<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss'><id>tag:blogger.com,1999:blog-4103886293770258948</id><updated>2009-12-25T10:16:30.110-05:00</updated><title type='text'>शब्दसृजन</title><subtitle type='html'>साहित्य-संस्कृति विमर्श की वेब पत्रिका</subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://shabdsrijan.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4103886293770258948/posts/default'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://shabdsrijan.blogspot.com/'/><link rel='hub' href='http://pubsubhubbub.appspot.com/'/><link rel='next' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4103886293770258948/posts/default?start-index=26&amp;max-results=25'/><author><name>योगेंद्र कृष्णा   Yogendra Krishna</name><uri>http://www.blogger.com/profile/17366269677319716325</uri><email>yogendrakrishna@yahoo.com</email></author><generator version='7.00' uri='http://www.blogger.com'>Blogger</generator><openSearch:totalResults>57</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>25</openSearch:itemsPerPage><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4103886293770258948.post-2971616166115592489</id><published>2009-12-25T10:06:00.001-05:00</published><updated>2009-12-25T10:16:30.249-05:00</updated><title type='text'>लमही कथा सम्मान योजना</title><content type='html'>&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_fc2wY2U36Kc/SzTVnYqN5rI/AAAAAAAAAlY/OUSI17RmJKE/s1600-h/lamhi+AD+NEW.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5419191124244686514" style="WIDTH: 320px; CURSOR: hand; HEIGHT: 200px" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_fc2wY2U36Kc/SzTVnYqN5rI/AAAAAAAAAlY/OUSI17RmJKE/s320/lamhi+AD+NEW.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पढ़ने के लिए इमेज पर क्लिक करें ।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4103886293770258948-2971616166115592489?l=shabdsrijan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://shabdsrijan.blogspot.com/feeds/2971616166115592489/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.blogger.com/comment.g?blogID=4103886293770258948&amp;postID=2971616166115592489' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4103886293770258948/posts/default/2971616166115592489'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4103886293770258948/posts/default/2971616166115592489'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://shabdsrijan.blogspot.com/2009/12/blog-post.html' title='लमही कथा सम्मान योजना'/><author><name>योगेंद्र कृष्णा   Yogendra Krishna</name><uri>http://www.blogger.com/profile/17366269677319716325</uri><email>yogendrakrishna@yahoo.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' name='OpenSocialUserId' value='00615047406804366258'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_fc2wY2U36Kc/SzTVnYqN5rI/AAAAAAAAAlY/OUSI17RmJKE/s72-c/lamhi+AD+NEW.jpg' height='72' width='72'/><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4103886293770258948.post-1149187316655725847</id><published>2009-11-21T11:19:00.004-05:00</published><updated>2009-11-21T11:28:32.317-05:00</updated><title type='text'>शोक-सभा</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_fc2wY2U36Kc/SwgTkNz8d5I/AAAAAAAAAlQ/cCfq4P7eEJg/s1600/RKPandey-2-188x300%5B1%5D.gif"&gt;&lt;img style="cursor:pointer; cursor:hand;width: 188px; height: 300px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_fc2wY2U36Kc/SwgTkNz8d5I/AAAAAAAAAlQ/cCfq4P7eEJg/s320/RKPandey-2-188x300%5B1%5D.gif" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5406592865562032018" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हिंदी के वरिष्ठ पत्रकार एवं कवि &lt;strong&gt;रामकृष्ण पांडेय &lt;/strong&gt;के असामयिक निधन पर आज पटना की प्रलेस इकाई ने केदार भवन स्थित अपने कर्यालय में एक शोक-सभा आयोजित की. पिछले सोमवार की रात दिल का दौरा पड़ने से उनका निधन हो गया था. वे करीब 61 साल के थे. रामकृष्‍ण पांडेय पिछले कुछ समय से मधुमेह से पीड़ित थे और पिछले सोमवार देर शाम उन्हें दिल का दौरा पड़ा. इसके बाद उन्हें दिल्ली के नरेंद्र मोहन अस्पताल ले जाया गया जहां उनका निधन हो गया. वे लंबे समय से हिंदी संवाद एजेंसी &lt;em&gt;यूनिवार्ता &lt;/em&gt;से जुड़े थे. वे कुछ समय तक &lt;em&gt;समाचार भारती &lt;/em&gt;में भी रहे. उनके परिवार में उनकी पत्नी के अलावा दो पुत्री हैं. मूल रूप से पटना के रहने वाले रामकृष्‍ण पांडेय ने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से हिंदी में पीचएडी की थी और वे कम्युनिस्ट आंदोलन से गहरे जुड़े रहे. साहित्य की विभिन्न विधाओं में रुचि रखने वाले पांडेय एक बेहतरीन कवि भी थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शोक-सभा में वरिष्ठ आलोचक खगेन्द्र ठाकुर, वरिष्ठ कवि आलोक धन्वा, अरुण कमल, विश्वजीत सेन, योगेंद्र कृष्णा, शहंशाह आलम, प्रमोद कुमार सिंह समेत शहर के अनेक साहित्यकार तथा उनके परिजनों ने भी उनके निधन पर अपनी गहरी श्रद्धांजलि अर्पित की.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कवि अरुण कमल के प्रस्ताव पर सर्वसम्मति से यह निर्णय लिया गया कि जनवरी में स्व. पांडेय के जन्म-दिन के अवसर पर उनके नाम पर एक स्मृति व्याख्यान की शुरुआत की जाए.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4103886293770258948-1149187316655725847?l=shabdsrijan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://shabdsrijan.blogspot.com/feeds/1149187316655725847/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.blogger.com/comment.g?blogID=4103886293770258948&amp;postID=1149187316655725847' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4103886293770258948/posts/default/1149187316655725847'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4103886293770258948/posts/default/1149187316655725847'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://shabdsrijan.blogspot.com/2009/11/blog-post_21.html' title='शोक-सभा'/><author><name>योगेंद्र कृष्णा   Yogendra Krishna</name><uri>http://www.blogger.com/profile/17366269677319716325</uri><email>yogendrakrishna@yahoo.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' name='OpenSocialUserId' value='00615047406804366258'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_fc2wY2U36Kc/SwgTkNz8d5I/AAAAAAAAAlQ/cCfq4P7eEJg/s72-c/RKPandey-2-188x300%5B1%5D.gif' height='72' width='72'/><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4103886293770258948.post-6364324540640277312</id><published>2009-11-15T04:48:00.014-05:00</published><updated>2009-11-15T10:22:27.378-05:00</updated><title type='text'>नई सदी में संस्कृति</title><content type='html'>&lt;p&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;कला पर नई दृष्टि की ज़रूरत&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;hr size="2" align="center" noshade/&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_fc2wY2U36Kc/SwAb4M3kieI/AAAAAAAAAlI/PjdqD3f76Tw/s1600-h/shantas%5B1%5D.jpg"&gt;&lt;img style="cursor:pointer; cursor:hand;width: 87px; height: 100px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_fc2wY2U36Kc/SwAb4M3kieI/AAAAAAAAAlI/PjdqD3f76Tw/s320/shantas%5B1%5D.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5404350205185526242" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;शांता सरबजीत सिंह&lt;/strong&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;blockquote&gt;&lt;i&gt;भारत की राजधानी का वर्तमान परिदृश्य इससे और अधिक त्रासद क्या हो सकता है कि जहां अनगिनत निजी प्रबंधन वाली सरकारी कोष प्राप्त सांस्कृतिक संस्थाएं मौजूद हों, लेकिन जो बिना भारी शुल्क अदा किए युवा कलाकारों या संस्कृतिकर्मियों के लिए उपलब्ध नहीं हों. समय आ चुका है जब सरकार को यह बात समझ लेनी चाहिए कि संस्कृति और नई नीति--जिसमें बुनियादी और कठोर कदम भी उठाने की जरूरत पड़ सकती है--पर यदि समुचित ध्यान नहीं दिया गया तो संभव है कि राष्ट्र निर्माण एवं विकास के लिए आवश्यक हम अपने बेहद मूल्यवान तथा अमूर्त संसाधन खो बैठें.&lt;/i&gt;&lt;/blockquote&gt;&lt;br /&gt;मैं अपनी बात कुछ प्रश्नों के साथ आरंभ करना चाहूंगी. क्या हमारे युवाओं को यह जानने की ज़रूरत है कि भरत नाट्यम क्या है? क्या ध्रुपद के उस्ताद फहीमुद्दीन डागर की कला की जानकारी या किशोरी अमोणकर की ग्वालियर शैली किस तरह किरण घराना के गायकी अंग से अलग है जैसी बारीकियां उनके लिए महत्वपूर्ण हैं? क्या नए युग की इस पीढ़ी का मुख्य लक्ष्य आत्म-निर्भर होना या अपने ही दोनों पांव पर खड़ा होना, जीवन में निरंतर आगे बढ़ना और केवल अवसरों की तलाश--जिसे आप पैसा भी कह सकते हैं--नहीं है? उनकी इस परिकल्पना में `कला और संस्कृति´ का क्या महत्व है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इन प्रश्नों का जवाब `हां´ है--एक उच्चस्वरीय हां, अगर हम विषय को अराजकता के उस परिप्रेक्ष्य में देखें जिसमें चीजें आज हैं. बीसवीं सदी के दौरान प्राय: हमारा ध्यान केवल अर्थशास्त्र, राजनीति, प्रौद्योगिकी और विझान पर केंद्रित रहा है. और इस तरह अपना ध्यान इन विषयों पर केंद्रित करने में, इनमें से किसी भी विषय को उस सांस्कृतिक संदर्भ से जोड़ने की कोशिश नहीं की गई जहां से ये विषय पैदा होते हैं और जिसमें इनकी जड़ें अवस्थित हैं. जब कृषि का कोई नया औज़ार या संकर बीज उपयोग में लाया जाना था तो नए उत्पाद को उपयोग में लाने के पूर्व किसी ने आंध्र प्रदेश के किसानों के कृषि-ढांचे को समझने की कोशिश नहीं की. और देखें इसका परिणाम क्या हुआ! निष्प्राण और यांत्रिक लक्ष्य के किस दलदल में हम पहुंचे हैं! लक्ष्य प्राप्त हो जाने के बाद भी यह हमारे लिए महत्वपूर्ण नहीं है, क्योंकि यह हमारे जीवन को संपोषित करने वाला नहीं है. अन्य विकसित देशों ने इसे पहले ही महसूस कर लिया है. और अब समय आ गया है कि हम भी यह बात समझ लें कि —षि या अर्थतंत्र या विज्ञान या कोई भी अन्य विषय संस्कृति से अलग कर नहीं देखे जा सकते जिसमें वे अपस्थित हैं, और `संस्कृति´ की भूमिका को सबसे पहले स्वीकार किए बिना कोई भी विकास संभव नहीं है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यदि कल के नागरिक को वैश्वीकरण और सांस्कृतिक वैविध्य के बीच रिश्ता स्थापित करना है, अगर उन्हें वैश्वीकरण के सांस्कृतिक परिणाम समझने हैं--उदाहरण के लिए, प्रवसन, सांस्कृतिक संपर्क, जन-माध्यम जैसी घटनाएं--और यदि उन्हें सांस्कृतिक वैश्वीकरण से जुड़ी गतिकी को समझने की शुरुआत करनी है, तो संस्कृति पर एक नई और गतिशील दृष्टि का होना सर्वाधिक महत्वपूर्ण है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक स्तर पर, युवा पीढ़ी के लिए यह बात महत्वपूर्ण है कि अबतक भारतीय नृत्य और संगीत वैश्विक चेतना में प्रवेश पा चुका है. दूसरे शब्दों में, संस्कृति, जो हमें अपनी पहचान का बोध कराती है और जिस पर हम भरोसा करते हैं, आज वैश्विक परिदृश्य के महत्वपूर्ण हिस्सों को सजाने-संवारने लगी है. सुदूर पर्थ में जापानी युवतियां हैं जो कथक पढ़ाती हैं. इंग्लैण्ड के योर्क युनिवर्सिटी में भारतीय क्लासिक संगीत की एक स्वतंत्र पीठ है जहां हर वर्ष भारत के संगीताचार्य क्लास संचालित करते हैं. और कुछ अत्यंत प्रतिभाशाली तबला-वादक बेल्जियम और हॉलैण्ड में पैदा हो रहे हैं, जहां ज़ाकिर हुसैन और शिवमणि जैसे तबला-वादकों के अकसर भ्रमण के लिए हम आभारी हैं. अमेरिका में भरत नाट्यम, कुचिपुड़ी, कथक आदि के विद्यालय उतनी ही संख्या में मौजूद हैं जितनी कि वहां पर क्लासिक कलाओं में प्रशिक्षित प्रवासी भारतीय युवतियां. जीविका की तलाश में अपने पति का साथ देने को विवश इन युवतियों में से प्रत्येक ने अपनी सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण और विकास का रास्ता चुना है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इन उदाहरणों में संस्कृति पर नई दृष्टि की आवश्यकता के लिए औचित्य ढूंढ़ना बेमानी होगा. न ही इसका औचित्य इस तथ्य में निहित है कि भारत में कला से जुड़ा कोई प्रकाशन नहीं है जो इन विषयों और हजारों अन्य महत्वपूर्ण मुद्दों पर बात करता हो. और न कि मुख्यधारा के समाचार माध्यमों--टाइम्स ऑफ इंडिया से हिंदुस्तान टाइम्स तक अनेक `टाइम्स´ में संस्कृति के लिए जगह इस हद तक सिकुड़ गई है कि किसी गंभीर सांस्कृतिक मसले पर प्रसंगवश भी कोई संदर्भ-विंदु ढूंढ़ पाना कठिन हो गया है. वैश्वीकरण की शुरुआत और राष्ट्र की सर्वाधिक महत्वपूर्ण धरोहर--संस्कृति--के हाशियेकरण के बीच का संयोग भी दरअसल कोई इतना बड़ा संयोग नहीं है. इसके समानांतर, उन लोगों के साधारणीकरण की प्रक्रिया तेज हुई है जो संस्कृति के सर्जक हैं--नर्तक, संगीतज्ञ, चित्रकार, मूर्तिकार, लेखक और कवि. यह वह क्रांतिक समूह है जो संपूर्ण सभ्यता का सूचकांक-फलक और पहचान-पत्र है जिसके माध्यम से किसी राष्ट्र की पहचान बनती है. क्या ही विडंबना है कि इंटरनेशनल हेराल्ड ट्रिब्यून जैसे अंतरराष्ट्रीय प्रकाशन, जो प्रमुख भारतीय अखबारों के तथाकथित आदर्श हैं, आज भी अपने आठ-पृष्ठीय स्वरूप में भी ओपेरा, रंगमंच और बैले पर भारी-भरकम समीक्षाएं और वैचारिक आलेख प्रस्तुत कर रहे हैं, जबकि अपने यहां भारत में बड़े-बड़े अखबार समीक्षाओं का उपहास करते नज़र आते हैं, और संस्कृति पर सोचने-विचारने के बदले इन्होंने सहर्ष पूरे इस विषय को ही कूड़ेदान में डाल दिया है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ज़मीनी हकीकत आज यह है कि नृत्य की किसी नई शैली, रंगमंच के किसी नए प्रयोग, स्थापत्य कला की किसी मौलिक और नई अभिव्यक्ति, या सिनेमा में नई भाषा के प्रयोग पर चर्चा करने के बदले, जो इन कलाओं के सर्जक हैं उन्हें पेज-3 के बकबास में अवमूल्यित कर दिया गया है. पिछले दिनों एक युवा उप-संपादक ने जब लिखा कि `उमा शर्मा, भरतनाट्यम नृत्यांगना´ फलां समारोह में देखी गईं, तो वह न तो यह जानता है और न ही उसे यह जानने में दिलचस्पी है कि उमा शर्मा का कला-क्षेत्र कथक है और सांस्कृतिक रूप से सजग कोई भी पीढ़ी इस क्षेत्र में उनके अवदान से गौरवान्वित महसूस करेगी. लेकिन समाचार माध्यमों में उमा शर्मा की प्रतिभा और कला के प्रति सच्ची दिलचस्पी के अभाव में, कोई आश्चर्य नहीं कि अखबारों में चर्चा इस बात पर केंद्रित हो कि किसी समारोह में उन्होंने क्या पहन रखा था और खाने में उन्होंने क्या लिया, न कि इस बात पर कि उनके वैचारिक और रचनात्मक अवदान क्या हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक ऐसी नीति, जो हमारी संस्कृति के नैरंतर्य और उसकी समकालीन प्रासंगिकता दोनों ही पर ध्यान केंद्रित करती हो, का औचित्य नकारात्मक संदर्भों में नहीं, बल्कि इस तथ्य में निहित है कि भारत पूरी शिÌत के साथ केवल अपनी संस्कृति में वास करता है, और यहां के प्रत्येक व्यक्ति के लिए--जो यहां की हवा को अपनी सांसों में भरता है, इसकी मिट्टी पर अपने कदम रखता है--स्वयं को जानने-समझने का और अपनी भाषा, समाज, स्मृति, इतिहास और जीवनानुभवों के विशिष्ट प्रतिमानों के आधार पर अपने जीवन को रचने का एक माध्यम है, संभवत: एकमात्र महत्वपूर्ण माध्यम.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस नई नीति का सत्त्व अन्वेषण और संरक्षण के बीच, नवीन और पुरातन के द्वैत के बीच, लोक और नागर के बीच, लोकप्रिय संस्कृति के निर्माण की दिशा में तथा संप्रदाय या सामूहिक चेतना को बचाए रखने की दिशा में सक्रिय शक्तियों के बीच एक संतुलन बनाए रखने में निहित होगा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसे इन दो ध्रुवांतों के बीच की नाजु़क जगहों को पाटने के साथ-साथ, निरंतर विकसित हो रहे भारत के मध्य वर्ग के जेहन में संस्—ति को संस्कार, सुरक्षा कवच, जीवित बचे रहने के लिए हमारा अपना ही एक विशिष्ट उपकरण के रूप में बिठाने का काम करना होगा. और आखिर किस चीज से हम स्वयं को बचाए रखने की कोशिश कर रहे हैं र्षोर्षो संक्षेप में कहें तो, भावात्मक तथा भौतिक विध्वंस से. मानव सभ्यता का मर्म आज भी, और वैश्वीकरण के इस युग में विशेषकर, संस्कृतियों की विराट विविधता में अवस्थित है. हालांकि इसके साथ ही, सांस्कृतिक विभिन्नताएं अकसर संकट और द्वंद्व का सबब बन कर उभरती हैं. इसलिए, अंतरसांस्कृतिक संवाद, जिसमें आत्म-छवि और प्रतिद्वंद्वी-छवि पर तार्किक विमर्श शामिल हो, इक्कीसवीं सदी की चुनौतियों में सर्वाधिक महत्वपूर्ण है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कल्पना करें इस परिदृश्य की : आप नाश्ते पर बैठे हैं नई दिल्ली में, साथ में है दार्जिलिंग की चाय, जैव ऊर्जा से भरपूर ऊबरमार्क की मुस्ली और डेनमार्क का पनीर. सुबह के अखबार पर जब आप सरसरी नजर डालते हैं तो कुछ इस प्रकार के समाचार आपके सामने उभरते हैं : जापान के शहर नोरीकुरा में कोरियाई यॉडेलर किम चुल हांग ने प्रथम पुरस्कार जीता है, जर्मनी की और जापान की एक कंपनी ने संयुक्त पहलकदमी की घोषणा की है. बाद में, बीबीसी वल्र्ड सर्विस बांग्लादेश के एक बैंक की नई पहलकदमी के बारे में एक रिपोर्ट प्रसारित करती है. यह बैंक अपने 2.1 मिलियन ग्राहकों को सेल्युलर टेलीफोन प्रदान करने जा रहा है, जिससे कि दुनिया के सर्वाधिक गरीब देशों में से एक के लिए सीधे सूचना-युग में प्रवेश का द्वार खुलता है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जहां एक दशक पूर्व तक भी दुनिया की एक तस्वीर खींचना, खास ठिकानों के संदर्भ में आर्थिक और राजनीतिक तंत्र का पूर्वानुमान लगाना संभव प्रतीत होता था, आज इस तरह के प्रयास प्रश्नों और संदेहों से परे नहीं दिखते. वैश्वीकरण का प्रभाव हर क्षेत्र और दिशा में पड़ रहा है. मुद्राएं, कंपनियां, विचार और लोग--ये सभी पूर्व के किसी भी समय की तुलना में आज कहीं अधिक गतिशील हो गए हैं. बावजूद इसके, एक ओर जहां समाज के भीतर वैश्विक नेटविर्कंग के आर्थिक तथा राजनीतिक परिणाम पर गरमागरम बहसें जारी हैं, हमारा ध्यान इस बात पर बहुत कम ही गया है कि हमारी संस्कृति और रोजमर्रे की दुनिया पर ये परिवर्तन कैसा प्रभाव डाल रहे हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारत में सर्वाधिक प्रभावशाली एवं दूरगामी जो परिवर्तन घटित हो रहे हैं वे हैं शहरी, अप्रबुद्ध मध्य वर्ग संस्कृति का नये से नये एवं अबतक अनछुए सार्वजनिक इलाकों में विस्तार. उदाहरण के लिए, पिछले पांच दशकों में शहरी भारतवासियों का अनुपात केवल पांच प्रतिशत बढ़ा है, (यह 20 प्रतिशत से बढ़कर 25 प्रतिशत हुआ है), लेकिन समग्रता में देखा जाए तो इससे जो आंकड़ा उभर कर सामने आता है वह आश्चर्यजनक है : यह हमें दुनिया के सबसे बड़े मध्य-वर्ग जनसंख्या वाले देशों के बीच लाकर खड़ा कर देता है. सामाजिक एवं राजनीतिक परिदृश्य पर आज इसका प्रभुत्व जिस पैमाने पर है वह दो दशक पूर्व तक भी कल्पनातीत था. भारत के लंबे इतिहास में, पहली बार हमारे यहां एक ऐसी लोक संस्—ति अस्तित्व में आई है जिसमें लोकप्रिय सिनेमा, क्रिकेट, दूरदर्शन धारावाहिक और पॉप म्यूजिक जैसे नए रूपाकार हमारी पुरानी विधाओं--यथा यात्रा, कथा, रामलीला और कृष्णलीला आदि--में शामिल हुए हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वर्तमान में भारत का यह मध्य वर्ग जहां एक ओर समाज के एवज़ में आधुनिक जीवन-शैली से जुड़ी अनेक प्रकार की असहज आगतों को साधने में जुटा है, वहीं दूसरी तरफ़ यह समाज के सामूहिक संस्कार, इसके सांस्कृतिक प्रतिमानों को भी अद्यतन कर रहा है. सत्यजित राय, रित्विक घटक या अदूर गोपाल्कृष्णन जैसे महान फिल्म निर्माता, रविन्द्रनाथ टैगोर और अमृता शेरगिल जैसे चाक्षुष कलाकार, शरतचंद चट्टोपाध्याय और प्रेमचंद जैसे लेखक, ये सभी मध्य वर्ग की उपज थे, और यहीं से इन हस्तियों ने बदलाव के लिए काम किया. नई सांस्कृतिक नीति को समकालीन जीवन की ऐसी शख्सीयतों, और उनके माध्यम से पर्यावरण, समाज और समय के प्रति उनकी सजगता और सरोकार पर अपना ध्यान केंद्रित करना होगा. और जिसका उद्देश्य भारत के लोगों को नई सदी में एक दिशा प्रदान करना होगा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;संस्कृति और व्यक्तित्व को देखने के नए तरीकों का संधान करना होगा क्योकि संस्कृति के बारे में सामान्य समझ है कि यह ऐतिहासिक उद्भव से जुड़ा एक अपेक्षाकृत स्थिर उपोत्पाद है. मानव-वैज्ञानिक उल्फ हैन्नर्ज़ विरोधाभासों एवं अर्थ-प्रणाली की पारगम्य सीमाओं को उचित ठहराने के लिए `क्रियोलाइजेशन´ शब्द का सहारा लेते हैं. भाषिक संदर्भ में यह कैरिबियाइयों की पिडगिन भाषाओं की ओर संकेत करता है जो औपनिवेशिक तथा अफ़्रिकी भाषाओं का मिश्रण थे. सामान्यत: यह शब्द वैसी किसी नई विविधता को दर्शाता है जो स्वायत्तता से कहीं अधिक संबंधों पर आधारित है. यह संस्कृति को एक स्थिर, बंद प्रणाली के रूप में नहीं, बल्कि विविध अर्थों से भरी, बहती एक नदी के रूप में देखता है जो पुराने रिश्तों को निरंतर जज्ब करती और नए संबंधों-संपर्कों को बनाती चलती है. इसे आंकड़ों के आइने में देखें तो जर्मनी जैसा देश हमारे सामने एक उदाहरण है, जहां आज से कुछ वर्ष बाद यहां के प्रमुख शहरों में बच्चों और युवाओं की कुल संख्या का 40 प्रतिशत से 50 प्रतिशत प्रवासी परिवारों की संतान होंगे. एक गतिशील नई सांस्कृतिक नीति को, पूरी दुनिया और अपने देश के संदर्भ में भी, ऐसे ही प्रतिमानों (पाराडाइम) पर अपना ध्यान केंद्रित करना होगा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कतिपय सुधारों की तुरंत आवश्यकता है. भारत की राजधानी का वर्तमान परिदृश्य इससे और अधिक त्रासद क्या हो सकता है कि जहां अनगिनत निजी प्रबंधन वाली सरकारी कोष प्राप्त सांस्कृतिक संस्थाएं मौजूद हों, लेकिन जो बिना भारी शुल्क अदा किए युवा कलाकारों या संस्कृतिकर्मियों के लिए उपलब्ध नहीं हों. समय आ चुका है जब सरकार को यह बात समझ लेनी चाहिए कि संस्कृति और नई नीति--जिसमें बुनियादी और कठोर कदम भी उठाने की जरूरत पड़ सकती है--पर यदि समुचित ध्यान नहीं दिया गया तो संभव है कि राष्ट्र निर्माण एवं विकास के लिए आवश्यक हम अपने बेहद मूल्यवान तथा अमूर्त संसाधन खो बैठें.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसा कहना उचित नहीं होगा कि जो संस्कृति हूणों और मंगोलों, तुर्कों और फारसियों, असीरियाइयों और अरबों, पुर्तगालियों, फ्रांसिसियों, और अंग्रेजों के हाथों भी, बच कर निकल गई, वह भारतीयों के हाथों नहीं बच पाएगी !&lt;br /&gt;&lt;hr size="2" align="center" noshade/&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अंग्रेज़ी से अनुवाद : योगेन्द्र कृष्णा&lt;br /&gt;साभार : &lt;em&gt;पूर्वग्रह&lt;/em&gt; ( अक्तूबर-दिसंबर, २००९ )&lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4103886293770258948-6364324540640277312?l=shabdsrijan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://shabdsrijan.blogspot.com/feeds/6364324540640277312/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.blogger.com/comment.g?blogID=4103886293770258948&amp;postID=6364324540640277312' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4103886293770258948/posts/default/6364324540640277312'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4103886293770258948/posts/default/6364324540640277312'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://shabdsrijan.blogspot.com/2009/11/blog-post.html' title='नई सदी में संस्कृति'/><author><name>योगेंद्र कृष्णा   Yogendra Krishna</name><uri>http://www.blogger.com/profile/17366269677319716325</uri><email>yogendrakrishna@yahoo.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' name='OpenSocialUserId' value='00615047406804366258'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_fc2wY2U36Kc/SwAb4M3kieI/AAAAAAAAAlI/PjdqD3f76Tw/s72-c/shantas%5B1%5D.jpg' height='72' width='72'/><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4103886293770258948.post-2597817674404974604</id><published>2009-10-07T10:53:00.005-04:00</published><updated>2009-10-07T13:32:02.093-04:00</updated><title type='text'>साहित्य समाचार</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_fc2wY2U36Kc/SsyspReSmfI/AAAAAAAAAlA/0H7ugpiRQ_g/s1600-h/untitled.bmp"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5389872679120706034" style="WIDTH: 150px; CURSOR: hand; HEIGHT: 164px" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_fc2wY2U36Kc/SsyspReSmfI/AAAAAAAAAlA/0H7ugpiRQ_g/s320/untitled.bmp" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:180%;"&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;कुंवर नारायण को ज्ञानपीठ पुरस्कार&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तीसरा सप्तक के यशस्वी कवि &lt;strong&gt;कुंवर नारायण &lt;/strong&gt;को मंगलवार को भारतीय भाषाओं के साहित्य में उल्लेखनीय योगदान के लिए 41वें &lt;strong&gt;ज्ञानपीठ पुरस्कार &lt;/strong&gt;से सम्मानित किया गया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने संसद भवन के बालयोगी सभागार में एक गरिमामय समारोह में कुंवर नारायण को वर्ष 2005 के ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया। सम्मान में 7 लाख रुपये की राशि, वनदेवी की प्रतिमा, प्रशस्तिपत्र, प्रतीक चिन्ह, शाल और श्रीफल शामिल है। भारतीय ज्ञानपीठ के निदेशक रवींद्र कालिया के अनुसार इस बार से पुरस्कार राशि पांच लाख रुपये से बढ़ाकर 7 लाख कर दी गई है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;19 सितम्बर 1927 को जन्मे कुंवर नारायण को पद्म भूषण, साहित्य अकादमी पुरस्कार, हिन्दी अकादमी का श्लाका सम्मान, कबीर सम्मान तथा मानद डीलिट की उपाधि भी मिल चुकी हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उडिया के प्रसिद्ध कवि एवं ज्ञानपीठ पुरस्कार विजेता डॉ सीताकांत महापात्र की अध्यक्षता वाली चयन समिति ने कुंवर नारायण को यह पुरस्कार देने का निर्णय दिया। इससे पहले 1999 में हिन्दी के लेखक निर्मल वर्मा को यह पुरस्कार मिला था। अब तक &lt;strong&gt;सुमित्रा नंदन पंत, दिनकर, अज्ञेय, महादेवी वर्मा &lt;/strong&gt;और &lt;strong&gt;नरेश मेहता &lt;/strong&gt;जैसे हिन्दी लेखकों को यह पुरस्कार दिया जा चुका है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुंवर नारायण का पहला कविता संग्रह &lt;em&gt;चक्रव्यूह&lt;/em&gt; 1956 में छपा था। उनके छह कविता संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। &lt;em&gt;आत्मजयी&lt;/em&gt; और &lt;em&gt;वाजश्रवा के बहाने &lt;/em&gt;उनके चर्चित खण्डकाव्य हैं। उनकी आलोचना की तीन पुस्तकें भी प्रकाशित हैं और उन्होंने विदेशी साहित्य का भी काफी अनुवाद किया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span class=""&gt;कुंवर जी को &lt;em&gt;शब्दसृजन&lt;/em&gt; की बधाई एवं शुभकामनाएं।&lt;/span&gt; &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4103886293770258948-2597817674404974604?l=shabdsrijan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://shabdsrijan.blogspot.com/feeds/2597817674404974604/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.blogger.com/comment.g?blogID=4103886293770258948&amp;postID=2597817674404974604' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4103886293770258948/posts/default/2597817674404974604'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4103886293770258948/posts/default/2597817674404974604'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://shabdsrijan.blogspot.com/2009/10/blog-post.html' title='साहित्य समाचार'/><author><name>योगेंद्र कृष्णा   Yogendra Krishna</name><uri>http://www.blogger.com/profile/17366269677319716325</uri><email>yogendrakrishna@yahoo.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' name='OpenSocialUserId' value='00615047406804366258'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_fc2wY2U36Kc/SsyspReSmfI/AAAAAAAAAlA/0H7ugpiRQ_g/s72-c/untitled.bmp' height='72' width='72'/><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4103886293770258948.post-2717886161032729085</id><published>2009-08-02T04:52:00.003-04:00</published><updated>2009-08-02T04:59:10.220-04:00</updated><title type='text'>इस सदी का यह दौर</title><content type='html'>इस सदी का यह &lt;br /&gt;अजीब-सा दौर है दोस्तो&lt;br /&gt;कि सुबह-सुबह जब &lt;br /&gt;कोई चिड़िया भी गाती है&lt;br /&gt;तो पता नहीं क्यों&lt;br /&gt;लगता है जैसे किसी ने&lt;br /&gt;मेरे घर का कॉल बेल बजाया है...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुंह-अंधेरे&lt;br /&gt;बारिश की आवाज़ से &lt;br /&gt;चौंक जाता हूं&lt;br /&gt;कि फिर किसी ने&lt;br /&gt;बाथरूम का शावर&lt;br /&gt;खुला तो नहीं छोड़ दिया...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बहुत नेह से जब&lt;br /&gt;करता है कोई बात&lt;br /&gt;तो संदेह होता है &lt;br /&gt;खालिस संदेह...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब कोई पड़ोसी&lt;br /&gt;चीखता-चिल्लाता है&lt;br /&gt;शायद असह्य यंत्रणा या पीड़ा में&lt;br /&gt;तो गुस्सा आता है&lt;br /&gt;कि इतनी ऊंची आवाज़ में&lt;br /&gt;क्यों लोग सुनते हैं अपने घरों में टीवी&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और जब किसी की&lt;br /&gt;बेइंतहा वफादारी का मिलता है&lt;br /&gt;कोई सच्चा दृष्टांत&lt;br /&gt;तो सच पूछिए&lt;br /&gt;अपने घर का कुत्ता &lt;br /&gt;बहुत याद आता है...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्या इस सदी का यह सचमुच &lt;br /&gt;इतना अजीब-सा दौर है दोस्तो&lt;br /&gt;या कि सिर्फ मुझे ही ऐसा लगा है...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(&lt;em&gt;शीघ्र प्रकाश्य संग्रह से&lt;/em&gt;)&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4103886293770258948-2717886161032729085?l=shabdsrijan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://shabdsrijan.blogspot.com/feeds/2717886161032729085/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.blogger.com/comment.g?blogID=4103886293770258948&amp;postID=2717886161032729085' title='8 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4103886293770258948/posts/default/2717886161032729085'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4103886293770258948/posts/default/2717886161032729085'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://shabdsrijan.blogspot.com/2009/08/blog-post.html' title='इस सदी का यह दौर'/><author><name>योगेंद्र कृष्णा   Yogendra Krishna</name><uri>http://www.blogger.com/profile/17366269677319716325</uri><email>yogendrakrishna@yahoo.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' name='OpenSocialUserId' value='00615047406804366258'/></author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>8</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4103886293770258948.post-7959935074959248531</id><published>2009-06-27T03:07:00.009-04:00</published><updated>2009-07-03T11:46:36.561-04:00</updated><title type='text'>आलोक श्रीवास्तव को दुष्यंत कुमार पुरस्कार</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_fc2wY2U36Kc/SkXGx2camQI/AAAAAAAAAkw/mZaP-8Z8GJQ/s1600-h/AALOK.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5351902291930290434" style="WIDTH: 301px; CURSOR: hand; HEIGHT: 320px" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_fc2wY2U36Kc/SkXGx2camQI/AAAAAAAAAkw/mZaP-8Z8GJQ/s320/AALOK.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी ने इस बार अपना प्रतिष्ठित 'दुष्यंत कुमार पुरस्कार' युवा ग़ज़लकार &lt;strong&gt;आलोक श्रीवास्तव &lt;/strong&gt;को देने की घोषणा की है. आलोक को यह पुरस्कार उनके बहुचर्चित ग़ज़ल संग्रह &lt;em&gt;'आमीन'&lt;/em&gt; के लिए दिया जाएगा. साल 2007 में राजकमल प्रकाशन, दिल्ली से प्रकाशित इस संग्रह के लिए आलोक श्रीवास्तव को मिलने वाला यह तीसरा प्रतिष्ठित साहित्यिक पुरस्कार है.इससे पहले उन्हें राजस्थान के 'डॉ भगवतीशरण चतुर्वेदी पुरस्कार' और प्रख्यात आलोचक डॉ.नामवर सिंह के हाथों मुंबई में प्रतिष्ठित 'हेमंत स्मृति कविता सम्मान' से नवाज़ा जा चुका है. हाल ही में ग़ज़ल गायक जगजीत सिंह ने अपने नए एलबम 'इंतेहा' में आलोक की ग़ज़ल को अपनी आवाज़ दी है. प्रख्यात शास्त्रीय गायिका शुभा मुदगल भी अपने चर्चित एलबम 'कोशिश' में फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की नज़्मों के साथ आलोक के गीतों को स्वर दे चुकी हैं. पेशे से टीवी पत्रकार आलोक, मूलत: विदिशा (म.प्र.) के हैं और इन दिनों दिल्ली में न्यूज़ चैनल 'आजतक' से जुड़े हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आलोक को &lt;em&gt;शब्दसृजन &lt;/em&gt;की बधाई!&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;आलोक की कुछ गजलें&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;एक &lt;/em&gt;&lt;br /&gt;चिंतन दर्शन जीवन सर्जन रूह नज़र पर छाई अम्मा,&lt;br /&gt;सारे घर का शोर शराबा, सूनापन तनहाई अम्मा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सारे रिश्ते- जेठ-दुपहरी, गर्म हवा, आतिश, अंगारे,&lt;br /&gt;झरना, दरिया, झील, समंदर, भीनी-सी पुरवाई अम्मा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;घर में झीने रिश्ते मैंने लाखों बार उधड़ते देखे,&lt;br /&gt;चुपके-चुपके कर देती है, जाने कब तुरपाई अम्मा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उसने ख़ुदको खो कर मुझमें एक नया आकार लिया है,&lt;br /&gt;धरती, अंबर, आग, हवा, जल जैसी ही सच्चाई अम्मा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बाबूजी गुज़रे आपस में सब चीज़ें तक़्सीम हुईं, तब-&lt;br /&gt;मैं घर में सबसे छोटा था, मेरे हिस्से आई अम्मा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;दो&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;घर की बुनियादें, दीवारें, बामो-दर थे बाबूजी, &lt;br /&gt;सबको बांधे रखने वाला, ख़ास हुनर थे बाबूजी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तीन मुहल्लों में उन जैसी क़द काठी का कोई न था,&lt;br /&gt;अच्छे-ख़ासे, ऊंचे-पूरे, क़द्दावर थे बाबूजी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब तो उस सूने माथे पर कोरेपन की चादर है,&lt;br /&gt;अम्माजी की सारी सजधज, सब ज़ेवर थे बाबूजी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भीतर से ख़ालिस जज़्बाती और ऊपर से ठेठ पिता,&lt;br /&gt;अलग, अनूठा, अनबूझा-सा, इक तेवर थे बाबूजी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कभी बड़ा-सा हाथ ख़र्च थे, कभी हथेली की सूजन,&lt;br /&gt;मेरे मन का आधा साहस, आधा डर थे बाबूजी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;तीन&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;वही आंगन, वही खिड़की, वही दर याद आता है,&lt;br /&gt;मैं जब भी तन्हा होता हूं, मुझे दर याद आता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरे सीने की हिचकी भी, मुझे खुलकर बताती है,&lt;br /&gt;तेरे अपनों को गांव में, तू अक्सर याद आता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जो अपने पास हो उसकी कोई क़ीमत नहीं होती,&lt;br /&gt;हमारे भाई को ही लो, बिछड़ कर याद आता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सफलता के सफ़र में तो कहां फ़ुर्सत के' कुछ सोचें,&lt;br /&gt;मगर जब चोट लगती है, मुक़द्दर याद आता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मई और जून की गर्मी, बदन से जब टपकती है,&lt;br /&gt;नवम्बर याद आता है, दिसम्बर याद आता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;चार&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;ये सोचना ग़लत है के' तुम पर नज़र नहीं,&lt;br /&gt;मसरूफ़ हम बहुत हैं मगर, बेख़बर नहीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब तो ख़ुद अपने ख़ून ने भी साफ़ कह दिया,&lt;br /&gt;मैं आपका रहूंगा मगर उम्र भर नहीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आ ही गए हैं ख़्वाब तो फिर जाएंगे कहां,&lt;br /&gt;आंखों से आगे इनकी कोई रहगुज़र नहीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कितना जिएं, कहां से जिएं और किस लिए,&lt;br /&gt;ये इख़्तियार हम पे' है, तक़्दीर पर नहीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;माज़ी की राख उलटें तो चिंगारिया मिलें,&lt;br /&gt;बेशक किसी को चाहो मगर इस क़दर नहीं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4103886293770258948-7959935074959248531?l=shabdsrijan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://shabdsrijan.blogspot.com/feeds/7959935074959248531/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.blogger.com/comment.g?blogID=4103886293770258948&amp;postID=7959935074959248531' title='13 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4103886293770258948/posts/default/7959935074959248531'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4103886293770258948/posts/default/7959935074959248531'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://shabdsrijan.blogspot.com/2009/06/blog-post.html' title='आलोक श्रीवास्तव को दुष्यंत कुमार पुरस्कार'/><author><name>योगेंद्र कृष्णा   Yogendra Krishna</name><uri>http://www.blogger.com/profile/17366269677319716325</uri><email>yogendrakrishna@yahoo.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' name='OpenSocialUserId' value='00615047406804366258'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_fc2wY2U36Kc/SkXGx2camQI/AAAAAAAAAkw/mZaP-8Z8GJQ/s72-c/AALOK.jpg' height='72' width='72'/><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>13</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4103886293770258948.post-1068059424071517066</id><published>2009-05-27T09:55:00.017-04:00</published><updated>2009-05-28T12:06:33.930-04:00</updated><title type='text'>अपने कार्यालय के कमरे से…</title><content type='html'>&lt;hr size="4" align="center" noshade/&gt;&lt;/br&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;em&gt;&lt;i&gt;मैं जिस संस्था में काम करता हूं वह बिहार विधानमंडल का उच्च सदन है : बिहार विधान परिषद। और इस संस्था के जिस कमरे में मैं बैठता हूं वह यहां का प्रकाशन विभाग है जहां से यहां के हिंदी प्रकाशनों से जुड़ी तकरीबन तमाम प्रक्रियाओं का निष्पादन होता है। यहां के प्रकाशनों में सदन की कार्यवाहियों, समितियों के प्रतिवेदनों के अतिरिक्त यहां से निकलने वाली पत्रिकाएं--संवाद तथा साक्ष्य शामिल हैं। संवाद यहां की इन-हाउस जर्नल है, जबकि साक्ष्य के अंक साहित्यिक, सामाजिक एवं संसदीय विषयों पर आयोजित होते हैं, और जिससे आपमें से कई लोग परिचित भी हैं। साक्ष्य की स्तरीयता तथा विभिन्न विषयों पर केंद्रित इसके विशेषांकों ने देश भर के साहित्यकारों, बुद्धिजीवियों तथा पाठकों के बीच अपनी ठोस उपस्थिति दर्ज़ की है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह एक सुखद और विरल संयोग-सा प्रतीत हो सकता है कि यहां जिस कमरे में मैं बैठता हूं, वहां, इसी कमरे में, और भी कई चर्चित-अल्पचर्चित युवा रचनाकार, कवि, कथाकार हमारे सहकर्मी के रूप में कार्यरत हैं। इनमें से तीन कवियों की कविता-पुस्तक अभी-अभी एक साथ प्रकाशित हुई है।&lt;/div&gt;&lt;ul&gt;&lt;br /&gt;&lt;li&gt;&lt;strong&gt;अच्छे दिनों में ऊंटनियों का कोरस &lt;/strong&gt;/ &lt;strong&gt;शहंशाह आलम&lt;/strong&gt;&lt;/li&gt;&lt;br /&gt;&lt;li&gt;&lt;strong&gt;बुतों के शहर में / एम के मधु&lt;/strong&gt;&lt;/li&gt;&lt;br /&gt;&lt;li&gt;&lt;strong&gt;इच्छाओं की पृथ्वी के रंग / राकेश प्रियदर्शी&lt;/strong&gt;&lt;/li&gt;&lt;/ul&gt;&lt;div align="justify"&gt;ये तीनों कविता-पुस्तकें अपनी अंतर्वस्तु, शिल्प, संवेदना एवं दृष्टि में एक दूसरे से भिन्न होते हुए भी अपनी सहकालीन उपस्थिति के कारण एक दूसरे से जुड़ती हैं। इनमें जो एक महत्वपूर्ण साम्य है वह यह कि बिहार के राजभाषा विभाग ने पांडुलिपि प्रकाशन के लिए इस वर्ष अनुदान हेतु जिन पांडुलिपियों का चयन किया उनमें ये तीनों पुस्तकें शामिल हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ये तो रही उन कवियों के बारे में जिनकी कविता पुस्तक अभी-अभी आई है। लेकिन इन तीन कवियों के अतिरिक्त भी कई रचनाकर्मी परिषद के इस साहित्य-प्रकोष्ठ में साथ-साथ बैठते हैं, जो अपने-अपने क्षेत्र में लगातार सृजनरत हैं, जैसे--&lt;strong&gt;मुसाफिर बैठा &lt;/strong&gt;(कवि), &lt;strong&gt;अरुण नारायण &lt;/strong&gt;(समीक्षक), &lt;strong&gt;अजय कुमार मिश्र &lt;/strong&gt;(कवि-कथाकार), &lt;strong&gt;चंद्रमोहन मिश्र &lt;/strong&gt;(लेखक-टिप्पणीकार)।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;किसी सरकारी संस्था के एक प्रकोष्ठ में एक साथ इतनी-इतनी सृजनात्मक प्रतिभाओं की उपस्थिति क्या एक महज संयोग की बात हो सकती है? शायद नहीं। याद कीजिए, एक समय जिस तरह भोपाल में किसी शख्स ने भारत भवन की संकल्पना को साकार करने का संघर्ष किया था, उसी तरह बिहार में भी एक शख्स हिंदी भवन को आकार देने की कोशिश में लहूलुहान हुआ… लहूलुहान इसलिए कि बिहार की राजनीतिक परिस्थितियां साहित्य-संस्कृति के लिए भोपाल जैसी अनुकूल नहीं, बल्कि बुरी तरह प्रतिकूल थीं। फिर भी, उस प्रयास के अवशेष के रूप में जो कुछ अच्छी चीजें बची रह गईं, उन्हीं में ये प्रतिभाएं भी शामिल हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जानकार लोग जानते हैं कि परिषद कार्यालय के इस कमरे की खिड़कियों-दरवाजों से बाहर झांकती… दूर-दूर तक रचनात्मक हस्तक्षेप करती इन प्रतिभाओं की उपस्थिति एक सुनियोजित दृष्टि का प्रतिफलन रही है। विधानमंडल के इस उच्च सदन को इसके नाम और गरिमा के अनुरूप अपनी सृजनात्मक कल्पना-दृष्टि से संचालित करने के लिए &lt;strong&gt;प्रो जाबिर हुसेन &lt;/strong&gt;ने अपने सभापतित्व-काल में (वे 1995 से 2006 तक बिहार विधान परिषद के सभापति रहे, और संप्रति सांसद हैं) रूढ़ परंपराओं से मुठभेड़ करते हुए इन प्रतिभाओं का चयन किया था… इसलिए ये प्रतिभाएं अगर हमें आश्चर्य में डालती हैं तो केवल इसलिए कि यहां के पूरे सचिवालयीय बाबूमय पर्यावरण में, जहां राजनीतिक दांव-पेंच, कर्मियों के बीच अपने दायित्वों के प्रति गहरी उदासीनता और बेफिक्री तथा विद्वता और प्रतिभा के प्रति अनादर और विद्रोह-भाव तक का वर्चस्व हो, ये अपने दायित्वों के प्रति निष्ठा, समर्पण और रचनात्मकता से अपनी अलग पहचान बनाए रख सके हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इनकी रचनात्मकता पर आप स्वयं गौर करें। हाल में आई इनकी पुस्तकों से यहां प्रस्तुत हैं इनकी कुछ कविताएं :&lt;/br&gt;&lt;/br&gt;&lt;/i&gt;&lt;hr size="4" align="center" noshade/&gt;&lt;br /&gt;&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;big&gt;स&lt;/big&gt;मकालीन हिंदी कविता में &lt;strong&gt;शहंशाह आलम &lt;/strong&gt;एक जाना-माना नाम है। अपने पहले संग्रह &lt;em&gt;गर दादी की कोई खबर आए &lt;/em&gt;(1993) के साथ शहंशाह ने समकालीन हिंदी कविता के उर्वर प्रदेश में दस्तक दी थी। फिर दो साल बाद &lt;em&gt;अभी शेष है पृथ्वी-राग &lt;/em&gt;(1995) के साथ वे उपस्थित हुए। इसके बाद एक लंबे अंतराल के बाद उनका यह नया संग्रह &lt;em&gt;अच्छे दिनों में ऊंटनियों का कोरस &lt;/em&gt;(2009) अभी हाल में प्रकाशित हुआ है। कविता के अतिरिक्त कला एवं रेखांकन में भी इनकी गहरी रुचि है, तथा इनके रेखांकन देश की लगभग सभी स्तरीय पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_fc2wY2U36Kc/Sh1NogORFuI/AAAAAAAAAkg/lXg2qqX3Bv8/s1600-h/Acche+Dino.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5340510091371157218" style="WIDTH: 150px; CURSOR: hand; HEIGHT: 220px" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_fc2wY2U36Kc/Sh1NogORFuI/AAAAAAAAAkg/lXg2qqX3Bv8/s320/Acche+Dino.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;शहंशाह आलम&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;h3&gt;अभी-अभी&lt;/h3&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;अभी-अभी&lt;br /&gt;एक शब्द जनमा&lt;br /&gt;उस बच्चे के मुंह से&lt;br /&gt;मां से जनमी&lt;br /&gt;एक पूरी भाषा समृद्ध&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अभी-अभी&lt;br /&gt;यह समय था तुम्हारा&lt;br /&gt;अब हुआ किसी अन्य का&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अभी-अभी&lt;br /&gt;वह दरख़्त हुआ&lt;br /&gt;उस चिड़िया का&lt;br /&gt;एकदम अपना&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अभी-अभी&lt;br /&gt;एक पूरा युद्ध लड़ा गया&lt;br /&gt;खुरपी से&lt;br /&gt;हंसिया से&lt;br /&gt;कुदाल से&lt;br /&gt;लाठी से&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अभी-अभी&lt;br /&gt;खुली एक ट्रेन&lt;br /&gt;कि दूसरी आ लगी झट से&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अभी-अभी&lt;br /&gt;रसोईघर से निकल&lt;br /&gt;फैली इस पृथ्वी पर&lt;br /&gt;लहसुन की गंध अनोखी&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अभी-अभी&lt;br /&gt;यह देह हुई उसकी&lt;br /&gt;यह बीज&lt;br /&gt;यह कामना&lt;br /&gt;यह शोर&lt;br /&gt;यह एकांत हुआ उसी का&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अभी-अभी&lt;br /&gt;आग हुई मेरी&lt;br /&gt;फाग हुआ मेरा&lt;br /&gt;राग हुआ मेरा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अभी-अभी&lt;br /&gt;वहां था सूर्यास्त&lt;br /&gt;अब दिखता था&lt;br /&gt;सूर्योदय वहीं पर&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अभी-अभी&lt;br /&gt;जो भूल गया था&lt;br /&gt;रास्ता अपने घर का&lt;br /&gt;बता रहा था&lt;br /&gt;किसी अन्य को&lt;br /&gt;उसके घर का रास्ता&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अभी-अभी&lt;br /&gt;वह मटका था खाली&lt;br /&gt;अब भरा था&lt;br /&gt;मीठे जल से&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अभी-अभी&lt;br /&gt;एक लड़का कूदा पानी में&lt;br /&gt;बहा धार में&lt;br /&gt;एक दूसरे लड़के ने लांघा&lt;br /&gt;अपने ही अंदर के पुरुष को&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अभी-अभी&lt;br /&gt;जलतरंग बजाया उसने अद्भुत&lt;br /&gt;ओझल को प्रकट किया उसी ने&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अभी-अभी&lt;br /&gt;मैं धंसा तुम्हारी ही धमक में&lt;br /&gt;तुम धंसी मुझ में&lt;br /&gt;सन्नाटे को चीर&lt;/br&gt;&lt;/br&gt;&lt;br /&gt;&lt;hr size="4" align="center" noshade/&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;big&gt;ए&lt;/big&gt;म के मधु &lt;/strong&gt;की कविताएं विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं--&lt;em&gt;कथादेश, उद्भावना, वनिता, सरिता, हिंदुस्तान, प्रभात खबर &lt;/em&gt;आदि--में प्रकाशित तथा दूरदर्शन से समय-समय पर प्रसारित होती रही हैं। &lt;em&gt;समय के शिलालेख&lt;/em&gt; संग्रह के बाद &lt;em&gt;बुतों के शहर में&lt;/em&gt;, जो अभी-अभी प्रकाशित हुआ है, इनका दूसरा कविता संग्रह है। अन्य विधाओं में पत्रकारिता, रंगमंच तथा सिनेमा से गहरा जुड़ाव है। राष्ट्रीय फिल्म सेंसर बोर्ड के सदस्य भी रहे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_fc2wY2U36Kc/Sh1NSaHNWmI/AAAAAAAAAkY/zHUHDW-UoW4/s1600-h/Buton+Ke.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5340509711773817442" style="WIDTH: 150px; CURSOR: hand; HEIGHT: 220px" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_fc2wY2U36Kc/Sh1NSaHNWmI/AAAAAAAAAkY/zHUHDW-UoW4/s320/Buton+Ke.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;एम के मधु&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;h3&gt;इन दिनों&lt;/h3&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;इन दिनों&lt;br /&gt;मेरी परछाइयां हिल रही हैं&lt;br /&gt;इन दिनों&lt;br /&gt;शब्द मेरे गडमड हो रहे हैं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इन दिनों&lt;br /&gt;हर आहट पर&lt;br /&gt;मेरी आंखें&lt;br /&gt;खिड़की से फिसलकर&lt;br /&gt;दरवाजे तक चली जाती हैं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इन दिनों&lt;br /&gt;सड़क का शोर&lt;br /&gt;अनसुना लगता है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इन दिनों&lt;br /&gt;आकाश में उड़ती पतंगें&lt;br /&gt;लगता है मेरे लिए उड़ी है…&lt;br /&gt;कट कर गिरती हैं&lt;br /&gt;तो लगता है&lt;br /&gt;मेरे लिए गिरी हैं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इन दिनों&lt;br /&gt;बहुत अच्छा लगता है&lt;br /&gt;घुटर-घूं, घुटर-घूं करता&lt;br /&gt;पड़ोसी की दीवार पर&lt;br /&gt;कबूतर का जोड़ा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आधा रास्ता चल लेने पर भी&lt;br /&gt;मन बार-बार&lt;br /&gt;लौट जाने को करता है&lt;br /&gt;इन दिनों…&lt;/br&gt;&lt;/br&gt;&lt;hr size="4" align="center" noshade/&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;big&gt;यु&lt;/big&gt;वा कवि &lt;strong&gt;राकेश प्रियदर्शी &lt;/strong&gt;लंबे समय से रचना-कर्म में सक्रिय हैं। इनकी कविताएं विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित तथा आकाशवाणी पटना तथा दूरदर्शन से प्रसारित होती रही हैं। कविता के अलावा रेखांकन में भी इनकी गहरी रुचि है तथा इनके रेखांकन हंस समेत देश की स्तरीय पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए हैं। हिंदी के अलावा मगही में भी कविताएं लिखते हैं, तथा स्कूल पाठ्यक्रम में भी इनकी मगही कविता शामिल है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_fc2wY2U36Kc/Sh1NGspweqI/AAAAAAAAAkQ/4PidjHajMaI/s1600-h/Rakesh.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5340509510592133794" style="WIDTH: 150px; CURSOR: hand; HEIGHT: 220px" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_fc2wY2U36Kc/Sh1NGspweqI/AAAAAAAAAkQ/4PidjHajMaI/s320/Rakesh.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;राकेश प्रियदर्शी&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;h3&gt;कागज बीनता बच्चा&lt;/h3&gt;&lt;br /&gt;कूड़े के ढेर से कगज बीनता बच्चा&lt;br /&gt;पूरा का पूरा हिंदुस्तान की जीती-जागती तस्वीर है&lt;br /&gt;कागज बीनता बच्चा हमारी वर्तमान व्यवस्था&lt;br /&gt;की पोल खोल रहा है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उसके फटे-चीटे कपड़े देख कर भी हम&lt;br /&gt;स्वच्छ और विकसित होने की कर रहे हैं&lt;br /&gt;घोषनाएं अगले दशक के अंत तक&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उसकी भूख से सटी हुई आंतों और गालों पर&lt;br /&gt;सूखे हुए आंसुओं के निशान से&lt;br /&gt;हम लिख रहे हैं भारत का इतिहास&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कूड़े के ढेर से कागज बीनता बच्चा&lt;br /&gt;बाजार के विरुद्ध एक चीख है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हम कर रहे हैं जिस कूड़े के ढेर से घृणा&lt;br /&gt;वही उसका सपना है&lt;br /&gt;भारत का सपना&lt;br /&gt;भारत का भविष्य और कूड़े का ढेर!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुड़े के ढेर से कागज बीनता बच्चा&lt;br /&gt;कूड़े के ढेर पर सफ़ेदी की ऊंचाई नाप रहा है अपनी आंखों से&lt;br /&gt;कूड़े के ढेर की खोज में भटकता बच्चा&lt;br /&gt;कोसों नंगे पांव चलता है पीठ से बोरा लटकाए&lt;br /&gt;बोरे के वजन में उसके पूरे परिवार की&lt;br /&gt;रोटी की संख्या छिपी है&lt;br /&gt;कहां-कहां नहीं कूड़े के ढेर से मिलती है&lt;br /&gt;उसे रोटी की गंध!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कूड़े के ढेर से कागज बीनते बच्चे के बारे में सोचता हूं&lt;br /&gt;यह हम सब पर निर्भर करता है कि वह&lt;br /&gt;भविष्य का निर्माता बनेगा या विध्वंसकारक&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4103886293770258948-1068059424071517066?l=shabdsrijan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://shabdsrijan.blogspot.com/feeds/1068059424071517066/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.blogger.com/comment.g?blogID=4103886293770258948&amp;postID=1068059424071517066' title='6 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4103886293770258948/posts/default/1068059424071517066'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4103886293770258948/posts/default/1068059424071517066'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://shabdsrijan.blogspot.com/2009/05/blog-post_27.html' title='अपने कार्यालय के कमरे से…'/><author><name>योगेंद्र कृष्णा   Yogendra Krishna</name><uri>http://www.blogger.com/profile/17366269677319716325</uri><email>yogendrakrishna@yahoo.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' name='OpenSocialUserId' value='00615047406804366258'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_fc2wY2U36Kc/Sh1NogORFuI/AAAAAAAAAkg/lXg2qqX3Bv8/s72-c/Acche+Dino.jpg' height='72' width='72'/><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4103886293770258948.post-1279306054167957470</id><published>2009-05-12T12:44:00.024-04:00</published><updated>2009-05-14T12:05:56.765-04:00</updated><title type='text'>मुलाक़ात</title><content type='html'>&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_fc2wY2U36Kc/Sgmn8HqWzDI/AAAAAAAAAkI/6e7mcCLbgHw/s1600-h/photo-vishnu+prabhakar.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5334979884887755826" style="WIDTH: 133px; CURSOR: hand; HEIGHT: 173px" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_fc2wY2U36Kc/Sgmn8HqWzDI/AAAAAAAAAkI/6e7mcCLbgHw/s320/photo-vishnu+prabhakar.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:135%;color:#FFA500"&gt;मेरे जीने के लिए सौ की उमर छोटी है&lt;/span&gt;&lt;hr width="75%" size="6" noshade/&gt;&lt;strong&gt;&lt;i&gt;&lt;br /&gt;विष्णु प्रभाकर से हुई एक मुलाकात&lt;/br&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/i&gt;&lt;br /&gt;• &lt;strong&gt;&lt;span style="color:#FFA500"&gt;ओम निश्चल‍&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वह मई 2005 का कोई निपट दोपहरी वाला दिन था, जब मुझे वयोवृद्ध साहित्यकार विष्णु प्रभाकर जी से मिलने जाना था। साल के शुरू में सहारा समय ने उम्र को जीतते देश के ख्यातिप्राप्त बुजुर्गों की एक तालिका बना कर उनके जीवन के विभिन्न पक्षों पर रोशनी डाली थी। एम एफ हुसैन, शामलाल, यशपाल, नौशाद, बाबा आम्टे, ए के हंगल, हबीब तनवीर, लक्ष्मी सहगल, रजनी कोठारी, बिस्मिल्लाह खॉं, के के बिड़ला आदि के साथ विष्णु प्रभाकर का नाम भी उसमें शामिल था। मुजफ्फरनगर, उत्तरप्रदेश के कस्बे मीरापुर में 12 जून, 1912 को जन्मे विष्णु प्रभाकर का पिछले दिनों देहावसान हो गया। वे 97 वर्ष के थे। वे अभी होते तो 12 जून 2009 को 98वें वर्ष में प्रवेश करते। छोटी आयु में ही वे मुजफ्फरनगर से हिसार (हरियाणा) आ गए थे जो पहले पंजाब में था। जीवट के धनी विष्णु जी को बंधी-बंधायी नौकरी कभी रास नहीं आयी। हाईस्कूल करते हुए उन्हें एक नौकरी से जुडना पडा परन्तु यह सिलसिला देर तक न चला। बाद में भी कहीं भी लंबी अवधि तक वे टिक नहीं सके। गाँधी जी के जीवनादर्शो से प्रेम के कारण उनका रुझान कांग्रेस की तरफ हुआ तथा आजादी के दौर में बजते राजनीतिक बिगुल में उनकी लेखनी का भी अपना एक मिशन बन गया था जो आजादी के लिए प्रतिश्रुत और संघर्षरत थी। अपने लेखन के दौर में वे प्रेमचंद, यशपाल, जैनेन्द्र, अज्ञेय जैसे महारथियों के सहयात्री रहे, किन्तु रचना के क्षेत्र में उनकी अपनी एक अलग पहचान बनी। 1931 में हिन्दी मिलाप में पहली कहानी दीवाली के दिन छपने के साथ ही उनके लेखन का जो सिलसिला शुरू हुआ, वह आठ दशकों तक निरंतर सक्रिय रहा। नाथूराम शर्मा प्रेम के कहने से वे शरतचन्द्र की जीवनी आवारा मसीहा लिखने के लिए प्रेरित हुए जिसके लिए वे शरत को जानने के लगभग सभी स्त्रोतों, जगहों तक गए, बाँग्ला भी सीखी और जब यह जीवनी छपी तो साहित्य में विष्णु जी की धूम मच गयी। कहानी, उपन्यास, नाटक, एकांकी, संस्मरण, बाल साहित्य सभी विधाओं में प्रचुर साहित्य लिखने के बावजूद &lt;em&gt;आवारा मसीहा &lt;/em&gt;उनकी पहचान का पर्याय बन गयी। बाद में &lt;em&gt;अर्द्धनारीश्वर&lt;/em&gt; पर उन्हें बेशक साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला हो, किन्तु &lt;em&gt;आवारा मसीहा &lt;/em&gt;ने साहित्य में उनका मुकाम अलग ही रखा। उन पर लिखे &lt;em&gt;नया ज्ञानोदय &lt;/em&gt;के अपने एक संपादकीय में &lt;strong&gt;प्रभाकर श्रोत्रिय &lt;/strong&gt;ने ठीक ही लिखा था कि विष्णु जी साहित्य और पाठक के बीच स्लिप डिस्क के सही हकीम हैं। यही कारण है कि उनका साहित्य पुरस्कारों के कारण नहीं, पाठकों के कारण चर्चित हुआ है।&lt;/br&gt;&lt;br /&gt;हिंदी के वयोवृद्ध साहित्यकारों में विष्णु प्रभाकर का समवयस अब शायद ही कोई हमारे बीच विद्यमान हो। सुपरिचित कवि-गीतकार जानकीवल्लभ शास्त्री भी 94 वर्ष के हो रहे हैं तथा मुजफ्फरपुर में रहते हुए साहित्य-साधना में संलग्न हैं। उनसे मिलने लोग कभी कभार जाते रहते हैं। मूड में होते हैं तो बतियाते हैं। यों स्वास्थ्य बहुत अच्छा नहीं रहता।&lt;hr width="35%" size="8"noshade align="center"/&gt;&lt;blockquote&gt;&lt;span style="font-size:115%;color:#FFA500"&gt;अपनी सुदीर्घ आयु से लगभग एक शताब्दी का पर्याय बन चुके विष्णु प्रभाकर कोई अस्सी वर्षों से साहित्य में सक्रिय रहे तथा आखिरी दिनों से कुछ पहले तक वे सुबह 8 बजे अखबार पढ़ने के बाद लिखने-पढ़ने बैठ जाते थे। एक पूरी शताब्दी की हलचल को अपने भीतर समेटे विष्णु जी के निकट बैठें तो उनके चेहरे पर एक निष्काम आभा तैरती नज़र आती थी। यश, धन, लोभ तथा मानवीय दुर्बलताओं से बहुत हद तक अछूते विष्णु जी पाठकों के पत्रों का मनोयोग से जवाब लिखते हुए देखे जा सकते थे।&lt;/blockquote&gt;&lt;/span&gt;&lt;hr width="35%" size="8"noshade align="center"/&gt;कुछ वर्षों पूर्व गणतंत्र दिवस पर आमंत्रित होने के बावजूद अपने पुत्र के साथ राष्ट्रपति भवन में प्रवेश न मिल पाने से खिन्न मन घर लौटने पर जब वे यह निर्णय लेने को बाध्य हुए कि उन्हें मिला पद्मभूषण लौटा देना चाहिए तो वे अचानक कुछ दिनों सुर्खियों में रहे। पता चलने पर राष्ट्रपति ने जब उन्हें वाहन भेज कर बुलाया और असावधानीवश हुई त्रुटि के लिए क्षमा मांगी तो विष्णु जी ने अपनी पेशकश वापस ले ली।&lt;/br&gt;&lt;br /&gt;जागरण &lt;em&gt;पुनर्नवा &lt;/em&gt;के संयोजक कथाकार &lt;strong&gt;राजेन्द्र राव &lt;/strong&gt;जी का यह आग्रह था कि विष्णु जी से एक बातचीत करुँ तो मन असमंजस से घिर गया। पहला असमंजस तो यही कि जब ऐसा कोई प्रकरण या स्कूप मीडिया के सम्मुख आता है तो वह अचानक सक्रिय हो उठता है। अपनी मार्केटिबिलिटी के लिहाज से उसके लिए व्यक्ति से ज्यादा वह न्यूज वैल्यू महत्वपूर्ण है जो उसकी साख को बढ़ाता हो। इलेक्ट्रानिक मीडिया तिल को ताड़ बनाने में माहिर है। लिहाजा यह अनुमान लगा पाना असंभव नहीं था कि इस समय विष्णु जी कैसे इलेक्ट्रानिक व प्रिंट मीडिया के संवाददाताओं से घिरे होंगे और उनके न चाहते हुए भी उनका निजी अपमान, निजी अफसोस मलाल और क्षोभ के दायरे से छिटक कर राष्ट्रीय सुर्खियों का विषय बन जाएगा। इसलिए मैंने सोचा जब यह तूफान शांत हो तो उनसे बातचीत करना बेहतर रहेगा। यद्यपि वैसे भी लोग आए दिन उनसे मिलने जुलने, बातचीत करने के निमित्त आते ही रहते हैं तथा उनका घंटों समय खराब कर चले जाते हैं। ऐसे में फिर एक बातचीत, वही वही सवाल, प्रश्नों की झड़ी निश्चय ही एक वयोवृद्ध लेखक के लेखन और आराम के समय में एक व्यवधान ही बनेगा। यह सोच मन उद्विग्न रहा। फिर भी जब एकाधिक बार राजेन्द्र जी ने इस बाबत याद दिलायी तो उनसे मिलना अपरिहार्य हो उठा।&lt;/br&gt;&lt;br /&gt;पहले वे कुंडेवालान, अजमेरी गेट में रहते थे, पर इधर एक दशक से वे दिल्ली की एक कालोनी महाराणा प्रताप एन्क्लेव में आ गए थे। उनका हाल चाल जानने जब मैंने फोन किया तो पता चला वे हिंदी साहित्य सम्मेलन के निमंत्रण पर हैदराबाद गए हैं, जहॉं से वे लौटे तो कुछ दिनों अस्वस्थ रहे। फिर एक दिन उनकी सेहत और दिनचर्या की जानकारी चाही तो उनके पुत्र अतुल जी ने बताया कि वे अभी सुबह अखबार पढ़ रहे हैं। फिर डेढ़ दो बजे तक लिखने पढ़ने, पत्रों का उत्तर देने आदि का कार्य करेंगे। दो बजे भोजन के उपरांत पॉंच बजे तक आराम करेंगे। इसलिए उनसे या तो दोपहर से पहले मिला जा सकता था या अपराह्न पॉंच के बाद।&lt;/br&gt;&lt;br /&gt;मैं जब विष्णु प्रभाकर जी के घर महाराणा प्रताप एन्क्लेव पहुंचा, उस समय दोपहर के लगभग बारह बज रहे थे। बाहर धूप थोडी तीखी हो चली थी। मुख्य गेट खोल कर अंदर कमरे में दाखिल हुआ तो वे पालथी मारे लैंप की रोशनी में चिट्ठियों का उत्तर लिख रहे थे। इतनी वय में भी वे अपने पाठकों का ख्याल रखते हैं, यह जानकर मन को संतोष हुआ। अपना परिचय देते हुए उनका कुशल क्षेम जानने की जिज्ञासा की तो उन्होंने कहा, देखिए 93 बरस से ज्यादा का हो गया हूँ। छिहत्तर बरस लिखते हो गए। अब यह सब कठिन होता जा रहा है। काम नहीं होता। अखबार के अक्षर पढने में कम आते हैं। उम्र का असर है यह। फिर भी आपके मन में पाठकों के पत्रों के प्रति उत्साह बचा हुआ है। उत्साह ही नहीं, कोई भी पत्र अनदेखा, अनुत्तरित न चला जाए, इस बात का कितना ख्याल रखते हैं आप? कहने लगे, अब क्या कहूँ। नौजवान पाठक- पाठिकाएं दूर-दराज से पत्र लिखते हैं। कोई चीज पढी--किसी रचना ने उन्हें छुआ, उद्वेलित किया तो वे पत्र लिखने बैठ जाते हैं। उन्हें क्या मालूम कि मुझसे अब उत्तर नहीं दिया जाता। हाँ, कोई उत्तर लिखने वाला होता है तो बोल कर लिखाता भी हूँ, पर इसके लिए कोई नियमित रूप से आता भी नहीं। देखिए, जब तक निभा पाता हूँ, उत्तर देता रहूंगा। पर मैं चाहता हूं कि मेरे पाठक समझें कि अब मैं वृद्ध हो गया हूं--उनके पत्रों का उत्तर लिखने की सामर्थ्य मुझमें दिनोंदिन कम होती जा रही है। मैंने कहा भी कि वे चाहें तो कुछ पत्रों के उत्तर बोल दें तो मैं लिख देता हूँ, पर उन्होंने शालीनता से मना कर दिया। ऐसी स्थिति में लेखन के सिरे को नियमित कैसे रख पाते हैं? मैंने जानना चाहा तो उन्होंने कहा, भई, अब मुझे किसी यश की आकांक्षा तो है नहीं, धन की भी मुझे ज्यादा दरकार नहीं है, सब कुछ तो मिल चुका--वही बहुत है। हां, मैं शांति से अपनी आत्मकथा का चौथा खंड पूरा कर सकूं, इतनी मोहलत और एकांत ईश्वर से और चाहता हूं। वैसे तो वह अभी ही उठा ले तो मैं क्या कर सकता हूं। उन्होंने बताया कि लेख निबंध आदि के लिए एक व्यक्ति को वे पारिश्रमिक पर बुलाते हैं, बोल कर लिखाते हैं। पर यह भी अब नियमित रुप से नहीं हो पाता और रचनात्मक कार्य तो खुद ही करना प़ड़ता है। उसे बोल कर लिखाना संभव नहीं। जैनेन्द्र इस कार्य में निपुण थे----दशार्क और कई कृतियॉं उन्होंने बोल कर ही लिखवाई हैं। उन दिनों हाल ही में विष्णुकांत शास्त्री के निधन से वे आहत थे। बोले, शास्त्री जी सहृदय साहित्यिक व्यक्ति थे---मेरा उनसे साहित्यिक रिश्ता ही था, कभी राजनीति की चर्चा मैंने उनसे नहीं की। घंटों बतियाते थे वे। एक बार जब वे उत्तर प्रदेश के राज्यपाल थे तो कुछ लोग मेरे गॉंव हरियाणा से मेरे पास आए और बोले कि आपके तो राज्यपाल शास्त्री जी दोस्त हैं----उनसे गॉंव के स्कूल का उद्घाटन करा दीजिए। मैंने पहले तो मना किया पर फिर सोचा कि चलो गॉंव की तरक्की की बात है तो शास्त्री जी से कह देता हूँ। मैंने कहा तो वे सहमत हो गए। मेरे गॉंव आए, स्कूल का उद्घाटन किया और बहुत ही प्रभावी भाषण किया। मैं भी समारोह में था, बहुत सी बातें हुईं पर साहित्यिक-सांस्कृतिक ही----राजनीति पर न तो वे एक शब्द अपने भाषण में बोले न ही मुझसे उसकी कोई चर्चा की। प्रभाकर जी बोले, राजनीति में ऐसे लोग अब कम होते जा रहे हैं। मैं उन पर जल्दी ही एक लेख लिखूँगा। क्योंकि मेरे उनके संबंध राजनीतिक नहीं, साहित्यिक रहे हैं----उनकी सहृदयता का मैं ऋणी हूँ।&lt;/br&gt;&lt;br /&gt;इस जराजीर्ण स्वास्थ्य के चलते आत्मकथा का चौथा खंड कैसे पूरा करेंगे, पूछने पर वे संजीदा हो उठे। बोले, हफ्ते में तीन-चार दिन लोग भेंट करने-बातचीत करने के लिए आ जाते हैं- बातचीत से मैं थक जाता हूं। लिखने का समय ही नहीं मिल पाता। किसी गुमनाम-सी जगह चला जाऊँ तो शायद इसे पूरा कर सकूं । कहने लगे, अभी कल परसों की ही बात है, टी वी वाले चार-पाँच घंटे लगाकर गए। कोई मानदेय नहीं- समय की बरबादी अलग। टी. वी. वालों को तो अपने कार्यक्रम चलाने हैं, लोगों की सुविधा- असुविधा का ख्याल उन्हें कहां है। अखबारों से भी लोग अक्सर आते रहते हैं-मुझे खुद उनकी स्क्रिप्ट भी सुधारनी पडती है, पर पारिश्रमिक के नाम पर कुछ भी नहीं। एक बार एक टी. वी. चैनल वाले मेरा इंटरव्यू ले गए और बदले में किसी मशहूर होटल के खाने का कूपन दे गए कि वहां जाने पर 50 प्रतिशत की रियायत मिलेगी। अब वहां जब हजार रुपये का बिल आएगा तो पचास फीसदी काट कर भी तो पांच सौ देने पडेंगे। इससे तो मैं दस दिन खा लूंगा। तो यह हाल है!&lt;br /&gt;मोहन सिंह प्लेस का काफी हाउस कभी विष्णु प्रभाकर की मौजूदगी से गुलजार रहा करता था। पिछले लगभग दस वर्षो से वे वहां नहीं आ-जा पाते थे। वे जब भी काफी हाउस में दिखते, लेखकों के वृत्त से घिरे होते। खद्दर का कुर्ता और गाँधी टोपी दूर से ही दिख जाती। बतरस के धनी विष्णु जी उस दौर को याद कर भावुक हो उठते हैं। कभी लोहिया भी वहां आते थे, अन्य राजनेता भी। लोहिया से खूब बातें होती थीं। उनके भीतर देश को लेकर विलक्षण सपने थे। मोहन सिंह प्‍लेस स्थि‍त काफी हाउस न जाने की पीड़ा उन्‍हें सालती तो है, पर अपनी हालत से लाचार थे। बोले, मन तो होता है, लोग भी कहते हैं क‍ि कभी कभी तो आ जाया कीजिए, पर एक बार यहॉं से जाने-आने का किराया 75 रुपये लगता है। फिर शरीर भी साथ नहीं देता। इसलिए मेरे लिए शा‍रीरिक-आर्थिक दोनों दृष्टियों से वहॉं जा पाना मुश्किलतलब है। बाहर भी कम ही निकलता हूँ। अभी पिछले दिनों हैदराबाद गया था, हिंदी साहित्‍य सम्‍मेलन वालों के बुलावे पर। वहॉं से लगभग पचास हजार रुपये मिले। इससे छह-सात महीने का मेरा काम चल गया।&lt;/br&gt;&lt;br /&gt;बातचीत के दौरान उन्‍होंने पंडित नेहरू से होने वाली मुलाकातों को याद किया, इंदिरागॉंधी से भी। डॉ0 राजेन्‍द्रप्रसाद जी से भी उनके ताल्‍लुकात थे। एक बार, वे बताते हैं, डाक्‍टर राजेन्‍द्रप्रसाद जी के सम्‍मान में समारोह आयोजित हुआ था। उसमें पं0 नेहरू , डॉ राजेन्‍द्रप्रसाद, अन्‍य नेतागण साहित्‍यकार सभी उपस्थित थे। अंत में कलाकारों ने मंच पर उनसे मिलने की इच्‍छा व्‍यक्‍त की और मंच पर इकट्ठे आ खड़े हुए। पंडित नेहरू व डॉ राजेन्‍द्रप्रसाद जी से अनुरोध किया गया तो नेहरू जी बोले, क्‍या आप समझते हैं कि देश का प्रधानमंत्री मंच पर चल कर इन लोगों से मिलने जाएगा। वे कुछ नाखुश-से हुए कि तभी किसी ने कहा, नहीं, वे तो इसलिए एक साथ मंच पर आ खड़े हुए हैं क‍ि पंक्तिबद्ध होकर एक एक कर आपके निकट आकर आपसे मिल सकें, तब उन्‍होंने कहा, हॉं, तब तो ठीक है। विष्‍णु प्रभाकर जी ने ऐसे और बहुत से प्रसंगों की याद करते हुए तब के राजनीतिकों की सराहना की। हालॉंकि वे गॉंधीवादी थे, कॉंग्रेसी भी, किन्‍तु कॉंग्रेस के आपात्‍काल के विरोध में थे तथा जेल जाते जाते बचे थे।&lt;/br&gt;&lt;br /&gt;चूंकि बातचीत का कोई निश्चित क्रम बन नहीं पा रहा था और वे बीच बीच में पत्र भी लिखते जाते थे, मैंने चर्चा के सिरे को बढाते हुए आवारा मसीहा की बात उठायी। कहने लगे, निश्चय ही मुझे साहित्य में यह कृति जिंदा रखेगी। मैंने पूछा, बंगाल में इसका रिस्पांस कैसा रहा, तो बोले कुछ बहुत अच्छा तो नहीं। बांग्ला अनुवाद भी इसका हुआ, पर उसमें बांग्लाभाषियों ने ज्यादा दिलचस्पी नहीं दिखायी। हालांकि वे भीतर ही भीतर इस काम को रिकग्नाइज तो करते ही हैं।&lt;/br&gt;&lt;br /&gt;ब्यूरोक्रेसी और सरकारी तंत्र की बात छिडी तो उनके चेहरे पर आक्रोश और क्षोभ की लकीरें खिंच गयीं। उन्हें अपने मकान को छलछद्म से अपने नाम करा लेने वाले किरायेदार को बेदखल कराने के लिए सरकारी अहलकारों तक की गयी दौडधूप और बदले में मिलने वाले अपमान और झिडकियों की याद ताजा हो उठी। बोले, मकान बनाने पर कुछ दिनों के लिए उसे एक किरायेदार को रहने को दिया तो उसने भीतर ही भीतर विष्णु जी की अवस्था, लाचारी का लाभ उठाकर तथा डीडीए वालों से सांठगांठ कर उसे अपने काम करा लिया। सेल डीड और अन्य कागजात पर विष्णु जी के जाली हस्ताक्षर भी हो गए। डीडीए वालों से मिलने पर कोई सुनवाई नहीं हुई। डीडीए के अधिकारी यह मानने को तैयार ही नहीं हुए कि इसमें कोई जालसाजी हुई है, क्योंकि ये लोग पैसे ले चुके थे। यह मकान उन्होंने सस्ती के जमाने में चार-पांच लाख की लागत में बनवाया था। आज इसकी कीमत कई लाख होगी। विष्णु जी और उनके लडके ने मदद के लिए बहुतों से संपर्क किया पर किसी ने ध्यान न दिया। अंतत: पुलिस महकमे का एक इंस्पेक्टर काम आया। साहित्यिक रुचियों का होने के कारण उसने इस काम में दिलचस्पी ली, तब कहीं जाकर मकान खाली हो पाया। विष्णु जी ने बड़े क्षोभ से कहा, सभी सरकारी मशीनरी बिकी हुई है-सभी स्तर के कर्मचारियों के पैसे बँधे हैं।&lt;/br&gt;&lt;br /&gt;उन दिनों जब से पद्मभूषण लौटाने का प्रसंग चर्चा में आया, उन्हें कुछ व्यक्तियों के अभिनिंदक पत्र भी मिले। पद्मभूषण उन्हें भाजपा शासनकाल में मिला, जिस कारण कुछ लोग आरोप लगाते रहे कि उन्होंने यह पुरस्कार भाजपा से मैनेज किया है, जबकि विष्णु जी का मानना था कि उनका नाम तो साहित्य अकादमी से प्रस्तावित हुआ था और सांप्रदायिकता के मुद्दे पर वे अपने को भाजपा का विरोधी मानते हैं। यह और बात है कि भाजपा के भी शीर्ष नेताओं में अटल जी से उनसे निकट के संबंध थे। विष्णुकांत जी से भी थे। वे गुस्से से बोले, वैसे भी इस तमगे की बाजार में कोई कीमत तो है नहीं। मुझे क्या मिलने वाला है इससे? जो मिलना था, बहुत मिल चुका। अब मुझे किसी भी चीज की स्पृहा नहीं है। ऐसे अलंकरण से कहीं ज्यादा संतोषदायी बात मेरे लिए यह है कि मेरा लेखन चलता रहे। मैंने कहा कि कुछ लोग तो अपने नाम के पीछे पद्मश्री- पद्मविभूषण लगाने में गौरव समझते हैं तो उन्होंने कहा, वे लोग शायद नहीं जानते कि ऐसा करना जुर्म है। यह तो महज अलंकरण है, नाम और उपाधि का हिस्सा नहीं है। इस बीच उनकी पुत्रवधू चाय रख गयी थीं। उन्होंने मेरे साथ चाय पी और बिस्कुट भी लिया और पुन: पत्रों को पढने और उनके उत्तर देने में दत्तचित्त हो उठे थे। मैंने कैमरे से उनकी फोटो लेने की इजाजत चाही तो उन्होंने सिर उठाया। दो-तीन स्नैप के बाद वे फिर ध्यानमग्न हो गए। दोपहर के डेढ बज चुके थे। सुई दो की ओर अग्रसर थी। उनके स्नान व भोजन का समय हो चुका था। मैंने विदा लेने के पूर्व पूछना चाहा कि विधिवत बातचीत के लिए कब आऊँ। वे इस पर कोई उत्‍साह न दिखाते हुए बोले, यों मिलने के लिए कभी भी आ सकते हैं, पर बातचीत के निमित्‍त नहीं। बहुत बातचीत कर चुका हूँ मैं। वही वही बातें बार बार, इसलिए अब इसमें मेरी कोई दिलचस्‍पी नहीं है। यशेषणा से मुक्‍त विष्‍णु जी को देख कर मुझे शंभुनाथ सिंह के गीत की पंक्ति‍ याद हो आई। लगा जैसे विष्‍णु जी उन्‍हीं के शब्‍दों में कहना चाहते हों---मेरे जीने के लिए सौ की उमर छोटी है। पर नियति देखिए, सौ के होने के दो बरस पहले ही वे इस दुनिया से विदा हो गए। यदि वे दो बरस और हम सबके बीच रहते तो जीते जी जन्‍मशताब्‍दी मनाने वाले पहले हिंदी साहित्‍यकार होते।&lt;hr width="2%" size="8" color="#FFA500"/&gt;&lt;span style=font-size:"50%"&gt;&lt;br /&gt;• डॉ. ओम निश्‍चल, जी-1/506 ए, उत्‍तम नगर, नई दिल्‍ली-110059&lt;br /&gt;• फोन: 09955774115, ई मेल omnishchal@yahoo.co.in&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4103886293770258948-1279306054167957470?l=shabdsrijan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://shabdsrijan.blogspot.com/feeds/1279306054167957470/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.blogger.com/comment.g?blogID=4103886293770258948&amp;postID=1279306054167957470' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4103886293770258948/posts/default/1279306054167957470'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4103886293770258948/posts/default/1279306054167957470'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://shabdsrijan.blogspot.com/2009/05/blog-post_12.html' title='मुलाक़ात'/><author><name>योगेंद्र कृष्णा   Yogendra 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आज की पत्रकारिता पर भी गौर कर सकते हैं, जहां वैश्विक स्तर पर ख़बरें बेची और खरीदी जा सकती हों और ख़बरों का विश्लेषण तथा हमारे विचार भी प्रायोजित हो रहे हों।&lt;/em&gt;  --योगेंद्र कृष्णा&lt;br /&gt;&lt;/blockquote&gt;&lt;hr size="1.5" width="20%" align="center"/&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:180%;"&gt;अ&lt;/span&gt;भी हाल में इस नाम की एक पुस्तक साहित्य-मंडल देहली ने प्रकाशित की है। इसके लेखक हैं श्री चतुरसेन जी शास्त्री। शास्त्री जी यशस्वी लेखक हैं, उनकी शैली में ओज है, आकर्षण है, तेज है, पर दुर्भाग्यवश वह कभी-कभी इन गुणों का दुरुपयोग किया करते हैं। थोड़े से धन और थोड़े से यश के लोभ से ऐसी रचनाएं कर डालते हैं, जिनसे सनसनी के साथ देश में सांप्रदायिक द्वेष को उत्तेजित करने की मनोवृत्ति साफ झलकती है। ऐसी जहरीली पुस्तकें बिकती ज़्यादा हैं, इसमें कोई संदेह नहीं। मुसलमानों ने हिंदुओं पर जो अत्याचार किए, उसका विषद और एकांगी विस्तार दिखाकर सांप्रदायिक मनोवृत्ति वाली हिंदू जनता में मुसलमानों के प्रति द्वेष बढ़ाया जा सकता है। यह ऐसा मुश्किल काम नहीं, लेकिन क्या इस द्वेष को भड़काना एक यशस्वी और जिम्मेदार लेखक की मर्यादा के अनुकूल है? दोष सभी धर्मों में निकाले जा सकते हैं। क्या हिंदू धर्म दोषों से खाली है? अपने-अपने समय में प्रभुता पाकर अत्याचार भी सभी जातियों ने किये हैं, लेकिन उन गई-बीती बातों को कीने की तरह पालना और उनका प्रचार करके जनता में द्वेष फैलाना, राष्ट्र को सर्वनाश की ओर ले जाना है।&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#ff9900;"&gt;&lt;hr width="30%" size="8"  align="center" noshade /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="color:#ff9900;"&gt;&lt;span style="font-size:100%;"&gt;धार्मिक कट्टरता से भूमंडल को जितनी यातनाएं भोगनी पड़ी हैं, उनसे इतिहास के पोथे भरे पड़े हैं। इस लिहाज से क्या ईसाई, क्या बौद्ध, क्या हिंदू सभी समान रीति से अपराधी हैं। उसमें से किसी एक धर्म को छांट लेना और सारी बुराइयां उसी में दिखाना,अस्वस्थ और पक्षपातपूर्ण मन का परिचय देता है।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#ff9900;"&gt;&lt;hr width="30%" size="8" align="center" noshade /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;'रंगीला रसूल' के ढंग की पुस्तकों से देश का क्या कल्याण हो सकता है? &lt;em&gt;&lt;span style="color:#ff9900;"&gt;इस्लाम का विष-वृक्ष &lt;/span&gt;&lt;/em&gt;के पृष्ठ पैंतालीस पर कुरान में लिखी हुई बातों के विषय में कहा गया है कि कुरान के अनुसार--&lt;br /&gt;&lt;ul&gt;&lt;br /&gt;&lt;li&gt;खुदा आदमी को बहकाता है।&lt;/li&gt;&lt;br /&gt;&lt;li&gt;खुदा सबसे बड़ा कपटी है।&lt;/li&gt;&lt;br /&gt;&lt;li&gt;खुदा ने प्रत्येक शहर में पापियों के सरदार छोड़ रखे हैं, ताकि वे लोगों को बहकाते और धोखा देते रहें।&lt;/li&gt;&lt;br /&gt;&lt;li&gt;खुदा घात में लगा रहता है।&lt;/li&gt;&lt;br /&gt;&lt;li&gt;बिहिश्त में शराब पीने को, मांस खाने को, तथा सत्तर हूरें और लौंडे मौज करने को मिलेंगे।&lt;/li&gt;&lt;br /&gt;&lt;/ul&gt;&lt;br /&gt;हम नहीं समझते कि इस तरह की लचर, बेबुनियादी, धोखे में डालने वाली बातों के प्रचार का इसके सिवा और क्या उद्देश्य है कि हिंदुओं में इस्लाम और मुसलमानों के प्रति घृणा और द्वेष पैदा किया जाए। ऐसी मनोवृत्ति वालों से इश्वर इस देश की रक्षा करे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसके आगे चलकर शास्त्री जी ने इर्विन, एलफिंस्टन आदि योरोपियन लेखकों की रचनाओं के उद्धरण देकर इस मत का समर्थन करने की चेष्टा की है कि मुहम्मद मनुष्य जाति का भयानक शत्रु था और यह कुरान में मुर्खता के सिवा और कुछ नहीं है। योरोप के इतिहासकारों ने इस्लाम को इसलिए कलंकित किया कि वे यूनान और बलकान आदि देशों से तुर्कों को निकालना चाहते थे। इस्लाम का प्रभुत्व उनकी आंखों में कांटे की तरह खटकता था। उनके कथन को प्रमाण मानकर, यहां नकल करना किसी तरह भी स्तुत्य नहीं कहा जा सकता। हम स्वयं संप्रदायों के वकील नहीं हैं। धार्मिक कट्टरता से भूमंडल को जितनी यातनाएं भोगनी पड़ी हैं, उनसे इतिहास के पोथे भरे पड़े हैं। इस लिहाज से क्या ईसाई, क्या बौद्ध, क्या हिंदू सभी समान रीति से अपराधी हैं। उसमें से किसी एक धर्म को छांट लेना और सारी बुराइयां उसी में दिखाना, अस्वस्थ और पक्षपातपूर्ण मन का परिचय देता है। यह पुस्तक इस्लाम का इतिहास है। किसी जाति या धर्म का इतिहास लिखना बुरा नहीं, यदि निष्पक्ष होकर, पूरे अध्ययन और खोज से, सत्यासत्य का पूरा विचार करने और उसके साथ सौजन्य का पालन करते हुर लिखा जाए। इस पुस्तक का नाम ही बतला रहा है कि इसकी रचना किस भाव की प्रेरणा से हुई है, और पुस्तक के कवर पर जो रंगीन चित्र दिया है, वह तो लेखक के विषैले मनोभाव की नंगी तस्वीर है। यह इस्लाम का विष-वृक्ष रूपी मन है। इस पुस्तक में अधिकांश उन्हीं अंग्रेजी इतिहासों से नकल किया गया है, जिनमें मुसलमानों के प्रति काफी द्वेष और ईर्ष्या का भाव भरा हुआ है, जैसे बर्नियर और मनूची आदि। वही बादशाहों के महल के अंदर की बातें, मीनाबाज़ार के कपोलकल्पित किस्से, इस पुस्तक के आधार हैं। न जाने किस प्रमाण से पृष्ठ एक सौ तीन पर लिखा गया है कि मुगल बादशाह सांप पालते थे और जिस सरदार से उन्हें शंका होती थी, उसे सांप से डसबा देते थे, या जहरीले कपड़े पहना कर उसकी जीवन-लीला समाप्त कर देते थे। हम कहते हैं मान लो यह ठीक भी है, तो इससे क्या? हिंदुओं के राजा भी तो विष-कन्याएं रखते थे और उनके द्वारा अपने शत्रुओं को यमराज के घर भेज देते थे। आज इन बातों पर आक्षेप करने का क्या अर्थ है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;श्री चतुरसेन जी हमारे मित्र हैं। वह विद्वान हैं, मनस्वी हैं, उदार हैं, हम उनसे प्रार्थना करते हैं कि ऐसी जटिल और द्रोह भरी रचनाएं लिख कर अपनी प्रतिभा को और हिंदी भाषा को कलंकित न करें और राष्ट्र में जो चाहे द्रोह और द्वेष पहले से ही फैला हुआ है, उस बारूद में आग न लगाएं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:85%;"&gt;(संपादकीय : &lt;em&gt;जागरण&lt;/em&gt;, 24 जुलाई, 1933)&lt;/span&gt; &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4103886293770258948-3971111475030230774?l=shabdsrijan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://shabdsrijan.blogspot.com/feeds/3971111475030230774/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.blogger.com/comment.g?blogID=4103886293770258948&amp;postID=3971111475030230774' title='7 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4103886293770258948/posts/default/3971111475030230774'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4103886293770258948/posts/default/3971111475030230774'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://shabdsrijan.blogspot.com/2009/05/blog-post.html' title='इस्लाम का विष-वृक्ष'/><author><name>योगेंद्र कृष्णा   Yogendra Krishna</name><uri>http://www.blogger.com/profile/17366269677319716325</uri><email>yogendrakrishna@yahoo.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' name='OpenSocialUserId' value='00615047406804366258'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_fc2wY2U36Kc/SfxFlsbVlbI/AAAAAAAAAkA/kWqi-eJqdsI/s72-c/Premchand02%5B1%5D.jpg' height='72' width='72'/><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>7</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4103886293770258948.post-1383419613712625547</id><published>2009-04-26T04:22:00.023-04:00</published><updated>2009-05-09T14:16:54.332-04:00</updated><title type='text'>कविता के मर जाने की ख़बर...</title><content type='html'>&lt;hr width="96%" size="3" noshade /&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="left"&gt;योगेंद्र कृष्णा&lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:180%"&gt;ऐ&lt;/span&gt;से विकट एवं अराजक समय में--जबकि जीवन के सारे आयाम,सारे अनुशासन और इसलिए साहित्य भी छद्म आकांक्षाओं, कृत्रिम सरोकारों, जटिलताओं एवं महत्त्वाकांक्षी दांव-पेंच से निरंतर आक्रांत हैं--हमें कुछ ऐसे ठोस और प्रभावी तिनकों की फिर भी जरूरत है जो हमें एक सहज मनुष्य बने रहने में हमारी मदद कर सके, और इस तरह हमें अपने छद्म, अपनी चालाकियों, अपनी कृत्रिमताओं और अपने ही द्वारा विरूपित अपनी छवियों को पहचानने के पर्याप्त अवकाश और औज़ार उपलब्ध करा सके। बाजार और उपभोक्तावाद में स्थगित होती जिंदगी के भयावह परिदृश्य में भी कविता ही हमें ज्यादा से ज्यादा आदमी बने रहने का प्रलोभन देती प्रतीत होती है. और यही हमारी विरूपित छवियों की शिनाख्त कर हमें मुक्त करने की आश्वस्ति भी प्रदान करती है. &lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;लेकिन शायद कुछ लोग ऐसा मानने के लिए तैयार न हों, जैसा कि राजेंद्र यादव जी बड़ी उत्सवधर्मिता के साथ जोर-शोर से यह कहते सुने-पढ़े जा रहे हैं कि `यह कविता से मुक्ति की सदी है´। और अगर सचमुच ऐसा है तो यह सदी उत्सव की नहीं, मातम की होगी। यह केवल कविता से मुक्ति की नहीं, बल्कि उन सारे उदात्त मूल्यों से मुक्ति की सदी होगी जिनसे कविता--और मूलत: कविता ही--सदियों से संपोषित-समृद्ध होती रही है। &lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;मेरा निवेदन तो सिर्फ इतना है कि यह राजेंद्र जी या आपके द्वारा बहुत जल्दबाजी में कर लिया गया यक़ीन है कि कविता मर गई! लेकिन इस निराशाजनक परिदृश्य में भी कविता के विस्तृत फलक पर ऐसे  अल्पसंख्यक कवि-लेखक जरूर मौजूद हैं जो कविता के मर जाने की इस खबर पर पूरे संदेह के साथ सक्रिय हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यहां &lt;span style="color:#ff9900;"&gt;कुंवर नारायण&lt;/span&gt; जी की ये काव्य-पंक्तियां कितनी प्रासंगिक हो उठती हैं :&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff9900;"&gt;एक बार खबर उड़ी कि&lt;br /&gt;कि कविता अब कविता नहीं रही&lt;br /&gt;और यूं फैली&lt;br /&gt;कि कविता अब नहीं रही!&lt;br /&gt;यकी़न करने वालों ने यक़ीन कर लिया&lt;br /&gt;कि कविता मर गई,&lt;br /&gt;लेकिन शक करने वालों ने शक किया&lt;br /&gt;कि ऐसा हो ही नहीं सकता&lt;br /&gt;और इस तरह बच गई कविता की जान&lt;br /&gt;ऐसा पहली बार नहीं हुआ&lt;br /&gt;कि यक़ीनों की जल्दबाज़ी से&lt;br /&gt;महज़ एक शक ने बचा लिया हो&lt;br /&gt;किसी बेगुनाह को&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size:85%;"&gt;( कुंवर नारायण / यक़ीन की जल्दबाज़ी से )&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन शायद कविता से मुक्ति की यह घोषणा या खबर कविता के विरुद्ध कोई सुनियोजित या सार्थक बयान नहीं है, बल्कि आज कविता के नाम पर लिखी जा रही अनर्गलों और अत्यंत साधारण कवित-विवेक और अखबारी कतरनों से निर्मित कविताओं के आतंक से घबराई हुई एक बेबस चीख-सी है. कविता का यह आतंक आज कई स्तरों पर महसूस किया जा रहा है. साहित्य में आज साधारण के वर्चस्व ने भी हमें आतंकित कर रखा है. साधारण और अनर्गल के वर्चस्व को बनाए रखने में भरपूर मदद करते साहित्य के आधुनिक कारपोरेट मठाधीशों ने भी साहित्य और समाज का कम अहित नहीं किया है. इनमें से कुछ तो साहित्य को बाजार में बिकाऊ नारों-इश्तहारों की तरह भी उपयोग में लाने से परहेज नहीं करते, क्योंकि इन्हें तो हड़बड़ी है...बिना कौशल, बिना प्रतिभा, बिना साधना और सर्वोपरि बिना अंत:करण के सब कुछ पा लेने की... वैसे ही जैसे कारपोरेट जगत में सत्यम और एनरॉन जैसी कंपनियों के शीर्ष पर बैठे सफेदपोश बुद्धिजीवियों को हड़बड़ी होती है सीधे शिखर पर पहुंचने की... पूरी जिंदगी समर्पित कर देने के बाद भी जो काम अधूरा रह जा सकता है, वे तो उसे रातों-रात कर गुजरने की ख्वाहिश पाले मंच के सधे कलाकार-बहुरूपिए हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;काश उन्हें ऐसी आपाधापी और हड़बड़ी नहीं होती तो शायद समझ पाते :&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff9900;"&gt;...उसे कोई हड़बड़ी नहीं&lt;br /&gt;कि वह इश्तहारों की तरह चिपके&lt;br /&gt;जुलूसों की तरह निकले&lt;br /&gt;नारों की तरह लगे&lt;br /&gt;और चुनावों की तरह जीते&lt;br /&gt;वह आदमी की भाषा में&lt;br /&gt;कहीं किसी तरह जिदा रहे बस&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size:85%;"&gt;( कुंवर नारायण / कविता )&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff9900;"&gt;बहुत कुछ दे सकती है कविता&lt;br /&gt;बहुत कुछ हो सकती है कविता&lt;br /&gt;जिंदगी में&lt;br /&gt;अगर हम जगह दें उसे&lt;br /&gt;जैसे फूलों को जगह देते हैं पेड़&lt;br /&gt;जैसे तारों को जगह देती है रात...&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size:85%;"&gt;( कुंवर नारायण / कविता की जरूरत )&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size:180%;"&gt;सा&lt;/span&gt;हित्य की दूकान चलाने वालों तथा उपलब्धि की सुविधाजनक रास्तों-सीढ़ियों की तलाश में भटकती अतृप्त बेचैन आत्माओं और अपने लिखे पर आत्ममुग्ध साहित्यकारों के लिए निर्मल वर्मा की यह सलाह भी कम महत्वपूर्ण नहीं  है :&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;...साहित्य अन्य अनुशासनों से बहुत अलग है-- वहां कोई सीधा रास्ता निर्दिष्ट सत्य की ओर नहीं जाता, वहां अपने ही मन के अंधेरे गलियारों में भटकना पड़ता है. यहां यदि पैर लड़खड़ाते हैं तो कोई ऐसा संबल नहीं जो आपको संभाल सके. यदि संबल की तलाश हो, तो हमें साहित्य की शरण में नहीं जाना चाहिए-- वहां संदेह और भी सघन होगा, अंधेरा और भी अंधकारपूर्ण, तृष्णा और भी अधिक तृष्णाकुल. साहित्य में हम अपना सत्य केवल अस्तित्व के चरम छोर पर जाकर ही पा सकते हैं और चूंकि दुनियावी सुविधाओं के बीच हम वहां जाने का खतरा नहीं उठाना चाहते, साहित्य यह जोखिम हमारे लिए उठाता है. इसलिए हमें यह गर्व नहीं करना चाहिए कि हम साहित्य को कुछ देते हैं. हम जो कुछ लिखते हैं एक तरह से इस ऋण से उऋण होने का विनम्र प्रयास करते हैं, जो हमने होमर, व्यास, शेक्सपियर और तुलसीदास, दॉस्तोयवस्की और तॉल्सतॉय जैसे लेखकों से प्राप्त किया है. क्या हम कभी कल्पना कर सकते हैं कि उन्होंने जो दुनियाएं हमारे लिए रची हैं उनके बिना हमारी यह दुनिया कैसा अंतहीन मरुस्थल बन जाती?&lt;br /&gt;&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;लेकिन &lt;span style="color:#ff6600;"&gt;&lt;a href="http://www.shvoong.com/books/1795926-nirmal-verma-profile/"&gt;&lt;strong&gt;निर्मल वर्मा&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;/span&gt; या &lt;span style="color:#ff6600;"&gt;&lt;strong&gt;कुंवर नारायण&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt; जैसी शख्सियतों का कोई असर संवेदनहीन समाज पर नहीं हो सकता. संकट का एक समय वह होता है जब हम अपने भीतर नैतिकता को लेकर अंतर्द्वंद्वों से मुठभेड़ कर रहे होते हैं या फिर अपने बाहर के सत्ता केंद्रों से टकरा रहे होते हैं... यहां तो न कोई अंतर्द्वंद्व है और न कोई संघर्ष--बल्कि अनैतिकता और अराजकता के पक्ष में खड़े वयस्क होते एक संपूर्ण रूप से निर्द्वंद्व और संवेदनहीन समाज से हम टकराने को विवश हैं...और जहां इस बहुसंख्यक समाज को नेतृत्व प्रदान करने की होड़ में साहित्य पत्रकारिता की सांस्थानिक कमान संभाले कुछ बहुरूपिए अपने निजी झगड़ों विवादों को पूरी निर्लज्जता के साथ निपटाते हुए अपने शिष्यों-अनुयायियों को भेंड़ बकरियों की तरह हांक रहे हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:180%;"&gt;श&lt;/span&gt;ब्द और समाज पर गहराती इस धुंध में भी अनेक युवा कवि शब्द की खो रही गरिमा और मूल्य को अपनी-अपनी तरह से पुनर्वासित करने की दिशा में सक्रिय दिखते हैं. हाल में प्रकाशित जिन कुछ युवा कवियों की कविता-पुस्तकों ने संयोग से मेरी अध्ययन मेज पर अपनी जगहें बना रखीं हैं उनमें अनीता वर्मा की रोशनी के रास्ते पर, नीलेश रघुवंशी की अंतिम पंक्ति में, निरंजन श्रोत्रिय की जुगलबंदी तथा आशुतोष दुबे की यक़ीन की आयतें शामिल हैं. इन्हीं कविता पुस्तकों से गुजरते हुए मैंने यहां अपनी कुछ फुटकर प्रतिक्रियाएं व्यक्त की हैं. शायद कहने की जरूरत नहीं कि यह युवा कविता के परिदृश्य के आकलन का नहीं, बल्कि कविता की मृत्यु की खबर पर संदेह को और भी सघन करने का प्रयास है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जटिल से जटिलतर होते जीवन के बीच गहरी मूल्यवान सहजता और कोमलता की तलाश, निजता की सीमाओं का अतिक्रमण कर सार्वजनीन अनुभवों की दिशा में संवेदना का विस्तार इन कविताओं के प्रस्थान विंदु बन कर उभरते हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हमारे जीवन में स्वाभाविक सहजता और सरलता के निरंतर अभाव के गहरे अहसास की शिनाख्त अनीता वर्मा की कविताओं में की जा सकती है. जो चीजें जितनी ही सरल और सहज हैं वे उतनी ही गहरी और मूल्यवान भी हैं... नैसर्गिक सहजता और सरलता उतनी आसान भी नहीं हैं जितनी वह दिखती हैं. गहन अंधकार में भी उम्मीद की उजली किरणें अनीता की कविताओं की विशिष्टता है. देखें उनकी इन पंक्तियों को :&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff9900;"&gt;हवा और पानी सरल हैं&lt;br /&gt;जब तक वे सांस और प्यास नहीं बन जाते&lt;br /&gt;और मनुष्य के रुदन को कैसे देखा जाए&lt;br /&gt;वह सिर्फ आंसू नहीं है&lt;br /&gt;उसमें हर बार नए सिरे से दिखता है एक पूरा जीचन&lt;br /&gt;फूल और फल सरल हैं&lt;br /&gt;लेकिन कितनी गहराइयां लांघ कर वे आए हैं ऊपर&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size:85%;"&gt;( अनीता वर्मा / सरलता )&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color:#ff9900;"&gt;इंसानों से भरी-पूरी दुनिया में&lt;br /&gt;मैं खोजती हूं एक मनुष्य&lt;br /&gt;जो बाशिंदा हो इस मृत्युलोक का&lt;br /&gt;धरती पर आए हुए पहले नि:स्वार्थ प्राणी की तरह...&lt;br /&gt;ऐसे मनुष्य को खोजना&lt;br /&gt;एक भ्रम का पीछा करना है&lt;br /&gt;एक ऐसा भ्रम जिसे मैं सत्य मानती हूं&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size:85%;"&gt;(अनीता वर्मा / मैं खोजती हूं )&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff9900;"&gt;एक पेड़ को पेड़ होकर ही जाना जा सकता है&lt;br /&gt;उसकी धूप और कोमलता को&lt;br /&gt;उसके रंध्रों से होकर गुजरना&lt;br /&gt;आकाश को अपने ऊपर समझने की तरह है&lt;br /&gt;( अनीता वर्मा / अपना पेड़ )&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सोचती हूं एक फूल को कैसे समझा जाये&lt;br /&gt;क्या यह संभव है फूल में बदले बिना...&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size:85%;"&gt;(अनीता वर्मा / देखते हुए )&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:180%;"&gt;ह&lt;/span&gt;मारा समाज जितना ही मूल्यहीन होगा, वस्तुएं उतनी ही कीमती. कीमती वस्तुओं के इस मूल्यविहीन बाजार में हमें लूटा जा रहा हो, हमें लुट जाने का अहसास भी हो और हम कुछ कर नहीं सकते हों तो समझ सकते हैं कि बाजार ने धीरे-धीरे हमें अपनी गिरफ्त में लेकर मानसिक रूप से कितना पंगु बना डाला है. यहां बाजार द्वारा लूटे जाने का एक और अत्यंत निर्मम और विश्वासघाती तरीका गौरतलब है. शिखर पर दिखती सत्यम जैसी कंपनियों के देशी-विदेशी हजारों लाखों कर्मी रातों-रात सड़क पर आ जाते हैं...और हम कुछ कर नहीं सकते! यह समाज के कुछ सफेदपोश बुद्धिजीवियों द्वारा लाखों सामान्य जीवन की कीमत पर रातों-रात यश-समृद्धि और शिखर पा लेने की खूनी और लोलुप होड़ की दुष्परिणति नहीं तो और क्या है!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अनीता वर्मा अपनी कविता बाजार की इन पंक्तियों में अपने बचपन के बाजार को अकारण ही याद नहीं करतीं :&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff9900;"&gt;इस बाजार में एक चीज के साथ दूसरी चीज मुफ्त नहीं है&lt;br /&gt;जैसा कि चलन है इन दिनों का&lt;br /&gt;यह सुंदर तारिकाओं के साबुन नहीं बेचता&lt;br /&gt;अर्द्धनग्न सुंदरता नहीं बेचता....&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यहां बिना जरूरत कोई कुछ नहीं खरीदता&lt;br /&gt;यहां आकर नहीं होता लुटे-पिटे होने का अहसास&lt;br /&gt;यह चलकर नहीं आता हमारे घरों तक....&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size:85%;"&gt;( अनीता वर्मा / बाजार )&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff9900;"&gt;आशुतोष दुबे&lt;/span&gt; की कविताएं सामान्य पाठकों के लिए प्रथम दृष्टया थोड़ी अबूझ, थोड़ी जटिल, थोड़ी वायवीय प्रतीत हो सकती है. लेकिन बाद के पाठ में आपका श्रम बेकार नहीं जाता--वे कई स्तरों पर खुलती हुई आपको चकित भी करती हैं. कविता में सपाटबयानी के प्रतिकूल वे एक ऐसी भाषा और शिल्प रचते हैं जो आपसे थोड़ी अतिरिक्त संवेदना, बौद्धिकता और संयम की मांग करते हैं. आशुतोष की कविताओं की गहरी और बारीक संवेदनाएं हमें जीवन और जगत के रिश्ते को देखने-समझने की नई दृष्टि प्रदान करती हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कवि को पता है कि जीवन को बार-बार दूसरों के लिए खाली कर देना ही जीवन का मर्म है. एक अच्छा इंसान होना कवि होने की पहली शर्त भी है. देखें उनकी इन पंक्तियों को :&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff9900;"&gt;खुद को खाली कर देने के बाद&lt;br /&gt;पेड़ की तरह&lt;br /&gt;प्रतीक्षा कर रहा हूं&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size:85%;"&gt;( आशुतोष दुबे / हो रहा हूं )&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff9900;"&gt;अनीता वर्मा&lt;/span&gt; की कविताओं के संदर्भ में बाजार के दांव-पेंच और प्रलोभनों की जो चर्चा मैंने की है, उस फरेब को आशुतोष भी बखूबी पहचानते हैं :&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff9900;"&gt;प्रलोभन की उकसाती इबारत के नीचे&lt;br /&gt;बारीक फरेबी हर्फों में लिखा है&lt;br /&gt;शर्तें लागू&lt;br /&gt;जो बहुत गौर से देखने पर ही नजर आता है&lt;br /&gt;शर्तें तो फिर भी नजर नहीं आतीं&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size:85%;"&gt;( आशुतोष दुबे / शर्तें लागू )&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;जीवन-मृत्यु, सुख और दुख को देखने-परखने की आशुतोष की शैली और संवेदना उन्हें अपनी अभिव्यक्ति में &lt;span style="color:#ff9900;"&gt;निर्मल वर्मा&lt;/span&gt; की शैली के बहुत करीब लाती है :&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff9900;"&gt;तालाब में डूबते हुए&lt;br /&gt;उसने सोचा&lt;br /&gt;उसके साथ उसका दुख भी डूब जाएगा...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कहा जा सकता है&lt;br /&gt;कि वह जलाशय दरअसल एक दुखाशय था&lt;br /&gt;जहां हल्के और भारी&lt;br /&gt;बड़े, छोटे और मझोले दुख तैरते रहते थे...&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:85%;"&gt;( आशुतोष दुबे / जलाशय )&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff9900;"&gt;डर, पृथ्वी के इर्द-गिर्द&lt;br /&gt;एक उपग्रह की तरह&lt;br /&gt;मंडराता है&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size:85%;"&gt;( आशुतोष दुबे / जलाशय )&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff9900;"&gt;निरंजन श्रोत्रिय&lt;/span&gt; की कविताएं भी हमें जीवन में गहरी संवेदना और कोमलताओं के प्रति आस्थावान बनाती हैं. शिल्प की नैसर्गिक सहजता के साथ कठिन और भयावह समय को साधने की आकांक्षा निरंजन की कविताओं की विशिष्टता है. और यह उनकी कविता जुगलबंदी में ही नहीं उनकी अन्य कविताओं में भी लक्ष्य की जा सकती है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff9900;"&gt;फिलहाल&lt;br /&gt;जबकि सारे जाहिल लोग&lt;br /&gt;थक कर सोये हैं&lt;br /&gt;नींद से लड़ता कवि&lt;br /&gt;लिखता एक आसान-सी कविता&lt;br /&gt;कठिन समय पर&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size:85%;"&gt;( निरंजन श्रोत्रिय / कठिन समय की कविता )&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;निरंजन की लंबी कविता &lt;span style="color:#ff9900;"&gt;जुगलबंदी&lt;/span&gt; प्रतिकूलताओं से भरे इस कठिन समय में भयावह हिंसाओं और दु:स्वप्नों से उबरने के लिए जीवन में एक ऐसी समन्वयकारी दृष्टि और मानवीय सौंदर्य को प्रतिष्ठापित करती है जो क्रूरताओं और हिंसा के विरुद्ध कोमलताओं और मानवीय संवेदना की पक्षधर है. यह कविता आज पूरे विश्व में घट रही हिंसा और अमानवीयता की घटनाओं के विरुद्ध एक विवेकशील मानवीय प्रस्तावना और प्रार्थना की तरह है... अपनी संवेदना में इतनी नाजुक कि अपने ही समय की कठोरता से टकराकर लहूलुहान होती हुई, और फिर भी अपनी ही आंतरिक ऊर्जा से उठ खड़ी होती हुई...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff9900;"&gt;जुगलबंदी नहीं यह प्रार्थना थी दरअसल&lt;br /&gt;कि लहलहा उठें मुरझाई फसलें&lt;br /&gt;बहने लगें झरने सदियों से सूखे&lt;br /&gt;भर जाएं उजास से अंधेरी सुरंगें दुनिया की&lt;br /&gt;स्पंदन होने लगे पत्थरों में&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size:85%;"&gt;( निरंजन श्रोत्रिय / जुगलबंदी )&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff9900;"&gt;नीलेश रघुवंशी&lt;/span&gt; की कविताएं आशुतोष दुबे की कविताओं की तरह बहुत कोमल या वायवीय संसार से अपना रिश्ता नहीं जोड़तीं. वे सामान्य जन-जीवन के स्वप्न की तलाश अपने निर्वैयक्तिक स्वप्न में करती प्रतीत होती हैं. नीलेश के यहां स्वप्नाकांक्षाओं और उपलब्धियों की वैयक्तिकता या निजता का निषेध बहुत स्पष्ट रूप से लक्ष्य किया जा सकता है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff9900;"&gt;इतना-इतना ज्यादा सोच लेती हूं&lt;br /&gt;अपने हिस्से का ही नहीं सबके हिस्से का सोचकर&lt;br /&gt;न इस पार रह पाती हूं, न उस पार जा पाती हूं...&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size:85%;"&gt;( नीलेश रघुवंशी / नया दिन )&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;जन-सामान्य के जीवन की विडंबनाएं उन्हें गहरे विचलित करती हैं. वे उनके सुख-दुख की भागीदार बनने की आकांक्षा रचना चाहती हैं, उन्हीं के सपने देखना चाहती हैं :&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff9900;"&gt;वो जो घर बनाते हैं उसके स्वप्न भी नहीं आते उन्हें&lt;br /&gt;जिस कुएं को खोदते हैं उसका जल भी नहीं तैरता नींद में...&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size:85%;"&gt;( नीलेश रघुवंशी / सपनों का उच्चारण )&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff9900;"&gt;मैं डाकिया बन जाना चाहती हूं&lt;br /&gt;सुख और दुख को अपने झोले में भरकर&lt;br /&gt;हर घर की चौखट पर सुख को घर देना चाहती हूं...&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size:85%;"&gt;( नीलेश रघुवंशी / रसायन )&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff9900;"&gt;समय कितना भी जटिल और उलझनों भरा क्यों न हो&lt;br /&gt;जगह होनी चाहिए उसमें पेन खिड़कियों और कागज की&lt;br /&gt;मुंश्किल है बहुत मुंश्किल है सपनों को ठंडी नींद सुला देना&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size:85%;"&gt;( नीलेश रघुवंशी / ठंडी नींद )&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;नीलेश अमानवीयता के विरुद्ध अपने स्वप्न को पूरे संकल्प के साथ यथार्थ में बदलने का उपक्रम करती हैं लेकिन रास्ते में आती कठिनाइयों से भी वे बेखबर नहीं हैं :&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff9900;"&gt;इस बदरंग और ऊबड़-खाबड़ दुनिया को बदल देना&lt;br /&gt;एक खेत में और उसमें मनुष्यता को बो देना&lt;br /&gt;एक स्वप्न है जाती हूं जिसमें बार-बार&lt;br /&gt;लौटती हूं हर बार&lt;br /&gt;मकड़ी के जाले-सी बुनी इस दुनिया के भीतर...&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size:85%;"&gt;( नीलेश रघुवंशी / एक स्वप्न )&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:180%;"&gt;क&lt;/span&gt;विताओं की ये बानगियां हमें आश्वस्त करती प्रतीत होती हैं कि कविता अपनी सारी उदात्त आकांक्षाओं स्वप्नों के साथ आज भी जिदा है और समय की बढ़ी हुई चुनौतियों के साथ और भी बड़े और उन्मुक्त स्पेस में सांस ले रही है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff9900;"&gt;---------------------------------------------&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4103886293770258948-1383419613712625547?l=shabdsrijan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://shabdsrijan.blogspot.com/feeds/1383419613712625547/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.blogger.com/comment.g?blogID=4103886293770258948&amp;postID=1383419613712625547' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4103886293770258948/posts/default/1383419613712625547'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4103886293770258948/posts/default/1383419613712625547'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://shabdsrijan.blogspot.com/2009/04/blog-post_26.html' title='कविता के मर जाने की ख़बर...'/><author><name>योगेंद्र कृष्णा   Yogendra Krishna</name><uri>http://www.blogger.com/profile/17366269677319716325</uri><email>yogendrakrishna@yahoo.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' name='OpenSocialUserId' value='00615047406804366258'/></author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4103886293770258948.post-1171624842863353873</id><published>2009-04-24T11:06:00.005-04:00</published><updated>2009-04-24T11:39:44.898-04:00</updated><title type='text'>प्रबंधन के दौर में साहित्य</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_fc2wY2U36Kc/SfHVtSQeeuI/AAAAAAAAAj4/cO4k7a8wbu0/s1600-h/untitled.bmp"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5328274808127781602" style="WIDTH: 212px; CURSOR: hand; HEIGHT: 158px" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_fc2wY2U36Kc/SfHVtSQeeuI/AAAAAAAAAj4/cO4k7a8wbu0/s320/untitled.bmp" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;निरंजन श्रोत्रिय&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह प्रबन्धन का दौर है बन्धु!इक्कीसवीं सदी में उत्तर आधुनिकता की खाल ओढ़े, बाज़ार-संस्कृति की हवा में सांस लेता चकाचक `मेनेजमेंट इरा´! यहाँ मसलों को हल नहीं `मैनेज´ किया जाता है। जो जितना कुशल मैनेजर है वह इस `महान्´ युग में उतना ही सफल व्यक्ति है। यह आँकड़ों, प्रायोजित सर्वेक्षणों और आकर्षक विज्ञापनों के गर्भ से उपजा वह अर्द्धसत्य है जो यह घोषणा कर रहा है कि `गोविन्द´ से बड़ा `गुरू´ नहीं `मैनेजमेंट गुरू´ है। यह आधुनिक संस्कृति (!) हमें संघर्ष की कठिन राह से मुक्त कर सुखी होने के `शॉर्टकट´ बता रही है...उसने एक ऐसी शब्दावली तैयार की है जिसके चलते मनुष्य की `गरिमा´ बढ़ी है और दफ्तरों में टेबिल पोंछते, फाइलें ढोते, पानी पिलाते भृत्य अब `ऑफिस मैनेजर´ जैसी भारी-भरकम पदवी पा चुके हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रबन्धन की यह शब्दावली संभवत: नेपोलियन की आत्मा ने तैयार की है जिसमें बताया गया है कि दुनिया में असम्भव कुछ नहीं होता, आपमें `गट्स´ होना चाहिये। वह कोई भी क्षेत्र हो--व्यापार, शिक्षा, खेल, सिनेमा, राजनीति, पत्रकारिता या फिर कला और साहित्य ही, चीजें `मैनेज´ की जा सकती हैं। इधर संचार क्रान्ति इस प्रबन्धकीय संजाल ( मैनेजेरियल नेटवर्क ) के पोषण हेतु पूरी तरह प्रस्तुत है--परीक्षा केवल आपकी योग्यता की है कि आप किस तरह ( या खूबसूरती से ) इसका उपयोग अपने पक्ष में करते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मसला यह है कि जब सफलता का ऐसा चकाचक फार्मूला मौजूद हो तो फिर साहित्य और कला ही इससे मुक्त क्यों रहें ? इस दौर में अप्रासंगिक होने का खतरा कौन झेलना चाहेगा ? सो, साहित्य और कला भी प्रबन्धन की करिश्माई दुनिया की शरण में है। इसमें लेखक, पाठक, आलोचक, संपादक, पुरस्कार, प्रकाशक सभी अपनी नयी भूमिका में हैं। &lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="color:#ff9900;"&gt;अब साहित्य की दुनिया आसान हो चली है। उसमें लेखक होने के लिये आपको सर्जनात्मक संघर्ष की अनावश्यक पीड़ा से गुजरने की नहीं, कुछ टूल्स की ज़रूरत है जिसके जरिये आप रातों-रात साहित्य के सुपरस्टार, बेस्ट सेलर या महान हो सकते हैं अमुकजी की परम्परा के सच्चे वाहक! जाहिर है यह दुनिया देश की राजधानी के `विहारों´, संस्थानों, कॉफी हाउसों, प्रकाशकों, मेलों, समारोहों-गोष्ठियों और रात्रि रस-रंजन बैठकों में बसती है। ये सब मिलकर देश के साहित्य का एक उर्जावान् सर्किट तैयार करते हैं। जो इस सर्किट से बाहर है, वह साहित्य से भी बाहर है। यह साहित्य का शक्ति-पीठ है जहाँ अनुष्ठान के तरीके भिन्न हैं...यही साहित्य का प्रबन्धन है।&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;यह सवाल पूछना व्यर्थ है कि कबीर, तुलसी, प्रसाद, निराला, प्रेमचंद, मुक्तिबोध या रेणु ने किस प्रबन्धन का उपयोग किया था। वे सब अब इतिहास के शिलालेख या जीवाश्म हैं जो अपने युग का पता भर देते हैं। आज के दौर में होते तो इतिहास छोड़ वर्तमान भी न बना पाते। मुक्तिबोध जो बीड़ी का सुट्टा मारते `अंधेरे में´ खाई-खंदकों की खाक छान रहे हैं कम्प्यूटर पर बैठे आधुनिक लेखक के प्रबन्धकीय संजाल के समक्ष एक अप्रासंगिक चित्र है। गांव की चौपाल पर खैनी मलते प्रेमचंद, इंटरनेट पर `ब्लॉग´ में अपने वरिष्ठों-समकालीनों की ऐसी-तैसी करते युवा लेखक के सामने एक भूली-बिसरी याद है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पिछले दिनों हिन्दी के वरिष्ठ कवि कुंवर नारायण ने एक सभा में यह चिन्ता जाहिर की थी कि साहित्य का सबसे बड़ा नुकसान यह हुआ है कि हमने दिल्ली जैसे महानगर को उसका केन्द्र बना दिया है। इस कारण देश के दूर-दराज इलाकों में छुपी प्रतिभाएं या तो कुंठित हो रही हैं या फिर उपयुक्त मंच के अभाव में असमय दम तोड़ रही हैं। साहित्य अपने स्वरूप और चरित्र में ही बहुलतावादी होता है। उसमें हमारे समय और समाज के इतने विविध शेड्स मौजूद होते हैं कि उसे किसी एक स्थान पर केन्द्रीकृत नहीं किया जा सकता। सर्जना देश के कोने-कोने तक फैली हुई है। एकान्त श्रीवास्तव विशाखापत्तनम-कलकत्ता में बैठकर कविताएं लिख रहे हैं तो राजकुमार राकेश शिमला में कहानी रच रहे हैं, लखनउ में अखिलेश तो अशोकनगर में हरिओम राजोरिया, उत्तरप्रदेश के किसी कस्बे में अष्टभुजा शुक्ल तो भोपाल में राजेश जोशी, मुम्बई में विजयकुमार तो बड़ौदा में नरेश चन्द्रकर और शाहजहांपुर में बुजुर्ग हृदयेश! आखिर ये सब बार-बार दिल्ली का मुँह क्यों जोएँ! होना तो यह चाहिये था कि कलकत्ता, पटना, बनारस, लखनउ, उज्जैन, इलाहाबाद, जबलपुर जैसी जगहों पर साहित्य और कला का विकेन्द्रीकरण होता जैसे एक समय में था! दिल्ली ने इन सभी जगहों की सत्ताओं को अपने में विलीन कर लिया और साहित्य की इन्द्रधनुषी छटा की बड़ी सम्भावनाओं का अंत कर दिया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दिल्ली के इसी ग्लेमर से आकर्षित होकर जब कोई वहाँ पहुंचता है तो दूर-दराज के कस्बों से भले ही उसके `दिल्लीवास´ का उलाहना दिया जाता हो लेकिन हर कोई जानता है कि चीजों को दिल्ली से ही तय होना है। दिल्ली के लेखक, दिल्ली की पत्रिकाएं, दिल्ली के प्रकाशक, दिल्ली के आलोचक ही अंतत: तय करेंगे कि किसे, कब और किस दर्जे का लेखक होना है। या तो दिल्ली जाएं या फिर आपकी नेटविर्कंग इतनी ज़बरदस्त हो कि दिल्ली आपको अपना मान ले। साहित्य का भवसागर दिल्ली नामक मगरमच्छ की पीठ पर बैठ कर ही पार किया जा सकता है। परिणामत: देश के कोने-कोने में फैला लेखक अपनी साधना छोड़कर दिल्ली साधने में जुट जाता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और दिल्ली कितनी बेदर्द है यह किसी ऐसे दिल्ली वाले से पूछो जो दिल्ली का होकर भी दिल्ली का नहीं हो पाया है। कोई भी तुर्रमखां आधी रात को नींद से जागकर अ को मीडियाकर, ब को बकवास और स को मुक्तिबोध की परम्परा का कवि घोषित कर देता है। सरकारी उपनिवेशों से प्राप्त मोटी तनख्वाह, भत्तों और विदेश यात्राओं से अफराया साहित्य का कोई महंत साहित्यकारों को पूर्णकालिक लेखन की सलाह देने लगता है। अपनी घर-गिरस्ती को संभालते, अपने दायित्वों को निर्वहन करते बेचारे मध्यवर्गीय लेखक महंत की मु्फ्त सलाह और वाकई फ्रीलांसर्स की मुफलिसी के बीच अनिर्णय के झूले पर झूलता रहता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आशय यह नहीं है कि आज का लेखक नवीन-आधुनिक टैक्नॉलॉजी को नकारे, बाज़ार की उपेक्षा करे और अपने अहं के किसी निर्जन द्वीप पर जाकर बैठ जाए। लेकिन बाज़ार की व्यावसायिकता और प्रबन्धन के पीछे छुपी मंशा ने जो साहित्येतर अनिवार्यताएं पैदा कर दी हैं वह देश के दूर-दराज तक फैले अत्यंत प्रतिभाशाली लेखकों को दिग्भ्रमित कर रही है। इन स्थितियों में यह हर लेखक के लिये संभव नहीं है कि वह दिल्ली में अपना एक `गॉडफादर´ स्थापित करे, साहित्य के महंतों को स्टेशन पर `रिसीव´ या `सी-ऑफ´ करता फिरे, पत्रिकाओं के वार्षिक चंदे से कटौती कर उनके सायंकालीन रस-रंजन की व्यवस्था करे और प्रायोजित आलोचना-पुरस्कार-सम्मान-चर्चाओं के जरिये समकालीन साहित्य का चमकता सितारा बने । वह जो कर सकता है वह यह कि अपने आत्मसम्मान की रक्षा करते हुए ईमानदार लेखन करे जो पहले की पीढ़ी ने किया है। इस मायने में वे लेखक आज के दौर में चाहे कितने भी अप्रासंगिक होते उनके संघर्षों की स्मृतियां कभी अप्रासंगिक नहीं हो सकतीं। एक सच्चे लेखक को किसी भी प्रकार के `प्रमोशन´ या नेटविर्कंग की आवश्यकता नहीं है। उसकी चिन्ता केवल अपना समय-समाज और पाठक होना चाहिये।&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;&lt;strong&gt;----------------------------------------------&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;सम्पर्क: `विन्यास´, कैन्ट रोड, गुना (म.प्र.) फोन -(07542) 254734 / 098270 07736&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4103886293770258948-1171624842863353873?l=shabdsrijan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://shabdsrijan.blogspot.com/feeds/1171624842863353873/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.blogger.com/comment.g?blogID=4103886293770258948&amp;postID=1171624842863353873' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4103886293770258948/posts/default/1171624842863353873'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4103886293770258948/posts/default/1171624842863353873'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://shabdsrijan.blogspot.com/2009/04/blog-post_24.html' title='प्रबंधन के दौर में साहित्य'/><author><name>योगेंद्र कृष्णा   Yogendra Krishna</name><uri>http://www.blogger.com/profile/17366269677319716325</uri><email>yogendrakrishna@yahoo.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' name='OpenSocialUserId' value='00615047406804366258'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_fc2wY2U36Kc/SfHVtSQeeuI/AAAAAAAAAj4/cO4k7a8wbu0/s72-c/untitled.bmp' height='72' width='72'/><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4103886293770258948.post-4885344367655863879</id><published>2009-04-19T02:44:00.007-04:00</published><updated>2009-04-19T04:03:28.843-04:00</updated><title type='text'>प्रेम का अनगढ़ शिल्प एवं अन्य कविताएं</title><content type='html'>&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_fc2wY2U36Kc/SerIacXDF0I/AAAAAAAAAjg/Rzfs5pDqTQo/s1600-h/beetchukeshahar[2].jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5326289865934051138" style="WIDTH: 143px; CURSOR: hand; HEIGHT: 220px" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_fc2wY2U36Kc/SerIacXDF0I/AAAAAAAAAjg/Rzfs5pDqTQo/s320/beetchukeshahar%5B2%5D.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="justify"&gt;यह मेरा सौभाग्य है कि मेरी कविता-पुस्तक बीत चुके शहर में पढ़ने के बाद कुँवर जी ने मुझे अपनी प्रतिक्रिया भेजी और संग्रह की कुछ कविताओं को विशेष रूप से रेखांकित करते हुए मेरी रचनात्मकता को प्रोत्साहित किया है। उनके शब्द मेरे लिए अत्यंत मूल्यवान हैं। कुँवर जी के प्रति अपना सम्मान और आभार व्यक्त करते हुए उनकी टिप्पणी के साथ मैं इस बार अपने संग्रह की उन्हीं कविताओं को यहां प्रस्तुत कर रहा हूं जिन्हें उन्होंने ख़ास तौर पर रेखांकित किया है।&lt;br /&gt;-- &lt;span style="font-size:85%;"&gt;योगेन्द्र कृष्णा&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;--------------------------------------------------------------------&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="color:#009900;"&gt;&lt;em&gt;तुम्हारी कविताओं को यदाकदा पढ़ता रहा हूं, किन्तु "बीत चुके शहर में" पहली बार कविताओं को इकट्ठा पढ़ना उनके सरोकारों के प्रमुख आयाम को नज़दीक से जानने का अवसर देता है। अधिकांश कविताएं कुछ ख़ास अनुभवों से जुड़ी हैं, फिर भी "बीत चुके अपने शहर में", "प्रेम का अनगढ़ शिल्प", "ख्याल रखा जाता है", "मर्द की मूंछ", "अपना चेहरा", "दिल्ली में पहली बार" जैसी कविताएं एक ज़्यादा बड़े अनुभव-क्षेत्र को उद्दीप्त करती हैं। कविता की इस सामर्थ्य को महत्व देता हूं। …&lt;br /&gt;&lt;/em&gt;&lt;/span&gt;&lt;strong&gt;कुँवर नारायण&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;--------------------------------------------------------------------&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span style="color:#ff6600;"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span style="color:#ff6600;"&gt;बीत चुके अपने शहर में&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;p align="justify"&gt;तेजी से बीत चुके&lt;br /&gt;अपने शहर में लौटा हूं&lt;br /&gt;और ठिठक गया हूं&lt;br /&gt;उस गोरैये की तरह&lt;br /&gt;जो लौटती है अपने घोंसले में&lt;br /&gt;चोंच में दाना लिए&lt;br /&gt;और ठिठक जाती है हवा में&lt;br /&gt;घोंसले की जगह शून्य देख कर...&lt;br /&gt;पंख फरफराती हुई...&lt;br /&gt;इर्द-गिर्द देर तक मंडराती हुई...&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;p align="justify"&gt;नहीं मिला मुझे भी&lt;br /&gt;मेरा घर&lt;br /&gt;मेरा देखा सुना शहर&lt;br /&gt;मेरी खोई दुनिया का&lt;br /&gt;कोई सुराग...&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;बहुत ऊंचाई पर&lt;br /&gt;लगभग हवा में टंगी&lt;br /&gt;घंटा घर की वह घड़ी&lt;br /&gt;जरूर मिली&lt;br /&gt;घर लौटते हुए जिसमें मुझे&lt;br /&gt;मां की प्रतीक्षारत&lt;br /&gt;झुर्रियां दिखती थीं&lt;br /&gt;और जिसे देख कर मैं&lt;br /&gt;अपनी साइकिल की रफ्तार&lt;br /&gt;तेज या धीमी करता था&lt;br /&gt;लेकिन वही घड़ी&lt;br /&gt;मुंह बाये&lt;br /&gt;आज पूछती है मुझसे--&lt;br /&gt;किस मौसम की&lt;br /&gt;कौन सी तारीख है यह...&lt;br /&gt;इस शहर में इस वक्त&lt;br /&gt;आखिर कितना बजा है ?&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;कुछ ही दूरी पर&lt;br /&gt;मलबे से झांकता&lt;br /&gt;मील का वह पत्थर भी दिखा&lt;br /&gt;जिसे देख कर मैं जान जाता था&lt;br /&gt;कि घर अब&lt;br /&gt;बस एक कोस दूर है&lt;br /&gt;रास्ते का मुसाफिर बना&lt;br /&gt;अपनी जगह ढूंढ़ता&lt;br /&gt;वही पत्थर&lt;br /&gt;आज पूछता है मुझसे--&lt;br /&gt;शहर का यह रास्ता&lt;br /&gt;अब किधर जाता है ?&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;खड़ा हूं स्तब्ध-मौन...&lt;br /&gt;सामने उनके&lt;br /&gt;अपने ही शहर की&lt;br /&gt;तारीख, समय और&lt;br /&gt;मील का पत्थर बन कर&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span style="color:#ff6600;"&gt;प्रेम का अनगढ़ शिल्प&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;काटने से पहले&lt;br /&gt;लकड़हारे ने पूछा&lt;br /&gt;उसकी अंतिम इच्छा क्या है&lt;br /&gt;वृद्ध पेड़ ने कहा&lt;br /&gt;जीवन भर मैंने&lt;br /&gt;किसी से कुछ मांगा है क्या&lt;br /&gt;कि आज&lt;br /&gt;बर्बर होते इस समय में&lt;br /&gt;मरने के पहले&lt;br /&gt;अपने लिए कुछ मांगूं&lt;br /&gt;लेकिन&lt;br /&gt;अगर संभव हो&lt;br /&gt;तो मुझे गिरने से बचा लेना&lt;br /&gt;आसपास बनी झोपिड़यों पर&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;p align="justify"&gt;श्मशान में&lt;br /&gt;किसी की चिता सजा देना&lt;br /&gt;पर मेरी लकड़ियों को&lt;br /&gt;हवनकुंड की आग से बचा लेना&lt;br /&gt;बचा लेना मुझे&lt;br /&gt;आतंकवादियों के हाथ से&lt;br /&gt;किसी अनर्गल कर्मकांड से&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;p align="justify"&gt;मेरी शाख पर बने&lt;br /&gt;बया के उस घोंसले को&lt;br /&gt;तो जरूर बचा लेना&lt;br /&gt;युगल प्रेमियों ने&lt;br /&gt;खींच दी हैं मेरे खुरदरे तन पर&lt;br /&gt;कुछ आड़ी तिरछी रेखाएं&lt;br /&gt;बड़ी उम्मीद से&lt;br /&gt;मेरी बाहों में लिपटी हैं&lt;br /&gt;कुछ कोमल लताएं भी&lt;br /&gt;हो सके तो बचा लेना&lt;br /&gt;इस उम्मीद को&lt;br /&gt;प्रेम की अनगढ़ इस भाषा&lt;br /&gt;इस शिल्प को&lt;br /&gt;मैंने अबतक&lt;br /&gt;बचाए रखा है इन्हें&lt;br /&gt;प्रचंड हवाओं&lt;br /&gt;बारिश और तपिश से&lt;br /&gt;नैसर्गिक मेरा नाता है इनसे&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;लेकिन डरता हूं तुमसे&lt;br /&gt;आदमी हो&lt;br /&gt;कर दोगे एक साथ&lt;br /&gt;कई-कई हत्याएं&lt;br /&gt;कई-कई हिंसाएं&lt;br /&gt;कई-कई आतंक&lt;br /&gt;और पता भी नहीं होगा तुम्हें&lt;br /&gt;तुम तो&lt;br /&gt;किसी के इशारे पर&lt;br /&gt;काट रहे होगे&lt;br /&gt;सिर्फ एक पेड़...&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span style="color:#ff6600;"&gt;ख़्याल रखा जाता है&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;गाय और बाछी को&lt;br /&gt;एक ही खूंटे से बांधने में&lt;br /&gt;ख्याल रखा जाता है&lt;br /&gt;कि वे जितनी चाहें&lt;br /&gt;अपने पैरों के नीचे उगी&lt;br /&gt;अनचाही घास को चर सकें&lt;br /&gt;जितनी चाहें एक-दूसरे को&lt;br /&gt;प्यार कर सकें&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;p align="justify"&gt;गाय के थन को&lt;br /&gt;खूंटे से बंधी बाछी&lt;br /&gt;जितना चाहे&lt;br /&gt;अपनी कातर आंखों से निहार सके&lt;br /&gt;और गाय&lt;br /&gt;उमड़ते प्रेम और वात्सल्य में&lt;br /&gt;उसकी बेचारगी पर तरस खा कर&lt;br /&gt;भरपूर उसकी देह को चाट सके&lt;br /&gt;अपनी-अपनी बेचारगी को&lt;br /&gt;आधा-आधा बांट सके...&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;लेकिन&lt;br /&gt;यह भी ख्याल रखा जाता है&lt;br /&gt;कि गाय का दूध भरा थन&lt;br /&gt;किसी भी हाल में&lt;br /&gt;लार टपकाती बाछी के मुंह से&lt;br /&gt;कम-से-कम&lt;br /&gt;एक इंच दूर रहे&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff6600;"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;मर्द की मूंछ&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;सपने में एक रात&lt;br /&gt;गांव-गांव के बीच&lt;br /&gt;दीवारों को गिराता&lt;br /&gt;वह&lt;br /&gt;विश्वग्राम की संकल्पना को&lt;br /&gt;साकार कर रहा था...&lt;br /&gt;सभी गांव शहर और देश&lt;br /&gt;सिमट कर एक हो रहे थे&lt;br /&gt;और वह&lt;br /&gt;अपनी ही बनाई सड़कों पर&lt;br /&gt;तेज रफ्तार&lt;br /&gt;आगे बढ़ रहा था...&lt;br /&gt;तभी&lt;br /&gt;पीछे से&lt;br /&gt;जैसे किसी ने आवाज दी&lt;br /&gt;मुड़कर देखा&lt;br /&gt;बहुत पीछे&lt;br /&gt;एक नंगी देह औरत&lt;br /&gt;अपने सफेद-पुते चेहरे ढोती&lt;br /&gt;सड़कों पर चलाई जा रही थी-&lt;br /&gt;जैसे गायें या भैंसे चलाई जाती हैं-&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;p align="justify"&gt;पीछे सारा गांव था&lt;br /&gt;मर्द थे&lt;br /&gt;जो अपनी मूंछें&lt;br /&gt;औरत की नंगी देह में&lt;br /&gt;उगी देखना चाहते थे&lt;br /&gt;सड़कों के किनारे&lt;br /&gt;दोनों तरफ खड़ी औरतें&lt;br /&gt;मजबूर थीं&lt;br /&gt;उस नंगी औरत की देह में उगी&lt;br /&gt;अपने मर्दों की&lt;br /&gt;मूंछ देखने को&lt;br /&gt;नंगी औरत&lt;br /&gt;जिस सड़क पर चल रही थी&lt;br /&gt;हमारी सड़क की तरह&lt;br /&gt;विश्वग्राम की ओर&lt;br /&gt;नहीं जाती थी&lt;br /&gt;एक बियाबान में&lt;br /&gt;गुम हो जाती थी&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;उस औरत पर&lt;br /&gt;ढाए गए जुल्म की कहानी&lt;br /&gt;विश्वग्राम तक आने वाली&lt;br /&gt;सड़कों से चल कर&lt;br /&gt;एक दिन तड़के&lt;br /&gt;हाईटेक मीडिया की&lt;br /&gt;सुर्खियों में आईं&lt;br /&gt;और एक ग्राम में सिमटे&lt;br /&gt;नींद के हाशिए पर&lt;br /&gt;लेटे-अधलेटे&lt;br /&gt;नंगे-अधनंगे&lt;br /&gt;संपूर्ण विश्व ने&lt;br /&gt;इस हादसे को&lt;br /&gt;सूरज निकलने के पहले&lt;br /&gt;सुबह की पहली चाय के साथ&lt;br /&gt;सुड़क ली&lt;br /&gt;सूरज निकलने तक&lt;br /&gt;यदि उन्हें याद रह गए हैं&lt;br /&gt;तो बस&lt;br /&gt;आज के शेयर बाजारों के भाव&lt;br /&gt;उनके उतार-चढ़ाव&lt;br /&gt;और कुछ बहुमूल्य धातुओं&lt;br /&gt;की बढ़ती चमक से झांकते&lt;br /&gt;अपने भविष्य के सपने&lt;br /&gt;जो उन्हें&lt;br /&gt;बहुत कुछ दे सकते हैं&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;बहुत पीछे छूट गई&lt;br /&gt;वह नंगी सफेद-पुती औरत&lt;br /&gt;उन्हें क्या दे सकती है&lt;br /&gt;उसकी नग्नता भी&lt;br /&gt;तो दरअसल&lt;br /&gt;उन्हीं की है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span style="color:#ff6600;"&gt;अपना चेहरा&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;सड़कों के हाशिये पर&lt;br /&gt;भागती-हांफती भीड़ में&lt;br /&gt;पल भर के लिए&lt;br /&gt;एक चेहरा&lt;br /&gt;ऐसा भी दिखा था&lt;br /&gt;जो बहुत अपना-सा लगा था&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;p align="justify"&gt;बदहवास-सी भागती&lt;br /&gt;जिंदगी की भीड़ में&lt;br /&gt;एक अजनबी चेहरा&lt;br /&gt;ऐसा भी दिखा था&lt;br /&gt;जो कुछ सपना-सा लगा था&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;वर्षों बाद&lt;br /&gt;जब समय की करबटों ने&lt;br /&gt;बदल दिए&lt;br /&gt;सड़कों के हाशिये&lt;br /&gt;जब बदल गए&lt;br /&gt;सड़क और आसमान के फासले&lt;br /&gt;और चेहरों की सलवटों ने&lt;br /&gt;सुविधा से गढ़ लिए&lt;br /&gt;रिश्तों के नए प्रतिमान&lt;br /&gt;तब&lt;br /&gt;आज मुद्दतों बाद&lt;br /&gt;पता चला&lt;br /&gt;वह चेहरा&lt;br /&gt;वह सपना&lt;br /&gt;दोनों अपना ही था&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span style="color:#ff6600;"&gt;दिल्ली में पहली बार&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:85%;"&gt;(बलात्कार की शिकार उस स्विस महिला के नाम)&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;गाइड ने मुझे बताया&lt;br /&gt;यह लाल किला है&lt;br /&gt;जहां के प्राचीर से...&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;p align="justify"&gt;मैंने कहा, मैं जानता हूं&lt;br /&gt;अपने देश का अतीत मैं जानता हूं&lt;br /&gt;मुझे वह सब दिखाओ&lt;br /&gt;जो आज की तारीख में घट रहा है&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;उसने बताया...&lt;br /&gt;मैं दिल्ली की जिस सड़क पर चल रहा हूं&lt;br /&gt;उसका नाम सत्य मार्ग है&lt;br /&gt;आस-पास ही शांति मार्ग&lt;br /&gt;और नीति मार्ग भी है&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;मैंने कहा&lt;br /&gt;मैं इन रास्तों से होता हुआ&lt;br /&gt;खेल गांव जाना चाहता हूं&lt;br /&gt;उसने बताया, शाम के अंधेरे में&lt;br /&gt;इन रास्तों पर अब कोई चलता नहीं&lt;br /&gt;फिर खेल गांव में क्या रखा है...&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;मैंने कहा, वहां सीरी फोर्ट स्टेडियम है&lt;br /&gt;जहां अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव चल रहा है&lt;br /&gt;और जहां के हर खेल का स्तर अंतरराष्ट्रीय है&lt;br /&gt;यहां तक कि हाल में&lt;br /&gt;स्टेडियम के बाहर खेले गए&lt;br /&gt;उस खेल का स्तर भी&lt;br /&gt;जिसे लोगों ने पता नहीं क्यों `बलात्कार´ कह दिया&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;गाइड ने मुझे गौर से देखा&lt;br /&gt;ऐसे जैसे किसी पागल के चक्कर में पड़ गया हो&lt;br /&gt;मैंने भी उसे पहली बार ठीक से देखा&lt;br /&gt;इंडिया गेट, लाल किले और देसी लोकतंत्र का&lt;br /&gt;ऐतिहासिक आतंक उसकी आंखों में&lt;br /&gt;साफ नजर आता था&lt;br /&gt;और उसकी पूरी देह&lt;br /&gt;खंडहर होते इतिहास की भव्यता संभाले थी&lt;br /&gt;जिसके मलबे से चुपके-से झांक जाती थी&lt;br /&gt;स्टेडियम के बाहर खड़ी&lt;br /&gt;अपनी ही कार में बलात्कृत&lt;br /&gt;स्विस महिला की आंखें&lt;br /&gt;तंदूर के भीतर टुकड़ों में जली नारी देह&lt;br /&gt;खूनी दरवाजा और जेसिका लाल...&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;मैंने कहा&lt;br /&gt;मैं जनपथ की उन सड़कों से&lt;br /&gt;पैदल गुजरना चाहता हूं&lt;br /&gt;जो हमारे देश की संसद तक जाती है&lt;br /&gt;उसने बताया&lt;br /&gt;इन सड़कों पर अब&lt;br /&gt;केवल मोटरगाड़ियां चलती हैं&lt;br /&gt;आप संसद तक जाना चाहें&lt;br /&gt;तो लाल बत्ती गाड़ी में जा सकते हैं&lt;br /&gt;जनपथ हो या नीति मार्ग&lt;br /&gt;या कि सत्य मार्ग और शांति मार्ग&lt;br /&gt;उन पर पैदल चल कर&lt;br /&gt;अब कोई संसद नहीं जाता&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;उसने शायद ठीक कहा था&lt;br /&gt;मुझे याद आया&lt;br /&gt;कुछ ही दिन पहले&lt;br /&gt;हमलावर भी इन्हीं मार्गों से&lt;br /&gt;लाल बत्ती गाड़ी में ही तो गए थे...&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4103886293770258948-4885344367655863879?l=shabdsrijan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://shabdsrijan.blogspot.com/feeds/4885344367655863879/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.blogger.com/comment.g?blogID=4103886293770258948&amp;postID=4885344367655863879' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4103886293770258948/posts/default/4885344367655863879'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4103886293770258948/posts/default/4885344367655863879'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://shabdsrijan.blogspot.com/2009/04/blog-post_19.html' title='प्रेम का अनगढ़ शिल्प एवं अन्य कविताएं'/><author><name>योगेंद्र कृष्णा   Yogendra Krishna</name><uri>http://www.blogger.com/profile/17366269677319716325</uri><email>yogendrakrishna@yahoo.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' name='OpenSocialUserId' value='00615047406804366258'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_fc2wY2U36Kc/SerIacXDF0I/AAAAAAAAAjg/Rzfs5pDqTQo/s72-c/beetchukeshahar%5B2%5D.jpg' height='72' width='72'/><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4103886293770258948.post-8828497233390912577</id><published>2009-04-01T13:49:00.003-04:00</published><updated>2009-04-01T14:02:01.301-04:00</updated><title type='text'>श्मशान में मां</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;मित्रो,&lt;br /&gt;30 मार्च को मेरी मां का निधन हो गया। दुःख इसलिए भी अधिक है कि मां बहुत लंबे समय तक हमारे साथ रहीं और कभी यह मह्सूस करने का शायद अवसर ही नहीं दिया कि वे हमें छोड़कर चली भी जायेंगी। जबकि वे हम पांच भाइयों, एक बहन और दर्जनों पोता-पोतियों, नाती-नातिनों के बीच अंतिम समय तक अपने स्नेह और प्यार में बंटती रहीं। मृत्यु के समय उनकी आयु लगभग 95 वर्ष थी।&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;उसी दिन रात्रि में पटना के गुलबी घाट में उनका दाह-संस्कार कर दिया गया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गंगा के इस श्मशान घाट के अपने कुछ ताज़ा ग़मग़ीन अनुभवों को भी आपसे साझा करने का मन है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;-----------------------&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;&lt;br /&gt;उनका भी निष्काम देखो&lt;br /&gt;जो तुम्हें नहीं जानतीं&lt;br /&gt;फिर भी तुम्हारे लिए&lt;br /&gt;तुम्हारे साथ जलकर राख हो रही हैं&lt;br /&gt;वे ढेर सारी लकड़ियां&lt;br /&gt;अंत तक तुम्हारी देह से&lt;br /&gt;मिलकर एक हो रही हैं&lt;br /&gt;राख में राख&lt;br /&gt;क्या अलग कर पाएंगे हम&lt;br /&gt;लकड़ी और देह की राख&lt;br /&gt;-----&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;धू-धू कर जलती चिताएं हैं&lt;br /&gt;आकाश में उठता काला धुआं&lt;br /&gt;और रात्रि की भयावह नीरवता&lt;br /&gt;को चीरती घाट की सीढियों से&lt;br /&gt;नीचे उतरतीं कुछ आवाज़ें हैं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;असमय एक युवा देह को&lt;br /&gt;तलाश है मिट्टी की…&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और फिर&lt;br /&gt;सफ़ेद कपड़े में लपेटे&lt;br /&gt;एक शिशु को दोनो हाथों मे उठाए&lt;br /&gt;उतरता है एक युवक&lt;br /&gt;साथ में और भी कई लोग&lt;br /&gt;पर उतने भी नहीं&lt;br /&gt;जितने कि होने चाहिए&lt;br /&gt;दुःख की इस बीहड़ घड़ी में&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और घाट की सीढियों से&lt;br /&gt;उतरता है पीछे-पीछे&lt;br /&gt;भारी पत्थर का एक बड़ा-सा टुकड़ा&lt;br /&gt;बिलकुल अंधेरे में&lt;br /&gt;गंगा तट की तरफ़…&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पानी के बड़े बुलबुले छूटने-सी आवाज़&lt;br /&gt;अर्द्ध-रात्रि की बीहड़ बेबस खामोशी को&lt;br /&gt;हल्के से हिलाती है…&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;छोड़ दिए गए हैं&lt;br /&gt;पत्थर और शिशु देह&lt;br /&gt;कुछ दिनों के लिए&lt;br /&gt;एक दूसरे के साथ&lt;br /&gt;निबद्ध रहने के करार पर…&lt;br /&gt;------&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;श्मशान घाट तक आने में&lt;br /&gt;कितना वजन था&lt;br /&gt;हमारे कंधों पर&lt;br /&gt;लेकिन नहीं था&lt;br /&gt;फिर भी कोई भार&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और अब जबकि लौट रहा हूं&lt;br /&gt;लेकर मुट्ठी भर तुम्हारी राख&lt;br /&gt;क्यों दब रहा है मन इसके भार से…&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जैसे कि पत्थर हो कोई&lt;br /&gt;बंधा हुआ मेरी ही देह से…&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/em&gt;----- &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4103886293770258948-8828497233390912577?l=shabdsrijan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://shabdsrijan.blogspot.com/feeds/8828497233390912577/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.blogger.com/comment.g?blogID=4103886293770258948&amp;postID=8828497233390912577' title='17 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4103886293770258948/posts/default/8828497233390912577'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4103886293770258948/posts/default/8828497233390912577'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://shabdsrijan.blogspot.com/2009/04/blog-post.html' title='श्मशान में मां'/><author><name>योगेंद्र कृष्णा   Yogendra Krishna</name><uri>http://www.blogger.com/profile/17366269677319716325</uri><email>yogendrakrishna@yahoo.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' name='OpenSocialUserId' value='00615047406804366258'/></author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>17</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4103886293770258948.post-1604430668106189981</id><published>2009-03-22T06:36:00.006-04:00</published><updated>2009-03-22T07:02:55.185-04:00</updated><title type='text'>समावर्तन के बारह अंक</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_fc2wY2U36Kc/ScYVaCs6l5I/AAAAAAAAAjY/6j6cykl-AJc/s1600-h/Samavartan_2.JPG"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5315959947303491474" style="WIDTH: 320px; CURSOR: hand; HEIGHT: 240px" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_fc2wY2U36Kc/ScYVaCs6l5I/AAAAAAAAAjY/6j6cykl-AJc/s320/Samavartan_2.JPG" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;एक ही वर्ष में एक अलग पहचान बनाई &lt;em&gt;समावर्तन &lt;/em&gt;ने&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;(देश भर के संस्कृतिकर्मियों एवं पाठकों ने दिया सहयोग)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गुना, 21 मार्च : हिन्दी की साहित्यिक-सांस्कृतिक पत्रिकाओं की भीड़ में &lt;em&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;समावर्तन &lt;/span&gt;&lt;/em&gt;ने अपनी एक अलग पहचान बनाई है। इस मासिक पत्रिका का प्रकाशन आरंभ हुए केवल एक ही वर्ष हुआ है लेकिन समूचे हिन्दी-जगत ने इसे पूरी आत्मीयता से अपनाया है तथा अपना रचनात्मक सहयोग दिया है। साहित्य-संस्कृति एवं सामाजिक सरोकारों पर केन्द्रित इस मासिक पत्रिका के संपादक युवा कवि-कथाकार एवं शासकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, गुना में वनस्पति शास्त्र के विभागाध्यक्ष डॉ. निरंजन श्रोत्रिय हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पिछले दिनों उज्जैन में &lt;em&gt;समावर्तन &lt;/em&gt;के बारहवें अंक (मार्च 2009) का लोकार्पण देश के अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त चित्रकार-कथाकार श्री अशोक भौमिक, कवि-कथाकार विचारक श्री संतोष चौबे एवं स्वराज भवन, भोपाल के संचालक श्रीराम तिवारी ने किया। समावर्तन के संपादक निरंजन श्रोत्रिय ने बताया कि एक साल पहले पत्रिका के प्रवेशांक का लोकार्पण ज्ञानपीठ पुरस्कार एवं पद्म सम्मान प्राप्त वरिष्ठ कवि श्री कुंवर नारायण ने नई दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में किया था तथा यह अपेक्षा की थी कि साहित्य-संस्कृति को महानगरों में सिमटने के बजाय छोटे शहरों तक विकेन्द्रित किया जाना चाहिये ताकि देश के दूर-दराज में फैली प्रतिभाओं को उचित मंच मिल सके। संस्कृति प्रकाशन, उज्जैन से प्रकाशित इस मासिक पत्रिका ने इस अपेक्षा को पूरा किया है और अब यह हिन्दी की राष्ट्रीय स्तर की पत्रिका के रूप में प्रतिष्ठित हो चुकी है। बगैर किसी विज्ञापन के एक मासिक पत्रिका को वर्ष भर तक जारी रखना एक चुनौति है। इस पत्रिका के संस्थापक एवं संपादन समन्वयक देश के प्रसिद्ध रंगकर्मी एवं कवि डॉ. प्रभात कुमार भट्टाचार्य हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पिछले एक वर्ष की यात्रा में &lt;em&gt;समावर्तन &lt;/em&gt;ने जहाँ देश के शीर्षस्थ साहित्यकारों-रंगकर्मियों पर एकाग्र अंक प्रकाशित किये हैं वहीं नई एवं युवतम प्रतिभाओं को भी मंच प्रदान किया है। अब तक इस पत्रिका में अशोक वाजपेयी, पणिक्कर, त्रिलोचन, शरद जोशी, गिरिराज किशोर, राजेन्द्र यादव, बादल सरकार, अमरकान्त, रज़ा, सुनीता जैन, रमेशचन्द्र शाह, कुमार गंधर्व, मन्नू भण्डारी, कृष्ण बलदेव वैद, ब.व. कारंत, हकु शाह, राजी सेठ, धनंजय वर्मा, सिद्धेश्वर सेन, अमृतलाल वेगड़, गोविन्द मिश्र, दिनेश ठाकुर, विजय तेन्दुलकर, चित्रा मुद्गल एवं हबीब तनवीर पर एकाग्र अंक प्रकाशित किये हैं। समावर्तन को देश के शीर्षस्थ साहित्यकारों एवं पाठकों का रचनात्मक सहयोग मिल रहा है। पत्रिका में साहित्य-संस्कृति पर महत्वपूर्ण सामग्री के अतिरिक्त सामाजिक सरोकारों को भी संजोया गया है। पर्यावरण, जल संग्रहण, सिनेमा, मीडिया, आतंकवाद, सूचना तकनीक जैसे विषयों पर भी स्तरीय सामग्री ने पत्रिका को संग्रहणीय बनाया है। मात्र पंद्रह रूपये के मूल्य पर इतनी विपुल एवं विविध सामग्री इस समय हिन्दी साहित्य में दुर्लभ है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;समावर्तन &lt;/em&gt;में अब तक देश के अनेक सुप्रसिद्ध लेखकों ने अपनी रचनाएं दी हैं। इनमें हृदयेश, परमानन्द श्रीवास्तव, कमला प्रसाद, राधावल्लभ त्रिपाठी, रमेश उपाध्याय, रेवती रमण, कांतिकुमार जैन, ज्ञानप्रकाश विवेक, चन्द्रकांत बांदिवड़ेकर, प्रमोद त्रिवेदी, राममूर्ति त्रिपाठी, लीलाधर मण्डलोई, मनोहर वर्मा, भालचन्द्र जोशी, सुधा अरोड़ा, प्रयाग शुक्ल, जयदेव तनेजा, आलोक मेहता, देवव्रत जोशी मोहन कुमार डहेरिया, हरिओम राजोरिया, बसंत त्रिपाठी, अष्टभुजा शुक्ल, राजेन्द्र उपाध्याय, ललित साह, योगेन्द्र कृष्णा, प्रतापराव कदम इत्यादि प्रमुख हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पत्रिका के संपादक निरंजन श्रोत्रिय के अनुसार &lt;em&gt;समावर्तन &lt;/em&gt;के आगामी अंकों में कई महत्वपूर्ण लेखकों एवं रंगकर्मियों पर एकाग्र अंकों को प्रकाशित करने की योजना है।&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4103886293770258948-1604430668106189981?l=shabdsrijan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://shabdsrijan.blogspot.com/feeds/1604430668106189981/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.blogger.com/comment.g?blogID=4103886293770258948&amp;postID=1604430668106189981' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4103886293770258948/posts/default/1604430668106189981'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4103886293770258948/posts/default/1604430668106189981'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://shabdsrijan.blogspot.com/2009/03/blog-post_22.html' title='समावर्तन के बारह अंक'/><author><name>योगेंद्र कृष्णा   Yogendra Krishna</name><uri>http://www.blogger.com/profile/17366269677319716325</uri><email>yogendrakrishna@yahoo.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' name='OpenSocialUserId' value='00615047406804366258'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_fc2wY2U36Kc/ScYVaCs6l5I/AAAAAAAAAjY/6j6cykl-AJc/s72-c/Samavartan_2.JPG' height='72' width='72'/><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4103886293770258948.post-4611004858688615315</id><published>2009-03-18T13:01:00.012-04:00</published><updated>2009-03-19T12:52:05.135-04:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कहानी'/><title type='text'>मुन्ना बैंडवाले उस्ताद : शिवदयाल की कहानियां</title><content type='html'>&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_fc2wY2U36Kc/ScEqEJu2koI/AAAAAAAAAjQ/Pqw2FArLfWs/s1600-h/Munna_Bandwale_Ustad-Cover__full_.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5314575286094172802" style="WIDTH: 274px; CURSOR: hand; HEIGHT: 199px" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_fc2wY2U36Kc/ScEqEJu2koI/AAAAAAAAAjQ/Pqw2FArLfWs/s320/Munna_Bandwale_Ustad-Cover__full_.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशन&lt;/div&gt;&lt;div&gt;18, इंस्टीट्यूशनल एरिया&lt;/div&gt;&lt;div&gt;लोदी रोड, नई दिल्ली&lt;/div&gt;&lt;div&gt;प्रकाशन : 2009&lt;/div&gt;&lt;div&gt;मूल्य : 150 रु&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;----------------------------------------&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-size:85%;color:#ff0000;"&gt;लेखक&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_fc2wY2U36Kc/ScEpvCNwVCI/AAAAAAAAAjI/tlNqx1dEh64/s1600-h/Munna_Bandwale.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5314574923299050530" style="WIDTH: 192px; CURSOR: hand; HEIGHT: 200px" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_fc2wY2U36Kc/ScEpvCNwVCI/AAAAAAAAAjI/tlNqx1dEh64/s320/Munna_Bandwale.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt; &lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;-----------------------------------------&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-size:180%;"&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-size:180%;"&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-size:180%;"&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-size:180%;"&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;&lt;span style="font-size:90%;"&gt;&lt;br /&gt;उत्तर उपनिवेषवादी भारतीय जीवन की कहानियां&lt;/span&gt;&lt;/span&gt; &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;&lt;br /&gt;विजेन्द्र नारायण सिंह&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;उत्तर उपनिवेषवादी भारतीय जीवन के कथाकार हैं शिवदयाल। वह चाहे दांपत्य जीवन के विघटन का प्रतिरोध हो या बाज़ारवाद का प्रतिरोध, परजीविता का प्रतिरोध हो या फिर बिंदास जीवन शैली का प्रतिरोध--सब मिलाकर उत्तरआधुनिक सभ्यता का प्रतिरोध हैं शिवदयाल की कहानियां। शिवदयाल न तो समय से त्रस्त हैं और न आशंकित। नये समाज के रचने के क्रम में वे समय भी रच देते हैं। भूमंडलीकरण के नये अर्थतंत्र की उलझन से अपनी अस्मिता के लिये संघर्ष करते चंदन और खुशबू जैसे उनकी कहानियों के पात्र सहज ही नायकत्व पा जाते हैं। चूंकि हर कहानी किसी एक समाजिक यथार्थ की अभिव्यक्ति है, इसलिए सभी कहानियों में एक ही कहानी अनस्यूत है। यथार्थ की भाषा रचने में कथाकार की कला की सहजता दिखाई पड़ती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शिवदयाल न तो गल्प गढ़ते है, और न ही वृत्तांत को रबड़ की तरह खींचते हैं, वरन् जीवन प्रवाह में गल्प के विवर्त उठ खड़े होते हैं। उनके नायक और नायिका उत्तरआधुनिक जीवन के विंदास पात्र नहीं हैं। वर्ग चरित्र में वे पेंचकश की तरह प्रवेश करते हैं और उनके शील का उन्मोचन करते हुए वर्ग की पहचान रेखांकित कर देते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शिल्प की जिस सहजता का दर्शन इन कहानियों में होता है वह आम आदमी की आमफ़हम भाषा से ही संभव है। कथ्य और शिल्प की इस अंतरंगता के कारण ही मुन्ना बैंड वाले उस्ताद के लेखक शिवदयाल हमारे समय के प्रतिनिधि कहानिकार बन गये हैं।&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4103886293770258948-4611004858688615315?l=shabdsrijan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://shabdsrijan.blogspot.com/feeds/4611004858688615315/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.blogger.com/comment.g?blogID=4103886293770258948&amp;postID=4611004858688615315' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4103886293770258948/posts/default/4611004858688615315'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4103886293770258948/posts/default/4611004858688615315'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://shabdsrijan.blogspot.com/2009/03/blog-post_18.html' title='मुन्ना बैंडवाले उस्ताद : शिवदयाल की कहानियां'/><author><name>योगेंद्र कृष्णा   Yogendra Krishna</name><uri>http://www.blogger.com/profile/17366269677319716325</uri><email>yogendrakrishna@yahoo.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' name='OpenSocialUserId' value='00615047406804366258'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_fc2wY2U36Kc/ScEqEJu2koI/AAAAAAAAAjQ/Pqw2FArLfWs/s72-c/Munna_Bandwale_Ustad-Cover__full_.jpg' height='72' width='72'/><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4103886293770258948.post-2819882216767113992</id><published>2009-03-07T00:17:00.002-05:00</published><updated>2009-03-07T00:53:25.922-05:00</updated><title type='text'>अच्छे कवि पुनर्जन्म लेते रहते हैं</title><content type='html'>&lt;strong&gt;ओम निश्चल&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;( पिछले अंक से जारी .......)&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;------------------------&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt; &lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5310311210494312194" style="WIDTH: 153px; CURSOR: hand; HEIGHT: 212px" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_fc2wY2U36Kc/SbID6SRJvwI/AAAAAAAAAig/W3nCZ909UUY/s320/2.jpg" border="0" /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;strong&gt;होने न होने से परे&lt;/strong&gt; / अमित कल्ला&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशन&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;18, इंस्टीट्यूशनल एरिया&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;लोदी रोड, नई दिल्ली, मूल्य 120 रुपये&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;-----------------------&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;चित्त और चैतन्य का रूपायन&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भौतिकतावादी समय की आपाधापी और संसारी वृत्तियों में गहरे धँसे समाज के सापेक्ष &lt;span style="color:#3333ff;"&gt;अमित कल्ला&lt;/span&gt; की कविताएँ हमें अतीन्द्रिय आस्वाद से भर देती हैं। उनकी कविता का वस्तु-विधान समकालीन कविता से बहुत अलग है और आत्मा व मन की निश्छल गहराइयों में उतर कर रचा गया है। होने न होने से परे संग्रह भी भारतीय ज्ञानपीठ के नवलेखन पुरस्कार से सम्मानित है, किन्तु इस नाते ही नहीं, यह कवि जीवन, संसार और समाज की गतिविधियों को बिल्कुल विरल दृष्टि से निरखता, रचता और अपने इंद्रियबोध का विषय बनाता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कवि आस्था, नियति, स्वप्न, मुक्ति, अन्तर्बाह्य, आगम, व्याप्ति, इच्छा, कबीरी, राग, वैराग्य, वृक्ष, ब्रह्मांड और समाधि के पक्ष को लेकर कविता में उपस्थित होता है। कवि के अवचेतन में धँसी अनेक अंतश्छवियाँ यहाँ कविता के गुह्य अर्थ में निबद्ध हुई हैं, जिनसे गुजरते हुए दृश्यों के आचमन का-सा बोध होता है। इस कवि के पास भाषा की सरहदें नहीं हैं। वह ऐसे मुक्त दिखता है जैसे मात्राओं की उलझनों से मुक्त शब्द। प्रकृति को देखने का उसका नजरिया अत्यंत सूक्ष्म है। टुकड़े टुकड़े फिरदौसी बादल को अपनी चितवन में उतारता कवि किसी कुम्हलाए ख्वाब-से प्रकृति के हर रंग को अपनी चाक्षुष अनुभूतियों में भर लेना चाहता है। एक गहरी प्रश्नाकुलता कविताओं की अन्तश्चेतना में समाई है। प्रकृति से उसका तादात्म्य गहरा और उद्वेलनों से भरा है। उसके ही शब्दों में, अंदर मैं / और बाहर वृक्ष / देखते देखते समा जाता / किन्तु वृक्ष, वृक्ष ही रहता / मैं नहीं रह पाता / वृक्ष हो जाता हूँ। (वृक्ष और मैं)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सच कहें तो ये कविताएँ जिज्ञासाओं और पृच्छाओं से भरी हैं, इनके भीतर से फूटती एक आध्यात्मिक, दार्शनिक उजास हमें सहज नहीं रहने देती। ये कविताएँ, डूब कर पढ़ें, तो पाठक को समाधिस्थ कर देती हैं। कबीरी कविता के बहाने इन कविताओं की मूर्त अन्तर्वस्तु को देखें तो इनमें एक कबीरी अर्थात फकीरी भाव विद्यमान है। कवि को इस बात का भरम नहीं है कि वह शब्दों का सारथी है। बार बार फिसलते बिखरते जाते शब्दों को सहेजना ही उसका काम्य है। एक कविता में वह कहता है--रोज रात में खोलता हूँ पोथी / भोर होते ही शब्द चिड़िया बन / उड़ जाते हैं इक - इक कर / बस रह जाते कुछ / टूटे-बिखरे पंख / सँजोता बटोरता रखता हूँ किसी अन्य खाली पोथी में / आशा से कि रात उन्हें फिर शब्द बना देगी। आशा, निराशा, निस्पृहता और रहस्यमयता को मथती-भेदती कवि की निस्संगता आखिर जानती ही है-- अपने आप मिट जाती हैं रेखाएँ / यकायक टूट जाता सचमुच / निर्लिप्त आवाजों के सहारे ही / गुजर जाता यह संसार (कितनी रिक्तता)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अमित कल्ला कला के पारखी हैं। चित्र रचना में निमग्न अमित ने कविता के अंत:संसार में भी उतर कर चित्र ही आँके हैं। जीवन की खोज में कला और कविता दोनों माध्यमों की सोहबत की है। वागर्थ के साधक हैं। ये कविताएँ तर्क और विवेक से ज्यादा चैतन्य और दार्शनिक प्रत्यभिज्ञा से उद्भूत हैं। ये आध्यात्मिक चेतना से उगाही गयी कविताएँ हैं। शायद यही कला है में अमित के चैतन्य का विश्लेषण करें तो कविता रचने की उनकी प्रविधि खुलती दीखती है। एक चित्र देखने से पहले चित्त को देखना होगा-- कहने वाले कवि को साधन और साध्य की पवित्रता खींचती है। इन कविताओं में झाँकने से पहले अपने चित्त में झाँकना जरूरी है। अमित को सांख्य दर्शन लुभाता है। प्रकृति-पुरुष का पारस्परिक सहकार खींचता है। विस्मयता इन कविताओं की नींव में है। यथार्थ, जैसा दिखता है, वैसा नहीं है। वह जटिल है, परिवर्तनशील है, सदैव संभावी है। एक वाक्य में कहें तो अमित कल्ला की ये कविताएँ यथार्थ के सूक्ष्म तंतुओं के रुबरू व्यक्ति के मनोजगत का साक्ष्य हैं और शब्द-संयम का उत्कृष्ट प्रतिफलन। इन्हें पढ़ने के लिए निस्संदेह संस्कारित चित्त चाहिए। एक दूसरे अर्थ में, ये कविताएँ चित्त और चैतन्य का रूपायन हैं।&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;-----------------------&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_fc2wY2U36Kc/SbIENpBISaI/AAAAAAAAAio/fctl5V-gZb4/s1600-h/yagyabalboy__se_bahas.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5310311543018637730" style="WIDTH: 153px; CURSOR: hand; HEIGHT: 205px" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_fc2wY2U36Kc/SbIENpBISaI/AAAAAAAAAio/fctl5V-gZb4/s320/yagyabalboy__se_bahas.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;strong&gt;याज्ञवल्क्य से बहस&lt;/strong&gt; / सुमन केशरी&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;राजकमल प्रकाशन&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;नई दिल्ली, मूल्य 200 रुपये&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;-----------------------&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;अंत:संसार से बाहर आती स्त्री&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;कविता में देर से आई &lt;span style="color:#ff0000;"&gt;सुमन केशरी&lt;/span&gt; का पहला कविता संग्रह याज्ञवल्क्य से बहस एक बार फिर कविता में मिथकों के पुनरवतरण की ओर हमारा ध्यान खींचता है। लोहे के पुतले, कबीर-अबीर, तुम्हारी चाह, एक निश्चित समय और मैंने ठान लिया है-- शीर्षकों में विभक्त सुमन केशरी की कविताओं का दायरा बहुआयामी है। पहले खंड में वे मिथकीय चरित्रों का पुनर्मार्जन करती हुई अश्वत्थामा, द्रौपदी, कृष्णा, याज्ञसेनी, कर्ण, सीता, रावण, राधा, माधवी तथा सत्यवान को समकालीनता की रोशनी में देखती हैं। द्रोपदी की अपनी पीड़ा है, उसके भीतर अपमानों की याद ताजा है। द्रोपदी जिन्दगी भर बँटने वाली एक संज्ञा-भर रही है, जिसका अपना कोई वजूद नहीं रहा। उसके सवालों का न पहले उत्तर था, न आज है। कृष्ण के रूप में परिणत होकर भी उसकी विक्षुब्धताओं का हल नहीं निकला, सखा कृष्ण से उसकी शिकायतें ज्यों की त्यों हैं। स्त्री की आवाज आज भी अनसुनी है। वह आज भी पुरुषों से जुड़कर ही पहचानी जाती है। कर्ण के अपने दुख हैं। जीवन भर सूत पु़त्र होने का लांक्षन सहना पड़ा, तरसता रहा कि माँ बस एक बार कह भर दे कि हाँ तुम राधेय हो, तुम्ही मेरे पुत्र। पर नियति देखें कि अर्जुन को श्रेष्ठ धनुर्धर का खिताब देने के लिए कितने व्यूह रचे गए। छली इंद्र ब्राह्मण बन कर कवच कुंडल तक दान में ले गए। सीता के अपने संताप हैं तो राधा की अपनी व्यथा। माधवी की स्त्री चेतना भी पिता गालव की गुरुदक्षिणा के आगे निष्प्रभ हो उठती है और दान में गृहीता बन कर विश्वामित्र के भोग का अंश बनती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कवयित्री का ध्यान पुरुष पात्रों की तरफ तो गया ही है, किन्तु स्त्री पात्रों की पीड़ा उसे ज्यादा कचोटती है। इन स्त्रियों के अनुत्तरित सवाल आज भी याज्ञवल्क्य से गार्गी के बहस की याद दिलाते हैं। संग्रह के कबीर अबीर खंड में बच्चे को लेकर पेड. और माँ को लेकर कवयित्री ने मार्मिक अनुभूतियाँ सँजोई हैं। बदले हुए समय और हालात को बूझने की कोशिश भी उनके यहाँ दिखती है और अपने अतीत से भी वे रू ब रू होती हैं जब लौंगिया की बेल देख कर मन में माँ की याद कौंधती है। सुमन केशरी के कवि-चित्त को परखना हो तो उसके लिए तुम्हारी याद व एक निश्चित समय पर खंडों की कविताएँ देखनी चाहिए। स्त्री-जीवन की तपश्चर्या को वे कविताओं में पिरोती हैं। कवयित्री के शब्दों में, अपने होने का बहाना ढूढती है औरत और बहाने से जीवन जीती है। उसकी सक्रियता घड़ी की सुइयों से परिचालित होती है और दिन भर खटती हुई शाम को अपने सपनों को खूँटी पर टाँग सुबह पुनर्जन्म लेने के लिए नींद को भेंट चढ. जाती है। माँ से संवाद करती हुई या माँ को याद करती हुई किसी कल्पना में खोई सुमन केशरी स्त्री जीवन को कभी रोजी में टटोलती है कभी बीजल में। देर से कविता के इलाके में आना भी उनकी उस जिद के कारण ही संभव हुआ है जब वे श्रृंखला की कड़ियां तोड़ कर कविता लिखने का व्रत ठानती हैं और यह करते हुए वे इस अनुष्ठान में पाठक को भी न्योतती हैं:--पिछले दिनों याज्ञवल्क्य से चलते चलते हुई मुलाकात एक लंबी बहस में बदल गयी है। क्या तुम मेरे साथ उनसे बहस में उलझोगे। स्त्री-जीवन की कारुणिकता को मन में बसाए एक घरेलू स्त्री किन्तु जागरूक कवयित्री का परिचय देते हुए वे अतीत में सोए प्रश्नों को जगाती हैं, वे मिथकों, किंवदन्तियों में उद्धृत की जाती स्त्रियों के प्रारब्ध से टकराती हैं तथा एक सहज स्त्री-मन के साथ उन प्रश्नों को एक बार फिर अपनी ताकिर्कता के धरातल पर ले आती हैं जिनके सटीक उत्तर अभी तक प्रतीक्षित हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कविता शब्द-संयम माँगती है--यह न तो बयान है, न सपाटबयानी, न सुभाषित है न निंदा पुराण या शिकवा-शिकायत। यह दुनियावी हकीकत से उपजा जीवन-सारांश है। सच कहें तो कवि अपनी कविताओं में एक बार और जन्म लेता है। सुमन केशरी की चाहत भी तो जीवन को कविता में बदल देने की है। वे इस संग्रह के बूते भले ही कवियों की उल्लेखनीय पंक्ति में शरीक न हो पाएँ किन्तु वे कवित्व के सहज गुणधर्म से भरी हैं, इसमें संदेह नहीं।&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4103886293770258948-2819882216767113992?l=shabdsrijan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://shabdsrijan.blogspot.com/feeds/2819882216767113992/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.blogger.com/comment.g?blogID=4103886293770258948&amp;postID=2819882216767113992' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4103886293770258948/posts/default/2819882216767113992'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4103886293770258948/posts/default/2819882216767113992'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://shabdsrijan.blogspot.com/2009/03/blog-post_07.html' title='अच्छे कवि पुनर्जन्म लेते रहते हैं'/><author><name>योगेंद्र कृष्णा   Yogendra Krishna</name><uri>http://www.blogger.com/profile/17366269677319716325</uri><email>yogendrakrishna@yahoo.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' name='OpenSocialUserId' value='00615047406804366258'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_fc2wY2U36Kc/SbID6SRJvwI/AAAAAAAAAig/W3nCZ909UUY/s72-c/2.jpg' height='72' width='72'/><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4103886293770258948.post-2334431136610611348</id><published>2009-03-05T09:48:00.005-05:00</published><updated>2009-03-05T11:26:44.158-05:00</updated><title type='text'>अच्छे कवि पुनर्जन्म लेते रहते हैं</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;युवा कविता के कुछ रूपाकार&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;ओम निश्चल&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;एक पक्षी है प्रतीक्षित&lt;br /&gt;जो गिरते हुए पत्तों को मन पर झेलते हुए&lt;br /&gt;आने वाले मौसम के बारे में पेड़ को बताए&lt;br /&gt;जिसकी आवाज सुनकर&lt;br /&gt;कोई नई कोंपल अचानक फूट आए&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वह आएगा अवश्य&lt;br /&gt;ऐसा विश्वास है दृढ़&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कई बार देखा गया है&lt;br /&gt;अच्छे कवि&lt;br /&gt;पुनर्जन्म लेते रहते हैं।&lt;br /&gt;&lt;/em&gt;(&lt;em&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="font-size:85%;"&gt;यकीन की आयतें&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/em&gt; / &lt;span style="font-size:85%;"&gt;आशुतोष दुबे&lt;/span&gt;)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यों तो हर व्यक्ति की सत्ता, खुशबू और पहचान अलग अलग होती है, उसकी हर गतिविधि में कहीं न कहीं उसका अपना होना लक्ष्य किया जा सकता है किन्तु मानवीय गुणों की अपनी एक ब्रांड इमेज होती है जिसे पाने की बेताबी सब में होती है। मानवीय उच्चादर्शों से जुड़ने में ही व्यक्ति की सार्थकता मानी जाती है। हम जिस भीड़ और कोलाहल के वातावरण में रहने के अभ्यस्त होते गए हैं, आज कविता के बीचोबीच खड़े हो कर ऐसी ही गहमागहमी और भीड़ का अहसास प्रबल होता है। इसी भीड़ में कुछ चेहरे हमें अलग और अपनी पहचान के साथ खड़े दिखायी देते हैं तो कविता में कुछ अलग-सा खदबदाता दिखता है। ऐसे कवि, चाहे स्वांत:सुखाय व्यग्र दिखते हों या कविता के उच्चादर्शों से खिंच कर चले आए हों, वे एकरसता को ठोकर मारते हुए कविता में अपने समय और समाज की शिनाख्त बिल्कुल अलग तरह से करते हैं। उत्तर उदारतावादी परिदृश्य में समाज जिस तेजी से बदल रहा है, तकनीक की ईजाद से नए नए संकट पैदा हो रहे हैं, मनुष्य का रुख हजार चेतावनियों के बाद भी बाजार की तरफ खिंचा जा रहा है, बचपन के खेल और चंचलताओं के लिए लगातार जगहें सिकुड़ती गयी हैं, किसी एक कवि के बूते यह संभव नहीं रहा कि वह इतनी तेजी से दृश्यांतरित होते परिदृश्य को अपनी कूची से उकेर सके।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कविता हमेशा से अपने मानवीय दायित्व निबाहती आई है। वह मनुष्य के आंतरिक परिष्कार का रास्ता प्रशस्त करती है तो अपने को समाज के सरोकारों से भी जोड़े रखती है। एकाधिक वर्षों में कविता में जिस नई पीढ़ी का आगमन हुआ है, जिसमें नए काव्यास्वाद की छवियाँ प्रतिबिम्बित होती हैं, जिसमें कुछ नया और अपने तरीके से रचने का माद्दा दिखता है, जो किसी सामूहिकता में खो जाने के बजाय अपनी अप्रतिहत शख्सियत में भरोसा रखती है, उस पीढ़ी के कुछ इने गिने कवियों में तुषार धवल, पंकज राग, सौमित्र, अमित कल्ला तथा सुमन केशरी प्रमुख हैं। यहाँ हमने विशेषकर उन कवियों को लिया है, जिनका पहला संग्रह हाल ही प्रकाशित हुआ है और जिन्होंने अपने काव्यात्मक सफर का पहला पड़ाव तय किया है। और कविता की आबोहवा में अपने होने का हस्तक्षेप दर्ज किया है। शाख से फूटती नई कोंपलों की तरह इनकी कविताओं से नए संवत्सर की-सी सुगंध आती है।&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_fc2wY2U36Kc/Sa_nrD8rJHI/AAAAAAAAAiI/a1fLgJsAsJA/s1600-h/3.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5309717212673287282" style="WIDTH: 145px; CURSOR: hand; HEIGHT: 225px" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_fc2wY2U36Kc/Sa_nrD8rJHI/AAAAAAAAAiI/a1fLgJsAsJA/s320/3.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;&lt;strong&gt;-----------------------&lt;/strong&gt;&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;&lt;strong&gt;पहर यह बेपहर &lt;/strong&gt;&lt;/em&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;em&gt;&lt;strong&gt;का&lt;/strong&gt;&lt;/em&gt; &lt;/span&gt;/ तुषार धवल&lt;br /&gt;राजकमल प्रकाशन 1बी, नेताजी सु्भाष मार्ग&lt;br /&gt;नई दिल्ली, मूल्य 200 रुपये&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;------------------------&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;रागात्मकता और आध्यात्मिक सिहरन&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;पिछले कुछ बरस से पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होते आ रहे &lt;span style="color:#ff0000;"&gt;तुषार धवल&lt;/span&gt; का संग्रह पहर यह बेपहर का उनके कवि-व्यक्तित्व की एक मजबूत पहचान बनाता है। पाँच खंडों-- अजनबी इस दौर में, दीवारें और सीढ़ियां, पुल पर मौन, चलो कहीं चलते हैं तथा पार दहलीज के-- में वर्गीकृत इस संग्रह की कविताएँ अपने स्थापत्य में भले ही एक-सी लगें, इनका भीतरी ताना-बाना अलग है। पहले खंड में इस दुरूह समय की अभिव्यंजना है तो दूसरे खंड में आज का संघर्षरत मनुष्य केंद्र में है। तीसरे खंड में इन्सानी रिश्तों का बयान है चौथे में वैयक्तिक रागात्मकता और प्रेम तथा पाँचवे खंड में आध्यात्मिकता की सिहरन जिसमें कवि मौन का अंतर्मन टटोलता है। गौर से देखें तो संग्रह के शीर्षक में ही विलक्षणता है। कहना न होगा कि पहली ही कविता जिन्न तुषार के काव्यचिंतन की गवाही देती है। उनकी कविता नए मनुष्य को संबोधित है। वह पारंपरिक गुण सूत्रों को नकारती नई सोच के आदमी की अभिव्यक्ति है। कवि के ही शब्दों में कहें तो, मुझे सपनों में कोई गांव नहीं पुकारता/नहीं दुलारते पूर्वज/दंतकथाओं का कोई सिरा नहीं जुड़ा है मेरे पोर से/अणु-परमाणु अस्तित्व का/ मेरे चंद ही हैं सरोकार/ मैं क्लोन हूँ नई सोच का। यह बदलते मनुष्य की ओर इशारा है। आज हाई मोरेल नहीं हाई सेंसेक्स मनुष्य की श्रेष्ठता का मानक बन गया है। सेंसेक्स लुढ़कने भर से मनुष्य अपने को पतन की खाई में लुढ़कता महसूस करता है। फिर उच्चादर्शों की कौन कहे। तुषार का कवि महसूस करता है-- इस हड़बड़ाई हुई दौड़ में / यह समय कितना लाचार है/ विकास की तनी प्रत्यंचा पर / कैसा हाहाकार है (टाई बाँधते हुए)। एटीएम, क्रेडिट कार्ड, आसान किस्तों में अदायगी तथा थ्री जी मोबाइल से उपजे लुभावने संसार में तकनीक ने जीवन के सारे आयाम बदल दिए हैं। चमचमाती होर्डिंग्स के नेपथ्य में बजबजाती सभ्यता का कोई नामलेवा नहीं है। जूठे सपने, शहर में, इस भीड़ में, क्या फर्क पड़ता है तथा डूबती आवाजों के बीच जैसी कविताओं में इस दौर की बदहाल तस्वीरों का मुआयना किया गया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इन्सानी जद्दोजहद का खाका खींचते हुए तुषार को एक तरफ सुख की मरुभूमि नजर आती है, दूसरी तरफ नंगे पैर। सभ्यता के असंतोष को पहली बार किसी कवि ने चिह्नित किया है। पुल पर मौन में मानवीय संबंधों पर रोशनी बिखेरती कविताएँ हैं। पिता, माँ, पानी, बहन, बेटी से अंतरंग जुड़ाव को कविता बना सकना जोखिम का काम है, किन्तु कभी अशोक वाजपेयी शहर अब भी संभावना है की मौत की ट्रेन में दिदिया जैसी निजी अहसास की कविताओं से ही जाने गए थे। और अशोक ही क्यों--तमाम कवियों ने निजी रिश्तों को कविता के आत्मीय ताने-बाने में बुना और प्रसिद्धि पाई है। तुषार धवल ने एक तरह से कवि-परंपरा का ही वरण करते हुए आत्मीय संबंधों और रागात्मकता को तरजीह दी है। वे अनुभूतियों के इन्हीं निजी क्षणों को आगे चल कर नरसोबा ची वाड़ी : भाव छवियाँ शीर्षक लंबी कविता में एक आध्यात्मिक ऊँचाई देते हैं, उसे एक ऐसी सिहरन में बदलने का उपक्रम करते हैं जो मौन के अंतर्मन को टटोलते हुए उपजती है। हमारे समय के कोलाहल में दबे मौन को खोजता कवि-- मैं नदी तुम नदी तक की यात्रा करता है। वह जब कहता है कि मुझे भर कर हर बार तुम भी नदी हो जाती हो तो यह किसी लोकेषणा के वशीभूत होकर नहीं बल्कि इस सचाई के चलते कि तृष्णा आती है सन्यास का भाव लिए छलने/ पर तुम्हारी रोशनी में बेनकाब हो जाता है हर अँधेरा। यह मैं की ईप्सा से बाहर निकलने का उद्यम है, माटी के इस घरौंदे को किसी और को सौंप कर अनन्त यात्रा पर निकल पड़ने का तोष है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस तरह तुषार की कविता इस अकेली जिल्द में ही जीवन के तमाम आयामों को छूती हुई निर्विकार हमारी तरफ देखती है। मानो तनिक विस्मय और आश्चर्य से कहती हो--पहर यह बेपहर का। कविता के क्राफ्ट से ज्यादा कवि ने कथन की सादगी पर बल दिया है और कविता-कला के लावण्य से अधिक सहज वाक्यों के कुरकुरेपन पर अधिक भरोसा टिकाया है।&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;-----------------------&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_fc2wY2U36Kc/Sa_qM_tfTKI/AAAAAAAAAiQ/_tFaRaXXxzs/s1600-h/5.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5309719994674662562" style="WIDTH: 152px; CURSOR: hand; HEIGHT: 211px" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_fc2wY2U36Kc/Sa_qM_tfTKI/AAAAAAAAAiQ/_tFaRaXXxzs/s320/5.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;यह भूमंडल की रात है&lt;/strong&gt; / पंकज राग&lt;br /&gt;राजकमल प्रकाशन&lt;br /&gt;1बी, नेताजी सुभाष मार्ग&lt;br /&gt;नई दिल्ली, मूल्य 200 रुपये&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;------------------------&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#ff0000;"&gt;विमर्श की जगमगाती तार्किक रोशनी में&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;तुषार धवल की ही तरह &lt;span style="color:#3333ff;"&gt;पंकज राग&lt;/span&gt; को भी कविता की दुनिया में व्यवस्थित रूप से प्रवेश किए अभी ज्यादा दिन नहीं हुए हैं यद्यपि वे अरसे से कविताएँ लिखते आ रहे हैं। अपने पहले ही संग्रह यह भूमंडल की रात है से वे यह जताते हैं कि वे मौजूदा बाजारवादी परिदृश्य को किस तरह आँकते हैं। इतिहास पर उनकी गहरी पकड़ है। इसलिए जहाँ उन्होंने 1857 को लेकर इतिहास को बहुविध खँगालने का यत्न किया है वहीं उनके अन्वेषी कवि की निगाह हमारे समय को देखती हुई इतिहास के पीले पड़ते पन्नों को ओझल नहीं होने देती।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इतिहास की इसी खँगाल का परिणाम दिल्ली:शहर दर शहर जैसी लंबी कविता है। दिल्ली की रूह को खोजता यह कविता-रिपोर्ताज कवि की बेचैनियों का इजहार है। इतिहास से मुठभेड़ करती, तमाम बार लहूलुहान हुई दिल्ली को दर्ज करते हुए कवि जानता है कि दिल्ली को ढ़ूढ़ना है तो मामूली लोगों तक जाना होगा। इस कविता का ताना बाना बेशक प्रोजैक है किन्तु किसी शहर के अतीत और वर्तमान के मिजाज को केवल इतिहास की आँखों से देख सकना संभव नहीं। श्रीकांत वर्मा ने जिस तरह मगध में इतिहास और मिथकों का विनियोग अपनी कविताओं में किया है या तमाम ऐसे पुरा प्रसंगों का कुँवर नारायण ने जिस तरह अपने यहाँ निवेश किया है, वैसा विनियोग तो यहाँ नहीं मिलता किन्तु इसमें संशय नहीं कि कवि की दूरंदेशी चेतना इतिहास के बहुस्तरीय ढाँचे में दबे यथार्थ और सभ्यता के कवच-कुंडल में ठिठके वर्तमान के असंतुलित विकास को चिह्नित कर पाती है। विमर्श की जगमगाती तार्किक रोशनी में पंकज ने कविता का एक चंदोवा बुना है, जहाँ कवि-मन से ज्यादा नागरिक वेदना नजर आती है। 1857 को लेकर लिखी 1857 के डेढ़ सौवें वर्ष में भी ऐसी ही कविता है, किन्तु यह इतिहास के समानान्तर एक यात्रा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज कविता से मासूमियत विदा हो चुकी है। कवि को दमकते चाकचिक्य और सतरंगी बातों का यथार्थ पता है। कर्ज से मिटती थकान और अनुदान से मिटती उधारी की हकीकत पता है। वह कहता है-- अब विमर्श ही विमर्श है और बुद्धिजीवियों और तालीमयाफ्ता नुमाइंदों की बढ़ती कतार। यह भूमंडल की रात है। इस कविता (यह भूमंडल की रात है) में आज का भूमंडलीकृत समय बोलता है। यहाँ सूखा पर एक कविता है जो कहती है सूखा एक परंपरा है। सूखे की तालीम आसान नहीं, इसका अपना रहस्यवाद है। कविता के अंतिम पद में कवि के इस कथन के पीछे कि सूखा एक घोषणा भी है, यहाँ राहत अनुभूति नहीं, प्रक्रिया है-- सूखे को लेकर चलने वाली राजनीतिक घोषणाओं का निहितार्थ प्रकट होता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पंकज राग की कविताओं पर न तो विचारों का दबाव है, न कविता को शिल्प की तरह बरतने की व्यग्रता ही दिखती है। कुछ कविताएँ, जैसे प्रेम, मत फाड़ो, शपथ, गर्मी बाकी है, सोचते हुए तथा कुछ कविताओं के बहाने आदि काव्यास्वाद का एक स्पेस सृजित करती हैं। कुछ कविताओं के बहाने वे संस्कृति की तथाकथित अस्मिस्ता से आती दुर्गन्ध की ओर इशारा करते हैं तो कुछ कविताओं के जरिए वे प्राच्यविदों को कटघरे में खड़ा करते हैं जो बाहर से आगत लोगों को वापस निकालने को अपनी आत्मा की आवाज कहते हैं। किन्तु अधिकतर कविताओं से यह प्रकट होता है कि आज की अस्त-व्यस्त मशीनी जिन्दगी ने न केवल आम आदमी को, बल्कि कवियों को भी किस कदर मशीनी बना दिया है। एक यांत्रिक किस्म की संवेदना हमारी चेतना पर हावी हो चुकी है। लिहाजा ह्वदय के सबसे कोमल प्रदेश से निकलने वाली कविता इतनी निस्संग क्यों होती जा रही है कि कवि को सिर्फ अपनी ही आवाज गूँजती सुनाई देती है। इसलिए यह कहना निस्संशय सही है कि आज कविता पर विचार नहीं, विमर्श हावी हैं। कविता की किसी महीन बीनाई के बजाय वे सहज किन्तु संजीदा गद्य के फार्मेट में ही पुरअसर तरीके से अपनी बात करते हैं। समय पर लिखी कुछ कविताओं से उद्धृत इन पंक्तियों से हमारे समय और जीवन की कश्मकश का पता चलता है : बहुत दिनों बाद समय ने थोड़ा प्यार किया/ तो जिन्दगी उसे डाँटने लगी/ बात आदत के भय की थी/ समय थोड़ी देरे के लिए माँ जैसा था/ जिन्दगी वही खीझते बाप-सी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पंकज राग कई कविताओं में कुछ धुँधले-से प्रतीकों में इस डरावने समय के बारे में बात करते हैं। रात कविता में वे कहते हैं एक रात ऐसी भी आएगी / अगले कई दिन खंडहर हो जाएँगे। इसी तरह सूचना के अधिकार के इस दौर में उनकी कविता सूचित तो तुम्हें होना ही पड़ेगा-- सूचना-बहुल समय पर एक गहरा व्यंग्य है। वे बड़े संजीदा ढंग से यह लिखते हैं-- शहर की बदरंग हो चुकी दीवारों के बीच / महफूज है एक पुरानी इमारत--एक कोना सम्हाले / तारीख के उस मजबूत हिस्से को/इश्तहार की तरह/ मत फाड़ो/ मेरे सरमायादारो! (मत फाड़ो) कहना होगा कि कविता से पंकज के सरोकार संजीदा हैं, वे इस बात का भरपूर यत्न करते हैं कि चीजें कविता के शिल्प में घटित हों, होती भी हैं किन्तु कहीं-कहीं सूचनाओं का दबाव उनकी संवेदना की त्वचा पर भारी पड़ता है।&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;-----------------------&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_fc2wY2U36Kc/Sa_vdhgHjTI/AAAAAAAAAiY/Ue8EPNwRd6E/s1600-h/4.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5309725776181431602" style="WIDTH: 152px; CURSOR: hand; HEIGHT: 194px" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_fc2wY2U36Kc/Sa_vdhgHjTI/AAAAAAAAAiY/Ue8EPNwRd6E/s320/4.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;मित्र&lt;/strong&gt; / सौमित्र&lt;br /&gt;भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशन&lt;br /&gt;18 इंस्टीट्यूशनल एरिया&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;लोदी रोड, नई दिल्ली, मूल्य 120 रुपये&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;&lt;strong&gt;---------------------&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;उत्सवता की हिलोर&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बिल्कुल नए कवि &lt;span style="color:#ff0000;"&gt;सौमित्र&lt;/span&gt; इन दिनों ओहायो में रह रहे हैं। भारतीय ज्ञानपीठ के नवलेखन पुरस्कार से सम्मानित उनके संग्रह मित्र की अधिकांश कविताएँ विभिन्न मूड और मिजाज की कविताएँ हैं। ज्यादातर में छोटे छोटे सजीव क्षणों को कविताओं में सहेजा गया है। उनके बारे में कहा गया है कि समय सौमित्र के लिए एक बिम्बबहुला वीथिका है। सौमित्र की कविताओं के मिजाज को समझने के लिए व्यापार कविता की पंक्तियाँ देखें--आज तुमने मुझसे बात की / लगा सारे फूल तुमने अपने घर के लाकर रख दिए/ मेरे दरवाजे पर/ कल मैं तुमसे बात करूँगा/ और ढेर सारे पौधे रोप आऊँगा तुम्हारे आँगन में। समय के दबावों के बावजूद कविता अंतत: एक हार्दिक अभिव्यक्ति है। बिना संवेदना की छुअन के यह संभव नहीं है। और यह हार्दिकता, तरलता, सौमित्र के पास है। उनकी कविता के परिवार में चिड़ियाँ उसी तरह शामिल हैं जैसे माँ, पिता, सगे संबंधी। मानवीय जीवन में चिड़ियों का ऐसा आत्मीय सहकार वही कवि महसूस करता है जिसने ऐसे ही जीवन्त कलरव और चिड़ियों की चुहल के बीच जीवन बिताया हो। वह चिड़ियों को संबोधित करते हुए जीवन की तमाम सहज जिज्ञासाएँ जैसे उनके समक्ष रख देना चाहता है, जैस कि वह एक अंडे को सेह कर कैसे जीवन उत्पन्न करती है, कैसे वे सात्विक-सी दृष्टिगोचर होती हैं, कैसे वे नदक-नदक कर दुनिया को मस्ती का पाठ सिखाती हैं, बालियों से दाने चुगती हुई उत्सव-सा रचाती हैं और आगे कवि-कल्पना तो देखें कि जब चोंच मारती हूँ मैं/ तुम्हारे ढेरे सारे फलों में से एक पर / तो ऊपर का अन्नदाता / मेरे मुँह से ऋतु का प्रसाद चखता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चिड़ियों से सौमित्र की यह मैत्री केवल कवि की अल्हड़ता का परिचायक ही नहीं है, वह इस बात का संकेत भी है कि कविताओं को एकालाप होने से बचाने के लिए कवि कैसे अपना एक संगी ढूढ़ लेता है। चिड़ियों की गृहस्थी की बात वह करता है तो लगता है जैसे चिड़ियों के बिना खुद कवि की गृहस्थी पूरी नहीं होती। उसने चिड़ियों को नाम भी कैसे कैसे दिए हैं--सुमन और सुनन्दा और फिर उनकी कारगुजारियों का वृत्तांत गढ़ता हुआ एक काव्यात्मक सुख का अनुभव करता है। सौमित्र के यहाँ चिड़ियाँ किसी प्रतीकवाद के कारण नहीं, कवि की अपनी प्रकृति के कारण आती हैं, वे कवि की आत्मा में गहरे उतरती हैं, उससे सीधा संवाद करती हैं। टहनियों, पित्तयों, फूलों, बालियों, घोंसलों की बात करती हैं। नित्यप्रति बदलते आकाश की बातें करती हैं और बार बार कहती हैं-- भीतर पेड़ में लौट कर खो जाने का मन होता है। इसीलिए जब चिड़ियाँ पेड़ छोड़ कर उड़ती हैं तो जैसे एक आवाज-सी टहनियों से आती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सौमित्र की कविताएँ विभिन्न क्षणों की अनुभूतियों का समुच्चय भले लगती हैं किन्तु उसके भीतर अनेक आख्यान, अनेक संवाद, अनेक व्यंजनाएँ हैं। सौमित्र ने कविताओं में नहीं जैसे जीवन में रंग भरे हैं। रंग कविता में माँ के साथ खरीदारी के लिए स्कूटर पर जाते हुए क्षणों को दृष्टि में भर कर देखें तो सौमित्र के भीतर का सौष्ठव कविता को कितनी ऊँचाई पर प्रतिष्ठत कर देता है। माँ को छूकर कवि में जैसे यह अहसास जागता है कि एक आँचल आसमान से भी बड़ा / मेरी मुट्ठी में है / और एक हवा है जो / मेरे बालों को छूकर आँचल हिला रही है। इसी तरह दिवंगत कविता पढ़ें या बूढ़ी औरतें, स्मृति या दिन, या फिर मोक्ष और पुनर्जन्म-- सौमित्र ने कल्पना की हदें तोड़ दी हैं। उसके कवि-मन की थाह ले पाना कभी कभी मुश्किल-सा हो जाता है। मित्र को पढ़ते हुए प्रेमरंजन अनिमेष के संग्रह कोई नया समाचार की याद आती है, जिसकी सारी कविताओं के केंद्र में बच्चे हैं। जैसे कि यहाँ चिड़ियाँ, माँ, पिता, दादी और कवि की कल्पनाशील पदावलियाँ। चित्र उकेरना कोई सौमित्र से सीखे। सिर सहलाती हवा को हाथ फेर कर न उड़ने की ताकीद वे महज इसलिए करना चाहते हैं कि उन्हें इससे अपनी दादी की याद आती है। बेटी के नाम को लेकर लिखी प्रार्थना कविता में जीवन को जिस हिलोर के साथ और भाव-विभोर होते हुए जिया गया है, उसकी धमक मोक्ष में यों प्रकट होती है--मुझे मोक्ष नहीं चाहिए / ऐसी चीज का मैं क्या करूँगा/ जो घर जाते माँ को यह भी न कह सकूँ / कि देखो तुम्हारे लिए आज क्या लाया। रागात्मकता क्या होती है, संबंधों में न्योछावर हो जाने तक की अनुभूति को किस भाषा-भंगिमा में कहा जाए, इस उलझन से प्राय: हर कवि को गुजरना होता है। सौमित्र इसे बड़ी सहजता से कह लेते हैं। कहना न होगा कि सौमित्र की कविता भाषा और विचारों से नहीं, भावात्मक वेध्यता से रची-बुनी है। मित्र कविता में वह समुद्र के पानी से मुँह धोने की इच्छा से भरा हुआ नदियों से घुल-मिल समुद्र में नमक बन कर घुल चुकी अस्थियों से बात करना चाहता है। सदियों से मौन थके मृतकों से उनका सुख दुख बतियाना उसकी इच्छाओं में शामिल है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इन कविताओं में कवि के झरने सरीखे मन की बहुतेरी उपस्थितियाँ हैं। एक गहरी फील यानी अनुभूति की सजीवता हर कविता में दिखेगी, संशोधन, प्रक्रिया, अनुरोध-- इन तमाम कविताओं में कवि के भीतर कल्पना की रील चलती हुई दिखायी देती है। सौमित्र में सरलता है, उसकी कल्पना में दुनिया को बहुत सुंदर देखने की आकांक्षा है--उसके कल्पना-कैनवस का कोई भी रंग चिड़ियों की आवाजाही के बिना अधूरा है। वह संबंधों को पूरी ऊष्मा के साथ जीने वाला कवि है। उसके मन के भीतर सेंसर्स नहीं हैं, वह कविता करने के लिए कलम उठाता है तो जैसे कल्पनाएँ, बिम्ब, प्रतीक सावधानी से कवि के संकल्प की रक्षा में तैनात हो उठते हैं, सारा बाजारवाद, सारी यांत्रिकता उसके कदमों में सिर धुनती है। &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;(अगले अंक में जारी)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4103886293770258948-2334431136610611348?l=shabdsrijan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://shabdsrijan.blogspot.com/feeds/2334431136610611348/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.blogger.com/comment.g?blogID=4103886293770258948&amp;postID=2334431136610611348' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4103886293770258948/posts/default/2334431136610611348'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4103886293770258948/posts/default/2334431136610611348'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://shabdsrijan.blogspot.com/2009/03/blog-post.html' title='अच्छे कवि पुनर्जन्म लेते रहते हैं'/><author><name>योगेंद्र कृष्णा   Yogendra Krishna</name><uri>http://www.blogger.com/profile/17366269677319716325</uri><email>yogendrakrishna@yahoo.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' name='OpenSocialUserId' value='00615047406804366258'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_fc2wY2U36Kc/Sa_nrD8rJHI/AAAAAAAAAiI/a1fLgJsAsJA/s72-c/3.jpg' height='72' width='72'/><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4103886293770258948.post-2117891624811957122</id><published>2009-02-05T10:00:00.006-05:00</published><updated>2009-02-15T13:38:05.075-05:00</updated><title type='text'>साक्षात्कार</title><content type='html'>&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_fc2wY2U36Kc/SYr_LXOyT2I/AAAAAAAAAhE/xlnjCpfmUW0/s1600-h/untitled.bmp"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5299328482234486626" style="WIDTH: 150px; CURSOR: hand; HEIGHT: 164px" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_fc2wY2U36Kc/SYr_LXOyT2I/AAAAAAAAAhE/xlnjCpfmUW0/s320/untitled.bmp" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:180%;color:#ff0000;"&gt;कविता स्वभावत: एक स्वायत्त कला है&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;&lt;strong&gt;वरिष्ठ कवि &lt;em&gt;कुंवर नारायण&lt;/em&gt; से &lt;em&gt;अरुंधती सुब्रह्मणियम&lt;/em&gt; की बातचीत&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:85%;"&gt;&lt;span style="color:#33cc00;"&gt;मूल अंग्रेजी से अनुवाद : &lt;em&gt;योगेंद्र कृष्णा&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;अ. सु.&lt;/strong&gt; : &lt;em&gt;&lt;span style="color:#ff6600;"&gt;आपके छ: कविता-संग्रहों के क्रम में आपकी कविता ने कौन-सी दिशाएं तय की हैं? क्या आप एक संग्रह से दूसरे संग्रह तक की अपनी इस कविता यात्रा को विषय-वस्तु, सरोकार, और रूपाकार के प्रति अपने दृष्टिकोण के संदर्भ में निरूपित करना चाहेंगे? क्या इस बीच काव्य-शास्त्र को लेकर आपके अपने दृष्टिकोण में कोई तब्दीलियां आई हैं?&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;कुं. ना.&lt;/strong&gt; : मैं अट्ठाइस वर्ष का था जब मेरा पहला कविता-संग्रह चक्रव्यूह प्रकाशित हुआ. इसके पूर्व मैंने अंग्रेजी में लिखना प्रारंभ किया था, और उस निर्मिति-काल में मुझ पर योरप की रोमानी कविताओं का पुरजोर असर था. अंग्रेजी रोमानी कवियों की अपेक्षा मैं फ्रांसिसी प्रतीकवादियों, विशेषकर बॉदेलेयर, मलार्मे, वर्लाइने, रिम्बॉद आदि से अधिक प्रभावित था. चक्रव्यूह में कई कविताएं हैं जिनपर प्रतीकवादी प्रभाव दिखते हैं. उदाहरण के लिए, मुक्त छंद (फ्री वर्स) ने मुझे हिंदी कविता के सख्त छंद-विधान को अधिक स्वतंत्रता और अन्वेषणों के साथ रूपांतरित करने में हमारी मदद की. मैंने संस्कृत के वार्णिक मीटर के प्रति एक सहज निकटता महसूस की क्योंकि इसकी संरचना समान थी--शब्द-गणना यहां स्वराघात (स्ट्रेस) और अंत्यानुप्रास (राइम) से अधिक महत्वपूर्ण हैं. हिंदी शब्दों की व्युत्पत्ति का एक लंबा और आकर्षक इतिहास रहा है--शब्दों के अर्थ होते हैं, लेकिन इससे भी कहीं अधिक महत्वपूर्ण उनकी संस्कृति और इतिहास होता है. शब्दों की एक तात्कालिकता होती है, लेकिन उससे कहीं अधिक अर्थपूर्ण उनका एक व्यक्तित्व होता है जिसे कविता में जीवंत कर, सदियों लंबी उनकी उन अनुभव-यात्राओं के बारे में जाना जा सकता है जिनसे गुजर कर वे वर्तमान अर्थ-संदर्भ तक पहुंचे हैं. इस दृष्टि से चक्रव्यूह की कविताएं शब्दों के इस जादुई लोक में मेरी पहली अनुभव-यात्रा थीं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन मैंने हिंदी मीटर में मात्रा को बिलकुल छोड़ नहीं दिया. परिवेश : हम-तुम, जो पांच वर्ष बाद प्रकाशित हुआ, में मुक्त छंद और छंद दोनों साथ-साथ चलते हैं, लेकिन भाषिक और सामाजिक स्तर पर, यह एक ज्यादा वैविध्यपूर्ण दुनिया है जिसमें मेरी कविता सांस लेती है. अपने संग्रह प्रकाशित कराने की मुझे कभी कोई हड़बड़ी नहीं रहती : पांच-दस वर्षों के बीच का अंतराल उसी प्रकार दिक्काल से भरा होता है जिस प्रकार दो शब्दों के बीच की खाली जगह--जो खाली दिखती है, लेकिन वास्तव में होती नहीं. देखा जाए तो, इन अलग-अलग संग्रहों के बीच एक सिलसिला है, वे एक-दूसरे से जुड़े हैं, और इन्हें हम एक नैरन्तर्य (कंटिनुअम) के रूप में पढ़ सकते हैं--जो मेरे भीतर और बाहर की दुनिया में घटित हो रहे बदलावों के प्रति मेरी प्रतिक्रियाओं के रूप में अभिव्यक्त हुए हैं. आत्मजयी (कठोपनिषद पर आधारित और 1965 में प्रकाशित एक लघु महाकाव्य) मेरे अन्य संग्रहों से बिलकुल भिन्न है. यहां मृत्यु के प्रति मेरी दृष्टि उजागर हुई है. मृत्यु--जिसका सामना हर व्यक्ति को अपने जीवन में करना होता है. मुझे लगता है, सृजनात्मक जीवन हमें एक प्रकार का अमरत्व-बोध (इंटिमेशन ऑफ इम्मोर्टालिटी) प्रदान करता है और मृत्यु के भय से हमारा ध्यान हटाता है. अपने सामने (1979) देश में आपातकाल के पूर्व तथा बाद की सामाजिक-राजनीतिक स्थितियों का प्रत्यक्ष जायजा लेता है. इसके बाद के संग्रह कोई दूसरा नहीं (1993) और इन दिनों (2002) में मैंने मानव जीवन और उसकी दुनिया के बारे में अपनी दृष्टि को विस्तार देने की कोशिश की है. इस दृष्टि को वैश्विक कह देना भर बहुत स्थूल बात होगी क्योंकि इस दृष्टि में मिथक, इतिहास, संस्कृति, विकास आदि से जुड़ी हमारी व्यापक चिंताएं और सरोकार शामिल हैं. अपने जीवन-संघर्ष की समझ को व्यापकता प्रदान करने के लिए कविता एक संवेदनात्मक और कल्पनाशील साधन है. इस तरह, मेरी कुछ कविताओं को इस रूप में पढ़ना अर्थपूर्ण हो सकता है. एक संपूर्ण जीवन-यथार्थ केवल अनुभूत दुनिया से ही नहीं बनता बल्कि यह काल्पनिक दुनिया से संपृक्त होकर अनुप्राणित होता है. अपनी कविताओं पर मैंने किसी प्रकार का सौंदर्यशास्त्र आरोपित नहीं किया है, बल्कि उन्हें स्वयं अपने `रूपाकार´ और `विषयवस्तु´ निर्धारित करने की स्वतंत्रता दी है. मार्क्स की यह मान्यता कि `रूप´ `विषयवस्तु´ का ही `रूप´ है, या जगन्नाथ (17वीं शताब्दी) की पुरानी संस्कृत उक्ति `शब्दारथौ-सहितौ-काव्यम्´ (कविता शब्द और अर्थ का सुखद संयोजन है) मेरे लिए काव्य-रचना की एक सारगर्भित व्यावहारिक परिभाषा प्रस्तुत करती है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;अ. सु.&lt;/strong&gt; : &lt;em&gt;&lt;span style="color:#ff6600;"&gt;साहित्य के प्रति आपका लगाव कैसे हुआ? अपने प्रारंभिक अनुभवों के बारे में हमें कुछ बताएं.&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;कुं. ना&lt;/strong&gt;. : पुस्तकें मुझे बहुत शुरू से ही आकिर्षत करती रहीं और मैं अपना अच्छा खासा समय पुस्तकें पढ़ने और स्वयं भी कुछ लिख डालने में व्यतीत कर देता. जब मैं विश्वविद्यालय में था तभी मैंने कविताएं लिखना शुरू कीं--पहले अंग्रेजी में और फिर थोड़े ही समय बाद हिंदी में. काव्य-लेखन की प्रक्रिया, किसी भी अन्य सृजनात्मक प्रक्रिया की तरह, जटिलताओं से भरी है, इसलिए इसे बहुत स्पष्ट शब्दों में व्याख्यायित नहीं किया जा सकता. जीवन और भाषा में इसकी जड़ें बहुत गहरी हैं, और यह एक प्रकार के जैव विकास की प्रक्रिया के समान है. यही कारण है कि अपने विकास-क्रम की एक खास अवस्था पर पहुंच कर कवि के लिए यह असंभव-सा होता है कि वह अपनी रचनात्मक पहचान को बनाए रख सके और उसे एक वस्तुपरक स्वायत्त सत्ता के रूप में निरूपित करे. अपनी कविताओं को वह एक आलोचकीय दृष्टि से परख तो सकता है, लेकिन उसकी कविताएं इस रूप में किस तरह प्रतिफलित हुईं, इसकी तार्किक व्याख्या वह शायद ही कभी कर पाए. अपने बारे में मैं ऐसा ही कुछ महसूस करता हूं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उन्नीस सौ पचपन में मैंने पोलैंड, रूस, और चीन की यात्रा की थी, और वारसा में मुझे पाब्लो नेरुदा, नाज़िम हिकमत और एंटन स्लोनिस्मकी से मुलाक़ात का अवसर मिला था. इस उम्र में ये मुलाक़ातें मेरे लिए बहुत महत्वपूर्ण थीं. इसने कविता के प्रति मेरे आकर्षण को और बढ़ा दिया. लखनऊ का तत्कालीन साहित्यिक जीवन काफी समृद्ध था--कॉफी हाउस में नियमित विचार-विमर्श और लेखक मित्रों के साथ लेखक संघ की साप्ताहिक साहित्यिक गोष्ठियां हुआ करतीं. इस दौरान मुझे अनेक अग्रज साहित्यकारों, शिक्षाविदों तथा राजनीतिज्ञों से मिलने का अवसर मिला. आचार्य नरेंद्र देव, आचार्य कृपलानी तथा डा. राम मनोहर लोहिया--जो मेरे पारिवारिक सदस्य के समान थे--का मेरे विचारों की निर्मिति में पर्याप्त योगदान रहा. उन्होंने मुझे मेरे परिवार की व्यापारिक पृष्ठभूमि से बाहर निकाल कर साहित्य की दिशा में प्रेरित किया. इन सभी अनुभवों को मैं अपनी साहित्यिक निर्मिति में अत्यंत महत्वपूर्ण मानता हूं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;अ. सु.&lt;/strong&gt; : &lt;em&gt;&lt;span style="color:#ff6600;"&gt;आपने कई अंतरराष्ट्रीय लेखकों का अनुवाद किया है. उदाहरण के लिए बोर्खेज़, कवाफ़ी, वालकॉट आदि. अनुवाद की इस प्रक्रिया ने--जो कि स्वयं एक रचनात्मक प्रक्रिया है--आपके लेखन को किस तरह प्रभावित किया?&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;कुं. ना&lt;/strong&gt;. : मेरा मानना है कि किसी अच्छे कवि को जानने का सर्वोत्तम उपाय यह है कि आप उसे अनुवाद करने की कोशिश करें. जब मैंने अपने फ्रेंच शिक्षक की मदद से मलार्मे का अनुवाद सीधे फ्रेंच से करने की कोशिश की तो मुझे बहुत कुछ सीखने का अवसर मिला. मेरे यह अनुवाद मलार्मे की मूल रचना से सर्वथा भिन्न थे : लेकिन उस विरल काव्य-सामग्री पर स्वतंत्र रूप से कार्य करने के इस उर्वर अनुभव ने मुझे कविता में एक ऐसी मूल्यवान अंतर्दृष्टि प्रदान की जो उन कविताओं के शाब्दिक अनुवाद से कभी संभव नहीं होता. जर्मन अनुवादकों के साथ मिलकर किए गए कवाफी, बोर्खेज़, वालकॉट तथा हाल में, गुंटर ग्रास की रचनाओं के अनुवाद ने भी उसी तरह मेरे अनुभवों को काफी समृद्ध किया है. ये सारे कवि एक-दूसरे से काफी अलग हैं, इसलिए इस अनुभव ने मुझे काव्य-शिल्प के विभिन्न आयामों को समझने में मेरी मदद की. कविता अकसर पूरी तरह संस्कृति-विशिष्ट तथा भाषा-विशिष्ट कला है, और बहुतेरी ऐसी कविताएं हैं जिनके शाब्दिक अनुवाद का या तो बहुत कम या कोई अर्थ नहीं निकलता जबतक कि उस दूसरी भाषा में उनका पुनर्लेखन न कर दिया जाए. उदाहरण के लिए, उर्दू की अधिकांश कविताएं अतिशय संस्कृति/भाषा-विशिष्ट हैं : इसलिए गालिब के अंदाज़े-बयां का अनुवाद करना बिलकुल असंभव है. विभिन्न प्रकार के कवियों की रचनाओं के अनुवाद के क्रम में एक अहम अंतर जो मैंने महसूस किया वह यह कि किसी एक भाषा में समान रूप से सभी प्रकार की कविताओं को ग्रहण करने की क्षमता नहीं होती. ऐसा भी हो सकता है कि एक ही कवि की विभिन्न कविताओं में से कुछ कविताओं का अनुवाद संभव हो और कुछ का नहीं. उदाहरणस्वरूप, गुंटर ग्रास को अनुवाद करते हुए मैंने पाया कि सैटर्न जैसी उनकी कविताओं का हिंदी अनुवाद तो सहज है, किंतु द्वितीय विश्वयुद्ध से जुड़े विशिष्ट अनुभवों पर केंद्रित उनकी कविताओं का अनुवाद हिंदी में उतना सहज नहीं जितना कि यूरोपीय भाषाओं में.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अनुवाद में जिस चीज ने मुझे सर्वाधिक आकृष्ट किया वह है इसका अन्वेषणात्मक पक्ष. यह सहज स्वाभाविक था कि मैंने अनुवाद के लिए वैसे कवियों को चुना जो मेरी संवेदना और सरोकारों के सर्वाधिक निकट थे. बोर्खेज़ और कवाफ़ी में मैंने जीवन और अतीत को देखने का जो तरीका पाया वह मेरे लिए भी, भारतीय इतिहास को जैसे मैं देखता हूं, उस संदर्भ में प्रासंगिक जान पड़ा. मैं गुन्नार एकलॉफ और पाब्लो नेरुदा के नाम भी जोड़ना चाहता, जिनका मैं प्रशंसक रहा हूं, लेकिन उनका अनुवाद करना मुझे कभी सहज नहीं लगा. कविता अपना शिल्प अनेक स्रोतों से ग्रहण करती है, मेरी कविताओं के संदर्भ में भी ऐसा ही रहा है--जिन कवियों का अनुवाद मैंने किया है वे इन स्रोतों में से केवल एक स्रोत हैं. पचास और साठ के दशक में विश्व साहित्य पर मार्क्सवाद का जबर्दस्त प्रभाव रहा. जमीनी यथार्थ, आम गरीबी और शोषण के सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक समाधान के प्रति मार्क्सवाद के प्रबल आग्रह से आम आदमी की समस्याओं की ओर चिर-अपेक्षित ध्यान आकृष्ट हुआ. इसने लोगों में एक उम्मीद को जन्म दिया कि उनके दुख और संताप का शमन प्रभावी राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक कार्रवाई से संभव है--यह महसूस किया जाने लगा कि महान आदर्शवादी स्वप्न अब उनकी पहुंच से दूर नहीं है. लेकिन बहुत जल्द ही स्वयं मार्क्सवादी राजनीति के भीतर के अंतर्विरोध उभरकर सामने आने लगे, और राजकीय नियंत्रण के नाम पर फासीवादी प्रवृत्तियां--जैसा कि मार्क्सवाद के सोवियत और चीनी मॉडल में हमें देखने को मिला--उन्हीं लोगों का शोषण करती प्रतीत हुईं जिन्हें मुक्त करने का संकल्प उसने लिया था. जल्द ही, एक रूपांतरित मार्क्सवाद--ज्यादा उदार और लोकतांत्रिक--अस्तित्व में आ चुका प्रतीत होता है और जिसने आज लोगों के ज़ेहन में एक जगह बना रखी है. मार्क्सवाद के हिंस्र और युद्धोन्मुख संस्करण की अपेक्षा इसका ज्यादा पसंदीदा यह समाजवादी मॉडल ही मेरे लेखन में भी अंतत: बना रहा है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गांधी के दर्शन में मुझे एक सक्रिय नैतिक क्रांति दिखाई देती है. बुद्ध के विश्व-दर्शन और गांधीवादी विचार-व्यवहार में काफी समानताएं हैं. क्रांति के हिंसक साधन अनगढ़ भावोत्तेजनाओं के ख़ूनी विस्फोट हैं: अहिंसक क्रांति एक अटल और दृढ़ नैतिक बल की मांग करती है--और इसका सर्वोत्तम दृष्टांत हमें ब्रिटिश उपनिवेशवाद के विरुद्ध गांधी के प्रतिरोध में देखने को मिलता है. बौद्ध दर्शन, जैसा कि मेरी कविताओं में आप पाएंगे, आस्था के कारण उतना नहीं, जितना कि लंबे समय से स्वयं को अस्तित्व में बनाए रखने के कारण मुझे आकृष्ट करता है. इसके अस्तित्व की गहरी जड़ें बीहड़ संयम और समायोजन की इसकी क्षमता में निहित है, न कि इसकी रूढ़िवादी प्रकृति में. भारत और मध्य एशिया में विकसित और संविर्द्धत बौद्ध दर्शन के विभिन्न संप्रदायों पर यदि एक सरसरी निगाह दौड़ाई जाए तो हमें करुणा और संवेदना के इस दर्शन में एक अद्भुत लचीलापन देखने को मिलेगा. मानवतावाद वह विराट विंदु है जहां मानव कल्याण से जुड़ी तमाम विचार-धाराएं आकर मिलती हैं, और अपनी कविताओं में मैंने इस विंदु का हमेशा ध्यान रखा है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;अ. सु. :&lt;/strong&gt; &lt;em&gt;&lt;span style="color:#ff6600;"&gt;कविता के अलावा, अन्य विधाओं में भी आपकी रुचि रही है. एक कवि के रूप में आपकी मूल विधा के साथ आपकी ये अन्य अभिरुचियां किस तरह पेश आती हैं?&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;कुं. ना&lt;/strong&gt;. : मैं आरंभ से ही कविता के साथ-साथ कहानियां, साहित्यालोचना, फिल्म समीक्षा तथा निबंध लिखता रहा हूं. अक्सर विषय ही विधाओं का चयन कर लेते हैं. सिनेमा, नाटक, संगीत और कला का गहरा रिश्ता मेरी काव्य-संवेदना से है, लेकिन वे मेरी काव्यानुभूत दुनिया के विस्तार नहीं हैं, बल्कि इस दुनिया--जिसमें हम रहते हैं--से जुड़े मेरे अनुभवों और मेरे विचारों के विस्तार हैं. इनमें बदलाव आते रहते हैं और मेरी कविता अक्सर इन बदलावों से नई स्फूर्ति और ऊर्जा प्राप्त करती है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;अ. सु.&lt;/strong&gt; : &lt;span style="color:#ff6600;"&gt;&lt;em&gt;आपकी राय में वे कौन-सी चुनौतियां हैं जिनसे आज का कवि रू-ब-रू है? समकालीन हिंदी कवि के सामने क्या कोई विशेष चुनौतियां भी हैं?&lt;br /&gt;&lt;/em&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;कुं. ना&lt;/strong&gt;. : किसी महान विचारधारा का पतन अपने पीछे एक विराट शून्य छोड़ जाता है. आधी सदी से अधिक समय से हिंदी रचनाशीलता का एक अच्छा-खासा हिस्सा मार्क्सवादी तथा आधुनिकतावादी सिद्धांतों से प्राण-शक्ति लेता रहा. विगत 15-20 वर्षों के दरमियान इस स्थिति मे आमूल परिवर्तन हुआ है. आज की तारीख में हम उत्तर-मार्क्सवादी व उत्तर-आधुनिकतावादी दुनिया में रह रहे हैं, जहां हम बाजार के अर्थतंत्र और वैश्वीकरण से पैदा हुई नई चुनौतियों से दो-चार हैं. भारत जैसे विकासशील देश के लिए, जहां गरीबी, निरक्षरता, प्रदूषण और भ्रष्टाचार आज भी समाज में व्याप्त हैं, नए बदलावों ने आशाओं से अधिक चुनौतियां ही पैदा की हैं. हिंदी साहित्य सामान्यत: इन समस्याओं के प्रति सजग है. लेकिन इसकी प्रतिक्रिया अक्सर हड़बड़ी में लिखी गई अखबारी लेखन-सी प्रतीत होती है, न कि आत्म-मंथन से पैदा हुई कोई चीज. ऐसा संभवत: इसलिए है कि ये समस्याएं हमारे जीवन की सतह पर घटित हो रहे तेज बदलावों से जुड़ी हैं, न कि उन मूल्यों से जिनकी जड़ें व्यक्ति की सांस्कृतिक, कलात्मक और मानवीय अनुभूतियों की गहराइयों तक जाती हैं. दोनों ही प्रकार के जीवन से जुड़ी कविताएं एक जटिल संरचना में अभिव्यक्त होती हैं जिसे सहज रूप में परिभाषित या व्याख्यायित कर पाना संभव नहीं है. जीवन की सामान्यीकृत व्याख्याओं से कहीं अधिक काव्यात्मकता मुझे जीवन और साहित्य की विविधताओं और जटिलताओं में मिली है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसमें भी कोई संदेह नहीं कि जातीय अलगाव, सांप्रदायिक हिंसा, रूढ़िवादिता तथा आतंकवाद ने आज हर सही सोच वाले व्यक्ति के अंत:करण को झकझोर कर रख दिया है. इनमें से कई समस्याओं की जड़ें आज की भारतीय राजनीति में हैं. वर्चस्ववादी भ्रष्ट राजनीति और हाशिए से उठती साहित्य की आवाज़ के बीच का असहज रिश्ता उन कई समस्याओं में से एक है जिनके कारण हमारे देश की मानवतावादी संस्कृति का क्षरण हो रहा है. इसे मैं आज हिंदी कविता के सामने खड़ी एक अति विशिष्ट समस्या के रूप में देखता हूं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;अ. सु&lt;/strong&gt;. : &lt;em&gt;&lt;span style="color:#ff6600;"&gt;बोर्खेज़ का कथन है `हर लेखक अपने पूर्ववर्ती लेखकों को रचता है.´ आपकी नजर में वे कौन से लेखक हैं जिन्हें आप अपने पूर्ववर्ती मानते हैं या जो आपकी सृजन-यात्रा में उल्लेखनीय रहे हैं?&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/em&gt;&lt;strong&gt;कुं. ना.&lt;/strong&gt; : महान कृतियों--जिन्हें हम पढ़ते हैं, हमारे ऊपर पड़ने वाले प्रभावों, पूर्ववर्ती लेखकों--आदि के साथ हमारे रिश्ते शायद ही कभी चिर-स्थायी या अटल होते हैं--मेरे मामले में तो बिलकुल ही नहीं. समय के साथ, जैसे-जैसे कवि का विकास होता है वे बदलते रहते हैं. जब हम किसी वैसे पूर्ववर्ती विशिष्ट साहित्यकार को पुन: पढ़ते हैं जो एक समय में हमारे लिए एक महान साहित्यकार रहे थे, तो उनके साथ हमारा रिश्ता या हमारे ऊपर उनका प्रभाव वही नहीं रहता जो उस समय था. एक विकासवान लेखक की संवेदनाएं तथा स्वयं के बारे में और अपने समय के बारे में उसकी अपनी समझ यह निर्धारित करती हैं कि कोई खास लेखक, कवि या कृति उसकी रचनात्मक प्रवृत्तियों को किस तरह प्रभावित करेगी. मैं समझता हूं कि बोर्खेज़ का तात्पर्य यही था जब उसने कहा कि `हर लेखक अपने पूर्ववर्ती लेखकों को रचता है´. मैंने पहली बार महाभारत तब पढ़ी जब मैं 15 या 16 वर्ष का था. युद्ध के अद्भुत दृश्यों से मैं अभिभूत था. इसमें भरपूर नाटकीयता थी. जब मैं बड़ा हुआ तो महाभारत को कई बार पुन: पढ़ा, लेकिन उन्हीं आकर्षणों के कारण नहीं. एक लंबे समय तक भागवत गीता से मेरी सोच और कल्पना मुग्ध रही. लेकिन अब, हो सकता है कि शांतिपर्वम् मुझे ज्यादा आकिर्षत करती हो. बाद के दिनों में, भारतीय क्लासिकी लेखकों में, उदाहरण के लिए, कबीर ने मुझे अपने सामाजिक और रहस्यवादी सरोकारों के कारण, और गालिब ने अपने उदात्त शिल्प तथा मानवीय समझ की गहराई के कारण प्रभावित किया. इन महान कृतियों के साथ मेरा सक्रिय और गतिशील रिश्ता मुझे अत्यंत प्रिय है--रचनात्मक स्तर पर यह मेरे लिए ज्यादा समृद्धिकारक रहा है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;अ. सु. &lt;/strong&gt;: &lt;em&gt;&lt;span style="color:#ff6600;"&gt;समकालीन हिंदी कविता की प्रवृत्तियों या धाराओं को लेकर आपकी प्रतिक्रिया क्या रही है?&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;कुं. ना&lt;/strong&gt;. : समकालीन हिंदी कविता की प्रवृत्तियों और प्रभावों को लेकर मेरी प्रतिक्रिया उदासीन रही है, कभी-कभी तो नकारात्मक भी जब कोई आंदोलन अत्यंत हठधर्मी हो गया. कविता स्वभावत: एक स्वायत्त कला है, यह किन्हीं अवरोधों या शासनादेशों को स्वीकार नहीं करती. मैं लगभग आधी सदी से कविता लिख रहा हूं. इस दरमियान मैं आधे दर्जन से अधिक साहित्यिक आंदोलनों की शुरुआत और अंत का साक्षी रही हूं. इन सब से जो जीवित बचा रहा वह उदात्त कविता है, न कि इसके आस-पास मंडराता कोलाहल. दरअसल, किसी प्रवृत्ति को नाम देने के पीछे कवि से कहीं अधिक सक्रिय आलोचक होते हैं, और जो नाम किसी सच्चे कवि के लिए शायद ही कोई मायने रखता हो. हिंदी कविता में, इसी तरह छायावाद, प्रगतिवाद, प्रयोगवाद, नई कविता, अकविता आदि जैसे नाम अस्तित्व में आए, लेकिन अच्छी कविता सदैव इन नामकरणों से अपेक्षाकृत उदासीन ही रही. कई बार तो, कविता के विकास में इनकी भूमिका प्रतिगामी रही. किसी आंदोलन ने जब किसी खास प्रकार की कविता या कवि को एक आदर्श नमूना के तौर पर तरजीह दिया तो इससे नकल को प्रोत्साहन मिला, और मौलिकता अवरुद्ध एवं उपेक्षित हुई.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आधुनिकतावादी आंदोलन की शुरुआत टी. एस. इलियट की कविता एवं उनकी साहित्यिक आलोचना से होती है. सामान्यत:, इसका तात्पर्य था काव्य-शिल्प, परंपरा, संस्कृति, अतीत, प्रयोगशीलता आदि को एक नए अंदाज में देखना. हिंदी कविता पर आधुनिकीकरण के प्रभाव को अज्ञेय द्वारा संपादित चार सप्तकों (समकालीन कवियों की कविताओं के चार संग्रह--प्रत्येक में शामिल सात कवि जो 1943 और उसके बाद कविता में सक्रिय रहे) में देखा जा सकता है. देखा जाए तो मार्क्सवाद, आधुनिकतावाद, प्रयोगवाद, नव-वाद जैसी धाराएं इस काल-खंड की कविताओं में परस्पर एक-दूसरे से आच्छादित हैं, जैसा कि वे आज भी हैं. तीसरा सप्तक में शामिल एक कवि के रूप में, मुझे जल्द ही यह महसूस हुआ कि कविता को इस तरह वर्गीकृत नहीं किया जा सकता. बार-बार यह आलाचकों द्वारा गिनाई गई अपनी विशेषताओं एवं कर्तव्यों की सीमाओं का अतिक्रमण कर जाती है. यह जरूर महसूस होता है कि समकालीन हिंदी कविता, संदर्भ और विषयवस्तु के स्तर पर आज ज्यादा बड़ी और ज्यादा स्वाधीन दुनिया में सांस ले रही है.&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#ff6600;"&gt;---------------------------------------&lt;br /&gt;&lt;em&gt;पूर्वग्रह&lt;/em&gt; (जनवरी-मार्च, २००९) से साभार&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4103886293770258948-2117891624811957122?l=shabdsrijan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://shabdsrijan.blogspot.com/feeds/2117891624811957122/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.blogger.com/comment.g?blogID=4103886293770258948&amp;postID=2117891624811957122' title='8 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4103886293770258948/posts/default/2117891624811957122'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4103886293770258948/posts/default/2117891624811957122'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://shabdsrijan.blogspot.com/2009/02/blog-post.html' title='साक्षात्कार'/><author><name>योगेंद्र कृष्णा   Yogendra Krishna</name><uri>http://www.blogger.com/profile/17366269677319716325</uri><email>yogendrakrishna@yahoo.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' name='OpenSocialUserId' value='00615047406804366258'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_fc2wY2U36Kc/SYr_LXOyT2I/AAAAAAAAAhE/xlnjCpfmUW0/s72-c/untitled.bmp' height='72' width='72'/><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>8</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4103886293770258948.post-1219291776244177793</id><published>2009-01-08T08:04:00.003-05:00</published><updated>2009-01-08T08:57:14.923-05:00</updated><title type='text'>हाल-फिलहाल : 10</title><content type='html'>&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_fc2wY2U36Kc/SWX58-U565I/AAAAAAAAAgE/JE_tuPiD5us/s1600-h/Manglesh_d.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5288908163334663058" style="WIDTH: 175px; CURSOR: hand; HEIGHT: 236px" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_fc2wY2U36Kc/SWX58-U565I/AAAAAAAAAgE/JE_tuPiD5us/s320/Manglesh_d.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc33cc;"&gt;&lt;span style="font-size:85%;"&gt;मंगलेश डबराल&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;इस स्तंभ के अंतर्गत अभी तक आप अशोक वाजपेयी, उदय प्रकाश, लीलाधर जगूड़ी, पुष्पिता, आलोक श्रीवास्तव, कृष्ण बलदेव वैद, गीताश्री, कुँवर नारायण एवं प्रभाकर श्रोत्रिय की हाल में प्रकाशित पुस्तकों पर आलोचक-समीक्षक डॉ. ओम निश्चल की टिप्पणियाँ पढ़ चुके हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस बार प्रस्तुत है हिंदी के सुपरिचित कवि &lt;span style="color:#ff6600;"&gt;&lt;strong&gt;मंगलेश डबराल&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt; की ताजा पुस्तक &lt;em&gt;&lt;span style="color:#009900;"&gt;&lt;strong&gt;कवि का अकेलापन&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/em&gt; पर &lt;strong&gt;ओम निश्चल&lt;/strong&gt; का समीक्षात्मक आलेख। गद्य कवियों का निकष है। हमारे समय के अंत्यंत तेजस्वी कवियों ने जब भी अपने समय को गद्य में उपनिबद्ध किया है, भाषा की गतिमयता ने नई करवट ली है। मंगलेश डबराल की पिछली कृतियों --&lt;em&gt;एक बार आयोवा&lt;/em&gt; और &lt;em&gt;लेखक की रोटी&lt;/em&gt; का आस्वाद जो लोग ले चुके हैं, उन्हें इस कृति में उनकी विवेकी कवि-दृष्टि और सर्जनात्मक समीक्षा की बेहतरीन बानगी &lt;span class=""&gt;मिलेगी।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;-------------------------------&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_fc2wY2U36Kc/SWYBFj9bFvI/AAAAAAAAAgU/_iPxs95GYbk/s1600-h/Kavi+Ka+Akelapan.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5288916007457068786" style="WIDTH: 217px; CURSOR: hand; HEIGHT: 320px" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_fc2wY2U36Kc/SWYBFj9bFvI/AAAAAAAAAgU/_iPxs95GYbk/s320/Kavi+Ka+Akelapan.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;-----------------------------------&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#009900;"&gt;&lt;em&gt;कवि का अकेलापन&lt;/em&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;strong&gt;मंगलेश डबराल&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;em&gt;प्रकाशक&lt;/em&gt; &lt;/span&gt;: राधाकृष्ण प्रकाशन&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;7/31, अंसारी रोड&lt;br /&gt;दरियागंज, नई दिल्ली&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;em&gt;संस्करण&lt;/em&gt; &lt;/span&gt;: 2008&lt;br /&gt;&lt;em&gt;मूल्य&lt;/em&gt; : 250 रूपये&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;-----------------------------------&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;&lt;span style="font-size:85%;"&gt;&lt;em&gt;कवि-&lt;span class=""&gt;संपर्क &lt;/span&gt;&lt;/em&gt;: मंगलेश डबराल, 326, निर्माण अपार्टमेंट, मयूर विहार, फेज-1, दिल्ली&lt;br /&gt;फोन-011-22711805, मोबाइल-09910402459&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;&lt;strong&gt;------------------------------------&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:180%;color:#ff0000;"&gt;आरोह-अवरोह में विन्यस्त गद्य&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#009900;"&gt;ओम निश्चल&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गद्य को कवियों की कसौटी माना गया है। इस दृष्टि से आज के अनेक वरिष्ठ कवियों के पास लिखने का जो बेहतरीन हुनर है, उसकी एक मिसाल मंगलेश डबराल की डायरियाँ, टिप्पणियाँ और समकालीन कविता, समाज, संस्कृति, कला और फिल्म पर लिखे विमर्श हैं। आज भी प्राय: कवि-कुटुम्ब यह मानता है कि अपने समय के रचना संसार पर बेहतरीन संवेदना और समझ के साथ लिखने वाले कवि ही होते हैं। &lt;em&gt;एक बार आयोवा&lt;/em&gt; और &lt;em&gt;लेखक की रोटी&lt;/em&gt; के बाद प्रकाशित &lt;em&gt;कवि का अकेलापन&lt;/em&gt; मंगलेश डबराल को फिर एक बार अपने समकालीनों में गद्य-रचना के शिखर पर पहुँचा देता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आलोचना के स्पंदनहीन, जड़ीभूत और संस्कारित समझ के कोलाहल के बीच जब भी कवियों का लिखा गद्य सामने आया है, उसने रूढ. होती मूल्यांकन प्रविधियों, यथास्थितिशीलता में साँस लेती रचनाकारिता को सिरे से विचलित और विस्थापित किया है। केदारनाथ सिंह, मंगलेश डबराल, लीलाधर जगूड़ी, राजेश जोशी, लीलाधर मंडलोई, अरुण कमल, उदय प्रकाश, विजय कुमार, देवीप्रसाद मिश्र और यतीन्द्र मिश्र की गद्य रचनाओं में जहाँ संवेदना की सबसे सुकोमल दुनिया खुलती नजर आती है, वहीं अपने समय की रचनाशीलता की अलक्षित बारीकियाँ भी अपने पंख खोल देती हैं। मंगलेश डबराल जिस संवेदना और समझ के कवि हैं, वे जीवन और समाज को सतही तौर पर न देख कर उसके चौतरफ होते बदलावों को विभिन्न कला रूपों के आलोक में देखते हैं और अचरज नहीं कि उनके देखने का ढंग केवल एक कवि जैसा नहीं, एक सु्चिंतित, सुपठित विमर्शकार जैसा है। उनकी गद्य-संरचना में संगीत का आरोह-अवरोह धड़कता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पुस्तक की शुरुआत चंद्रकुँवर बर्त्वाल की वसीयत से हुई है। अकालकवलित बर्त्वाल की कविताओं पर लोगों की दृष्टि लगभग नहीं गयी है। किन्तु अट्ठाईस की वय में कविता में वाक् और अर्थ का जैसा समन्वय उनमें मिलता है, वैसा कम देखने को मिलता है। दुख ने ही मुझको प्रकाश का देश दिखाया जैसी पंक्ति लिख कर बर्त्वाल ने अपनी सधी लेखनी का परिचय दिया था। मंगलेश डबराल पर जिन दो कवियों की कविता का गहरा प्रभाव दिखता है, वे शमशेर और रघुवीर सहाय हैं। मंगलेश अनुभूति की शुद्धता की सीख शमशेर से लेते हैं तो संकटों से घिरे मनुष्य की वेदना और विडंबनाओं से ग्रस्त समाज की बारीकियों को उकेरने की प्रविधि रघुवीर सहाय से हासिल करते हैं। यदि संक्षेप में शमशेर और रघुवीर सहाय का मिजाज समझना हो तो मंगलेश के इन निबंधों में उसकी मुकम्मल पहचान मिलेगी। मंगलेश शमशेर को विचार के सँकरे बना दिए गए साँचों में न अँटने वाला कवि मानते हैं।  तेरी खोपड़ी के अंदर शीर्षक नागार्जुन की कविता को मंगलेश इसीलिए महत्व देते जान पड़ते हैं क्योंकि सांप्रदायिकता के उभार के दिनों में इस कविता का पात्र कल्लू मुसलमान हिंदुओं की घृणा से बचने के लिए जीविका के निमित्त अपना नाम और चोला बिल्कुल बदल लेता है। नागार्जुन इस बहाने समाज में जड़ जमाती धार्मिक घृणा का अनावरण करते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यहाँ कुँवर नारायण, लीलाधर जगूड़ी, आलोकधन्वा, नरेश सक्सेना, सुदीप बनर्जी, असद जैदी, नरेन्द्र जैन, वीरेन डंगवाल, विजय कुमार, कात्यायनी और ऋतुराज की कविताओं पर मंगलेश की टिप्पणियाँ हैं तो साहित्य अकादेमी पुरस्कार मिलने के अवसर पर दिया गया वक्तव्य--&lt;em&gt;कवि का अकेलापन&lt;/em&gt; भी, जो इस पुस्तक का एक मार्मिक निबंध है। कुँवर नारायण पर लिखते हुए मंगलेश आश्चर्यजनक ढंग से कुँवर नारायण और रघुवीर सहाय को आमने सामने रख कर देखते हैं। मंगलेश के शब्दों में, रघुवीर सहाय साहित्य का उद्देश्य उपलब्ध यथार्थ के सामने एक दूसरे और ज्यादा मानवीय यथार्थ की ओर संकेत करना मानते थे तो कुँवर नारायण यथार्थ के बरक्स एक आदर्श की, एक उदात्त की स्थापना करते, वास्तविकता के सामने जैसे कल्पना का एक आईना रखते हैं। किन्तु जगूड़ी पर लिखते हुए मंगलेश डाक्यूमेंटेशन की-सी प्रविधि अपनाते जान पड़ते हैं तथा कविता को अनुभव के जिन सुदूर इलाकों में जगूड़ी ले गए हैं, उनके कवि-सामर्थ्य के आगे मंगलेश की टिप्पणी नाकाफी जान पड़ती है। हाँ, मंगलेश का यह कहना तोष देता है कि वे संसार की प्रत्येक गतिविधि और हलचल और कंपन को भाषा के अनुभव में बदलने का उपक्रम करते हैं और दूर तक उसका पीछा करते हैं। कदाचित मंगलेश जगूड़ी के नवीनतम संग्रह &lt;em&gt;खबर का मुँह विज्ञापन से ढका है&lt;/em&gt; पढ़ने के बाद यह टिप्पणी लिखते तो निश्चय ही वे जगूड़ी के मुरीद हो उठते। तब जगूड़ी &lt;em&gt;घबराये हुए शब्द&lt;/em&gt; में अपनी कविता की जिन विशेषताओं का स्मरण करते हैं--यानी अनुभव में तात्कालिक, स्वभाव में तत्वदर्शी, कथ्य में सबकी आवाज लिए, विन्यास में सर्वाधिक नाटकीय...इत्यादि इनका विरल संगम इस संग्रह में वे लक्ष्य कर पाते। ऋतुराज पर उनका कहना सटीक है कि अन्याय, क्रूरता, घृणा और असत्य के जटिल लीलालोक को चीरती उनकी कविताएँ उस जीवन की कामना करती हैं जो ज्यादा सरल, मानवीय और सच हो। आलोक धन्वा में वे रेटारिक की खूबियाँ लोकेट करते हैं तो नरेश सक्सेना की कविता में उन्हें एक नैतिक मनुश्य हलचल करता साफ दिखता है। संप्रेषणीयता का वैसा कोई संकट नरेश के पास नहीं है जो बौद्धिक माने जाने वाले अन्य कवियों में। अलग अलग कारणों से मंगलेश असद जैदी और नरेन्द्र जैन की कविताओं को महत्व देते हैं। असद की कविता में उन्हें एक दलित हास्य जैसा तत्व सक्रिय दिखता है तो नरेन्द्र जैन में फैली उदासी हमेशा एक संभावना का हाथ थामे हुए दिखती है। वे नरेन्द्र जैन की कविताओं में अनुस्यूत उस संगीत तत्व की ओर भी ध्यान दिलाते हैं जिसकी आमद कविताओं में धीरे धीरे कम होती जा रही है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वीरेन डंगवाल की कविता का ठीहा न केवल मंगलेश को बल्कि आलोक धन्वा को भी बेहद प्रिय है। वीरेन की कविता का जिक्र करते हुए दोनों ही कवि कदाचित भावुक हो उठें। &lt;em&gt;दुश्चक्र में स्रष्टा&lt;/em&gt; से वीरेन ने अपनी कविता की एक अलग प्रजाति निर्मित की है जहाँ भाषा की देशज भंगिमाएँ आधुनिकता बोध से टकराती हैं। वीरेन के सान्निध्य में रहते हुए मंगलेश ने उनके कवि-स्वभाव की जैसी पड़ताल की है वैसी किसी अन्य के द्वारा संभव नहीं। मंगलेश ने अपनी काव्यरुचि के खाने में न अँटने वाले विजय कुमार और कात्यायनी को भी सलीके से आकलित किया है। और यहाँ असद जैदी की कविता सामान की तलाश पर मंगलेश की वह टिप्पणी भी शामिल है जिस पर हाल ही में काफी अप्रिय ब्लागबाजी हुई है। देखा जाए तो मंगलेश का मन विचार-बोझिल कविता पर नहीं, क्लासिकी की गतिमयता से भरी कविताओं पर मुग्ध होता है। संवेदना के कोमल आघात से जन्म लेने वाली कविता उन्हें प्रिय लगती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नेरुदा, ब्रेख्त, कवाफी, आक्तेवियो पाज की कविताओं से गहरे बावस्ता मंगलेश का वक्तव्य कवि का अकेलापन कवि का जैसे कि एक कन्फेशन हो। लीक से अलग चलने वाले कवि का अकेलापन किस तरह उत्तरोत्तर सघन हुआ है, इसकी तफसील से वे इस आलेख में व्याख्या करते हैं। &lt;em&gt;कवि का अकेलापन&lt;/em&gt; उन तमाम दबावों, संतापों, उदासियों से घिरे कवि के अंत:करण का खुलासा है जिनसे होकर कवि गुजर रहा है। वह प्राकृतिक आपदा के मारे लोगों को दी जाने वाली राहत को हिंदू राहत, मुसलमान राहत और दलित राहत जैसे वर्गीकरणों में तकसीम करने के सियासी खेल से आहत है। मंगलेश गुजरात त्रासदी से इतने आहत दिखते हैं कि उनका कहना है कि सत्ता-राजनीति अपनी कमतर संवेदनशीलता के चलते इस तरह की ग्लानियों से मुक्त कर लेती है, किन्तु कविता संताप और पश्चात्ताप की गठरी अपने सर से नहीं उतार सकती। यह आलेख अपने समय के ऐसे ही क्रूरतम वृत्तांतों, राजनीतिक दावपेंच से जन्म लेते राहत-पुनर्वास के दलगत वर्गीकरणों, मनुष्यता को क्षुद्र प्रलोभनों के चलते लगातार शर्मसार करती स्थितियों की प्रतिक्रिया में लिखा गया शोकलेख है जिस पर यों तो भीतर से अवसाद की धुँधली परत छाई दिख सकती है किन्तु जहाँ ताकत की संरचना के बीच मिटती मनुष्यता की पहचान के बावजूद कवि का यह स्वप्न नाक में कील की तरह दमकता है कि---काश, हिंदी एक छोटी-सी भाषा होती, लोग उसे प्रेम और मनुष्यता के साथ बरतते तो उसका लेखक इतना अकेला नहीं होता। मुक्तिबोध नामक एक विराट पेड़ होता, जिस पर नागार्जुन के घने पत्ते होते और शमशेर नाम की सुंदर  चिड़ियाँ उस पर बैठ कर मीठी गजल गुनगु्नातीं। यहाँ हिंदी को छोटी-सी भाषा कहने का कवि का तात्पर्य कदाचित यह है कि हिंदी थोड़े लोगों द्वारा बोली जाने वाली भाषा होती।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हिंदी साहित्य में इन दिनों जो हड़बड़ी का माहौल है, सब कुछ थोड़े ही समय में कम संघर्ष और जद्दोजहद से पा लेने की अधीर आकांक्षा है वह दिनोदिन विरूप होती गयी है। रिक्त स्थानों की कविता में मंगलेश इसी हड़बड़ी और क्षुद्र महत्वाकांक्षाओं का ग्राफ खींचते हैं--इतनी पत्रिकाएँ, इतने सारे कवि, पढ़ना कठिन, उनका नामोल्लेख तक कठिन, रोज ब रोज आते पोस्टकार्डों में लेखकों के ध्यानाकर्षण प्रस्ताव---रिक्त स्थानों को भरने के लिए आतुर नई पीढ़ी, खद्योत सम कवियों की बहुतायत, लगभग एक काव्यात्मक घमासान---यह टिप्पणी इन मुद्दों पर सावधानी और विवेक के साथ गौर करती है और अफसोस करती है कि आलोचना जिसे अंबार में से बेहतर के चयन का काम करना चाहिए, अपने सामने हाथ बाँधे खड़ी कविता के अलावा और कुछ नहीं देखती। गद्य कविता नहीं में कविता में गद्य के सौंदर्य से लेकर कविता में जड़ जमाती निबंधात्मकता तक पर गौर किया गया है और इस विड़बना पर भी दृष्टिपात किया गया है कि आज सुंदर सुगठित गद्य दुर्लभ होता जा रहा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;कवि का अकेलापन&lt;/span&gt;&lt;/em&gt; में केवल कवि का एकालाप ही नहीं है, पुस्तकों का विलाप भी ध्वनित होता है। समाज में लगातार कम होते जा रहे किताबों के स्पेस और दूसरी तरफ शवासन में पुस्तकालयों में निश्चेष्ट और उपेक्षित पड़ी किताबें---मंगलेश ने इस प्रकरण पर पुस्तक का रुदन लेख लिखा है तो हिंदी सेवा के इस छद्म पर ज्ञानेन्द्रपति ने एक कविता में कड़ी फटकार लगाई है। खेद है कि किताबें हमारी आदतों का हिस्सा नहीं बन पा रही हैं। उनके लिए आज हमारी शेल्फ में जगह नहीं है। पुस्तक में कई आलेख कला, संस्कृति और फिल्म पर हैं। रामकुमार की कला्कृति पृथ्वी, ब्रेष्ट के नाटक लाइफ आफ गैलीलियो, संजय काक की वृत्त फिल्म जश्ने आजादी, बाजार के बीच खड़ी कला, सौंदर्य के बाजारवादी यथार्थ और प्रसिद्धि के उद्योग में बदलने के वृत्तांत को लेकर मंगलेश ने संजीदा टिप्पणियाँ की हैं। किन्तु इस पुस्तक का बेहद निजी कोना उनके डायरी अंश हैं जो मरना भी रहना है शीर्षक से छपे हैं। जून 2001 से नवम्बर 2005 तक के चुनिंदा डायरी अंशों से मंगलेश के भीतर निवास करते संवेदी कवि की अनेक छवियाँ मिलती हैं तो उनके नागरिक मन को आहत करने वाले अनेक प्रसंग भी। मंगलेश दिल्ली में बढ़ते कलावा कल्चर, एक शक्की पति की कवयित्री पत्नी की पीड़ा, तात्कालिक अमरता के लिए जोड़तोड़ करते हिंदी समाज, दिवंगत कवियों, मित्रों पर लिखी अपनी कविताओं, राजनैतिक कविता, पेज थ्री संस्कृति, रघुवीर सहाय, साहित्यिक हल्के में चलन में आती नई शब्दावलियों और लोकार्पण युगीन माहौल पर टिप्पणियाँ करते हैं। मंगलेश दर्ज करते हैं कि जहां  प्राय: नेता, इंजीनियर, एमबीए, नौकरशाह राज्य, सत्ता, बाजार और ग्लोबलाइजेशन के विरोध में नहीं जाते, सिर्फ कवि-लेखक-बुद्धिजीवी हैं जो सत्ताओं के प्रतिकूल सोचते हैं। वरवर राव जैसे कवि हमारे समक्ष एक मिसाल हैं जो सत्ता के आगे झुके नहीं, भले ही उन्हें टाडा और अन्य आरोपों में बरसों जेल की सीखचों में बंद रहना पड़ा। कहना न होगा कि कवि का अकेलापन अपनी व्यंजकता में समाज में रह रहे उन तमाम बौद्धिकों और संवेदनशील व्यक्तियों की बेचारगी की ओर भी इंगित करता है जिन्हें बाजार, हिंसा, राजनीति, धार्मिक बर्बरता और वर्चस्ववादी ताकतों ने अकेला कर दिया है।&lt;br /&gt;---------------------------------&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:85%;"&gt;&lt;em&gt;संपर्क&lt;/em&gt; : डॉ.ओम निश्चल, जी-1/506 ए, उत्तम नगर, नई दिल्ली-110059,&lt;br /&gt;मोबाईल: 09955774115  ईमेल: omnishchal@yahoo.co.in&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4103886293770258948-1219291776244177793?l=shabdsrijan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://shabdsrijan.blogspot.com/feeds/1219291776244177793/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.blogger.com/comment.g?blogID=4103886293770258948&amp;postID=1219291776244177793' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4103886293770258948/posts/default/1219291776244177793'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4103886293770258948/posts/default/1219291776244177793'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://shabdsrijan.blogspot.com/2009/01/10.html' title='हाल-फिलहाल : 10'/><author><name>योगेंद्र कृष्णा   Yogendra Krishna</name><uri>http://www.blogger.com/profile/17366269677319716325</uri><email>yogendrakrishna@yahoo.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' name='OpenSocialUserId' value='00615047406804366258'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_fc2wY2U36Kc/SWX58-U565I/AAAAAAAAAgE/JE_tuPiD5us/s72-c/Manglesh_d.jpg' height='72' width='72'/><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4103886293770258948.post-3890191055581810376</id><published>2009-01-01T12:07:00.003-05:00</published><updated>2009-01-01T12:36:13.446-05:00</updated><title type='text'>नया वर्ष</title><content type='html'>&lt;span style="font-size:180%;color:#ff0000;"&gt;&lt;strong&gt;२००९&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;..............................&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;आतंक के साये में&lt;br /&gt;2008 के हाशिए पर जगमगाती&lt;br /&gt;स्वप्निल इस रात को&lt;br /&gt;इस तरह रेस्तराओं क्लबों होटलों&lt;br /&gt;के नाम मत करो...&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;इसे ऐसे भी विदा मत करो&lt;br /&gt;जैसे कभी यह समय&lt;br /&gt;तुम्हारा था ही नहीं...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह थोड़ा थोड़ा हमेशा से&lt;br /&gt;तुम्हारे हर समय में मौजूद था&lt;br /&gt;समय के नैरंतर्य को तुम&lt;br /&gt;इस तरह मत तोड़ो...&lt;br /&gt;जैसे 31 दिसंबर को 1 जनवरी से तोड़ते हो&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;तुम्हें पता नहीं&lt;br /&gt;कितनी कीमती अपनी ही चीजें&lt;br /&gt;तुम इस तरह छोड़ते हो...&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;जागती आंखों में&lt;br /&gt;नये समय नये सहर का ख्वाब देखना&lt;br /&gt;कोई मना तो नहीं...&lt;br /&gt;लेकिन इसे इस तरह मत देखो&lt;br /&gt;जैसे यह सिर्फ तुम्हारा हो...&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;जितना ही इसे&lt;br /&gt;दूसरों की आंखों से भी देख पाओगे&lt;br /&gt;सदियों से जमा अपने भीतर&lt;br /&gt;समय के इस अंधेरे को&lt;br /&gt;शायद उतना ही छांट पाओगे...&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;.................................&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;नववर्ष की शुभकामनाओं सहित&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4103886293770258948-3890191055581810376?l=shabdsrijan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://shabdsrijan.blogspot.com/feeds/3890191055581810376/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.blogger.com/comment.g?blogID=4103886293770258948&amp;postID=3890191055581810376' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4103886293770258948/posts/default/3890191055581810376'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4103886293770258948/posts/default/3890191055581810376'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://shabdsrijan.blogspot.com/2009/01/blog-post.html' title='नया वर्ष'/><author><name>योगेंद्र कृष्णा   Yogendra Krishna</name><uri>http://www.blogger.com/profile/17366269677319716325</uri><email>yogendrakrishna@yahoo.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' name='OpenSocialUserId' value='00615047406804366258'/></author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4103886293770258948.post-3073387356022682781</id><published>2008-12-21T06:24:00.004-05:00</published><updated>2008-12-21T06:57:50.454-05:00</updated><title type='text'>हाल-फिलहाल : 9</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_fc2wY2U36Kc/SU4pK_HXosI/AAAAAAAAAf8/VF0wn6AZCHw/s1600-h/prabhakar_shrotriya"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5282204681669944002" style="WIDTH: 150px; CURSOR: hand; HEIGHT: 200px" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_fc2wY2U36Kc/SU4pK_HXosI/AAAAAAAAAf8/VF0wn6AZCHw/s320/prabhakar_shrotriya%27+photo.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:78%;"&gt;प्रभाकर श्रोत्रिय&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color:#33cc00;"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="color:#33cc00;"&gt;हाल-फिलहाल&lt;/span&gt; स्तंभ के अंतर्गत आप साहित्य की दुनिया में नये प्रकाशनों से रू-ब-रू हैं। हमारे इस स्तंभ में अबतक आप अशोक वाजपेयी, उदयप्रकाश, लीलाधर जगूड़ी, पुष्पिता, गीताश्री, कुंवर नारायण, कृष्ण बलदेव वैद एवं आलोक श्रीवास्तव की पुस्तकों पर ओम निश्चल की टिप्पणी पढ चुके हैं। इस श्रृंखला की अगली कड़ी के रूप में प्रस्तुत है हमारे समय के एक महत्वपूर्ण आलोचक डॉ प्रभाकर श्रोत्रिय की पुस्तक &lt;span class=""&gt;&lt;em&gt;कवि-परंपरा&lt;/em&gt;।&lt;/div&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;&lt;strong&gt;----------------------------------&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="color:#009900;"&gt;कवि-परम्परा : तुलसी से त्रिलोचन&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;प्रभाकर श्रोत्रिय&lt;br /&gt;भारतीय ज्ञानपीठ, लोदी रोड,&lt;br /&gt;नई दिल्ली-3&lt;br /&gt;कीमत रू 195 रुपये&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;&lt;strong&gt;--------------------------------&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#ff0000;"&gt;उदात्त और उच्चादर्शों की बाट जोहती आलोचना&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;        &lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;ओम निश्चल&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;आलोचकों से भरी इस दुनिया में कम से कम हिंदी में कुछ इने-गिने ही नाम ऐसे हैं जिनके यहाँ भाषा अपनी सतत् साधना से गुजरती हुई अपनी प्रकृति में उत्सवता का आभास कराती है। प्रभाकर श्रोत्रिय उनमें से एक हैं, जिनका लिखना, बोलना, मुस्कराना और यहाँ  तक कि फटकारना भी एक लय से आबद्ध होता है। एक जमाना था, उत्तरप्रदेश को लोग हिंदी का ह्वदय प्रदेश कहा करते थे, किन्तु प्रभाकर श्रोत्रिय के गद्य का प्रभामंडल इस धारणा को ध्वस्त करता हुआ अपने मालवी ठाठ के प्रति अभिभूत कर लेता है। मालवा की माटी का संस्कार ही ऐसा है कि वह साहित्य को एक अल्पना की तरह रचती है। गिरिजा कुमार माथुर के गीतों की माधवता देखें या नरेश मेहता के रचना संसार में पैठी वैष्णवता, अखबारी दुनिया में राहुल बारपुते, राजेन्द्र माथुर और प्रभाष जोशी की भाषा का वैभव अब पत्रकारिता के सरसब्ज इलाके से गायब होता जा रहा है। अकारण नहीं कि मालवा के पर्यावरण में पल्लवित प्रभाकर श्रोत्रिय की साहित्यिक मेधा शुरु से ही सकारात्मक के उन्मेष  को पहचानने, स्थापित करने और उसे अग्रसर करने के मुहिम में लगी रही है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;            हाल में प्रकाशित &lt;span style="color:#000099;"&gt;कवि-परम्परा:तुलसी से त्रिलोचन&lt;/span&gt; शीर्षक आलोचनात्मक कृति के जरिए प्रभाकर श्रोत्रिय ने फिर एक बार अपनी आलोचना के उपकरणों और मानदंडों को हिंदी कविता के सुदूर हित में व्यवह्वत और विन्यस्त किया है। वे कविता के उन हितैषियों में हैं, जिनके पास पहुँच कर कविता आश्वस्ति और गौरव के भाव से भर उठती है। यह उनके भीतर रसज्ञ आलोचक का ही निवास है कि वह सुदूर अंचलों तक से आती हुई कविता की पुकार सुन पाता है और अपने कवित-विवेक से कवितानुशीलन को अपने साहित्यिक कार्यभार का अनिवार्य अनुषंग बनाता है। यही कारण है कि श्रोत्रिय की आलोचना क्षिद्रान्वेषी न होकर मूल्यान्वेषी है---वह रचना के उदात्त की बाट जोहती और प्राय: रचना में गुँथे उच्चाशयों को ही चुनती-बीनती आई है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;            रचना एक यातना है, कालयात्री है कविता तथा संवाद के बाद कवि-परम्परा:तुलसी से त्रिलोचन प्रभाकर श्रोत्रिय के आलोचना कर्म का एक बड़ा पड़ाव है। यद्यपि यह हिंदी के एक बड़े रचना फलक का विवेचन है सो कवि-परम्परा की तमाम कड़ियाँ यहाँ  छूट भी गयी हैं, परन्तु श्रोत्रिय के ही शब्दों में, यह इतिहास नहीं, एक चयन है।  प्रभाकर श्रोत्रिय आलोचकों की उस कोटि में आते हैं,जिनके बौद्धिक निर्माण में देश की सांस्‍कृतिक और भारतीय मनीषा का गहरा योगदान है। वे हर चीज समग्रता में देखने के अभ्यस्त हैं । परम्परा को फलाँगते हुए समकालीनता में उछल-कूद कर अपने गौरव का ढिंढोरा पीटना उनका मकसद नहीं रहा। एक पौराणिक की तरह सदियों से पल्लवित विकसित मूल्यों की खोज के लिए यदि वे भक्ति परंपरा के बड़े कवियों--तुलसी, मीरा, सूर, और कबीर तक जाते हैं तो एक आधुनिक की तरह वे प्रसाद, निराला, मुक्तिबोध, नागार्जुन, सुमन, शमशेर, भवानी प्रसाद मिश्र, नरेश मेहता और त्रिलोचन की समकालीनता से संवाद करते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;            प्राचीन कवियों के रचना-संसार में नवजागरण के मूल्य तलाशते हुए श्रोत्रिय तत्कालीन समय और सर्जनात्मक आचरण का दृश्यालेख लिखते हैं तो आधुनिक समाज और जीवन में उसकी प्रासंगिकता और उसके सार्थक उपयोग की मनोभूमि भी तलाशते हैं। तुलसी के अध्ययन से समारंभ इस कृति से वे परोक्षत: यह भी उद्घाटित करते हैं कि तुलसी को आचार्य रामचंद्र शुक्ल और रामविलास शर्मा तथा कबीर को हजारीप्रसाद द्विवेदी जैसे दिग्गजों ने अपना लक्ष्य कवि बनाया है। इसलिए हिंदी कविता को समग्रता में देखने के लिए तुलसी और कबीर जैसे जनकवियों का अध्ययन आवश्यक है। यह उस अनवरत एक कवित विवेक और आँखिन देखी की सैद्धांतिकी से परिचालित है, जिसे तुलसी और कबीर बार-बार अपनी रचना के केंद्र में रखते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;            भक्ति परंपरा के कवियों तुलसी, कबीर, सूरदास और मीरा का अनुशीलन करते हुए श्रोत्रिय को जहॉं  तुलसी के साहित्य में सब कँह हित दिखाई देता है, वहीं कबीर में तोड़ने और रचने की समझ। कबीर ने समाज को निर्भयता का संदेश दिया तो मीरा ने भी कृष्ण से समाजवर्जित प्रेम कर जताया कि प्रेम और भय साथ नहीं चलते। जिस तरह की क्रांतिकारिता मीरा के प्रेम में नजर आती है, उससे श्रोत्रिय उन्हें पॉंच सौ बरस की युवती का खिताब देते हैं। सूर के बारे में लिखते हुए श्रोत्रिय कहते हैं कि भक्ति की सीमा को लाँघकर सूर ने प्रेम की जिस गरिमा को स्थापित किया, उससे वह भक्ति और सामाजिक शील में बदल गया। भक्त कवियों के बाद मैथिलीशरण गुप्त को वे संभवत: पहला आधुनिक कवि मानते हैं, जिसने कविता में इतिवृत्तात्मकता को प्रश्रय दिया। यद्यपि महादेवी, पंत और निराला पर भी उन्होंने यहाँ रम कर लिखा है। किन्तु छायावादियों में प्रसाद कई कारणों से श्रोत्रिय की मनोरचना के ज्यादा अनुकूल पड़ते हैं। प्रसाद पर उन्होंने बृहद शोध किया है। प्रसाद की कविता का सौंदर्य-विन्यास उन्हें बाँधता है। निराला की शक्ति को वे राम की शक्तिपूजा में तलाशते हैं तो पंत की सुकुमार कल्पनाओं की टोह लेते हुए उनकी उपेक्षा के पीछे मौजूद कारणों की तह में भी जाते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;            निराला के बाद मुक्तिबोध और अज्ञेय हिंदी की दो बड़ी काव्य शक्तियॉं हैं। कहना न होगा कि मुक्तिबोध अपने विपुल और अर्थगर्भी काव्य संसार के बल पर आज भी महत्वपूर्ण हैं। नई कविता के भीतर के कल्मष को साफ करने के लिए मुक्तिबोध ने न केवल फैंटेसी तथा रहस्यवादी कवियों का-सा शिल्प अपनाया बल्कि आलोचना की तार्किक समझ के साथ नई कविता के आत्मसंघर्ष की एक नई जमीन भी तैयार की। जहॉं व्यक्तिवादी मूल्यों का कोई आधार न था। यहीं से वे धीरे-धीरे अज्ञेयवादी प्रयोगवादी राहों से अपना अलग रास्ता अख्तियार करते हैं। नई कविता में व्याप्त जड़ीभूत सौंदर्याभिरूचि के खतरों से आगाह करने वाले मुक्तिबोध ही थे। उनकी कविता को अस्तित्ववादी कहे जाने का प्रत्याख्यान करते हुए श्रोत्रिय मुक्तिबोध को कविता की शब्दावली को नए अर्थ और तेवर का सूत्रधार मानते हैं। अन्वीक्षा की कँटीली राहों से गुजरे मुक्तिबोध की कवि-छवि जहाँ उन्हें कचोटती है, अज्ञेय की कविता का आभिजात्य अपील करता है। अज्ञेय के व्यक्तिवाद की निंदा उन्हें भली नहीं लगती। व्यक्ति और समाज तथा मम और ममेतर पर समूची बहस को केंद्रित करते हुए श्रोत्रिय ने व्यक्ति की स्वाधीन सत्ता की अज्ञेयवादी विचारणा को सही ठहराया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रगतिशील कवियों में नागार्जुन एक नई परंपरा के वाहक हैं। उनके लिए कविता कोई व्यक्तिगत इकाई नहीं है, बल्कि समाज से उसका गहरा रिश्ता है। राजनीति से उसका बराबर का लेना देना है। जनता की नियति को प्रभावित करने वाली हर चीज नागार्जुन के निशाने पर रही है। प्रभाकर के शब्दों में ऐसे कवि को शास्त्र-वास्त्र या भाषा का पातिव्रत्य रास नहीं  आता। नागार्जुन हर तरह की चौखट का इन्कार है। श्रोत्रिय का कहना है कि वे ज्ञान और संस्‍कृति के सार्थवाह नहीं, लोकाकांक्षा के सहचर थे। अकारण नहीं कि तारानंद वियोगी ने हाल ही में प्रकाशित अपने एक संस्मरण में नागार्जुन को तुम चिर सारथि कह कर संबोधित किया है। बिसराये न बिसरैं के केंद्र में सुमन हैं जिन्हें श्रोत्रिय ने गुराँस के फूल और काँस के फूल दोनों रूपों में देखा है। सुमन की कविता में संवेदना की बारीक बीनाई न होने की शिकायत श्रोत्रिय करते हैं फिर भी उनके पास बैठना उन्हें खुले जलाशय के पास घनी छाँह तले बैठने जैसा लगता रहा है। वे कहते हैं कि इस सिकुड़ती हुई टुच्ची दुनिया के रास्ते से चलते हुए जब हम उनके पास पहुँचते हैं तो पता चलता है कि वे सदाशयता और परदुखकातरता की कितनी दुर्लभ मूर्ति थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;            जिन कवियों में श्रोत्रिय के कवित-विवेक को विश्रांति का अनुभव होता है, उनमें अज्ञेय, शमशेर, नरेश मेहता, भवानी प्रसाद मिश्र और धर्मवीर भारती प्रमुख हैं। त्रिलोचन के कवि-व्यक्तित्व को भी श्रोत्रिय ने उचित मान दिया है। अनूठे सौष्ठव से भरी शमशेर की संवेदना-तरल कविताओं में जहॉं  श्रोत्रिय को कविता की वास्तविक शक्ति नजर आती है, वहीं  मार्क्‍सवादी चिंतन से संपृक्त कविताओं से उनकी वैचारिक दृढ़ता का पता चलता है। श्रोत्रिय शमशेर की काव्यकला के चरम वैशिष्ट्य की दृष्टि से अमन का राग, पिकासोई कला, टूटी हुई बिखरी हुई और कहीं बहुत दूर से सुन रहा हूँ आदि कविताओं को चिह्नित करते हैं। श्रोत्रिय के कवि चित्त में भवानी प्रसाद मिश्र की छवि भक्त कवि जैसी है। उन्हें भवानी दा की भाषा भीगी हुई लगती है, जैसे कि उसमें आधुनिकता का तीखा तेवर प्रकट करने की मुखर बेचैनी न हो। किन्तु उनकी कविता में भाषाई तराश और शिल्प के टटकेपन को वे गजब का मानते हैं। नरेश मेहता की क्लासिक उदात्तता और सौंदर्य के बनानी परिवेश पर श्रोत्रिय का आलोचक विमुग्ध दिखता है। श्रोत्रिय के शब्दों में, उन्होंने हर संग्रह में अपने नए और बदले होने का आभास दिया है। सौंदर्य की जितनी अपूर्व विवक्षा नरेश मेहता के यहाँ  संभव हुई है, वह बाद के कवियों में-धर्मवीर भारती तक में नहीं  दीखती, जिनकी कनुप्रिया को अनुभूति की तीव्रता के चलते श्रोत्रिय ने अंधायुग से ज्यादा मान दिया है। श्रोत्रिय कहते हैं कि अगर नरेश जी चरम तक पहुँचे हैं तो संसार को लाँघ कर नहीं, उसमें से होते हुए पहुँचे हैं। नरेश जी की उपेक्षा भले हुई पर बकौल् श्रोत्रिय वे न पराजित हुए न याचक, न उनका सर झुका न ओठ फैले। उनकी वैष्णवता के पीछे उनकी आत्मवान प्रज्ञा का योगदान है। अल्पश्रुत रामविलास शर्मा और वीरेन्द्रकुमार जैन की कविता-प्रकृति भी उन्हें मोहक लगती रही है। रंजना अरगड़े के एक सवाल में शमशेर  अपनी तुलना जिस एक कवि से करते हैं, वह वीरेन्द्र कुमार जैन हैं। जैन में भाषा का जैसा अंत:संसार है, वैसा कम कवियों में दीखता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;            अनेक किंवदन्तियों के नायक त्रिलोचन को संस्मरणों में बाँधते हुए श्रोत्रिय उन्हें चलता-फिरता विश्वविद्यालय मानते हैं, जिसमें कई फैकिल्टयाँ  हैं। उन्हें लगता है, त्रिलोचन को जानने के लिए शास्त्र और लोक परंपरा दोनों से जुड़ना अनिवार्य है। प्रमुखत: धरती, दिगंत, चैती और मेरा घर की कविताओं पर आधारित इस मूल्यांकन में श्रोत्रिय को त्रिलोचन में उदात्त मेधा और अनूठी प्रतिभा के मेहनतकश कवि का स्वर सुन पड़ता है जिसकी बानगी संतों की बानी में है। जहाँ  भीतर ज्वाला धधकती है लेकिन बाहर केवल एक शांत तप झलकता है। बकौल श्रोत्रिय उनकी भाषा व्याकरण, अभिधा, व्यंजना और छंद के चतुष्पाद पर खड़ी दिलीप की नंदिनी है, जिसकी रक्षा में वे धनुष ताने हैं। काश श्रोत्रिय उस जनपद का कवि हूँ, ताप के ताए हुए दिन, व जीने की कला के काव्य विस्तार को भी ध्यान में रख पाते तो उनके प्रति अधिक न्याय कर पाते।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;            कुल मिला कर कवि परम्परा: तुलसी से त्रिलोचन पर ध्यान दें तो यह आलोचना नहीं, अनुशीलन से उपजी उपपत्‍तिपूर्ण विवेचना है। अक्सर लगता है कि श्रोत्रिय पर कहीं न कहीं  नरेश मेहता की वैष्णवता हावी है और शुभ- शुभ  देखने-सुनने की आकांक्षी उनकी रसज्ञ आलोचना-वृत्ति सर्जनात्मक अन्वेषण-निदिध्यासन में ही सुख पाती है। वे कविता में कुलीनतावाद के भी हामी है, व्यक्तिवाद के भी, कबीर की अक्खड़ता भी प्रिय है और तुलसी का परंपरापोषण भी ,  नागार्जुन को भी वे कालिदास सच सच बतलाना, तथा बादल को घिरते देखा है जैसी कविता के आलोक में परखते हैं।  उनकी राजनीतिक समाजधर्मी  कविताओं का जिक्र यहाँ  कम ही है, जिनके आधार पर नागार्जुन का असली जन चरित्र सामने आता है और वे जनता की लहरों पर सवार दिखते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नरेश मेहता की वैष्णवता, भारती की माधवता, वीरेन्द्र कुमार जैन की लोकोत्तरता, सुमन की ऐहिकता और अज्ञेय की वैयक्तिकता के वे एक साथ परिपोषक और समर्थक दिखते हैं। ऐसा नहीं लगता कि इन सभी कवियों में मुक्तिबोध और निराला की सत्ता कुछ अलग और अद्वितीय है। को बड़ छोट कहत अपराधू वाले भाव से भरे श्रोत्रिय की आलोचना दरअसल उच्चादर्शो से भरे जीवन-मूल्यों की ही खोज है। कवि परम्परा:तुलसी से त्रिलोचन शीर्षक से तुलसी और त्रिलोचन की अवधी-संवेदना मुखर हो उठती है। यह दूसरे शब्दों में उनकी परंपरा-प्रियता का ही इजहार है। त्रिलोचन ने लिखा है, हिंदी की कविता उनकी कविता है जिनकी साँसों को आराम नहीं था और जिन्होंने सारा जीवन लगा दिया कल्मष को धोने में समाज के। श्रोत्रिय की आलोचना भीसाहित्‍यिक गलियारे में चलाया जाने वाला स्वच्छता अभियान है, जिसे उन्होंने संजीदगी से अंजाम दिया है। गौरतलब यह भी कि अशोक वाजपेयी जिस अकृतज्ञ हिंदी समाज को लेकर अक्सर विक्षुब्धता का इजहार करते रहते हैं, श्रोत्रिय के यहाँ  कवियों के प्रति यह कृतज्ञता प्रचुर मात्रा में मौजूद है।&lt;br /&gt;         --------------------------------&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:85%;"&gt;संपर्क: जी-1/506 ए, उत्तम नगर, नई दिल्ली-110059 फोन: 09955774115&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:85%;"&gt;ईमेल: omnishchal@yahoo.co.in&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4103886293770258948-3073387356022682781?l=shabdsrijan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://shabdsrijan.blogspot.com/feeds/3073387356022682781/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.blogger.com/comment.g?blogID=4103886293770258948&amp;postID=3073387356022682781' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4103886293770258948/posts/default/3073387356022682781'/><link rel='self' 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type='text'>हाल-फिलहाल : 8</title><content type='html'>&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_fc2wY2U36Kc/SPTQHlgLQyI/AAAAAAAAAYk/ibvZZOkReUA/s1600-h/aameen"&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_fc2wY2U36Kc/SPTP0pBhjXI/AAAAAAAAAYc/Yttah8h97QQ/s1600-h/Aalok+Photo.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5257055168320605554" style="WIDTH: 211px; CURSOR: hand; HEIGHT: 257px" height="320" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_fc2wY2U36Kc/SPTP0pBhjXI/AAAAAAAAAYc/Yttah8h97QQ/s320/Aalok+Photo.jpg" width="249" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-size:85%;"&gt;आलोक श्रीवास्तव&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#009900;"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#009900;"&gt;&lt;span class=""&gt;हाल&lt;/span&gt;-फिलहाल&lt;/span&gt; &lt;/strong&gt;स्तंभ के अंतर्गत आप साहित्य की दुनिया में नये प्रकाशनों से रू-ब-रू हैं। हमारे इस स्तंभ में अबतक आप अशोक वाजपेयी, उदयप्रकाश, लीलाधर जगूड़ी, पुष्पिता , &lt;span class=""&gt;गीताश्री,&lt;/span&gt; कुंवर नारायण तथा कृष्ण बलदेव वैद की पुस्तकों पर ओम निश्चल की टिप्पणी पढ चुके हैं। इस श्रृंखला की अगली कड़ी के रूप में प्रस्तुत है हमारे समय के एक महत्वपूर्ण ग़ज़लगो आलोक श्रीवास्तव की पुस्तक &lt;em&gt;&lt;strong&gt;आमीन&lt;/strong&gt;&lt;/em&gt; । &lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;-------------------------------------&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_fc2wY2U36Kc/SPTQHlgLQyI/AAAAAAAAAYk/ibvZZOkReUA/s1600-h/aameen"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5257055493792940834" style="CURSOR: hand" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_fc2wY2U36Kc/SPTQHlgLQyI/AAAAAAAAAYk/ibvZZOkReUA/s320/aameen%27cover.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt; &lt;/div&gt;&lt;div&gt;-------------------------------------&lt;br /&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;आमीन&lt;/span&gt; &lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;आलोक श्रीवास्तव&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;प्रकाशक : राजकमल प्रकाशन&lt;br /&gt;दरियागंज, नई दिल्ली 110002&lt;br /&gt;संस्करण : 2007&lt;br /&gt;मूल्य : 150 रु.&lt;br /&gt;------------------------------------&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-size:180%;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#009900;"&gt;&lt;strong&gt;फूलों की कहानी है तितली की जबानी है&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;ओम निश्चल&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:180%;"&gt;ए&lt;/span&gt;जरा पाउंड ने कहा था, कविता जब संगीत से दूर निकल जाती है तो दम तोड़ने लगती है। हिंदी कविता के प्रांगण में कभी-कभी जब गीतों-गजलों-नज्मों की खुशगवार हवाएं बहती हैं तो लगता है, सब कुछ छंदोमय है। आदमी के सोने, जागने, बोलने, बतियाने, लिखने में--हर कहीं छंद है। प्रकृति में छंद है। जहां छंद नहीं है, लय नहीं है, वहां जीवन नहीं है। और जब कभी छंद की महक कविता से उठती है, तो लगता है छंद बचा है तो जीवन बचा है अभी। आमीन का हिंदी की दुनिया में प्रवेश कुछ इसी तरह हुआ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आलोक श्रीवास्तव की गजलें, नज्में जब तब पढ़ने को मिलती। कभी वे एक प्रकाशन गृह के प्रभारी हुआ करते थे। पुस्तक मेलों में उक्त प्रकाशन गृह की पुस्तकें पलटते हुए जब कभी कोई शायरी की किताब पलटता, संपादक या चयन में उनका नाम होता। नाम न भी होता तो वे उसके स्थापत्य के नेपथ्य में होते। इस तरह बड़े बड़े शायरों की सोहबत ने उन्हें इस मायावी दुनिया में, शब्दों की संगत करना सिखाया जहां सब कुछ लुटा कर भी कोई विपन्न नही, सम्पन्न कहा जाता है। आलोक से मिलते वक्त उनके भीतर के शायर की खुमारी ओझल न रहती और अब जब आमीन सामने है तो केवल खुशामदीद ! कहने का मन होता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह वह समय है जब नई कविता का बोलबाला है। कविता बौद्धिकों की पंगत में बिराजती है। उसे दाद देने वाले कम मिलते हैं, उस पर कलम घसीटने वाले ज्यादा। शायरी कवि-कंठाभरण है। यह एक कंठ से दूसरे कंठ के वाचिक वैभव का हिस्सा बनती हुई आबोहवा में बिखर जाती है। आलोक ने नौकरी बदली, मीडिया में आए लेकिन शायरी से रिश्ता नहीं तोड़ा। नीरज ने कानपुर के नाम पाती में लिखा था, वो कुरसवां की अंधेरी सी हवादार गली, मेरे गुंजन ने जहां पहली किरण देखी थी। आलोक के भीतर की अनुगूंज बताती है कि वे मालवा के हैं और मालवा का शख्स भीतर से कोमल और किसी मेघदूत की तरह शहद से भीगी जबान की बारिश करता हुआ होता है। उर्दू गजलों के प्रतिस्पर्धी माहौल में हिंदी गजलों का रुतबा बुलंद करने वालों में अब दुष्यंत की परम्परा में आलोक श्रीवास्तव भी शुमार किए जा रहे हैं। कमलेश्वर को उनकी गजलें, नज्में, दिलों में नमी पैदा करने वाली लगती रहीं तो गुलजार ने उसका तआरुफ लिखते हुए माना है कि उसकी सीधी-सादी बातों की ठहरी हुई सतह के नीचे एक गहरी हलचल है। वे कहते हैं, अल्फाज का चुनाव और आहंग उसे कुछ विरासत में मिला है, कुछ उसकी अपनी लीक है, अपनी उम्र से बड़ी बात करता है आलोक।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बहुत कम लेकिन चुनिंदा लिखने के हामी आलोक ने हमेशा इस बात से हतप्रभ किया है कि उसकी शायरी भले ही समकालीन शायरों-कवियों की सोहबत में परवान चढ़ी हो, उसका लहजा अलग है। पहली ही गजल शीशे पर दिखती बांकी छवि-सी मुग्ध कर देती है---ले गया दिल में दबा कर राज कोई/ पानियों पर लिख गया आवाज कोई। और हद तब होती है जब वह मक्ते को एक ठोस बुनियाद देता है--रोज उसको खुद के अंदर खोजना/ रोज आना दिल से इक आवाज कोई। मां-पिता की स्मृतियों को नमन करने के लिए यहां दो गजलों का उल्लेख जरूरी है। मॉ पर लिखी गजल का यह मिसरा-- सारे रिश्ते जेठ दुपहरी, गर्म हवा, आतिश, अंगारे/ झरना दरया झील समंदर झीनी-सी पुरवाई अम्मा। मां की यादों को जिस एक और शायर ने अपनी शायरी के बीचोबीच रखा है, वह है मुनव्वर राणा। लेकिन आलोक के दिल और गजल में भी मां के लिए बड़ी जगह है। जिस एक गजल से उसको चाहने वालों की तादाद बढ़ी है, वह अम्मा वाली गजल ही है। मुशायरों में आलोक से इस गजल की फरमाइश जरूर की जाती है और वह उसे सुना कर मां के प्रति बार-बार कृतज्ञ होता है। इस गजल का एक मिसरा और देखिए जिसमें मां को पंचतत्वों की प्रतिमा के रूप में देखा गया है:- उसने खुद को खोकर मुझमें एक नया आकार लिया है/ धरती, अंबर, आग, हवा, जल जैसी ही सच्चाई अम्मा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और बाबू जी के लिए लिखी गजल का एक शेर देखें--&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;अब तो उस सूने माथे पर कोरे मन की चादर है&lt;br /&gt;अम्मा जी की सारी सज-धज सब जेवर थे बाबू जी।&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;--आमीन उन्हीं मां-पिता की स्मृति को इन पदावलियों के साथ अर्पित है--&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;मुझे मालूम है उनकी दुआएं साथ चलती हैं&lt;br /&gt;सफर की मुश्किलों को हाथ मलते मैंने देखा है।&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब पिता का जिक्र छिड़ा है तो इसी गजल के एक और मिसरे का उल्लेख जरूरी है, जिसमें पिता की शख्सियत बोलती है। एक बेटे के अहसास में पिता किस तरह बसते हैं और न होते हुए भी कैसे अस्थि-मज्जा में महसूस होते हैं, इसकी बानगी के लिए यह शेर देखें--तुम्हारे खून से मेरी रगों में ख्वाब रौशन है/ तुम्हारी आदतों में खुद को ढलते मैंने देखा है। हिंदी कविता और शायरी में मां-पिता पर लिखी बहुतेरी कविताएं और गजलें होंगी पर आलोक की गजल दूर से पहचान में आ जाती है। मां-पिता बेशक दुनिया में न हों, उनकी स्मृतिधायी शख्सियत को ये गजलें अस्तित्ववान बनाती हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आलोक गजलों की किसी सल्तनत के दावेदार नहीं, वे गजलों की दुनिया में तुकबंदियां भिड़ाते शायरों के मध्य एक कद्दावर उदाहरण हैं। हिंदी गजलों की उत्तरदायी भूमिका उन्होंने निभाई है तथा किसी तरह की कंडीशनिंग स्वीकार न करते हुए अपने गंतव्य को सुनिश्चित उड़ान दी है---&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;तुम सोच रहे हो बस बादल की उड़ानों तक&lt;br /&gt;मेरी तो निगाहें हैं सूरज के ठिकानों तक।&lt;br /&gt;हर वक्त फिजाओं में महसूस करोगे तुम&lt;br /&gt;मैं प्यार की खुशबू हूं महकूंगा जमानों तक।&lt;br /&gt;&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;आलोक इस रूखे समय में इंसानियत की नमी खोजने निकले हैं। उनकी गजलें इस बात की गवाही देती हैं। जहां वे अपने शब्दों से प्यार बिखेरते चलते हैं, वहीं उनकी निगाह बूढ़े टपरे, टूटे छप्पर के नीचे बरसातें काटते लोगों के यथार्थ पर भी ठहरती है। बशीर बद्र ने लिखा था--हजारों शेर मेरे सो गए कागज की कब्रों में/ अजब मां हूं कोई बच्चा मेरा जिन्दा नहीं रहता। आलोक इसी कद का शेर कहते हैं--जाने क्यों मेरी नींदों के हाथ नहीं पीले होते/ पलकों से ही लौट गयी हैं सपनों की बारातें सच। इन पंक्तियों को पढ़ते हुए अपने गीत का एक टुकड़ा याद आता है: नींद उड़ गयी है अरसे से आंखों की/ उजड़ रही हैं फिर सपनों की तहसीलें।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दुनिया में इतनी गुरबत है, दिक्कतें हैं, गैर बराबरी है कि आप चाह कर भी दुनिया बदल नहीं सकते । शायरी या तो पलायन करती है, या मुठभेड़ में शरीक होती है। आलोक की शायरी पलायन नही करती, वह आम आदमी के सपनों से वास्ता रखते हुए व्यवस्था के जुल्मो सितम से मुठभेड़ करती है--&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;किसी और ने तो बुना नहीं मेरा आस्मां मेरा आस्मां&lt;br /&gt;तेरे आस्मां से जुदा नहीं मेरा आस्मां मेरा आस्मां।&lt;br /&gt;&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;आलोक ने गजलों को किसी विचारधारा का मंच बनने न देकर उसे दिल के कैनवस पर प्रतिष्ठित किया है। वह देश-दुनिया की बड़ी बातें बेशक नहीं करता लेकिन इन्सान और इन्सान के बीच एक ऐसा पुल बनाता चलता है, जिस पर गुजरते हुए यह दुनिया खूबसूरत और रहने योग्य लगे। आलोक लिखते हैं--&lt;em&gt;वो दौर दिखा जिसमें इंसान की खुशबू हो/ इंसान की सांसों में ईमान की खुशबू हो। मस्जिद की फिजाओं में महकार हो चंदन की/मंदिर की हवाओं में, लोबान की खुशबू हो।&lt;br /&gt;&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;मेरे एक कवि मित्र ने लिखा था--&lt;em&gt;तुम्हारे लिए मैं कोई गीत बुन दूं / हमारे लिए कोई सपना बुनो तुम&lt;/em&gt;---और आलोक लिखते हैं--&lt;em&gt;तुम मुझे रोज चिटि्ठयां लिखना/ मैं तुम्हें रोज इक गजल दूंगा।&lt;/em&gt; तब से अब तक की दुनिया कितनी बदली है। अब चिटि्ठयां भला कौन लिखता है। ईमेल और एसएमएस में सारे जज्बात सिमट गए हैं। फिर भी एक शायर चिटि्ठयों के बदले रोज एक नई गजल लिखना चाहता है, इसे शब्दों के प्रति, रचनाधर्मिता के प्रति उसकी प्रतिश्रुति ही कहा जाना चाहिए। आलोक की गजलें यों ही सीधी-सादी नहीं हैं। वे नींदों में खलल डालने वाली हैं। रामावतार त्यागी ने लिखा था, &lt;em&gt;हमें हस्ताक्षर करना न आया चैक पर माना/ मगर दिल पर बड़ी कारीगरी से नाम लिखते हैं।&lt;/em&gt; आलोक की गजलें यही काम करती हैं, वे दिल पर कारीगरी से नाम लिखती हैं। यह महज खिलंदड़ापन नहीं है, एक गहरी कश्मकश है जिसे होंठ चाहते हैं, उसे कभी कभी दिल नहीं मानता। आलोक ही होंठ और दिल की गहराई में उतर कर ऐसी बात कह सकता है--&lt;em&gt;मेरे होंठ कह रहे हैं, उसे चूम कर सुलाना/ मेरा दिल कि चाहता है, उसे रात भर जगाना।&lt;br /&gt;&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;आमीन में गजलों के साथ कुछ दोहे, नज्में और गीत भी शामिल हैं जैसे एक रसोई में सारे किस्म के पकवान। कुछ गजलें अधूरी भी हैं, जैसे जीवन में बहुत कुछ अधूरापन होता है। आलोक ने इस अधूरेपन को भी पाठकों से शेयर किया है। ये आधी-अधूरी गजलें भी पूरी-सी लगती हैं। कभी ठाकुर प्रसाद सिंह ने एक अंतरे के कई गीत वंशी और मादल में सम्मिलित किए थे। उन अधूरे गीतों की गोचर इमेजरी उसे एक पूरे अर्थवान बिम्ब में बदल देती थी। इसी तरह दोहे भी थोड़े लेकिन अर्थ अपरिमित। मां-बेटे के प्यार को केंद्र में रखता एक दोहा देखें। मां-बेटे के नेह में एक सघन विस्तार। ताजमहल की रूह में जमना जी का प्यार। गीतों में आलोक के जज्बात शीशे की तरह पिघले हैं। जो हममें तुममें हुई मुहब्बत, और कई बातें शीर्षक गीत सुकोमलता का पर्याय हैं और फिक्र की चंद पंक्तियां जैसे इंसानियत को रास्ता दिखाती हों --&lt;em&gt;भूल कर चाहतें/ छीन कर राहतें/ बांट कर नफरतें/ खींच कर सरहदें/ हाथ क्या आएगा/ साथ क्या जाएगा/ आओ सोचें जरा !&lt;br /&gt;&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;आलोक के सरोकार संजीदा हैं। उसकी गजलों की रूह में मुहब्बत के चिराग जलते हैं। उसने शायरी की दुनिया में आहिस्ता कदम रखा है, किहीं कोई हड़बड़ी नहीं लेकिन एक जरूरी हस्तक्षेप की तरह हिंदी गजलों की दुनिया में उसका प्रवेश हुआ है। एक शायर के लफ्जों में कहें तो &lt;em&gt;आहिस्ता कदम रखना ये शबनमी लहजा है/ फूलों की कहानी है तितली की जबानी है।&lt;/em&gt; उसे पढ़ते हुए जैसे गजलों, नज्मों का पराग भीतर उतरने लगता है। इन गजलों, नज्मों की यह खूबी है कि ये दिलों को जोड़ती हैं। उजाड़ होती वसुंधरा में अहसासात के बिरवे रोपती हैं । आलोक की किताब आमीन के भीतर समाए संदेश को अगर चंद लफ्जों में बयान करना हो तो मुझे अपने ही गीत ये सर्द मौसम ये शोख लम्हे का एक पद याद आता है, जिसकी पंक्तियां आमीन पढ़ते हुए खुद ब खुद लिख गयी थीं---&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;चलो कि टूटे हुओं को जोड़ें&lt;br /&gt;जमाने से रूठे हुओं को मोड़ें,&lt;br /&gt;अंधेरे में इक दिया तो बालें&lt;br /&gt;हम आंधियों का गुरूर तोड़ें&lt;br /&gt;धरा पे लिख दें, हवा से कह दें&lt;br /&gt;है मंहगी नफरत औ प्यार सस्ता।&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हिंदी गजलों की दुनिया फिर से हरी-भरी हो रही है। सोच की नयी जमीन का विस्तार करने वाले तमाम हस्ताक्षर हवा में बिखरे हुए हैं, जिनकी खुशबुओं से यह दौर रौशन है। फिर भी भरोसे से जिस एक शख्स की ओर उंगली उठाई जा सकती है वह आलोक श्रीवास्तव हैं, इसमें संदेह नहीं। आमीन को जो भी पढ़ेगा, उसे जरूर अपने शेल्फ में सहेजना चाहेगा। प्रत्यक्षम् किम् प्रमाणम्।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;------------------------------------------------&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;आलोक श्रीवास्त्तव की कुछ ग़ज़लें&lt;/span&gt;&lt;/span&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:85%;"&gt;एक &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;चिंतन दर्शन जीवन सर्जन रूह नज़र पर छाई अम्मा,&lt;br /&gt;सारे घर का शोर शराबा, सूनापन तनहाई अम्मा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सारे रिश्ते- जेठ-दुपहरी, गर्म हवा, आतिश, अंगारे,&lt;br /&gt;झरना, दरिया, झील, समंदर, भीनी-सी पुरवाई अम्मा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;घर में झीने रिश्ते मैंने लाखों बार उधड़ते देखे,&lt;br /&gt;चुपके-चुपके कर देती है, जाने कब तुरपाई अम्मा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उसने ख़ुदको खो कर मुझमें एक नया आकार लिया है,&lt;br /&gt;धरती, अंबर, आग, हवा, जल जैसी ही सच्चाई अम्मा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बाबूजी गुज़ते तो घर में सारी चीज़ें तक़्सीम हुईं,&lt;br /&gt;मैं घर मैं सबसे छोटा था, मेरे हिस्से आई अम्मा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:85%;"&gt;दो &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;घर की बुनियादें, दीवारें, बामो-दर थे बाबूजी,&lt;br /&gt;सबको बांधे रखने वाला, ख़ास हुनर थे बाबूजी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तीन मुहल्लों में उन जैसी क़द काठी का कोई न था,&lt;br /&gt;अच्छे-ख़ासे, ऊंचे-पूरे, क़द्दावर थे बाबूजी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब तो उस सूने माथे पर कोरेपन की चादर है,&lt;br /&gt;अम्माजी की सारी सजधज, सब ज़ेवर थे बाबूजी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भीतर से ख़ालिस जज़्बाती और ऊपर से ठेठ पिता,&lt;br /&gt;अलग, अनूठा, अनबूझा-सा, इक तेवर थे बाबूजी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कभी बड़ा-सा हाथ ख़र्च थे, कभी हथेली की सूजन,&lt;br /&gt;मेरे मन का आधा साहस, आधा डर थे बाबूजी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:85%;"&gt;तीन&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;सखी पिया को जो मैं न देखूं, तो कैसे काटूं अंधेरी रतियां,*&lt;br /&gt;कि जिनमें उनकी ही रोशनी हो, कहीं से ला दो मुझे वो अंखियां।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दिलों की बातें, दिलों के अंदर, ज़रा-सी ज़िद से दबी हुई हैं,&lt;br /&gt;वो सुनना चाहें ज़ुबां से सब कुछ, मैं करना चाहूं नज़र से बतियां।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ये इश्क़ क्या है, ये इश्क़ क्या है, ये इश्क़ क्या है, ये इश्क़ क्या है,&lt;br /&gt;सुलगती सांसे, तरसती आंखें, मचलती रूहें, धड़कती छतियां।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उन्हीं की आंखें, उन्हीं का जादू, उन्हीं की हस्ती, उन्हीं की ख़ुश्बू,&lt;br /&gt;किसी भी धुन में रमाऊं जियरा, किसी दरस में पिरोलूं अंखियां।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं कैसे मानूं बरसते नैनो कि तुमने देखा है पी को आते,&lt;br /&gt;न काग बोले, न मोर नाचे, न कूकी कोयल, न चटखीं कलियां।&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:85%;"&gt;[&lt;/span&gt;* &lt;span style="font-size:85%;"&gt;अमीर ख़ुसरो की नज़्र जिनके मिसरे पर ये ग़ज़ल हुई.]&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:85%;"&gt;चार&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;वही आंगन, वही खिड़की, वही दर याद आता है,&lt;br /&gt;मैं जब भी तन्हा होता हूं, मुझे दर याद आता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरे सीने की हिचकी भी, मुझे खुलकर बताती है,&lt;br /&gt;तेरे अपनों को गांव में, तू अक्सर याद आता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जो अपने पास हो उसकी कोई क़ीमत नहीं होती,&lt;br /&gt;हमारे भाई को ही लो, बिछड़ कर याद आता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सफलता के सफ़र में तो कहां फ़ुर्सत के' कुछ सोचें,&lt;br /&gt;मगर जब चोट लगती है, मुक़द्दर याद आता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मई और जून की गर्मी, बदन से जब टपकती है,&lt;br /&gt;नवम्बर याद आता है, दिसम्बर याद आता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:85%;"&gt;पाँच&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;ये सोचना ग़लत है के' तुम पर नज़र नहीं,&lt;br /&gt;मसरूफ़ हम बहुत हैं मगर, बेख़बर नहीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब तो ख़ुद अपने ख़ून ने भी साफ़ कह दिया,&lt;br /&gt;मैं आपका रहूंगा मगर उम्र भर नहीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आ ही गए हैं ख़्वाब तो फिर जाएंगे कहां,&lt;br /&gt;आंखों से आगे इनकी कोई रहगुज़र नहीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कितना जिएं, कहां से जिएं और किस लिए,&lt;br /&gt;ये इख़्तियार हम पे' है, तक़्दीर पर नहीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;माज़ी की राख उलटें तो चिंगारिया मिलें,&lt;br /&gt;बेशक किसी को चाहो मगर इस क़दर नहीं।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;-----------------------------------------&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:85%;"&gt;संपर्क : V-90, Sector-12, Noida 201 301 UP.&lt;br /&gt;Mob. 098990 33337&lt;br /&gt;स्थायी पता : 73, Ramdwara, Vidisha MP&lt;br /&gt;&lt;/span&gt; &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4103886293770258948-4242166830361931353?l=shabdsrijan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://shabdsrijan.blogspot.com/feeds/4242166830361931353/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.blogger.com/comment.g?blogID=4103886293770258948&amp;postID=4242166830361931353' title='8 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4103886293770258948/posts/default/4242166830361931353'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4103886293770258948/posts/default/4242166830361931353'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://shabdsrijan.blogspot.com/2008/10/8.html' title='हाल-फिलहाल : 8'/><author><name>योगेंद्र कृष्णा   Yogendra Krishna</name><uri>http://www.blogger.com/profile/17366269677319716325</uri><email>yogendrakrishna@yahoo.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' name='OpenSocialUserId' value='00615047406804366258'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_fc2wY2U36Kc/SPTP0pBhjXI/AAAAAAAAAYc/Yttah8h97QQ/s72-c/Aalok+Photo.jpg' height='72' width='72'/><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>8</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4103886293770258948.post-4859007662408016796</id><published>2008-10-07T13:05:00.004-04:00</published><updated>2008-10-07T13:29:59.472-04:00</updated><title type='text'>निर्मल वर्मा को याद करते हुए</title><content type='html'>&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_fc2wY2U36Kc/SOuYJqvpRzI/AAAAAAAAAYM/rrumCYueqAc/s1600-h/NIRMAL_VERMA_1JPG.JPG"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5254460682118186802" style="CURSOR: hand" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_fc2wY2U36Kc/SOuYJqvpRzI/AAAAAAAAAYM/rrumCYueqAc/s320/NIRMAL_VERMA_1JPG.JPG" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="color:#009900;"&gt;&lt;span style="font-size:180%;"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="color:#009900;"&gt;&lt;span style="font-size:180%;"&gt;निर्मल स्मरण&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;/span&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="font-size:85%;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-size:85%;"&gt;योगेंद्र कृष्णा&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;तुम्हारे अंतस से नि:सृत&lt;br /&gt;तुम्हारी दुनिया लौट जाती है&lt;br /&gt;हर बार तुम्हारे ही भीतर&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हमें पता है&lt;br /&gt;तुमने ही नहीं&lt;br /&gt;तुम्हारे किरदारों ने भी&lt;br /&gt;तुम्हें रचा है&lt;br /&gt;और अपने किरदारों की ही दुनिया में&lt;br /&gt;अंतत: रचने-बसने के लिए&lt;br /&gt;चुन लिया तुमने&lt;br /&gt;किराए का साझा एक घर&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अंतिम अरण्य तुम्हारा अपना चुनाव था&lt;br /&gt;मृत्यु में जीवन और जीवन में मृत्यु को&lt;br /&gt;अपनी देह से दूर छिटक कर&lt;br /&gt;देखने परखने का.....&lt;br /&gt;अपनी दुनिया के बीहड़ में&lt;br /&gt;होने और न होने के बीच&lt;br /&gt;संपूर्णता में घटित होने का....&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और जहां तुमने&lt;br /&gt;आखिर राख हो चुकी देह से&lt;br /&gt;चुन लीं अपनी ही अस्थियां&lt;br /&gt;पहाड़ और निर्जन एक नदी&lt;br /&gt;जिसमें &lt;em&gt;अवाक्&lt;/em&gt; हम देख सकें&lt;br /&gt;दूर गगन से&lt;br /&gt;फूल की तरह झरती&lt;br /&gt;कोमल आकांक्षाओं-आस्थाओं की&lt;br /&gt;तुम्हारी अंतिम सुरक्षित पोटली&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हम तो हम&lt;br /&gt;प्राग के पतझड़ों&lt;br /&gt;दिल्ली की गर्मियों की उदास लंबी दोपहरों&lt;br /&gt;को भी इंतज़ार रहेगा तुम्हारा&lt;br /&gt;क्योंकि हर बार वे उतरती रहीं&lt;br /&gt;तुम्हारी दुनिया में ठीक तुम्हारी ही तरह.....&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पहाड़ चीड़ और चांदनी&lt;br /&gt;संवेदना और स्मृतियों से धुल-छन कर आतीं&lt;br /&gt;गहन उदासियां, एकाकीपन&lt;br /&gt;और एक चिथड़ा सुख की तलाश में&lt;br /&gt;कांपते-थरथराते दुख से दीप्त चेहरे&lt;br /&gt;तुम्हारे भी जीवन का ठौर बताते हैं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तुम छुपते रहे अपने शब्दों में&lt;br /&gt;मगर हमने खंड खंड संपूर्ण&lt;br /&gt;पा लिया तुम्हें&lt;br /&gt;दो शब्दों के बीच&lt;br /&gt;तुम्हारी खामोशियों में&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तुम अपनी दुनिया में&lt;br /&gt;जहां कहीं भी थे&lt;br /&gt;अज्ञेय कहां थे......&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;-----------------------&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-size:85%;"&gt;पुण्य तिथि : 25 अक्तूबर&lt;/span&gt; &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4103886293770258948-4859007662408016796?l=shabdsrijan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://shabdsrijan.blogspot.com/feeds/4859007662408016796/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.blogger.com/comment.g?blogID=4103886293770258948&amp;postID=4859007662408016796' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4103886293770258948/posts/default/4859007662408016796'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4103886293770258948/posts/default/4859007662408016796'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://shabdsrijan.blogspot.com/2008/10/blog-post_07.html' title='निर्मल वर्मा को याद करते हुए'/><author><name>योगेंद्र कृष्णा   Yogendra Krishna</name><uri>http://www.blogger.com/profile/17366269677319716325</uri><email>yogendrakrishna@yahoo.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' name='OpenSocialUserId' value='00615047406804366258'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_fc2wY2U36Kc/SOuYJqvpRzI/AAAAAAAAAYM/rrumCYueqAc/s72-c/NIRMAL_VERMA_1JPG.JPG' height='72' width='72'/><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4103886293770258948.post-7803196519666695187</id><published>2008-10-06T03:52:00.004-04:00</published><updated>2008-10-06T06:54:05.209-04:00</updated><title type='text'>साहित्य अकादमी का अभूतपूर्व आयोजन</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की जन्मशतवार्षिकी के अवसर पर 1 अक्तूबर, 2008 को साहित्य अकादमी, नई दिल्ली द्वारा पटना के तारामंडल सभागार  में हिंदी काव्य-गोष्ठी आयोजित की गई। पूर्वाह्न 10 बजे से शाम 6 बजे तक कुल चार सत्रों में चली इस गोष्ठी में हिंदी के कई चर्चित वरिष्ठ एवं युवा कवि मंच पर एक साथ उपस्थित थे। यह काव्य गोष्ठी इस मायने में भी अभूतपूर्व थी कि छोटे-छोटे अंतराल के बीच लगभग 7 घंटे तक चली इस गोष्ठी में शुरू से अंत तक भारी संख्या में शहर एवं शहर के बाहर के साहित्य-प्रेमियों, कलाकारों, बु्द्धिजीवियों ने पूरी गंभीरता और तन्मयता के साथ अपनी उपस्थिति के साथ-साथ अपने अतिथि कवियों का उत्साह भी बनाए रखा। आज के असंवेदनशील होते समय में साहित्य के प्रति अरुचि और गहरी उदासीनता की लगातार आती खबरों के बीच बार-बार यह मह्सूस होता रहा कि जहां हम यह काव्य-पाठ सुन रहे हैं वहाँ "शहर अब भी संभावना है"।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वरिष्ठ कवि लीलाधर जगूड़ी की अध्यक्षता में प्रारंभ हुए पहले सत्र में लीलाधर जगूड़ी के अतिरिक्त अनामिका, आलोक धन्वा, अष्टभुजा शुक्ल, शंभू बादल तथा संजय कुंदन ने अपनी कविताएं सुनाईं। दूसरे सत्र में अशोक वाजपेयी की अध्यक्षता में अशोक वाजपेयी के अतिरिक्त नरेश सक्सेना, अरुण कमल, मदन कश्यप, अरुणेश नीरन तथा रंजना जायसवाल की रचनाएं सुनी गईं। तीसरे सत्र में कैलाश वाजपेयी की अध्यक्षता में स्वयं उनकी कविताओं के अतिरिक्त नंदकिशोर आचार्य, ओम निश्चल, विमल कुमार, अनंत मिश्र तथा कमलेश की कविताएं सुनी गईं। अंतिम सत्र में विश्वनाथ प्रसाद तिवारी की अध्यक्षता में ज्ञानेन्द्रपति, सत्यनारायण, रश्मिरेखा, शरद रंजन शरद तथा सुनीता जैन ने अपनी कविताएं सुनाईं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पढी गईं ये कविताएं जितनी विविधताएं लिए हुई थीं, वे एक स्तर पर आकर उतनी ही एकात्म और एक-स्वर भी थीं। वे समकालीन जीवन और समाज के संकटों, अंतर्विरोधों और द्वंद्वों को अपनी पैनी बारीक दृष्टि से बेधती सुनाई पड़ीं। अपनी-अपनी विशिष्ट शैली, अंदाज और तेवर में सामाजिक विसंगतियां, प्रेम और मानवीय सरोकार कविताओं के केंद्रीय स्वर के रूप में बार-बार उभरते रहे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पढी गई कुछ कविताएं हम यहां प्रस्तुत कर रहे हैं :&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="color:#ff6600;"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="color:#ff6600;"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;अध:पतन&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;strong&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;strong&gt;लीलाधर जगूड़ी&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;इतने बड़े अध:पतन की ख़ुशी&lt;br /&gt;उन आंखों में देखी जा सकती है&lt;br /&gt;जो टंगी हुई हैं झरने पर&lt;br /&gt;ऊंचाई हासिल करके झरने की तरह गिरना हो सके तो हो जाए&lt;br /&gt;गिरना और मरना भी नदी हो जाए&lt;br /&gt;जीवन फिर चल पड़े&lt;br /&gt;मज़ा आ जाएजितना मैं निम्नगा होऊंगा&lt;br /&gt;और और नीचे वालों की ओर चलता चला जाऊंगा&lt;br /&gt;उतना मैं अन्त में समुद्र के पास होऊंगा&lt;br /&gt;जनसमुद्र के पास &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;एक दिन मैं अपार समुद्र से उठता बादल होऊंगा&lt;br /&gt;बरसता पहाड़ों पर, मैदानों में&lt;br /&gt;तब मैं अपनी कोई ऊंचाई पा सकूंगा&lt;br /&gt;उजली गिरावट वाली दुर्लभ ऊंचाईकोई &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;कोई गिरना , गिरने को भी इतना उज्ज्वल बना दे&lt;br /&gt;जैसे झरना पानी को दूधिया बना देता है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span style="color:#ff6600;"&gt;आधा चांद मांगता है पूरी रात&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;/span&gt;&lt;strong&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;strong&gt;नरेश सक्सेना&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;पूरी रात के लिए मचलता है&lt;br /&gt;आधा समुद्र&lt;br /&gt;आधे चांद को मिलती है पूरी रात&lt;br /&gt;आधी पृथ्वी की पूरी रात&lt;br /&gt;आधी पृथ्वी के हिस्से में आता है&lt;br /&gt;पूरा सूर्य&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आधे से अधिक&lt;br /&gt;बहुत अधिक मेरी दुनिया के करोड़ों-करोड़ लोग&lt;br /&gt;आधे वस्त्रों से ढांकते हुए पूरा तन&lt;br /&gt;आधी चादर में फैलाते हुए पूरे पांव&lt;br /&gt;आधे भोजन से खींचते पूरी ताकत&lt;br /&gt;आधी इच्छा से जीते पूरा जीवन&lt;br /&gt;आधे इलाज की देते पूरी फीस&lt;br /&gt;पूरी मृत्यु&lt;br /&gt;पाते आधी उम्र में।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आधी उम्र, बची आधी उम्र नहीं&lt;br /&gt;बीती आधी उम्र का बचा पूरा भोजन&lt;br /&gt;पूरा स्वाद&lt;br /&gt;पूरी दवा&lt;br /&gt;पूरी नींद&lt;br /&gt;पूरा चैन&lt;br /&gt;पूरा जीवन&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पूरे जीवन का पूरा हिसाब हमें चाहिए&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हम नहीं समुद्र, नहीं चांद, नहीं सूर्य&lt;br /&gt;हम मनुष्य, हम--&lt;br /&gt;आधे चौथाई या एक बटा आठ&lt;br /&gt;पूरे होने की इच्छा से भरे हम मनुष्य।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#ff6600;"&gt;गाढे अंधेरे में&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;strong&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;strong&gt;अशोक वाजपेयी&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;इस गाढे अंधेरे में&lt;br /&gt;यों तो हाथ को हाथ नहीं सूझता&lt;br /&gt;लेकिन साफ़-साफ़ नज़र आता है :&lt;br /&gt;हत्यारों का बढता हुआ हुजूम,&lt;br /&gt;उनकी ख़ूंख़्वार आंखें,&lt;br /&gt;उसके तेज़ धारदार हथियार,&lt;br /&gt;उनकी भड़कीली पोशाकें&lt;br /&gt;मारने-नष्ट करने का उनका चमकीला उत्साह,&lt;br /&gt;उनके सधे-सोचे-समझे क़दम।&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;div align="justify"&gt;हमारे पास अंधेरे को भेदने की कोई हिकमत नहीं है&lt;br /&gt;और न हमारी आंखों को अंधेरे में देखने का कोई वरदान मिला है।&lt;br /&gt;फिर भी हमको यह सब साफ़ नज़र आ रहा है।&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;div align="justify"&gt;यह अजब अंधेरा है&lt;br /&gt;जिसमें सब कुछ साफ़ दिखाई दे रहा है&lt;br /&gt;जैसे नीमरोशनी में कोई नाटक के दृश्य।&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;div align="justify"&gt;हमारे पास न तो आत्मा का प्रकाश है&lt;br /&gt;और न ही अंतःकरण का कोई आलोक :&lt;br /&gt;यह हमारा विचित्र समय है&lt;br /&gt;जो बिना किसी रोशनी की उम्मीद के&lt;br /&gt;हमें गाढे अंधेरे में गुम भी कर रहा है&lt;br /&gt;और साथ ही उसमें जो हो रहा है&lt;br /&gt;वह दिखा रहा है :&lt;br /&gt;क्या कभी-कभार कोई अंधेरा समय रोशनी भी होता है? &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4103886293770258948-7803196519666695187?l=shabdsrijan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://shabdsrijan.blogspot.com/feeds/7803196519666695187/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.blogger.com/comment.g?blogID=4103886293770258948&amp;postID=7803196519666695187' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4103886293770258948/posts/default/7803196519666695187'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4103886293770258948/posts/default/7803196519666695187'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://shabdsrijan.blogspot.com/2008/10/blog-post.html' title='साहित्य अकादमी का अभूतपूर्व आयोजन'/><author><name>योगेंद्र कृष्णा   Yogendra Krishna</name><uri>http://www.blogger.com/profile/17366269677319716325</uri><email>yogendrakrishna@yahoo.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' name='OpenSocialUserId' value='00615047406804366258'/></author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4103886293770258948.post-3641369094120106508</id><published>2008-09-19T11:47:00.001-04:00</published><updated>2008-09-19T12:42:12.257-04:00</updated><title type='text'>एक अभिनेत्री के संस्मरण</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_fc2wY2U36Kc/SNPKE-_iPEI/AAAAAAAAAXs/5aG9gTI-hwk/s1600-h/chekhov[1].gif"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5247760177794530370" style="CURSOR: hand" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_fc2wY2U36Kc/SNPKE-_iPEI/AAAAAAAAAXs/5aG9gTI-hwk/s320/chekhov%5B1%5D.gif" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:85%;"&gt;एंटन चेखव&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="color:#009900;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="color:#009900;"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="color:#009900;"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;द सी गल की प्रथम प्रस्तुति&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;एम एम चिताउ&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;div align="justify"&gt;अलेग्जैंन्ड्रिन्स्की थिएटर के रंगमंच पर चेखव के &lt;em&gt;द सी गल&lt;/em&gt; की प्रस्तुति तक अनेक युवा नाटककार अंतत: नाटक में नए स्वर की आवश्यकता महसूस कर रहे थे, लेकिन इस आवश्यकता की सम्यक समझ थिएटर दर्शकों में अभी विकसित नहीं हुई थी। जहां तक थिएटर आयोजकों, जो रूसी थिएटर के मामले में लगभग उदासीन बने रहते थे, का प्रश्न है, अन्वेषणों में उनकी कोई खास रुचि नहीं थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुझे याद है पी पी ग्नेडिच द्वारा 1880 या 1881 में लिखा गया नाटक &lt;em&gt;डार्कनेस,&lt;/em&gt; जो इस तरह के नए स्वर की दिशा में पहला प्रयास था, कभी मंचित भी नहीं हो सका : मंचन के लिए इसे अयोग्य माना गया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जैसा कि सभी जानते हैं, ए पी चेखव का पहला महत्वपूर्ण नाटक जो अलेग्जैंड्रिन्स्की थिएटर के रंगमंच पर प्रस्तुत हुआ वह &lt;em&gt;ईवानोव&lt;/em&gt; था। यह नाटक देवीदोव के लिए लाभप्रद साबित हुआ। इसमें रंगकर्मियों के अभिनय अद्भुत थे, और नाटक को भारी सफलता मिली थी। निस्संदेह अभिनेताओं ने नाटक के परिवर्तनकारी नए स्वर को सही रूप में संप्रेषित किया था और दर्शकों ने उसे स्वीकार किया था। हालांकि, चेखव के दूसरे नाटक, द सी गल को इसी थिएटर में भारी असफलता झेलनी पड़ी। इसके प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष कई कारण थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;द सी गल&lt;/em&gt; का चयन वाई आई लेवकिएवा ने अपने लाभ-प्रदर्शन (बेनिफिट परफॉरमेंस) के लिए किया था। रंग-दर्शकों ने उन्हें हमेशा कॉमेडी की भूमिका में देखा था, और एक मनोरंजक शाम बिताने की उम्मीद में वे नाटक देखने आए थे। उनकी इस उम्मीद की एक वज़ह चेखव की विनोदप्रिय `चेखोन्ते´ वाली छवि भी थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नेपथ्य में पहले से ही इस बात की चर्चा थी कि द सी गल `सर्वथा नए स्वर´ में लिखा गया नाटक है। यह बात एक ओर जहां रंगकर्मियों की दिलचस्पी का हिस्सा बन रही थी, वहीं दूसरी तरफ़ उनमें आशंकाएं भी पैदा कर रही थी, हालांकि ये आशंकाएं इस बात से कमज़ोर पड़ रही थीं कि स्वयं नाटककार इस नाटक को पढ़ने वाले हैं, और यह उम्मीद बंधती थी कि वे इन अन्वेषणों को समझने में हमारी मदद करेंगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नाटक की भूमिकाएं स्वयं ए एस सुवोरिन ने बांटी थीं। एम जी सवीना को नीना जरेचनाया की भूमिका अदा करनी थी। ड्यूझिकोवा की भूमिका में अरकाडिना, अबारोनोवा की भूमिका में पोलिना आंद्रयेव्ना तथा माशा की भूमिका में स्वयं मैं थी। पुरुषों की मुख्य भूमिकाएं देवीदोव, वारलामोव, अपोलोंस्की तथा साजोनोव को दी गई थीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अभिनेताओं के लिए निर्धारित जगह, फोयर, पर हमलोग नाटक के पाठ के लिए एकत्र हुए। केवल सवीना और लेखक अनुपस्थित थे। सवीना ने सूचना भेजी थी कि वह अस्वस्थ हैं। बहरहाल, वहां उपस्थित रंगकर्मियों की दिलचस्पी सवीना की अनुपस्थिति में नहीं, बल्कि स्वयं लेखक की उपस्थिति और उनके पाठ में थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बहुत देर तक हमलोगों ने धैर्यपूर्वक इंतज़ार किया। फिर हमलोग हर मिनट पर घड़ी देखने लगे, और सभी लोग जब इंतज़ार करते थक गए तो उनके बीच थिएटर से जुड़ी गप्पें शुरू हो गईं। अंत में मुख्य सूत्रधार, वाई पी कारपोव उपस्थित हुए और उन्होंने हमें सूचना दी कि चेखव ने मास्को से तार भेज कर ख़बर दी है कि वे नाटक के पाठ के लिए नहीं आ पाएंगे। इस समाचार ने सबों को निराश किया। कारपोव ने तब प्रोंप्टर, कोरनेव को नाटक का पाठ करने को कहा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेवकिएवा, जो कभी हतोत्साहित नहीं होती थी, ने द सी गल में अपना प्रदर्शन नहीं किया। लेकिन अपनी प्रतिभा के अनुरूप एक हल्की-फुल्की कॉमेडी का प्रदर्शन उसने संध्या समापन के तौर पर किया। हालांकि नाटक के पाठ के दौरान वह उपस्थित थीं और स्वयं को यह सांत्वना दे चुकी थीं कि नाटक का पूर्वाभ्यास स्वयं चेखव कराएंगे और उस दौरान हमारा मार्गदर्शन करते रहेंगे, क्योंकि थिएटर के प्रोड्यूसर के रूप में उनका कोई मुकाबला नहीं था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नाटक के नए स्वर या उसके मर्म को समझने के संदर्भ में कोरनेव द्वारा नाटक का पाठ हमारी कोई मदद नहीं कर सका। तब हमलोगों ने इसे पढ़ने के लिए घर ले जाने की पेशकश की।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कालांतर में, मास्को आर्ट थिएटर में &lt;em&gt;द सी गल&lt;/em&gt; के प्रदर्शन की जब मैंने प्रशंशा की थी तो मुझे यह प्रतीत हुआ था कि इसके मूल पाठ में पर्याप्त परिवर्तन कर इसे रंगमंच के अनुकूल बनाया गया है। शायद मैं ग़लत थी। प्रश्न नाटक के पाठ और प्रस्तुतकर्ताओं का नहीं, बल्कि हमारे कमज़ोर प्रदर्शन का था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नाटक के पूर्वाभ्यास आरंभ हुए। नाटककार अभी भी मास्को से नहीं पहुंचे थे। सवीना की अस्वस्थता ज़ारी रही, और जरेचनाया की भूमिका सहायक प्रस्तुतकर्ता पोल्याकोव द्वारा पढ़ी गई।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दूसरे पूर्वाभ्यास तक भी नाटककार नहीं पहुंचे थे, और सवीना, जिसने भी थिएटर में अपनी उपस्थिति दर्ज़ नहीं की थी, नीना की भूमिका करने की इच्छुक नहीं थी, हालांकि वह अरकाडिना की भूमिका करना चाह्ती थी। जरेचनाया की भूमिका कोमीसारजेव्स्काया को दी गई। नाटक की भूमिका में की गई प्रत्येक तब्दीली निश्चित तौर पर हमारे अभ्यास पर ख़ेदजनक प्रभाव छोड़ती थी जबकि नाटक की तैयारी के लिए हमें केवल सात पूर्वाअभ्यास करने थे। हालांकि इस मामले में किया गया यह परिवर्तन बेहतरी के लिए था। कोमीसारजेव्स्काया पूर्वाभ्यास के लिए आईं और सवीना की जगह लेने ड्यूझिकोवा भी उपस्थित हुईं। नाटक का पूर्वाभ्यास ज़ारी रखने में सहयोग करने के लिए यह लगनशील, ईमानदार और बेहतरीन अभिनेत्री वास्तविक अदाकारा के आने तक डमी की भूमिका भी अदा करने के लिए तैयार थी। हालांकि, वह बहुत उपयोगी साबित नहीं हो सकी क्योकि यह अनुमान लगा पाना या दूसरे कलाकारों को यह बता पाना सचमुच असंभव था कि सवीना अपनी भूमिका का निर्वाह किस तरह करेंगी। प्रस्तुतकर्ताओं द्वारा दिए गए निर्देशों के अलावा देवीदोव ने भी हममें से कुछ कलाकारों को कुछ निर्देश दिए थे। लेकिन प्रस्तुतकर्ताओं को स्वयं भी अभी नाटककार द्वारा दिए जाने वाले निर्देशों का इंतज़ार था, क्योंकि अपनी प्रखर प्रतिभा के बावजूद, देवीदोव के लिए भी नाटक के नए स्वर को सही-सही पकड़ पाना असंभव हो रहा था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;केवल कोमीसारजेव्स्काया ने इतनी कलात्मकता के साथ नीना जरेचनाया के चरित्र-निरूपण में सफलता प्राप्त की थी कि हमेशा आशा से भरपूर रहने वाली लेवकिएवा की बड़ी-बड़ी आंखों में चमक आ गई थी, और अंगुलियों के संपूर्ण फैलाव के साथ अपना हाथ उठाते हुए उसने मुझे अपनी उम्मीदों के बारे में इन शब्दों में बताया था : वेरा फ्योदोरोव्ना नीना के किरदार में से कुछ तो रच ही लेगी, सबुश्का स्थानीय गायिका (प्राइमाडोना) की भूमिका में अद्भुत रहेगी----कि नाटक का पूर्वाभ्यास शायद दुआओं के साथ अपनी परवाज़ पर है, लेकिन एंटन पैवलोविच इसे अंतिम रूप में संवारेंगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बहुतों की यह उत्सुकता और चिंता थी कि `मंच के भीतर मंच´ पर नीना जरेचनाया के एकालाप पर अलेग्जैंड्रिंस्की थिएटर के दर्शकों की प्रतिक्रिया क्या होगी, और जिसे न कि सिर्फ़ नए स्वर में लिखा गया था बल्कि यह नाट्य-कला में कुछ अत्याधुनिक शिल्प की मांग करता था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नेपथ्य के हमारे हास्य-कलाकारों ने इसे पहले ही अपनी शैली और मिज़ाज में ढाल लिया था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कोमीसारजेव्स्काया अपनी कोशिशों में क़ामयाब रही थीं। उन्होंने इस एकालाप का आग़ाज अपनी बेहतरीन गहरी आवाज़ से कीं--धीरे-धीरे अपने स्वर को उठाती हुई और श्रोताओं का ध्यान अपने स्वर के आकर्षक आरोह-अवरोह पर केंद्रित करती हुईं। फिर स्वर को नीचे गिराती हुई--एक फुसफुसाहट में तब्दील होती आवाज़, और इस एकालाप का अंत जब इस जुमले से हुआ, &lt;em&gt;'समस्त जीव अपने दुखद कालचक्र पूरा कर मृत्यु को प्राप्त हो चुके हैं´&lt;/em&gt;, तो अंतिम शब्द के उच्चारण तक उसका स्वर बिल्कुल क्षीण हो गया था। और यह सारा प्रभाव उसकी अच्छी आवाज़ और स्वर के आरोह-अवरोह पर निर्भर था। संवाद की इस पुरानी तकनीक, जिसमें भावप्रवणता का उपयोग किया जाता है, से बहुत लोग अवगत हैं, बहुतों ने इसका अध्ययन किया है, लेकिन बहुत कम लोग हैं जो इतनी उदात्तता के साथ इसका इस्तेमाल कर पाएंगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कंबल वाले दृश्य का निर्वाह कोमीसारजेव्स्काया सफलतापूर्वक नहीं कर पाई थीं, वह दृश्य विश्वसनीय नहीं बन पाया था, और यह बात प्रदर्शन के दौरान स्पष्ट हो गई थी : दर्शकों ने इस पर अपनी प्रतिक्रिया का इज़हार ठहाके के विस्फोट से किया था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तीसरे पूर्वाभ्यास के लिए जब मैं अपने ड्रेसिंग-रूम में पहुंची तो वहां मुझे अपनी मुख्य दर्ज़ी (कॉस्टूमियर) से मुलाक़ात हुई, जिसके साथ मैंने माशा की भूमिका के लिए थिएटर के पोशाक-कक्ष से अपने लिए पोशाक का चुनाव किया था और उसमें कुछ संशोधन करने के लिए उससे कहा था। वह उदासीन दिखी, और जब मैंने उसे उस पोशाक की फिटिंग आदि जल्दी करने को कहा तो मैं चकित रह गई जब उसने घोषणा की कि `मारिया गैव्रीलोव्ना (सवीना) ने इस पोशाक को अपने लिए बिल्कुल सही पाया है और वह इसी ड्रेस में प्रदर्शन करने जा रही हैं। फिर बाद में जब संभव होगा तो इसमें संशोधन कर दिया जाएगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बात मेरी समझ में तब आई जब स्वयं लेवकिएवा वहां आईं। वह परेशान दिख रही थी, हालांकि यह उसके स्वभाव का हिस्सा नहीं था। उन्होंने मुझे बताया कि दरअसल सवीना ने द सी गल को समझा नहीं है और अरकाडिना तथा नीना जरेचनाया की भूमिकाएं वे अस्वीकार चुकी हैं, लेकिन बावजूद इसके लेवकिएवा के साथ अपनी पुरानी दोस्ती की खाातिर उन्होंने लाभ-प्रदर्शन के लिए माशा की भूमिका करने की पेशकश की है, और पुन: दूसरी बार भी वे यह किरदार निभाएंगी, और तब यह भूमिका मुझे दी जाएगी। आज मैं अपना पूर्वाभ्यास ज़ारी रखूंगी लेकिन शेष पूर्वाभ्यास मारिया गैव्रीलोव्ना करेंगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;`आखिर यह कैसा पूर्वाभ्यास है!´ मैंने गुस्से में प्रतिकार किया। `चार शेष अभ्यास मुझसे छीन लिए गए हैं। सच तो यह है कि लाभ-प्रदर्शन इसलिए स्थगित नहीं किया जा सकता कि न कि सिर्फ नाटक की तैयारी पूरी नहीं हुई है, बल्कि इसलिए कि हमें पता ही नहीं कि इसकी तैयारी कैसे की जाए!´&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरे इस बेतुके प्रलाप ने लेवकिएवा को इतना परेशान कर दिया था कि मैं अपनी ग़लती पर तत्काल लीपापोती कर अपने अंतिम पूर्वाभ्यास के लिए बाहर निकल आई।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अभी भी नाटककार का कोई अता-पता नहीं था। कुछ रंगकर्मी संयोजन की कमियों को लेकर उत्तेजित और निराश थे, जबकि अन्य इन बातों पर कोई ध्यान न देकर अपने मोरंजन में लग गए थे। इसका नतीज़ा यह निकला कि न केवल नए स्वर विकसित नहीं हो सके बल्कि इस परिस्थिति में पूर्वाभ्यास भी असंभव हो गया, और सब कुछ बिखरने लगा। केवल कोमीसारजेव्स्काया, जिन्होंने पहले ही से अपनी भूमिका पर पर्याप्त चिंतन-मनन कर रखा था, ने इस दौरान कुछ हासिल किया, और सबसे बड़ी बात, अपने किरदार के साथ उन्होंने तादात्म्य स्थापित कर लिया था। वे अपना किरदार करती रहीं और हर पूर्वाभ्यास के साथ उन्होंने बेहतर प्रदर्शन किया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दूसरे दिन चूंकि मुझे पूर्वाभ्यास करना नहीं था इसलिए मैं नहीं गई। हालांकि उसी शाम कारपोव मुझसे मिलने आए और उन्होंने मुझसे कहा कि सवीना ने माशा की भूमिका भी छोड़ दी है, और पोल्याकोव ने पूर्वाभ्यास के दौरान मेरी भूमिका पढ़ी थी, और यह कि अब यह भूमिका मुझे वापस की जा रही है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसी अव्यवस्था और गड्डमड की स्थिति पहले कभी नहीं देखी गई!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अंतत: ए पी चेखव पहुंचे, और हमारे पूर्वाभ्यास में अंत तक बने रहे। लेकिन इस दौरान उन्होंने कोई टिप्पणी नहीं की, कोई निदेश नहीं दिया। संभवत: इसलिए कि तबतक किसी भी प्रकार के परिवर्तन के लिए काफ़ी विलंब हो चुका था, या पता नहीं किसी अन्य कारण से। पूर्वाभ्यास का कोई लाभ नहीं मिल रहा था और सभी हतोत्साहित होने लगे थे, लेकिन कोमीसारजेव्स्काया ने नीना की अपनी भूमिका में बेहतरी ज़ारी रखी। अबारिनोवा भी निराश नहीं थी, बल्कि यह समझते हुए कि नए स्वर का सुराग़ उनके हाथ लग गया है, उन्होंने हममें से अनेक रंगकर्मियों को पूरे विश्वास के साथ सलाह दी :&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;`मुख्य चीज़ है विषादपूर्ण स्वर में बोलना।´&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिर, उत्साहपूर्वक पूर्वाभ्यास करती हुई, वे ट्रेप्लेव को रुदन भरे स्वर में कहतीं :&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;`अच्छा, अब तुम एक प्रख्यात लेखक बन गए हो।´&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेवकिएवा, जो पारंपरिक नाट्य-शैली में प्रशिक्षित हुई थीं, यह सब समझने में पूरी तरह असमर्थ होतीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;`लेकिन यह कितना अद्भुत है कि वह एक प्रख्यात लेखक बन गया है´, वे मुझसे फुसफुसातीं, `लेकिन तोशा (अबारिनोवा) क्यों इस तरह बात कर रही है जैसे उसे बता रही हो कि उसकी प्यारी आंट बीमार पड़ गई है!´&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और अंत में अब मेरे पास कुछ बातें लाभ-प्रदर्शन के संदर्भ में ही कहने को रह गई हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पर्दा उठने के ठीक पहले यह अफ़वाह फैलने लगी कि युवा वर्ग इस प्रदर्शन पर सीटी बजाएंगे और हूट करेंगे। अफ़वाह किधर से आई हमें पता नहीं, पर सभी लोगों की यह राय बनी कि चेखव युवाओं के बीच लोकप्रिय नहीं हैं क्योंकि चेखब की दिलचस्पी राजनीति में नहीं है और क्योंकि सुवोरिन से उनकी मित्रता है। इस अफ़वाह, जो अनर्गल ही क्यों न सही, का असर अधिसंख्य रंगकर्मियों के मूड पर भी पड़ा : नाटक अगर प्रस्तुति के पूर्व ही असफल होने को अभिशप्त हो तो किया ही क्या जा सकता था?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यही वे परिस्थितियां थीं जिसमें द सी गल की शुरुआत हुई। दर्शकों ने इस नाटक को किस प्रकार लिया इसके बारे में उन लोगों ने बहुत कुछ लिखा है जिन्होंने इस तमाशे को देखा था। जहां तक मेरा सवाल है, मैं केवल इतना जोड़ना चाहूंगी कि, जहां तक मैं जानती हूं, अलेग्जैंड्रिन्स्की थिएटर के रंगमंच पर इतना बुरा प्रदर्शन पहले कभी नहीं हुआ था, और इसके पूर्व हमलोगों ने वाहवाही में कभी दर्शकों की ऐसी सिसकारियां और `रंगकर्मियों को मंच पर लाओ´ या `नाटककार को सामने लाओ´ जैसे नारों के सा सिसकारियों के विस्फोट नहीं सुने थे। रंगकर्मी अपनी असफलता से क्षुब्ध अंधकार में गुम हो गए थे। लेकिन सबों ने महसूस किया कि उस अंधकार में भी कोमीसारजेव्स्काया एक प्रकाश की तरह चमक रही थीं जब मंच पर आकर दर्शकों का झुक कर अभिवादन करने की उनकी बारी आई, और दर्शकों ने जब पूरे उत्साह के साथ उनका स्वागत किया। दर्शक, जो अपने मनोरंजन और जी भर हंसने के लिए एक हास्य अभिनेत्री के लाभ-प्रदर्शन देखने आए थे, को अगर `केलिको ब्लैंकेट´ (जैसा कि एक संस्मरण लेखक ने लिखा) दृश्य वाली कोमीसारजेव्स्काया के हास्यास्पद कारनामों पर हंसना पड़ा तो इसमें कोमीसारजेव्स्काया का कोई दोष नहीं था, क्योंकि नाटक के रूप में द सी गल का प्रदर्शन किसी भी स्थिति में दर्शकों के उत्सवी मूड को बदलने में कामयाब नहीं हो पाता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुझे स्मरण नहीं कि वह कौन-सा ऐक्ट था जिस दौरान मैं ड्रेसिंग रूम में आई और वहां लेवकिएवा को चेखव के साथ देखा। वह अपनी बड़ी-बड़ी आंखों में अपराध-बोध या सहानुभूति के भाव लिए चेखव को देख रही थीं और अपने हाथ से भी कोई संकेत नहीं कर रही थीं। चेखव अपना सिर झुकाए बैठे थे। केश का एक लट उनकी ललाट पर आ गिरा था, और उनका पैन्स-ने (नाक पर बैठने वाला चश्मा जिसे कान के सहारे की ज़रूरत नहीं होती) उनकी नाक पर कुछ टेढ़ा बैठा था…दोनों में से कोई भी कुछ बोल नहीं रहे थे। उनकी बगल में खड़ी मैं भी चुप थी। कुछ क्षण इस तरह गुज़रे, फिर चेखव अचानक खड़े हुए और बाहर निकल गए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और वे केवल थिएटर से ही बाहर नहीं निकले, बल्कि सेंट पीटर्सबर्ग से भी चले गए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नाटक की दूसरी प्रस्तुति के दौरान चमत्कारिक परिवर्तन हुआ : नाटक का अद्भुत स्वागत हुआ और लेखक तथा रंगकर्मियों को रंगमंच पर बुलाने की असंख्य मांगें गूंजीं। कोमीसारजेव्स्काया को जो उत्साहजनक सराहनाएं मिलीं उसकी बात तो छोड़ ही दें। बहरहाल, निस्संदेह दूसरी बार भी, हमारा प्रदर्शन पहली बार से कोई बेहतर नहीं था।&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:85%;"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:85%;"&gt;पेरिस, १९२६ &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:85%;"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;em&gt;अनुवाद&lt;/em&gt; &lt;/span&gt;: योगेन्द्र कृष्णा&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4103886293770258948-3641369094120106508?l=shabdsrijan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://shabdsrijan.blogspot.com/feeds/3641369094120106508/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.blogger.com/comment.g?blogID=4103886293770258948&amp;postID=3641369094120106508' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4103886293770258948/posts/default/3641369094120106508'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4103886293770258948/posts/default/3641369094120106508'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://shabdsrijan.blogspot.com/2008/09/blog-post.html' title='एक अभिनेत्री के संस्मरण'/><author><name>योगेंद्र कृष्णा   Yogendra 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