tag:blogger.com,1999:blog-44972692645312813452008-07-27T14:46:06.048+05:30हँसते रहो Hanste Rahoराजीव तनेजाhttp://www.blogger.com/profile/00683488495609747573rajivtaneja2004@gmail.comBlogger97125tag:blogger.com,1999:blog-4497269264531281345.post-47129341016029074142008-07-27T14:41:00.001+05:302008-07-27T14:46:06.060+05:30महिमा मंडन एक ग्राम सेवक का<p>&#160;</p> <p><b><font size="3">&quot;महिमा मंडन-एक ग्राम सेवक का&quot;</font></b> </p> <p><font size="3">भारत किसानों का..खेत-खलिहानों का देश है।हमारे देश की 70% से ज़्यादा आबादी खेती पर निर्भर है।ज़ाहिर है कि जब इतने ज़्यादा लोग एक ही काम में....एक ही मकसद में जुटे होंगे तो उन्हें कई तरह की मुश्किलों का सामना भी करना पड़ता होगा।लेकिन राई के दाने बराबर छोटी मुश्किलों को पहाड़ बराबर बताने का हुनर तो कोई इन भोले किसानों से सीखे।मेरे ख्याल से तो ये बेकार की ड्रामेबाज़ी सबका ध्यान अपनी तरफ खींचने की कवायद भर ही है क्योंकि..</font> </p> <ul> <li><font size="3">जहाँ एक तरफ किसान रोना रोते हैँ खेतो में बिजली ना होने का.... तो यहाँ शहर में ही कौन सा हरदम लट्टू(बल्ब)चमचमियाते रहते हैँ?लाईट जैसी वहाँ जाती है..ठीक वैसी ही यहाँ भी जाती है।</font> </li> <li><font size="3">वो कहते हैँ कि गाँवों में खेतों को प्रचुर मात्रा में पानी नहीं मिल रहा है तो यहाँ शहर में ही कौन सा हम स्विमिंग पूल में आए दिन डुबकियाँ लगा...पिकनिक मना रहे होते हैँ?</font> </li> <li><font size="3">वो समय पे <strong>'खाद'</strong> इत्यादि के ना मिलने से दुखी रहते हैँ तो यहाँ हम ही कौन सा सब कुछ पाकर सुखी हो गए हैँ?</font> </li> <li><font size="3">अगर कभी वो अपने आपसी झगड़ों से त्रस्त नज़र आते हैँ तो यहाँ कौन सा हम आपस में गलबहियाँ डाल फूले समा रहे होते हैँ? </font></li> <li><font size="3">किसानों का कहना है कि उन्हें आए दिन एक से एक दिक्कत पेश आती रहती है और वो सदा परेशानियों से घिरे रहते हैँ लेकिन इसमें कौन सी बड़ी बात है?यहाँ शहर में ही कौन चैन से बेचिंत हो...वेल्ला बैठ मूँगफली चबा रहा होता है?</font> </li> </ul> <p><font size="3">ठीक है!...माना कि किसानों को कई परेशानियाँ है....कई मुश्किलें हैँ।तो क्या इन छोटे-मोटे कामों के लिए सरकार खुद या फिर उसके कोट-पैंट पहने सूटेड-बूटेड मातहत अफसर रोज़ाना कीचड़ और गोबर की दुर्गन्ध भरे माहौल से दो चार होते रहें? <br />&quot;नहीं ना?&quot;... <br />वैसे अगर मेरी राय मानें तो आप ऐसे घिनौने सपने देखना तो छोड़ ही दें कि सरकार के बड़े-बड़े शाही अफसर खुद सीधे सीधे...पर्सनल तौर पर गाँव के निपट गँवारों से आ के संपर्क साधेंगे।लेकिन फिर भी दरियादिली देखिए इन फुली 'ए.सी' के 'वैल फर्निशड' दफ्तरों में बैठने वाले 'इंगलिश स्पीकिंग' अफसरों की कि उन्होंने देश की खातिर...किसानों की खातिर&#160; 'ग्राम सेवक' नामक अपने नुमाईन्दे को उनकी सेवा में अर्पित कर दिया कि &quot;लो!...खुश हो जाओ और सम्भालो इसे...यही है तुम्हारा <strong>ग्राम सेवक</strong>&quot;... </font></p> <p><strong><font size="3">&quot;अब करते रहो आराम से&#160; इसकी सेवा।&quot;</font></strong> </p> <p><font size="3">अब करने को तो सरकारी बाबुओं ने इस <strong>'ग्राम सेवक'</strong> नामक पद को क्रिएट कर दिया लेकिन फिर उनके सामने ये यक्ष प्रश्न मुँह उठाए खड़ा हो गया कि इन स्थानों पर रखा किसे जाए?अर्थात किसकी भर्ती की जाए इस मलाईदार पद के लिए?तो किसी समझदार ने पूरी ईमानदारी से अपनी समझदारी दिखाते हुए कहा होगा....</font> </p> <p><font size="3">&quot; इसमें क्या है?....जो करारे-करारे नोट खिलाएगा वही साँवली-सलौनी नौकरी पाएगा....सिम्पल&quot;और फिर सबने सर्वसम्मति से इस प्रस्ताव को पारित कर इस पर 'आफिशियल' की अनधिकारिक मोहर लगा दी होगी।इसके बाद उन सभी स्थानों पर अपने आदमियों को पैसे ले-ले फिट किया गया।अब आप पूछेंगे कि अचानक इतने सारे अपने आदमी कहाँ से टपक पड़े?... <br />तो भय्यी!...जब उन्होंने पैसे दे दिए...तो वो पराए कहाँ रहे?...अपने ही हो गए ना?... <br />खैर!...नौकरी तो दे दी गई लेकिन फिर सवाल उठा कि...&quot;ये ग्राम सेवक नाम का जंतु आखिर करेगा क्या?&quot;</font> </p> <p><font size="3">क्या इसे ऐसे ही भोले-भाले किसानों को मुफ्त में ठगने का लाईसैंस दे खुला छोड़ दिया जाए?...</font> </p> <p><font size="3">&quot;नहीं ना?&quot;...</font> </p> <p><font size="3">&quot;और अगर कुछ नहीं करेगा तो उसे पैसा किस बात का दिया जाए?...</font> </p> <p><font size="3">तनख्वाह किस बात की दी जाए?&quot;</font> </p> <p><font size="3">क्योंकि पुराना उसूल जो बना हुआ है कि...आराम ...हराम है। <br />इसलिए उसका पहला काम जो उसे सौँपा गया वो था कि अलसुबह पँचायत भवन को खोलना और साँझ ढलते ही उसे बन्द करना।अलसुबह इसलिए खोलना कि ताश पीटने वालों और दारू पी अपना मनोरंजन करने वालों को धूप या बारिश में बाहर खड़े हो इंतज़ार ना करना पड़े।यू नो?&#160; इंतज़ार करना ही सबसे मुश्किल काम होता है।...अब अगर माशूका-वाशूका का इंतज़ार करना पड़े तो कोई करे भी।... <br />अब यहाँ उनकी माशूका याने ताश की गड्डी या दारू की बोतल...अद्धा पव्वा तो उनके खीसे में पहले से ही मौजूद होता है तो फिर इंतज़ार कौन कम्बख्त करता फिरे? </font></p> <p><font size="3">असल में सरकारी बाबुओं ने एक सोची समझी रणनीति के तहत इस 'ग़्राम सेवक' नामक चमचे की रचना की जो बिना किसी लाग-लपेट के उनके उल्लू को सीधा करता रहे।और ये सब इस तरह किया गया कि इस से देश और देश की किसान लॉबी में सीधे-सीधे ये संदेश गया कि यह <strong>'ग्राम सेवक'</strong> किसानों के बीच का है और उनके हालात को...उनकी परेशानियों को समझ कर उनका हल ढूँढने में सक्षम है। </font></p> <p><strong><font size="3">&quot;सही ग्राम सेवक वो&#160;&#160; जो सेवा कर&#160;&#160; दिल जीत </font></strong></p> <p><strong><font size="3">खेत की&#160;&#160; खलिहान की&#160;&#160; आवाम की&#160; सबकी पीड़ा हरे&quot;</font></strong> </p> <p><font size="3">खैर!...ये तो हुई <strong>'ग्राम सेवक'</strong> शब्द की सरकारी परिभाषा लेकिन असलियत इसके बिलकुल ही उलट है।असलियत में <strong>ग्राम सेवक</strong> वो होता है जो सरकारी एड का...सरकारी फण्डों का एक-एक ग्राम तक नोच ले..लूट-खसोट ले।कहने को तो लिखत्तम में उसके काम कुछ और होते हैँ और बखत्तम में कुछ और...जैसे सरकारी तौर पे तो इनका काम होता है....</font> </p> <ul> <li><font size="3">ग्राम पंचायतों के रिकार्ड मेनटेन रखना..उनके बही-खाते अप टू डेट रखना वगैरा वगैरा लेकिन असल में पहले वो अपनी सेहत...अपना स्टैंडर्ड...अपना बैंक बैलैंस मेनटेन करता है और अपनी आमदनी को एकदम एकूरेट याने के अप टू दा मार्क रखता है।</font> </li> <li><font size="3">उसका दूसरा काम होता है पंचायतों की महीने भर में हुई बैठकों का ब्योरा रखना लेकिन उसका इंटरैस्ट इन कामों के बजाय इस सब में होता है कि...फलाने फलाने पंच ने इस महीने कितने रुपए कूटे और कितने नहीं।</font> </li> <li><font size="3">उसके जिम्मे एक और निहायत ही ज़रूरी काम होता है कि वो ग्रामीण विकास और उन्नति के कार्यक्रमों को सुचारू रूप से लागू करने में ग्राम पंचायत की हरसंभव मदद करे।तो इसके लिए वो(ग्राम सेवक) और पंच दोनों अपने विकास और अपनी उन्नति के लिए एक दूसरे की पूरी ईमानदारी...मेहनत और लगन के साथ जी भर मदद करते हैँ।</font> </li> <li><font size="3">ग्राम सेवक का एक और काम होता है कि वो <strong>'पंचायत'</strong> और <strong>'बी.डी.पी.ओ</strong>' के बीच में बिचौलिए की तरह काम करे।तो इस काम को बखूबी पूरा करते हुए वो इधर की बातें उधर और उधर की बातें इधर करने में कोई कसर नहीं छोड़ता है।</font> </li> </ul> <p><font size="3">लेकिन वो पुरानी कहावत सुनी है ना कि <strong>&quot;कुत्ते को घी हज़म नहीं होता है&quot;...</strong>ठीक वैसे ही किसानों को ये ग्राम सेवक हज़म नहीं होता है।हाज़मा खराब रहता है उनका हरहमेशा। पचा नहीं पाते हैँ कि कोई उन्हें...सरकार को&#160; यूँ ही दिनदहाड़े ठगता चला जाए।वो कहते हैँ ना कि <strong>&quot;एक तो करेला...ऊपर से नीम चढा&quot;...</strong>एक तो कभी ना संतुष्ट होने वाला उनका&#160; स्वभाव ...ऊपर से ये औरतों वाली चुगलखोरी की आदत।बाप रे!...कभी इसकी चुगली तो कभी उसकी चुगली...वो शिकायत करते हैँ कि...</font> </p> <ul> <li><font size="3">ग्राम सेवक अपनी ड्यूटी ठीक से नहीं करते और ज़्यादातर गैर हाज़िर रहते हैँ।... <br />अरे!..ऐसी कौन सी खेत-खलिहानों में गोली चल रही है जो वो रोज़-रोज़ सावधान मुद्रा में हाज़िर हो अपनी ड्यूटी बजाएँ?</font> </li> <li><font size="3">किसान कहते हैँ कि ग्राम सेवक पंचायत के साथ मिलकर सरकारी ऐड और सरकारी फण्ड का एक-एक ग्राम तक लूट कर देश को तबाह करने में लगे हैँ...बरबाद करने में लगे हैँ।लेकिन उनसे पूछो तो ग्राम-मिलीग्राम नहीं बल्कि हर माईक्रोग्राम तक का उनका हक बनता है।आखिर कौन बक्श रहा है देश को? सभी तो लूटने-खसोटने में जुटे हैँ।तो ऐसे में ये कहाँ का इंसाफ है कि वो अकेला&#160; साधू-महात्मा बन दूर बैठे खाली तमाशा देखता रहे? </font></li> </ul> <p><font size="3">खैर ये सब शिकवे-शिकायतें तो लगी ही रहेंगी लेकिन इनके चक्कर में कहीं असली बात ना छूट जाए कि आज के आधुनिक युग में नारी की शक्ति को...नारी की महत्ता को नकारा&#160; नहीं जा सकता।वो कहते हैँ ना कि हर सफल आदमी के पीछे एक नारी का हाथ होता।ये </font><font size="3">सच्चाई ही तो है कि वर्तमान सरकार के पीछे 'सोनिया गाँधी' का हाथ है...इसलिए ये चल रही है।</font> </p> <p><font size="3">पुरानी सरकारों ने भी नारी जाति की महत्ता को पहचाना और उसका&#160; पूरा सम्मान करते हुए उसे <strong>'ग्राम सेविका'</strong> के पद पे सुशोभित किया।जहाँ इनका काम....</font> </p> <ul> <li><font size="3">लिपस्टिक पाउडर और बिन्दी लगा सजने संवरने के अलावा अपने इलाके में महिला मण्डलों का निर्माण कर उन्हें चलाना होता है।लेकिन सार्वभौमिक तथ्य ये है कि भला अकेली बेचारी औरत इतना सब कैसे कर पाएगी?कैसे झेल पाएगी काम के भारी दबाव और टैंशन को?इसलिए उसके हर काम में उनके घर के मर्दों का पूरा-पूरा दखल रहता है और जो कुछ कुँवारी या चिर कुँवारी टाईप की होती हैँ तो उनकी मदद के लिए <br />बुड्ढों से लेकर जवान तक...कुँवारों से लेकर शादीशुदा तक.. <br />यहाँ तक कि तलाकशुदा और रंडुए तक...सभी मदद को तत्पर रहते हैँ <br />वैसे देखा जाए तो ये सब सही भी है क्योंकि इन बेचारी ग्राम सेविकाओं के जिम्मे मर्दों को रिझाने के अलावा महिला उद्धार जैसे कठिन शब्दों सरीखे&#160; कठिन काम सौँप उनका जीना मुहाल कर दिया है सरकार ने।</font> </li> <li><font size="3">सरकार कहती है कि ग्राम सेविकाएँ महिला मण्डलों के जरिए औरतों में जागरूकता ला उन्हें आत्मनिर्भर बनाएँ।लेकिन कौन कहता है कि महिलाएँ जागरूक नहीं हैँ?महिलाएँ आत्मनिर्भर नहीं हैँ?</font> </li> </ul> <p><font size="3">आज की नारी सब जानती है...सब पहचानती है।विडंबना देखिए कि 'ग्राम सेविका' वो लेकिन सेविका जैसा एक भी गुण मुझे उनमें दिखाई नहीं देता क्योंकि...उसे सब पता रहता है कि... </font></p> <ul> <li><font size="3">कैसे अपने रूपजाल में..अपने मोहपाश में फँसा मर्दों को उल्लू बना अपने स्वार्थ सिद्ध किए जाते हैँ?</font> </li> <li><font size="3">कैसे रोनी सूरत बना मर्दों को इमोशनली ब्लैकमेल कर मर्दों से बर्तन और कपड़े धुलवाए जाते हैँ?</font> </li> <li><font size="3">कैसे भोली सूरत बना शापिंग मॉलों में मर्दों की जेबें खाली करवाई जाती हैँ?</font> </li> <li><font size="3">कैसे दहेज के झूठे केसों में भोले पतियों को फँसा डराया-धमकाया जाता है?वगैरा वगैरा...</font> </li> </ul> <p><font size="3">जय हो <b>नारी शक्ति </b>की...</font> </p> <p><font size="3">जय हो <b>'ग्राम सेवक'</b> की&#160; और साथ ही जय हो <b>'ग्राम सेविका' </b>की भी&#160; </font></p> <p><font size="3">अरे हाँ!...याद आया किसानों को इन 'ग्राम सेवकों' से ताज़ी-ताज़ी शिकायत ये भी है कि ये आजकल बात-बेबात 'लाल झंडा' उठा हड़ताल पे जा इधर-उधर की हाँकने के बजाय काम ठप्प करने में ज़्यादा रुचि...ज़्यादा इंटरैस्ट लेने लगे हैँ।वैसे आप ये बताएँ कि वे पहले ही बैठ के कौन सी घुय्यियाँ ही छीला करते थे जो अब आपको तकलीफ होने लगी।क्या आपके ऐतराज़ के चलते वो हड़ताल पे भी ना जाएँ?क्या उन्हें आपके इस सड़ेले समाज में जीने का हक नहीं?</font> </p> <p><font size="3">&quot;क्या कहा?...नहीं?&quot;....</font> </p> <p><font size="3">&quot;हद हो यार आप भी!....यहाँ अपने हिन्दुस्तान में जो कर्मचारी अपने जीवन मे कभी हड़ताल पे ना गया हो उसे किसी भी हालत में सच्चा देशभग्त नहीं माना जा सकता। इसलिए आप इस बारे में इलज़ाम लगाना तो छोड़ ही दें कि 'ग्राम सेवक' आलसी हैँ...काम नहीं करना चाहते वगैरा वगैरा।कुछ पता भी है कि हाथ में झण्डा लगा&quot;सरकार...हाय-हाय... सरकार...हाय-हाय&quot; के नारे लगाने में गला कैसे सूख के सिकुड़ जाता है?...कैसे बाज़ुएँ अकड़ के दोहरी हो जाती हैँ?...कैसे सीना पिचक के पस्त हो जाता है?आपको तो इन हड़तालियों की हिम्मत की दाद देनी चाहिए कि वो ताश-बीड़ी और तीन पत्ती का लालच छोड़ कड़कती धूप में प्रशासन से...मैनैजमैंट से दो-दो हाथ कर अपने हक की लड़ाई लड़ रहे होते हैँ।इसलिए आपको तो चाहिए कि आप अपने सब वैर-भाव भुला के इन बेचारे मज़लूम <strong>'ग्राम सेवकों'</strong>&#160; का साथ दें और ज़ोर से जयकारा लगाएँ&#160; </font></p> <p><font size="3"><strong>&quot;जय हो कृपा निधान....</strong><strong>आँधी में उड़ते तूफान की&quot;...</strong></font> </p> <p><strong><font size="3">&quot;जय हो भारतीय संविधान की&quot;</font></strong> </p> <p><font size="3">***राजीव तनेजा***</font> </p> <p>&#160;</p> <p><font color="#ff0000" size="5"><strong> नोट:</strong>इस लेख को लिखने की प्रेरणा मुझे श्री अविनाश वाचस्पति जी से मिली</font> </p> <p>&#160;</p> <p>Rajiv Taneja</p> <p><font size="3">Delhi.India</font></p> <p><a href="http://www.hansteraho.blogspot.com/"><font size="3">http://www.hansteraho.blogspot.com/</font></a> <br /></p> <p>+919810821361</p> <p>+919896397625</p> <div class="blogger-post-footer"><script type="text/javascript"><!-- google_ad_client = "pub-0164171627729298"; google_ad_width = 728; google_ad_height = 90; google_ad_format = "728x90_as"; google_ad_type = "text_image"; google_ad_channel = ""; //--> </script> <script type="text/javascript" src="http://pagead2.googlesyndication.com/pagead/show_ads.js"> </script></div>राजीव तनेजाhttp://www.blogger.com/profile/00683488495609747573rajivtaneja2004@gmail.comtag:blogger.com,1999:blog-4497269264531281345.post-14515187120660045832008-07-25T22:05:00.001+05:302008-07-25T22:05:59.497+05:30"व्यथा-बिचौलियों की"<p><font size="4">&quot;व्यथा-बिचौलियों की&quot;</font></p> <p>&#160;</p> <p><font size="4"></font></p> <p><font size="4">***राजीव तनेजा***</font></p> <p><font size="4">मैँ भगवान को हाज़िर नाज़िर मान आज अपने पूर्ण होशोवास तथा&#160; सही मानसिक संतुलन में अपने तमाम साथियों कि ओर से ये खुलेआम ऐलान करता हूँ कि मैँ एक बिचौलिया हूँ और लोगों के रुके काम...बिगड़े काम बनवा...पैसा कमाना हमारी&#160; हॉबी...हमारा पेशा...हमारी फितरत है।ये कहने में हमें&#160; किसी भी प्रकार का कोई संकोच..कोई ग्लानि या कोई शर्म नहीं कि ...कई बार अपने निहित स्वार्थों के चलते हम पहले दूसरों के बनते काम बिगड़वाते हैँ और बाद में अपना टैलैंट...अपना हुनर दिखा उन्हें&#160; चमत्कारिक ढंग से हल करवाते हुए अपना...अपने दिमाग का लोहा मनवाते हैँ।दरअसल!..यही सब झोल-झाल हमारे जीने का..हमारी आजीविका का साधन हैँ।</font></p> <p><font size="4"></font></p> <p><font size="4">&quot;क्या कहा?&quot;...</font></p> <p><font size="4">&quot;हमें शर्म आनी चाहिए इस सब के लिए?&quot;...</font></p> <p><font size="4"></font></p> <p><font size="4">&quot;हुँह!... <strong>&quot;जिसने की शर्म ...उसके फूटे कर्म&quot;...</strong></font></p> <p><font size="4">&quot;और वैसे भी जीविकोपार्जन में कैसी शर्म?</font></p> <p><font size="4"></font></p> <p><font size="4">वैसे तो हम कई तरह के छोटे-बड़े काम करके अपना तथा अपने बच्चों का पेट पालते हैँ जैसे हम में से कोई प्रापर्टी डीलर है...</font></p> <p><font size="4"><a href="http://lh4.ggpht.com/rajivtaneja2004/SIn9VRGpmlI/AAAAAAAAAPg/bbWsLzlFve0/s1600-h/share%5B3%5D.jpg"><img style="border-top-width: 0px; border-left-width: 0px; border-bottom-width: 0px; border-right-width: 0px" height="175" alt="share" src="http://lh4.ggpht.com/rajivtaneja2004/SIn9XucQnoI/AAAAAAAAAPk/AJHBRuWWxB4/share_thumb%5B1%5D.jpg?imgmax=800" width="139" border="0" /></a></font></p> <p><font size="4">तो कोई शेयर दलाल...कोई सिमेंट-जिप्सम-कैमिकल वगैरा की दलाली से संतुष्ट है तो कोई....अनाज और फल-सब्ज़ियों से मगजमारी कर बावला बना बैठा है...कोई कोयले की दलाली में हाथ-मुँह सब काले करे&#160; बैठा है ...तो कोई लोगों के ब्याह-शादी और निकाह करवाने जैसे पावन और पवित्र काम को छोड़ कमीशन बेसिस पे या फिर एकमुश्त रकम के बदले उनके तलाक करवाने के&#160; ठेके ले अपनी तथा अपने परिवार की गुज़र-बरस कर रहा है।</font></p> <p><font size="4">हमारी व्यथा सुनिए कि हम में से कुछ को ना चाहते हुए भी मजबूरन ऐसे काम में हाथ डालना पड़ता है जिसका जिक्र यहाँ इस ब्लॉग पर यूँ ओपनली करना उचित नहीं क्योंकि आप पढने वाले और हम लिखने वाले दोनों के ही घरों में माँ-बहनें हैँ।</font></p> <p><font size="4"><a href="http://lh5.ggpht.com/rajivtaneja2004/SIn9bWN6FUI/AAAAAAAAAPo/yRYaBLYhkcA/s1600-h/gb%20road%5B2%5D.jpg"><img style="border-top-width: 0px; border-left-width: 0px; border-bottom-width: 0px; border-right-width: 0px" height="156" alt="gb road" src="http://lh3.ggpht.com/rajivtaneja2004/SIoAMbtDv_I/AAAAAAAAAPs/girZYqAj6Zo/gbroad_thumb.jpg?imgmax=800" width="207" border="0" /></a></font></p> <p><font size="4">लेकिन क्या करें?...</font><font size="4">पैसा और ऐश..दोनों की लत हमें कुछ इस तरह की लग चुकी है कि लाख चाहने के बावजूद भी हमें कोई और काम-धन्धा रास ही नहीं आता।</font><font size="4">इन सब कामों के अलावा और भी बहुत से काम-धन्धे हैँ जिनमें हमारे कई संगी-साथी हाथ आज़माते हुए आगे बढने की कोशिश कर रहे हैँ लेकिन अगर सबकी लिस्ट यहीं देने लग गया तो इस पोस्ट के कई और पन्ने तो इसी सब में भर जाएंगे जो यकीनन आपको नागवार गुज़रेगा।लेकिन हाँ!...अगर आप फुर्सत में हैँ और तसल्ली से हमारे बारे में कोई शोध-पत्र या निबन्ध वगैरा तैयार करने की मुहिम में जुटे हैँ या जुटना चाहते हैँ तो आपका तहेदिल से स्वागत है। तो ऐसे में आप मुझे मेरी पर्सनल मेल पर मेल भेज कर मुझसे मेल कर सकते हैँ।मेरा ई.मेल आई.डी है <a href="mailto:दल्लानम्बरवन@बिचौलिया.कॉम">दल्ला नम्बर वन@बिचौलिया.कॉम</a>&#160;&#160; </font></p> <p><font size="4"></font></p> <p><font size="4">हाँ!..आपको मेल आई.डी देने से याद आया कि </font><font size="4">आप लोगों ने ना जाने किस जन्म का बदला लेने की खातिर हमें नाहक बदनाम करते हुए&#160; हमें <strong><font size="5">'बीच वाला'..'बिचौलिया'...'दल्ला'...'दलाल'</font></strong> इत्यादि नाम दिए हुए हैँ जबकि </font><font size="4">ना तो हमें ढंग से ताली बजाना आता है और ना ही उचक-उचक कर भौंडे तरीके से कमर मटकाना पसन्द है।</font><font size="4">ठीक है!...माना कि हम कई बार जल्दी बौखला के शोर शराबा शुरू कर देते हैँ ..हो हल्ला शुरू कर देते हैँ ...</font><font size="4">तो क्या सिर्फ इसी बिनाह पे आप हमें <strong><font size="5">'दल्ला' </font></strong>कहना शुरू कर देंगे?&quot;...</font></p> <p><font size="4">क्या हम आपके साथ इज़्ज़त से...तमीज़ से पेश नहीं आते?</font><font size="4">हम आपको हमेशा जी...जी कह कर पुकारते हैँ...पूरी इज़्ज़त देते हैँ।जब आप हमारे पास आते हैँ तो ना चाहते हुए भी हम आपको चाय नाश्ते के लिए पूछते हैँ।वैसे ये अन्दरखाने की बात है कि अगर हम एक खर्चा करते हैँ तो उसके बदले सौ वसूलते भी हैँ।जब हम आपके लिए ना चाहते हुए भी इतना सबकुछ कर सकते हैँ तो क्या आप हमें इज़्ज़त से नहीं बुला सकते ?और अच्छे भले सलीकेदार नाम भी तो हैँ...हमारे लिए उनका प्रयोग भी तो किया जा सकता है जैसे... <strong><font size="5">'मीडिएटर'...'एडवाईज़र'....'कँसलटैंट'</font></strong> वगैरा...वगैरा...</font></p> <p><font size="4"></font></p> <p><font size="4"><strong>आप कहते हैँ कि हम एक नम्बर के फ्राड हैँ और अपनी चिकनी-चुपड़ी बातों से आप लोगों को बहला-फुसला के अपना उल्लू सीधा करते हैँ।</strong></font></p> <p><font size="4"></font></p> <p><font size="4">चलो!..माना कि कई बार हम एक ही प्लाट या मकान को कई-कई बार बेच आप लोगों को चूना लगाने से भी नहीं चूकते हैँ।<font size="4">लेकिन क्या आपको डाक्टर कहता है कि आप हमारी मीठी-मीठे...चिकनी-चुपड़ी बातों में आ अपना धन...अपना पैसा..अपना चैन और सुकून गवाएँ?&quot;</font></font></p> <p><font size="4"><strong>क्या कहा?..अनैतिक है ये?...</strong> </font></p> <p></p> <p><font size="4">अरे!...अगर हम कम समय में अकृत पैसा इकट्ठा करना चाहते हैँ तो इसमें आखिर गलत ही क्या है? वैसे आप ये बताएँगे कि यहाँ कौन किसको नहीं लूट रहा है जो हम साधू-संत...महात्मा बनते हुए सबको बक्श दें? </font></p> <p><font size="4">क्या <strong>डाक्टर</strong> और <strong>कैमिस्ट</strong> फ्री सैम्पल वाली दवाईयों को मरीज़ों को चेप अँधा पैसा नहीं कमा रहे हैँ?या... प्राईवेट स्कूल वाले ही अभिभावकों को लूटने में कौन सी कसर छोड़ रहे हैँ?...</font></p> <p><font size="4">क्या हलवाई मिठाई के साथ डिब्बा तौल कर पब्लिक को फुद्दू नहीं बना रहे हैँ?..</font></p> <p><font size="4">या सरकारी कर्मचारी काम के समय को हँसी-ठट्ठे में उड़ा मुफ्त में तनख्वाह हासिल नहीं कर रहे हैँ?</font></p> <p><font size="4">किस-किस को रोकोगे तुम?...किस-किस को कोसोगे तुम?</font></p> <p><font size="4">अरे!..फफूंद है ये हमारे सिस्टम पर...जितनी आप साफ करोगे..उससे कई गुणा रातोंरात और उग कर फैल जाएगी।इसलिए ये सब बेकार की दिमागी कसरत और धींगामुश्ती छोड़ आप ध्यान से मेरी आगे की बात सुनें।...</font></p> <p><font size="4"></font></p> <p><a href="http://lh5.ggpht.com/rajivtaneja2004/SIoAORedCTI/AAAAAAAAAPw/PleCyt6mYdE/s1600-h/weight_lifting_072.png"><img style="border-top-width: 0px; border-left-width: 0px; border-bottom-width: 0px; border-right-width: 0px" height="154" alt="weight_lifting_07" src="http://lh5.ggpht.com/rajivtaneja2004/SIoAQqm8SpI/AAAAAAAAAP0/wckM3hnYbio/weight_lifting_07_thumb.png?imgmax=800" width="204" border="0" /></a>&#160; </p> <p><font size="4"></font></p> <p><font size="4">हमारे काम करने ढंग आप जैसे सीधे-सरल लोगों के जैसा एकदम 'स्ट्रेट फॉरवर्ड' नहीं बल्कि आप सब से अलग...सबसे जुदा है।कई बार हम सूट-बूट पहन एकदम सोबर...<strong>जैंटल मैन</strong> टाईप </font><font size="4"><strong>'मीडिएटर</strong>' का रूप धारण कर लेते हैँ... तो कभी समय की नज़ाकत को भांपते हुए <strong>'एडवाईज़र'</strong>&#160; वगैरा का भेष भी बदल लेते हैँ और कई बार अपनी औकात पे आते हुए एकदम नंगे हो...अपनी जात दिखाने से भी नहीं चूकते हैँ।</font></p> <p><font size="4">एक्चुअली!...हमें अपनी हर चाल को(सामने दिखाई देती सिचुऐशन के हिसाब से)..</font><font size="4">ऊपर से नीचे तक और...आगे से पीछे तक...अच्छी तरह सोचते-समझते हुए चलना होता है क्योंकि पासा पलटने में देर नहीं लगती। सच ही तो कह गए हैँ बड़े-बुज़ुर्ग कि.... </font></p> <p><font size="4"><strong>&quot;दुर्घटना से देरी भली&quot;</strong> और....</font></p> <p><font size="4">&#160;<strong>'सावधानी हटी तो दुर्घटना घटी</strong>'</font></p> <p><font size="4">कभी हम नरम रह कर क्रिटिकल सिचुएशनज़ को संभालते हैँ तो&#160; कभी बौखला के गर्म होते हुए अपना काम साधते हैँ।दरअसल!...ये सब हमारे विवेक पर नहीं बल्कि सामने वाले के व्यवहार पर निर्भर करता है...डिपैंड करता है कि हम उसे अपना कौन सा रूप दिखाएँ?&quot;..सरल वाला ठण्डा रूप?...या खौल कर उबाले खाता हुआ रौद्र रूप?</font></p> <p><font size="4">दरअसल पहले तो हम आराम से...प्यार से...मेल-जोल की ही बात करते हैँ और आपसी मनुहार से ही अपना काम निकालने की कोशिश करते हैँ लेकिन जब इस तरह के हमारे सारे प्रयास...सारी कोशिशें&#160; फेल हो जाती हैँ या&#160; विफल कर दी जाती हैँ।तब कोई और चारा ना देख हमें ना चाहते हुए भी कमीनियत पे उतरते हुए टुच्चेपन का सहारा लेना पड़ता है।</font></p> <p></p> <p><strong><font color="#ff0000"><font size="4"></font></font></strong></p> <font size="4"><strong></strong>आज इस ब्लाग के माध्यम से हम </font><font size="4">ये 'शपथ-पत्र' भी साथ ही साथ दे देना चाहते हैँ कि... <font color="#ff0000" size="5"><strong>&quot;हम 'बिचौलियों' की पूरी कौम हर प्रकार से भलीभांति स्वस्थ...तन्दुरस्त और हट्टी-कट्टी है&quot;...</strong></font></font> <p></p> <p><font size="4">&quot;क्या कहा?&quot;...</font></p> <p><font size="4">&quot;विश्वास नहीं है आपको हमारी इस काली ज़बान पर?&quot;...</font></p> <p><font size="4">&quot;अरे!..रोज़ाना ही तो लाखों-करोड़ों के सौदे हमारी इस ज़बान के नाम पर&#160; ही स्वाहा हो इधर-उधर हो जाते हैँ।मतलब कि टूट&#160; कर...बिखर कर छिन्न-भिन्न हो जाते हैँ।दरअसल!...ऐसा तब होता है जब हम अँधाधुँध कमाई के चलते...दारू के साथ-साथ...दौलत के नशे में भी चूर होते हैँ या फिर...बाज़ार में छाई तेज़ी के चलते....आने वाले मंदी के दौर को ठीक से भांप नहीं पाते हैँ। </font></p> <p><font size="4"></font></p> <p><font size="4">&quot;क्या कहा?...ज़बान से फिरना गलत बात है&quot;...</font></p> <p><font size="4">&quot;नामर्दानगी की निशानी है ये?...</font></p> <p><font size="4">अरे!...ऐसी हालत में अपनी ज़बान से फिर कर बैकआउट हो जाना ही बेहतर रहता है।अब इसमें कहाँ की समझदारी है?कि...हम इस कलमुँही ज़बान के चलते लाखों-करोड़ों का घाटा बिला वजह सहते फिरें?और ये आप </font><font size="4">इतनी जल्दी कैसे भूल गए कि </font><font size="4">आप ही ने तो खुद अपनी मर्ज़ी से ही हमारा नामकरण कर हमें <strong>'बिचौलिए'</strong> का नाम दिया है और <strong>'बिचौलिया' </strong>माने...बीच वाला </font><font size="4">याने के!..ना औरत और ना ही मर्द&quot; <br />तो ऐसी हालत में मर्दानगी का तो सवाल ही पैदा नहीं होता है ना।&quot;</font></p> <p><font size="4"></font></p> <p><font size="4">वैसे एक बात कहूं?...</font></p> <p><font size="4">ये आप जो हम पर कोई ना कोई इलज़ाम लगाते रहते हैँ..थोपते रहते हैँ...वो सब निरे झूठ के पुलिन्दों के अलावा और कुछ नहीं है।अब आप हमें ये जो <strong>'बिचौलिया-बिचौलिया'</strong> कह के चिढाते हैँ।तो ये मैँ आपको खुलेआम चैलैंज करता हूँ कि आप हमारे...हमारे बच्चों के जितना मन करे उतने <strong><font size="5">'एम.आर.आई'</font></strong> और&#160; <strong><font size="5">'डी.एन.ए. टैस्ट'</font></strong> करवा लें।इतने सब से तसल्ली ना हो तो बेशक <strong><font size="5">'सी.टी.स्कैन'</font></strong> और सौ दो सौ <strong><font size="5">'<font color="#ff0000">रं</font><font color="#0000ff">गी</font><font color="#00ff00">न</font> <font color="#0000ff">ए</font><font color="#ff0000">क्स</font><font color="#8000ff">रे'</font></font></strong><font color="#ff0080"> </font>भी खिंचवा के देख लें।अगर हम में या...हमारी नस्ल में कोई कमी-बेसी निकल आए तो बेशक आप अभी के अभी गिरेबान पकड़ हमारा टेंटुआ दबा डालें।हम 'उफ' तक ना करेंगे।और ऐसा दावा हम किसी <strong>'शिलाजीत'</strong> युक्त चूर्ण या फिर <strong>'वियाग्रा'</strong> के रोज़ाना के सेवन के बल पर नहीं कह रहे हैँ।दरअसल ये सब चीज़ें तो हम ऐसे ही शौकिया इस्तेमाल कर लिया करते हैँ...जस्ट फॉर ए चेंज।</font></p> <p><a href="http://lh6.ggpht.com/rajivtaneja2004/SIoAyNbnHUI/AAAAAAAAAP4/HF4fB6LfZNg/s1600-h/India07112.jpg"><img style="border-top-width: 0px; border-left-width: 0px; border-bottom-width: 0px; border-right-width: 0px" height="244" alt="India0711" src="http://lh6.ggpht.com/rajivtaneja2004/SIoAzXrmi3I/AAAAAAAAAP8/7JGbi3Ty30Y/India0711_thumb.jpg?imgmax=800" width="164" border="0" /></a></p> <p><font size="4">एक्चुअली!...ये जो चिंकी...मिंकी...टीना...मीना और नीना हैँ ना?...इस सब उठा-पटक और धींगामुश्ती की इतनी हैबिचुअल हो चुकी हैँ कि इन को बिना एक्स्ट्रा पावर या एक्स्ट्रा डोज़ के सैटिसफॉई करना मुश्किल ही नहीं बल्कि नामुमकिन होता है।</font></p> <p><font size="4"></font></p> <p><font size="4"></font></p> <p><font size="4"></font></p> <p><font size="4">&quot;जहाँ तक आपका आरोप है कि...<strong>हम मेहनत कर हलाल की खाने के बजाए आराम से बैठे-बैठे हराम की कमाई खाना चाहते हैँ। </strong></font></p> <p><font size="4"></font></p> <p><font size="4">तो इसके जवाब में बस यही कहना चाहूँगा कि आपका ये आरोप सरासर गलत और बेबुनियाद&#160; है। दरअसल!...किसी भी देश का कोई भी कानून ये नहीं कहता कि पैसा कमाने के लिए पसीना बहाना ज़रूरी है।और जब बिना कोई काम-धाम किए...बैठे-बैठे सिर्फ ज़बान चलाने से ही हम पर लक्ष्मी मैय्या की फुल्ल-फुल्ल कृपा रहती है तो हम बेफाल्तू में क्यों धकड़पेल कर बावले होते फिरें?</font></p> <p><font size="4">अब अगर ऊपरवाले ने!...हमसे प्रसन्न हो हमें ये तेज़ कैंची के माफिक कचर-कचर करती जिव्हा रूपी नेमत बक्शी है तो क्यों ना इससे भरपूर फायदा उठाया जाए?</font><font size="4">और ये आपसे किस गधे ने कह दिया कि दलाली करना गलत बात है?...पाप है?</font></p> <p><font size="4">सही मायने हमसे हमसे बड़ा और हमसे सच्चा देशभग्त आपको पूरे हिन्दोस्तान में नहीं मिलेगा।</font></p> <p><font size="4"></font></p> <p><font size="4">&quot;क्यों ज़ोर का झटका धीरे से लगा ना?&quot;...</font></p> <p><font size="4">अरे!...हाथ कँगन को आरसी क्या और पढे-लिखे को फारसी क्या?&quot;....</font></p> <p><font size="4">एक्चुअली!...आजकल की पढी-लिखी जमात को भी फारसी पढनी नहीं आती है लेकिन मुहावरा तो मुहावरा होता है...मुँह में आ गया तो बोल दिया।...</font></p> <p><font size="4">खैर!...आप खुद ही देख लें कि कैसे हमने एक मिमियाते हुए शासक को गरज कर बरसना सिखाते हुए अपने देश को गंभीर संकट और खर्चे से बचाया।</font></p> <p><font size="4"></font></p> <p><font size="4">अब आप कहेंगे कि...&quot;</font></p> <p><font size="4">&quot;कैसा शेर?&quot;...</font></p> <p><font size="4">&quot;कैसा मिमियाना?&quot;और...</font></p> <p><font size="4">&quot; कैसा खर्चा?&quot;...</font></p> <p><font size="4"></font></p> <p><font size="4">&quot;अब ये जो अपने मनमोहिनी सूरत वाले '<strong>मनमोहन सिंह'</strong> जी हैँ...वो <strong>सोनिया जी</strong> के सामने मिमियाते ही हैँ ना?&quot;</font></p> <p><font size="4">अब आप खुद अपने दिल पे हाथ रख के बताएँ कि अच्छी-भली मिमिया कर चलती <strong>'मनमोहन सरकार'</strong> से समर्थन वापिस ले उसे गिराने की साजिश रच क्या <strong>वामपंथियों</strong> ने सही किया?</font></p> <p><font size="4"></font></p> <p><font size="4">&quot;नहीं ना?&quot;...</font></p> <p><font size="4"></font></p> <p>&#160;</p> <p><font size="4">&quot;सुनो!...वो पागल के बच्चे किसे प्रधानमंत्री बनाने चले थे?</font></p> <p>&#160; <a href="http://lh5.ggpht.com/rajivtaneja2004/SIoA0vBEXbI/AAAAAAAAAQA/BE3c6dcIBTc/s1600-h/mayawati33.jpg"><img style="border-top-width: 0px; border-left-width: 0px; border-bottom-width: 0px; border-right-width: 0px" height="180" alt="mayawati3" src="http://lh5.ggpht.com/rajivtaneja2004/SIoA1wHr3zI/AAAAAAAAAQE/X8GdxpbbRZ4/mayawati3_thumb1.jpg?imgmax=800" width="138" border="0" /></a>&#160;&#160; </p> <p><font size="4">अपनी हाथी वाली <strong>बहन जी</strong> को...</font><font size="4">और हिमाकत देखो कि कुल जमा तेरह सांसदों के बल पर&#160; वो देश की कमान संभाल उसकी प्रधानी करने के ख्वाब पालने लगी थी।...</font></p> <p><font size="4">सोचो..सोचो!...</font><font size="4">सोचने में कौन सा टैक्स लग रहा है? </font></p> <p><font size="4">लेकिन क्या चंद मच्छरों के किसी कटखनी मक्खी के साथ मिलकर छींकने से कभी छींका फूटा है जो अब फूटेगा?...</font>&#160;</p> <p><font size="4">हाँ!...लेकिन एक बात तो माननी पड़े इन बहन जी की कि इन्हें टैक्स वालों को बरगला बेनामी संपत्ति को दान में...गिफ्ट में मिली संपत्ति बता नामी बनाना अच्छी तरह आता है।</font></p> <p><a href="http://lh4.ggpht.com/rajivtaneja2004/SIoA2wlKDzI/AAAAAAAAAQI/8yMrstDIzvs/s1600-h/3.jpg"><img style="border-top-width: 0px; border-left-width: 0px; border-bottom-width: 0px; border-right-width: 0px" height="149" alt="अमर सिंघ" src="http://lh5.ggpht.com/rajivtaneja2004/SIoA36QviiI/AAAAAAAAAQM/E0E3ilH2qcE/_thumb1.jpg?imgmax=800" width="197" border="0" /></a></p> <p></p> <p><font size="4"></font></p> <font size="4">खैर !...जैसे ही हम में से एक को पता चला कि कलयुग में ऐसा घोर अनर्थ होने जा रहा है...तुरंत सक्रिय हो पहुँच गए <strong>मुलायम रूपी संजीवनी</strong> अमरबेल ले कर कि... <br /></font> <p></p> <p><font size="4"><strong><font size="5"><font color="#ff0000">&quot;<font size="4"><font size="5">बाल ना बांका कर सकेगा जो वामपंथ बैरी होय&quot;...</font></font></font></font></strong></font></p> <p><font size="4"><strong><font color="#ff0000" size="5">&quot;जाको राखे साईयाँ...मार सकै ना कोय&quot;</font></strong></font></p> <p><font size="4"></font></p> <p><font size="4">&quot;बस आते ही उन्होंने इसको...उसको...सबको संभालने की जिम्मेदारी अपने ऊपर ली और जोर-शोर से जोड़-तोड़ की मुहिम में जुट गए।</font><font size="4">नतीजा आपके सामने है...जीजान की मेहनत और तिकड़मबाजी ने सही में बिना <strong>'नवजोत सिंह सिद्धू'(भाजपा)</strong> के ये सिद्ध कर दिखाया कि </font><strong><font color="#ff0000" size="5">&quot;सिंह इज़ किंग&quot;</font></strong></p> <p><strong><font color="#ff0000" size="5"></font></strong></p> <p><font size="4"></font></p> <p><font size="4">अब आप कहेंगे कि...&quot;इस सब जोड़-जुगाड़ से फायदा क्या हुआ?&quot;...</font></p> <p><font size="4">&quot;वो तमाम छोटे-बड़े&#160; टीवी चैनलों पर जो खचाखच भरे सभा मंडप में बार-बार हज़ार-हज़ार के नोटों की गड्डियाँ गड्डमड्ड होती दीख रही थी...उसका क्या?&quot;</font></p> <p><font size="4"></font></p> <p><font size="4"></font></p> <p><font size="4">&quot;अब क्या बताऊँ?&quot;...</font></p> <p><font size="4">&quot;हमने तो अच्छी तरह से जाँच-परख सिर्फ और सिर्फ असली <strong><font color="#ff0000" size="5">'अरबी नस्ल के घोड़ों</font></strong> पर ही चारा फैंका था और उन्हें रिझाने में हम काफी हद तक कामयाब भी हुए थे लेकिन क्या पता था कि घोड़ों की इस भीड़ में तीन <font color="#ff0000" size="5"><strong>'बहरुपिए गधे'</strong></font> भी धोखे से शामिल हो गए थे?जो चुपचाप मस्त हो चारा चबाने के बजाए बिना किसी परमिशन और इज़ाज़त के शोर मचाते हुए सरेआम <strong>हज़ार-हज़ार के नोटों की गड्डियों</strong> को लहरा रेंकने लगे।</font></p> <p><font size="4">&quot;हद होती है नासमझी की भी&quot;...</font></p> <p><font size="4">&quot;स्सालों को!...हीरो बनने का चाव चढा हुआ था।अरे!...ये कोई फिल्लम नहीं जो यहाँ नायक ही जीतेगा ये कलयुग है कलयुग...यहाँ पाप की...अन्याय की हम जैसे बिचौलियों के माध्यम से जीत होती है।</font></p> <p><font size="4">&quot;कुछ नहीं बिगाड़ पाओगे तुम हमारा&quot;..</font></p> <p><font size="4">&quot;देखा नहीं?कि हमारा <strong>अमरत्व प्राप्त</strong> चेला कैसे साफ मुकर गया मीडिया के तमाम फ्लैश मारते कैमरों के सामने और खुला चैलैंज दे डाला कि...</font></p> <p><font size="4"><strong><font size="5">&quot;अगर कोई भी आरोप साबित हो जाता है तो वह सार्वजनिक जीवन जीना छोड़ देगा&quot;..</font></strong></font></p> <p><font size="4">पहली बात तो ऐसी नौबत आएगी ही&#160; नहीं और अगर कभी भूले-भटके आ भी गई तो उसमें इतने साल लग चुके होंगे कि किसी को कुछ याद नहीं रहना है।यू नो!...पब्लिक की यादाश्त बहुत कमज़ोर होती है।यहाँ गंभीर से गंभीर मुद्दा भी दो या चार महीने से ज़्यादा ज़िन्दा नहीं रहता।अब आप खुद ही देख लो ना कि....</font></p> <p><font size="4">&quot;किसे याद है आग उगलते हुए <strong>'तंदूर काण्ड'</strong> की?...या फिर....</font></p> <p><font size="4">&quot;किसे याद है नरसिम्हाँ राव के नोट भरे <strong>सूटकेस </strong>की?&quot;...</font></p> <p><font size="4">&quot;किसे याद है बाल-कंकालों से लबालब भरे <strong>'निठारी काण्ड'</strong> की?&quot;या....</font></p> <p><font size="4">&quot;किसे याद है हाँफ-हाँफ नाक में दम करता हुआ <strong>भोपाल का गैस काण्ड</strong>?&quot;...</font></p> <p><font size="4">सच्चाई ये है मेरे दोस्त!...कि ये सारे काण्ड तो कब के पब्लिक की समृति से विलुप्त हो भ्रष्टाचार रूपी विशाल हवन कुण्ड की पवित्र और पावन अग्नि में स्वाहा हो गए और बाकियों की तरह इस घोटाले ने भी शांत हो जाना है और बस सबके दिल ओ दिमाग में बस यही याद रहना है कि.....&#160;&#160; </font></p> <p><font size="4"><font color="#ff0000"><strong><font size="5">&quot;सिंह इज़ किंग&quot;...&quot;सिंह इज़ किंग&quot;... &quot;सिंह इज़ किंग&quot;... &quot;सिंह इज़ किंग</font></strong></font></font></p> <p><a href="http://lh4.ggpht.com/rajivtaneja2004/SIoA44Z2M2I/AAAAAAAAAQQ/BKq4spMZuew/s1600-h/singhisking2.jpg"><img style="border-top-width: 0px; border-left-width: 0px; border-bottom-width: 0px; border-right-width: 0px" height="135" alt="singh is king" src="http://lh5.ggpht.com/rajivtaneja2004/SIoA6Lz-bCI/AAAAAAAAAQU/ezdXjCb6g1A/singhisking_thumb.jpg?imgmax=800" width="132" border="0" /></a>..... <a href="http://lh4.ggpht.com/rajivtaneja2004/SIoA44Z2M2I/AAAAAAAAAQQ/BKq4spMZuew/s1600-h/singhisking2.jpg"><img style="border-top-width: 0px; border-left-width: 0px; border-bottom-width: 0px; border-right-width: 0px" height="135" alt="singh is king" src="http://lh5.ggpht.com/rajivtaneja2004/SIoA6Lz-bCI/AAAAAAAAAQU/ezdXjCb6g1A/singhisking_thumb.jpg?imgmax=800" width="132" border="0" /></a> .... <a href="http://lh4.ggpht.com/rajivtaneja2004/SIoA44Z2M2I/AAAAAAAAAQQ/BKq4spMZuew/s1600-h/singhisking2.jpg"><img style="border-top-width: 0px; border-left-width: 0px; border-bottom-width: 0px; border-right-width: 0px" height="135" alt="singh is king" src="http://lh5.ggpht.com/rajivtaneja2004/SIoA6Lz-bCI/AAAAAAAAAQU/ezdXjCb6g1A/singhisking_thumb.jpg?imgmax=800" width="132" border="0" /></a>.....<a href="http://lh4.ggpht.com/rajivtaneja2004/SIoA44Z2M2I/AAAAAAAAAQQ/BKq4spMZuew/s1600-h/singhisking2.jpg"><img style="border-top-width: 0px; border-left-width: 0px; border-bottom-width: 0px; border-right-width: 0px" height="135" alt="singh is king" src="http://lh5.ggpht.com/rajivtaneja2004/SIoA6Lz-bCI/AAAAAAAAAQU/ezdXjCb6g1A/singhisking_thumb.jpg?imgmax=800" width="132" border="0" /></a>....<a href="http://lh4.ggpht.com/rajivtaneja2004/SIoA44Z2M2I/AAAAAAAAAQQ/BKq4spMZuew/s1600-h/singhisking2.jpg"><img style="border-top-width: 0px; border-left-width: 0px; border-bottom-width: 0px; border-right-width: 0px" height="135" alt="singh is king" src="http://lh5.ggpht.com/rajivtaneja2004/SIoA6Lz-bCI/AAAAAAAAAQU/ezdXjCb6g1A/singhisking_thumb.jpg?imgmax=800" width="132" border="0" /></a></p> <p>&#160;</p> <p><font size="4">&quot;बिचौलिया एकता&quot;.....</font></p> <p><font size="4">&quot;ज़िन्दाबाद...ज़िन्दाबाद&quot;...</font></p> <p><font size="4"></font></p> <p><font size="4">&quot;बिचौलिया एकता अमर रहे&quot;...</font></p> <p><font size="4"></font></p> <p><font size="4">&quot;जय हिन्द&quot;... <br /></font></p> <p><font size="4">&quot;भारत माता की जय&quot;</font></p> <p><font size="4"></font></p> <p><font size="4">***राजीव तनेजा***</font></p> <p><font size="4"></font></p> <p><font size="4">Rajiv Taneja</font></p> <p><font size="4">Delhi,India</font></p> <p><font size="4"><a href="http://hansteraho.blogspot.com">http://hansteraho.blogspot.com</a></font></p> <p><font size="4"></font></p> <p><font size="4">+919810821361</font></p> <p><font size="4"></font></p> <p><font size="4">+919896397625</font></p> <div class="blogger-post-footer"><script type="text/javascript"><!-- google_ad_client = "pub-0164171627729298"; google_ad_width = 728; google_ad_height = 90; google_ad_format = "728x90_as"; google_ad_type = "text_image"; google_ad_channel = ""; //--> </script> <script type="text/javascript" src="http://pagead2.googlesyndication.com/pagead/show_ads.js"> </script></div>राजीव तनेजाhttp://www.blogger.com/profile/00683488495609747573rajivtaneja2004@gmail.comtag:blogger.com,1999:blog-4497269264531281345.post-54201722993647928622008-07-21T02:12:00.001+05:302008-07-21T02:12:25.050+05:30"व्यथा-एक कहानी चोर की"<p>&#160;</p> <p><font size="4"><strong>&quot;नोट:</strong> इस कहानी या व्यथा की प्रेरणा मुझे अपनी ही <a href="http://hansteraho.blogspot.com/2008/06/blog-post_22.html" target="_blank">कहानी</a> के एक चोर <font color="#ff0000"><u><a href="http://pungibaaj.blogspot.com/2008/06/blog-post_28.html" target="_blank">'पुंगीबाज'</a>&#160;</u></font> और....</font></p> <p><font size="4"><u>&#160;<font color="#ff0000"><a href="http://deepakbapukahin.wordpress.com/2008/07/20/a-article/" target="_blank">'दीपक भारतदीप जी'</a></font></u> के आर्टिकल से मिली।इस कारण मैँ 'पुंगीबाज' महाश्य जी का और दीपक भारतदीप जी का दोनों का ही शुक्रगुज़ार हूँ।एक बार फिर तहेदिल से आप सभी का शुक्रिया</font> </p> <p>&#160;</p> <p><a href="http://lh5.ggpht.com/rajivtaneja2004/SIOheQJwWZI/AAAAAAAAAPI/y_sR8KZQPwU/s1600-h/images%5B3%5D.jpg"><img style="border-top-width: 0px; border-left-width: 0px; border-bottom-width: 0px; border-right-width: 0px" height="187" alt="images" src="http://lh4.ggpht.com/rajivtaneja2004/SIOhk8axBHI/AAAAAAAAAPM/Nwa8ZCpOZr0/images_thumb%5B1%5D.jpg?imgmax=800" width="222" border="0" /></a>&#160;&#160; </p> <p><strong></strong></p> <p>हाँ!..मैँ चोर हूँ..एक कहानी चोर।अपने बिज़ी शैड्यूल के चलते इतना वक्त नहीं है मेरे पास कि मैँ आप जैसे वेल्लों के माफिक बैठ के रात-रात भर कहानियाँ या आर्टिकल लिखता फिरूँ।इसलिए अगर अपनी भावनाओं को व्यक्त करने के लिए मैँने कॉपी-पेस्ट का सिम्पल और सीधा-सरल रास्ता अख्तियार&#160; कर लिया तो कौन सा गुनाह किया?फॉर यूअर काईन्ड इंफार्मेशन!...मैँ सिर्फ उन्हीं लेखों और कहानियों को चुराता हूँ जो मुझे...मेरे दिल को अन्दर तक...भीतर तक छू जाती हैँ।वही कहानियाँ...वही लेख मेरा ध्यान अपनी तरफ खींच मुझे अट्रैक्ट करते हैँ जो मेरी भावनाओं के...मेरे दिल के बेहद करीब होते हैँ।यूँ समझ लो कि ऐसी कहानी या फिर ऐसे लेख को चुराते वक्त मुझे अर्जुन की तरह मछली की आँख के अलावा और कुछ नहीं दिखाई देता मसलन लेखक का नाम...उसके ब्लाग का नाम...उसकी साईट का पता वैगरा वगैरा...इसलिए बस झट से अपने मतलब का आर्टिकल कापी करता हूँ और उसे फट से अपने ब्लाग या फिर अपनी साईट पे डाल देता हूँ।</p> <p>&quot;क्या कहा?&quot;...</p> <p>&quot;हमें किसी का डर नहीं है?&quot;...</p> <p>&quot;हाँ सच!..सच कहा आपने हमें किसी का डर नहीं है।कौन सा हमें इस जुर्म में फाँसी लग जाएगी जो हम खाम्ख्वाह डरते रहें?.. भयभीत होते रहे?&#160;&#160; </p> <p>अरे!...हमारे देश का कानून ही इतना लचर है कि यहाँ कत्ल से लेकर ब्लात्कार करने वाले सभी खुलेआम ...सरेआम घूमते रहते हैँ और कोई उनका बाल भी बांका नहीं कर पाता है।और...</p> <p>&quot;यहाँ तो हमने किया ही क्या है?&quot;...</p> <p>&quot;कौन सा हमने कोई बैंक लूटा है या फिर कोई डकैती डाली है?&quot;...</p> <p><a href="http://lh6.ggpht.com/rajivtaneja2004/SIOjBySHNvI/AAAAAAAAAPQ/m78lWong_Zc/s1600-h/thiefyellow2.jpg"><img style="border-top-width: 0px; border-left-width: 0px; border-bottom-width: 0px; border-right-width: 0px" height="229" alt="thief yellow" src="http://lh5.ggpht.com/rajivtaneja2004/SIOjFcjgTcI/AAAAAAAAAPU/1fnaCjs_gjM/thiefyellow_thumb.jpg?imgmax=800" width="244" border="0" /></a></p> <p>&quot;चाहे हम जानते हैँ कि कोई हमारा कुछ नहीं बिगाड़ सकता है या बिगाड़ पाएगा लेकिन इतने बेवाकूफ भी नहें हैँ हम कि अपने हर जुर्म..हर गुनाह के पीछे सुराग छोड़ते जाएँ।पहली बात तो हम अपने असली नाम..असली पते का प्रयोग करते ही नहीं हैँ।अब ऐसी हालत में आप अपनी जी भर कोशिश करने के बाद भी हमारा क्या उखाड़ लेंगे?&quot;दूसरे हम छदम नाम...छदम आई.डी इस्तेमाल करते हैँ।हाँ!...एक खतरा तो रहता ही है हमें इस सब में कहीं कोई हमारे 'आई.पी अड्रैस' के जरिए हम तक ना पहुँच जाए।इसलिए हमें मजबूरन एक नहीं बल्कि अलग-जगह से अलग-अलग कम्प्यूटरों के इस्तेमाल से अपना ब्लाग....अपनी साईट चलानी पड़ती है।जो यकीनन काफी खर्चीला साबित होता है लेकिन नेम और फेम की इस गेम में हम इस तरह के छोटे-मोटे खर्चों की परवाह नहीं करते क्योंकि उधर गूगल ऐड के जरिए प्राप्त होने वाली आय से हम अपने इन सभी नाजयज़ खर्चों की भरपायी कर लेते हैँ।</p> <p>आप क्या सोचते हैँ कि हमने झट से यूँ चुटकी बजाते हुए ये सब कह दिया तो ये आसान काम हो गया?अरे!...सुबह से लेकर शाम तक...आगे से लेकर पीछे तक और...ऊपर से लेकर नीचे तक बहुत पापड़ बेलने पड़ते हैँ...बहुत सोचना पड़ता है कि इस सब में..कहीं हम खुद अपनी किसी छोटी या फिर बड़ी गलती के चलते फँस ना जाएँ।हमेशा दिल में धुक्कधुक्की सी बजती रहती है कि किसी को हमारी कारस्तानी...हमारी शरारत का पता तो नही चल जाएगा?&quot;और वैसे!...पता चल भी जाए तो बेशक चल जाए...&#160; हमारे ठेंगे से ...हमें कोई परवाह नहीं।हमारी तरफ से ये खुला चैलैंज ..ओपन ऑफर है ये कि जिस किसी भी माई के लाल में दम हो और जो कोई हमारा कुछ बिगाड़ना चाहे वो बेशक!...बिना किसी शर्म के बेखटके बिगाड़ ले।</p> <p>क्या कहा?...सब बकवास है ये?</p> <p>अरे!..कब तक यूँ आँखें मूंद हमारे वजूद को नकारोगे तुम?..है हिम्मत तो खत्म कर के दिखाओ हमें।हमारे में से एक को मिटाओगे तो दस और सर उठा...फन फैला खड़े हो जाएँगे।किस-किस के फन को&#160; कुचलोगे तुम? किस-किस को पकड़वाओगे तुम...किस-किस की पोल खोलोगे तुम?&quot;</p> <p>और जब बहस शुरू हो ही गई है तो लगे हाथ मैँ एक और बात साफ करना चाहूँगा कि ना मैँ कोई बिल्ली हूँ और ना ही चार पैरों पे चलने वाला कोई अन्य चौपाया।इसलिए बेहतर यही होगा कि आप ये मुझे बच्चों की तरह 'कॉपी कैट'... 'कॉपी कैट' कह पुकारना छोड़ें और अपने मतलब से मतलब रखें।</p> <p><a href="http://lh6.ggpht.com/rajivtaneja2004/SIOjI3kvUpI/AAAAAAAAAPY/oeXvDSvLE80/s1600-h/CopyCat_Color2.jpg"><img style="border-top-width: 0px; border-left-width: 0px; border-bottom-width: 0px; border-right-width: 0px" height="196" alt="Copy-Cat_Color" src="http://lh4.ggpht.com/rajivtaneja2004/SIOjK5Ghv3I/AAAAAAAAAPc/z54an6ux0SI/CopyCat_Color_thumb.jpg?imgmax=800" width="244" border="0" /></a></p> <p>मेरा कहना मानें तो आप किसी भी तरह की गलतफहमी या मुगाल्ते को अपने दिल में ना पालें कि आपके रूठ जाने या आपके नाराज़ होने से&#160; हम अपनी करनी छोड़...सुधर जाएँगे? अगर फिर भी आप अपनी बेहूदी सोच के चलते ऐसा कुछ उल्टा-पुल्टा सोचने भी जा रहे हैँ तो अभी के अभी...यहीं के यहीं अपने बढते कदमों को थाम रुक जाएँ क्योंकि पहली बात तो ये कि खुली आँखो से ख्वाब नहीं देखे जाते और जाने-अनजाने..भूले-भटके कभी देख-दाख भी लिए जाते हैँ तो वो कभी हकीकत का जामा पहन असलियत नहीं बन पाते हैँ।वो कहते हैँ ना कि रस्सी जल जाती है लेकिन उसकी ऐंठन..उसके बल नहीं जाते हैँ&quot;...&quot;क्या आपने कभी किसी कुत्ते की पूँछ को सीधे होते देखा है?&quot;...&quot;नहीं ना?&quot;</p> <p>अगर मेरी बातों से...मेरे विचारों से आपको तनिक भी सच्चाई का आभास होता है तो आप मेरी बात मानें और ऐसे बेतुके...बेसिरपैर के विचारों को अपने दिल में जगह दे उन्हें अपना स्थाई घरौंदा ना बनाने दें।आप कह रहे हैँ कि हम आपका हक छीन अपनी झोली भरने की सोच रहे हैँ..तो आपकी सोच एकदम सही दिशा में जा रही है।और वैसे भी इसमें गलत ही क्या है?&#160; कामयाबी हासिल करने का सबसे पहला और सबसे गूढ मंत्र भी तो शायद यही है कि... <font size="4"><u><strong>&quot;तुम्हारे रास्ते में जो भी आए...जैसा भी आए उसे रौँदते हुए कुचल कर बेपरवाह हो आगे बढते चलो&quot;</strong>..</u></font></p> <p>और यही गूढ महामंत्र हमें हमारे गुरू ने सिखाते वक्त कहा था कि एक ना एक दिन मंज़िल तुम्हारे करीब होगी और तुम लिक्खाड़ों के बादशाह ही नहीं अपितु शहंशाह बनोगे...आमीन।मैँ आपको खुला आमंत्रण देता हूँ कि आप जब चाहे...जितने बजे चाहें...दिन में या रात में कभी भी मेरे ब्लॉग पर आ के अपना मत्था टेक सकते हैँ।आईएगा ज़रूर!...मुझे इंतज़ार रहेगा।</p> <p>&#160;</p> <p><strong><font color="#ff0000" size="4"><em><u>ब्लॉग पर आने के बाद</u></em></font></strong> </p> <p>अब जैसा कि मेरे ब्लॉग पर आने के बाद ..और उसे ध्यानपूर्वक टटोलने-खंगालने&#160; के बाद&#160; आप सभी ने ये अच्छी तरह जान-बूझ और समझ लिया है कि साहित्य में मेरी कितनी रुचि है?...कितना इंटरैस्ट है? हाँ!...ये सही है कि आप ही की तरह मुझे भी अच्छे लगते हैँ ये किस्से...ये कहानियाँ और मैँ भी कुछ मौलिक ..कुछ क्रिएटिव...कुछ अलग सा लिख आप सभी के दिलों पे धाक जमाते हुए अपने काम की अनूठी छाप छोड़ना चाहता हूँ लेकिन क्या ये जायज़ होगा?.. कि काम-धन्धे से थके-मांदे घर लौटने के बाद हम अपने <strong>बीवी-बच्चों से प्यार भरी..शरारत भरी</strong> <strong>अटखेलियाँ </strong>करने के बजाय इस मुय्ये कम्प्यूटर में आँखे गड़ा अपने काले-काले&#160; मृग नयनी डेल्लों(आँखों) को सुजाते फिरें?</p> <p>आपका कहना सही है कि हमें हिन्दी भाषा के उत्थान के लिए कुछ ना कुछ समय तो ज़रूर ही देना चाहिए।लेकिन दोस्त!...ऊपर&#160; हाई-लाईट किए गए सभी गैर ज़रूरी कामों से निबटने के बाद जो रहा-सहा थोड़ा-बहुत टाईम बचता भी है तो मेरी लाख कोशिशों के बावजूद ये मुय्या&#160; टीवी का बच्चा मेरे ध्यान को अपने अलावा कहीं और...इधर-उधर पल भर के लिए भी भटकने नहीं देता।कई बार...कई मर्तबा इस इडियट बाक्स को समझा-बुझा कर भी देख लिया और रिकवैस्ट कर के भी थक लिया कि कम्बख्त!...अब तो जाने दे और मुझे&#160; कुछ अच्छा सा...सटीक सा लिखने-लिखाने दे।...समझा कर!...मान ले मेरी बात&quot;...&quot;वर्ना लोग क्या कहेंगे?&quot;लेकिन कैसे बताऊँ आपको&#160; अपने हाल-ए-दिल की व्यथा कि ये पागल का बच्चा ठीक उसी वक्त कभी बिपाशा' ...तो कभी कैटरीना के ठुमके लगवा मेरे एकाग्र होते हुए चित्त को भंग करने में कोई कसर...कोई कमी नहीं छोड़ता है।</p> <p>'अब जहाँ एक तरफ 'विश्वामित्र' सरीखा दिग्गज साधु भी मेनका&#160; की मनमोहिनी अदाओं के&#160; मोहपाश से ना बच सका और कामवासना के चलते अपनी तपस्या भंग कर पाप का भागीदार बन बैठा।वहीं दूसरी तरफ मैँ तो खुद एक मामुली सा..तुच्छ सा...अदना सा प्राणी हूँ।मेरी क्या बिसात?...कि मैँ इन तमाम कलयुगी अप्सराओं के रूप सौन्दर्य को अनदेखा कर उनके सभी जायज़-नाजयज़ प्रयासों को असफल बना...धत्ता बता चुपचाप आगे बढ जाऊँ?अब ऐसे में हमारा गिरेबान पकड़ हमें कोसने से तो अच्छा रहेगा कि आप हमारे समाज से इस 'टी.वी' रूपी विष बेल को ही जड़ उखाड़ फैंके।क्या हक बनता है किसी चैनल वाले का कि वो ऐसे-ऐसे गर्मागरम...सड़ते-बलते म्यूज़िक विडियो परोस हमारा धर्म...हमारा ईमान बिगाड़ें?</p> <p>अब तक आप मेरी दशा तो समझ ही गए होंगे।अब ऐसे कठिन हालात में हम लाख चाहने और लाख कोशिशें करने के बावजूद&#160; कुछ मौलिक ...कुछ ओरिजिनल लिखने के लिए वक्त नहीं निकाल पाते तो इसमें हमारा&#160; क्या कसूर है?आपका ये कहना सरासर झूठ और फरेब के अलावा कुछ नहीं है कि हम में अच्छा लिखने की इच्छा शक्ति नहीं है या फिर हम कुछ रुचिकर लिखना&#160; ही नहीं चाहते हैँ।वो कहते हैँ ना कि सावन के अँधे को हर तरफ हरा ही हरा नज़र आता है।इसी तरह आप सभी महान जनों को हम में सिर्फ कमियाँ ही कमियाँ दिखाई देती हैँ।आपके इन आरोपों में रत्ती भर भी सच्चाई नहीं है बल्कि सीधी...सरल और सच्ची बात तो ये है कि हम हक-हलाल की खाने के बजाए आराम से घर बैठे-बैठे हराम की कमाई डकारने में ज़्यादा विश्वास रखते हैँ।</p> <p>आप कहते हैँ कि हम समाज के नाम पर कलंक हैँ....धब्बा हैँ लेकिन यहाँ मैँ आपकी बात से कतई सहमत नहीं हूं।जितना नुकसान हम आपकी कहानियों को...आपके लेखो को चुरा कर कर रहे हैँ...उससे कहीं ज़्यादा नुकसान तो आप इन कहानियों&#160; और लेखों&#160; को लिख कर कर रहे हैँ।क्यों झटका लगा ना?...जानता हूँ!...जानता हूँ कि सच अक्सर कड़वा होता है और आप मेरी लाख कोशिशों के बाद भी इस पर विश्वास नहीं करेंगे।लेकिन क्या सिर्फ आप भर के विश्वास ना करने से सच...सच नहीं रहेगा?...झूठ हो जाएगा?&quot;... <br />अगर आप में सच सुनने की हिम्मत नहीं है तो बेशक अपने कान बन्द कर लें और अगर सच देखना नहीं चाहते हैँ तो बिना किसी भी प्रकार की कोई देरी किए&#160; अपनी आँखे बन्द कर लें।...</p> <p>अभी भी मानने को तैयार नहीं?...</p> <p>क्या आपको इल्म भी है कि आपकी इस दिन रात की बेकार की&#160; टकाटक से....</p> <p><strong>&quot;कितना साऊँड पाल्यूशन होता है?&quot;..</strong></p> <p><strong>&quot;कितने कीबोर्ड और माऊस टूटते हैँ?&quot;...</strong></p> <p><strong>&quot;कितनों की नींदे खराब होती हैँ? और...</strong></p> <p><strong>असमय जाग जाने के कारण कितनों के सपने धराशायी हो वास्तविकता के धरातल पे टूटते हैँ?&quot;....</strong></p> <p>इस तरह लोगों की सेहत और भावनाओं से साथ खिलवाड़ करना आपकी नज़रों में सही होगा...जायज़ होगा लेकिन हमारे लिए ये मज़ाक नहीं बल्कि गहन चिंता का विष्य है।अगर हम ऐसा सोचते हैँ तो इसमें आखिर गलत ही क्या है?ठीक है!...माना कि सबकी अपनी अपनी सोच होती है..सबकी अपनी अपनी विचारधारा होती है।जिसे जो अच्छा लगता है वो वही करता है।जैसे आपको दिन-रात सोच-सोच के अपने दिमाग का दही करना अच्छा लगता है तो हमें बिना कोई मेहनत किए दूसरे के माल को अपना बनाना भाता है। </p> <p>आपके इस कहानियाँ और लेखों को लिखने...लिखते चले जाने के ज़ुनून की कारण&#160; ही आज भारत&#160; जैसे स्वाभिमानी देश को&#160; अमेरिका जैसे घमंडी और नकचढे देश का पिछलग्गू बन उसके आगे अपनी झोली फैलानी पड़ रही है।अफसोस!...आप जैसे गंभीर लेखन से जुड़े हुए लोग भी मेरी इस बात को गंभीरता से लेने के बजाए पेट पकड़ कर हँसने की तैयारी में जुटे हैँ।क्या आपके दिल में स्वाभिमान नाम की कोई चीज़ नहीं है?...या कोई यूँ ही आपके साथ...आपके देश की अस्मिता के साथ खिलवाड़ करता फिरे...आपको कोई फर्क नहीं पड़ता?</p> <p>&quot;क्या कहा?&quot;...&quot;विश्वास नहीं हो रहा आपको मेरी बात का?&quot;</p> <p>बड़े अचरज की बात है कि आप जैसे इतने पढे-लिखे और ज़हीन इनसान भी इतनी छोटी और कमज़ोर समझदानी लिए बैठे हैँ।इसिलिए मैँ हर किसी नए-पुराने लेखक से कहता फिरता हूँ कि यूँ रात-रात भर जाग-जाग कर कीबोर्ड के साथ ये बेसिरपैर की उठापटक अच्छी नहीं।खैर छोड़ो!...मैँ ही समझा देता हूँ आप जैसे महान लिक्खाड़ों को कि ..आप जैसों की ही लेखनी के रात-रात भर चलने से आज हमारा देश गंभीर ऊर्जा संकट का सामना कर रहा है।खेतों&#160; को...फैक्ट्रियों को प्रचुर मात्रा में पानी नहीं मिल रहा है।जिसके चलते कृषि-प्रधान देश होते हुए भी आज हम अन्न के मामले में&#160; आत्मनिर्भर होने के बजाए दाने-दाने को मोहताज हुए बैठे हैँ।</p> <p>बिजली की कमी के चलते सभी तरह के उत्पादन कार्य...विकास कार्य ठप्प हुए पड़े हैँ।कल-कारखानों को एक के बाद एक ताले लगते जा रहे हैँ।जिसकी वजह से हमारे देश में बेरोज़गारी जैसी अत्याधिक गंभीर समस्या भी सिर उठाए खड़ी है ।आज ऊर्जा की कमी के चलते हमें ना चाहते हुए भी मजबूरन रशिया का साथ छोड़ अमेरिका का हाथ थाम उसके साथ परमाणु समझौता करना पड़ रहा है।</p> <p>अब आप कहने को ये भी कह सकते हैँ कि...&quot;<strong>ये समझौता तो हमारे देश के लिए हितकारी है...फायदेमन्द है&quot;...</strong></p> <p>चलो!...मानी आपकी बात कि इस सौदे के बाद से हमें यूरेनियम की प्रयाप्त सप्लाई होगी जिससे देश में बिजली की कोई कमी नहीं रहेगी लेकिन ये भी तो देखें आप कि इस समझौते के बाद से हमारे हर काम पर निगरानी रखने का अधिकार मिल जएगा चन्द मगरूर...मगर अकड़बाज देशों को।&#160; </p> <p>अब आप कहेंगे कि गाँव बसा नहीं और पहले ही ये <strong>राजीव </strong>नाम का भिखमंगा कटोरा हाथ में लिए तैयार खड़ा हो गया।अरे!..इतना क्यों सोचता है ऐ 'राजीव'? अभी कौन सा समझौता फाईनल हो गया?देखता नहीं कि इसी परमाणु समझौते के कारण वामपंथियों ने भी सरकार से अपना हाथ खींच लिया है।देखता जा!..ये सरकार अब गिरी...कि अब गिरी।</p> <p>&quot;ठीक है!..मानी आपकी बात कि इसी मुद्दे सरकार गिर सकती हैँ।अब आप कहेंगे कि उसे बचाने के वास्ते खुद 'मुलायम सिंह' जी अपनी साईकिल पर भी तो पहुँच गए हैँ...उसका क्या?&quot;...</p> <p>&quot;अरे!..अगर वो मिल भी जाएँ तो भी कौन सा गिनती पूरी हुए जा रही है?चमत्कारिक संख्या से तो फिर भी काँग्रेस दूर है&quot;...</p> <p>&quot;तो क्या हुआ?&quot;...&quot;अभी तो बहुत लेन-देन..बहुत उठा-पटक होनी बाकि है।..हमने तो यहाँ तक सुना है कि एक-एक सांसद को पच्चीस से चालीस करोड़ रुपए तक ऑफर कर दिए गए हैँ समर्थन के बदले में।</p> <p>चलो!...मानी आपकी बात कि इस सब उठा-पटक के जरिए सरकार बच सकती है लेकिन ये तो आप सोचें कि ये सब पंगा आखिर पड़ा तो आपके कहानी लेखन के कारण ही ना?..</p> <p>&quot;ना आप देर रात तक कहानी लिखते और ना हे देश को इन नेताओं के चुनावों जैसे मँहगे और पेचीदा&#160; शौक से दो-चार होना पड़ता।</p> <p>&quot;अभी भी कुछ नहीं बिगड़ा है ...समय रहते चेत जाओ और ओरिजिनल और मौलिक लिखने के बजाए हमारी तरह कॉपी-पेस्ट की सरल और सुलभ तकनीक को अपनाते हुए देश को संकट और मुसीबत से बचा आत्मनिर्भर बनाओ।</p> <p>तो आओ दोस्तो!...हम इस सब लिखने-लिखाने की बेकार की माथापच्ची से दूर हो शांति से कहीं एकांत में जीवन बिताएँ और मिल के ये शपथ लें कि... &quot;<strong><font color="#ff0000" size="4">आज से..अब से&#160; कोई मौलिक कहानी नहीं ...कोई ओरिजिनल लेख नहीं&quot;..</font></strong></p> <p>आखिर!..देश का...देश की अस्मिता का मामला जो ठहरा। <br /></p> <p>&quot;जय हिन्द&quot;....</p> <p>&quot;इंकलाब ज़िन्दाबाद&quot;...</p> <p>&quot;ज़िन्दाबाद...ज़िन्दाबाद&quot;...</p> <p>&quot;भारत माता की जय&quot; </p> <p>&#160;</p> <p>***राजीव तनेजा***</p> <p>Rajiv Taneja</p> <p>Delhi(India)</p> <p><a href="http://hansteraho.blogspot.com">http://hansteraho.blogspot.com</a></p> <p>&#160;</p> <p>+919810821361</p> <p>+919896397625</p> <div class="blogger-post-footer"><script type="text/javascript"><!-- google_ad_client = "pub-0164171627729298"; google_ad_width = 728; google_ad_height = 90; google_ad_format = "728x90_as"; google_ad_type = "text_image"; google_ad_channel = ""; //--> </script> <script type="text/javascript" src="http://pagead2.googlesyndication.com/pagead/show_ads.js"> </script></div>राजीव तनेजाhttp://www.blogger.com/profile/00683488495609747573rajivtaneja2004@gmail.comtag:blogger.com,1999:blog-4497269264531281345.post-74945863413077061342008-07-19T00:20:00.001+05:302008-07-19T07:25:38.586+05:30"व्यथा-चालू चिड़िया की"<p>&#160;</p> <p><strong>&quot;व्यथा-चालू चिड़िया की&quot;</strong></p> <p><strong></strong></p> <p>***राजीव तनेजा*** </p> <p>&#160;</p> <p>&#160;<a href="http://lh3.ggpht.com/rajivtaneja2004/SIDltZq57CI/AAAAAAAAAO0/VWdPP-XJFyk/s1600-h/babes123%5B4%5D.jpg"><img style="border-top-width: 0px; border-left-width: 0px; border-bottom-width: 0px; border-right-width: 0px" height="140" alt="babes123" src="http://lh4.ggpht.com/rajivtaneja2004/SIDl16T0efI/AAAAAAAAAO4/Rv2FkGL3k8U/babes123_thumb%5B2%5D.jpg?imgmax=800" width="244" border="0" /></a> </p> <p>&quot;लो कर लो बात&quot;...</p> <p>&quot;पहले तो आप खुद ही मुझे इस कोर्ट-कचहरी के झमेले में घसीट लाए और अब आपको ही डर लग रहा है कि माननीय अदालत में जज साहिबा के एक महिला होने के कारण आपके साथ इंसाफ नहीं होगा&quot;...</p> <p>&quot;चलो!...मानी आपकी बात कि कभी-कभी हमदर्दी या फिर जाति भेद के चलते माननीय न्यायधीशों से कुछ गल्तियाँ भी हो जाती हैँ लेकिन ऐसी अनोखी और विरली घटनाएँ तो यदा-कदा सावन के महीने में ही घटा करती हैँ&quot;</p> <p>&quot;बाकि ज़्यादातर केसों में तो पैसो का लँबा-चौड़ा हेर-फेर ही इस सब के पीछे असली कारण..असली वजह होता है&quot;</p> <p>&quot;क्या कहा?...आपको विश्वास नहीं है हमारी न्याय प्रणाली पर&quot;...</p> <p>&quot;और आपको शुबह है कि फैसला आपके हक में नहीं बल्कि मेरे हक में होगा?&quot;</p> <p>&quot;अगर यही सब सोच के पहले ही अदालत के बाहर फैसला कर लिया होता तो आज आपको यूँ शर्मिन्दा हो सर तो ना झुकाना पड़ता&quot;...</p> <p>&quot;ठीक है!...अभी भी कुछ नहीं बिगड़ा है&quot;...</p> <p>&quot;इस केस-कास के चक्कर को रहने ही देते हैँ&quot;... <br /></p> <p>&quot;आप भी क्या याद करेंगे कि सुबह-सुबह किसी दिलदार से पाला पड़ा है&quot;..</p> <p>&quot;चलो!...हम कोर्ट के बजाय यहीं...बाहर...खुले में ही बैठ के आराम से......इत्मीनान से अपने सारे विवाद...सारे फसाद&#160; सुलझा लेते हैँ&quot;...</p> <p>&quot;वैसे भी हम लड़कियाँ!...नफरत और दुश्मनी में नहीं बल्कि प्यार में....मोहब्बत में यकीन करती हैँ&quot;...</p> <p>&quot;ऊपरवाले ने इस सब का सन्देश देने के लिए ही हमें इस निष्ठुर धरती पे भेजा है&quot;...</p> <p>&quot;वैसे ये और बात है कि ज़्यादातर झगड़े...ज़्यादातर फसाद भी हमारी ही वजह से होते हैँ&quot;...</p> <p>&quot;खैर!...अपवाद कहाँ नहीं है?&quot;...</p> <p>&quot;इन्हें छोड़ असल मुद्दे पे आते हुए हम काम की बात करते हैँ&quot;...</p> <p>&quot;लो!...चलो मैँने तो सब कुछ आप पर ही छोड़ दिया&quot;....</p> <p>&quot;आप खुद शिकायतकर्ता...आप ही मुवक्किल...और खुद आप&#160; ही माननीय दण्डाधिकारी&quot;....</p> <p>&quot;अब खुश?&quot;...</p> <p>&quot;मेरे ख्याल से यही ठीक भी रहेगा&quot;...</p> <p>&quot;तो फिर शुरू करें मुकदमा?&quot;....</p> <p>&quot;ओ.के&quot;...</p> <ul> <li><strong>&quot;तो आपका पहला इलज़ाम हम लड़कियों पर ये है कि हम लड़कों के भोलेपन का फायदा उठा ...उन्हें पागल बना...अपना उल्लू सीधा करती हैँ&quot;</strong> <br /></li> </ul> <p>&quot;एक मिनट!...बीच में टोकने के लिए मॉफी चाहूँगी लेकिन ये आपसे किस गधे ने कह दिया कि उल्लू टेढा होता है?&quot;...</p> <p>&quot;अरे!...देखा जाए तो सही मायने में टेढा तो 'कुरकुरे' होता है&quot;....</p> <p>&quot;यकीं नहीं आए तो बेशक पैकट मँगवा उसे खुद अपनी ही आँखों के सामने फड़वा के देख लें&quot;</p> <p>&quot;एक भी..सिंगल पीस भी ...सीधा निकल जाए तो कहना&quot;...</p> <p>&quot;अब तो खुद&#160; <strong>'जूही चावला'</strong> भी कह रही है कि टेढा है...तो सही ही होगा&quot;...</p> <p>&quot;आखिर इतनी बड़ी सैलीब्रिटी है...हमसे...आप से झूठ थोड़े ही बोलेगी&quot;...</p> <p>&quot;ऐक्चुअली!..मैँ खुद इसलिए भी इतनी कॉंफीडैंट हूँ क्योंकि मैँने भी इसे अच्छी तरह से चैक किया है&quot;...</p> <p>&quot;सचमुच में टेढा ही है&quot;...</p> <p>&quot;सभी टुकड़े टेढे...एकदम टेढे ना निकलें तो बेशक मेरा नाम <strong>'चालू चिड़िया'</strong> से बदल के <strong>'चालू' कबूतरी'</strong> रख देना&quot;...</p> <p>&quot;मैँ!...उफ तक ना करूँगी&quot;...</p> <p>&quot;और हाँ...याद आया!...पहले तो आप मुझे साफ-साफ ..एकदम क्लीयर शब्दों में समझाएँ कि ये <strong>'चालू चिड़िया'</strong> आखिर होती क्या है?&quot;...</p> <p>&quot;हद है आप लोग भी&quot;....</p> <p>&quot;अच्छी भली दो-दो सुरमई...काजल भरी...कजरारी आँखों के होते हुए भी दिन-दहाड़े जानबूझ कर अँधे बने बैठे हैँ&quot;...&quot;</p> <p>&quot;मज़ा आता है ना आपको इस सब में?</p> <p>&quot;सच-सच बताएँ कि क्या आपने मुझे कभी पँख फैला उड़ते देखा है?&quot;...</p> <p>&quot;नहीं ना?&quot;...</p> <p>&quot;तो फिर मैँ चिड़िया कैसे हो गई?&quot;...</p> <p>&quot;क्या आपने मुझे मोटर की तरह कभी 'चालू' ...तो कभी बन्द होते हुए देखा है?&quot;...</p> <p>&quot;नहीं ना?&quot;...</p> <p>&quot;क्या मेरे ये दोनों हाथ.....हाथ नही