, सातों ने एक दुसरे का हाथ पकड़कर एक साथ कदम बढ़ाते दौड़ना शुरू किया और एक साथ ही विजय रेखा पार की.<br /><br />सारे ऑफिसर अवाक थे! दर्शको की तालियों की गुंज से मैदान भर गया.<br />कई आंखों मे आंसू थे.<br />शायद भगवान की भी आँखे भींगी थी.<br /><br /><strong>क्या हम कुछ सीख सकते हैं इनसे.<br /><br />समानता?<br />मानवता?<br />एकजुटता?</strong><br />=====================================================<br />आभार <br />एस. के. मिश्रा जी (अपने ब्लॉग वाले नहीं) का.<br />जिन्होंने मेल द्वारा मुझे इस सच्ची घटना की जानकारी दी.<br /><a href="http://www.nimhans.kar.nic.in/"></a>बाल किशनhttp://www.blogger.com/profile/18245891263227015744noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-5934688400202363802.post-10790399205127139122008-05-31T04:21:00.002+05:302008-05-31T04:21:01.025+05:30ब्लागवाणी /चिट्ठाजगत - कृपया इस रहस्य को सुलझाए.कल यानी दिनांक ३०-०५-०८ को सुबह नौ बजे के बाद से रात तकरीबन १० बजे के बीच मै नाहीं कंप्युटर पर बैठ सका और नाहीं कुछ लिख सका और नाहीं टिपण्णी कर सका. कहने का मतलब ये कि मैंने अपने ब्लॉग पर <br />log -in ही नही किया. फ़िर ये पोस्ट <a href="http://bal-kishan.blogspot.com/2008/05/blog-post_8291.html">जवाब</a> कैसे आई.<br /><br />नहीं समझ पा रहा हूँ.<br /><br />कोई इस रहस्य को सुलझा दे.<br /><br />खैर.<br /><br />पता चले या ना चले. उस गुमनाम मित्र के लिए मेरी तरफ़ से संदेश.<br /><br /><a href="http://bp2.blogger.com/_bBgj57Qb9Fg/SEBY4r52N0I/AAAAAAAAAEk/MA9bq-8C32I/s1600-h/pic10.gif"><img style="cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://bp2.blogger.com/_bBgj57Qb9Fg/SEBY4r52N0I/AAAAAAAAAEk/MA9bq-8C32I/s200/pic10.gif" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5206258900121564994" /></a>बाल किशनhttp://www.blogger.com/profile/18245891263227015744noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-5934688400202363802.post-3912015138491768132008-05-30T17:02:00.001+05:302008-05-30T17:08:09.301+05:30जवाबजवाब एक ही है की 'हमको नही मालूम'बाल किशनhttp://www.blogger.com/profile/18245891263227015744noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-5934688400202363802.post-43390182019536866672008-05-30T04:21:00.002+05:302008-06-03T13:13:54.477+05:30तुमको क्या मालूमदुश्मन तो खुले-आम करते है दुश्मनी की बातें<br />दोस्त मगर कब क्या कर गुजरे तुमको क्या मालूम.<br /><br />अगर पोंछने वाला कोई हो साथी तो<br />आंसुओं का मज़ा क्या है तुमको क्या मालूम.<br /><br />अरे नादान सूरज चाँद सितारों की बातें करता है<br />आसमान मे कब बादल छा जाय तुमको क्या मालूम.<br /><br />गैरों पे करम अपनों मे सितम करवा दे<br />ये कमबख्त इश्क क्या-क्या करवा दे तुमको क्या मालूम.<br /><br />वो और होंगे खंजरो-नश्तर चाहिए कत्ल करने के लिए जिनको<br />तेरी आंखो ने कितनों को मार डाला तुमको क्या मालूम.<br /><br />जन्नत खरीद ले तू सारी या खुदाई सारी<br />एक बच्चे की खुशी मे होता खुदा खुश तुमको क्या मालूम.<br /><br />===============================================<br /><br /><em><strong>बताएं:-<br />१) पान क्यों सड़ा?<br />२) घोडा क्यों अड़ा?<br />३) पाठ क्यों भुला?</strong></em><br /><em><strong>(जवाब सिर्फ़ एक ही है.)</strong></em>बाल किशनhttp://www.blogger.com/profile/18245891263227015744noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-5934688400202363802.post-40517515434021857312008-05-29T04:23:00.008+05:302008-05-29T04:23:00.294+05:30एक रहस्य - एक सपनारात........ आसमान से सुनहरी धूप के रथ पर सवार एक श्वेत, सुंदर परी मेरे घर के पास वाले कुएं की मुंडेर पर उतरी. मुझे आवाज दे देकर उसने जगाया और कभी मेरे बालों को सहलाती हुई कभी गुदगुदाती हुई हाथ पकड़कर मेरा नीले, तारों भरे आकाश मे उड़ने लगी.<br /><br />जंगल, नदी, नाले, पर्वत, खेत सब पार करते हुए हम दोनों आकाश मे उड़ते फिरने लगे...........उसके साथ से मुझे असीम शान्ति और सुख मिल रहा था. रिम-झिम बारिश की बूंदों मे भीगते हम दोनों उड़ते रहे......उड़ते रहे...... फ़िर बादलों मे बने एक सुंदर,विशालकाय भव्य महल में हम उतरे. उस महल मे हम दोनों के अलावा कोई नही था. पर स्याह काली रात का अंधकार और काले बादलों से घिरा वो महल मुझे भीतर से डराने लगा तभी वो श्वेत, सुंदर परी मेरा हाथ अपने हाथो मे लेते हुए बोली डरो मत राजा ये मेरा ही महल है. पर यंहा मुझे क्रूर राक्षस ने बंदी बनाकर रखा है. रात मे जब वो सोता है तो मैं बाहर की दुनिया मे जाती हूँ. और एक दोस्त बनाती हूँ. शायद कोई दोस्त मुझे इस राक्षस से बचा सके........ वो सुबकने लगी ...... और फ़िर मेरा हाथ पकड़े-पकड़े ही बोली क्या तुम मुझे बचाओगे राजा? मैंने कहा मैं तुम्हे जरुर बचाऊँगा इस राक्षस से, मैं उसे मार डालूँगा पर ये सब बातें सिर्फ़ उसके मोह मे मेरे मुंह से निकल रही थी और कंही एक डरावना सा ख्याल भी मन मे अ रहा था कि वो राक्षस अभी आजाये तो मुझे निश्चय ही मार डालेगा. हम इसी तरह से बातें कर ही रहे थे कि यकायक जोरदार गर्ज़न सुनाई दी जैसे पहाड़ कि ऊँची चोटी से किसी ने बड़ी चट्टान धकेल दी हो, सुंदर परी घबरा गई, वो बोली तुम्हे जाना होगा मेरे राजा, क्रूर राक्षस के जागने का समय हो गया है वो तुम्हे मार डालेगा. इतना कहकर उसने मेरा हाथ पकड़ा और आसमान की ऊँचाइयों पर ले गई और बोली अलविदा मेरे राजा.......फ़िर मिलेंगे.......वो रो रही थी.............<br /><br />मैं चीखा नहीं........नहीं.... ....तुम नहीं जा सकती इस तरह मझधार मे मुझे छोड़कर...... मैं इतने ऊंचाई से नीचे कैसे जाऊंगा, घर कैसे पहुंचूंगा, माँ राह तकेगी......पर वो नहीं मानी. उसने कहा नहीं राजा मुझे जाना ही होगा हो सका तो फ़िर मिलूंगी और उसने धीरे से मेरा हाथ छोड़ा और फ़िर आकाश की गहराइयों मे खो गई......... उस घड़ी लगा जैसे जिंदगी ने मेरा हाथ छोड़ दिया है......मैं ऊंचाई से गिरने लगा. लगा कि जैसे सब ख़त्म...... अब नहीं बच सकूँगा. मैंने सभालने की कोशिश की और फ़िर धीरे... धीरे..... संभलने लगा और ....... और...... फ़िर जैस जमीन पर चलता था वैसे ही आकाश मे चलने लगा. मेरी खुशी का कोई ठिकाना नहीं था. उस घड़ी सुंदर परी का गम दिमाग से जाता रहा, मैं फ़िर आकाश की उन्चाईया छूने लगा.<br /><br />बादलों ने मोटी मोटी जल की बूंदों से धरती को भिन्गोना शुरू कर दिया था. मुझे इतने ऊंचाई पर जाकर बादलों के साथ खेलकर असीम आनंद मिल रहा था सारे के सारे तारे मेरे इर्द-गिर्द थे मैं कभी तारों के बीच......... तो कभी बादलों के बीच....... आनंद अपनी चरम सीमा पर था. फ़िर मैंने सोचा की ऊपर से धरती कैसी दिखती है जाकर देखूं. <br />मैं थोड़ा नीचे आया तो ये क्या......... जल की जो बूंदे आकाश से गिर रही थी वो धरती पर पड़ते ही विशाल अंगारों का रूप धारण कर ले रही थी ...... आसमान के तारे भी आग का गोला बन बन कर धरती पर गिर रहे थे..... .... समूची धरती एक विशाल अग्नि कुंड बन चुकी थी......... इन अग्नि कुंड मे सब कुछ जल कर राख हो रहा था......चारों तरफ़ सिर्फ़ और सिर्फ़ आग थी.........<br /><br />=================================================================================<br /><br />मेरी पिछली पोस्ट पर ब्लोगर बंधुओं द्वारा की गई टिप्पणियों मे समस्या के हल खोजने के बजाय मुझे सांत्वना और समझौते के स्वर ही ज्यादा सुने दिए. <strong>ये शिकायत नहीं है</strong>. खैर प्रस्तुत समय के लिए मैंने इस सांत्वना मे ही समस्या का हल पाया है. <br />आप सबका धन्यवाद.<br /><br />=================================================================================<br /><br /><br /><em><strong>वो देखो गम के ठीक पीछे खुशी खड़ी हमारा इंतज़ार कर रही है.</strong></em>बाल किशनhttp://www.blogger.com/profile/18245891263227015744noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-5934688400202363802.post-2662455464763065422008-05-27T17:45:00.000+05:302008-05-27T17:46:58.241+05:30एक बहस की शुरुआत फ़िर से -- कृपया करें.बहुत हो-हल्ला हो रहा है आजकल. ब्लॉग ये है, ब्लॉग वो है, ये होना चहिये, वो होना चाहिए, वो नहीं होना चाहिए . ब्लोगियर को ये लिखना चहिये, ये नहीं लिखना चाहिए आदि-आदि. कई एक तो एक-आध दिन परेशान भी दिखते हैं कि अपने ब्लॉग जगत मे ये क्या हो रहा है. कल-परसों <a href="http://www.shiv-gyan.blogspot.com">शिवजी</a> हो रहे थे आज <a href="http://udantashtari.blogspot.com/2008/05/blog-post_27.html">समीर भाई</a> परेशान दिख रहे हैं. <a href="http://kushkikalam.blogspot.com/2008/05/blog-post_27.html">कुश </a> भी चिंतित है. और भी कई महानुभाव चिंतित हैं.<br /><br />इन सब के मूल मे क्या होता है? दरअसल हो क्या रहा है कि गाहे-बगाहे कुछ एक विवाद किस्म के मसले खड़े होते हैं या यूं कहिये खड़े किए जाते हैं. उनपर पोस्ट लिखी जाती है अब चूँकि विवादास्पद पोस्ट पढी भी ज्यादा जाती है और कमेंट्स भी ज्यादा मिलते हैं तो लोग इनकी तरफ़ आकर्षित भी ज्यादा होते हैं. पर खतरनाक बात ये है कि इन पोस्ट और इन पर आने वाली टिप्पणियों मे जिस भाषा का इस्तेमाल होता है वो बहुतो को गले नहीं उतरती और उतरनी भी नहीं चाहिए. आख़िर हम सब जुड़े हैं कुछ कारणों से कोई अभिव्यक्ति की बात कर रहा है, कोई सृजन की बात कर रहा है, कोई मस्ती की बात कर रहा है. तो फ़िर ये अभद्रता कंहा से आगई. आप किसी से सहमत नहीं हैं तो विरोध प्रदर्शन के कई रास्ते है पर अभद्रता या फ़िर गुंडई तो कतई नही.<br /><br />विवाद हो बहस भी हो खूब जम कर हो पर जिस स्तर पर हम उतर आते है वो गंदगी का पर्याय बन जाता है. आप पिछले छ महीने साल भर के ब्लोग्गिंग को ध्यान से देंखे तो पता चलेगा का कि इन विवाद की जड़ें सिर्फ़ आठ-दस ब्लोगों से ही निकलती है. और इनको बढावा देने मे कुछ तथाकथित बड़े ब्लोगियारों का हाथ होता है. जो ४-५ दिनों के अंतराल मे ही इस बिषवृक्ष को इतना बढ़ा देतें है कि कईयों का दम घुटने लगता है.<br /> <br />इस बीमारी से ब्लॉग जगत को बचाने के लिए हम सब को प्रयत्न करना होगा. जो जितना पुराना है, जितना वरिष्ठ है उसकी जिम्मेदारी उतनी ही अधिक होगी. सिर्फ़ एक - दो पोस्ट लिख कर अपनी पीडा व्यक्त कर आप अपने कर्तव्य की इतिश्री नही कर सकते. और नाही कोई तटस्थ रहकर कर सकता है क्योंकि :-<br /><br /><strong>"जो तटस्थ है समय लिखेगा उनका भी अपराध."</strong><br /><br />हमे बहुत सी बातों के बारे मे सोचना होगा जैसे:-<br /><br /><strong>और क्या किया जाय कि इस तरह की बातों की पुनरावृति ना हो? <br />जो ब्लोगियर इस तरह की हरकतें करे उसके खिलाफ क्या कदम उठाएं जायं?<br />कैसे हम यंहा के वातावरण को प्रदूषित होने से बचा सकते हैं?<br />आने वाले समय को हम क्या मुंह दिखायेंगे?</strong><br /><br />इन्ही सब बातों पर चर्चा के लिए मैंने ये शुरुआत करने की कोशिश की है इस अर्ज़ के साथ कि हर ब्लोगियर इस विषय को आगे बढ़ने के लिए अपने विचार एक पोस्ट के माध्यम से जरुर सब के सामने रखें. <br />आख़िर जब हम लोग घटिया विवाद के बिषवृक्ष को बढ़ने मे मददगार हो सकते है तो फ़िर ये तो हमारे अपने ब्लॉग जगत का मामला है. क्योंकि ये ब्लॉग जगत हम सबका है. इसे स्वच्छ और साफ रखना हम सबका कर्तव्य हो जाता है.<br /><br /><br /><strong>मुस्कुराते रहिये.</strong>बाल किशनhttp://www.blogger.com/profile/18245891263227015744noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-5934688400202363802.post-54854335418131310882008-05-25T11:00:00.001+05:302008-05-25T11:00:01.937+05:30"असफल साहित्यकारों का जमावड़ा -हिन्दी ब्लागिंग"अपनी (अ) साहित्यिक जरूरतों और कुछ बेकार सी व्यस्तता के कारण कई दिनों या शायद कई महीनों बाद ब्लॉग पर वापस आना हुआ. बीच-बीच में कुछ कविता वगैरह ठेल दिया करता था. लेकिन आज राहत के साथ आए. राहत फतह अली खान के साथ नहीं. वो तो बेचारे तीन-चार दिन पहले ही पाकिस्तान वापस लौट चुके हैं. राहत से मेरा मतलब टाइम निकाल के. खैर, आते ही जिस बात ने मेरी नज़र अपनी तरफ़ खींच ली (जी हाँ, लगा जैसे रस्सी बांधकर खीच ली), वो थी साहित्यकार बनाम ब्लॉगर. बहुतों ने हाथ साफ कर लिया है. कई तो पूरी तरह से नहा भी चुके हैं. <a href="http://vinay-patrika.blogspot.com">बोधि भाई</a>, <a href="http://azdak.blogspot.com/">अजदक जी</a>, <a href="http://pratyaksha.blogspot.com/">प्रत्यक्षा जी</a>, <a href="http://chitthacharcha.blogspot.com">headmaster saab </a><a href="http://masijeevi.blogspot.com">मसिजीवी</a>, <a href="http://shiv-gyan.blogspot.com/">शिवजी </a>और <a href="http://nirmal-anand.blogspot.com">अभय जी</a> और कई है जिन्होंने अपने घी होने के धर्म का सफलतापूर्वक निर्वाह किया और पिघल-पिघल आग में जा घुसे.<a href="http://kakesh.com/">काकेश जी</a>, <a href="http://udantashtari.blogspot.com">समीर भाई</a>,<a href="http://hgdp.blogspot.com/">ज्ञान भइया</a> , <a href="http://pangebaj.blogspot.com/">दी ग्रेट पंगेबाज</a>,<a href="http://nandinidubey.blogspot.com">नंदिनी जी</a> , <a href="http://merasaman.blogspot.com/">गौरव जी</a> वगैरह ने भी इस मंहगाई के जमाने में टिपण्णी रुपी घी झोंक दिया. <br /><br />वैसे इतने दिनों गायब रहकर मैंने ब्लागर्स की कुछ विशिष्ट प्रजातियों पर गहन शोध किए हैं और चाहता हूँ की नतीजा आपतक पहुँचा दूँ. और क्यों न पहुँचाऊँ? कौन सा सेंसर बोर्ड आदे आएगा इस काम में? आपको बता दूँ कि मेरे शोधानुसार कुल चार तरह के साहित्यकार और ब्लॉगर होते हैं.<br /><br />एक तो वे साहित्यकार जो पाठकों या टिप्पणियों के प्रभाव से पूरी तरह से मुक्त होतें हैं. उनके पास ये पाठक और उनकी टिप्पणियां खुदबखुद पहुँच जाती है. और अगर ना भी पंहुचे तो उनकी अनुपस्थिति से बगैर प्रभावित हुए वे अपना लेखन जारी रखतें है. इस प्रजाति के साहित्यकार लगभग विलुप्त हो चुके है. और इनकी संख्या नगण्य हैं.<br /><br />दूसरे प्रकार के वे ब्लोगर होते है जिन्हें पाठकों (और उपधियायों) और उनकी टिप्पणियों की कोई कमी नहीं महसूस होती है. इसके पीछे कारण ये बताया जाता है की ये स्वयं भी बहुत बड़े पाठक होते है और अपने ब्लॉगर भाइयों को कभी भी टिप्पणियों की कमी महसूस नहीं होने देते. इस प्रजाति के ब्लोगर बड़े निर्दोष प्रकार के होते है और बड़े ही निर्विकार भाव से अपनी टिपण्णी का खजाना लुटाते रहतें हैं. इनका मूल-मंत्र "सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय" होता है. खाकसार की गिनती भी चंद महीनों पहले तक इसी प्रजाति के ब्लोगरों मैं होती थी. और अब वो उसी रुतबे को वापिस हासिल करने को बेताब और कर्मरत है.<br /><br />तीसरे प्रकार के वे साहित्यकार कम ब्लॉगर होते हैं जो किसी भी क्षेत्र मे कोई झंडा नहीं गाड़ सके हैं. इस प्रजाति के साहित्यकार/ब्लॉगर अपनी प्रजाति को लेकर दुविधा और संशय मे रहते हैं कि वे अपने आप को साहित्यकार माने या फ़िर एक ब्लॉगर. और यही दुविधा इनकी असफलता का कारण बनती है. ब्लागिंग ग्रह पर यह प्रजाति प्रचुर मात्रा मैं पाई जाती है. इनका लिखा भी बहुधा लोगों को समझ नहीं आता है. ये एक अलग विचार का मुद्दा बन सकता है कि इनका लिखा पाठको को न समझ मे आना इनकी कमी है या फ़िर पाठकों की. इस प्रजाति के प्रभाव के कारण ही ब्लागिंग ग्रह से बाहर के प्राणी यह कहने की हिमाकत करतें है कि "असफल साहित्यकारों का जमावड़ा -हिन्दी ब्लागिंग"<br /><br />ब्लागरों कि चौथी प्रजाति बड़ी ही अजीब किस्म कि होती है. इन्हे ना साहित्यकार से कोई सरोकार है ना ब्लॉगर से. ये "स्वान्त सुखाय" लिखते है. जब मन हुआ कुछ लिख दिया और जब मन हुआ टिपिया दिया. इन्हे अपनी प्रजाति को लेकर कोई संदेह नही हैं. और ये शुरू से जानते हैं कि ये कंही भी कोई झंडा नहीं गाड़ सकते. नाचीज के अन्दर वर्तमान मे इसी प्रजाति के गुण मौजूद हैं और किसी तरह से इस प्रभाव से मुक्त होकर अपनी आप को सफल साहित्यकार या सफल ब्लॉगर बनाने की जुगाड़ मे है. इस सन्दर्भ मे सभी प्रजातियों के सुझावों का स्वागत हैं.<br /><br />DISCLAIMER:-<br /><br />किसी भी प्रकार के विवाद से बचने के लिए यंहा उदाहरणार्थ साहित्यकारों एवं ब्लागरों के नाम नही दिए गए हैं.<br />सभी प्रकार की प्रजातियों से अनुरोध हैं की शोध के परिणामों के अनुसार अपना मूल्यांकन कर लें. शोध पर आपकी टिप्पणियों का स्वागत हैं. टिप्पणियों मे अगर अपनी प्रजाति को स्पेसिफाई कर सकें तो आगामी शोधों के लिए ये एक अमूल्य धरोहर साबित होगी.बाल किशनhttp://www.blogger.com/profile/18245891263227015744noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-5934688400202363802.post-29963643427749393752008-05-20T19:30:00.001+05:302008-05-20T19:35:15.636+05:30'उनकी' एक कविताजिन्होंने भी परसाई जी का उपन्यास, रानी नागफनी की कहानी पढा है, उन्हें वह कवि जरूर याद होंगे जो कुँवर अस्तभान को कविता सुनाकर उनका मनोरंजन करना चाहते हैं. उन्ही कवि की एक कविता पढ़िए...<br /><br />कल तक मैं समंदर था<br />स्थिर था<br />धरती को डुबोये था <br />एक दिन इच्छा हुई; <br />मैं आकाश में उड़ जाऊं<br />एक गौरैया की तरह <br /><br />कभी सोचता;<br />'काश, कि मैं हिमालय पर बहता'<br />तो हिमालय को ख़ुद में डुबो लेता <br />किंतु हाय; ऐसा हो न सका <br /><br />लेकिन ये कौन है <br />जिसने मुझे हिमालय से अलग कर रक्खा है?<br />ये कौन है <br />जो मुझे रोकता है आकाश में उड़ने से?<br />ये कौन है<br />जो मुझे रोकता है गौरैया बनने से<br /><br />ये नीली व्हेल<br />ये शार्क <br />ये छोटी छोटी मछलियाँ <br />मेरी किस्मत में क्या यही हैं?<br />क्या मैं कभी हिमालय को नहीं डुबो सकूंगा?<br />कोई मुझे क्यों नहीं बताता?<br /><br />जिसने भी मुझे रोक रक्खा है <br />उससे मेरी विनती है;<br />एक बार तो मौका दो<br />हिमालय को ख़ुद के अन्दर डुबोने का<br />गौरैया बनकर उड़ने का<br /><br />एक बार मौका दो<br />कि मैं भी कश्मीर में बह जाऊं <br />वहाँ से हिमाचल होते हुए<br />दिल्ली तक पहुँच जाऊंबाल किशनhttp://www.blogger.com/profile/18245891263227015744noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-5934688400202363802.post-55302530054945281222008-03-25T23:17:00.000+05:302008-03-25T23:21:53.061+05:30आपका नाम भी मूक-वधिर रजिस्टर में लिख दूँ?पिछले महीने डॉक्टर ने मेरा ब्लॉग देखा और मुझे मूक-वधिर घोषित कर दिया. मैंने सोचा इन्होने मेरा कोई टेस्ट वेस्ट तो किया है नहीं तो फिर मेरा नाम मूक और वधिर रजिस्टर में क्यों डाला? शायद मेरी सोच भांप गए. बोले; "एक हिन्दी ब्लॉग के मालिक हो. उसके बावजूद गाजा में इसराईली दखलंदाजी की खिलाफत करते हुए पोस्ट नहीं लिखी तुमने. अब तुम्ही बताओ, तुम्हें और क्या कहूं मैं?" <br /><br />मैंने सोचा इसराईली नीतियों के ख़िलाफ़ बोल देता तो मूक वधिर रजिस्टर में नाम तो नहीं जाता. फिर सोचा, लेकिन बोलने वालों की कमी है क्या? नेहरू, नासिर, टीटो ने क्या किया? बेचारे बोलते ही तो थे. यासिर अराफात भारत आते थे तो इंदिरा जी बोलती थीं. इंदिरा जी बाहर जाती थीं तो गुट निरपेक्ष सम्मेलनों में बोलती ही तो थीं. जुलियस न्येयेरेरे जी बोलते ही तो थे. लालू जी अराफात जी के अन्तिम संस्कार में गए थे. बोले ही तो थे. तो भइया, बोलने के लिए कुछ हैसियत भी तो चाहिए. हम अगर अंतराष्ट्रीय मुद्दों पर बोलेंगे तो प्रधानमंत्री किस मुद्दे पर बोलेंगे? विदेश मंत्री किस मुद्दे पर बोलेंगे? जेएनयू में खेलने विचरने वाले किस मुद्दे पर बोलेंगे? और हम तो जी अपने गली-मुहल्ले में होने वाले झगडों पर बोलेंगे. अपनी पहुँच उतनी ही है.<br /><br />कल डॉक्टर साहब मिल गए. वही जिन्होंने मेरा नाम मूक वधिर रजिस्टर में दर्ज कर दिया था. मैंने उनसे पूछा; "क्या डॉक्टर साहब, आपने विरोध किया की नहीं?"<br /><br />बोले; "हाँ हाँ, बिल्कुल किया. इसराईल को गालियाँ दी. और देखना हम लोग इसराईल की क्या हालत करते हैं."<br /><br />मैंने कहा; "वो तो पिछले महीने की बात है. मैं तो इस महीने की बात कर रहा हूँ. मैं तो ये जानना चाहता था कि आपने चीन का विरोध किया कि नहीं? मैंने सुना है तिब्बत में बड़ी तबाही मचा रहे हैं चीन वाले."<br /><br />मेरी बात सुनकर बोले; "अच्छा, अच्छा, चीन की बात कर रहे हो. लेकिन मेरा तो मानना है कि तिब्बत पहले से ही चीन का हिस्सा है."<br /><br />"लेकिन इतिहास में तो लिखा गया है कि तिब्बत पर चीन ने हमला कर उसपर कब्जा कर लिया था. इसी वजह से दलाई लामा बेचारे भारत आए थे"; मैंने उनसे कहा.<br /><br />मेरी बात सुनकर कुछ देर सोचते रहे. फिर बोले; "तो इसमें कौन सी नई बात है? अमेरिका ने इराक पर हमला नहीं किया क्या?"<br /><br />उनकी बात सुनकर लगा जैसे अभी कहने वाले हैं कि 'अगर अमेरिका ने इराक पर हमला नहीं किया होता तो चीन तिब्बत को अपने कब्जे में नहीं लेता. लेकिन आख़िर ठहरे डॉक्टर. इतना जरूर मालूम है कि पहले चीन ने तिब्बत पर हमला कर उसे अपने कब्जे में लिया था.'<br /><br />मैंने उनकी तरफ़ देखा. लगा कि एक बार पूछ लूँ कि आपका नाम उसी रजिस्टर में लिख दूँ?बाल किशनhttp://www.blogger.com/profile/18245891263227015744noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-5934688400202363802.post-59113753808731243632008-02-24T13:13:00.002+05:302008-02-24T13:34:31.871+05:30जवानी ओ दीवानी तू जिन्दाबाद.३५-४० के आस-पास की उम्र भी एक खतरनाक पड़ाव हैं. उम्र के इस पड़ाव पर बहुत कुछ अधूरा सा लगता है. ये भी महसूस होता है कि बहुत कुछ पीछे छुटता जा रहा है. दिमाग अपने आप को अभी भी अपने आप को बुजुर्गों की श्रेणी मे मान लेने के लिए तैयार नहीं हैं. जो कि शायद सही भी है. लेकिन शरीर भी युवाओं का साथ देने से कतराने लगता है. ऊपर से अगर स्लिपडिस्क और स्पोंडेलाइसिस जैसी बीमारियों से दोस्ती हो जाय तो क्रियाकलापों मे जो लिमिटेशंश आजाती है वो आपकी मनःस्थिति को भी प्रभावित करती हैं. लेकिन कभी कभी कुछ ऐसे वाकयात हो जाते है जो बहुत सी दुविधा दूर करने मे मददगार साबित होतें है.<br /><br />आज सुबह की ही बात है फैक्ट्री आते समय जब ऑटो-रिक्शा मे बैठा तो मेरे पहले से ४ लड़के-लड़कियां बैठे थे. उम्र सबकी लगभग १८ से २३ साल. तकरीबन १० मिनट का सफर था उस ऑटो मे हम सबका. उस दरमियान मेरा ध्यान अनायास ही उनकी बात- चित पर चला गया. मैंने जो कुछ सुना, महसूस किया वो कुछ इस प्रकार था.<br /><br />बात-बात पर जोरदार हँसी जैसे सब कुछ उनके हंसने के लिए ही बना है या हो रहा है. जोर-जोर से बातें कर रहे थे सब जैसे उनके अलावा आस-पास कोई नहीं हो. सब के सब आपस मे ही खोये हुए, अपने चारो तरफ़ फैली दुनिया से बिल्कुल अनजान और बेखबर. मैंने अचानक एक बार उनकी तरफ़ उत्सुकतावश नज़र घुमा कर देखा तो अचानक ऑटो मे मरघट सी शान्ति छा गई. मुझे भी अपराध-बोध होने लगा कि क्यों मैंने इस ढंग से देखा उन्हें. फ़िर १-२ मिनट बाद सब कुछ पूर्ववत् चलने लगा. उनके इस अपार उर्जा के स्रोत के प्रति जो उन्हें इस कदर जीवंत रखती है, मुझे जिज्ञासा होने लगी. <br /><br />इन १०-१२ मिनटों के दौरान हर विषय पर बातें की उन्होंने क्रिकेट, फिल्में, अपनी पढ़ाई के विषय आदि-आदि. लेकिन वो जोर-जोर से हँसना और ऊँची आवाज के साथ सब कुछ चलता रहा. कोई भी इस प्रकार उन लोगों को देखे तो ये सोच सकता है कि ये बड़े अभद्र बच्चे है. कोई उनकी प्रगतिशीलता पर सवाल खड़े कर सकता था कोई उनको पतनशील बता सकता था.<br /><br />पर उनकी ये हरकतें मुझे १०-१५ साल पीछे ले गई. अचानक लगने लगा जैसे मैं भी उन चारों मे से ही हूँ. अपने समय की बहुत सी बातें याद आ गई. कैसे सब दोस्त यार मिलकर इसी तरह मस्ती करते थे. बिना मतलब के घंटों रास्तों पर घूमना, बात-बात पर खिलखिलाकर हँसना. स्कूल, कॉलेज के समय की गई बदमाशियां, शरारतें सब आंखो के सामने नाचने लगी. <br /><br />सहसा ही रहस्य से परदा उठने लगा वही उर्जा मैं अपने आप मे भी महसूस करने लगा. लगा की सारी दुनिया को मुट्ठी मे बंद कर सकता हूँ. हौसला इस कदर बढ़ा हुआ लगता था की उस घड़ी दुनिया मे मेरे लिए कुछ भी असंभव नहीं है. ये उर्जा, ये हौसला प्रकृति का एक नायब तोहफा है युवाओं को, जवानों को और उनकी जवानी को.<br /><br />मुझे राजेश खन्ना साहब की फ़िल्म का ये गाना याद आने लगा जो उन्होंने जूनियर महमूद के साथ गाया था.<br /><br /><strong>" तेरे ही तो सर पे मुहब्बत का ताज है<br /> जवानी ओ दीवानी तू जिन्दाबाद."</strong>बाल किशनhttp://www.blogger.com/profile/18245891263227015744noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-5934688400202363802.post-48121287220980747792008-02-23T12:33:00.002+05:302008-02-23T12:39:53.614+05:30समाज विकास (अखिल भारतवर्षीय मारवाड़ी सम्मेलन) की सूचना के निहितार्थ.<strong>समर्थन के लिए सभी ब्लोगर बंधुओं को धन्यवाद.</strong><br />मेरी कल की पोस्ट "घूस देकर सब मैनेज करते हैं मारवाड़ी " पर अखिल भारतवर्षीय मारवाड़ी सम्मेलन द्वारा जो कुछ कहा गया उसके जवाब मे कुछ कहना चाहूँगा. पहले आप सब उनकी ये टिपण्णी देखें.<br /><br />समाज विकास said... <br />सम्मेलन द्वारा जारी प्रेस विज्ञप्ती:<br /><br />पश्चिम बंगाल के भूमि सुधार मंत्री श्री अब्दूल रज्जाक मौल्ला की कथित टिप्पणी के विषय में अखिल भारतवर्षीय मारवाड़ी सम्मेलन के अध्यक्ष श्री सीताराम शर्मा ने मंत्री श्री मौल्ला से मालदह में फोन पर बातचीत कर अपना असंतोष एवं प्रतिवाद ज्ञापित किया। श्री मौल्ला ने उन्हें स्पष्ट किया कि उनकी कथित टिप्पणी को तोड़ मरोड़ कर प्रस्तुत किया जा रहा है। श्री मौल्ला ने अपने वक्तव्य को स्पष्ट करते हुए कहा कि उन्होंने यह कहा था मारवाड़ी समुदाय मुख्यतः व्यवसाय में है अपने व्यवसाय को अच्छा ‘‘मैनेज’’ करना जानते हैं। श्री मौल्ला ने कहा इस ‘‘मैनेज’’ ‘शब्द को मीडिया द्वारा गलत रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। श्री मौल्ला ने श्री शर्मा से कहा कि वे मारवाड़ी समाज सहित सभी समाज की इज्जत करते हैं एवं जातिगत तथा साम्प्रदायिक आधारित टिप्पणी में विश्वास नहीं करते । उन्होंने कहा कि मेरा अभिप्राय मारवाड़ी समाज की भावना को ठेस पहुँचाना कतई नहीं था।<br /><br />अखिल भारतवर्षीय मारवाड़ी सम्मेलन, मंत्री महोदय के स्पष्टीकरण पर संतोष व्यक्त करते हुए ऐसे संवेदनशील विषय पर मंत्रियों द्वारा टिप्पणी में संयम एवं सावधानी बरतने की अपील करती है। <strong>सम्मेलन मारवाड़ी समाज से भी मंत्री महोदय के स्पष्टीकरण एवं ठेस नहीं पहुंचाने के वक्तव्य को सही भावना के साथ लेने की अपील करता है। </strong><br /><br />-शम्भु चौधरी (सहयोगी संपादक, समाज विकास),<br /> दिनांक : 22.02.2008<br /><br /><strong>सम्मेलन को कोटी-कोटी धन्यवाद.</strong>लेकिन एक बात आप सबकी नज़र मे लाना चाहता हूँ कि रज्जाक साहब इस मामले मे सफ़ेद झूठ बोल रहे है. उनके कथित भाषण की सीडी <strong>"प्रभात खबर - कोलकत्ता कार्यालय"</strong> मे उपलब्ध है. आप अवलोकन कर सकते हैं.<br />दूसरी बात जब से उनका ये बयान आया है एक-एक वाम पंथी नेता ये कहकर अपना पल्ला झाड़ रहे है कि उनके इस बयान से पार्टी का कोई लेना देना नहीं है. कल तो मुख्यमंत्री माननीय बुद्धदेव जी ने माफ़ी भी मांगी है.<br /><br />मेरे इस स्पष्टीकरण का मकसद केवल इतना है कि <strong>" जब किसी की अस्मिता और अस्तित्व का सवाल हो इतनी उदारता अच्छी नही होती"</strong><br />बाकी आप लोग सब गुणी और प्रतिष्टित व्यक्ति है. आप ज्यादा समझतें है.