tag:blogger.com,1999:blog-4325088392143650842008-07-17T08:20:44.123-07:00मालवी जाजम......बोलोगा तो बचेगी मालवीमालवी जाजमhttp://www.blogger.com/profile/10905821853128369906noreply@blogger.comBlogger25125tag:blogger.com,1999:blog-432508839214365084.post-848037967261674412008-04-30T07:49:00.000-07:002008-04-30T07:53:48.674-07:00तपते मौसम में हिन्दी तर्जुमे के साथ मालवी की ग़ज़ल !बोली की अपनी ख़ूबसूरती है. हालाकि भाषा पंडित बोली से<br />थोड़े नाराज़ ही रहते हैं . अपने अपने अंचल में बोली का <br />अपना विन्यास,मुहावरे,लहजा और कहन है.मालवी भी इससे अछूती नहीं है. <br />आलम ये है कि इन्दौर, उज्जैन,रतलाम,धार<br />या मंदसौर (तक़रीबन २०० कि.मी के रेडियस में)मालवी अंदाज़ बदल जाता है.<br /> रतलाम में जो अठे (यहाँ) है वह उज्जैन में अइने हो जाता है और इन्दौर में याँ.<br />इस तरह से बोली हमेशा एक शब्द यात्रा में ही रहती है. आपको मेरे मुलुक <br />मालवा की मिठास का स्वाद चखाने के लिहाज़ से ये ग़ज़ल अपने मालवी जाजम<br /> पर जारी कर रहा हूँ.<br />बेटे संजय का इसरार था कि आप सादा पंक्तियों <br />में मालवी मिसरे का तर्जुमा भर हिन्दीं में कर दें जिससे<br />मालवी न जानने वाले पाठक भी इस ग़ज़ल का लुत्फ़ उठा सकें . <br />मैने तर्जुमें यानी अनुवाद को भी तुकांत बनाने की कोशिश की है.<br />आशा है अनुवाद को भी तुक में पढ़ने का मज़ा भी आपको मिल सकेगा. <br /><br />गर्मी ने आप-हम सब को हैरान परेशान कर रखा है ऐसे में ये<br />ग़ज़ल पूरे परिवेश और इंसानी रिश्तों को ज़ुबान देने का प्रयास है.<br />मैं विगत एक दशक से मालवी ग़ज़ल कह रहा हूँ,तीन मजमुए शाया<br />हो चुके है और आपको बताते हुए <br /> ख़ुशी है कि मालवी ग़ज़लों को मैने मुशायरों में भी पढ़ा है <br />और जानेमाने शायरों ने भी इन्हें अपनी प्रेमल दाद दी है.<br />हम सब जानते ही हैं कि ग़ज़ल अब उर्दू के साथ<br />सिंधी,मराठी,गुजराती में भी कही जा रही है <br />और हाँ मालवी की साथन निमाड़ी में भी ग़ज़ल विधा में ख़ासा काम हो रहा है<br />जिसकी बानगी भी जल्द ही आपकी ख़िदमत में पेश की जाएगी.<br /><br /> <em>(साथन यानी सखी; ये शब्द लेखक और पत्रकार श्री यशवंत व्यास का है<br /> जो उन्होंने मालवा के अग्रणी अख़बार नईदुनिया में मालवी - निमाड़ी<br /> कॉलम थोड़ी-घणी को शुरू करते वक़्त दिया था. यशवंत भाई <br />भी मेरे मालवा के ही सपूत हैं)</em><br /><br /><br />मुलाहिज़ा फ़रमाएँ ये मालवी ग़ज़ल.....<br /><br /><strong>तवा सा तमतमाता त्रास का दन<br />तरस का तिलमिलाता प्यास का दन</strong><br /><br />तवे से तमतमाते त्रास के दिन<br />तरसते तिलमिलाते प्यास के दिन<br /><br /><strong>अलूणी साँझ रात खाटी है<br />निठारा निरजला उपास का दन</strong><br /><br />ये फीकी साँझ -रात नफ़रत की<br />निपट ये निरजले उपवास के दिन<br /><br /><strong>खाली हे कुवाँ-बावडी,खाली हे घट<br />उखड़ती सांस का विनास का दन</strong><br /><br />ख़ाली हैं कुएँ-बावडी और घट<br />घुटन के हैं उखड़ती सांस के दिन<br /><br /><strong>तीखा तीखा हे बोल घाव घणा<br />दोगला दरद का हे फ़ाँस का दन</strong><br /><br />तीख़े तीख़े से हैं ये घाव बहुत<br />दर्द के दोगले ये फ़ाँस के दिन<br /><br /><strong>आव-आदर नीं कोई प्रीत सरम<br />खाटा खाटा कसा खटास का दन</strong><br /><br />न कोई प्रेम-आदर लाज न शर्म<br />ये कैसे कटकटे खटास के दिन<br /><br /><strong>हत्या हे द्वेस न्याव नी कोई<br />दनछता ई कसा उजास का दन</strong><br /><br />हत्या है द्वेश है और न्याय नहीं<br />ये कैसे उजले-उजास के दिन<br /><br /><strong>पीड़ा लम्बी घणी हे छाया गुम<br />खजूर-खेजड़ा का बाँस का दन</strong><br /><br />नहीं छाया है लम्बी पीड़ाएँ<br />बबूल,खजूर और बाँस के दिन<br /><br /><strong>थू थू नाता थू थू कड़वा रिस्ता<br />’पटेल’ हे कठे मिठास का दन</strong><br /><br />थू थू नाते हैं और कड़वे रिश्ते<br />पटेल कहाँ हैं वो मिठास के दिन<br /><br /><br /><em>मुझे आपकी अनमोल दाद का इंतज़ार है.</em><br /><strong>नरहरि पटेल</strong>099265-60881मालवी जाजमhttp://www.blogger.com/profile/10905821853128369906noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-432508839214365084.post-41611012012236143042008-04-17T07:37:00.000-07:002008-04-17T07:41:54.675-07:00विख्यात मालवी लोकगीत गायक रामअवतार अखण्ड को भेराजी सम्मान<a href="http://bp2.blogger.com/_2kx6UhZMVZs/SAdhlTMkaOI/AAAAAAAAABk/TpsOVhckav8/s1600-h/ramavtar+akhand.jpg"><img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://bp2.blogger.com/_2kx6UhZMVZs/SAdhlTMkaOI/AAAAAAAAABk/TpsOVhckav8/s320/ramavtar+akhand.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5190224389003831522" /></a><br />जाने माने मालवी लोक-गीत गायक श्री रामअवतार अखण्ड को सन 2008<br />का भेराजी सम्मान दिया जा रहा है। उज्जैन में 18 अप्रैल को आयोजित<br />एक भव्य समारोह में अखंडजी इस सम्मान से नवाज़े जाएंगे।<br />अभी तक इस सम्मान से बालकवि बैरागी,नरहरि पटेल,नरेन्द्रसिंह तोमर,आनन्दराव<br />दुबे,भावसार बा,प्यारेलाल श्रीमाल,हरीश निगम,शिव चौरसिया,सिध्देश्वर सेन आदि<br />कई विभूतियां सम्मानित हो चुकीं हैं। अखण्डजी सगुण – निर्गुण मालवी गीतों <br />के सुमधुर गायक हैं। ये जानकारी देना भी प्रासंगिक ही होगा कि भेराजी यानि<br />आकशवाणी इन्दौर के किसान भाइयों के लोकप्रिय कार्यक्रम के आशु-प्रसारणकर्ता और<br />जाने माने लोकगीत गायक थे।ये सम्मान भेराजी का परिवार पिछले बीस वर्षों से <br />उज्जैन में आयोजित कर रहा है। कोशिश की जाती है कि मालवा से ही जुडे हुए<br />किसी कलाकर्मी को प्रतिवर्ष सम्मानित किया जाए।<br /><br />कलाकार सदैव ही अपनी सभी रचनाओं की प्रस्तुति मन-प्राण से देता है। हर प्रस्तुति में भावनाओं और गायकी के अनूठे रंग भरता है। लेकिन कोई एक प्रस्तुति ऐसी होती है जो कलाकार की हस्ताक्षर रचना बन जाती है। श्रोताओं को भी ना जाने क्यूँ उसी एक रचना को बार-बार सुनने में अधिक रस मिलता है। इसी तरह से श्री रामअवतार अखण्ड का भजन "दरसन देता जाजो जी, सासरिया की बात पीहर में केता जाजो जी' श्रोताओं में अत्यंत लोकप्रिय है। आकाशवाणी इन्दौर पर रेकॉर्ड किया गया निर्गुणी छाप वाला यह लोकगीत विविध भारती के प्रातःकालीन प्रसारण "वंदना' में सैकड़ों बार सुना गया! विविध भारती जैसी लोकप्रिय राष्ट्रीय प्रसारण सेवा में इस भजन का बजना मालवी लोक संस्कृति का गौरव-गान है।<br /><br /> लोक संगीत प्रकृति की अद्भुत देन है। यही वजह है कि मालवा का लोक संगीत मन को गहराई तक छूता है। चंबल, शिप्रा-सी पवित्रता लिए और कल-कल करते मालवा के भोले लोकगीत घर-आँगन, रिश्तों, तीज-त्यौहारों और सूरज-चंदा, नदी, पवन, आकाश जैसे तत्वों का बखान करते हैं। दुनिया कितनी ही आगे बढ़ जाए, मालवा का लोक संगीत हमेशा मनुष्य के अस्तित्व के मूल का स्मरण दिलाता आया है। मालवा के लोक संगीत की सबसे बड़ी ताक़त वह सहृदयता है जिसमें सूर, तुलसी, कबीर, मीरा, गोरख की पवित्र बानी उन्मुक्त होकर गूँजती है। जब-जब मालवा के लोक संगीत को सरल, सहज और आडंबरविहीन स्वर मिला वह कुछ अधिक ही चहक उठा है। वह कभी मन की ख़ुशी बढ़ाता, कभी थके मन को दिलासा देता, कभी जीवन के संघर्ष की पूछताछ करता है; तो कभी मांगलिक प्रसंग की धजा बनकर घर-आँगन में गूँजता यह मालवा का लोक संगीत जीवन के प्रमाद को नष्ट कर उल्लास की सृष्टि करता है।<br /><br /> श्री रामअवतार अखण्ड ने मालवा के लोक संगीत को आगे बढ़ाने में हमेशा अपना विनम्र योगदान दिया है। प्रचार-प्रसार से परे श्री अखण्ड उन खरे गायकों में से हैं जो मालवी लोकगीत गा कर स्वयं आनंदित होते हैं, यह अलग बात है कि उनके आनंद को एक बड़ा श्रोता-वर्ग सहज अपने हृदय में समेट लेता है। शब्दप्रधान गायकी कहलाने वाला मालवा का लोक संगीत किसी शास्त्र में बंधा हुआ नहीं है, वह तो गायक की स्फूर्त भावना का इज़हार करता है और श्री अखण्ड के कंठ से झर कर न जाने कितने श्रोताओं के आनंद का हिस्सेदार बनता है। श्री अखण्ड की गायकी सरलता से सजी हुई है और वह हमेशा इस बात को व्यक्त करती रही है कि लोक संगीत से अभिव्यक्त होती सुरभि पहले गाने वाले को आनंदित करे तो वह अपने आप सुनने वाले की अमानत बन जाती है। <br />श्री रामअवतार अखण्ड का सरल-सहज स्वर मालवी परिवेश का सुरीला प्रतिनिधि है। सन् २००८ का भेराजी सम्मान इस भावुक कलाकार को दिया जा रहा है।<br /><br /> श्री अखण्ड की प्रथम कैसेट का शीर्षक-गीत "प्यारे लागे रे म्हारो मालवो देस' मालवा के उत्सवों, मेलों, विश्वविद्यालयीन युवा उत्सवों और ना जाने कितनी टी.वी. फ़िल्मों के पार्श्व में बजता रहा है। सादा धुन और मीठी मालवी में भीगा यह गीत कुछ इतना सुना जा चुका है कि यह स्वतः ही लोकप्रिय हो गया है। श्री अखण्ड जैसे लोकगायक की यह सबसे बड़ी उपलब्धि है। जब कोई गीत अवाम की ज़ुबान पर चढ़ जाता है तो समझिए उसने लोकप्रिय होने का पद पा लिया !<br />-संजय पटेलमालवी जाजमhttp://www.blogger.com/profile/10905821853128369906noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-432508839214365084.post-3074576339148696062008-04-08T20:19:00.000-07:002008-04-08T20:29:54.557-07:00मालवा के लोक-नाट्य माच में थिरकतीं हैं मानवीय संवेदना<strong>मालवी माच में केवल मनोरंजन नहीं है, इसमें लोकरंजन है।</strong> मनोरंजन तो केवल मन रंजन करता है और वह केवल मन को रास आता है। मनोरंजन तो बदलता रहता है, व्यक्ति की मानसिक स्थिति के अनुसार और इसीलिए वह अपनी-अपनी रूचि से बनता-बिगड़ता भी है। इसमें केवल आमोद, प्रमोद, विनोद और वैयक्तिक मनोरंजन के लिए आग्रह होता है। इसलिए यह व्यक्ति, जाति, वर्ग के अनुसार बदलता रहता है। दूसरों शब्दों में हम कह सकते हैं कि मनोरंजन के आचरण में पूर्वाग्रह भी आड़े आते हैं जबकि लोकरंजन किसी व्यक्ति या वर्ग का न रहकर पूरे लोक का होता है। मालवा का माच लोकरंजन है। उसमें समग्र लोक की सांस्कृतिक चेतना का भाव है। उसका आश्रय लोक मन ही है। और यह लोक मन ही माच जैसी प्रदर्शनकारी लोककला का चयन करता है। मालवा का माच सबके मन का रंजक है। माच की यह लोकरंजकता सहज रूप से एक कालखंड तक नहीं चलती। उसमें काल के पार जाने की उदारता भी है। इसे समझने के लिए तटस्थ और निरपेक्ष दृष्टि चाहिए। यहॉं ((कलाकार लोक की सभी संवेदनाओं और सामाजिक रेखाओं से जुड़ता है। इसीलिए जब माच के मंच पर लोक कलाकार नृत्य करता है तब उसके पॉंव की थिरकन का आभार और आनंद सभी के मन में ठेका देने लगती है, ताल देने लगती है। माच की तरह लीला और अन्य लोक नाट्यों में कलाकार लोक के शारीरिक, मानसिक और आत्मिक भावों को मुद्राओं, अभिनय और संवाद में दर्शाता है, किन्तु माच में अभिनय की विशिष्टता है। उसमें अतीत के चरित्र, इतिहास, परम्परा, मान्यता और मर्यादा का हितोपदेश भी छिपा रहता है। उसमें अपनी के अस्मिता की रक्षा का भाव प्रमुख है। मालवी माच की ख़ूबी है कि उसमें लोकरंजन के तमाम तत्व मौजूद हैं। उसमें समाज की कुत्सित भावनाओं को हास्य और विनोद के माध्यम से फूँक कर उड़ा देने की क्षमता है। उसमें कुत्सित भावनाओं की साज़िशें नहीं चलतीं। माच में एक विशेषता और भी है, वह यह कि उसमें भेदभाव के लिए जगह नहीं है। राजा की हीन हरकत को माच नहीं बख्शता और चाकर के ईमान को वह सलाम करता है। लोक आदर्शों की वफ़ादारी है माच में। उसमें सर्वत्र स्वच्छंदता के साथ लोकहित सर्वोपरि है।<br /><br /> मालवी माच ने युग के परिवर्तन के साथ समुचित परिवर्तन नहीं किया। लोकनाट्य माच ने विकास का रास्ता नहीं ढूंढ़ा। इसके अनेक कारण हो सकते हैं। इस पर आज के उन तमाम कलाकारों को जो लेखन और अभिनय से जुड़े हैं, जो लोकसंगीत और इतर रंगमंचीय कलाओं से जुड़े हैं, उन्हें मालवा के माच की अंदरूनी मासूम ताकत को पहचानना और जानना ज़रूरी है। यह भी सोचा जाना चाहिए कि आज माच की मॉंग क्यों नहीं है ? जबकि छत्तीसगढ़ में अभी भी हबीब तनवीर के एकल प्रयास से नाचा जीवित है। दरअसल, माच में समसामायिकता को जगह मिलनी चाहिए। यह भी स्वीकारना होगा कि आज जबकि पूरी लोक संस्कृति पर हमले कायम हैं, वैश्वीकरण और बाज़ारवाद ने हमारी लोकरूचि और जनरूचि को विकृत करने के सारे मंसूबे बना लिए हैं, हमें सोचना होगा कि हमारा लोकजीवन, हमारी प्रकृति, हमारा पुनीत जैविक पर्यावरण कैसे अभिव्यक्त हो, माच जैसे लोकरंजक माध्यमों से।<br /><strong>-नरहरि पटेल</strong><br /><br /><em><strong>उज्जैन के अंकुर मंच द्वारा हाल ही प्रकाशित और डॉ.शैलेंन्द्रकुमार शर्मा द्वारा संपादित महत्वपूर्ण दस्तावेज़ 'मालवा का लोक-नाट्य माच और अन्य विधाएँ...पुस्तक की विस्तृत समीक्षा शीघ्र ही</strong></em>मालवी जाजमhttp://www.blogger.com/profile/10905821853128369906noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-432508839214365084.post-85393713601082903822008-03-20T09:18:00.000-07:002008-03-20T09:26:27.150-07:00रे मनवा रंग तन,रंग मन,होली आई रंग गुलाल !<a href="http://bp1.blogger.com/_2kx6UhZMVZs/R-KQEQ3k-wI/AAAAAAAAABU/6g6FDPYXO0Y/s1600-h/malvi+folk+dance.jpg"><img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://bp1.blogger.com/_2kx6UhZMVZs/R-KQEQ3k-wI/AAAAAAAAABU/6g6FDPYXO0Y/s320/malvi+folk+dance.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5179860924351445762" /></a><br /><strong>रे मनवा रंग तन रंग मन<br />होली लाई रंग गुलाल।</strong><br /><br /><strong><br />प्रीत को काजल आँख में आँजो<br />कारा कारा मन ने चॉंदी सा मॉंजो<br />पाताला में गाढ़ी दो मलाल<br /><br />हेत को मंदर कितरो बड़ो है<br />अंदर जीके सांवरो खड़ो है<br />श्रम के आगे हार्यो काल<br /><br />भूख गरीबी को कीचड़ कारो<br />कई नी है थारो ने कई नी है म्हारो<br />झूठा है सब जंजाल<br /><br />एक ऊचो एक नीचो वात पुराणी<br />भई भई मिली ने भीत गिराणी<br />हाथा में लइलो कुदाल<br /><br />भर पिचकारी नवा नवा रंग की<br />थाप लगा धिन्नाधिंग मिरदंग की<br />प्रेम अबीर उछाल<br /><br />झूठ की होली जली जली जावे<br />सॉंच ने भई कूण आँच लगावे<br />सॉंच को है ऊंचो भाल</strong><br /><br /><strong>-नरहरि पटेल</strong>मालवी जाजमhttp://www.blogger.com/profile/10905821853128369906noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-432508839214365084.post-20915972941830552372008-03-13T08:18:00.000-07:002008-03-13T08:27:24.340-07:00संजय पटेल की मालवी कविता<a href="http://bp3.blogger.com/_2kx6UhZMVZs/R9lHlKLIkGI/AAAAAAAAABM/bijgVo0TC-A/s1600-h/narhariji+patel.jpg"><img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://bp3.blogger.com/_2kx6UhZMVZs/R9lHlKLIkGI/AAAAAAAAABM/bijgVo0TC-A/s320/narhariji+patel.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5177247950350880866" /></a><br /><strong>जमानो नीं बदलेगा</strong><br /><br />लुगई रोज रिसावे<br />लाड़ी पाणी नीं बचावे<br />तेंदूलकर रन नीं बनावे<br />छोरो घरे नीं आवे<br />छोरी सासरे नीं जावे<br />माड़साब सबक नीं करावे<br />टाबरा भणवा नीं जावे<br />नेता झूठी कसम खावे<br />अखबार सॉंच छुपावे<br />हेडसाब थाणा में खावे<br />भई-भई रोज कुटावे<br />बेसुरो नाम कमावे<br />मालवी बोलता नीं आवे<br />जमाना के बेसरमी भावे<br /><br /><br />दा साब ! <br />छाना-माना बेठा रो<br />बको मती।<br />तमारा दन ग्या।<br />किच-किच करोगा<br />तो छोरा-छोरी इज्जत का<br />कांकरा करेगा<br />मुंडो खोलो मती<br />दाना-बूढ़ा हो<br />बेठा-बेठा देखता रो<br />जमानो नीं बदलेगा<br />तम बदली सको <br />तो बदलो।<br /><br />थोड़ो लिख्यो हे<br />पूरो जाणजो।<br /><br /><strong><br />(रेखाचित्र:दिलीप चिंचालकर)</strong>मालवी जाजमhttp://www.blogger.com/profile/10905821853128369906noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-432508839214365084.post-80361878769478153192008-03-05T03:51:00.000-08:002008-03-05T03:59:03.983-08:00मालवी को समर्थ सम्बल चाहिए<a href="http://bp1.blogger.com/_2kx6UhZMVZs/R86K8oJPa3I/AAAAAAAAABE/FDXbncU-Dyk/s1600-h/Mandna.jpg"><img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://bp1.blogger.com/_2kx6UhZMVZs/R86K8oJPa3I/AAAAAAAAABE/FDXbncU-Dyk/s320/Mandna.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5174225796068240242" /></a><br /><br />भारत के पश्चिम मध्यप्रदेश में विन्ध्य की तलहटी में जो पठार है उसे कम से कम दो हज़ार वर्षों से मालव (मालवा) कहा जा रहा है। यहॉं के लोग भाषा और पोषाक से कहीं भी पहचान में आते रहे। मौसम की यहॉं सदा कृपा रही है। इसीलिए सदा सुकाल के सुरक्षित क्षेत्र के रूप में इसकी सर्वत्र मान्यता रही है। इस मालवा की बोली मालवी कहलाती है। वह पन्द्रह ज़िलों के प्रायः डेढ़ करोड़ लोगों की भाषा है।<br /><br />मालवा क्षेत्र की सदा से राजनीतिक पहचान रही है। भौगोलिक समशीतोष्णता का आकर्षण रहा है। धार्मिक उदारता, सामाजिक समभाव, आर्थिक निश्चिन्तता, कलात्मक समृद्धि से सम्पन्न विक्रमादित्य, भर्तृहरि, भोज जैसे महानायकों की यह भूमि रही है जहॉं कालिदास, वराहमिहिर जैसे दैदीप्यमान नक्षत्रों ने साधना की। मालवा के वसुमित्र ने विदेशी ग्रीकों को, विक्रमादित्य ने शकों तथा प्रकाश धर्मा और यशोधर्मा ने हूणों को पराजित कर स्वतंत्रता संग्राम की परंपरा पुरातनकाल से ही स्थापित कर दी थी। मालवा का अपना सर्वज्ञात विक्रम संवत् भी है। यहॉं भीमबेटका जैसे विश्वविख्यात पुरातत्व के स्थान हैं। उज्जयिनी, विदिशा, महेश्वर, धार, मन्दसौर जैसे यहॉं पारम्परिक सांस्कृतिक केन्द्र हैं जहॉं निरन्तर जीवन संस्कार पाता रहा। यहॉं की बोली मालवी की चिरकाल से समृद्धि होती रही जो अब क्रमशः उजागर होती जा रही है। मालवी का लोक साहित्य अत्यंत समृद्ध है। लोक नाट्य माच, गीत, कथा वार्ताएँ, पहेलियॉं, कहावतें आदि मालवी की अपनी शक्ति है। इसकी शब्द सम्पदा अत्यंत समृद्ध है। इसकी उच्चारण पद्धति नाट्शास्त्र युग से आज तक वैसी ही है।<br /><br />उसी समृद्ध मालवा की अपनी मीठी बोली मालवी और मालवा को आज अपनी पहचान की अपेक्षा बनी हुई है। डाक विभाग में मालवा डिवीजन और "मालवा एक्सप्रेस' ट्रेन के अतिरिक्त शासन स्तर पर अब "मालवा' नाम कहीं बचा नहीं है। इन्दौर-उज्जैन-भोपाल की प्रशासकीय इकाई को किसी स्तर पर भी "मालवा' नाम तो दिया ही जा सकता है परन्तु राजनीतिक इच्छाशक्ति के बिना यह सम्भव नहीं है। यही कारण है कि मालवी संस्कृति और साहित्य तथा भाषा के लिए काम करने वाली कोई एक भी मज़बूत संस्था नहीं है।<br /><br />तुलनात्मक अध्ययन द्वारा मालवी बोली तथा संस्कृति की शक्ति तथा व्यापकता को अभी पूरी तरह प्रकट करने के लिए और प्रयासों की अपेक्षा है। नई हवा में क्षरण होती मालवी लोक संस्कृति की विभिन्न धाराओं की सुरक्षा के लिए त्वरित उपाय करनेहोंगे। इस सबके लिए साहित्य-संस्कृति के समर्पित मर्मज्ञ साधकों के साथ ही राजनीतिक-प्रशासनिक समर्थ सम्बल की भी अत्यंत आवश्यकता है।<br /><br /><strong>डॉ. भगवतीलाल राजपुरोहित</strong>मालवी जाजमhttp://www.blogger.com/profile/10905821853128369906noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-432508839214365084.post-10913206884518127422008-02-29T09:22:00.000-08:002008-02-29T09:34:07.099-08:00आज पढिये वेद हिमांशु के मालवी हाईकूवेद हिमाशु शुजालपुर मे रेवे हे.खूब अच्छो लिखे हे..मालवी में , हिन्दी में.<br />आज बाँचो वेद हिमांशु का मालवी हाईकू.थोड़ा सा शब्द हे पण घाव केसो गेरो<br />करे हे आप भी देखो.<br /><br /><strong>><br />ऊ पियासो थो<br />नद्दी में उतरियो<br />ने डूबी गयो<br /><br />><br />घणी उदास<br />चुपचाप वा देखे<br />मनी पिलांट<br /><br />><br />क्रांति करोगा ?<br />घर से सुरू करो<br />जीती जावोगा</strong>मालवी जाजमhttp://www.blogger.com/profile/10905821853128369906noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-432508839214365084.post-77545046512929044752008-02-22T07:23:00.000-08:002008-02-22T08:08:31.711-08:00पहले मालवी कवि-सम्मेलन का दुर्लभ चित्र और श्रीनिवास जोशी की कविता<a href="http://bp0.blogger.com/_2kx6UhZMVZs/R77zGXEHL0I/AAAAAAAAAA0/XEsGBLL_33M/s1600-h/5.jpg"><img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://bp0.blogger.com/_2kx6UhZMVZs/R77zGXEHL0I/AAAAAAAAAA0/XEsGBLL_33M/s320/5.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5169836712863936322" /></a><br /><em>२४ फ़रवरी के मालवी गद्य का दादा बा श्रीनिवासजी जोशी की दूसरी बरसी हे.<br />इण मोका पे बाँचो दादा जोशी जी की या कविता पटवारी.इका साथे <strong>उज्जैन में सन ५२ में कार्तिक मेळा मे आयोजित पेला मालवी कवि सम्मेलन </strong>की फ़ोटू भी हे. इण चित्र में दादा जोशी का साथे मालवी-हिन्दी का घणामानेता कवि बालकविजी बैरागी भी बिराज्या हे.बालकवि जी के २४ फ़रवरी का दन हिन्दी साहित्य समिति को तरफ़ से दूसरो श्रीनिवास जोशी सम्मान दियो जावेगा. पेला आकाशवाणी इन्दौर का नंदाजी श्री कृष्णकांत दुबे सम्मानित हुई चुक्या हे.<br /><strong></em><br /><br />नाक पे टूटो सो चाँदी को चस्मो हे<br />जीर्ण शीर्ण स्वेटर को बरस यो दसमो हे<br />स्वेटर की कटी जेब से बंडी भी मुसकाय हे<br />मटमैली धोती की चुप्पी भी मन के खाय हे<br /><br />हाथ में सुपारी को छोटो सो कटको हे<br />सरोता की गत में मीठो सो लटको हे<br />सामे की मिसल पे पान पड्यो हाँसे हे<br />डोकरा बेठा खूणा में खाँसे हे<br /><br />तमाकू ने लोंग को मुंडा में झगड़ो हे<br />अफ़सर का दोरा को भी रगड़ो हे<br />पतिव्रता पत्नी जेसी पीकदानी ऊबी हे<br />घर में वईं परबारज रसोई में डूबी हे<br /><br />फ़ीता-झंडा जरीब खूणा में सोया है<br />पटवारी गप्पा में आज खूब खोया हे<br />सारो गाँव योज के , पटवारी जी हे महान<br />पटवारी जी जेसी नीं यां कोई ग्यानवान हे<br /><br />गाव में जद बी होय खून ने लठ्ठमारी<br />खेत खळा में होवे लड़ई की तैयारी<br />बात बढे़ गाँव डरे होवे जद हठ भारी<br />एकदम सब चिल्लाय पटवारी..पटवारी<br /><br />पुलिस का ज अफ़सर जेसा,होवे ई सरकारी<br />खसरो लईने झड़ पोंचे मौका पे पटवारी<br />ऐसा हे पटवारी ऐसा हे इनका काम<br />इका सेज सब झुके ,सब करे सलाम<br /><br />मुँछ की मुँछ ने पटवारी जद हाँसे<br />बात की बात में आसामी वी फ़ाँसे<br />काळू होय...धोळू होय, नीं तो होय हरिराम<br />पटवारी की बात जादू को करे काम<br /><br />वाँ जाओ , वो लाओ सुणतेज सब दौड़े<br />अंटी से पेसा बी हाँ ने वी छोड़े<br />पटवारी इस्वर हे पटवारी हे दाता<br />नीं तो हम साँची काँ..कदी का मरी जाता<br /><br />ऊपर से मजो यो के माथा पे सब लईने<br />बड़ी बड़ी आँख्यां पे चस्मो जमई ने<br />धीरे से पटवारी बाताँ जद सुरू करे<br />सब मिली ने सुणनेवाळा केवे हरे-हरे<br /><br />अफ़सर हूण आवे हे, आड़ा दन या होळी पे<br />नाक में दम व्हे भई, प्राण टंग्या वे सूळी पे<br />खसरा हूण भरणा हे, जमाबंदी अई गी हे<br />क़लम घिसते घिसते नजर मंदे हुई गी हे<br /><br />जनम भर ए ग्रेड भत्ता को नाम नीं<br />रात-दन मरता रो पण पूरो होय काम नीं<br />फ़िरे बी अपणों जोर हे सदा काम करणे पर<br />सब फ़ल का दाता हे - परमात्मा...परमेश्वर<br /><br />सुण्यो भई अपणा ई हाकिम सब नवा हे<br />नवो यो जमानो हे ने ई नया धारा गवा हे<br />हम अपणाँ राजा हाँ यो अपणों राज हे<br />केसी अच्छी वात करे ई पटवारी महाराज हे.</strong><br /><br /><strong>मालवी का पूत दादा श्रीनिवासजी जोशी पे एक लेख संजय पटेल ने लिख्यो हे..आप याँ बाँची सको हो..www.joglikhisanjaypatelki.blogspot.com</strong>मालवी जाजमhttp://www.blogger.com/profile/10905821853128369906noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-432508839214365084.post-76425774197001755362007-08-18T03:23:00.000-07:002007-08-18T03:45:01.719-07:00सुमनजी ! वागाँ में पधारिया जाणे दुनिया में वास उड़ी<a href="http://bp1.blogger.com/_2kx6UhZMVZs/RsbMmZxYqCI/AAAAAAAAAAs/HLCG6kXodVQ/s1600-h/Shivmangal+Sinh+Suman-1.jpg"><img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://bp1.blogger.com/_2kx6UhZMVZs/RsbMmZxYqCI/AAAAAAAAAAs/HLCG6kXodVQ/s320/Shivmangal+Sinh+Suman-1.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5099988588168783906" /></a><br />दन नागपंचमी को ने तारीख हे आज १८ अगस्त.हिन्दी कविता का घणामानेता कवि डाँ शिवमंगलसिंहजी सुमन को जनम दन.सुमनजी उज्जेण आया ने आखा मालवी मनख वई गिया. नरहरि पटेलजी की मालवी गीत की किताब सिपरा के किनारे में एक गीत सुमन जी पे हे...आज बाँचां और इण मालवी आत्मा के याद कराँ...मुजरो पेश कराँ.<br /><strong><br />सुमनजी! वागाँ में पधारया जाणे दुनिया में वास उडी़<br /><br />नाम झगरपुर रोप लगायो,काची पाकी कलियाँ से लाड़ लड़ायो<br />सुमनजी ! पोथी में लिखाया,जाणे जिवड़ा में प्रीत जड़ी<br /><br />मनख प्रेम का ओ भंडारी,मणियाँ लुटाई खोल पिटारी<br />सुमनजी ! बोले मीठा बोल जाणे घी में मिसरी डली<br /><br />मालव धरती गेर गंभीरी, शिवमंगल की मन की नगरी<br />सुमनजी ! उज्जेणी में रम्या जाणे जोगीड़ा की जोग धुणी<br /><br />ओ रे सुमन तू गरूवर प्यारो, देस धरम को कवि मनखारो<br />सुमनजी ! गुण का पारस कर दे लोवा ने सोन कडी़.</strong><br /><br />इण चिट्ठा का साते जो फ़ोटू हे वो सन १९९४ को हे जिणमें सुमनजी पटेलजी के भेराजी सम्मान दई रिया हे.<br /><strong>लिखी:संजय पटेल</strong>मालवी जाजमhttp://www.blogger.com/profile/10905821853128369906noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-432508839214365084.post-52259326802214588062007-08-16T07:02:00.000-07:002007-08-16T07:18:56.728-07:00जिने देखी नी टूटी नाव कदी ऊ पार लगाणों कईं जाणे.<strong>नरेन्द्रसिंह तोमर</strong> मूल रूप से तो मालवी लोक गीत गायक हैं लेकिन एक सशक्त गीतकार के रूप में भी उनकी विशिष्ट पहचान है.आज़ादी के आंदोलन में उनके गीतों ने खू़ब धूम मचाई थी..कभी उन गीतों में से कुछ रचनाएं जारी करेंगे ..आज पढि़ये उनका एक लोकप्रिय गीत जो मालवी - हिन्दी काव्य मंचों पर बहुत सराहा जाता रहा है.<br /><br /><strong>जिके डुबकी लगाता नीं आवे,ऊ मोती लाणों कईं जाणे<br />जिने देखी नीं टूटी नाव कदी , ऊ पार लगाणों कईं जाणे</strong><br /><br />हे बायर(बाहर)ऊजळो बगळा सो, भीतर काजळ सरको काळो<br />कूदी कूदी ने भाषण दे, घर में पिये दारू को प्यालो<br />जिके अपणों नी हे खुद काँ,ऊ बाट(राह) बताणों कईं जाणे<br /><br />कुर्सी का मद मे चूर हुवो,बोले तो ऐठई ने बोले<br />कोई साँचा रोणा रोवे तो, मकना हाथी सरको डोले<br />जिको दिल नी समंदर सो गेरो(गहरा) ऊ राज चलाणों कईं जाणे<br /><br />सोना चाँदी की खट-पट में,जो हुइग्यो भैंसा को जाडो़ (मोटा)<br />फ़ूलीग्यो कोरी बादे में, खावे चूरण पीवे काढ़ो<br />मेहनत का पसीना में न्हायो नी, ऊ रोटी खाणों कईं जाणे<br /><br />अपणा घर में तो आग लगई,अने पर घर छाणे के दौड़े<br />सपणा देखे गेल्या सरका, अपणा हाथे किस्मत फ़ोडे़<br />जिके लाय लगाणों याद फ़कत,ऊ बाग ऊगाणों कईं जाणे<br /><br />जो बकतो रे 'हड़ताल करो ' 'यो पुल तोडो़ ' ' यो घर बाळो'(जलाओ)<br />अबे उकपे भरोसो कूण(कौन) करे जिकीं निकल्यो अकल को दीवाळो<br />जो फ़िरे हे उजाड्यो साँड बण्यो, ऊ खेत रखाणो कईं जाणे.<br /><br />जिने देखी नी टूटी नाव कदी..ऊ पार लगाणों कईं जाणे.<br /><br /><strong>नरेन्द्रसिंह तोमर</strong>मालवी जाजमhttp://www.blogger.com/profile/10905821853128369906noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-432508839214365084.post-7458094788230048152007-07-20T07:15:00.000-07:002007-07-20T08:08:07.309-07:00विक्रम विश्वविद्यालय में मालवी के लिये रचनात्मक पहल<a href="http://bp2.blogger.com/_2kx6UhZMVZs/RqDPnmnibnI/AAAAAAAAAAk/CVOSiZNzp6I/s1600-h/mahakaal+shikhar.jpg"><img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://bp2.blogger.com/_2kx6UhZMVZs/RqDPnmnibnI/AAAAAAAAAAk/CVOSiZNzp6I/s320/mahakaal+shikhar.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5089295858216889970" /></a><br /><em><strong>उज्जैन</strong> मालवा का स्पंदित नगर रहा है.महापर्व कुंभ की विराटता,शिप्रा का आसरा,भर्तहरि की भक्ति और महाकालेश्वर का वैभव इस पुरातन पुण्य नगरी को विशिष्ट बनाता है. मालवी के सिलसिले में बात करें तो पद्म-भूषण <strong>प.सूर्यनारायण व्यास</strong> के अनन्य प्रेम से ही पचास के दशक में मालवी कवि सम्मेलनों की शुरूआत उज्जैन से हुई.<strong>डाँ.शिवमंगल सिंह सुमन </strong>उज्जैन आकर क्या बसे जैसे पूरा मालवा मालामाल हो गया.विक्रम विश्वविद्यालय ने हमेशा विद्या दान के साथ मालवा और मालवी के प्रसार और विस्तार में महती भूमिका निभाई है. हाल ही में <strong>विक्रम विश्वविद्यालय</strong> के हिन्दी विभागाध्यक्ष और मालवीमना <strong>डाँ शैलेंद्रकुमार शर्मा</strong> ने अथक परिश्रम कर विश्वविद्यालम में मालवी के इतिहास और साहित्य पर अकादमिक कार्य के गहन गंभीर प्रयत्न किये है.मालवी जाजम के विशेष आग्रह पर डाँ . शर्मा ने विक्रम विश्वविद्यालय में किये जा रहे कार्यों का संक्षिप्त विवरण भेजा है .मालवी के विकास हेतु अकादमिक स्तर पर विक्रम विश्वविद्यालय के इस सह्र्दय पहल की मुक्त कंठ से प्रशंसा की जानी चाहिये.</em><br /><em></em><br /><em>संजय पटेल</em><br /><br /><em></em><br /><br /><br /><br /><strong><em><span style="color:#ff0000;"></span><span style="color:#cc0000;">मालवी लोक संस्कृति के संरक्षण-संवर्द्धन के लिए व्यापक प्रयासों की दरकार है। इस दिशा में हाल के दशकों में हुए प्रयासों की ओर संकेत दे रहा हूँ।</span></em></strong><br /><br /><br /><strong><br /></strong>विक्रम विश्वविद्यालयों से एक साथ कई शोध दिशाओं में मालवी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति को लेकर काम हुआ है और आज भी जारी है। मालवी भाषा और उसकी उपबोलियों - सोंधवाड़ी, रजवाड़ी, दशोरी, उमरवाड़ी आदि पर काम हुआ है। साथ ही निमाड़ी भीली और बरेली पर भी काम हुआ है और आज भी जारी है। मालवी भाषा और उसकी उपबोलियों-सोंधवाड़ी, रजवाड़ी, दशोरी, उमरवाड़ी आदि पर काम हुआ है। साथ ही निमाड़ी, भीली और बरेली पर भी काम हुआ है। जहॉं तक मालवी साहित्य की बात है आधुनिक <strong>मालवी कविता के शीर्षस्थ हस्ताक्षरों</strong> यथा - आनंदराव दुबे, नरेन्द्रसिंह तोमर, मदनमोहन व्यास, नरहरि पटेल, हरीश निगम, सुल्तान मामा, बालकवि बैरागी, डॉ. शिव चौरसिया, चन्द्रशेखर दुबे आदि पर काम हो चुका है। और भी कई हस्ताक्षरों पर काम जारी है, इनमें मोहन सोनी, श्रीनिवास जोशी, जगन्नाथ विश्व, झलक निगम आदि शामिल है।<br /><br /><br /><br />मालवी संस्कृति के विविध पक्ष यथा - व्रत, पूर्व, उत्सव के गीत, लोकदेवता साहित्य,श्रंगारिका लोक गीत, हीड़ <strong>काव्य, माच परम्परा, संझा पर्व, चित्रावण, मांडणा</strong> आदि पर कार्य हो चुका हे। मालवी की विरद बखाण, गाथा साहित्य, लोकोक्ति आदि पर भी कार्य सम्पन्न हो गया है।<br /><br /><br />हिन्दी अध्ययनशाला, विक्रम विश्वविद्यालय में <strong>विश्वभाषा हिंदी संग्रहालय एवं अभिलेखन केन्द्र</strong> की शुरुआत हुई है। इसमें <strong>मालवी लोक संस्कृति</strong> को लेकर विशेष कार्य चल रहा है। इस हेतु मालवी संस्कृति के समेकित रूपांकन एवं अभिलेखन की दिशा में प्रयास जारी है। यहॉं मालवी के शीर्ष रचनाकारों के परिचयात्मक विवरण, कविता एवं चित्रों की दीर्घा संजोयी जा रही है। चित्रावण, सॉंझी, मांडणा सहित मालवा क्षेत्र के कलारूपों को भी इस संग्रहालय में संजोया जाएगा। मालवी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति के विविध पक्षों से सम्बद्ध साहित्य, लेख एवं सूचनाओं का <strong>दस्तावेजीकरण</strong> भी इस केन्द्र में किया जा रहा है। इस केन्द्र में निमाड़ी, भीली, बरेली, सहरिया जैसी बोलियों के अभिलेखन की दिशा में कार्य जारी है।<br /><br />मध्यप्रदेश आदिवासी लोक कला अकादमी ने हाल के बरसों में मालवी-निमाड़ी-भीली-बरेली पर एकाग्र महत्वपूर्ण पुस्तके, मोनोग्राफ़ आदि प्रकाशित किए हैं, साथ ही <strong>"चौमासा'</strong> पत्रिका में भी महत्वपूर्ण सामग्री संजोई जा रही है।<br /><br />हाल में म.प्र. के विश्वविद्यालय पाठ्यक्रम में स्नातक स्तर पर हिन्दी साहित्य के विद्यार्थियों के लिए एक प्रश्न पत्र मालवी का निर्धारित किया गया है। इसमें मालवी के प्रतिनिधि कवियों की रचनाएँ पढ़ाई जा रही हैं।विक्रम विश्वविद्यालय में एम.ए. (हिन्दी) के पाठ्यक्रम में <strong>मालवी साहित्य का एक प्रश्नपत्र</strong> लगाया गया है। ऐसा ही एक प्रश्न पत्र "जनपदीय भाषा मालवी के लोक साहित्य' पर चल रहा है।<br /><br /><strong>विश्वविद्यालय मालवी के उन्न्यन के लिये कृत-संकल्पित है और इस दिशा में रचनात्मक सुझावों का स्वागत करेगा.</strong><br /><br /><br />इन सारे प्रयत्नॊं के साथ <strong>ब्लाँग</strong> के रूप में <strong>मालवी जाजम</strong> के अवतरण को एक महत्वपूर्ण पहल के रूप में देखा जाना चाहिये.इंटरनेट के अभ्युदय के बाद मालवी जाजम की शुरूआत रेखांकित करने योग्य घटना है.<br /><br /><br /><em>इन सब प्रयत्नों के बावजूद नई पीढ़ी को मालवी की ओर लाने के गंभीर प्रयत्न होने चाहिये और इसके लिये दर-असल <strong>मालवी परिवारों को ही बच्चों के साथ बतियाने</strong> में गौरव अनुभव करना होगा.<strong>बोलांगा तो बचेगी मालवी.</strong></em>मालवी जाजमhttp://www.blogger.com/profile/10905821853128369906noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-432508839214365084.post-31742832182272403422007-07-17T07:41:00.000-07:002007-07-17T08:07:57.765-07:00याँ सेर में सब देखा देखी का चोचला हे<strong><span style="font-size:180%;color:#ff0000;">चतरलाल की चिट्ठी</span></strong><br /><br /><br />भई कचरा जी, राम राम।अठे सब मजा में है।<br />अपरंच समाचार यो है कि मालवा में पाणी खूब बरस्यो<br />ओर <strong>दादा</strong> <strong>आनंदरावजी दुबे</strong> की कविता याद अई गई...<br /><br /><strong><em>बस बसंत्या बरसात अई गई रे।</em></strong><br /><strong><em>जीवी ने जस जाण जे जसंत्या, </em></strong><br /><strong><em>जिंदगी जई री थीपण अब हाथ अई गई रे,</em></strong><br /><strong><em>बस बसंत्या बरसात अई गई रे।</em></strong><br /><strong><em></em></strong><br /><strong><em>बेन विचारी बसंती- भई की बाट जोई री थी।</em></strong><br /><strong><em>राखी की रीत सारू, पीयर को मूँडो धोई री थी।</em></strong><br /><strong><em>लाख राखी को तेव्हार थो, पण बीर बेबस थो।</em></strong><br /><strong><em>अरे बोदा बरस की पीर थी, यो कां को अपजस थो। </em></strong><br /><strong><em>सांची, सावण सुवावणो होतो, </em></strong><br /><strong><em>बसंती गीत फिर गाती।</em></strong><br /><strong><em>राखी, कंदोरा और पोंची, </em></strong><br /><strong><em>संग पतासा और पेड़ा मन भर लाती।</em></strong><br /><strong><em>तो बसंती रंग को लुगड़ो, घागरो घेरा को पाती।</em></strong><br /><strong><em>अने पेरती ससराल जई जई रे, </em></strong><br /><strong><em>ने केती बस बसंत्या बरसात अई गई रे...</em></strong><br /><strong><em></em></strong><br /><strong><em></em></strong><br />मन-मयूर खूब नाची रियो हे। तीज-तेवार पास अइग्या हे । कचरा भई; ई तीज-तेवार आवे तो म्हने गॉंव की खूब याद आवे। सावण में कसी रंगत रेती थी। झूला बंधता था। हाथ-पग ओर हिरदे; सब आला रेता था। यॉं सेर में तो सब देखा-देखी का चोचला है। "भई-बेन' को प्रेम भी अब टी.वी. सीरियल जैसो बनावटी हुई ग्यो हे। घर की दाल-बाटी, चूरमो, खिचड़ी-कढ़ी परोस दो तो छोरा-छोरी नाक टेड़ी करे। "पित्जा-बर्गर' में इनकी जिबान खूब लपलपाय। म्हे देखी रियो थो कि पाछला बरस जद राखी बंधी री थी तो घर का दाना-बूढ़ा-सियाणा तो छाना-माना बेठ्या था पण छोरा- छोरी असी धमाल मचई रिया था कि कई कूँ। कोई दड़ी से खेली रियो हे, कोई टी.वी. का सामे बेठ्यो हे तो कोई कम्प्यूटर में इंटरनेट में काड़ी करी रियो हे। धॉं-धूँ मची हे साब ! असो लगी रियो हे जैसे कि आप मेला-ठेला में अई ग्या हो। म्हारो मन रोई दियो थो कि इ छोरा-छोरी कॉं जाएगा। पण केवा से ने रोवा से कई वे। जो संस्कार ने तामझाम हमारा जमाना ने टाबरा-टाबरी के दिया उकी पावती तो मिलेगा साब ! जरूर मिलेगा। पेले दाना-मोटा लोग बेठा वेता तो छोरा-छोरी चूँ नीं करता था। तकलीफ जद वे कि छोरा-छोरी की धमाल देखी के उनका "मम्मी-पप्पा' दॉंत काडे ने, खुस वे। संस्कार धूल-धाणी वई रिया है ओर आप खुस वई रिया हो। जमानो आगे जावे; किने बुरो लागे ! पण अपणा घर की रिवायत नी भूलणी चइजे। टेम असो हे कि पुराना को मान करो और नया को भी स्वागत करो। याज बखत की दरकार है। कसमसाता मन से या "टपाल' भेजी रियो हूँ। कुड़ा में पाणी अई ग्यो वेगा; तलाब में खूब पाणी भरायो वेगा। ओर म्हारा नाला रोड का कई हाल हे, मजे मे है कि नी ? सावन मास,राखी,श्रीकृष्ण जन्माष्टमी नजीक अई री है... भेरू बा,जड़ावचंद,बसंतीलाल,रामा तेली,झब्बालाल,माँगू तेली,बद्रीजी कसेरा,हरिरामजी डाक साब सबके म्हारो जै गोपाल बॅंचावसी।<br /><br /><strong>आपको भई चतरलाल</strong><br /><strong><em>बक़लम : संजय पटेल</em></strong>मालवी जाजमhttp://www.blogger.com/profile/10905821853128369906noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-432508839214365084.post-9788989113314688412007-07-13T20:57:00.000-07:002007-07-13T21:27:17.473-07:00कवि मोहन सोनी को गीत<em>दादा <strong>मोहन सोनी</strong> उज्जैन में रे हे और मालवी की सेवा करे हे.देस का म्होटा म्होटा मंच पे वणा की चुटकीली कविता/गीत पसंद कर्या जाए हे.चोमासा की बेला में यो गीत आपका मन के स्पर्श करेगा.मालवी की बढोत्तरी का वास्ते यो जरूरी हे की इमें खालिस मालवी शब्द का साथ हम दीगर बोली और भाषा को स्वागत भी कराँ.जेसो सोनीजी इण गीत का आखरी बंद में कर्यो हे..."म्हारा फ़ोटू पे हाथ धर्यो होगा" अब आप महसूस करोगा कि फ़ोटू अंग्रेज़ी को शब्द हुई के भी याँ नी खटकी रियो हे. तो आज मालवी जाजम पे आप मोहन सोनी जी की की पेली पाती.</em><br /><br /><br /><span style="color:#993399;"><strong>रई रई के म्हारे हिचक्याँ अ इरी हे</strong><br /><strong>लजवन्ती तू ने याद कर्यो होगा</strong><br /><br /><strong>थारे बिन मोसम निरबंसी लागे</strong><br /><strong>तू हो तो सूरज उगनो त्यागे</strong><br /><strong>म्हारी आँख्यां भी राती वईरी हे</strong><br /><strong>तू ने उनमें परभात भरयो होगा</strong><br /><strong></strong><br /><strong>सुन लोकगीत का पनघट की राणी</strong><br /><strong>थारे बिन सूके (सूखना) पनघट को पाणी</strong><br /><strong>फिर हवा,नीर यो काँ से लईरी हे</strong><br /><strong>आख्याँ से आखी रात झरयो होगा</strong><br /><strong></strong><br /><strong>बदली सी थारी याद जदे भी छई</strong><br /><strong>बगिया की सगळी कली कली मुसकई</strong><br /><strong>मेंहदी की सोरभ मन के भईरी हे</strong><br /><strong>म्हारा फोटू पे हाथ धर्यो होगा.</strong><br /><strong></strong><br /><strong>रई रई के म्हारे हचक्याँ अईरी हे</strong><br /><strong>लजवंती तू ने याद कर्यो होगा</strong></span>मालवी जाजमhttp://www.blogger.com/profile/10905821853128369906noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-432508839214365084.post-25030048360630813682007-07-06T07:54:00.000-07:002007-07-06T08:22:28.562-07:00जाजम पे नवा पामणा..विवेक चौरसिया<em><strong><span style="color:#990000;">विवेक चौरसिया नौजवान खबरची हे.दैनिक भास्कर,रतलाम में काम करे हे.वरिष्ठ मालवी कवि दादा शिव चौरसिया का बेटा हे ; पेला-पेल मालवी जाजम पे आया हे अपणी उज्जैन की मीठी मालवी लई के.बाँचो आप उणकी चार कविता.</span></strong></em><br /><br /><em></em><br /><br /><em><strong><span style="font-size:130%;color:#ff0000;">१)</span></strong></em><br /><br /><em><strong></strong></em><br /><br /><em><strong>नीरी री...नीरी री</strong></em><br /><br /><em><strong>घर में आटो पीसी री</strong></em><br /><br /><em><strong>नानो खाए रोटी बाटी</strong></em><br /><br /><em><strong>सककर की तो तीन-तीन आँटी</strong></em><br /><br /><em><strong>नीरी री...नीरी री</strong></em><br /><br /><em><strong></strong></em><br /><br /><em><strong></strong></em><br /><br /><em><strong>नानो पेने</strong> (पहने)<strong> झबला धोती</strong></em><br /><br /><em><strong>हाथ में कंगन गला में मोती</strong></em><br /><br /><em><strong>नीरी री नीरी री</strong></em><br /><br /><em></em><br /><br /><em><strong><span style="font-size:130%;color:#ff0000;">२)</span></strong></em><br /><br /><em><strong></strong></em><br /><br /><em><strong>सोना की गाडी़ पे</strong></em><br /><br /><strong><em>नानो घूमे </em></strong><br /><br /><strong><em>साथी-संगी,नाचे झूमे</em></strong><br /><br /><strong><em>नाना के माथा पे लाल टोपी</em></strong><br /><br /><strong><em>माँ बई माथो चूमे</em></strong><br /><br /><em><strong>नाना का सारू</strong> (के लिये)</em><br /><br /><em><strong>नरा</strong> (बहुत से)<strong> खिलोना</strong></em><br /><br /><strong><em>साथी - संगी झूमे</em></strong><br /><br /><strong><em></em></strong><br /><br /><strong><em><span style="font-size:130%;color:#ff0000;">३)</span></em></strong><br /><br /><strong><em></em></strong><br /><br /><strong><em>बरबंड छोरो गरजे गाजे</em></strong><br /><br /><strong><em>चिड़ी बई आजे,</em></strong><br /><br /><strong><em>रेलकड़ी लाजे</em></strong><br /><br /><strong><em>मै तो लगऊं नी कालो टीको</em></strong><br /><br /><strong><em>हाथ से मसले मुंडो लाजे</em></strong><br /><br /><strong><em>मै तो खिलऊ नी मीठो सीरो</em></strong><br /><br /><strong><em>सूखा रोटा खाजे</em></strong><br /><br /><strong><em></em></strong><br /><br /><strong><em><span style="font-size:130%;color:#ff0000;">४)</span></em></strong><br /><br /><strong><em></em></strong><br /><br /><strong><em>वारे वारे भई, </em></strong><br /><br /><strong><em>अब कराँ कई</em></strong><br /><br /><strong><em>अँई जाय कि वँई</em></strong><br /><br /><strong><em>वारे वारे भई</em></strong><br /><br /><strong><em>अब कराँ कई</em></strong><br /><br /><strong><em></em></strong><br /><br /><strong><em>अपणी तो पतंग फ़टी गई</em></strong><br /><br /><strong><em>काँ से लाए लई</em></strong><br /><br /><strong><em>अब कराँ कई</em></strong><br /><br /><strong><em></em></strong><br /><br /><strong><em>अपणो तो दूध फ़टी गयो</em></strong><br /><br /><strong><em>केसे खावाँ मलई</em></strong><br /><br /><strong><em>वारे वारे भई</em></strong><br /><br /><strong><em>अब कराँ कई</em></strong><br /><br /><strong><em></em></strong><br /><br /><strong><span style="color:#003300;"><em>भई विवेक की या कविता हे छोटी छोटी पण इनमें गेरा अर्थ हे.आपके अच्छी लगी वे तो आप विवेक भई से चलती-फ़िरती मसीन पे ९८२६२-४४५०० पे बात करी सको हो..उणको ईमेल भी लिखी लो:</em> </span></strong><a href="mailto:v_chaurasiya@mp.bhaskarnet.com"><span style="font-family:courier new;color:#003300;"><strong>v_chaurasiya@mp.bhaskarnet.com</strong></span></a><br /><br /><strong><em></em></strong>मालवी जाजमhttp://www.blogger.com/profile/10905821853128369906noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-432508839214365084.post-40089199716398219812007-07-06T07:31:00.000-07:002007-07-12T12:24:38.271-07:00दादा बैरागीजी पाछा वेगा आजो<a href="http://bp2.blogger.com/_2kx6UhZMVZs/RpZ_6GniblI/AAAAAAAAAAU/8SmrlKEJ84w/s1600-h/balkrishna+bairagi.jpg"><img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5086393465347141202" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" src="http://bp2.blogger.com/_2kx6UhZMVZs/RpZ_6GniblI/AAAAAAAAAAU/8SmrlKEJ84w/s320/balkrishna+bairagi.jpg" border="0" /></a><br /><div>खबर पक्की हे ने खुसी की भी हे.मालवी का घणा-मानेता कवि <strong>दादा बालकवि बैरागी</strong> विश्व-हिन्दी सम्मेलन में भाग लेवा वास्त <strong>अमेरिका</strong> जई रिया हे.हिन्दी का पेला बैरागी जी पे मालवी को हक़ हे.म्हाको योज केणो हे के दादा पधारो आप राजी खुसी..और माँ भारती की धजा ऊँची करजो,और वठे कोई मालवी प्रेमी मिले तो वींके आखा मालवा को राम राम कीजो.और हाँ कोई <strong>पणियारी </strong>मिले तो वीने भी म्हाको मुजरो अरज करजो.पाछा वेगा आजो दा.साब.(खबर विनय उपाध्याय का हस्ते नईदुनिया में छपी हे)</div>मालवी जाजमhttp://www.blogger.com/profile/10905821853128369906noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-432508839214365084.post-89638277187916377202007-07-05T05:45:00.000-07:002007-07-05T11:02:41.780-07:00मालवी के विस्तार के लियेमालवी बोली सरल एवं कर्णप्रिय तो है ही, इसकी मिठास भी लाजवाब है। मालवा में शुरू से मालवी ही बोली जाती है। परंतु जैसे-जैसे अँगरेज़ी घरों में घुसपैठ करती जा रही है, वैसे-वैसे नई पीढ़ी इसे पिछड़ेपन का प्रतीक मानने लगी है। नईदुनिया ने मालवी को (थोड़ी-घणी) स्थान देकर सराहनीय कदम तो उठाया ही है, साथ ही अख़बार को लोकप्रियता भी मिली है। थोड़ी-घणी के बिना शनिवार के पृष्ठ अधूरे एवं बेमज़ा लगने लगते हैं। ऐसे ही आकाशवाणी इन्दौर ने भी वर्षों से मालवी कार्यक्रमों का प्रसारण कर इसके प्रचार-प्रसार में वृद्धि ही की है। नंदाजी-भेराजी के माध्यम से चर्चित कार्यक्रम बहुत लोकप्रिय रहे हैं। आज भी कृषि, श्रमिक जगत कार्यक्रम एवं ग्रामलक्ष्मी कार्यक्रमों से इसे अच्छा स्थान मिल रहा है। समय-समय पर मालवी में काव्यपाठ आदि ने मालवी के प्रति आत्मीयता ही बढ़ाई है। अगर ऐसे कार्यक्रमों की वृद्धि होती रही तो नई प्रतिभाओं को उभरने का मौका तो मिलेगा ही, नई पीढ़ी में भी इसका रुझान बढ़ेगा। इसके विस्तार एवं प्रवाह में कुछ सुझाव और भी प्रभावशाली हो सकते हैं। साहित्य संस्थाओं एवं अन्य सृजनात्मक संस्थाओं द्वारा वर्ष में एक-दो बार मालवी रचनाओं की पुस्तक प्रकाशित की जा सकती है जिससे युवा पाठक एवं प्रतिभाओं में इसके प्रति फिर लगाव पैदा हो सके। नए एवं वरिष्ठ रचनाकारों के दो वर्ग बनाकर पुस्तक प्रकाशित हो सकती है तथा उनकी अच्छी रचनाओं को पुरस्कृत कर मालवी साहित्य की सेवा की जा सकती है। ज़िला एवं नगरीय स्तर पर वर्ष में एक-दो कवि सम्मेलन, जो पूर्णतः मालवी में ही हो, आयोजित किए जा सकते हैं ताकि जन-जन में मालवी बोली की सौंधी-सौंधी ख़ुशबू फैल सके। अन्य बोलियों की तरह इसमें भी समाचार पत्र निकाले जा सकते हैं।<br /><strong>-विभा जैन "विरहन'</strong><br /><strong>८५, त्रिमूर्ति नगर, धार</strong><br /><strong><span style="color:#ff0000;"><em>नईदुनिया २६ जून २००७ में प्रकाशित</em></span></strong>मालवी जाजमhttp://www.blogger.com/profile/10905821853128369906noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-432508839214365084.post-39349525412091973022007-06-22T06:29:00.000-07:002007-06-22T07:11:04.438-07:00चार लाईन में रिस्ता की बात<em>मालवी जाजम पे आज मालवी में लिखी कविता पेश हे.रिश्ता की गंध अपणी बोली ज्यादा मीठी वई जाए हे.<br />म्हारो यो भी प्रयास हे कि इण चिट्ठा पे गीत,कविता,गजल,हाईकू,दोहा,मुक्तक सबका सब नमूदार वे.म्हारो यो भी केणो हे कि बोली को मानकीकरण मुश्किल काम हे. बोली को आँचल खूब बडो़ हे ने वीमे जतरी बी दीगर बोली-भाषा आवे ...बोली के बरकत वदे(बढे़)हे.तो आज आप बांचो म्हारी चार लाईन की चार कविता इणमें रिस्ता का नरा (बहुत से) रंग आपके मिलेगा.</em><br /><br /><strong>माँ</strong><br /><br />आज भी थपके हे म्हारी नींदा ने थारी लोरी<br />म्हने याद हे ममता की थारी झीणी झोरी<br />फाटा पल्ला में ढाँकी ने अपणी भूख तरस<br />माँ कस्तर उछेरया वेगा थें चाँद-सूरज<br /><br />टीप:<br />झीणी:पतली<br />कस्तर:किस तरह<br />उछेरया:बडे़ किये होंगे<br /><br /><strong>ममता:</strong><br /><br />म्हारा हिरदां में लाग्यो दूध थारो सिंदूरी<br />पेली बरखा की जाणे वास वसी कस्तूरी<br />तू तो देतीज रिजे माँ म्हारी जामण-गंगा<br />म्हारा माथा पे थारी ममता को ठंडो छांटो<br /><br />टीप:<br />वास:गंध<br />वसी:वैसी<br />देतीज:देते ही रहना<br /><br /><br /><strong>दादी</strong><br /><br />सुमरणी हाथ में,आँख्यां में भरया सोरमघट<br />चुगाती चरकला दादी दया की भण्डारण <br />अबोली बावडी़ उंडी,वरद की पोटली जूनी<br />खुणा में सादडी़ सुखी पडी हे आपणीं दादी<br /><br />टीप:<br />सुमरणी:राम नाम की माला<br />चुगाती चरकला:चिड़ियों को दाना खिलाते<br />उंडी:गहरी<br />खुणा:कोने में<br />सादड़ी:चटाई<br /><br /><strong><br />हीरा-मोती</strong><br /><br />घेर गुम्मेर कसी छाँव हे अपणा घर की<br />पूजा हे देवता हे या बड़ा मंदर की<br />अणमोल्या रतन झडे़ कसा ई दादी का<br />दूधो न्हावो पूतो फ़लो म्हारा वाला<br /><br />टीप:<br />घेर-गुम्मेर:गहरा-घनामालवी जाजमhttp://www.blogger.com/profile/10905821853128369906noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-432508839214365084.post-12573954432211116232007-06-19T11:46:00.000-07:002007-06-19T12:43:07.740-07:00मालवी लोक-नाट्य....माच..गणपति गजलमालवी जाजम पे आज पधारिया हे <strong>मालवी माच</strong> का मान...दादा <strong>सिध्देश्वरजी सेन</strong>.भोला,सरल ओर प्रतिभा का धनी सेनजी नया जमाना का माच का पुरोधा.गाँव-गाँव, गली-गली जईके सेनजी ने मालवी माच मो मान बढायो.जिन्दगी भर अभाव में रिया पर माच को दामन नीं छोड्यो.आकाशवाणी,सूचना विभाग ने (और)पंचायत का तेडा़ (निमंत्रण) पे सेन जी आखा(पूरे) मालवा,निमाड़,राजस्थान,गुजरात में घूम्या और माच को रंग जमायो.माच बडी़ लाजवाब विधा हे.ईंके आप संगीत और नाटक को सामेलो (मेल) कई सको हो.ढो़ल और हारमोनियम पे बारता ( कहाने) केता-केता एक रूपक साकार हुई जाए.कला का पेला देव गणपति जी म्हाराज गजल गई के माच की सुरूआत वे हे.सिध्देश्वर जी सेन उज्जैन में रेता था. जद तक वी रिया ..माच को काम और नाम खूब बढ़यो.सेनजी ने माच की सेवा वेसे ज की जस तर <strong>हबीब तनवीर</strong> साब ये छत्तीसगढ़ का <strong>नाचा </strong>की की हे.सिध्देश्वर जी के <strong>संगीत नाटक अकादमी </strong>को मोटो (प्रतिष्ठित)मान बी (भी) मिल्यो.लोग के कि ग़ज़ल उर्दू में ज (ही) लिखी जाए..पण आपके अचरज वेगा की माच में बी गजल (मालवी में गजल लिखनो अच्छो लगे हे..ईंका से ग़ज़ल नीं लिखी रियो हूं).माच का बारा में आपके आगे बी ओर जानकारी दांगा (देंगे) . आपके या बतई के भोत खुसी वई री हे कि दादा सेनजी का बेटा प्रेमकुमार सेन भी माच ओर मालवी लोक संगीत की सेवा में लग्या हे..उज्जैन में रे हे (रहते हैं)प्रेम भई को <strong>कानगुवालिया</strong> गीत के खूब पंसद कियो जाए हे..उमें लिख्या हुआ दोहा में नरी (बहुत सी) गम्मत ओर ठिठोली वे हे ओर सबक़ बी .ढोलक ओर खड़्ताल बजात कानगुवालिया <br />ढांढा-ढोर( मवेशी) की चरवई का वास्ते राजस्थान से मालवा में आवे ने के(कहते हैं)...<br /><br />आलखी की पालकी...जय कन्हैया लाल की<br />गोवर्धन गोपाल की ..श्री नन्द्लाल की<br />धीरे आन दे री जरा धीरे आन दे<br />धीरे आन दे री जरा धीरे आन दे<br /><br />पन्नालाल जी पापड़ बेले<br />धनालाल जी धनियो<br />बद्रीलाल जी बाटो (मविशियों का आहार) बेचे<br />घ्रर में पड्ग्यो घाटो<br /><br />बजार(बाज़ार) का माय(बीच)म्हारो छोरो अडी़ गयो<br />जलेबी देखी के यो तो आडो़ पडी़ गयो<br />कानगुवालिया की खासियत या हे कि आप सम-सामयिक प्रसंग पे बी दोहा कई सको हे ..एक उदाहरण देखो..<br /><br />राष्ट्रपति का पद पे देखो परमिला जीजी आई<br />सोनियाजी का गीत पे केसी बंसी हे बजाई<br /><br />ईन कुर्सी पे आज तलक तो आदमी हे बेठ्या<br />पेली बार बिराजेगा ईण पर देस की लुगाई<br /><br />तो जींकी अपण हिन्दी में स्फ़ूर्त विचार कां हां वा बात कानगुवालिया में रेती थी.<br /><br />तो या तो थी कानगुवालिया की बात..आपके यो बी बतई दां कि सेनजी की बेटी <strong>कृष्णा वर्मा</strong> देस की जाना-मानी कलाकार हे और मालवा का <strong>मांडणा </strong>बणावा में कृष्णा जी एक म्होटो नाम हे.उनके बी नरा(बहुत से) इनाम मिल्या हे.<br />अपण बात सुरू करी थी दादा सिध्देश्वर जी सेन से. तो उनके आज मालवी जाजम की श्रध्दांजली देता हुआ अपण मालवी माच मे <strong>गणपति वंदना </strong>की एक<strong> गजल</strong> बांची लां हां.<br /><br />गजानन्द गणराज आज, म्हारी अरज सुणी ने आजो<br />रिध्दि-सिध्दि दोई पटराणी, के सांते(साथ)तम लाजो<br /><br />मूसक ऊपर करो सवारी,दरसन बेग(जल्दी) दिखाओ<br />कंचन थाल धरां मुख आगे,मोदक भोग लगाजो<br /><br />साय करो मंडली का ऊपर,बिगड़ी बात बणाजो<br />बीगन(विघ्न)हरो आनन्द करो,हिरदां(ह्रदय)में आय बिराजो<br /><br /><br />पेलां(पहले) पूजा करां आपकी,अइने(आकर) रंग जमाओ<br />सिध्देश्वर हे सरन-चरन में गणपति लाज बचाओ.<br /><br />देख्यो आपने कित्तो सरल खयाल हे आदिदेव गणपति के मनावा को.अब तो दादा सिध्देश्वर जी रामजी का यां जई बस्या हे<br />पण मालवी माच की बिछात पे उनको नाम आज बी सरदा(श्रध्दा) का साते लियो जई रियो हे.मालवी जाजम पे आज माच का रंग की सुरूआत हे ..गजानन जी पधारी गया हे..देखो आगे आगे कई वे हे...तो फ़ेरे मिलां..राम..राम.मालवी जाजमhttp://www.blogger.com/profile/10905821853128369906noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-432508839214365084.post-2750203274641781442007-06-15T08:22:00.000-07:002007-06-15T08:26:05.074-07:00मालवी का प्रथम कवि दादा दुबेजी जाजम पेमालवी कविता का दादा बा आनन्दरावजी दुबे की मुहावरादार मालवी को कई केणो ?<br />पचास का दशक में शिप्रा का घाट पे पेलो कवि-सम्मेलन व्यो थो तब मालवी को कोई एसो आयोजन नीं व्यो जीमे<br />आनन्दराव दादा की धारदार मालवी को रंग नीं बिखरयो ।रामाजी रई ग्या ने रेल जाती री दादा की अमर रचना हे।अणी मालवी जाजम पे दादा की वा हस्ताक्षर रचना जल्दी ज बांचोगा आप।दुबेजी की कविता जाणें जुवार बाजरा की फ़सल की तरे धरती से उपजी।दादा दुबेजी सन १९९६ में हमारा बीच से चल्या ग्या।उनकी मीठी मालवी की चमक आज भी बरकरार हे,,,,,,एक बानगी देखो आप<br /><br /><em><strong>सुण बेटा, म्हारे याद अ इ ग्यो एक केवाड़ो<br />घर बांदो तो राखजो बाडो़<br />खेती करो तो लीजो गाड़ो<br />बेटा, जीका घर मे नीं हे बूढो़-आडो़ <br />उना घर को पूरो हे फ़जीतवाडो़<br />बात छोटी सी हे पण कितरी तीखी और चोखी हे । </strong></em><br /><br />आज दादा दुबेजी के याद करता अपण उनकी चर्चित रचना वांचां।<br /><br /><br /><strong>छोटा मूंडे बड़ी बात हूं बोलीरयो हूं</strong><br /><br />जाजम पर एक साथ बठी ने<br />तन नी देख्या मन परख्या हे<br />इनी परख में कोई रूठ्या ने , कोई हरख्या हे<br />घडी़-घडी़ का हेल - मेल से <br />पास-पडोसी मनख मनख की <br />छिपी जात हूं खोलीरयो हूं<br />छोटा मूंडे बड़ी बात हूं बोलीरयो हूं<br /><br />कुण अईरयो यो तण्या हुवो रे<br />बीस किताब यो भण्यो हुवो रे<br />देखो अपणी अक्कल से यो<br />सांच-झूठ से खरी खोट से<br />हांसी ने यो फ़ांसीरयो हे<br />सुन्ना से यौ तुली गयो <br />चांदी का पलडें यो मोटो हे<br />छोटा मूंडे बड़ी बात हूं बोलीरयो हूं<br /><br />सांची सांची खरी पोबात यो नी खोटो हे<br />कुण गरीब ने कुण अमीर हे<br />यो फ़सड्डी ऊ मीर हे<br />खूब बणायो थर्मामीटर<br />पूंजी को पारो सरके हे<br />कोण किखे कितरो बुखार हे<br />प्रीत प्यार सभी निगाह से <br />देखी परखी तोलीरयो हूं<br />छोटा मूंडे बड़ी बात हूं बोलीरयो हूं<br /><br />एक दुबलो ने एक तगडो़ हे<br />देखो-देखो यो झगडो़ हे <br />कि डालर सब खे डांटीरयो हे<br />धीरज कोई खे बांटीरयो हे<br />घाव पुराणा धूजीरयो हे<br />लोवा साँते रूई बळे हे<br />वले चाक पण धुरी गळेबड हे<br />धीर गंभीरो तरूवर पीपल<br />छिपई गोयरा साथ बळे हे<br />दुनिया जाय उजाला में<br />मुश्यालची ठोकर मत खई जाजो<br />जाणो लंबी दूर चलनो हे दिन रात<br />रात कँईं याँ मत रई जाजो<br />बडी़ बात पर छोटो मूंडो <br />सुख साठे दुःख मोलीरयो हूं<br />छोटा मुंडे बडी़ बात हूं बोलीरयो हूं<br /><br /><strong>टीपः</strong><br />सुन्नाःस्वर्ण<br />डाटीरयोःडांट रहा है<br />लोवाः लोहा<br />छिपइःछिपकली<br />डालरःअमेरिकी मुद्रामालवी जाजमhttp://www.blogger.com/profile/10905821853128369906noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-432508839214365084.post-18785006205776498972007-06-11T09:30:00.000-07:002007-06-11T11:17:02.835-07:00मानसून के पहले ..ये मनभावन मेवला गीत<object height="350" width="425"><param name="movie" value="http://www.youtube.com/v/9ggVZfPmeA0"><param name="wmode" value="transparent"><embed src="http://www.youtube.com/v/9ggVZfPmeA0" type="application/x-shockwave-flash" wmode="transparent" width="425" height="350"></embed></object><br />मालवा पर प्रकृति की सदा मेहर रही है.कुदरत की सौजन्यता से ही मालवा <strong><span style="color:#009900;">'पग पग रोटी,डग डग नीर'</span></strong> से सम्पन्न बना है.,मालवा के लोक-गायकों ने सदैव से अलमस्त प्रकृति से स्वार्थ की जगह जन-मन के शुभ-भावों को उजागर करने का आग्रह किया है.मालवा मे चौमासे को बड़ा आदर दिया गया है.समीसांझ के मेवला को आदरणीय पावणा (मेहमान) माना गया है और उसे मालव की सुहानी रात में विश्राम का खुला न्योता प्राप्त हुआ है.<strong>अब मनभावन मालवा मनुष्य की बेपरवाही से बंजर होने की कगार पर है.</strong> पग-पग रोटी देने वाला मालवा अब कहीं अतीत में खोता जा रहा है. कुंओं से उलीचता जल अब आंखों का नीर बन कर झरने को मजबूर है.भावन