<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss'><id>tag:blogger.com,1999:blog-3857696409871553743</id><updated>2009-12-02T14:41:02.263+06:00</updated><title type='text'>दख़ल की दुनिया</title><subtitle type='html'>सच बोलने का साहस</subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://dakhalkiduniya.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3857696409871553743/posts/default?start-index=26'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dakhalkiduniya.blogspot.com/'/><link rel='hub' href='http://pubsubhubbub.appspot.com/'/><link rel='previous' type='application/atom+xml' 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align="justify"&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="color:#cc33cc;"&gt;आलोक श्रीवास्तव के द्वारा नामवर सिंह को लिखा गया एक खुला ख़त, जिसे ब्लाग पर पहले ही आ जाना था. कुछ व्यस्तताओं के कारण नहीं आ सका. उम्मीद है कि यह ख़त आज की चुनौतियों पर रोना रोने के बज़ाय एक नयी दिशा देगा.&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;em&gt;&lt;/em&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;strong&gt;"जीवन में सपना नही रहा, क्योंकि सोवियत संघ नहीं रहा..... ” नामवर जी, यह पुरानी बात हो गई। ” समाजवाद कैंप नहीं रहा एक ही महाशक्ति का वर्चस्व हैं........ ”  &lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;ये और इस तरह की तमाम बातें अनैतिहासिक हैं और अप्रमाणिक मन से जन्मी हैं. क्या जब नाज़ी कैंपों में, बंगाल के अकाल में और साम्राज्यवादी विश्व युध्द में 5 करोड़ से ज्यादा लोग जिबह कर दिए गए थे, सपना खत्म हो गया था? जब मध्ययुगीन बर्बरों ने दुनिया को अपने अश्वों की टापों से रौंद दिया था -- तब दुनिया के संज्ञान और मानव-नियति से साक्षात के उपक्रम खत्म हो गए थे?&lt;br /&gt;नामवर जी, वे सपने कमज़ोर थे, जो समाजवाद कैंप पर टिके थे, क्या इतिहास में बारंबार ऐसे दौर नही़ आए जब सिर्फ पराजय क्षितिज तक दिखाती हो, सिर्फ़ धूसर हो गए स्वप्न दूर तक नज़र आते हों? माना कि यह युग कड़ा बहुत है -- पर इतिहास के व्दंव्द सलामत हैं और उपजाऊ हैं. सपनों की ज़मीन अभी भी ज़रखेज है. वैयक्तिक निराशा को इस प्रकार प्रचारित तो न करें. हिंदी की दुरिया वैसे भी अनुचरों की दुनिया हैं.&lt;br /&gt;आज अधिक बड़े सपनों की और ज्यादा गहरे कर्मों की दरकार हैं. आप अपनी उम्र और अपने सपने जी चुके. नई पीढ़ी को यह सिखाएं कि उधार के सपने मत देखना -- हमारी तरह. अपनी जागृति में अपने स्वप्न गढ़ो और उन्हें मशाल की तरह आनें वालों को सौंपो. इस विश्व और जीवन को जानने और बदलने का संज्ञान अभी भी मौजूद हैं, समाजवादी कैंपों के टूटने से सपने नही मरे हैं, बक्लि यह बात रेखांकित हुईग् है कि सपनों के लिए जीना भी पड़ता है. वे सडी-गली व्यवस्थाए खत्म हुई थीं, जिन्हें समाजवाद या माक्र्सवाद नहीं खत्म हुआ था. तथाकथित समाजवादी कैंपों के धराशाई होने से यह बात रेखांकित हुई थी कि क्रांति की भावना, विचार और तंत्र किन्हीं देशों में गुमराह हो चुके थे.&lt;br /&gt;सोवियत संघ के विघटन से न इतिहास खत्म हुआ न वर्ग युध्द --बक्लि वह और पैना, और उजागर हुआ है. उसने अब ऐसी परिस्थिति पैदा कर दी हैं कि पूंजीवादी वैश्विक तंत्र के खिलाफ़ मानव-भविष्य की वैकल्पिक विचारधारा, चेतना और कर्म को स्थापित करने के लिए ज्यादा यथार्थवादी और वैज्ञानिक ढंग से काम किया जाए. ” सोवियत संघ का विघटन पूंजीवादी षडयंत्र था, सी आई ए की साजिश थी.............. ” इन कुतर्कों से इतिहास बहुत आगे निकल आया है. इस बात की संपूर्ण वैचारिकी अब मौजूद है कि सोवियत संघ क्या बन गया था? सोवियत संघ और चीन की बीसवीं सदी के उत्तरार्ध की राजनीति और इतिहास विश्व सर्वहारा से विश्वासघात का इतिहास है. उस इतिहास को कलपने वाले शायद इतिहास को ठीक से जानने की जरूरत नही समझते. और यह ज़रूरत न समझना उनकी कमज़हनी से नहीं निहित स्वार्थें से जुड़ी बात है. साम्राज्यवाद बेशक आज बहुत मजबूत स्थिति में है, पर उसको मजबूती दी किसने? चीन विश्व राजनीति में तमाम प्रतिक्रियावादी देशों को अपना दुमछल्ला बना कर विश्व-सर्वहारा के साथ गद्दारी करता रहा और सोवियत संघ भारत सहित अनेक देशों के प्रतिक्रियावादी शासक वर्ग के साथ तीसरी दुनिया के सर्वहारा संघर्षो को पीछे घसीटता रहा. जिस समाजवादी कैंप की बात आप कह रहे हैं, उसके ठीक स्वरूप् केा समझने की ज़रूरत है, न कि उसका रोना रोने की, 1960 से 1990 तक के तथाकथित समाजवादी कैंप की राजनीति और विश्व सर्वहारा संघर्ष पर उसके प्रभाव का ठीक-ठीक आकलन ही भारत जैसे देशों में और उसमें हिंदी पट्टी औ हिंदी पट्टी के साहित्य को वास्तव में जन का साहित्य बनाने की राह पर ले जाएगा. अन्यथा जनवाद और इसी पतनशील व्यवस्था में जम कर मलाई खाते रहे, वह कई और पीढ़ियों तक जारी रह सकता है.&lt;br /&gt;दुनिया इनते पराभव इतनी इसहायता की स्थिति में नही पहुंची है. साम्राज्यवाद आज अपनी सैन्य-शक्ति में, पूंजी के फैलाव में, अपने सांस्कृतिक प्रभुत्व में बेशक अतीत के किन्हीं भी युगांे से बहुत मजबूत है, पर याद रखें कि एक जगह वह बेहद कमजोर हुआ है, और आने वाले दशकों में और भी कमजोर होगा-- वह है पूंजी के रह रह कर दोहराने वाले संकट की रिपेयरिंग में --- अब ये संकट ग्लोबल होंगें, ज्यादा मारक होंगें, और समाजों में उथल-पुथल ला देंगें. दो-तीन दशक बाद यह पूंजीवाद के वश का नहीं रह जाएगा िकवह किन्हीं कीन्स और किन्हीं अन्य अर्थशास्त्रियों के सिध्दांतों के बलबूत इन संकटों से निपठ सके. दूसरी बात यह होने जा रही है कि अब ये संकट ज्यादा आवत्र्तिता के साथ होंगें, आने वाली पूरी सदी में माक्र्स --- जहां तक आर्थिक विश्लेषण की बात है क्लासिक ढंग से और कह लें कि पैगंबरी ढंग से सच प्रमाणित होने जा रहे हैं. लेकिन साम्राज्यवाद इन संकटों के आगे घुटने टेक देगा, इस खुशफ़हमी में न रहें, इन संकटों के निदान निरंतर युध्दों और विश्व-प्रभुत्व में ढूंढ़े जाएंगें. सभ्यता का संकट ठीक यहीं पर है. वह संकट यह है कि माक्वर्स जहां इतिहास की हर करवट के साथ आर्थिक रूप् से एक भविष्यवक्ता की तरह डेढ़ सौ साल बाद भी सही सिध्द होते जाएंगे सिध्द होंगे, और हुए हैं, यह स्वाभाविक भी है, क्योंकि निदान की जो रूपरेखा थी, वह उनके अपने युग के लिए थी. माक्र्स के समय में पूंजीवाद में मानव-आबादी की चेतना और संस्कृति में इतनी फेरबदल नहीं की थी, पर आज इक्कीसवीं सदी में यह फेरबदल बहुत बड़े पैमाने पर हो चुकी है, श्रमिक वर्ग की पूरी संरचना में भी बड़े पैमाने की फेरबदल कर दी गई है. तो वास्तविक चुनौती इस युग के लिए जनता के पक्ष में प्रतिरोध के निर्णायक स्वरूपांे का निर्माण है. इस कार्य की पहली मंजिल संस्कृति और चेतना का प्रबोध नही है, उस संस्कृति और चेतना का जिसे पूंजीवाद और साम्राज्यवाद ने पिछले दो-तीन दशकों में तो बहुत तेजी से भष्ट और स्वप्नहिन बनाया है, नामवर जी हम हिंदी के किसी साहित्यिक अखाड़े की भाषा में नहीं इतिहास को जानने की इसी जन-नैजिकता के तकाजे से आपको यह बताना चाहते हैं कि आपके इस तरह के विचार इस स्वप्नहीनता के पक्ष में जात हैं -- बजाय उसका प्रतिरोध बनने के, और आप पिछले डेढ़ दशक से निरंतर, ठीक यही काम कर रहे हैं-- अपने तमाम व्याख्यानों आदि के जरिए. सोवियत संघ के टूटने के बाद भी हिंदी जगत का यह जीवंत सत्य है कि दिल्ली से लेकर आरा-पटना तक और राजेंद्र यादव से लेकर नवजात कविगण तक लोग आपकी कितनी भी भत्र्सना निजी या साहित्यिक कारणें या हताशाओं के चलते करते हों , फिर भी आपके उवाच आज भी हिंदी की दुनिया में व्यापक रूप् से प्रसारित होते हैं और उनका असर भी पड़ता है।&lt;br /&gt;ठीक यही वजी है कि आपको यह बताना ज़रूरी लग रहा है कि सोवियत संघ के परजीवी समाजवाद और सपनों का ज़माना खत्म हुए युग बीत चुका हैं. उस तथाकथित समाजवाद और उस समाजवादी सपने की कमाई खाने वाली और उससे अपनी दुकानें चलाने वाली प्रतिभओं के कुचक्रों ने हिंदी में वास्तविक माक्र्सवादी चेतना और स्वप्न को उठाना ही नहीं लेेने दी. यह राज्य समर्थित प्रतिरोध का बोदा साहित्य और विचारधारा थी, जो हिंदी में मठाधीशों व्दारा प्रत्यारोपित की गई थी. सोवियत संघ के तथाकथित समाजवादी कैंप व्दारा समर्थित भारत के माक्र्सवादी राजनीतिक दलों और भारत की बुर्जुआ राजसत्ता से उनके गठबंधन ने हिंदी साहित्य को क्षरित किया है. विभाजित व्यक्तित्व और विभजित मूल्यों वाले समाजचेता रचनाकर्मियों ने हिंदी साहित्य का जो हाल किया वह किसी बड़ी प्रतिभा को जन्म नहीं दे पाया. माक्र्सवादी सौंदर्यशास्त्र को अपनी चेतना का अंग बना पाने का संघर्ष इसीलिए मुक्तिबोध का अकेले का संघर्ष बन कर रह गया, न कि इसलिए कि मुक्तिबोध कोई बिरली प्रतिभा थे, जो अपने अवसान के साथ हिंदी साहित्य के माक्र्सवादी सौंदर्यशास्त्र की समस्त संभावनाएं और उसका समस्त भावी आत्मसंघर्ष भी लेते गए. स्वतंत्रता के बाद का और उसके आगे 1960 के बाद का तो अधिकांश हिंदी साहित्य व्यवस्था से पोषित लेखकों-आलोचकों का साहित्य रहा, न कि संघर्ष का साहित्य. यह संघर्ष का स्थूल अर्थ न लें वरना हिंदी लेखकों के पास मध्यवर्गीय जीवन और उसके लिए नौकरी के जुगाड़ वाले गर्दिश के दिनों की एक से एक कहानियां चिनी हुई होंगी. यहां संघर्ष से आशय माक्र्सवादी सौंदर्यशास्त्र के लिए किए गए आत्मसंघर्ष और उसके जरिए व्यक्तित्व के रूपांतरण के लिए किए गए संघर्ष से है। &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;नामवर जी जिस चीज का स्यापा कर रहे हैं, वह कुछ लोगों के लिए सुविधाजनक ज़रूर थी, पर वह किन्हीं मूल्यों, संघर्षों और वैचारिकता को सत्ता का गुलाम बनाने वाली थी. क्या आज सन 2008 में इस बात के दस्तावेजी और परिस्थितिजन्य प्रमाणें की आवश्यकता है कि समाजवादी कैंप ने हिंदी साहित्य को किस तरह बधिया और अवसरवादी बना दिया? ऐसे मिथ्या स्वप्नों के लिए बिसूरने वालों के लिए नागार्जुन की यह पंक्ति ही अलम है--- ” भूल जाओ पुराने सपने ”&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="color:#333300;"&gt;आलोक श्रीवास्तव  -मुंबईफोन- 09320016684&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3857696409871553743-8236224464940343779?l=dakhalkiduniya.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dakhalkiduniya.blogspot.com/feeds/8236224464940343779/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.blogger.com/comment.g?blogID=3857696409871553743&amp;postID=8236224464940343779' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3857696409871553743/posts/default/8236224464940343779'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3857696409871553743/posts/default/8236224464940343779'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dakhalkiduniya.blogspot.com/2009/08/blog-post_07.html' title='इतिहास के द्वन्द अभी सलामत हैं, नामवर जी ........'/><author><name>चन्द्रिका</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08498808385035641834</uri><email>chandrika.media@gmail.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' name='OpenSocialUserId' value='13859221743332310890'/></author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3857696409871553743.post-641126115413191801</id><published>2009-08-05T13:17:00.003+06:00</published><updated>2009-08-06T13:33:20.214+06:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='विकल्पहीन नहीं है दुनियाँ-'/><title type='text'>गोरखालैंड तो बन चुका है</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;कृपाशंकर &lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_06z5ZQ7dCYo/Snk0mN_XbuI/AAAAAAAAAts/SH0pb8c8f-A/s1600-h/kripa+shankar+chaube.JPG"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5366378262183767778" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 175px; CURSOR: hand; HEIGHT: 225px" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_06z5ZQ7dCYo/Snk0mN_XbuI/AAAAAAAAAts/SH0pb8c8f-A/s320/kripa+shankar+chaube.JPG" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;चौबे&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;लंबे समय से चल रही अलग गोरखालैंड राज्य की लड़ाई एक संवैधानिक संकट के मोड़ पर पहुंच गई है। दरअसल व्यवहार में गोरखा जनमुक्ति मोर्चा (जीजेएम) ने अलग गोरखालैंड राज्य हासिल कर लिया है।पूरे दार्जिलिंग पर्वतीय क्षेत्र में दुकानों के साइनबोर्ड में पश्चिम बंगाल का नाम मिटाकर गोरखालैंड कर दिया गया है तो गाड़ियों के नंबर प्लेट में भी डब्लू बी (वेस्ट बेंगाल) की जगह जीएल (गोरखालैंड) लिखवा दिया गया है। और तो और, जीजेएम ने पूरे पहाड़ में गोरखालैंड की अपनी सुरक्षा व्यवस्था लागू कर रखी है। पहाड़ में पश्चिम बंगाल पुलिस को प्रवेश करने की इजाजत नहीं है। जगह-जगह गोरखा जनमुक्ति के साढ़े दस हजार सशस्त्र जवान तैनात हैं। इन्हें जीएलपी यानी गोरखालैंड पर्सनल कहा जाता है। वैसे ये काम पुलिस का करते हैं इसलिए जीएलपी को पहाड़वासी पुलिस ही कहते हैं। जीएलपी के इन लाठीधारी जवानों ने सेना के पूर्व कर्नल रमेश दीक्षित से प्रशिक्षण हासिल किया है। जीजेएम ने अपना अलग प्रशिक्षण शिविर बना रखा है और उसके अध्यक्ष विमल गुरुंग ने कहा है कि जीएलपी जवानों की संख्या बढ़ाई जाएगी। गुरुंग ने जीएलपी के लिए प्रशिक्षण देकर कुल पचीस हजार जवानों को तैयार करने का ऐलान किया है। पहाड़ में जीएलपी के जवानों, पहाड़ की दुकानों और गाड़ियों को देखकर लगता है कि गोरखालैंड तो व्यवहार में बन ही गया है।&lt;br /&gt;व्यवहार में गोरखालैंड हासिल हो जाने के बाद अब उसे संवैधानिक स्वीकृति दिलाने के लिए जीजेएम ने पहाड़ में बीते तेरह जुलाई से हड़ताल कर रखी है। इस हड़ताल को टलवाने के लिए केंद्र सरकार ने अगले महीने अगस्त में तितरफा बैठक बुलाई है। उस प्रस्तावित बैठक की घोषणा किए जाने के बावजूद जीजेएम ने हड़ताल जारी रखने का ऐलान किया है और संकेत दिया है कि इस बार उनकी हड़ताल डेढ़ महीने से भी ज्यादा समय तक चल सकती है। दरअसल पहाड़ में अब गुरुंग की ही चलती है। वे ही आजकल दार्जिंलिंग के एकछत्र सम्राट हैं। पहाड़ पर दो दशकों से ज्यादा समय तक एक छत्र राज करनेवाले गोरखा राष्ट्रीय मुक्ति मोर्चा (जीएनएलएफ) के अध्यक्ष सुभाष घीसिंग भी गुरुंग की लोकप्रियता के आगे बौने पड़ गए हैं। उनका खुद का दार्जिलिंग में प्रवेश करना मुहाल हो गया है। उन्हें पहाड़ से निर्वासित होना पड़ा है। घीसिंग को पहाड़ के केंद्र से परिधि में फेंकने के बाद गुरुंग अब घीसिंग द्वारा सबसे लंबे समय तक की गई हड़ताल के रेकार्ड को भी इस बार तोड़ देना चाहते हैं। घीसिंग ने अपने आंदोलन के उत्कर्ष के जमाने में 45 दिनों तक लगातार हड़ताल की थी। गुरुंग उससे ज्यादा दिनों तक हड़ताल करने को आमादा हैं। गुरुंग की सलाह पर पहाड़वासियों ने जब दो महीने का राशन अपने यहां रख लिया, उसके बाद ही हड़ताल आरंभ की गई। इसके अलावा ऐहतियात के तौर पर जीजेएम ने खाद्यान्न के तीन गोदाम भरकर रखवा लिए हैं। पर्याप्त मात्रा में खाद्यान्न रखे जाने से भले हड़ताल के दौरान पहाड़वासियों को भोजन की असुविधा न हो पर जीजेएम का सारा आंदोलन एक गंभीर खतरे की तरफ इशारा करता है। हड़ताल के कारण जिस तरह पहाड़ को बाकी देश से काट दिया गया है, उसे किसी दृष्टि से उचित नहीं ठहराया जा सकता।&lt;br /&gt;जीएलपी के जवान जिस तरह पहाड़ में कानून-व्यवस्था को संभाले हुए हैं और विभिन्न सामाजार्थिक विकासमूलक योजनाओं के क्रियान्वयन, पर्यटकों की सहायता, यहां तक कि महाकाल मंदिर की सुरक्षा संभाल रहे हैं, उसके बाद स्वतंत्र गोरखालैंड राज्य को हासिल करने के लिए बाकी क्या बचा है? तब क्या बुद्धदेव सरकार ने व्यवहार में अलग गोरखालैंड की मांग को स्वीकार कर लिया है ?तथ्य यह है कि आज पूरे दार्जिलिंग में बुद्धदेव सरकार के प्रशासन नाम की कोई चीज नहीं है। बुद्धदेव सरकार की प्रशासनिक मशीनरी पहाड़ में क्यों फेल हो गई? देश-विदेश से आए पर्यटकों-छात्र-छात्राओं की सुरक्षा बंगाल पुलिस के बजाय जीएलपी पर क्यों निर्भर है? पुलिस के आईजी तक पहाड़ में क्यों नहीं प्रवेश कर पा रहे हैं? तथ्य यह भी है कि जीजेएम के हड़ताली अलग राज्य की मांग के अलावा आईजी व दो अन्य आईपीएस अधिकारियों को हटाने की मांग भी कर रहे हैं। सुभाष घीसिंग ने जब अलग गोरखालैंड की मांग को लेकर आंदोलन शुरू किया था तो राज्य प्रशासन मुखर था और तब राज्य प्रशासन ने पहाड़ के जन-जीवन को सामान्य बनाए रखने के लिए कई कदम उठाए थे। लेकिन आज क्या इस तरह के आंदोलनकारियों के आगे समर्पण कर देना ही बुद्धदेव सरकार की नीति है? कहना न होगा कि यह कापुरुष सरकार की निशानी है और उसकी अयोग्यता का प्रमाण भी।&lt;br /&gt;दार्जिलिंग में तो बंगाल पुलिस कानून-व्यवस्था की अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी निभाने के लिए भी सक्रिय नहीं होती जबकि जहां जरूरत नहीं होती, वहां अति सक्रिय हो उठती है। पुलिस विभाग चूंकि मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य के पास है, इसलिए पुलिस की किसी भूमिका की जिम्मेदारी से वे बच नहीं सकते। नंदीग्राम में बंगाल पुलिस ने नाहक अति सक्रिय होकर ही गोली चलाई थी और दोषी पुलिसवालों पर आज तक कोई कार्रवाई बुद्धदेव ने नहीं की। अदालत के आदेश के बावजूद आज तक नंदीग्राम गोलीकांड के हताहतों व क्षतिग्रस्त लोगों को मुआवजा नहीं दिया गया। नंदीग्राम से सटे खेजुरी में माकपा नेताओं के यहां से बरामद हथियारों के जखीरे के बारे में पुलिस मंत्री के नाते बुद्धदेव ने यह पता लगाने का जहमत नहीं उठाया कि उतने हथियार आए कहां से? जिनके यहां से हथियार बरामद हुए, इन पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई? लालगढ़ में बंगाल पुलिस ने रात में तलाशी के नाम पर आदिवासी महिलाओं के साथ जो ज्यादती की, उसकी जिम्मेदारी मंत्री के नाते लेने से बुद्धदेव इंकार कर सकते हैं? कहना न होगा कि बुद्धदेव की इन्हीं प्रशासनिक विफलताओं के कारण आज दार्जिलिंग मुक्तांचल बना हुआ है। इसके बाद अब दुआर्स की बारी है। दार्जिलिंग की तर्ज पर उत्तर बंगाल में ग्रेटर कूचबिहार व अलग कामतापुर आंदोलन की मांग कब जोर पकड़ लेगी, नहीं कहा जा सकता। &lt;em&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;लोकमत से साभार&lt;/span&gt;&lt;/em&gt; &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3857696409871553743-641126115413191801?l=dakhalkiduniya.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dakhalkiduniya.blogspot.com/feeds/641126115413191801/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.blogger.com/comment.g?blogID=3857696409871553743&amp;postID=641126115413191801' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3857696409871553743/posts/default/641126115413191801'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3857696409871553743/posts/default/641126115413191801'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dakhalkiduniya.blogspot.com/2009/08/blog-post_05.html' title='गोरखालैंड तो बन चुका है'/><author><name>चन्द्रिका</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08498808385035641834</uri><email>chandrika.media@gmail.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' name='OpenSocialUserId' value='13859221743332310890'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_06z5ZQ7dCYo/Snk0mN_XbuI/AAAAAAAAAts/SH0pb8c8f-A/s72-c/kripa+shankar+chaube.JPG' height='72' width='72'/><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3857696409871553743.post-16700205931795429</id><published>2009-08-03T17:14:00.008+06:00</published><updated>2009-08-03T18:21:56.286+06:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='सलवा-जुडूम'/><title type='text'>यह  सांस्कृतिक  सलवा-जुडूम  है</title><content type='html'>&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_06z5ZQ7dCYo/SnbMClZGD-I/AAAAAAAAAtU/qFNnv7toCtM/s1600-h/salwa+judum+8.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5365700350827696098" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 209px; CURSOR: hand; HEIGHT: 218px" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_06z5ZQ7dCYo/SnbMClZGD-I/AAAAAAAAAtU/qFNnv7toCtM/s320/salwa+judum+8.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;&lt;span class=""&gt; आशुतोष&lt;/span&gt; कुमार&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;span class=""&gt;अशोक&lt;/span&gt; वाजपेयी ने लिखा है ('कभी-कभार' 19 जुलाई, 2009, 'जनसत्ता') कि कुछ लेखकों ने 'प्रमोद वर्मा स्मृति सम्मान समारोह' का बहिष्कार इसलिए किया कि छत्तीसगढ़ सरकार नक्सलियों का 'जनसंहार' कर रही है। &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;em&gt;&lt;strong&gt;यह एक झूठ है. सीधा-सादा सिद्ध झूठ।&lt;/strong&gt;&lt;/em&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;बहिष्कार करनेवालों में एक थे पंकज चतुर्वेदी. विश्वरंजन के नाम उनका खुला पत्र 'अनुनाद' ब्लॉग पर समारोह के पहले ही प्रकाशित हो चुका था. सुना है, उसकी मुद्रित प्रतियाँ वहाँ बाँटी भी गयी थीं. उसमें कहा गया है कि समारोह के आयोजक विश्वरंजन ने मंगलेश डबराल द्वारा संपादित पत्रिका 'पब्लिक एजेंडा' के तभी प्रकाशित अंक में 'सलवा जुडूम' का खुलकर समर्थन किया है. 'सलवा-जुडूम' के आलोचकों को नक्सलियों का सहयोगी बताकर उनके खिलाफ़ हर तरह की लड़ाई लड़ने का संकल्प दोहराया है. विश्वरंजन छत्तीसगढ़ के डीजीपी और एक कवि भी हैं. 'सलवा-जुडूम' के क्रियान्वयन में उनकी नेतृत्वकारी भूमिका स्वाभाविक है. ख़ास बात यह है कि वे इसके सिद्धांतकार भी हैं. वे इसके पक्ष में पत्र-पत्रिकाओं में विस्तार से लिखते रहे हैं. लम्बे-लम्बे साक्षात्कार देते रहे हैं. 'दैनिक छत्तीसगढ़' में उनका एक साक्षात्कार सात खंडों में प्रकाशित हुआ था. वे महज़ पुलिस-अफ़सर नहीं, पुलिस-चिन्तक हैं.&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;क्या 'सलवा-जुडूम' की आलोचना करना नक्सली होना या उनकी हिमायत करना है ?&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt; &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;अप्रैल, 2008 में 'सलवा-जुडूम ' के सन्दर्भ में छत्तीसगढ़ की सरकार से सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था: 'यह सीधे-सीधे कानून-व्यवस्था का सवाल है। आप किसी भी नागरिक को हथियार थमाकर यह नहीं कह सकते कि जाओ, हत्याएँ करो! आप 'भारतीय दंड संहिता' की धारा 302 के तहत अपराध के उत्प्रेरक ठहराये जायेंगे.' विश्वरंजन के मुताबिक़ 'सलवा-जुडूम' के आलोचक वे नक्सली हैं, जिन्होंने तमाम मानवाधिकार संगठनों, गैर-सरकारी संगठनों और जनतांत्रिक आन्दोलनों में घुसपैठ कर ली है. या नक्सली नहीं भी हैं, तो उन्हें 'लोजिस्टिक सपोर्ट' देनेवाले हैं. संगी-साथी हैं. जैसे बिनायक सेन. क्या सर्वोच्च न्यायालय में भी नक्सलियों ने घुसपैठ कर ली है? तो उसके खिलाफ़ विश्वरंजन कौन-सी लड़ाई छेड़नेवाले हैं? दिसम्बर, 2008 में सर्वोच्च न्यायालय के सामने छत्तीसगढ़ सरकार ने क़बूल किया कि 'ख़ास पुलिस अफ़सरों' (एसपीओज़) ने आदिवासियों के घरों में आग लगाई है, लूटपाट भी की है. कुछ के खिलाफ़ दंडात्मक कार्रवाई भी हुई है.' लेकिन असली सवाल यह है कि क्या किसी संवैधानिक लोकतांत्रिक राज्य को 'सलवा-जुडूम 'जैसा अभियान चलाने का हक़ दिया जा सकता है? सर्वोच्च न्यायालय की राय है कि नहीं. हमारी-आपकी?&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;'तहलका' (अँग्रेज़ी) के ताज़ा अंक में उन आदिवासी युवतियों के विस्तृत बयान छपे हैं, जिनके साथ 'ख़ास पुलिस अफसरों'(एसपीओज़) ने आम पुलिस की मदद से नृशंस बलात्कार किये हैं. वे महिलाएँ 'सलवा-जुडूम' के कैम्पों में ही थीं, किसी 'नक्सली' गाँव में नहीं! छत्तीसगढ़ पुलिस तो उनकी मदद क्या करेगी, 'राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग' की जाँच टीम ने भी अपनी रिपोर्ट में लिख दिया कि ये झूठे आरोप हैं. यहाँ दिलचस्प बात यह है कि उस 'जाँच टीम' के सभी सदस्य पुलिस अधिकारियों में-से चुने गये थे. 'सलवा-जुडूम' क्या है?&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;a href="http://countercurrents.org/" target="_blank"&gt;countercurrents.org&lt;/a&gt; पर "विश्वरंजन के नाम एक आम नागरिक का खुला ख़त" प्रकाशित है. लेखक हैं-----अनूप साहा. इस ख़त से 'सलवा-जुडूम' को समझना आसान हो जाता है.&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;'स्ट्रेटेजिक हैमलेटिंग' (इसकी हिन्दी सुझायें, अशोक जी!) का प्रयोग अमेरिकी सेना ने विएतनाम में किया था। इसकी तीन ख़ास बातें हैं. आबादियों की ऐसी घेराबंदी की जाये कि उन्हें जीवन-निर्वाह के सभी साधनों के लिए घेरा डालनेवाली फ़ौज पर निर्भर हो जाना पड़े. अगर यह मुमकिन न हो, तो उन्हें गाँवों से हटाकर विशेष कैम्पों में स्थानांतरित कर दिया जाये. इन कैम्पों की निगरानी करने और उनमें रहनेवालों को नियंत्रित करने के लिए उन्हीं में-से 'सहयोगी' तत्त्वों को चुनकर उन्हें हरबा-हथियार, रुपये-पैसे के साथ फ़ौजी ट्रेनिंग मुहैया करायी जाये. दुश्मनों के साथ लड़ाई में उन्हें अग्रिम दस्ते की तरह इस्तेमाल किया जाये. बदले में उन्हें मनमानी करने की छूट दी जाये. इसके दो अहम फ़ायदे हैं. एक, इन 'ख़ास पुलिस अधिकारियों'(एसपीओज़) से वह सब कुछ कराया जा सकता है, जिसे करने में संविधान के तहत काम करनेवाली पुलिस हिचकती है. दूसरे, इसे स्थानीय आबादियों की आपसी लड़ाई के रूप में दिखाया जा सकता है, जिससे सरकार का दमनकारी चेहरा दिखायी न पड़े. 'सलवा-जुडूम' के विषय में किये गये सभी स्वतन्त्र अध्ययनों में उसकी ये तमाम विशेषताएँ उजागर होती हैं. स्थानीय लोगों को आतंकित और अपमानित करने की सबसे आसान तरकीब है-----महिलाओं का अपमान और उत्पीड़न. सीएवीओडब्ल्यू (C.A.V.O.W. ) ने 'सलवा-जुडूम' से सम्बन्धित अपनी 2007 की एक रपट में इसका ब्योरा दिया है. 'फ़ोरम फॉर फैक्ट फाइंडिंग डॉक्युमेंटेशन एंड एडवोकेसी' ने अपने अध्ययन में पाया है कि केवल दंतेवाड़ा के दक्षिणी ज़िले में 'सलवा-जुडूम' ने बारह हज़ार नाबालिग़ बच्चों का इस्तेमाल किया है. 'एशियन सेंटर फॉर ह्यूमन राइट्स' की रपट भी इसकी पुष्टि करती है. 'विकीपीडिया' पर यह सारी जानकारी सुलभ है. 'सलवा-जुडूम' के चलते दहशत में जीनेवाले आदिवासियों की आबादी कम-से-कम डेढ़ लाख है.&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;छत्तीसगढ़ के जंगल और ज़मीन क़ीमती हैं। वहाँ अपार खनिज संपदा है. उन पर बलशाली कम्पनियों की नज़र है. छत्तीसगढ़ सरकार ने सन 2000 से अब तक तिरेपन समझदारी पत्रों (एमओयू ) पर दस्तख़त किये हैं. 23,774 एकड़ भूमि के अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है. बिड़ला ग्रुप, टाटा ग्रुप, गुजरात अम्बुजा सीमेंट, एसीस, लाफार्ज, एस्सार, बाल्को, वेदान्त-----अनगिनत कंपनियाँ हैं, जिन्हें वहाँ लाखों एकड़ मुक्त ज़मीन चाहिए. आदिवासी इन्हीं ज़मीनों को बचाने के लिए लड़ते हैं. उनके खिलाफ़ सरकारी मशीनरी साम-दाम-दंड-भेद की पूरी ताक़त से टूट पड़ती है. अब वे क्या करें कि ऐसे में उनके साथ खड़े होने के लिए केवल नक्सली पहुँचते हैं. राज्य की विराट हिंसा के सामने आत्म-रक्षा के लिए हिंसा का सहारा लेना पड़े, इसे गाँधीजी तक ने अनुचित नहीं ठहराया है. लेकिन उत्तेजक, अराजक और आक्रामक हिंसात्मक कार्रवाइयां जन-आन्दोलनों को व्यापक जनता से अलगाव में डालती हैं. न सुधारी जा सकने लायक़ ग़लतियों, विकृतियों और बन्धुघाती हिंसा की संभावना बढ़ जाती है. इससे संघर्ष की असली ज़मीन छूट जाती है. दमन और उत्पीड़न आसान हो जाता है. आम आबादी की दो पाटों के बीच पिस जाने की-सी हालत हो जाती है. नक्सलियों की ओर से की गयी अराजक हिंसा निन्दनीय है. लेकिन राज्य द्वारा की जा रही हिंसा अलग है. लोकतंत्र में राज्य की मशीनरी आम आदमी के खून-पसीने से चलती है. 'सलवा-जुडूम' के बलात्कारी 'ख़ास पुलिस अफ़सरों' (सपीओज़) को पालने-पोसने में जो धन ख़र्च हो रहा है, उसमें मेरे-आपके खून-पसीने की कमाई शामिल है. इसमें हमारी-आपकी सीधी ज़िम्मेदारी बनती है. ऐसा नक्सलियों द्वारा की जा रही हिंसा के साथ नहीं है .&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;सरकार भी नक्सलियों का नहीं, आदिवासियों का जनसंहार कर रही है। अशोक जी के अवचेतन में भी कहीं यही बात रही होगी, इसीलिए वे नक्सलियों का 'जनसंहार ' लिख गये। नहीं तो सभी जानते हैं कि इतनी जनसंख्या उनकी नहीं है कि 'जनसंहार' जैसे शब्द का प्रयोग संगत जान पड़े। इस प्रसंग में मूल प्रश्न यह है कि क्या विश्वरंजन जैसे 'सलवा-जुडूम' के सिद्धांतकार केवल शौक़-शौक़ में सांस्कृतिक समारोहों का आयोजन कर रहे हैं? 'दैनिक छत्तीसगढ़ 'में छपे उनके एक लम्बे लेख में बड़ी मशक्कत से जनता को यह समझाने की कोशिश की गयी है कि नक्सली एक रणनीति के तहत छात्रों, बुद्धिजीवियों और संस्कृतिकर्मियों के बीच घुसपैठ बनाने की कोशिश कर रहे हैं। नक्सलियों की इस रणनीति से निपटना विश्वरंजन को सबसे बड़ी चुनौती जान पड़ती है. सुना है कि वे फ़िराक़ के नाती हैं. ख़ुद कवि हैं. निराला को पढ़ा ही होगा. "आराधन का दृढ़ आराधन से दो उत्तर. " घुसपैठ का दृढ़ घुसपैठ से दो उत्तर! अब जब हिन्दी के बड़े कवि-लेखक उनके समारोहों में उनकी जय-जयकार करेंगे, सम्मानित होंगे, विरोधियों को नक्सली बताकर लांछित करने में उनके सुर-में-सुर मिलायेंगे, तो उन्हें अपनी रणनीति की कामयाबी पर गर्व क्यों न होगा! &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;यह 'सांस्कृतिक सलवा-जुडूम' है. 'स्ट्रैटेजिक हैमलेटिंग'. विरोधियों को अलग-थलग करो. उनकी सप्लाई-लाइन काट दो. सहयोगियों की घेराबंदी सम्मानों और सुविधाओं से करो. जनता से अलगाव में डालो. गोरखपुर के योगी को भी सम्मानित करने के लिए उदय प्रकाश ही क्यों मिले? उन्हें हिन्दी के तरुण विजयों की याद क्यों न आयी? यह भूल-चूक-लेनी-देनी है ? या "सांस्कृतिक स्ट्रैटेजिक हैमलेटिंग"? &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;em&gt;('जनसत्ता', दिल्ली, 2 अगस्त, 2009 से साभार)&lt;/em&gt; &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3857696409871553743-16700205931795429?l=dakhalkiduniya.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dakhalkiduniya.blogspot.com/feeds/16700205931795429/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.blogger.com/comment.g?blogID=3857696409871553743&amp;postID=16700205931795429' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3857696409871553743/posts/default/16700205931795429'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3857696409871553743/posts/default/16700205931795429'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dakhalkiduniya.blogspot.com/2009/08/blog-post_03.html' title='यह  सांस्कृतिक  सलवा-जुडूम  है'/><author><name>चन्द्रिका</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08498808385035641834</uri><email>chandrika.media@gmail.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' name='OpenSocialUserId' value='13859221743332310890'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_06z5ZQ7dCYo/SnbMClZGD-I/AAAAAAAAAtU/qFNnv7toCtM/s72-c/salwa+judum+8.jpg' height='72' width='72'/><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3857696409871553743.post-2708387257193215338</id><published>2009-08-02T21:05:00.002+06:00</published><updated>2009-08-02T21:14:47.326+06:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='विकल्पहीन नहीं है दुनियाँ-'/><title type='text'>हरियाणा: दलित उत्पीड़न का क्रूर चेहरा॥</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;सदी के चेहरे पर क्रूर प्रताड़ना का लेप इतना गहरा है और उसके रंग इतने ज्यादा कि प्रिज़्म के रंगों में उन्हें व्याख्यायित नहीं किया जा सकता. क्रूरता और अपमान ने कभी अपने चेहरे को एक आकार में नहीं ढाला. वह जब भी बुना गया उसके रूप बदले हुए दिखे. शब्दों के प्रतिरोध के मायने इतने कम होते गये कि बडे निहितार्थों वाले शब्दों को दीमक की जुबान चाट गयी. एक पूरा का पूरा तंत्र समानता, समता का ढोंग करता रहा और उत्पीड़न पूर्ववत जारी रहे. समानता और समता को तंत्र के मूल में रखकर एक मोटी पोथी तैयार हुई जो आज थोथी दिख रही है.&lt;br /&gt;पूरे देश में दलित उत्पीड़न की अनगिनत घटनायें घटती हैं पर कितनी कम घटनायें हैं जिनकी ख़्बर हम तक पहुंच पाती है. पिछले कुछ वर्षों में हरियाना राज्य में दलितों पर हुए अत्याचारों को देखें तो पता चलता है कि मानवाधिकारों का कितने बेखौफ तरीके से मज़ाक उडाया गया है. राज्य में २० प्रतिशत जनसंख्या दलितों की है. पूरी राज्य मशीनरी पर अधिकांशतः सवर्णों का कब्जा है.यह कब्जेदारी महज़ नौकरियों और पदों तक ही सीमित नहीं रहते बल्कि देखा जाय तो एक सांस्कृतिक संरचना का व्यक्ति जब सत्ता के किसी मशीनरी में में आता है तो वह अपने पारंपरिक रीतियों के साथ संस्थान में जीता है.&lt;br /&gt;धर्म निरपेक्षता का ढोंग भले ही किया जाय पर देश की कोई ऎसी सरकारी ऑफिस नहीं है जो हिन्दू प्रतीकों, मूर्तियों कलेंडरों व देवी देवताओं से मुक्त हो. क्या देश की कानून व्यवस्था व संविधान की देख रेख करने वाली न्यायालयों की निगाह कभी इस बात पर गयी कि एक सार्वजनिक संस्थान में, धार्मिक कर्मकान्डों को बद किया जाना चाहिये व प्रतीकों को हटाया जाना चाहिये. इस रूप में पूरी मशीनरी यहाँ तक कि न्यायालय भी हिन्दूवादी मानसिकता से ग्रसित होकर काम कर रहे हैं. हिन्दू मानसिकता अपने मूल से जातीय वर्चस्व व विभेदीकरण के आधार पर काम करती रही है. हरियाणा राज्य में घट रही घटनायें इसका प्रत्यक्ष उदाहरण हैं कि सत्ता मशीनरी व वर्चस्वशाली वर्ग किस तरह से एक होकर दलितों पर अत्याचार कर रहे हैं.&lt;br /&gt;पिछले कुछ वर्षों में देखा जाय तो जमीदारों ने दलितों का खेतों में प्रवेश बंद कर दिया. झूठे मामले के तहत उन्हें जेलों में डाला जा रहा है. पानीपत के जुलना गाँव में गुर्जरों व जाटों द्वारा दलितों की पिटायी की गयी, कजरकरा गाँव में दलित महिला के साथ सामूहिक बलात्कार जैसे कितने मामले हैं जो घट रहे हैं. आखिर यह प्रवृत्ति दिनों-दिन बढ़ना वहाँ की सत्ता के मदद के बगैर कैसे संभव है. जबकि इस पर कोई अंकुश नहीं लग पा रहा है.&lt;br /&gt;झज्जर में २००२ में जब पाँच दलितों को पीट-पीट कर पुलिस चौकी के सामने ही जला दिया गया तो क्या यह वहाँ की पुलिस की मदद के बगैर संभव था. सरकारी संस्थाओं के ढांचे में जब किसी सवर्ण को लाया जाता है तो उसकी मानसिकता में बदलाव के लिये सांस्कृतिक स्तर पर प्रयास नहीं किया जाता. वे अपने सवर्णवादी समाज के ढांचे से आते हैं और ऊंच-नीच की भावना के साथ तंत्र में कार्य करते हैं. दलितों को जब जलाया गया तो राज्य एजेंसियों ने उसे यह कहते हुए सही ठहराया कि दलितों ने बहुसंख्यक की भावना को ठेस पहुंचाया है. जबकि मामला यह था कि दलितों ने मरी हुई गाय की खाल निकाली थी.&lt;br /&gt;१० फरवरी २००३ को कैथल जिले में उच्च जाति के लोगों ने २७५ दलित परिवारों को गाँव से पीट-पीटकर इसलिये बाहर खदेड़ दिया क्योंकि ये दलित ११ फरवरी को गुरू रविदास की जयंती मनाना चाह रहे थे. सवर्ण इस जयंती मनाये जाने के खिलाफ थे. कुछ दिनों बाद जब वे लौटकर आये तो फिर से सवर्णों द्वारा जुलूस निकाल तांडव किया गया और दलितों को दुबारा गाँव छोड़ना पडा. कई महीने तक उन्हें बेघर होकर कैंपों में दिन गुजारने पडे. इसके बावजूद आरोपियों को गिरफ्तारी के बाद जल्द ही छोड़ दिया गया. इतने बडे जुल्म का यदि यही अंजाम हो तो जाहिराना तौर पर सवर्णों के हौसले बुलंद ही होंगे.&lt;br /&gt;राज्य में दलित बडे पैमाने पर बंधुआ मजदूर बनने के लिये आज भी मजबूर हैं जबकि बंधुआ मजदूरी पर प्रतिबंध लगाया जा चुका है. पर राज्य में यह सब बेमानी हो चुका है. कुछ वर्ष पहले ही एक बाल्मीक मजदूर को हुकुम सिंह नामक जमीदार ने ट्रैक्टर से कुचलकर इसलिये मार डाला क्योंकि वह बंधुआ मजदूरी की खिलाफत कर रहा था.&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;&lt;em&gt;अब इस दमन चक्र को नया रूप देने का प्रयास किया जा रहा है जिसे कानूनी तौर पर जायज ठहराया जा सके. बीते दिनों २५ दलितों को माओवादी बताकर गिरफ्तार किया गया जिनमें तीन महिलायें भी शामिल हैं. इन्हें जेल में डाल दिया गया. आरोपी के रूप में करनाल जेल में बंद मुकेश कुमार नामक व्यक्ति के साथ जेल में जो बर्ताव किया गया वह अमानवीय है. मुकेश को जब जज अश्वनी मेहता के कोर्ट में लाया गया तो वह फफक पडा उसने अपने वकील के हवाले से एक पत्र लिखा जिसमे उसने बताया है कि दलित होने के कारण जेल प्रशासन के दो व्यक्तियों “ जोगिंदर सिंह, व “डांगी, द्वारा २२ जुलाई को पीटा गया, उससे शौचालय धुलवाये गये वदलित सूचक गालियाँ दी गयी. जब उसने इसका प्रतिरिध किया तो उसका सिर मुड़वा दिया गया और मूंछें काट दी गयी. प्रशासन द्वारा उसे इनकाउंटर में मारने की धमकी भी दी गयी. पर अभी तक न तो राष्ट्रीय मानवाधिकार और न ही दलित रक्षा करने वाली किसी संस्था ने इसकी खबर लेने का प्रयास किया.&lt;br /&gt;राज्य में एक तरफ सामाजिक ढांचे से बहिस्कृत व प्रताडित किये जाने के बाद जब सत्ता तंत्र भी इस भेद-भाव को प्रश्रय देने लगे तो आखिर उनके सामने रास्ता क्या बचता है. इसकी क्या वज़ह है कि देश में आदिवासी और दलित ही माओवाद के नाम पर पकडे जा रहे हैं. प्रतिरोध की ताकत आज आदिवासियों और दलितों के बीच ही बची है क्योंकि वे झारखंड में आदिवासियों के नेतृत्व का शासन, उत्तर प्रदेश में मायावती का शासन भी देख चुके हैं. अब वे इस असमान ढांचे को तोड़, नया ढांचा बनाने के पक्ष में हैं.&lt;/em&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3857696409871553743-2708387257193215338?l=dakhalkiduniya.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dakhalkiduniya.blogspot.com/feeds/2708387257193215338/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.blogger.com/comment.g?blogID=3857696409871553743&amp;postID=2708387257193215338' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3857696409871553743/posts/default/2708387257193215338'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3857696409871553743/posts/default/2708387257193215338'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dakhalkiduniya.blogspot.com/2009/08/blog-post.html' title='हरियाणा: दलित उत्पीड़न का क्रूर चेहरा॥'/><author><name>चन्द्रिका</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08498808385035641834</uri><email>chandrika.media@gmail.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' name='OpenSocialUserId' value='13859221743332310890'/></author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3857696409871553743.post-4348826982202126749</id><published>2009-07-31T19:03:00.010+06:00</published><updated>2009-07-31T19:43:11.820+06:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='लड़ते हैं मगर हाँथ में तलवार भी नहीं'/><title type='text'>क्या ये साहित्यकार इतने नासमझ हैं</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;a href="http://www.blogger.com/profile/16463722461399982407"&gt;&lt;strong&gt;अभिषेक मिश्रा&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;अनिल जी, &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;आप का कहने का निहितार्थ क्या है. यह समझ में नहीं आया. एक तरफ आप उदय प्रकाश का विरोध करने का समर्थन करते हैं. साथ ही यह कहकर -- "कहीं ऐसा तो नहीं कि उदय प्रकाश पर इस बहाने जो बहस हुई, वह एक लेखक की लोकप्रियता को उठाने गिराने के एजेंडे से संचालित रही हो?" आप इस मामले में उदय प्रकाश के स्टैंड कि उनके साथ साजिश कि जा रही है. का समर्थन कर रहें हैं. यदि लेखकों ने छत्तीसगढ़ में हुए कार्यक्रम का विरोध नहीं किया तो क्या इसका आशय यह है कि उन्होंने एक फासीवादी गुंडे से उदय के सम्मानित होने का विरोध कर ठीक नहीं किया.और आपके 'इस बहाने' का क्या मतलब है? क्या आपको यह सिर्फ बहाना लगता है.दूसरी बात आप उदय प्रकाश कि माफ़ी से लगता है पूरी तरह सहमत है. ऐसा क्यों है?आपका कहना है -- "उनकी रचनाएं हमारे समय के शुभ्र, उज्ज्वला और ’वैधानिकता’ की खोल में छिपे अपराधियों की ख़ौफ़नाक कार्रवाइयों का कच्चा चिट्ठा भर ही नहीं है, बल्कि वे ऐसे तत्त्वों के ख़िलाफ़ साहसी प्रतिरोध का भी आह्वान करती हैं।"यदि ऐसा है तो खौपनाक सच्चाईओं के प्रति सचेत इस लेखक को यह पता नहीं था कि योगी आदित्यनाथ कौन है. क्या उदय कि इस बात पर विशवास किया जा सकता है कि वे "राजनीतिक निहितार्थों के बारे में वे इतने सजग और सावधान नहीं थे।"और ध्यान से देखा जाये तो उन्होंने यह भी नहीं कहा है.उन्होंने व्यावहारिक राजनीतिक निहितार्थों की बात की हैमतलब उनके लिए अब भी यह "व्यावहारिक राजनीति" का सवाल है.&lt;br /&gt;दूसरी बात, आपने लिखा है -- "उनकी रचनाएं हमारे समय के शुभ्र, उज्ज्वला और ’वैधानिकता’ की खोल में छिपे अपराधियों की ख़ौफ़नाक कार्रवाइयों का कच्चा चिट्ठा भर ही नहीं है, बल्कि वे ऐसे तत्त्वों के ख़िलाफ़ साहसी प्रतिरोध का भी आह्वान करती हैं।"यह दावा तो स्वयं उदयप्रकाश भी नहीं करेंगे।आखिर उनकी किस कहानी में ऐसे तत्वों के खिलाफ साहसी प्रतिरोध का आह्वान है. जवाब है किसी में भी नहीं. यहाँ मेरे कहने का मतलब यह नहीं है कि उदय प्रकाश की कहानियों में कुछ भी श्रेष्ठ नहीं है. मेरा विनम्र आग्रह इतना ही है कि मनगढ़ंत तरीके से उनकी कहानियों में साहसी प्रतिरोध दिखा देना कोरा भाववाद है. आप उदय प्रकाश कि कहानियों में दरअसल वह बात डाल देना चाहते है जो आपको लगता है कि किसी अच्छे कहानीकार कि कहानियों में होनी चाहिए. और उदय प्रकाश के प्रति आप इतने मोहासक्त है कि जबरन उनकी कहानियों में साहसी प्रतिरोध घुसेड रहें है.&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;तीसरी बात, यह बात एकदम सही है कि छत्तीसगढ़ के कार्यक्रम में शिरकत के प्रश्न पर चर्चा होनी चाहिए. सत्ता और बुद्धिजीविओं के बीच के सम्बन्ध के बारे में बातचीत होनी चाहिए.कृष्णमोहन जी जो वहां गए थे. यह तर्क दे रहे हैं कि कार्यक्रम में रमण सिंह के आ जाने से ही वह प्रतिक्रियावादी नहीं हो जाता है. शायद सलवा जुडूम जैसे दमन अभियान कि गंभीरता को भूल रहे हैं. वे भूल रहे हैं कि यह अपने ही नागरिकों पर वियतनाम युद्ध की शैली में छेडा गया एक बर्बर युद्ध है. वे भूल रहें हैं कि इस युद्ध का नायक और निर्माता वही 'कवि' विश्वरंजन है. जो उस कार्यक्रम का कर्ता धर्ता था.लेकिन अनिल जी, बहुत से लोग इन कृष्णमोहन जी के प्रति भी मोहासक्त हैं. और इसकी तो वजहें भी है. मुक्तिबोध जैसे कवि के सरोकारों को समझ कर उन्होंने उनके रचना कर्म पर एक अच्छी पुस्तक भी लिखी है. लेकिन क्या मुक्तिबोध के काव्य व्यक्तित्व और उनकी पक्षधरता पर लिख कर ही कोई आलोचक आज जनपक्षधर हो सकता है. मुक्तिबोध जिन षड्यंत्रों कि पड़ताल कर रहे थे -- "किसी जन क्रांति के दमन निमित्त यह मार्शल ला है". क्या मुक्तिबोध इस तरह के कार्यक्रम में संम्मिलित होते ?कहा जाता है कि साहित्य जीवन और समाज की आलोचना है. इस तरह साहित्य की आलोचना तो उस आलोचना की भी आलोचना हुई. जीवन और समाज अपने गहनतम और संश्लिष्टतम रूप में आलोचना में आलोचना में मौजूद होते हैं.लेकिन क्या किया जाय जब हिंदी के उभरते हुए और स्थापित आलोचकों को अपनी जनता के जीवन और अपने समाज में चल रहे युद्धों की बुनियादी जानकारी भी नहीं है. अकेले कृष्णमोहन ही नहीं है. विश्वरंजन को भेजे अपने पात्र में कवि- आलोचक पंकज चतुर्वेदी कहते हैं कि सलवा जुडूम और उसमें विश्वरंजन कि भूमिका का पता उन्हें एक दिन पहले ही 'द पब्लिक एजेंडा' नामक पत्रिका से हुई. हद है!३ साल हो गए हैं सलवा जुडूम को शुरू हुए. २ साल तो बिनायक सेन ने जेल में गुजारे और हिंदी के एक संभावनाशील आलोचक को उसका पता एक दिन पहले चला है।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;strong&gt;विजय गौड़-&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;अनिल जी इस बिना पर कि कोई लेखक बहुत पढा जाता है या कि लेखक ने बहुत जनपक्षधर रचनाएं लिखी हैं तो वह यदि अमानवीय अत्याचारियों के साथ खडा हो तो बहुत ही भोलेपन के साथ उसके पक्ष में हम भी खडे हों,कोई ठीक बात नहीं। और न ही इसे किसी दूसरे सवाल के साथ जोड कर ही कोई बचाव किया जा सकता है। रही बात छतीसगढ वाले मामले की (जिसके बारे में मेरी जानकारी मात्र उन दो-तीन आलेखों तक ही है जो इस ब्लाग में भी पहले प्रकाशित हुए हैं- जिसमें एक पंकज जी का पत्र और दूसरा कृष्णमोहन जी का खत) तो उसमें जो सवाल आपने उठाएं हैं निश्चित ही वे जरूरी सवाल हैं। उन पर बात होनी चाहिए। लेकिन छायी हुई चुप्पी से यह समझ में आता है कि हिन्दी का रचनाजगत किस तरह से आत्ममुग्ध है जो सिर्फ़ पुरस्कार प्रकरण पर तो, वो भी आधे-अधूरे तरह से (आधे-अधूरे : क्योंकि उदय प्रकाश का नाम तो उठा, जो उठना जरूरी था, पर वहीं एक आलोचक परमानन्द श्रीवास्तव के नाम पर चुप्पी है) खूब उत्तेजित होता है, पर सत्ता के चरित्र के सवालों पर वहां वैसी बेचैनी नहीं होती। &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;a href="http://www.blogger.com/profile/03770667837625095504"&gt;&lt;strong&gt;राकेश सिंह&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span class=""&gt;       हम&lt;/span&gt; पढ़े लिखे सेकुलरों का एक ही काम रह गया है और वो है हन्दू विरोध तसलीमा नसरीन को जब धकियाया गया तब हिंदी से सेकुलर रहनुमा कहाँ थे ? कुछ मुस्लिम संगठनों ने गोदरेज को धमकी दी की यदि गोदरेज सलमान रुश्दी को भोज पे आमंत्रित करेंगे तो मुस्लिम समुदाय गोदरेज products का इस्तेमाल बंद कर देंगे हिंदी सेकुलर्स को सहाबुद्दीन, लालू या मुलायम से कोई दिक्कत नहीं है ये लोग सिर्फ अपनी राजनितिक रोटी सकने मैं लगे हैं मेरा ये पोस्ट देखिये शायद कुछ लोगों की आँखें खुले :&lt;br /&gt;&lt;a href="http://raksingh।blogspot.com/2009/07/blog-post_29.html"&gt;http://raksingh।blogspot.com/2009/07/blog-post_29.html&lt;/a&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt; &lt;/div&gt;&lt;a class="transl_class" id="286" href="http://raksingh।blogspot.com/2009/07/blog-post_29.html"&gt;&lt;/a&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3857696409871553743-4348826982202126749?l=dakhalkiduniya.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dakhalkiduniya.blogspot.com/feeds/4348826982202126749/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.blogger.com/comment.g?blogID=3857696409871553743&amp;postID=4348826982202126749' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3857696409871553743/posts/default/4348826982202126749'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3857696409871553743/posts/default/4348826982202126749'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dakhalkiduniya.blogspot.com/2009/07/blog-post_31.html' title='क्या ये साहित्यकार इतने नासमझ हैं'/><author><name>चन्द्रिका</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08498808385035641834</uri><email>chandrika.media@gmail.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' name='OpenSocialUserId' value='13859221743332310890'/></author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3857696409871553743.post-4511679204201641270</id><published>2009-07-30T19:36:00.004+06:00</published><updated>2009-07-30T19:59:15.006+06:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='साहित्य'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='वाद- विवाद'/><title type='text'>उदय प्रकाश और योगी प्रकरण बनाम छत्तीसगढ़ सरकार - अनिल</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;&lt;span class=""&gt;गोरखपुर&lt;/span&gt; के भाजपा सांसद योगी आदित्यनाथ के हाथों हिंदी के सर्वाधिक पढे़ जाने वाले लेखक उदय प्रकाश द्वारा एक ’स्मृति सम्मान’ लेने की ख़बर के साथ ही समूची हिंदी पट्टी के लेखकों, कवियों, आलोचकों और उदय प्रकाश के आत्मीय शुभचिंतकों में गहरी निराशा, क्षोभ, आक्रोश और असहमति की लहर फैल गई। हिंदी भाषा में अभी परिपक्वता की दहलीज की ओर अग्रसर नये-नवेले माध्यम ब्लॉग पर इस पूरी परिघटना के पक्ष-विपक्ष में व्यापक बहस हुई। उदय प्रकाश के अनुसार यह आयोजन नियाहत पारिवारिक था, जिसके राजनीतिक निहितार्थों के बारे में वे इतने सजग और सावधान नहीं थे।&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;&lt;span class=""&gt;बहरहाल&lt;/span&gt;, उदय प्रकाश ने अपने पाठकों, शुभचिंतकों को विचलित और दुखी कर देने की लापरवाही के कारण सार्वजनिक तौर पर माफ़ी मांग ली है। आख़िर उदय हिंदी के सबसे ज़्यादा पढ़े जाने वाले लेखक हैं। उदय प्रकाश की रचनाएं चाहे वह पद्य हो या गद्य, हिंदी जगत में एक ऊर्जावान हलचल के साथ आदर पाती हैं। उनकी रचनाएं हमारे समय के शुभ्र, उज्ज्वला और ’वैधानिकता’ की खोल में छिपे अपराधियों की ख़ौफ़नाक कार्रवाइयों का कच्चा चिट्ठा भर ही नहीं है, बल्कि वे ऐसे तत्त्वों के ख़िलाफ़ साहसी प्रतिरोध का भी आह्वान करती हैं। और उनकी रचनाओं में इस ताक़त को चीन्हकर अभी कुछ दिनों पहले महाराष्‍ट्र के अमरावती जिले में, खैरलांजी में एक दलित परिवार की हत्या के विरोध में हो रहे जनांदोलनों का दमन करने वाली राज सत्ता के ख़िलाफ़ वास्तविक, जुझारू लड़ाई लड़ने वाले दलित संगठनों ने उदय प्रकाश के सम्मान में सर झुकाते हुए उन्हें ’भीम सेना’ का प्रतीकात्मक सेनाध्यक्ष बनाकर रथ में घुमाया था। इसका जीवंत विवरण पाठक ख़ुद उदय प्रकाश के हिंदी ब्लॉग में पढ़ सकते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह कोई कहने की बात नहीं है कि हिंदी भाषा के एक ऐसे जनपक्षधर, लोकप्रिय तथा मूर्धन्य समकालीन लेखक द्वारा बर्बर हिंदुत्व की आतंकी राजनीति करने वाले बाहुबली सांसद के हाथों सम्मान लेना हिंदी जगत के लिए अपमानजनक ही नहीं, बल्कि घोर आपत्तिजनक है। हिंदी के सुधी रचनाकारों से इस मामले में उदय से असहमति ज़ाहिर करना, उनका विरोध करना बहुत स्वाभाविक और जायज़ है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;लेकिन&lt;/span&gt; सवाल कुछ और भी गहरे, जटिल तथा एक-दूसरे से गहरे संबद्ध हैं, जो समूचे हिंदी परिदृश्य के दोहरे मापदंडों और छद्‍म को उजागर करते हैं। जिन दिनों उदय प्रकाश के मामले पर समूचा हिंदी जगत अपना सिर खपा रहा था, उन्हीं दिनों छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में ’प्रमोद वर्मा’ स्मृति न्यास की ओर से पहले प्रमोद वर्मा स्मृति सम्मान के तत्वावधान में दो दिवसीय साहित्यिक आयोजन का प्रबंध था। न्यास के अध्यक्ष छत्तीसगढ़ पुलिस के मुखिया अर्थात डीजीपी विश्‍वरंजन इस कार्यक्रम के प्रमुख आयोजक थे। कार्यक्रम के दौरान छत्तीसगढ में सत्तारूढ़ भाजपा विधायक दल के नेता अर्थात मुख्यमंत्री रमन सिंह सहित कई अन्य मंत्रीगण भी बिना किसी पूर्वघोषणा के पहुंचे। कार्यक्रम में चंद्रकांत देवताले, अशोक वाजपेयी, नंदकिशोर आचार्य जैसे हिंदी के कई ’चर्चित’, ’बड़े’ प्रगतिशील और जनवादी लेखक, कवि और आलोचक उपस्थित थे।&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;आज&lt;/span&gt; दुनिया को यह बताने की कोई ख़ास ज़रूरत नहीं है कि छत्तीसगढ़ सरकार और उसके नुमाइंदों का वास्तविक चरित्र क्या है? देशी शासकों द्वारा देश के जल, जंगल, ज़मीन को बड़ी कार्पोरेट कंपनियों को सौंपे जाने के विरोध में जिन आदिवासी, मज़दूर, दलित या महिला संगठनों ने आवाज़ उठाई, उन पर सरकार के फौज़ी ’विजय अभियान’ का ’वीरता चक्र’ पूरे देश में चल रहा है। छत्तीसगढ़ इस दमन के नंगे रूप का प्रत्यक्ष बयान है, जहां ’सलवा जुडुम’ जैसे बर्बर, हत्यारे अभियान सरकारी एजेंडे में सर्वोपरि हैं, जहां अंग्रेज़ी औपनिवेशिक शासन की तर्ज़ पर आधारित ’विशेष जन (विशिष्ट जन) सुरक्षा अधिनियम’ जैसे अपराधी कानून ’लोकतंत्र’ की दुहाई दे देकर असहमति रखने वाले ’विरोधियों’ को सबक़ सिखाने के लिए हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;इन&lt;/span&gt; सारी स्थितियों का भंडाफोड़ पूरी दुनिया में हो चुका है। इसके कई ठोस उदाहरण गिनाए जा सकते हैं। और इन परिघटनाओं से अब अधिकांश लोग परिचित हैं। बावजूद इसके, सत्ता तथा सरकारों के ऐसे नुमाइंदों के बीच हमारे ’बड़े’, ’चर्चित’ प्रगतिशील तथा जनवादी रचनाकारों ने क्यूं शिरकत की? यह सवाल मन को कचोटता है। कार्यक्रम की एक रपट के अनुसार मुख्यमंत्री रमन सिंह ने साहित्यकारों को विचारधारा से ’मुक्‍त’ होकर रचना करने की सलाह दी। इस बात पर यक़ीन करने का कोई मज़बूत आधार नहीं है कि रमन सिंह के राजनीतिक (कु) कृत्य और साहित्यिक क़द के बारे में वहां मौजूद हमारे प्रिय रचनाकारों को कोई जानकारी नहीं रही होगी। और इस कारण उन्होंने किसी तरह के प्रतिवाद की कोई ज़रूरत महसूस नहीं की होगी। एक अन्य महत्त्वपूर्ण सवाल यह है, कि जिन लोगों ने फ़ासीवादी सांसद के हाथों सम्मान लेने वाले लेखक का प्रतिकार किया, उन लोगों ने छत्तीसगढ़ में सत्तारूढ़ फ़ासीवादी पार्टी के मुखिया के साथ मंच शेयर करने वाले कई हिंदी लेखकों का प्रतिकार क्यों नहीं किया? पूर्वी उत्तर प्रदेश को गुजरात बनाने की धमकी देने वाले योगी आदित्यनाथ और सल्वा जुडुम के कारण कई हज़ार लोगों को मार डालने तथा साठ हज़ार आदिवासियों को जड़ से उखाड़ देने के लिए ज़िम्मेदार रमन सिंह में क्या अंतर है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;एक&lt;/span&gt; ऐसे समय की धार में जब कुछ दिनों पहले ही पश्‍चिम बंगाल के बुद्धिजीवी और रचनाकार लालगढ़ में भारत सरकार द्वारा आदिवासियों के सुनियोजित संहार के ख़िलाफ़ सड़कों पर खुल कर आ रहे थे, पत्र पत्रिकाओं में विरोध के स्वर को तेज़ कर रहे थे, हिंदी के लेखकों और बुद्धिजीवियों के छत्तीसगढ़ में सरकारी साहित्यिक जलसे में शामिल होने के निर्णय पर हिंदी के अन्य रचनाकारों की चुप्पी भविष्‍य के लिए भयावह संकेत हैं। कहीं ऐसा तो नहीं कि उदय प्रकाश पर इस बहाने जो बहस हुई, वह एक लेखक की लोकप्रियता को उठाने गिराने के एजेंडे से संचालित रही हो? जबकि रायपुर के साहित्यिक आयोजन से जो राजनीतिक सवाल उभरे हैं, वे मौजूदा समय में समग्र साहित्यिक-सांस्कृतिक परिदृश्य के दुखते रग को छूते हैं। हिंदी में रचनारत समाज सिर्फ़ उदय की प्रतिबद्धताओं और सरोकार पर बहस करके एक सुविधाजनक संतुष्टि की ओर उन्मुख दिख रहा है। एक मित्र बता रहे थे कि हिंदी की एक साहित्यिक पत्रिका उदय प्रकाश प्रकरण पर विशेषांक निकालने जा रही है। हिंदी रचना संसार को छत्तीसगढ़ जैसे आयोजनों और उसमें शामिल होने वाले लेखकों के बारे में बात करने से, समूचे हिंदी रचनाशील दुनिया के खोखलेपन के उजागर होने का डर तो नहीं है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="color:#6600cc;"&gt;(लेखक महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्यालय, वर्धा में मीडिया के शोध छात्र हैं।)&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3857696409871553743-4511679204201641270?l=dakhalkiduniya.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dakhalkiduniya.blogspot.com/feeds/4511679204201641270/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.blogger.com/comment.g?blogID=3857696409871553743&amp;postID=4511679204201641270' title='6 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3857696409871553743/posts/default/4511679204201641270'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3857696409871553743/posts/default/4511679204201641270'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dakhalkiduniya.blogspot.com/2009/07/blog-post_30.html' title='उदय प्रकाश और योगी प्रकरण बनाम छत्तीसगढ़ सरकार - अनिल'/><author><name>चन्द्रिका</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08498808385035641834</uri><email>chandrika.media@gmail.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' name='OpenSocialUserId' value='13859221743332310890'/></author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3857696409871553743.post-3700613443511626831</id><published>2009-07-28T19:41:00.013+06:00</published><updated>2009-07-29T16:51:51.824+06:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='chhattisgarh'/><title type='text'>जनसंस्कृति मंच की बयानबाज़ी पर टिप्पणी           - कृष्णमोहन (आलोचक)</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;strong&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;strong&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;strong&gt;&lt;span class=""&gt;प्रमोद&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;strong&gt; वर्मा स्मृति सम्मान कार्यक्रम (रायपुर, 10-11 जुलाई, 09) के बारे में जनसंस्कृति मंच की राष्ट्रीय कार्यकारिणी (दिल्ली, 11-12 जुलाई) द्वारा पारित प्रस्ताव तथ्यहीन लफ़्फ़ाजी का नमूना भर है। यह इस बात का उदाहरण है कि कोई सांस्कृतिक संगठन रचनात्मकता से कटकर जब नौकरशाही प्रवृत्तियों के चंगुल में फँस जाता है तो उसका रवैया कैसा गरिमाहीन, अलोकतांत्रिक और ग़ैरज़िम्मेदार हो जाता है। दिनोदिन स्मृतिहीन होते जा रहे हमारे समाज में एक लगभग भुलाए जा चुके लेखक की स्मृति को संरक्षित करने के कार्यक्रम को यह ‘साज़िश’ करार देता है, क्योंकि उसमें मुख्यमंत्री और राज्यपाल ने भी शिरकत की। छत्तीसगढ़ और देश के तमाम संस्कृतिकर्मियों की भागीदारी को भी इसी तर्ज पर यह उनका ‘शर्मनाक पतन’ मानता है। यही नहीं, इस आरोप से बचने का एक ‘पापमोचक’ नुस्खा भी यह सुझाता है कि ये संस्कृतिकर्मी इसे अपनी ‘नादानी’ मान लें। इस उद्यण्ड प्रस्ताव के मुताबिक शिवकुमार मिश्र, कमला प्रसाद, खगेन्द्र ठाकुर, अशोक वाजपेई, प्रभाकर श्रोत्रिय, नन्दकिशोर आचार्य, चन्द्रकांत देवताले, प्रभात त्रिपाठी जैसे तमाम वरिष्ठ लेखक अपने पतन अथवा नादानी के कारण ही उस कार्यक्रम में भाग ले सकते हैं। इसकी कोई जायज वजह उनके पास नहीं हो सकती। वैसे भी, इन बौने तानाशाहों का गुट जिसे नहीं मानता वह कोई वैध वजह कैसे हो सकती है।&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;span class=""&gt;बहरहाल&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;, यह रवैया एक ऐसे संगठन के सर्वथा अनुरूप है, जो खुद तो कहीं जवाबदेह नहीं लेकिन पूरी दुनिया को अपने सामने जवाबदेह मानता है। किसी कार्यक्रम से सैकड़ों मील दूर लगभग उन्हीं तिथियों पर बैठे इसके कर्ता-धर्ता उसके ‘स्वरूप की कल्पना’ कर लेते हैं, जो वैसे भी कुछ मुश्किल नहीं, और फिर उसे अंतिम सत्य की तरह पेश करते हैं। वे यह मानकर चलते हैं कि उस ‘खास समय’ की राजनीतिक ज़रूरत के मुताबिक़ यह कार्यक्रम सरकार की मदद के लिए कर लिया गया होगा। उन्हें इससे क़तई फ़र्क़ नहीं पड़ता कि इस अवसर की तैयारी वर्षों से चल रही थी। ‘प्रमोद वर्मा समग्र’ की लगभग ढाई हजार पृष्ठों की सामग्री के संकलन, संपादन और प्रकाशन के अलावा ‘स्मृति-सम्मान’ के निर्णय की प्रक्रिया, जिससे केदारनाथ सिंह, विजय बहादुर सिंह, धनंजय वर्मा और विश्वनाथ प्रसाद तिवारी जैसे वरिष्ठ लेखक जुड़े हुए थे, से गुज़रकर यह आयोजन संभव हुआ। ‘समग्र’ के संपादक विश्वरंजन को प्रस्ताव में हर जगह ‘पुलिस महानिदेशक’ के रूप में याद करने की वजह भी यही है कि शब्दों की सत्ता से इस संगठन पर हाॅवी गुट का नाता टूट चुका है। इसीलिए गोरख पाण्डेय से लेकर चन्द्रशेखर तक, अपने लेखकों की विरासत को सहेजने की इसके अंदर न तो इच्छा बची है, न दूसरों के श्रम का सम्मान करने की तमीज। &lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;span class=""&gt;जहाँ&lt;/span&gt;&lt;/span&gt; तक पुलिस महानिदेशक होने का सवाल है तो इस पद अथवा अन्य प्रशासनिक पदों से जनसंस्कृति मंच को कभी कोई समस्या नहीं रही। राज्यसत्ता का चरित्र समूचे देश में एक जैसा है और शासन-तंत्र उसकी नीतियों को लागू करने का औजार है। न इससे कम, न इससे ज़्यादा। इसलिए इस मामले में भी, अन्य मामलों की तरह, दुहरे मानदंड नहीं चल सकते। पुलिस महानिदेशक होने से किसी के व्यक्तिगत अथवा लेखकीय अधिकार कम नहीं हो जाते। दूसरों की ही तरह सत्ता से जुड़े लोगों की भी अन्य सामाजिक भूमिकाओं का वस्तुगत मूल्यांकन किए बिना उन भूमिकाओं के बारे में कही गई कोई बात निरर्थक बकवास से अधिक महत्व नहीं रखती।&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;span class=""&gt;इस&lt;/span&gt;&lt;/span&gt; अहंकारग्रस्त प्रस्ताव में कहा गया है कि ‘वहाँ जाकर मुख्यमंत्री रमन सिंह के मुख से विचारधारा से मुक्त रहने का उपदेश और लोकतंत्र की व्याख्या सुनने की ज़िल्लत बर्दाश्त करने से बचा जा सकता था।’ नैतिकता के ऊँचे पायदान पर खड़े इन महानुभावों को अगर रत्ती भर भी ज़िम्मेदारी का एहसास होता तो उन लेखकों के वक्तव्यों का भी पता करते, जिनके प्रतिनिधित्व का वे दम भरते हैं। चन्द्रकांत देवताले, कमला प्रसाद, खगेन्द्र ठाकुर और शिवकुमार मिश्र जैसे वरिष्ठ लेखकों के साथ इन पंक्तियों के लेखक ने भी अपने वक्तव्य में स्पष्ट शब्दों में मुख्यमंत्री की बात का खण्डन करते हुए विचारधाराओं के संघर्ष की ज़रूरत पर ज़ोर दिया था। इस प्रतिवाद को सभा ने कई बार उत्साहपूर्ण समर्थन भी दिया था। जसम के इन अधिकारियों से यही कहना है कि मुख्यमंत्री की बात सुनने में कोई ज़िल्लत नहीं थी, क्योंकि हम उनके विरोधी हैं और उनको जवाब दे सकते हैं। लेकिन आपके श्रीमुख से इन उपदेशों को सुनना सचमुच ज़िल्लत भरा है, क्योंकि आपसे हम किसी न किसी रूप से जुड़े हुए हैं। वसीम बरेलवी की पंक्तियाँ याद आती हैं -&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;तुम्हारे हाथ गरेबाँ तक आ गए बढ़कर&lt;br /&gt;कोई बताए कि ये वार टाल दें कैसे &lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;जो होता पाँव में काँटा निकाल सकते थे &lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;तुम्हारी अक्ल का काँटा निकाल दें कैसे।&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;span class=""&gt;सच&lt;/span&gt; &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;तो यह है कि देश की जनता और राज्यसत्ता में युद्ध छिड़ा हुआ है जो आगे और तीखा होने वाला है। लेखकों और बुद्धिजीवियों की विशिष्ट भूमिका होती है। सार्वजनिक मंचों पर कई बार उन्हें सत्ता के नुमाइंदों की मौजूदगी के बावजूद उपस्थित होना पड़ता है। हम ऐसे मौक़ों पर अपनी जनता के सम्मान की हिफ़ाजत की ज़िम्मेदारी के साथ जाते हैं, और किसी को ये हक़ नहीं देते कि वो हमारी इस भूमिका पर अनर्गल टिप्पणी करे। हाँ, अगर किसी को सचमुच कोई सार्थक राजनीतिक बहस चलानी हो तो वो ऐसा कर सकता है। दूसरों को नसीहत देने वाले अगर अपने गिरेबान में झाँकने को तैयार हों तो उनका स्वागत है। &lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;p&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3857696409871553743-3700613443511626831?l=dakhalkiduniya.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dakhalkiduniya.blogspot.com/feeds/3700613443511626831/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.blogger.com/comment.g?blogID=3857696409871553743&amp;postID=3700613443511626831' title='13 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3857696409871553743/posts/default/3700613443511626831'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3857696409871553743/posts/default/3700613443511626831'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dakhalkiduniya.blogspot.com/2009/07/blog-post_28.html' title='जनसंस्कृति मंच की बयानबाज़ी पर टिप्पणी           - कृष्णमोहन (आलोचक)'/><author><name>चन्द्रिका</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08498808385035641834</uri><email>chandrika.media@gmail.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' name='OpenSocialUserId' value='13859221743332310890'/></author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>13</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3857696409871553743.post-1032073161741478645</id><published>2009-07-26T18:33:00.008+06:00</published><updated>2009-07-26T18:58:42.183+06:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='chhattisgarh'/><title type='text'>आलोचक श्री पंकज चतुर्वेदी को खुला पत्र</title><content type='html'>&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_06z5ZQ7dCYo/SmxRjK9JpzI/AAAAAAAAAqM/qLXc79vGcqU/s1600-h/2018343627_0519edf913_o.jpg"&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3857696409871553743-1032073161741478645?l=dakhalkiduniya.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='related' href='http://jayprakashmanas.blogspot.com/2009/07/blog-post_16.html' title='आलोचक श्री पंकज चतुर्वेदी को खुला पत्र'/><link rel='enclosure' type='text/html' href='http://jayprakashmanas.blogspot.com/2009/07/blog-post_16.html' length='0'/><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dakhalkiduniya.blogspot.com/feeds/1032073161741478645/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.blogger.com/comment.g?blogID=3857696409871553743&amp;postID=1032073161741478645' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3857696409871553743/posts/default/1032073161741478645'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3857696409871553743/posts/default/1032073161741478645'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dakhalkiduniya.blogspot.com/2009/07/blog-post_26.html' title='आलोचक श्री पंकज चतुर्वेदी को खुला पत्र'/><author><name>चन्द्रिका</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08498808385035641834</uri><email>chandrika.media@gmail.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' name='OpenSocialUserId' value='13859221743332310890'/></author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3857696409871553743.post-2844980098239525117</id><published>2009-07-15T09:42:00.003+06:00</published><updated>2009-07-15T10:35:52.406+06:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='chhattisgarh'/><title type='text'>संस्कृतिकर्मियों की शिरकत शर्मनाक:</title><content type='html'>&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_06z5ZQ7dCYo/Sl1a2siGzYI/AAAAAAAAApk/nQ-F4Ic9b-4/s1600-h/pranay.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5358539027354406274" style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; WIDTH: 104px; CURSOR: hand; HEIGHT: 157px" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_06z5ZQ7dCYo/Sl1a2siGzYI/AAAAAAAAApk/nQ-F4Ic9b-4/s400/pranay.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;प्रणय कृष्ण, महासचिव, जन संस्कृति मंच&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;११-१२ जुलाई को नई दिल्ली मे सम्पन्न हुई जन संस्कृति मंच की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में जनांदोलनों और मानवाधिकारों पर क्रूर दमन ढानेवाली छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा १० व ११ जुलाई को प्रायोजित 'प्रमोद वर्मा स्मृति सम्मान" कार्यक्रम में बहुतेरे वाम, प्रगतिशील और जनवादी लेखकों, संस्कृतिकर्मियों की शिरकत को शर्मनाक बताते हुए खेद व्यक्त किया गया। स्व. प्रमोद वर्मा की स्मृति को जीवित रखने के लिए किए जाने वाले किसी भी आयोजन या पुरस्कार से शायद ही किसी कि ऎतराज़ हो, लेकिन जिस तरह छ्त्तीसगढ के पुलिस महानिदेशक के नेतृत्व में इस कार्यक्रम को प्रायोजित किया गया, जिस तरह छत्तीसगढ़ की भाजपा सरकार के मुख्यमंत्री रमन सिंह ने इसला उदघाटन किया, शिक्षा और संस्कृतिमंत्री बृजमॊहन अग्रवाल भी अतिथि रहे और राज्यपाल के हाथों पुरस्कार बंटवाया गया, वह साफ़ बतलाता है कि यह कार्यक्रम एक साज़िशाना तरीके से एक खास समय में वाम, प्रगतिशील और लोकतांत्रिक संस्कृतिकर्मियों के अपने पक्ष में इस्तेमाल के लिए आयोजित था। यह संभव है कि इस कार्यक्रम में शरीक कई लोग ऎसे भी हों जिन्हें इस कार्यक्रम के स्वरूप के बारे में ठीक जानकारी न रही हो। लेकिन जिस राज्य में तमाम लोकतांत्रिक आंदोलन, मानवाधिकार संगठन, बिनायक सेन जैसे मानवाधिकारवादी चिकित्सक, अजय टी.जी. जैसे फ़िल्मकार, हिमांशु जैसे गांधीवादी को माओवादी बताकर राज्य दमन का शिकार बनाया जाता हो, जहां 'सलवा जुडुम' जैसी सरकार प्रायोजित हथियारबंद सेनाएं आदिवासियों की हत्या, लूट, बलात्कार के लिए कुख्यात हों और ३ लाख से ज़्यादा आदिवासियों को उनके घर-गांव से खदेड़ चुकी हों, जहां 'छ्त्तीसगढ़ पब्लिक सिक्योरिट ऎक्ट' जैसे काले कानून मीडिया से लेकर तमाम लोकतांत्रिक आंदोलनों का गला घोंटने के काम आते हों, वहां के पुलिस महानिदेशक विश्वरंजन (जिनके नेतृत्व में यह दमन अभियान चल रहा हो), के द्वारा प्रायोजित कार्यक्रम के स्वरूप की कल्पना मुश्किल नहीं थी। वहां जाकर मुख्यमंत्री रमन सिंह के मुख से विचारधारा से मुक्त रहने का उपदेश और लोकतंत्र की व्याख्या सुनने की ज़िल्लत बर्दाश्त करने से बचा जा सकता था। बहरहाल, यह घटना वामपंथी, प्रगतिशील, जनवादी सांस्कृतिक आंदोलन के लिए चिंताजनक और शर्मसार होने वाली घटना ज़रूर है। हम यह उम्मीद ज़रूर करते हैं कि जो साथी वहां नाजानकारी या नादानी में शरीक हुए, वे सत्ता द्वारा धोखे से अपना उपयोग किए जाने की सार्वजनिक निंदा करेंगे और जो जानबूझकर शरीक हुए थे, वे आत्मालोचन कर खुद को पतित होने से भविष्य में बचाने की कोशिश करेंगे और किसी भी जनविरोधी, फ़ासिस्ट सत्ता को वैधता प्रदान करने का औजार नहीं बनेंगे। हम सब जानते हैं कि भारत की ८०% खनिज संपदा और ७०% जंगल आदिवासी इलाकों में हैं। छत्तीसगढ एक ऎसा राज्य है जहां की ३२% आबादी आदिवासी है। लोहा, स्टील,अल्युमिनियम और अन्य धातुऒं, कोयला, हीरा और दूसरे खनिजों के अंधाधुंध दोहन के लिए; टेक्नालाजी पार्क, बड़ी बड़ी सम्पन्न टाउनशिप और गोल्फ़ कोर्स बनाने के लिए तमाम देशी विदेशी कारपोरेट घरानों ने छ्त्तीसगढ़ के आदिवासी इलाकों पर जैसे हमला ही बोल दिया है। उनकी ज़मीनों और जंगलों की कारपोरेट लूट और पर्यावरण के विनाश पर आधारित इस तथाकथित विकास का फ़ायदा सम्पन्न तबकों को है जबकि उजाड़े जाते आदिवासी और गरीब इस विकास की कीमत अदा कर रहे हैं। वर्ष २००० में स्थापित छ्त्तीसगढ राज्य की सरकारों ने इस प्रदेश के संसाधनों के दोहन के लिए देशी और बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के साथ पचासों समझौतों पर दस्तखत किए हैं। १०००० हेक्टेयर से भी ज़्यादा ज़मीन अधिग्रहण की प्रक्रिया में है। आदिवासी अपनी ज़मीन, आजीविका और जंगल बचाने का संघर्ष चलाते रहे हैं। लेकिन वर्षों से उनके तमाम लोकतांत्रिक आंदोलनों का गला घोटा जाता रहा है। कारपोरेट घरानों के मुनाफ़े की हिफ़ाज़त में केंद्र की राजग और संप्रग सरकारों ने, छ्त्तीसगढ़ में गृहयुद्ध जैसी स्थिति पैदा कर दी है। कांग्रेस और भाजपा ने मिलकर सलवा जुडुम का फ़ासिस्ट प्रयोग चला रखा है। आज देशभर में हर व्यवस्था विरोधी आंदोलन या उस पर असुविधाजनक सवाल उठाने वाले व्यक्तियों को माओवादी करार देकर दमन करना सत्ताधारियों का शगल बन चुका है। दमनकारी कानूनों और देश भर के अधिकाधिक इलाकों को सुरक्षाबलों और अत्याधुनिक हथियारों के बल पर शासित रखने की बढ़ती प्रवृत्ति से माओवादियों पर कितना असर पड़ता है, कहना मुश्किल है, लेकिन इस बहाने तमाम मेहनतकश तबकों, अकलियतों, किसानों, आदिवासियों, मज़दूरॊं और संस्कृतिकर्मियों के आंदोलनों को कुचलने में सत्ता को सहूलियत ज़रूर हो जाती है। &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3857696409871553743-2844980098239525117?l=dakhalkiduniya.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dakhalkiduniya.blogspot.com/feeds/2844980098239525117/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.blogger.com/comment.g?blogID=3857696409871553743&amp;postID=2844980098239525117' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3857696409871553743/posts/default/2844980098239525117'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3857696409871553743/posts/default/2844980098239525117'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dakhalkiduniya.blogspot.com/2009/07/blog-post_15.html' title='संस्कृतिकर्मियों की शिरकत शर्मनाक:'/><author><name>चन्द्रिका</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08498808385035641834</uri><email>chandrika.media@gmail.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' name='OpenSocialUserId' value='13859221743332310890'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_06z5ZQ7dCYo/Sl1a2siGzYI/AAAAAAAAApk/nQ-F4Ic9b-4/s72-c/pranay.jpg' height='72' width='72'/><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3857696409871553743.post-1032847756712940630</id><published>2009-07-13T17:37:00.003+06:00</published><updated>2009-07-13T18:01:27.311+06:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='chhattisgarh'/><title type='text'>छत्तीसगढ़ : डीजीपी विश्वरंजन के नाम एक खुला ख़त</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;strong&gt;महोदय, &lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;strong&gt;सादर अभिवादन ! &lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;strong&gt;आशा है, आप अच्छी तरह हैं।&lt;/strong&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;&lt;span class=""&gt;जैसा&lt;/span&gt; कि आपको मालूम ही है, आपके द्वारा रायपुर में 10-11 जुलाई, 2009 को आयोजित की जा रही दो--दिवसीय 'राष्ट्रीय आलोचना संगोष्ठी ' के एक सत्र 'आलोचना का प्रजातंत्र ' में अपना वक्तव्य प्रस्तुत करने के लिए आपने मुझे आमंत्रित किया था। इस सम्बन्ध में आपका पत्र ---दिनांक 15 मई , 2009 मुझे ई-मेल की मार्फ़त 18 जून, 2009 को भेजा गया और उसी दिन मिला था। उपर्युक्त संगोष्ठी में अपनी शिरकत की स्वीकृति मैंने आपको ई-मेल के ज़रिए दिनांक 19 जून, 2009 को भेज दी थी और उस पत्र में इस बात की ख़ुशी ज़ाहिर की थी कि आप सार्थक तथा उदात्त चिन्ताओं से प्रेरित होकर यह अहम संगोष्ठी करा रहे हैं और अपनी इस कृतज्ञता को भी व्यक्त किया था कि आपने मुझ जैसे अदना लेखक को इसमें आमंत्रित करने लायक़ समझा। यों रायपुर आने के लिए मैंने रेलवे रेज़र्वेशन्स करा लिए थे. मगर कल , यानी 6 जुलाई, 2009 को सहसा मेरी नज़र हिन्दी पाक्षिक ' द पब्लिक एजेंडा' के 8 जुलाई, 2009 के पृ . सं. 13 पर छतीसगढ़ के पुलिस महानिदेशक के तौर पर प्रकाशित आपके साक्षात्कार पर गयी और इसे पढ़कर मैं इतना विचलित हुआ कि मुझे उपर्युक्त संगोष्ठी में हिस्सेदारी करने का अपना फ़ैसला रद्द करना पड़ा और रायपुर आने के अपने रेलवे रेज़र्वेशन्स भी. कृपया इस असहयोग के लिए मुझे क्षमा करेंगे और मेरी वैचारिक असहमति को हरगिज़ व्यक्तिगत स्तर पर नहीं ग्रहण करेंगे ! दरअसल आप अपने साक्षात्कार में 'सलवा जुडूम ' सरीखी सरकार द्वारा संरक्षित ,पोषित और संचालित -----साधनहीन, विपन्न और अत्यंत सामान्य मानवाधिकारों से भी महरूम आदिवासियों का दमन करनेवाली-----संस्था का बेझिझक और सम्पूर्ण समर्थन करते हैं, जो मेरे जैसे लोगों के लिए एक बहुत तकलीफ़देह मामला है. आपने कहा है-----"इस समय बस्तर में हम पूरे ज़ोर-शोर से माओवादियों से लड़ रहे हैं. " सवाल है कि ये 'माओवादी ' कौन हैं ? क्या ये वही आदिवासी नहीं हैं, जिन्हें माओवादी बताकर हाल ही में पश्चिम बंगाल पुलिस ने लालगढ़ में न सिर्फ़ उन पर अत्याचार किये हैं ; बल्कि बकौल मशहूर लेखिका महाश्वेता देवी, " उनकी हत्याएँ भी की हैं. " बहरहाल. आपने अपने इस साक्षात्कार में यह आत्मविश्वास भी व्यक्त किया है कि "उनके खिलाफ़ पुलिस ही लड़ेगी और अंत में जीतेगी. " तो महोदय, पुलिस के आखिरकार जीत जाने में भला किसको संशय हो सकता है ? कुछ ही समय पहले दिवंगत हुए महान साहित्यकार विष्णु प्रभाकर ने कभी अपने एक इंटरव्यू में कहा था कि "हमारे देश का सबसे शक्तिशाली आदमी पुलिस कांस्टेबल होता है. " फिर जहाँ पूरे देश की पुलिस लालगढ़ से छत्तीसगढ़ तक आदिवासियों के बेरहम दमन में शामिल हो ; वहाँ उसके अकूत पराक्रम की तो केवल कल्पना की जा सकती है ! इस अद्भुत बल-विक्रम का एक सुबूत पेश करते हुए आपने कहा है -----"उत्तर छत्तीसगढ़ से नक्सलियों को खदेड़ दिया गया है ." गौरतलब है कि आपने यह नहीं बताया कि ऐसे लोगों को खदेड़कर पहुँचाया कहाँ गया है ! दूसरे शब्दों में, उनके पुनर्वास का क्या इंतिज़ाम सरकार ने किया है ? ' सलवा जुडूम ' का साथ देते हुए आप कहते हैं कि "इसके खिलाफ़ जिस तरह का दुष्प्रचार किया जा रहा है , उसके लिए माओवादियों को दाद देनी चाहिए ." दिलचस्प है कि फिर आप यह भी जोड़ते हैं-----' सलवा जुडूम ' माओवादियों के खिलाफ़ जनता की बगावत है.' सवाल है कि अगर यह सच है, तो उनकी विचारधारा और उनको उसी "जनता" की सहानुभूति और समर्थन कैसे प्राप्त होता है ? हम हिंसा के रास्ते के हामी नहीं हैं , लेकिन जिनसे उनका सब-कुछ छीन लिया गया हो, कई बार हथियार उठाना उनके लिए अपने वुजूद की रक्षा का आख़िरी उपाय होता है. दूसरे, जिनकी जीवन-स्थितियों में बदलाव और बेहतरी के सारे राजनीतिक रास्ते इस व्यवस्था में सदियों से बंद रहे आते हों और जिनके खुलने की कोई उम्मीद उन्हें आज भी-----आज़ादी मिलने के साठ बरस बाद भी-----नज़र न आती हो, वे आखिर क्या करें , कहाँ जायें, कैसे जियें, इस निज़ाम के नियंताओं से अपने अधिकार और अपने लिए न्याय कैसे माँगें ? इस समूचे अंतर्विरोध, विडम्बना और त्रासदी की भौतिक परिणति आसन्न अतीत में लालगढ़ में दिखायी पड़ी ; जहाँ पूरी दुनिया ने देखा है-----सरकारें चाहे जो कहती रहें-----कि हथियार कथित माओवादियों ने नहीं, बल्कि निरीह आदिवासियों ने उठाये हुए थे, भले उस सबका अंत उनके निर्मम और अप्रत्याशित पुलिस दमन में ही हुआ है. यह सब तब हो रहा है और लगातार हो रहा है, जब दुनिया भर के सामाजिक और मानवाधिकार कार्यकर्ता, बुद्धिजीवी और प्रतिबद्ध राजनीतिग्य एक आवाज़ में यह माँग कर रहे हैं कि इन सभी समस्याओं को राजनीतिक समाधान की ज़रूरत है और यह कि इस सन्दर्भ में राजनीतिक प्रक्रिया को अपनाने का कोई भी मानवीय विकल्प न है, न हो सकता है. इसके विपरीत, आप कहते हैं कि पहले उन्हें "हथियार शासन को सौंपने होंगे, तभी कोई बातचीत संभव है. " सवाल है कि जब उनके पास ये हथियार नहीं थे , तब उनकी समस्याओं का कौन-सा राजनीतिक हल तलाशा गया और जहाँ-जहाँ इन हथियारों और हथियार उठानेवालों को-----आपके ही शब्दों में कहूँ , तो "खदेड़" दिया गया है-----वहाँ वर्तमान में तमाम प्रांतीय और केन्द्रीय सरकारों द्वारा समाधान के लिए कौन-सी राजनीतिक प्रक्रिया चलायी जा रही है ? आपके राज्य छत्तीसगढ़ में तो आलम यह है कि बक़ौल गाँधीवादी सामाजिक कार्यकर्ता हिमांशु कुमार, " सरकार और माओवादियों की लड़ाई में आदिवासी मारे जा रहे हैं और विस्थापित हो रहे हैं . हिंसा का रास्ता छोड़ बातचीत के ज़रिए ही कोई हल निकाला जाना चाहिए , जिसकी पहल न राज्य कर रहा है , न माओवादी. " 'द पब्लिक एजेंडा ' के कार्यालय संवाददाता ( दिल्ली ) अजय प्रकाश के अनुसार-----"हिमांशु कुमार की यही साफ़गोई उनके लिए घातक साबित हुई है और दंतेवाड़ा प्रशासन ने 17 मई , 2009 को उनका आश्रम ढहा दिया . दंतेवाड़ा से लौटकर सामाजिक कार्यकर्ता संदीप पांडेय बताते हैं ,'हिमांशु के बारे में पूरा क्षेत्र जानता है कि ' सलवा जुडूम ' अभियान से विस्थापित और उजड़े आदिवासियों के पुनर्वास जैसा महत्त्वपूर्ण काम कर रहे हैं. लेकिन सरकार हिमांशु को माओवादियों का शुभचिन्तक बताकर दंतेवाड़ा से खदेड़ने की फिराक में है. " लगता है कि " खदेड़ना " छत्तीसगढ़ पुलिस-प्रशासन का तकियाकलाम बन गया है , उसकी केन्द्रीय रणनीति . हिटलर के ' फ़ाइनल सॉल्यूशन ' की तरह . उसका कहना था कि 'जो लोग तुम्हें पसंद न हों , उन्हें ख़त्म कर दो .' यहाँ यह कहा जा रहा है कि जो लोग तुम्हारे आड़े आते हों , उन्हें " खदेड़ " दो ! हालत यह है कि अगर कोई गाँधीवादी भी आपसे असहमत है , तो आपके मुताबिक़ वह "माओवादी " है ! छत्तीसगढ़ में जो सरकार के बताये रास्ते पर बिना कुछ सोचे-समझे नहीं चल रहा है ; वह इन दिनों माओवादी या नक्सली के तौर पर ' ब्रांडेड ' किये जाने , पुलिस उत्पीड़न झेलने , वहाँ से बेदख़ल किये जाने या " खदेड़ " दिये जाने और सज़ा भुगतने को अभिशप्त है. इस ट्रेजेडी का सबसे ज्वलंत उदाहरण डॉ. बिनायक सेन हैं , जो एक डॉक्टर के नाते छत्तीसगढ़ की आम जनता , ख़ास तौर पर वहाँ के आदिवासियों की चिकित्सा-सेवा में संलग्न थे. लेकिन प्रशासन और पुलिस ने उन पर नक्सलियों और माओवादियों का साथ देने का इल्ज़ाम मढ़ते हुए उन्हें जेल पहुँचा दिया. क़रीब तीन साल बाद सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें यह कहते हुए रिहा किया कि उनके खिलाफ़ कोई सुबूत नहीं पाये गये . मगर यह फ़ैसला आने तक एक निर्दोष और जन-सेवी डॉक्टर 3 साल जेल की सज़ा काट चुका था. इससे पुलिस-प्रशासन की अपरिमित दमनकारी ताक़त की कल्पना ही की जा सकती है. मुझे यह पता चला है कि आप कविता भी लिखते हैं . इसलिए मेरी यह जिग्यासा है कि अपने इस क़िस्म के सरकारी काम और कवि -कर्म के बीच क्या आपको कोई यातनाप्रद द्वंद्व महसूस नहीं होता या कहीं ऐसा तो नहीं है कि कोई अंतर्विरोध या द्वंद्व हो ही नहीं ? श्री प्रमोद वर्मा , जिनके नाम पर यह आयोजन हो रहा है और पुरस्कार बाँटे जा रहे हैं -----------पहला सवाल तो यह है कि अगर वे कहीं हैं , तो उन्हें कैसा लग रहा होगा ? दूसरी बात यह कि उपर्युक्त सरकारी कृत्यों पर पर्दा डालने के लिए ही क्या यह आयोजन नहीं किया जा रहा है ? कैसी विडम्बना है कि आपने इस संगोष्ठी में " आलोचना का प्रजातंत्र " शीर्षक एक पूरा सत्र ही रखा हुआ है ; जबकि आपके निज़ाम में न आलोचना की कोई वास्तविक गुंजाइश है और न निरीह प्रजा की ही कोई सुनवाई ! यह भी कोई महज़ संयोग नहीं कि पुरस्कृत और उपकृत करने के लिए आपने आलोचकों को ही निशाना बनाया ; जिससे 'आलोचना ' का रहा-सहा साहस , संवेदनशीलता, मूल्य्निष्ठता , प्रश्नाकुलता और विवेक का भी अपहरण किया जा सके और उसे निष्प्रभ एवं निस्तेज बनाया जा सके ! इस सन्दर्भ में मुझे रघुवीर सहाय की एक मशहूर कविता याद आ रही है ; जिसमें उन्होंने लिखा है----- " &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;आतंक कहाँ जा छिपा भागकर जीवन से &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;जो कविता की पीड़ा में अब दिख नहीं रहा ? &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;हत्यारों के क्या लेखक साझीदार हुए &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;जो कविता हम सबको लाचार बनाती है ? &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;" जहाँ तक मुझे मालूम है , श्री प्रमोद वर्मा , मुक्तिबोध के काफ़ी निकट थे. इसलिए इसे एक काव्य-न्याय ही मानता हूँ कि मुक्तिबोध की इन काव्य-पंक्तियों की स्मृति ने मुझे उपर्युक्त कार्यक्रम में शामिल होने से आखिरकार रोक लिया----- &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;" भीतर तनाव हो &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;विचारों का घाव हो &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;कि दिल में एक चोट हो आये &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;-दिन ठंडी इन रगों को गर्मी की खोज है &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;वैसे यह ज़िन्दगी भोजन है , मौज है । "&lt;/span&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;&lt;span class=""&gt;                                          आदर&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt; और शुभकामनाओं के साथ ;&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;&lt;span class=""&gt;                                                                                                         आपका&lt;/span&gt; ,&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;                                                                                            पंकज चतुर्वेदी कानपुर &lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3857696409871553743-1032847756712940630?l=dakhalkiduniya.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dakhalkiduniya.blogspot.com/feeds/1032847756712940630/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.blogger.com/comment.g?blogID=3857696409871553743&amp;postID=1032847756712940630' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3857696409871553743/posts/default/1032847756712940630'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3857696409871553743/posts/default/1032847756712940630'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dakhalkiduniya.blogspot.com/2009/07/blog-post_13.html' title='छत्तीसगढ़ : डीजीपी विश्वरंजन के नाम एक खुला ख़त'/><author><name>चन्द्रिका</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08498808385035641834</uri><email>chandrika.media@gmail.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' name='OpenSocialUserId' value='13859221743332310890'/></author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3857696409871553743.post-2320609837767153205</id><published>2009-07-06T14:26:00.001+06:00</published><updated>2009-07-06T15:01:28.280+06:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='chhattisgarh'/><title type='text'>छत्तीसगढ़ व उड़ीसा के बंधुआ/विस्थापित मजदूरों के अध्ययन की एक संक्षिप्त रपट</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt; समय के साथ चीजों को बदलना था, गुलामी खत्म होनी थी, समाज में व्याप्त जड. प्रवृत्तियां बदलनी थी. अंग्रेजी सत्ता से मुक्ति के बाद देश के एक बडे़ मनोजगत का यही सोचना था. पर अफसोस कि अंग्रेजों से मुक्ति जिसे आज़्ाादी कहा गया, महज़्ा सत्ता बदलाव तक ही सीमित रही यानि सामाजिक संरचना में कोई खास बदलाव नहीं आया छत्तीसगढ़ और उड़ीसा के कुछ जिलों में बंधुआ मजदूरों पर किये गये अध्ययन के दौरान निकलकर आये तथ्य तो यही कहते हैं. &lt;br /&gt;अंग्रेजी सत्ता से मुक्ति के बाद जनता को स्वतंत्र्ाता, समता व अन्य कई मौलिक अधिकार दिये गये, जिनका मिलना अपने को लोकतांत्र्ािक कहे जाने वाले देश में लाज़्ामी था. इन कानूनों के होने के बाद भी स्थिति ये रही कि देश के कई इलाकों में बंधुआ मजदूरी की प्रथा जारी रही अतः 19 फरवरी 1976 को बंधुआ मजदूर जो कि दुर्बल वर्ग के होते थे या आज भी हैं के शारीरिक व आर्थिक शोषण से मुक्ति हेतु ’बंधित श्रम प्रथा उन्मूलन नियम 1976’ सत्ता हस्तांतरण के 27 वर्ष बाद बनाया गया. इसके पश्चात अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति 1989 अधिनियम भी बनाया गया, जिसका सम्बंध बंधुआ मजदूरों से जुड़ा हुआ है, क्योंकि देश में चल रही बंधुआ प्रथा में एक अंकडे के मुताबिक 98 प्रतिशत से अधिक अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति के लोग प्रताड़ित होते हैं.&lt;br /&gt;कानूनी तौर पर बंधुआ मजदूरों को लेकर कुछ अन्य नियम भी बनाये गये जैसे बंधुआ मजदूर व प्रवासी बंधुआ मजदूर जो किसी अन्य राज्य में जाकर बंधुआ के रूप में कार्य करते हैं उनके लिये जिले में सतर्कता समिति के गठन का भी सुझाव दिया गया और समिति निर्माण का कार्य जिला अधिकारी को दिया गया. साथ में बंधुआ मजदूरी कराने वाले व्यक्ति नियोक्ता ठेकेदार आदि को दंडित करने का नियम भी बनाया गया जो 3 वर्ष तक कारावास व 2000 रूपये जुर्माने के रूप में थी. सरकार द्वारा बंधुआ मजदूरों के सम्बंध में राहत राशि की व्यवस्था भी की गयी जो 25,000 रूपये उनके पुनर्वास हेतु व पानी भूमि आदि के रूप में की गयी.जिसे छत्तीसगढ के कुछ जिलों में जिनमे महासमुंद, रायपुर व उड़ीसा के बरगड़ नवापाड़ा आदि में गैर सरकारी संस्थाओं द्वारा बंधुआ मजदूरों को इंगित कर उनमे से कुछ को यह सुविधा प्रदान कराई गयी पर कई बंधुआ मजदूरों को यह अभी तक नही मिली.&lt;br /&gt;प्रस्तुत रिपोर्ट प्रथम व द्वितीय श्रोतों के अध्ययन का एक संक्षिप्तीकरण है. जिसमे यह बात गौर करने की है कि कानूनों के दबाव व नियमों को ध्यान में रखते हुए राज्यों में बंधुआ मजदूरों का स्वरूप बदल गया है. अध्ययन के दौरान इस बात का पता लगा कि बंधुआ मजदूरों को लेकर स्वामी अग्निवेश के अंदोलन के प्रभाव से बंधुआ मजदूरों की स्थिति में बदलाव आया या कहा जाय कि उनका स्वरूप बदल गया क्योंकि उनके प्रभाव में आकर राज्य के कई संस्थाओं व कार्यकर्ताओं ने बंधुआ मुक्ति अंदोलन चलाया जिनमें छत्तीसगढ़ बंधुआ मुक्ति मोर्चा ने महती भूमिका निभाई है.कारणवस जो पारंपरिक स्वरूप था वह बहुत कम दिखता है परंतु यह बदले हुए स्वरूप में बड़ी मात्र्ाा में मौजूद है. मसलन छत्तीसगढ़ में विस्थापन एक बड़ी समस्या के रूप में रहा है और अधिकांसतः यह बधुआ मजदूरों के रूप में ही होता है. 1981 में मध्यप्रदेश के एक कमिश्नर (तब छत्तीसगढ़ अलग राज्य के रूप में अस्तित्व में नही आया था ) लोहानी ने आब्रजन कानून बनाया ताकि यहां से बंधुआ बनकर जाने वाले मजदूरों को रोका जा सके जबकि उनके कारणों की खोज कर निदान करने का प्रयास नहीं किया गया.&lt;br /&gt;अध्ययन के दौरान बंधुआ बनकर विस्थापित होने वाले मजदूरों के संदर्भ में जो कारण निकल कर आये वे कई आयामों के साथ हैं.&lt;br /&gt;एक तो छत्तीसगढ़ के किसान जो भूमि युक्त हैं या जो छोटे किसान हैं बारिस के बाद यानि धान की फसल लगाने के पश्चात उनके पास अन्य फसल लगाने के अवसर नहीं होते हैं. अत बारिस के बाद वे खाली हो जाते हैं, उनके पास संग्रहित धान इतने नहीं होते कि वे वर्ष भर इससे अपनी आजीविका चला सकें. न ही राज्य में मजदूरी की इतनी उप्लब्धता जिस वज़्ाह से वे अपनी आजीविका हेतु किसी अन्य राज्य मसलन उत्तर प्रदेश, आन्ध्र प्रदेश, जम्मू-काष्मीर, हरियाणा, पंजाब, कर्नाटक आदि राज्यों में पलायन कर जाते हैं जिस वर्ष छत्तीसगढ़ मे सूखा पड़ता है यह पलायन की दर और बढ़ जाती है. एक अंकडे़ के मुताबिक 2001 में पडे़ सूखे की वज़्ाह से 20,000 गांव से 6 लाख से अधिक मजदूरों का पलायन हुआ था.&lt;br /&gt;वहीं 18 लाख के आस-पास यहां भूमिहीन मजदूर भी हैं खासतौर से पलायन जिन जिलों से अधिक होता है उनमें बिलासपुर, जांजी-चाम्पा, महासमुंद आदि हैं यहां जमीन प्रति एकड़ से भी कम है ऐसी स्थिति में ठेकेदार इन्हें एडवांस देकर लेजाते हैं और दिन-रात काम के बदले अपने मन मुवाफ़िक रकम ही देते हैं. कई बार दिया हुआ एडवांस चुकता नही होने पर इन्हें फिर से उसी रकम पर वहीं जाना पड़ता है या फिर नियोक्ता इन्हे आने की अनुमति ही नहीं देता. ऐसी स्थिति में महिलाओं के साथ दुवर््यवहार भी होता है. कुछ मामले ऐसे भी हैं जिनमे मजदूर बंधक बनकर गये और उन्हें छोड़ने के लिये परिजनों से पैसा भी मांगा गया.&lt;br /&gt;बंधक बनकर जाने वाले मजदूरों के दवा पानी राशन आदि की सुविधा कई नियोक्ता करते भी हैं तो अंत मे उनकी मजदूरी जो प्रायः अनुबंधित मजदूरी से कम होती है उसमें से काट लिया जाता है. मजदूर अनपढ़ होते हैं अतः उन्हें सही-सही पता नहीं चल पाता कि उन्हें कितना मिलना चाहिये कितना नहीं. नियोक्ता लौटते वक्त जितना देता है उतना ही लेने के लिये वे मजबूर रहते हैं. विस्थापित होने वाले ज्यादातर बंधुआ मजदूर ईंट भट्ठों पर काम के लिये अपने परिवार के साथ जाते हैं जिन्हें 1000 ईंट बनाने का 120-130 रूपये दिया जाता है पर यह दर सभी के लिये समान रूप से लागू नहीं होती यह उनके द्वारा लिये गये दादेन ( एडवांस) पर निर्भर करती है कई बार वे मुफ्त में भी काम करते हैं .&lt;br /&gt;कई मामले ऐसे भी हैं जहां उनके मजदूरी का पैसा एक वर्ष के लिये रोक लिया जाता है यानि इस वर्ष का अगले बरस. इससे होता यह है कि मजदूर अगली बार नियोक्ता तक खुद पहुंच जाता है और उससे बंधने के लिये मजबूर होता है. यह पलायन अक्टूबर माह से चालू होता है और मई तक मजदूर लौट कर फिर अपने गांव आते हैं.&lt;br /&gt;छत्तीसगढ़ व अध्ययन के लिये चुने गये उड़ीसा के जिले आधिकांसतः आदिवासी बाहुल्य हैं. सतत क्रम में अध्ययन के दौरान यह पाया गया कि आदिवासियों का विस्थापन हाल के वर्षों में बढ़ा है, इससे पहले उनका विस्थापन कम होता था. सरकारी तौर पर हाल में काफी सख्ती विस्थापित होने वाले मजदूरों को लेकर बरती गयी. मसलन गांव के स्तर पर समितियां भी बनायी गयी, ग्राम उत्कर्ष योजना के तहत विस्थापन के समय में गांव में कार्य हेतु पैसे आबंटित किये गये, स्टेशन बस स्टैंड पर पुलिस तैनात की गयी. पर पुलिस मजदूरों के साथ ज्यादती नही करती. वह 10 रूपये प्रति व्यक्ति के हिसाब से ठेकेदारों से ले लेती है और मजदूरों को जाने देती है.&lt;br /&gt;बंधुआ मजदूर अक्सर सपरिवार ही पलायित करते हैं. गांव में केवल बूढे़ बचते हैं जो फसल से उपजे धान से अपनी जीविका चलाते हैं. अध्ययन के दौरान यह भी पाया गया कि पलायित होने वाले बंधुआ मजदूर अधिकांशतः अनुसूचित जाति या जन जाति के हैं जिनमे बहुतों के पास न तो घर के जमीन का पट्टा है न ही खेत का, वे जंगल की जमीन पर रहते हैं.&lt;br /&gt;वे अपने युवा बेटियों को कम ले जाते हैं क्योकि उनके साथ दुर्वयवहार होने की आशंका रहती है अतः एडवांस या दादेन लेकर उनकी शादी जल्दी कर देते हैं. ईट भट्ठों पर काम करने वाले मजदूर अक्सर जोड़ों के रूप में ही काम करते हैं. इन्हें किसी तरह की छुट्टी नही दी जाती जिस दिन नियोक्ता इन्हें पैसा देता है उस दिन सामान खरीदने जाने की छूट होती है. न तो नियोक्ता द्वारा इनके लिये किसी शौचालय की व्यवस्था होती है, न ही इन्हें बेतन कार्ड दिया जाता है, बच्चों के लिये पालना घर जैसी कोई सुविधा नहीं होती काम करते वक्त ये अपने बच्चों को साथ लिये होते हैं. इनके घर इनके द्वारा बनाये गये कच्चे ईंट पर घास लगाकर तैयार किये जाते हैं. और अधिकांश मजदूरों को सरकार के द्वारा तय की गयी मजदूरी का पता भी नहीं होता. अतः पलायित मजदूर असुरक्षा के बीच घोर अमानवीय व्यवस्था में जीते हैं.&lt;br /&gt;अध्ययन के दौरान यह पाया गया कि राज्य के कुछ जिलों में अभी भी ऐसे बंधुआ मजदूर मौजूद हैं जो पारंपरिक रूप से पीढ़ी दर पीढ़ी बंधुआ बने हुए हैं. और ये अपने को बंधुआ मानते भी हैं. ये अपने पूरे परिवार के साथ नियोक्ता यानि मालिक के घर पर काम करते हैं और प्रति दिन 700 ग्राम धान प्राप्त करते हैं. ये पूरी तरह से अपने मालिकों के संरक्षण में रहते हैं साथ ही जब इनकी अगली पीढ़ी बड़ी होती है तो वह भी वही काम करने लगती है प्रायः ये खेती, किसानी व घरेलू काम ही करते हैं व मालिक द्वारा कहीं पर भेज कर भी काम करवाया जाता है. जिसका पैसा मालिक खुद प्राप्त करता है. बीमार होने पर मालिक की तरफ से दवा करवा दी जाती है पर यह बीमारी पर निर्भर करता है. किसी गंभीर बीमारी की वज़्ाह से कई बार इनके सदस्यों की मृत्यु भी हो जाती है.&lt;br /&gt;छत्तीसगढ़ के कई जिले ऐसे हैं जिनका विकास औद्योगिक क्षेत्र्ा के रूप में हुआ है. मसलन सिलतरा, उर्ला, भिलाई, दुर्ग राजनांदगांव आदि इन औद्योगिक ईकाईयों में राज्य व राज्य के बाहर से मजदूर लाखों की संख्या में काम करते हैं. पिछले कुछ दशकों से यहां नियमित मजदूरों की संख्या घटी है और ठेकेदारी प्रथा को बढ़ावा मिला है. स्वयं भिलाई स्टील प्लांट में 90 के दशक में जहां पहले 96,000 के आस-पास मजदूर थे, उनकी संख्या घटकर महज़्ा 27,000 के आस-पास पहुंच गयी है, और इतने ही के आस्-पास संख्या में मजदूर ठेकेदारों की नियुक्ति पर काम करते हैं. बाकी संख्या के मजदूर मशीनीकरण की वज़्ाह से हटा दिये गये. ठेकेदारों के मातहत काम करने वाले मजदूर एडवांस लेकर उनके बंधुआ बनते हैं जबकि उर्ला व सिलतरा क्षेत्र्ा में जहां स्पंज आयरन व पावर प्लांट की बहुलता है वहां अधिकांस संख्या में ठेकेदारी प्रथा लागू है जो कि एडवांस देकर बधुआ बने मजदूरों पर आधारित है. आने वाले बंधुआ मजदूर बस्तर, व दांतेवाडा जैसे जंगलों के आदिवासी भी हैं जो पहले अपनी आजीविका जंगलों में खोज लिया करते थे पर कम होते व कटते जंगलों से इनके आजीविका की समस्या बढ़ रही है और ये पलायित होने व बंधुआ बनने को मजबूर हो रहे हैं. इन मजदूरों के लिये न ही कोई षौचालय की व्यवस्था की गयी है न ही पीने के साफ पानी की आस-पास के तालाबों में ये स्नान करते हैं, जहां का जल इन कम्पनियों के प्रदूषण से काला हो चुका है. स्थिति ये है कि आधे घंटे सड़क पर रहने के बाद कई कि.मी. के इलाके में फैले प्रदूषण की वज़्ाह से मुंह पर कालिख जम जाती है. यहां की फसलें काली होने की वज़्ाह से बिक्री में भी समस्या होती है कई बार मजबूर होकर सरकार खरीदती है. अन्यथा किसानों के यहां सड़ जाता है. इन काम करने वाले मजदूरों को ठेकेदार 1500 से 2000 रूपये मासिक देता है और 12 घंटे से ज्यादा काम करना पड़ता है.प्रायः ये अकुशल श्रमिक के रूप में देखे जाते हैं यही हालत अन्य कई क्षेत्र्ा में काम करने वाले ठेकेदारों द्वारा बंधक मजदूरों के साथ भी है जो सड़क निर्माण से लेकर चावल मिल में काम करते हैं दृ अतः ठेकेदारी की बड़ती प्रथा ने बंधुआ मजदूरों के स्वरूप को बदल दिया है. जिससे बंधुआ का जो संवैधानिक विश्लेषण है उसके तहत इन्हें पहचानना मुश्किल है.&lt;br /&gt;&lt;em&gt;चन्द्रिका&lt;/em&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3857696409871553743-2320609837767153205?l=dakhalkiduniya.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dakhalkiduniya.blogspot.com/feeds/2320609837767153205/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.blogger.com/comment.g?blogID=3857696409871553743&amp;postID=2320609837767153205' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3857696409871553743/posts/default/2320609837767153205'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3857696409871553743/posts/default/2320609837767153205'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dakhalkiduniya.blogspot.com/2009/07/blog-post.html' title='छत्तीसगढ़ व उड़ीसा के बंधुआ/विस्थापित मजदूरों के अध्ययन की एक संक्षिप्त रपट'/><author><name>चन्द्रिका</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08498808385035641834</uri><email>chandrika.media@gmail.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' name='OpenSocialUserId' value='13859221743332310890'/></author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3857696409871553743.post-7176739915419099036</id><published>2009-06-30T15:50:00.001+06:00</published><updated>2009-06-30T16:39:32.020+06:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='lalgarh'/><title type='text'>आतंकित होकर आतंकवाद का ठप्पा</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_06z5ZQ7dCYo/SknpdDjo1HI/AAAAAAAAAm4/kt-jQdGklh0/s1600-h/130810-lalgarh.jpg"&gt;&lt;img style="MARGIN: 0px 0px 10px 10px; WIDTH: 270px; FLOAT: right; HEIGHT: 455px; CURSOR: hand" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5353066317486806130" border="0" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_06z5ZQ7dCYo/SknpdDjo1HI/AAAAAAAAAm4/kt-jQdGklh0/s400/130810-lalgarh.jpg" /&gt;&lt;/a&gt; &lt;strong&gt;&lt;em&gt;हम देशद्रोही हैं और अब आतंकवादी भी, ऎसा कुछ देशप्रेमियों का कहना है. लालगढ़ पर लिखे पिछले दो टिप्पणियों पर कई लोगों की प्रतिक्रियायें मेल व फोन पर आयी, जिनमे कुछ लोगों ने अभद्र शब्दों के साथ हमे यह सर्टिफिकेट दे डाला। इन देश प्रेमियों के देश प्रेम के बारे में हमे नहीं पता कि इनका देश प्रेम क्या है और देश का ये क्या मायने लगाते हैं, जिससे उन्हें प्रेम है और जिसके हम खिलाफ हैं। मसलन देश का अर्थ क्या देश की वह पुलिस है जो लालगढ़ के गाँवों बेलासोल, कुलदहा, कोरमा, अमचोर, महतोपुर, बिमटोला, जम्बोनी आदि में लूट रही है, वहाँ के बुजुर्गों, बच्चों, महिलाओं पर अत्याचार कर रही है या देश वह जमीन का टुकडा़ है जिसे जिंदल को दिया जा रहा है या देश वहाँ के राज्य सरकार की इच्छा है या देश चिदम्बरम मनमोहन के हाँथ का डंडा है या फिर देश वहाँ के वे आदिवासी लोग जिन्हें बेदख़ल किया जा रहा है. देश के इतने सारे खाँचों में हम उस देश के साथ हैं जो वहाँ के लोगों की इच्छा से निर्मित हो शायद एक लोकतांत्रिक देश के मायने यही होंगे. ऎसे में इनकी स्थितियों को लिखना यदि देशद्रोही होना है तो जनलोकतंत्र की व्यवस्था ही देशद्रोही हो जायेगी. इस आधार पर किसी को देशद्रोही या आतंकी साबित करना महज़ चिदम्बरम व मनमोहन सिंह की जुबान होना भर है. दरअसल मीडिया उद्योग ने हमारी मानसिकता का ऎसा निर्माण कर दिया है कि हम सरकारी सोच के हो गये हैं, मसलन सरकार की सभी क्रियायें हमारे लिये लोकतांत्रिक हो गयी हैं. सरकार जिसे आतंकवादी कहती है वह आतंकवादी है, और जिसे देशद्रोही, वह देशद्रोही. हम लोकतंत्र की अवधारणा में रखकर घटनाओं को देखना भी भूल चुके हैं. क्योंकि लोकतंत्र के चौथे खंभे का ढोल पीटती मीडिया सत्ता का चौथा खम्भा बन चुकी है जिस पर विचार किये जाने की आवश्यकता है कारण कि देश दुनिया की घटनाओं पर हमारी राय मीडिया से ही निर्मित होती है और हम घटनाओं को प्रत्यक्ष तौर पर न देख पाने में मजबूर हैं. पर हमें मीडिया को समझने के तरीके इज़ाद करने होंगे. &lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;जय हो के नारे के साथ केन्द्र में आयी सरकार ने २२ जून को भारतीय राज्य में माओवादी संगठन को आतंकवादी घोषित कर उन पर प्रतिबंध लगा दिया और लालगढ़ में पुलिस ने कब्जा कर लिया. इस पुलिस कब्ज़ेदारी के साथ गाँवों की तलाशी जारी है. सुरक्षाबल अपने कैम्प जमाकर देश की सुरक्षा में तैनात हैं, यानि देश के एक छोटे से हिस्से की सुरक्षा. जहाँ के अधिकांश लोग असुरक्षित होकर गाँवों से भाग गये हैं पर सुरक्षा जारी है, जंगलों के उन पेडो़ की जो भाग नहीं सकते, जमीन की जो खिसक नहीं सकती, बाकी जितने लोग बचे हैं उनके लिये उतनी बंदूकें सरकार ने भेज दी हैं, पर वे या तो बूढे़ हैं या बच्चे इनके लिये लात, घूंसे और डंडे ही काफी हैं. अब ऎसे में लोकतंत्र की परिभाषा जिसे हम रटा करते हैं वह बदल चुकी है. जिसे हम सबको वर्तमान लोकतंत्र के लिये सुधार लेना चाहिये. यानि जनता पर, पुलिस द्वारा, बंदूकों का शासन लोकतंत्र है. यह महज़ पश्चिम बंगाल की स्थिति नहीं है बल्कि कश्मीर, मणिपुर, अरूणाचल, नागालैंड, आंध्र, छत्तीसगढ़......बाकी के नाम आप खुद याद करें. क्या देश में फासीवाद तभी आता है जब मुसोलिनी नाम का कोई व्यक्ति पैदा हो या फिर यह बुद्धदेव, मनमोहन, रमन, चिदम्बरम नाम के साथ भी आ सकता है. २२ जून को लालगढ़ की स्थिति जानने के लिये कार्यकर्ताओं व बुद्धिजीवियों की एक टीम जिसमें अभिनेत्री अपर्णा सेन, सोनाली मित्रा, कौशिक सेन, कवि जय गोस्वामी, बोलन गंगोपाद्याय गये. उन लोगों ने वहाँ की स्थितियों को देखा और वहाँ के लोगों से बातचीत की, लौटने के बाद सरकार द्वारा जारी प्रताड़ना की निंदा करते हुए इसे रोकने की मांग की तो उन पर केस लगा दिये गये. मेल्दा गाँव में संवाद प्रतिदिन पत्र के फोटोग्राफर ने पुलिस द्वारा पीटे जा रहे महिलाओं, बच्चों के फोटो लेने का प्रयास किया तो पुलिस द्वारा उन्हें पीटा गया. २७ जून को 'नेशनल फैक्ट फाइंडिंग' टीम जिसमे फिल्मकार के.एन.पंडित, पद्मा, दामोदर, टिंकू, एम. श्रीनिवास, राजकोशोर व सुसन्तो जैसे सामाजिक कार्यकर्ताओं व लेखकों को जाने से पहले मिदिनापुर पुलिस स्टेशन में गिरफ्तार कर लिया गया. यानि अब खबर वही मिलेगी जो पुलिस बतायेगी. बाकी सब पर प्रतिबंध, इसे हम क्या कहें? महाश्वेता देवी ने कहा है कि यदि ग्राम रक्षा समिति के मुखिया चक्रधर महतो को गिरफ्तार किया गया तो वे मुख्यमंत्री आवास के सामने घरना देंगी. निश्चित तौर पर इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि लालगढ़ के आंदोलन में माओवादी पार्टी भी सम्मलित थी. जिसे माओवादी नेता ''विकास'' ने स्वीकार भी किया, पर वे किस भूमिका में काम कर रहे थे इसे हमे देखने की जरूरत है. जब आदिवासियों से जमीने छीनी जाने लगी, उन्हें प्रताड़ित किया जाने लगा और सालबोनी प्रोजेक्ट को एक नये आधुनिक राष्ट्र की संज्ञा दी जाने लगी. यानि लालगढ़ में एक ऎसा वाशिंगटन उन आदिवासियों की जमीन पर बन रहा था (ये सारी संज्ञायें मीडिया व नेताओं की हैं ) जिन्हें दो जून की रोटी तक नहीं मिलती. ऎसे में देश की एक मात्र पार्टी चाहे उसे आतंकवादी कहा जायें या कुछ और ने वहाँ के लोगों को संगठित करने का कार्य किया. आधुनिक विकास के ढांचे को नकारते हुए लोगों की मूलभूत जरूरतों को मुखरित किया और उन्हें सम्बल पहुचाया. क्या यह उनका देशद्रोह था? माओवादी पार्टी को लेकर तमाम तरह के भ्रामक प्रचार किये गये मसलन विकास विरोधी होना. वे निजीकरण से चल रहे विकास के खिलाफ़ जरूर हैं पर शिक्षा, स्वास्थ, जैसी सुविधाओं के खिलाफ़ नहीं. भले ही शिक्षा प्रणालियां व नीतियाँ अपने आप में समाज विरोधी हों. ऎसा माओवादी नेताओं से रूचिर गर्ग की हुई बातचीत से पता चलता है. माओवादीयों ने आदिवासियों की मूलभूत जरूरतों को लेकर लड़ने में उन्हें सम्बल दिया है व शिक्षा, स्वास्थ को लेकर अपने आधार इलाकों में जमीनी स्तर से विकास का एक ढांचा भी निर्मित किया है. जिससे उनकी पैठ वाकई सागर में मछली की तरह है. ऎसी स्थितियों में महेन्द्र कर्मा के बयान को सभी राज्य अमल करने पर तुले हैं कि वे सागर को ही सोख जायेंगे. ज़ाहिर है सागर को सोखने के बाद मछलियाँ वहाँ नहीं रह सकती तो क्या हम एक ऎसे आधुनिक राष्ट्र के निर्माण में जुटे हैं जहाँ आदिवासियों की प्रजाति को खत्म कर दिया जाय. माओवादियों ने अपने कई वक्तव्यों में इस बात को दोहराया है कि आइ.एस.आई., सिमी, जैसे संगठनों के साथ उनके रिश्ते नहीं हैं और वैचारिक आधार पर होना सम्भव भी नहीं है व सरकार का भी कोई बयान इस बात को लेकर नहीं आया है. इसके बावजूद मीडिया समय-समय पर यह प्रोपोगेंडा चलाती रहती है तो क्या सरकार को मीडिया संस्थानों में रा की जिम्मेदारी दे देनी चाहिये? क्योंकि सरकारी इंटेलीजेंस इसे साबित करने में विफल रहा है. दूसरी बात यह कि सरकार की तरफ से माओवाद को एक आर्थिक, सामाजिक समस्या के रूप में चिन्हित किया जाता रहा है पर आज जब इसे आतंकवादी संगठन घोषित किया गया है तो इसके क्या मायने लगाये जाने चाहिये? कि आतंकवाद सामाजिक, आर्थिक कारणों की उपज है. फिर देश में उपजे सामाजिक आर्थिक कारणों के आंदोलन यदि आतंकवादी हैं तो असहमति के लिये वह कौन सी जगह है जहाँ हम आप बोल सकते हैं? अब हमें छोड़ना होगामरने के बाद मौन की परम्पराबटोरनी होगी मरने वाले की आख़िरी चीख़इतने सारे लोगों के रोज़ मरने का मौनहमारी उम्र भर की चुप्पी के लिये काफ़ी हैअपने मरने के पहले की आवाज़हमें अभी से ही निकालनी होगी॥ चन्द्रिका &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3857696409871553743-7176739915419099036?l=dakhalkiduniya.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dakhalkiduniya.blogspot.com/feeds/7176739915419099036/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.blogger.com/comment.g?blogID=3857696409871553743&amp;postID=7176739915419099036' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3857696409871553743/posts/default/7176739915419099036'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3857696409871553743/posts/default/7176739915419099036'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dakhalkiduniya.blogspot.com/2009/06/blog-post_30.html' title='आतंकित होकर आतंकवाद का ठप्पा'/><author><name>चन्द्रिका</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08498808385035641834</uri><email>chandrika.media@gmail.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' name='OpenSocialUserId' value='13859221743332310890'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_06z5ZQ7dCYo/SknpdDjo1HI/AAAAAAAAAm4/kt-jQdGklh0/s72-c/130810-lalgarh.jpg' height='72' width='72'/><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3857696409871553743.post-7910643777815398704</id><published>2009-06-22T13:21:00.004+06:00</published><updated>2009-06-22T13:51:42.504+06:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='lalgarh'/><title type='text'>लालगढ़: एक छोटे लोकतंत्र का बडे़ लोकतंत्र के लिये खतरा</title><content type='html'>&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://1.bp.blogspot.com/_06z5ZQ7dCYo/Sj83di3lVkI/AAAAAAAAAmw/PWKN13nTciA/s1600-h/lalgarh2.jpg"&gt;&lt;img style="margin: 0pt 0pt 10px 10px; float: right; cursor: pointer; width: 250px; height: 197px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_06z5ZQ7dCYo/Sj83di3lVkI/AAAAAAAAAmw/PWKN13nTciA/s400/lalgarh2.jpg" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5350055863055111746" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;वे&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;शांति&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;स्थापना&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;के&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;लिये&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;निकले&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;हैं&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;ज़ाहिर&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;है&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;कब्रिस्तान&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;में&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;शोर&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;नहीं&lt;/span&gt; &lt;span style="font-weight: bold;"&gt;होता&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;....&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span&gt;लालगढ़&lt;/span&gt; &lt;span&gt;को&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अशांत&lt;/span&gt; &lt;span&gt;घोषित&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दिया&lt;/span&gt; &lt;span&gt;गया&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है&lt;/span&gt;. &lt;span&gt;इस&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अशांति&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मायने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;क्या&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हैं&lt;/span&gt;? &lt;span&gt;क्या&lt;/span&gt; &lt;span&gt;यह&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कि&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तकरीबन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;१८७&lt;/span&gt; &lt;span&gt;गाँवों&lt;/span&gt; &lt;span&gt;में&lt;/span&gt; &lt;span&gt;संथाली&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आदिवासी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लोगों&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अपनी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कमेटियाँ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बना&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ली&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हैं&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;वे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अपने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सुख&lt;/span&gt;-&lt;span&gt;दुख&lt;/span&gt; &lt;span&gt;का&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आपस&lt;/span&gt; &lt;span&gt;में&lt;/span&gt; &lt;span&gt;निपटारा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;करने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;का&lt;/span&gt; &lt;span&gt;प्रयास&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रहे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हैं&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;गाँव&lt;/span&gt; &lt;span&gt;की&lt;/span&gt; &lt;span&gt;किसी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;समस्या&lt;/span&gt; &lt;span&gt;का&lt;/span&gt; &lt;span&gt;समाधान&lt;/span&gt; &lt;span&gt;गाँव&lt;/span&gt; &lt;span&gt;में&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ही&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लेना&lt;/span&gt; &lt;span&gt;चाहते&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हैं&lt;/span&gt;. &lt;span&gt;यानि&lt;/span&gt; &lt;span&gt;गाँव&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लोगों&lt;/span&gt; &lt;span&gt;का&lt;/span&gt; &lt;span&gt;गाँव&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लोगों&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;शासन&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;एक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;छोटा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लोकतंत्र&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आदिवासी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;समाज&lt;/span&gt; &lt;span&gt;का&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लोकतंत्र&lt;/span&gt;. &lt;span&gt;क्योंकि&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बडा़&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लोकतंत्र&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बडों&lt;/span&gt; &lt;span&gt;का&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;चुका&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है&lt;/span&gt; &lt;span&gt;इसलिये&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नज़र&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ही&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नहीं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जाती&lt;/span&gt;. &lt;span&gt;बडे़&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लोकतंत्र&lt;/span&gt; &lt;span&gt;का&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ढांचा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बडा़&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;पुलिस&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;फौज़&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;कानून&lt;/span&gt; &lt;span&gt;की&lt;/span&gt; &lt;span&gt;एक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मोटी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;किताब&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जिसमे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पूरी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अरब&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जनता&lt;/span&gt; &lt;span&gt;को&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नियंत्रित&lt;/span&gt; &lt;span&gt;करने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;फार्मूले&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हैं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;फार्मूले&lt;/span&gt; &lt;span&gt;वही&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लगा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सकते&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हैं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पढे़&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लिखे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हों&lt;/span&gt;. &lt;span&gt;संथाली&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आदिवासी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;की&lt;/span&gt; &lt;span&gt;स्थिति&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ये&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कि&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रात&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;थोडे़&lt;/span&gt; &lt;span&gt;से&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अंधेरे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;को&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अपने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भूख&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;साथ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सान&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;खा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जाता&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है&lt;/span&gt; &lt;span&gt;और&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जाता&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है&lt;/span&gt;. &lt;span&gt;ऎसे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;में&lt;/span&gt; &lt;span&gt;एक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;छोटा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लोकतंत्र&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बडे़&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लोकतंत्र&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लिये&lt;/span&gt; &lt;span&gt;खतरा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जाता&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है&lt;/span&gt;. &lt;span&gt;क्या&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मैं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;इस&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बडे़&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लोकतंत्र&lt;/span&gt; &lt;span&gt;को&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लोकतंत्र&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कहूँ&lt;/span&gt;? &lt;span&gt;दरअसल&lt;/span&gt; &lt;span&gt;वहाँ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अशांति&lt;/span&gt; &lt;span&gt;यही&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कि&lt;/span&gt; &lt;span&gt;वहाँ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पुलिस&lt;/span&gt; &lt;span&gt;और&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सेना&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नहीं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है&lt;/span&gt;. &lt;span&gt;और&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बिना&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पुलिस&lt;/span&gt; &lt;span&gt;और&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सेना&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कहीं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;शांति&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कैसे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रह&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सकती&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है&lt;/span&gt;? &lt;span&gt;क्या&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आप&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कल्पना&lt;/span&gt; &lt;span&gt;करना&lt;/span&gt; &lt;span&gt;चाहेंगे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उस&lt;/span&gt; &lt;span&gt;स्थान&lt;/span&gt; &lt;span&gt;की&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जहाँ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पुलिस&lt;/span&gt; &lt;span&gt;न&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;और&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लोग&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अपनी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;समस्यायें&lt;/span&gt; &lt;span&gt;खुद&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हल&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लेते&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हों&lt;/span&gt;. &lt;span&gt;यानि&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पुलिस&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;न&lt;/span&gt; &lt;span&gt;होने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;का&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अर्थ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सारी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;चीजों&lt;/span&gt; &lt;span&gt;का&lt;/span&gt; &lt;span&gt;न&lt;/span&gt; &lt;span&gt;होना&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पुलिस&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;होने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;साथ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मौजूद&lt;/span&gt; &lt;span&gt;होती&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हैं&lt;/span&gt;. &lt;span&gt;लालगढ़&lt;/span&gt; &lt;span&gt;में&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आज&lt;/span&gt; &lt;span&gt;की&lt;/span&gt; &lt;span&gt;स्थिति&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कुछ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कहने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;से&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पहले&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हमे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उसकी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ऎतिहासिकता&lt;/span&gt; &lt;span&gt;में&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उसे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;देखना&lt;/span&gt; &lt;span&gt;होगा&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;नवम्बर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;से&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अब&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बातें&lt;/span&gt; &lt;span&gt;स्पष्ट&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रूप&lt;/span&gt; &lt;span&gt;से&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उभर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आयेंगी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;एक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;यह&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कि&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आदिवासी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अपने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जंगल&lt;/span&gt; &lt;span&gt;की&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जमीन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;को&lt;/span&gt; &lt;span&gt;किसी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;स्टील&lt;/span&gt; &lt;span&gt;प्लांट&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लिये&lt;/span&gt; &lt;span&gt;देना&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नहीं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;चाहते&lt;/span&gt; &lt;span&gt;वे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नहीं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;चाहते&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कि&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अपनी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जमीनों&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बुलोडोजर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;चलता&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हुआ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;वे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;देखें&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;पर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सरकार&lt;/span&gt; &lt;span&gt;५०००&lt;/span&gt; &lt;span&gt;एकड़&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;सज्जन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जिंदल&lt;/span&gt; &lt;span&gt;को&lt;/span&gt; &lt;span&gt;देने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तुली&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है&lt;/span&gt;. &lt;span&gt;दूसरी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;यह&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कि&lt;/span&gt; &lt;span&gt;वे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सेना&lt;/span&gt; &lt;span&gt;और&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पुलिस&lt;/span&gt; &lt;span&gt;की&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सुरक्षा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नहीं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;चाहते&lt;/span&gt; &lt;span&gt;क्योंकि&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सुरक्षा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मायने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अब&lt;/span&gt; &lt;span&gt;वे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जान&lt;/span&gt; &lt;span&gt;चुके&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हैं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;और&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सुरक्षा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;से&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उन्हें&lt;/span&gt; &lt;span&gt;खतरा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जिसके&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बाबत&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उन्होंने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सड़कें&lt;/span&gt; &lt;span&gt;काट&lt;/span&gt; &lt;span&gt;डाली&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;आने&lt;/span&gt;-&lt;span&gt;जाने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रास्ते&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बंद&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दिये&lt;/span&gt;. &lt;span&gt;कई&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बार&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अपनी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मांगों&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;साथ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;धरने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बैठे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कुल&lt;/span&gt; &lt;span&gt;छोटी&lt;/span&gt;-&lt;span&gt;बडी़&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मिलाकर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;१३&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मांगे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;थी&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;आस&lt;/span&gt;-&lt;span&gt;पास&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;गाँवों&lt;/span&gt; &lt;span&gt;को&lt;/span&gt; &lt;span&gt;एकता&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बद्ध&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रैली&lt;/span&gt; &lt;span&gt;निकाली&lt;/span&gt;. &lt;span&gt;रैली&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;गोली&lt;/span&gt; &lt;span&gt;चलायी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;गयी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;और&lt;/span&gt; &lt;span&gt;३&lt;/span&gt; &lt;span&gt;युवाओं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;को&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मार&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दिया&lt;/span&gt; &lt;span&gt;गया&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सभा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;की&lt;/span&gt; &lt;span&gt;या&lt;/span&gt; &lt;span&gt;एकता&lt;/span&gt; &lt;span&gt;की&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अगुवाई&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रहे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;थे&lt;/span&gt;. &lt;span&gt;मानों&lt;/span&gt; &lt;span&gt;३&lt;/span&gt; &lt;span&gt;गोलियों&lt;/span&gt; &lt;span&gt;से&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तीन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मांगे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पूरी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;की&lt;/span&gt; &lt;span&gt;गयी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हों&lt;/span&gt;. &lt;span&gt;उनकी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जायज़&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मांगों&lt;/span&gt; &lt;span&gt;को&lt;/span&gt; &lt;span&gt;देखते&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हुए&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सी&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;पी&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;एम&lt;/span&gt;. &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कई&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कार्यकर्ता&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उनके&lt;/span&gt; &lt;span&gt;साथ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जुड़&lt;/span&gt; &lt;span&gt;गये&lt;/span&gt;. &lt;span&gt;यह&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सब&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कुछ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ऎसा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;चल&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रहा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;था&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मानों&lt;/span&gt; &lt;span&gt;राज्य&lt;/span&gt; &lt;span&gt;में&lt;/span&gt; &lt;span&gt;एक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नया&lt;/span&gt; &lt;span&gt;राज्य&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कायम&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;गया&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हो&lt;/span&gt;. &lt;span&gt;फरवरी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;में&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आदिवासी&lt;/span&gt;-&lt;span&gt;ओ&lt;/span&gt;-&lt;span&gt;गैरआदिवासी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;एकता&lt;/span&gt; &lt;span&gt;समिति&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बनायी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;गयी&lt;/span&gt;. &lt;span&gt;इसके&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बनाये&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जाने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;क्या&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मायने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लगाये&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जायें&lt;/span&gt;? &lt;span&gt;कि&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अब&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आदिवासियों&lt;/span&gt; &lt;span&gt;और&lt;/span&gt; &lt;span&gt;गैर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आदिवासियों&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बीच&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कोई&lt;/span&gt; &lt;span&gt;एकता&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ही&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नहीं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;थी&lt;/span&gt;. &lt;span&gt;शायद&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हां&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;शायद&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नहीं&lt;/span&gt;. &lt;span&gt;यह&lt;/span&gt; &lt;span&gt;एक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;शांति&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अभियान&lt;/span&gt; &lt;span&gt;था&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ठीक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;वैसा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ही&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जैसा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सलवा&lt;/span&gt;-&lt;span&gt;जुडुम&lt;/span&gt;. &lt;span&gt;आदिवासी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;युवकों&lt;/span&gt; &lt;span&gt;को&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जान&lt;/span&gt; &lt;span&gt;से&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मारा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जाने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लगा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;और&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आदिवासियों&lt;/span&gt; &lt;span&gt;द्वारा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;इन्हें&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;इन्हीं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;छीने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हथियार&lt;/span&gt; &lt;span&gt;से&lt;/span&gt;. &lt;span&gt;यानि&lt;/span&gt; &lt;span&gt;यह&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अपने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;स्वरूप&lt;/span&gt; &lt;span&gt;में&lt;/span&gt; &lt;span&gt;एक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दूसरे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;को&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मारने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;की&lt;/span&gt; &lt;span&gt;एकता&lt;/span&gt; &lt;span&gt;की&lt;/span&gt; &lt;span&gt;समिति&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बनी&lt;/span&gt;. &lt;span&gt;मुर्दों&lt;/span&gt; &lt;span&gt;की&lt;/span&gt; &lt;span&gt;एकता&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;मरने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बाद&lt;/span&gt; &lt;span&gt;चुप&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रहने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;की&lt;/span&gt; &lt;span&gt;एकता&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;प्रतिरोध&lt;/span&gt; &lt;span&gt;में&lt;/span&gt; &lt;span&gt;खून&lt;/span&gt; &lt;span&gt;की&lt;/span&gt; &lt;span&gt;एकता&lt;/span&gt;. &lt;span&gt;आदिवासियों&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भूख&lt;/span&gt; &lt;span&gt;और&lt;/span&gt; &lt;span&gt;वंचना&lt;/span&gt; &lt;span&gt;से&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उठे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आक्रोश&lt;/span&gt; &lt;span&gt;की&lt;/span&gt; &lt;span&gt;एकता&lt;/span&gt; &lt;span&gt;को&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तोड़ने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लिये&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उनके&lt;/span&gt; &lt;span&gt;साथ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हमेशा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;इसी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तरह&lt;/span&gt; &lt;span&gt;की&lt;/span&gt; &lt;span&gt;एकता&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बनायी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;गयी&lt;/span&gt;.&lt;br /&gt;&lt;span&gt;लालगढ़&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अब&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अशांत&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;चुका&lt;/span&gt; &lt;span&gt;था&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उसे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;शांत&lt;/span&gt; &lt;span&gt;करने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;की&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जरूरत&lt;/span&gt; &lt;span&gt;थी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जिसका&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अर्थ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;था&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पुलिस&lt;/span&gt; &lt;span&gt;और&lt;/span&gt; &lt;span&gt;फौज&lt;/span&gt; &lt;span&gt;को&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दुबारा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तैनात&lt;/span&gt; &lt;span&gt;किया&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जाना&lt;/span&gt;. &lt;span&gt;क्योंकि&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हमारे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;देश&lt;/span&gt; &lt;span&gt;में&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अशांत&lt;/span&gt; &lt;span&gt;को&lt;/span&gt; &lt;span&gt;शांत&lt;/span&gt; &lt;span&gt;करने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;का&lt;/span&gt; &lt;span&gt;एक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मात्र&lt;/span&gt; &lt;span&gt;यही&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तरीका&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है&lt;/span&gt;. &lt;span&gt;यहाँ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;की&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भूख&lt;/span&gt; &lt;span&gt;की&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आग&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पुलिस&lt;/span&gt; &lt;span&gt;की&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तैनाती&lt;/span&gt; &lt;span&gt;से&lt;/span&gt; &lt;span&gt;शांत&lt;/span&gt; &lt;span&gt;होती&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है&lt;/span&gt;. &lt;span&gt;बूट&lt;/span&gt; &lt;span&gt;की&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आवाज़ों&lt;/span&gt; &lt;span&gt;से&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लोगों&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कान&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सहम&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जायें&lt;/span&gt; &lt;span&gt;और&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आवाज़ें&lt;/span&gt; &lt;span&gt;चुप&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जायें&lt;/span&gt;. &lt;span&gt;देश&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;२८&lt;/span&gt; &lt;span&gt;राज्यों&lt;/span&gt; &lt;span&gt;में&lt;/span&gt; &lt;span&gt;से&lt;/span&gt; &lt;span&gt;२४&lt;/span&gt; &lt;span&gt;राज्य&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ऎसे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ही&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हैं&lt;/span&gt;. &lt;span&gt;लालगढ़&lt;/span&gt; &lt;span&gt;में&lt;/span&gt; &lt;span&gt;फौज&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बुलायी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;गयी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अर्ध&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सैनिक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बल&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आये&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;पर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;घुसने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;में&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नाकामयाब&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रहे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लोगों&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;प्रतिरोध&lt;/span&gt; &lt;span&gt;किया&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आंसू&lt;/span&gt; &lt;span&gt;गैस&lt;/span&gt; &lt;span&gt;छोडी़&lt;/span&gt; &lt;span&gt;गयी&lt;/span&gt;. &lt;span&gt;लाठियां&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बरसायी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;गयी&lt;/span&gt;. &lt;span&gt;पुलिस&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अंदर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पहुंच&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;घरों&lt;/span&gt; &lt;span&gt;की&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तलाशी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;की&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;औरतों&lt;/span&gt; &lt;span&gt;को&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नंगा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;करके&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उनकी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तलाशी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ली&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रही&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है&lt;/span&gt;. &lt;span&gt;पर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;वह&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नहीं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मिल&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रहा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जिसे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पुलिस&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ढूढ़&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रही&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है&lt;/span&gt; &lt;span&gt;और&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मिल&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रहा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उसे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;देख&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नहीं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रही&lt;/span&gt;. &lt;span&gt;यह&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उनकी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भूख&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उनके&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नंगे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;होने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बाद&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उनके&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बदन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;चिपकी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रह&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जाती&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है&lt;/span&gt;. &lt;span&gt;अपनी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ज़मीन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;छीने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जाने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;प्रतिरोध&lt;/span&gt; &lt;span&gt;का&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हल&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अस्मत&lt;/span&gt; &lt;span&gt;का&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लूटा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जाना&lt;/span&gt; &lt;span&gt;या&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मौत&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;घाट&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उतार&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दिये&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जाना&lt;/span&gt;. &lt;span&gt;एक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तथाकथित&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अति&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सभ्य&lt;/span&gt; &lt;span&gt;समाज&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अपने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;निर्माण&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लिये&lt;/span&gt; &lt;span&gt;एक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पिछ्डे़&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कहे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जाने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;वाले&lt;/span&gt; &lt;span&gt;समाज&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;साथ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;यह&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सलूक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उस&lt;/span&gt; &lt;span&gt;समय&lt;/span&gt; &lt;span&gt;होता&lt;/span&gt; &lt;span&gt;देख&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रहा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जब&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दुनिया&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सबसे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बडे़&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लोकतंत्र&lt;/span&gt; &lt;span&gt;का&lt;/span&gt; &lt;span&gt;चुनाव&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हुए&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;माह&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नहीं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बीते&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हैं&lt;/span&gt;. &lt;span&gt;२०&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जून&lt;/span&gt; &lt;span&gt;को&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लालगढ़&lt;/span&gt; &lt;span&gt;में&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पुलिस&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कब्जा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जमाने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सिलसिले&lt;/span&gt; &lt;span&gt;में&lt;/span&gt; &lt;span&gt;५&lt;/span&gt; &lt;span&gt;और&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आदिवासियों&lt;/span&gt; &lt;span&gt;को&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मारा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;गया&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;यह&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ठीक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उस&lt;/span&gt; &lt;span&gt;समय&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हुआ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;होगा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जब&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आप&lt;/span&gt; &lt;span&gt;चाय&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रहे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;होंगे&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;किसी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दफ्तर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;की&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ए&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;सी&lt;/span&gt;. &lt;span&gt;में&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बैठे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रहे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;होंगे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;या&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जहाँ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रह&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;खबर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सुनी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हो&lt;/span&gt;. &lt;span&gt;क्या&lt;/span&gt; &lt;span&gt;थोडी़&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कम्पन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;शरीर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;में&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नहीं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हुई&lt;/span&gt;. &lt;span&gt;शायद&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सभ्य&lt;/span&gt; &lt;span&gt;समाज&lt;/span&gt; &lt;span&gt;का&lt;/span&gt; &lt;span&gt;निर्माण&lt;/span&gt; &lt;span&gt;यही&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है&lt;/span&gt; &lt;span&gt;संवेदनाओं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;का&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जाना&lt;/span&gt;.&lt;br /&gt;&lt;span&gt;ठीक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उसी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दिन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पश्चिम&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बंगाल&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मुख्यमंत्री&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बुद्धदेव&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भट्टाचार्य&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;प्रधानमंत्री&lt;/span&gt; &lt;span&gt;और&lt;/span&gt; &lt;span&gt;गृहमंत्री&lt;/span&gt; &lt;span&gt;से&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मिलकर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;यह&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बताया&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कि&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लालगढ़&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लोगों&lt;/span&gt; &lt;span&gt;को&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ममता&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बनर्जी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;व&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उनकी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पार्टी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;का&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सहयोग&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मिल&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रहा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जिसमे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;माओवादी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;शामिल&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हैं&lt;/span&gt;,&lt;span&gt;यह&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पहली&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बार&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नहीं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कहा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;गया&lt;/span&gt; &lt;span&gt;था&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बल्कि&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नंदीग्राम&lt;/span&gt; &lt;span&gt;से&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सिंगूर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कई&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बार&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कहा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;गया&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आश्चर्य&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कि&lt;/span&gt; &lt;span&gt;इसी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सहयोग&lt;/span&gt; &lt;span&gt;करने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;या&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सम्बन्ध&lt;/span&gt; &lt;span&gt;होने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आधार&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बिनायक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सेन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;को&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जेल&lt;/span&gt; &lt;span&gt;होती&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है&lt;/span&gt; &lt;span&gt;और&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तब&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कैद&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रखे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जाते&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हैं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जब&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;वे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कुछ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नहीं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;करने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लायक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बचते&lt;/span&gt; &lt;span&gt;यानि&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हृदय&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रोग&lt;/span&gt; &lt;span&gt;की&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अवस्था&lt;/span&gt; &lt;span&gt;में&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उन्हें&lt;/span&gt; &lt;span&gt;छोडा़&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जाता&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ममता&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बनर्जी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;को&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बुद्धदेव&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जेल&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नहीं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भेज&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सकते&lt;/span&gt; &lt;span&gt;क्योंकि&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ममता&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बनर्जी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बडे़&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लोकतंत्र&lt;/span&gt; &lt;span&gt;की&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बडी़&lt;/span&gt; &lt;span&gt;स्तम्भ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हैं&lt;/span&gt;.&lt;br /&gt;&lt;span&gt;उनके&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हाथ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;में&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बंदूक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;तो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;यह&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उनकी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;वीरता&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है&lt;/span&gt;.&lt;br /&gt;&lt;span&gt;लोगों&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हाथ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;में&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बंदूक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;यह&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उनका&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जुर्म&lt;/span&gt; &lt;span&gt;क्यों&lt;/span&gt;?&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3857696409871553743-7910643777815398704?l=dakhalkiduniya.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dakhalkiduniya.blogspot.com/feeds/7910643777815398704/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.blogger.com/comment.g?blogID=3857696409871553743&amp;postID=7910643777815398704' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3857696409871553743/posts/default/7910643777815398704'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3857696409871553743/posts/default/7910643777815398704'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dakhalkiduniya.blogspot.com/2009/06/blog-post_22.html' title='लालगढ़: एक छोटे लोकतंत्र का बडे़ लोकतंत्र के लिये खतरा'/><author><name>चन्द्रिका</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08498808385035641834</uri><email>chandrika.media@gmail.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' name='OpenSocialUserId' value='13859221743332310890'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_06z5ZQ7dCYo/Sj83di3lVkI/AAAAAAAAAmw/PWKN13nTciA/s72-c/lalgarh2.jpg' height='72' width='72'/><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3857696409871553743.post-2385638730528423020</id><published>2009-06-21T14:50:00.002+06:00</published><updated>2009-06-21T15:17:24.321+06:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='विकल्पहीन नहीं है दुनियाँ-'/><title type='text'>लालगढ़ आरपेशन या आदिवासी आपरेशन</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_06z5ZQ7dCYo/Sj31z68v0eI/AAAAAAAAAmg/nd1NIrqEZw8/s1600-h/untitled.bmp"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5349702204732199394" style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; WIDTH: 282px; CURSOR: hand; HEIGHT: 320px" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_06z5ZQ7dCYo/Sj31z68v0eI/AAAAAAAAAmg/nd1NIrqEZw8/s320/untitled.bmp" border="0" /&gt;&lt;/a&gt; लालगढ़ में संघर्ष चल रहा है बचे रहने का और उजाड़ दिये जाने का. पर लाल गढ़ के संथाली आदिवासियों का उजड़ना महज़ देश के सबसे बडे़ आदिवासी समाज के एक हिस्से का उजड़ना भर नहीं है.बल्कि यह संथाली समाज का अपने उस प्राचीन भूमि से उजाडा़ जाना है जहाँ वह पहली बार आकर बसा था और यहीं से पूरे देश में फैला था. देश में आज भी सबसे बडी़ संख्या संथाली आदिवासियों की है. तथाकथित सभ्य समाज के निर्माण व सालबोनी सेज परियोजना के निर्माण की प्रक्रिया में जुटे लोग जब आज इन्हें इनकी जमीन से विस्थापित करने पर आतुर हैं तो उसके खिलाफ इन आदिवासी महिला पुरूषों का लामबंद होकर विद्रोह करना लाज़मी है.&lt;br /&gt;अपने जंगल और जमीन को छीने जाने के खिलाफ आदिवासियों का यह पहला विद्रोह नहीं है. इसके पहले अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ बिरसा मुंडा , तेभागा, तेलंगाना आदिवासी विद्रोह की एक लंबी सूची है पर ये विद्रोह आदिवासियों द्वारा राज्य सत्ता हथियाने को लेकर कभी नहीं किये गये बल्कि इनका स्वरूप अपने जल, जंगल और जमीन को बचाने को लेकर ही रहा. पूरे देश में जंगल का एक लम्बा क्षेत्र है जहाँ आदिवासी समाज बिना किसी स्वास्थ, शिक्षा, बिजली के जी या मर रहा है. बारिस के दिनों में बाढ़ व मलेरिया से कितने आदिवासी मर जाते हैं&lt;br /&gt;हर साल लोग भुखमरी का शिकार होते हैं. ऎसे में वह अपने जरूरत की पूर्ति जंगल से ही बिना नुकसान पहुंचाये करता है. इनके सीधेपन का फायदा उठाकर इन्हे खरीदा बेंचा जाता है पर विकास की इस अंधी दौड़ में सरकार को इस बात की कोई परवाह नहीं है बल्कि जंगल इनके लिये उपनिवेश बन चुके हैं जहाँ किसी भी तरह का फरमान जारी करके आदिवासियों को उसे मानने के लिये बाध्य किया जाता है. तथाकथित सभ्य समाज की जरूरतें बढ़ रही हैं और वह जंगलों पर कब्जेदारी कर इन्हें बेदख़ल करना चाहता है. लालगढ़ का सालबोनी प्रोजेक्ट इसी का एक हिस्सा है. जिसमें जंगल की ५००० एकड़ जमीन को लिया जा रहा है जबकि वन प्राधिकरण नियम के तहत भी यह गैर कानूनी है . ५०० एकड़ जमीन जिंदल स्टील कम्पनी के मालिक द्वारा वहाँ के लोगों से औने-पौने दाम पर खरीदी जा चुकी है पर लोगों को इसकी आधी ही कीमत चुकायी जा रही है और आधी कीमत कम्पनी शेयर के रूप में देने की बात कहकर टाल दी गयी है. जबकि ४५०० एकड़ जमीन जिसे सरकार लेने पर तुली है लोग छोड़ना नहीं चाहते जिसको लेकर वहाँ के आदिवासी एक जुट हो गये हैं .अपने जंगल और जमीन को लेकर हुई एक जुटता व प्रतिरोध को ही माओवाद के रूप में या किसी आतंक के रूप में प्रचारित किया जा रहा है. क्योंकि सरकार की दमन नीति व सेना के सशस्त्र कार्यवाहियों से लड़ने के लिये वहाँ के आदिवासी भी हथियार उठा चुके हैं.&lt;br /&gt;दरअसल सरकार द्वारा जंगल के संसाधनों को पूंजीपतियों के हाँथों में सौंपे जाने पर हो रहे किसी भी प्रतिरोध के दमन का यह नायाब तरीका पिछले कई वर्षों से अपनाया जा रहा है कि वह जल, जंगल, जमीन से जुडे़ आदिवासी प्रतिरोध में माओवादियों का हाथ बताकर आदिवासियों या नागरिकों की हत्यायें व प्रताड़ना का लाइसेंस प्राप्त कर लेती है. ऎसी स्थिति में जंगल का एक बडा़ आदिवासी समाज माओवादी बनाया जा रहा है ताकि सरकार जंगल अधिग्रहण के खिलाफ होने वाले प्रतिरोध का दमन माओवाद के नाम पर आसानी से कर सके. 22 नवम्बर2008को बुद्धदेव भट्टाचार्य ने २४ परगना में भाषण देते हुए लालगढ़ में माओवादियों के होने की बात इसीलिये ही कही थी ताकि वे केन्द्र से ज्यादा अर्धसैनिक बल व विशेष रकम मांग सकें.&lt;br /&gt;आज जब इस बात का शोर मचाया जा रहा है कि लालगढ़ में माओवादियों का कब्जा हो चुका है तो लालगढ़ में लोगों द्वारा शस्त्र उठाने की पूरी प्रक्रिया पर हमे गौर करना होगा. आदिवासी जंगल की जमीन दिये जाने के खिलाफ थे इसके बावजूद रामविलास पासवान और बुद्धदेव भट्टाचार्य ने 2 नवम्बर 2008 को सालबोनी स्टील प्लांट का उद्घाटन किया जिसके पश्चात इनके काफिले पर हमला हुआ. इस हमले के फलस्वरूप लालगढ़ के आस-पास के तकरीबन ३५ गाँवों में पुलिस द्वारा लोगों को प्रताडि़त किया गया, उन्हें मारा पीटा गया व महिलाओं की आँख तक फोड़ दी गयी,परियोजना के खिलाफ गाँवों को एक जुट करने वाले युवाओं की हत्या तक कर दी गयी और यह सब माओवादियों का ठप्पा लगाकर किया गया. यदि अपने जमीन और जंगल को बचाने के लिये प्रतिरोध करना माओवाद है तो इतिहास का हर आदिवासी विद्रोह ऐसे ही अपने अस्तित्व की सुरक्षा के साथ हुआ है . जिन बिरसा मुंडा और दूसरे लड़ाकों को वर्तमान सरकार नायक के रूप में स्थापित करती है पर फर्क इतना जरूर है कि वह अंग्रेजी व सामंती सत्ता के खिलाफ था और यह वर्तमान लोकतांत्रिक कही जाने वाली व्यवस्था के खिलाफ है .&lt;br /&gt;इतने दमन के बावजूद आदिवासियों ने जो मांग रखी वे बहुत ही सामान्य थी. उनका कहना था कि पुलिस दमन को खत्म किया जाये, लोगों पर जो आरोप लगाये गये हैं वे वापस लिये जायें, जिन लोगों को गिरफ्तार किया गया है उन्हे रिहा किया जाय. साथ में उन स्कूल, हास्पिटल व पंचायतों को मुक्त किया जाए जिनमे अर्ध सैनिक बलों ने डेरा डाला हुआ है जो कि कलकत्ता हाई कोर्ट का भी आदेश था. जनदबावो के तहत सरकार ने यह बात मंजूर भी कर ली पर यह लोगों के लिये एक छलावा साबित हुआ. सरकार महज़ उनकी लामबंदी को कम करना चाहती थी. अंततः लोगों ने ७ जनवरी 2009 को सरकार के सामाजिक बहिष्कार यानि क्षेत्र में सरकार की किसी भी संस्था के प्रवेश को वर्जित करने का फैसला लिया, लोगों ने किसी भी तरह के कर व मालगुजारी देने से भी मना कर दिया है. यह सरकार के लिये एक भयावहस्थिति थी जिससे निपटने के लिये सरकार ने छ्त्तीसगढ़ में चल रहे सलवा-जुडुम के तर्ज पर जन प्रतिरोध कमेटी व आदिवासी ओ गैर आदिवासी एकता कमेटी का निर्माण किया गया जिसमें सी.पी.एम. व झारखण्ड मुक्ति मोर्चा के लोगों को शामिल किया गया है. ये सैकडो़ की संख्या में जाकर गाँवों को लूटते है व लोगों को मारते पीटते हैं .कारणवश लोगों का आक्रोश और भी उभर कर सामने आया है.यद्यपि सी.पी.एम. सरकार इस समस्या का राजनीतिक हल निकालने की बात कहती रही है पर राजनीतिक हल के तौर पर उसने सिर्फ दमन ही किया है ताकि वह लालगढ़ को भेद सके.&lt;br /&gt;लालगढ़ में जारी असंतोष संथाली समाज के वंचना की पीडा़ है जिसमे विकास के नाम पर हर बार उनका उजाडा़ जाना, उनकी जमीनों को पूजीपतियों के हाथ में बेचा जाना, जिसके बाद नदियों का नालों में बदल जाना तय है. क्योंकि जिस स्टील प्लांट को जिंदल यहाँ स्थापित करना चाहते हैं वह एक बडी़ परियोजना है जिसके शुरूआती दौर में ही ३५,००० करोड़ रूपये लगाये जा रहे हैं व २०२० तक एक करॊड़ मैट्रीक टन के उत्पादन का लक्ष्य रखा गया है जिससे आस-पास के तीन जिले व सुवर्ण रेखा नदी जो वहाँ के लोगों की जीवन रेखा भी है का प्रदूषित होना तय है. अतः यहाँके लोगों के पास सिवाय विरोध के कोई रास्ता नहीं बचता क्योकि सरकार इनकी उन मांगों को भी लागू नहीं कर पा रही है जो मूलभूत अधिकारों के तहत मिलनी चाहिये जिसमे रोजगार, संथाली भाषा और संस्कृति को बढा़वा दिया जाना, व बेहतर स्वास्थ, शिक्षा, व कृषि की सुविधा जैसी १३ मांगे शामिल हैं . पर इनकी मांगे लाठियों से पूरी की जा रही हैं. ऎसे में एक बडे़ क्षेत्र में विस्तृत संथाली आदिवासियों का एक जुट होकर प्रतिरोध करना दमित की एकता है.&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3857696409871553743-2385638730528423020?l=dakhalkiduniya.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dakhalkiduniya.blogspot.com/feeds/2385638730528423020/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.blogger.com/comment.g?blogID=3857696409871553743&amp;postID=2385638730528423020' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3857696409871553743/posts/default/2385638730528423020'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3857696409871553743/posts/default/2385638730528423020'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dakhalkiduniya.blogspot.com/2009/06/blog-post.html' title='लालगढ़ आरपेशन या आदिवासी आपरेशन'/><author><name>चन्द्रिका</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08498808385035641834</uri><email>chandrika.media@gmail.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' name='OpenSocialUserId' value='13859221743332310890'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_06z5ZQ7dCYo/Sj31z68v0eI/AAAAAAAAAmg/nd1NIrqEZw8/s72-c/untitled.bmp' height='72' width='72'/><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3857696409871553743.post-6571817310405712577</id><published>2009-05-29T10:13:00.002+06:00</published><updated>2009-05-29T11:24:24.196+06:00</updated><title type='text'>मुंबई के झोपड़ पट्टी से एक कहानी</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;em&gt;शिरीष खरे, मुंबई से&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;23 जनवरी 2009 की रात दुनिया के लिये भले एक सामान्य रात रही होगी लेकिन शांतिनगर, मानपूर खूर्द की नूरजहां शेख के लिए नहीं. आखिर इसी रात तो उनके सपनों का कत्ल हुआ था. अपनी सूनी आंखों से खाली जगह को घुरती हुई नूरजहां अभी जहां बैठी हैं, वहां 23 जनवरी से पहले तक 18 गुणा 24 फीट की झोपड़ी थी, जिसमें एक परदा लगा कर कुल दो परिवारों के तेरह लोग रहते थे.&lt;br /&gt;लेकिन एक लोकतांत्रिक देश की याद दिलाने वाले गणतंत्र दिवस के ठीक 3 दिन पहले ही सारे नियम कायदे ताक पर रख कर नूरजहां शेख की बरसों की जमा पूंजी माटी में मिला दी गयी. 26 जनवरी के 3 रोज पहले सरकारी बुलडोजर ने उनकी गृहस्थी को कुचल डाला. अपनी जीवन भर की कमाई को झटके में गंवाने वाली नूरजहां अकेली नहीं थीं. उस रात मानपुर खुर्द की करीब 1800 झुग्गियां उजड़ीं और 5000 लोगों की जमा-पूंजी माटी में मिल गई.अंबेडकरनगर, भीमनगर, बंजारवाड़ा, इंदिरानगर और शांतिनगर अब केवल नाम भर हैं, जहां कल तक जिंदगी सांस लेती थी. अब इन इलाकों में केवल अपने-अपने घरों की यादें भर शेष हैं, जिनके सहारे जाने कितने सपने देखे गये थे. आज हज़ारों की संख्या में लोग खुले आकाश के नीचे अपनी रात गुजार रहे हैं. यह बच्चों की परीक्षाओं के दिन हैं लेकिन शासन ने पानी के पाइप और बिजली के खम्बों तक को उखाड़ डाला. इस तरह आने वाले कल के कई सपनों की बत्तियां अभी से बुझा दी गईं. ताक पर कानूनप्रदेश का कानून कहता है कि 1995 से पहले की झुग्गियां नहीं तोड़ी जाए. अनपढ़ नूरजहां शेख के हाथों में अंग्रेजी का लिखा सरकारी सबूत था. उसे पढ़े-लिखे बाबूओं पर पूरा भरोसा भी था. लेकिन शासन ने बिना बताए ही उसके जैसी हजारों झुग्गियां गिरा दी. नूरजहां की पूरी जिदंगी मामूली जरूरतों को पूरा करने में ही गुजरी है. अपनी उम्र के 50 में से 27 साल उसने मुंबई में ही बिताए. वह अपने शौहर युसुफ शेख के साथ कलकत्ता से यहां आई थी. दोनों 9 सालों तक किराए के मकानों को बदल-बदल कर रहते रहे.नूरजहां अपने शौहर पर इस कदर निर्भर थीं कि उन्हें मकान का किराया तक मालूम नहीं रहता था. 1995 में युसुफ शेख को बंग्लादेशी होने के शक में गिरफ्तार किया गया. जांच के बाद वह भारतीय निकला. पुलिस ने अपनी रिपोर्ट में उसके इस बस्ती में रहने का उल्लेख किया. युसुफ शेख जरी कारखाने में काम करते हुए समय के पहले बूढ़ा हुआ और गुजर गया. तब नूरजहां की जिंदगी से किराए का मकान भी छिन गया. कुछ लोग समुद्र की इस दलदली जगह पर बसे थे. 18 साल पहले नूरजहां भी अपने 6 बच्चों के साथ यही आ गईं.&lt;br /&gt;इन टूटी झुग्गियों के आसपास मकानों के कई नक्शे दबे रह गए. फिलहाल सस्ती तस्वीरों में दर्ज बेशकीमती कारों वाली हसरतें भी हवा हो चुकी हैं. नूरजहां का पहला बेटा शादी करके अलग हुआ मगर दूसरा उसके साथ है. वह जरी का काम करता है और 1500 रूपए महीने में घर चलाने की भारी जिम्मेदारी निभाता है. उससे छोटी 2 बहिनों ने दसवीं तक पढ़कर छोड़ दिया. आर्थिक तंगी से जूझता नूरजहां का परिवार अब बेहतर कल की उम्मीद भूल बैठा है. मुश्किल भरे दिनउस रोज जब 1 बुलडोजर के साथ 10 कर्मचारी और 20 पुलिस वाले मीना विश्वकर्मा की झुग्गी तोड़ने आए तब उसका पति ओमप्रकाश विश्वकर्मा घर पर नहीं था. उस वक्त मीना सहित बस्ती की सारी औरतों को पार्क की तरफ खदेड़ा दिया गया. मीना ने कागज निकालकर बताना चाहा कि उसकी झुग्गी गैरकानूनी नहीं है. 2008 को दादर कोर्ट ने अपने फैसले में उसे 1994 से यहां का निवासी माना है. लेकिन वहां उसकी बात सुनने वाला कोई नहीं था.बसंती जैसे ही मां बनी, वैसे ही बस्ती टूटने लगी. उसके यहां बिस्तर, दरवाजा, अनाज के डब्बे और टीवी को तोड़ा गया. पीछे से पति हुकुम सिंह ने सामान निकाला लेकिन गर्म कपड़े और खिलौने यहां-वहां बिखर गए. अब बहुत सारे बच्चे खिलौने और किताबें ढ़ूढ़ रहे हैं. हुकुम सिंह सालों पहले आगरा से सपनों के शहर मुंबई आया था जहां 2005 में उसने बसंती से प्रेम-विवाह किया. अब जब उनके जीवन में सबसे सुंदर दिन आने थे, उसी समय जीवन के सबसे मुश्किल दिनों ने दरवाजे पर दस्तक दे दी. अब बसंती भी बाकी औरतों की तरह खुले आसमान में सोती हैं. ओस की बूदों से उसके बच्चे की तबीयत नाजुक है. उसे दोपहर की धूप भी सहन नहीं होती. इन टूटी झुग्गियों के आसपास मकानों के कई नक्शे दबे रह गए. फिलहाल सस्ती तस्वीरों में दर्ज बेशकीमती कारों वाली हसरतें भी हवा हो चुकी हैं. बस्ती के लोग याद करते हैं कि सरकारी तोड़फोड़ से पहले विधायक यूसुफ अब्राहीम ने इंदिरानगर मस्जिद में खड़े होकर कहा था कि आपकी झुग्गियां सलामत रहेंगी. लेकिन अतिक्रमण दस्ते ने इंदिरानगर की मस्जिद को तो तोड़ा ही बस्ती के कई मंदिरों को भी तोड़ा.किस्से सैकड़ों हैंबस्ती तोड़ने का यह अंदाज नया नही है. पहली बार 1993 में शासन ने करीब 500 झुग्गियां तोड़ने की बात मानी थी. मतलब 1995 के पहले यहां कम-से कम 500 परिवार तो थे ही. सूचना के अधिकार के तहत मिली जानकारी के मुताबिक 1993 से 2008 तक इस बस्ती को 119 बार तोड़ा गया. लेकिन पिछली कार्यवाहियों के मुकाबले इस कार्यवाही से पूरी बस्ती का वजूद हिला गया है.&lt;br /&gt;समुद्र से लगी भीमनगर की जमीन पर बरसों से बिल्डरों की नजर है. लोग बताते हैं कि 1999 के पहले यह जमीन समुद्र में थी जिसे स्थानीय लोगों ने मिट्टी डालकर रहने लायक बनाया. लेकिन 2001 में खालिद नाम के बिल्डर ने दावा किया कि यह जमीन जयसिंह ठक्कर से उसने खरीदी है. वह झुग्गी वालों को यह जमीन बाईज्जत खाली करने की सलाह भी देने लगा. इसी साल उसकी गाड़ी से एक बच्चे की मौत हुई और वह इस केस में उलझ गया. फिर 2008 में बालकृष्ण गावड़े नाम का एक और बिल्डर आया और दावा किया कि जयसिंह ठक्कर के बेटे से उसने यह जमीन खरीदी है. हालांकि मुंबई उपनगर जिला अधिकारी से मिले पत्र में यह जमीन महाराष्ट्र सरकार की संपत्ति के रुप में दर्ज है. ‘समता’ संस्था की संगीता कांबले बताती हैं- “ 1998 में इस बस्ती का रजिस्ट्रेशन हो चुका है. लेकिन वर्ष 2000 का सर्वे महज 2 दिनों में निपटा लिया गया. जबकि इस दौरान यहां के मजदूर काम पर गए थे और कई झुग्गियां खार में फंसे होने के कारण छोड़ दी गईं थीं. उपर से 2005 में आई मुंबई की बाढ़ इन झुग्गियों में रहने वालों के सारे कागजात बहा ले गई. फिर भी यहां के 75 फीसदी लोगों ने साल 2000 के पहले से रहने के सबूत इकट्ठा किए हैं. ऐसे परिवारों को उनकी झोपड़ियों का पट्टा मिलना चाहिए.”कब्जे की होड़“ घर बचाओ-घर बनाओ आंदोलन” ने ‘सूचना के अधिकार’ के तहत जो जानकारियां एकत्र की हैं, उसके अनुसार मुंबई में जगह-जगह बिल्डर और ठेकेदारों का कब्जा है. अट्रीया शापिंग माल महापालिका की जमीन पर बना है. यह 3 एकड़ जमीन 1885 बेघरों को घर और बच्चों को एक स्कूल देने के लिए आवंटित थी. इसी तर्ज पर हिरानंदानी गार्डन शहर में घोटाला का गार्डन बन चुका है. इस केस में बड़े व्यपारियों को 40 पैसे एकड़ की दर पर 230 एकड़ जमीन 80 साल के लिए लीज पर दी गई. ऐसा ही इकरारनामा ओशिवरा की 160 एकड़ जमीन के साथ भी हुआ. इसी तरह मुंबई सेन्ट्रल में बन रहा 60 मंजिला टावर देश का सबसे ऊंचा टावर होगा. लेकिन यहां की 12.2 मीटर जमीन डीपी मार्ग के लिए है. यह काम झोपड़पट्टी पुनर्वास योजना के तहत होना है. लेकिन टावर के बहाने गरीबों की करोड़ों रूपए की जमीन घेर ली गई है.&lt;br /&gt;मुंबई को सिंगापुर बनाने का जो सपना देखा जा रहा है, लेकिन शहर के मास्टर प्लान में करोड़ों कामगारों के सपनों को जगह नहीं मिली है.&lt;br /&gt;90 के दशक में व्यापारिक केन्द्र के रूप में बांद्रा-कुर्ला कांप्लेक्स तैयार हुआ था. यह मंगरू मार्शेस पर बनाया गया जो माहिम खाड़ी के पास इस नदी के मुंह पर फैला है. यहां 1992 से 1996 के बीच कई नियमों की अनदेखी करके 730 एकड़ जमीन हथियाई गई. आज काम्पलेक्स का कैंपस लाखों वर्ग फिट से अधिक जगह पर फैला हैं. इनमें कई प्राइवेट बैंक और शापिंग माल हैं. मलबार हिल की जो जगह महापालिका थोक बाजार के लिए थी, अब उसे भी छोटे व्यापारियों से छीन लिया गया है.पूरी व्यवस्था कई तरह के विरोधाभासों से भरी हुई है. मानपुर खुर्द जैसी झुग्गियों में रहने वालों को वोट देने का हक तो है लेकिन आवास में रहने का नहीं. मतलब हर पार्टी सत्ता तक पहुंचने के लिए इनका वोट तो चाहती है लेकिन उसके बदले जीने का मौका नहीं देना चाहती. लोग मानते हैं कि मुंबई को सिंगापुर बनाने का जो सपना देखा जा रहा है, वह मेहनजकश मजदूरों के बिना पूरा नहीं हो सकता. फिर भी शहर के मास्टर प्लान में करोड़ों कामगारों के सपनों को जगह नहीं मिली है. एक अघोषित एजेंडा यह है कि शहर की झोपड़पट्टियों को तोड़कर भव्य मॉल और कॉम्पलेक्स बनाए जाएं. लेकिन सवाल है कि इन इमारतों को बनाने वाले कहां जाए ? &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3857696409871553743-6571817310405712577?l=dakhalkiduniya.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dakhalkiduniya.blogspot.com/feeds/6571817310405712577/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.blogger.com/comment.g?blogID=3857696409871553743&amp;postID=6571817310405712577' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3857696409871553743/posts/default/6571817310405712577'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3857696409871553743/posts/default/6571817310405712577'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dakhalkiduniya.blogspot.com/2009/05/blog-post_29.html' title='मुंबई के झोपड़ पट्टी से एक कहानी'/><author><name>चन्द्रिका</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08498808385035641834</uri><email>chandrika.media@gmail.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' name='OpenSocialUserId' value='13859221743332310890'/></author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3857696409871553743.post-4954659891591546042</id><published>2009-05-26T10:33:00.004+06:00</published><updated>2009-05-26T10:51:09.422+06:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मानवाधिकार:-naxalvad'/><title type='text'>जन संघर्षों की जीतः</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_06z5ZQ7dCYo/Shtx-vdRGSI/AAAAAAAAAmA/2DbszqdcPog/s1600-h/images1.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5339987105882904866" style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; WIDTH: 198px; CURSOR: hand; HEIGHT: 173px" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_06z5ZQ7dCYo/Shtx-vdRGSI/AAAAAAAAAmA/2DbszqdcPog/s320/images1.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt; &lt;strong&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;&lt;span class=""&gt;सुप्रीम&lt;/span&gt; कोर्ट ने छत्तीसगढ़ की जेल में बंद नागरिक अधिकारों के लिए काम करने वाले डॉ विनायक सेन को सोमवार को ज़मानत दे दी है.&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;न्यायाधीश मार्कण्डेय काटजू और दीपक वर्मा की खंडपीठ ने अपने फ़ैसले में कहा कि डॉ सेन को निजी मुचलके पर स्थानीय अदालत से ज़मानत दे दी जाए.&lt;br /&gt;डॉ सेन पिछले दो वर्षों से छत्तीसगढ़ की जेल में बंद हैं. राज्य सरकार का आरोप है कि उन्होंने राज्य में सक्रिय माओवादियों की मदद की है और उनके समर्थक रहे हैं.&lt;br /&gt;पर डॉक्टर बिनायक शुरु से राज्य सरकार के आरोपों का खंडन करते रहे हैं और कहते रहे हैं कि वो नक्सलियों का साथ नहीं देते लेकिन वो साथ ही राज्य सरकार की ज्यादतियों का भी विरोध करते रहे हैं.&lt;br /&gt;बिनायक सेन की ज़मानत के बारे में जानकारी देते हुए सामाजिक कार्यकर्ता कविता श्रीवास्तव ने बीबीसी संवाददाता पाणिनी आनंद को बताया, "बिनायक को ज़मानत की ख़बर मानवाधिकारों के लिए लड़ाई कर रहे लोगों के लिए इस मामले में पहली जीत है. सोमवार को सुप्रीम कोर्ट से आदेश मिला है जिसे आज ही एक कार्यकर्ता के हाथों रायपुर भेजा जा रहा है. मंगलवार को इस आदेश के आधार पर बिनायक रिहा किए जा सकते हैं."&lt;br /&gt;उनकी बेटी अपराजिता सेन ने बीबीसी को बताया, "मेरे लिए और पूरे परिवार के लिए आज का दिन एक भावुक दिन है. दो वर्षों से बिना किसी अपराध के मेरे पिताजी हिरासत में रहे. अब मेरे परिवार को एकसाथ मिलने का मौका मिला है. मैं जल्द से जल्द उनसे मिलना चाहूंगी."&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;बिनायक का व्यक्तित्व&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;पेशे से चिकित्सक डॉ बिनायक सेन छात्र जीवन से ही राजनीति में रुचि लेते रहे हैं. उन्होंने छत्तीसगढ़ में समाजसेवा की शुरुआत सुपरिचित श्रमिक नेता शंकर गुहा नियोगी के साथ की और श्रमिकों के लिए बनाए गए शहीद अस्पताल में अपनी सेवाएँ देने लगे.&lt;br /&gt;इसके बाद वे छत्तीसगढ़ के विभिन्न ज़िलों में लोगों के लिए सस्ती चिकित्सा सुविधाएँ उपलब्ध करवाने के उपाय तलाश करने के लिए काम करते रहे.&lt;br /&gt;डॉ बिनायक सेन सामाजिक स्वास्थ्य कार्यकर्ता तैयार करने के लिए बनी छत्तीसगढ़ सरकार की एक सलाहकार समिति के सदस्य रहे और उनसे जुड़े लोगों का कहना है कि डॉ सेन के सुझावों के आधार पर सरकार ने ‘मितानिन’ नाम से एक कार्यक्रम शुरु किया.&lt;br /&gt;इस कार्यक्रम के तहत छत्तीसगढ़ में महिला स्वास्थ्य कार्यकर्ता तैयार की जा रहीं हैं.&lt;br /&gt;स्वास्थ्य के क्षेत्र में उनके योगदान को उनके कॉलेज क्रिस्चन मेडिकल कॉलेज, वेल्लोर ने भी सराहा और पॉल हैरिसन अवॉर्ड दिया और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वास्थ्य और मानवाधिकार के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए जोनाथन मैन सम्मान दिया गया.&lt;br /&gt;डॉ बिनायक सेन मानवाधिकार संगठन पीयूसीएल की छत्तीसगढ़ शाखा के उपाध्यक्ष भी हैं.&lt;br /&gt;इस संस्था के साथ काम करते हुए उन्होंने छत्तीसगढ़ में भूख से मौत और कुपोषण जैसे मुद्दों को उठाया और कई ग़ैर सरकारी जाँच दलों के सदस्य रहे.&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;नक्सली आंदोलन और बिनायक&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;उन्होंने अक्सर सरकार के लिए असुविधाजनक सवाल खड़े किए और नक्सली आंदोलन के ख़िलाफ़ चल रहे सलमा जुड़ुम की विसंगतियों पर भी गंभीर सवाल उठाए.&lt;br /&gt;सलवा जुड़ुम के चलते आदिवासियों को हो रही कथित परेशानियों को स्थानीय और राष्ट्रीय मीडिया तक पहुँचाने में भी उनकी अहम भूमिका रही.&lt;br /&gt;छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित इलाक़े बस्तर में नक्सलवाद के ख़िलाफ़ चल रहे सलवा जुड़ुम को सरकार स्वस्फ़ूर्त जनांदोलन कहती है जबकि इसके विरोधी इसे सरकारी सहायता से चल रहा कार्यक्रम कहते हैं. इस कार्यक्रम को विपक्षी पार्टी कांग्रेस का भी पूरा समर्थन प्राप्त है.&lt;br /&gt;छत्तीसगढ़ की भारतीय जनता पार्टी सरकार ने 2005 में जब छत्तीसगढ़ विशेष जनसुरक्षा अधिनियम लागू करने का फ़ैसला किया तो उसका मुखर विरोध करने वालों में डॉ बिनायक सेन भी थे.&lt;br /&gt;उन्होंने आशंका जताई थी कि इस क़ानून की आड़ में सामाजिक कार्यकर्ताओं और पत्रकारों को परेशानी का सामना करना पड़ सकता है.&lt;br /&gt;उनकी आशंका सही साबित हुई और इसी क़ानून के तहत उन्हें 14 मई 2007 को गिरफ़्तार कर लिया गया था .&lt;br /&gt;&lt;em&gt;बीबीसी हिन्दी से साभार &lt;/em&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3857696409871553743-4954659891591546042?l=dakhalkiduniya.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dakhalkiduniya.blogspot.com/feeds/4954659891591546042/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.blogger.com/comment.g?blogID=3857696409871553743&amp;postID=4954659891591546042' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3857696409871553743/posts/default/4954659891591546042'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3857696409871553743/posts/default/4954659891591546042'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dakhalkiduniya.blogspot.com/2009/05/blog-post_26.html' title='जन संघर्षों की जीतः'/><author><name>चन्द्रिका</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08498808385035641834</uri><email>chandrika.media@gmail.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' name='OpenSocialUserId' value='13859221743332310890'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_06z5ZQ7dCYo/Shtx-vdRGSI/AAAAAAAAAmA/2DbszqdcPog/s72-c/images1.jpg' height='72' width='72'/><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3857696409871553743.post-250312162892862953</id><published>2009-05-11T12:37:00.002+06:00</published><updated>2009-05-11T14:46:36.182+06:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='बिनायक सेन'/><title type='text'>भारतीय पुलिस और डॉ विनायक सेन के जीवन पर खतरा</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;यह पत्र डॉ विनायक सेन की पत्नी इलीना सेन द्वारा 22 अप्रैल, 2009 को भेजा गया है। &lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;&lt;span style="font-size:+0;"&gt;प्यारे&lt;/span&gt; साथियो,&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:+0;"&gt;मैं&lt;/span&gt; कुछ &lt;span style="font-size:+0;"&gt;बे&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_06z5ZQ7dCYo/SgfhHl9eo2I/AAAAAAAAAlw/W1bF0KsApQU/s1600-h/ilina.jpg"&gt;&lt;img style="MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 113px; FLOAT: left; HEIGHT: 179px; CURSOR: hand" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5334479804208948066" border="0" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_06z5ZQ7dCYo/SgfhHl9eo2I/AAAAAAAAAlw/W1bF0KsApQU/s320/ilina.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;हद&lt;/span&gt; पीडाजनक अनुभवों को यहां आपके साथ बांट रही &lt;span style="font-size:+0;"&gt;हूं।&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_06z5ZQ7dCYo/Sgff8JA2AfI/AAAAAAAAAlo/gWA5ciYHKqc/s1600-h/binayak.jpg"&gt;&lt;img style="MARGIN: 0px 0px 10px 10px; WIDTH: 153px; FLOAT: right; HEIGHT: 247px; CURSOR: hand" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5334478507948245490" border="0" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_06z5ZQ7dCYo/Sgff8JA2AfI/AAAAAAAAAlo/gWA5ciYHKqc/s320/binayak.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/span&gt; हमारे पास इसके स्पष्ट &lt;span style="font-size:0;"&gt;प्रमाण&lt;/span&gt; हैं कि छत्तीसगढ पुलिस विनायक सेन की स्वास्थ्य की देखभाल की जरूरतों में सक्रिय हस्तक्षेप कर रही है. मैं तथ्यों को आपके सामने रख रही हूं.कई वर्षों से हाइपरटेंसिव के मरीज रहे विनायक रायपुर में एकमात्र कार्डियोलॉजी में डीएम डॉक्टर आशीष मलहोत्रा, जो निजी तौर पर चिकित्सा कर रहे हैं, के यहां कार्डियाक एसेसमेंट टेस्ट के दौरान एंजाइना से ग्रस्त पाये गये. वे 2007 में और उसके बाद अपने डॉक्टर द्वारा बतायी गयी दवाएं ले रहे थे. जेल में 2008 के दिसंबर और इस वर्ष जनवरी-फरवरी में कभी-कभी व्यायाम के बाद उन्हें सीने में और बायें हाथ में झुनझुनी दर्द की शिकायत हुई. उन्होंने जेल अधिकारियों को इसकी सूचना दी और जब इस बारे में कुछ भी ठोस नहीं किया गया (जेल अस्पताल में सुविधाएं नहीं हैं) उन्होंने अदालत को इसकी सूचना दी. उनकी ओर से 17 फरवरी, 2009 को एक आवेदन इस आग्रह के साथ अदालत में दाखिल किया गया कि उन्हें अपनी पसंद की सुविधाओंवाले अस्पताल में-सीएमसी, वेल्लोर को तरजीह देते हुए-इलाज कराने की इजाजत जेल अधिनियम-1894 की धारा 39-ए के तहत दी जाये, जो जेल अधीक्षक को कैदी अथवा उसके परिवार द्वारा बांड भरे जाने और अधीक्षक द्वारा रखी गयी शर्तों की बाध्यता के साथ उन्हें अपनी पसंद के इलाज की अनुमति देने में सक्षम बनाता है. 20 फरवरी, 2009 को जज ( इस मामले को देख रहे 11वें अतिरिक्त जिला व सत्र न्यायाधीश बीएस सलूजा) ने जेल अधिकारियों को विनायक सेन के हृदय की स्थिति के बारे में मेडिकल बोर्ड की राय हासिल करने का आदेश दिया, ताकि विनायक के आवेदन पर सही निर्णय लिया जा सके.विनायक 20 फरवरी, 2009 और 17 मार्च, 2009 के बीच कभी रायपुर जिला अस्पताल ले जाये गये, जहां उन्हें देखनेवाले डॉक्टरों ने इसीजी और इकोकार्डियोग्राफ की सलाह दी.17 मार्च को विनायक ने अदालत से शिकायत की कि उनके इलाज के आग्रह पर कोई कार्रवाई नहीं की गयी है और यह कहते हुए वे थोडे भावुक हो गये कि उन्हें लगता है कि कोर्ट के लिए उनके जीवित रहने या मर जाने का कोई अर्थ नहीं है. जज भी समान रूप से विचलित थे और मैं सबूतों के रखे जाने और आरोपित के वापस जेल ले जाये जाने के बाद उनसे निजी तौर पर मिली ताकि मैं उन्हें समझा सकूं कि जितना रेकार्ड किया गया है, विनायक की स्थिति उससे कहीं अधिक की मांग करती है. जज नरम दिखे और 18 मार्च को विनायक से अदालत में पूछा कि वे रायपुर में किस डॉक्टर से दिखाना चाहेंगे, जो यह तय करेगा कि उन्हें वेल्लोर के लिए भेजे जाने की जरूरत है या नहीं और इस पर विनायक द्वारा डॉ आशीष मलहोत्रा का नाम लिये जाने के बाद उन्होंने जेल अधिकारियों को आदेश दिया कि वे विनायक को डॉ मलहोत्रा को दिखायें ताकि यह जाना जा सके कि उन्हें आगे के इलाज के लिए रेफर करने की जरूरत है या नहीं.विनायक 25 मार्च को डॉ आशीष मलहोत्रा को दिखाये गये. अदालत के 18 मार्च के आदेश के आधार पर जेल अधीक्षक ने पुलिस से आग्रह किया कि वह विनायक को दिखाने ले जाने के लिए सुरक्षा गार्ड मुहैया कराये. इसके बाद सशस्त्र पुलिस बल से भरी एक बस विनायक को डॉ मलहोत्रा से दिखाने सुबह 10 बजे के करीब ले गयी और मुझे डॉ मलहोत्रा के यहां से पुरानी रिर्पोंटों के लिए 10.30 में फोन आया. मैंने ऐसा किया और अधिकतर कंसल्टेशन के दौरान मौजूद रही. जेल अधीक्षक के आग्रहवाले पत्र कि वे सीएमसी, वेल्लोर रेफर किया जाने, इसीजी, इकोकार्डियोग्राफ और ट्रेडमिल टेस्ट की आवश्यकता पर स्पष्ट राय दें, वे इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि विनायक को कोरोनरी आर्टरी डिजीज (सीएडी) है और उन्हें एंजियोग.्राफी और आगे की जांच के लिए वीएमसी, वेल्लोर रेफर कर दिया ताकि एंजियोप्लास्टी/कोरोनरी आर्टरी बाइपास सर्जरी हो सके. मैंने प्रिस्किप्शन की फोटो प्रति अपने रिकार्ड के लिए रख ली, क्योंकि मुझसे पूरी प्रक्रिया के लिए भुगतान करने को कहा गया.मैं विनायक से 26 मार्च को जेल में मिली और दक्षिण भारत में यात्रा के दौरान सुविधाओं पर बात की. मुझे झटका लगा जब अधीक्षक ने कहा कि विनायक की जांच और इलाज वेल्लोर में नहीं, रायपुर में होगा. किसी गलती को महसूस करते हुए मैंने सूचना के अधिकार के तहत एक आवेदन किया कि मुझे जेल और डॉक्टरों के बीच विनायक सेन के इलाज के संदर्भ में हुए पत्राचारों को दिखाय जाये. ये मेरे हाथ में आये अंतिम दस्तावेज हैं.इलाज की कहानी के अंत पर आने से पहले मैं यह बताना चाहूंगी कि जेल ने 31 मार्च को विनायक को रायपुर में एस्कॉटर्स हॉस्पिटल ले जाने की कोशिश की और मेरी पिछली मुलाकात में हुई बातों के अनुसार विनायक ने यह कहते हुए कि, जैसा कि जेल अधीक्षक का भी निर्देश है, वे छत्तीसगढ में कहीं भी इलाज कराने को इच्छुक नहीं हैं क्योंकि इससे उनका जीवन खतरे में पड जायेगा, लिखित तौर पर वहां जाने से इनकार कर दिया. उनका यह जवाब एक टिप्पणी के साथ 31 मार्च को अदालत में आगे के निर्देश के लिए प्रस्तुत किया गया. अदालत ने लोक अभियोजक को इसे भेजते हुए सात दिनों में जवाब देने को कहा. मेरी जानकारी में अब तक ऐसा कोई जवाब नहीं दाखिल किया गया है. विनायक ने डॉ मलहोत्रा द्वारा लिखी गयी दवा (रींीर्ीिंर ीींरींळ)ि लेना शुरू कर दिया और कुछ लाक्षणिक राहत की सूचना दी.आरटीआइ के नतीजों पर आते हैं. मुझे अब डॉ मलहोत्रा का 25 मार्च का मूल रेफरल लेटर मिला है. लेकिन जेल अधीक्षक के नाम उनके सवाल को उद्धृत करता 26 मार्च का एक दूसरा पत्र भी था, जिसमें उन्होंने राय दी है कि एंजियोग्राफी की सुविधाएं छत्तीसगढ में एस्कॉटर्स, अपोलो, भिलाई मुख्य अस्पताल, रामकृष्णा अस्पताल और दो अन्य जगहों पर है. उन्होंने यह भी लिखा है कि उन्होंने डॉ सेन को वेल्लोर इसलिए रेफर किया क्योंकि पत्र उनसे ऐसा करने के लिए कहता था. इससे जुडे सवाल ये हैं : डॉ मलहोत्रा के पास दूसरी बार पत्र क्यों भेजा गया÷ यदि जेल अधीक्षक ने ऐसा पत्र भेजा तो किसने उन्हें ऐसा करने पर मजबूर किया÷ यह पूरी तरह अदालत की अवहेलना है. डॉ मलहोत्रा से कोर्ट ने यह जानना चाहा था कि वेल्लोर भेजे जाने की जरूरत है या नहीं, इस पर अपनी राय जाहिर करें. अदालत ने डॉ मलहोत्रा से छत्तीसगढ में मेडिकल सुविधाओं की व्यापकता के बारे में नहीं पूछा था.डॉ मलहोत्रा बेशक दबाव में थे, जब उन्होंने कहा कि उन्होंने विनायक को वेल्लोर रेफर किया था, क्योंकि पत्र उन्हें ऐसा करने को कहता था. किसी मामले में अपने मरीज के साथ हुए या नहीं हुए उनके संवाद विशेषाधिकार प्राप्त सूचना माने जाते हैं.यदि एक डॉक्टर पब्लिक सेक्टर का नहीं है, इस हद तक डराया जा सकता है, जो एस्कॉटर्स, अपोलो आदि के डॉक्टरों को भी कहा जा सकता है, जो कि मेडिकल कॉलेज में स्थापित निजी मेडिकल संस्थान हैं (पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप के बडे उदाहरण, जिनमें सभी मानव संसाधन सार्वजनिक सेक्टर के होते हैं लेकिन ब्रांड नेम और आगे के लिए रेफरल विकल्प निजी होते हैं).इन हालात में विनायक बिल्कुल सही हैं कि उनका जीवन छत्तीसगढ के किसी सरकारी नियंत्रणवाले अस्पताल में खतरे मे पड सकता है.दरअसल मैं अब चिंतित हूं कि पुलिस/अभियोजक का प्लान ए (विनायक को बदनाम करो और दोषी साबित करो) संकेत दे रहा है कि वे अब प्लान बी (छत्तीसगढ में किसी अस्पताल में इलाज के दौरान किसी से कह कर-जैसे कुछ बूंदों के साथ हवा इंजेक्ट कर के- उनकी हत्या कर दो) लागू करने की कोशिश कर रहे हैं.मैं सभी साथियों से अपील करना चाहूंगी कि विनायक की शारीरिक सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिए इस सामग्री का प्रकाशन करें, इसके बारे में लिखें, उच्च न्यायालयों और राजनेताओं से अपील करें. यह बहुत जरूरी है.मैं यह कहते हुए अंत करना चाहती हूं कि जिसकी हम मांग कर रहे हैं, पसंद के अस्पताल में इलाज का-वह भारतीय न्यायिक इतिहास के लिए अनजान नहीं है. दरअसल रायपुर सेंट्रल जेल से ही हत्या के आरोप में जेल में बंद शिवसेना नेता धनंजय सिंह परिहार को सरकारी खर्च पर केइएम अस्पताल, मुंबई, शंकर नेत्रालय, चेन्नई और तीन दूसरे अस्पतालों में 2003 में इलाज के लिए ले जाया गया था. पुलिस विनायक सेन को आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बडे खतरे के रूप में चित्रित कर रही है. क्या हम उसे ऐसा करने देने जा रहे हैं÷ &lt;/span&gt;&lt;span style="color:#cc33cc;"&gt;&lt;em&gt;&lt;strong&gt;इलीना&lt;/strong&gt;&lt;/em&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="color:#663333;"&gt;अंगरेजी से अनुवाद : रेयाज उल हक मूलतः मंथली रिव्यू की वेबसाइट पर&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3857696409871553743-250312162892862953?l=dakhalkiduniya.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dakhalkiduniya.blogspot.com/feeds/250312162892862953/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.blogger.com/comment.g?blogID=3857696409871553743&amp;postID=250312162892862953' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3857696409871553743/posts/default/250312162892862953'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3857696409871553743/posts/default/250312162892862953'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dakhalkiduniya.blogspot.com/2009/05/blog-post.html' title='भारतीय पुलिस और डॉ विनायक सेन के जीवन पर खतरा'/><author><name>चन्द्रिका</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08498808385035641834</uri><email>chandrika.media@gmail.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' name='OpenSocialUserId' value='13859221743332310890'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_06z5ZQ7dCYo/SgfhHl9eo2I/AAAAAAAAAlw/W1bF0KsApQU/s72-c/ilina.jpg' height='72' width='72'/><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3857696409871553743.post-5944435169560896653</id><published>2009-04-23T11:27:00.002+06:00</published><updated>2009-05-17T19:27:31.134+06:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='naxal'/><title type='text'>राजनीतिक अंधेरे में नक्सली हिंसा के मायने</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;चुनाव के पहले चरण में बैलेट पर बुलेट दाग कर नक्सलियों ने अपनी पांच साल पहले की उस सोच को ही मूर्त रुप देना शुरु किया है, जिसे एमसीसी और पीडब्लूजी ने मिलकर पाला था। ठीक पांच साल पहले 2004 में बिहार-झारखंड में सक्रिय माओवादी कम्युनिस्ट सेंटर यानी एमसीसी और आंध्रप्रदेश से लेकर बस्तर तक में सक्रिय पीपुल्सवार ग्रुप यानी पीडब्ल्युजी एक हुये थे। उस वक्त नक्सली संगठनों के अंदर पीडब्ल्यूजी की पहचान हथियारबंद संघर्ष के लिये मजबूत ट्रेनिंग दस्ते का होना था तो एमसीसी की पहचान प्रभावित इलाकों में लोगो को सामूहिक तौर पर जोड़ कर किसी भी हमले को अंजाम देना था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन, 2004 में जब दोनों संगठन एक हुये और सीपीआई माओवादी का गठन किया तो पहला सवाल दोनों के बीच इसी बात को लेकर उठा कि संसदीय राजनीति के चुनाव में माओवादियों की पहल का तरीका इस तरह का होना चाहिये, जिससे आर्म्स स्ट्रगल में बहुसंख्यक लोगों की भागेदारी नजर आये। सांगठनिक तौर पर संघर्ष के नक्सली तरीकों में आम लोगो की गोलबंदी को एमसीसी ने बखूबी अंजाम देना जहानाबाद जेल ब्रेक से ही शुरु किया । जेल ब्रेक को सफल प्रयोग मान कर माओवादियो ने बीते पांच साल में जो भी प्रयोग किये, उसमें आंध्र के नक्सलियों ने अगर उपरी कमान संभाली तो बिहार झारखंड के नक्सलियों ने जमीनी कमान संभाली ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पहले चरण के मतदान के वक्त माओवादियों की यही रणनीति सामने भी आयी । लेकिन माओवादियों की सोच को सिर्फ चुनावी हिंसा से जोडकर देखना भूल होगी । हकीकत में झारखंड, बिहार, उड़ीसा, छत्तीसगढ और महाराष्ट्र के जिन इलाकों में नक्सली हिंसा हुई हैं, वहां की सामाजिक आर्थिक स्थिति के उपर पहली बार राजनीतिक हालात हावी हुये है। यानी पहले नक्सल प्रभावित इलाको में बहस की गुंजाइश विकास को लेकर होती रही। जिसमें रोजगार से लेकर न्यूनतम जरुरतों का सवाल माओवादी उठाते रहे। नक्सली संगठन पीपुल्सवार ने हमेशा इसी नजरिये को राजनीतिक आधार भी बनाया। जिस वजह से राष्ट्रीय राजनीति में हमेशा नक्सली संघर्ष को सामाजिक-आर्थिक समस्या के ही इर्द-गिर्द रखा गया। लेकिन बीते पांच साल में सीपीआई माओवादी ने सामाजिक-आर्थिक मुद्दों से इतर राजनीतिक तौर पर ही अपने प्रभावित इलाकों में हर कार्रवाई शुरु की। जिसका असर आंध्र प्रदेश के तेलागंना, महाराष्ट्र के विदर्भ और छत्तीसगढ के बस्तर से लेकर मध्यप्रदेश, उडीसा, झारखंड बिहार और पश्चिमी बंगाल के हर उस मुद्दे में नजर आया जो राजनीतिक दलों को प्रभावित कर रहा था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तेलांगना में माओवादियों ने शुरु से ही इस प्रचार को आगे बढाया कि वह किसी राजनीतिक दल के साथ नहीं है। और तेलागंना राष्ट्रवादी पार्टी की राजनीति उनकी सोच से अलग है। इस थ्योरी ने माओवादियो की राजनीतिक जमीन झटके में चन्द्रशेखर से अलग की और वायएसआर रेड्डी को भी चेताया कि वह एनटीआर की बोली अन्ना या बडे भाई वाली ना बोले। वहीं, विदर्भ के चन्द्रपुर और गढ़चिरोली में किसानों की आत्महत्या से लेकर उघोगपतियो के मुनाफे को भी उस राजनीति से जोड़ा, जहां सवाल सामाजिक-आर्थिक आधार पर रखकर पिछड़े आदिवासियों का आंकलन ना हो, बल्कि राजनीतिक दलों की राजनीतिक महत्वाकांक्षा का विद्रूप चेहरा ही उभरे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसलिये कांग्रेस और बीजेपी की नीतियों के जरीये उनके नेताओं के लाभ का लेखा-जोखा भी इन इलाको में रखा गया। कुछ उसी तर्ज पर छत्तीसगढ में भी माओवादियों की पहल राजनीतिक तौर पर ही हुई, जिसके एवज में सलमा जुडुम को राज्य सरकार ने खड़ा किया। लेकिन माओवादियों ने सलवा-जुडुम के सामानातंर उस राजनीतिक लाभ को इन इलाकों में उभारना शुरु किया जो प्रकृतिक संपदा को निचोड़ कर बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हाथ कौडियो के भाव जा रहा है। इसी आधार का असर उडीसा में नाल्को के अधिकारियो पर हमले में नजर आया । जबकि झारखंड और बिहार में सीधे राजनेताओ पर निशाना साध कर माओवादियों ने राजनीतिक संदेश देने की ही पहल को आगे बढाया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;असल में माओवादियों की नयी थ्योरी कहीं ज्यादा राजनीतिक चेतावनी वाली है । खासकर संसदीय राजनीति के उस तंत्र को वह सीधे चेतावनी देने की स्थिति में खुद को लाना चाहती है, जो अभी तक विकास के अंतर्विरोध के मद्देनजर ही पिछड़े इलाकों में सक्रिय माओवादियो का आईना देश को दिखाती रही है । एसइजेड यानी स्पेशल इकनॉमी जोन की अधिकतर योजनाएं उसी रेड कारिडोर में हैं, जहा माओवादी सक्रिय हैं । लेकिन पहली बार एसईजेड का विरोध सामाजिक-आर्थिक तौर पर करने की जगह माओवादियों ने उसे उसी राजनीति से जोड़ा, जिसकी आर्थिक नीतियों को लेकर आम शहरी जनता में भी सवाल उठ रहे हैं। नंदीग्राम और सिंगुर इस मायने में पारदर्शी राजनीति का प्रतीक है । जहां माओवादियो ने वाम राजनीति के सामानातंर उस प्रतिक्रियावादी राजनीति को आगे बढाया, जिसने वामपंथियों को सत्ता के लिये विचारधारा से उतरते देखा। बंगाल में वाममोर्चा का यह बयान दुरस्त है कि ममता के पीछे माओवादियो का राजनीतिक संघर्ष काम कर रहा है। लेकिन इसका यह भी मतलब नहीं है कि ममता की राजनीति उसी वाम राजनीति का विकल्प है। हकीकत में पहली बार माओवादी राजनीतिक तौर पर उस सोच को खारिज करना चाहते हैं जिसके जरीये यह सवाल खड़ा होता है कि सत्ता अगर बंदूक की नली से नहीं निकलती तो माओवाद की थ्योरी संसदीय राजनीति में सिवाय हिंसा के क्या मायने रखती है। यह सवाल माओवाद के सामने इसलिये भी बड़ा है क्योकि पहली बार केन्द्र सरकार ने नक्सल हिंसा को आंतकवाद सरीखा माना है। जिसे उन्हीं वामंपथियों ने सही ठहराया है, जो एक दशक पहले तक अतिवाम को भटकाव या बड़े भाई के तर्ज पर देखते थे। लेकिन सरकार की इस पहल को भी माओवादियों ने राजनीतिक तौर पर ही उठाया । जिसका असर नंदीग्राम में दिखा । लेकिन चुनाव में वोटिंग के दौरान नक्सली हिंसा लोकतंत्र के खिलाफ की भाषा मानी जायेगी, यह भी हकीकत है ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन, देश की राजनीति का नया सवाल लोकतंत्र के नाम पर राजनीतिक दलों के आम लोगो से गैर सरोकार वाले मुद्दों का उठना भी है और सरोकार के उन मुद्दो को लोकतंत्र का ही नाम लेकर हाशिये पर ढकेल देना भी, जो लोकतंत्र पर ही सवालिया निशान लगाते हैं। मसलन , अपराधियों और बाहुबलियों से कोई राजनीतिक दल नहीं बच पाया है लेकिन इसे मुद्दा नहीं बनने दिया गया। बालीवुड या क्रिकेट खिलाडियों के जरीये राजनीति का गैर राजनीतिक राग हर राजनीतिक दल ने छेड़ा । रोजगार और मंहगाई के निपटने का कोई तरीका किसी दल के पास नहीं है। अगर इन सवालों ने गांव और छोटे शहरो में चुनाव के लोकतंत्र को लेकर वोटरो में सवाल खडे किये हैं तो आंतकवाद के सवाल ने शहरी मतदाताओ के बीच राजनीति को लेकर एक आक्रोष भी पैदा किया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह वही परिस्थितयां हैं, जिसमें पहली बार विकल्प का सवाल खड़ा तो हो रहा है लेकिन बिना किसी रास्ते के विकल्प का सवाल सवाल ही बना रह जा रहा है । इसलिये चुनाव के वक्त नक्सली हिसा ने नक्सल प्रभावित इलाको में कुछ नये सवाल पैदा कर दिये हैं। बिना स्थानीय मदद के चुनाव के वक्त हिंसा कैसे संभव है । स्थानीय वोटरों का यह एहसास खत्म हो चुका है कि वह चुनाव के जरीये लोकतंत्र को जीते हैं। राजनीतिक दलों के उम्मीदवार खलनायक माने जाते हैं। हिंसा का अंदेशा जब सरकार और सुरक्षाकर्मियों को भी था तो भी नक्सली कार्रवाई कर कैसे सुरक्षित निकल गये। राजनीतिक दलों ने कोई प्रतिक्रिया क्यों नहीं दी। और सीमा सुरक्षा बल के महानिदेशक को क्यों कहना पडा कि नक्सलियों से निपटने में राज्य सरकारें पूरी तरह विफल रही हैं। और उनसे नक्सल संकट सुलझ भी नही सकता है। असल में माओवादियों के लेकर बड़े सवाल अब शहरी मतदाताओ तक भी पहुंच रहे हैं । क्योंकि जिन राजनीतिक परिस्थियों से वोटर यह जानते समझते हुये गुजर रहा है कि चुनावी लोकतंत्र में उसकी शिरकत सिवाय वोट डालने भर की है। उसमें चुनाव के जरीये सत्ता बनाना या बदलना लोकतंत्र का नही सौदे का हिस्सा है, जो उन्हीं नेताओं के हाथ में है, जिन्हे वह लगातार सवाल उठाता रहा है । यानी चुनावी लोकतंत्र का जो खाका पिछले साठ साल से चला आ रहा है, उसमें राजनीति के जरीये विकल्प के सपनो को संजोना खत्म हो चला है। और माओवाद की नयी राजनीतिक दस्तक चुनावी लोकंतंत्र के टूटे सपने से निकल कर फिर से सत्ता बंदूक की नली से निकलने का अंदेशा जगाना चाह रही है । &lt;strong&gt;&lt;em&gt;पुण्य प्रसून vajpeyee&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3857696409871553743-5944435169560896653?l=dakhalkiduniya.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dakhalkiduniya.blogspot.com/feeds/5944435169560896653/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.blogger.com/comment.g?blogID=3857696409871553743&amp;postID=5944435169560896653' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3857696409871553743/posts/default/5944435169560896653'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3857696409871553743/posts/default/5944435169560896653'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dakhalkiduniya.blogspot.com/2009/04/blog-post.html' title='राजनीतिक अंधेरे में नक्सली हिंसा के मायने'/><author><name>चन्द्रिका</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08498808385035641834</uri><email>chandrika.media@gmail.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' name='OpenSocialUserId' value='13859221743332310890'/></author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3857696409871553743.post-3849220663379103197</id><published>2009-03-06T16:22:00.001+06:00</published><updated>2009-03-06T16:30:34.471+06:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='साम्प्रदायिकता'/><title type='text'>अंजन गाँव में हुई साम्प्रदायिक  झड़प पर  तथ्य संकलन के आधार पर तैयार की गयी एक रिपोर्ट:-</title><content type='html'>&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_06z5ZQ7dCYo/SbD61qNRg2I/AAAAAAAAAkw/7AJxIoTuOW8/s1600-h/images.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5310019760439788386" style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; WIDTH: 197px; CURSOR: hand; HEIGHT: 201px" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_06z5ZQ7dCYo/SbD61qNRg2I/AAAAAAAAAkw/7AJxIoTuOW8/s320/images.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;घटनायें जब घट चुकी होती हैं हमारे पास बताने के लिये ढेर सारे तथ्य होते हैं, हमारी मुट्ठीयों में संकलित आंकड़े की एक पोटली होती हैं और चेहरे पर विवशता की छाया। जब चीख-चीख कर हम गोधरा की नृशंसता का बयान कर रहे होते हैं ठीक उसी समय हमारे आस-पास पसरी होती है एक भयावह चुप्पी, एक लम्बी चीख को समेटती हुई। महाराष्ट्र राज्य के अमरावती जिले में एक छोटी सी तालुका है अंजन गाँव जिसकी आबादी तकरीबन ५१००० है. ५१००० कम तो नहीं होते प्रेम करने के लिये या नफ़रत करने के लिये. २३ फरवरी को हुई हिन्दू मुस्लिम सम्प्रदायों के बीच एक झड़प के बाद यहाँ के बयान पेश करने के कई अंदाज़ हो सकते हैं, मसलन पुलिस की दख़लंदाजी ने एक और गोधरा होने से बचाया अंजन गाँव को, या मज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर करना. पर सच्चाई कभी एक नहीं होती, दरअसल जरूरी यह होता है कि आप अपनी आँख के किस कोने से कौन सा चश्मा लगाकर घटनाओं को देख रहे हैं. ५१००० की आबादी वाले इस तालुका में मुसलमानों की आबादी १७००० के आस-पास है, २६००० की संख्या में हिन्दू व तकरीबन ६००० बुद्धिस्ट हैं. ये तीनों समुदाय आपस में घनी बस्तियाँ बनाकर इस तरह से रहते हैं कि लोगों में मनमुटाव हो, एक संप्रदाय दूसरे सम्प्रदाय से बातचीत करना बंद कर दे पर घरों की दीवारें हैं कि धूप में अपनी छाया एक दूसरे पर लुढ़का ही देती हैं इस बात का फ़िक्र किये बगैर कि जिस दीवार के कंधे पर वे झुक रही हैं उसके घेरे में किसी अन्य सम्प्रदाय के लोग रहते हैं. इस घनी बस्ती में लोगॊं के घर भले ही छोटे हों, लोगों को रहने के लिये ज़मीन भले ही कम हो पर मंदिरों और मस्ज़िदों को विस्तृत इलाके में बनाया गया है शायद इसलिये कि इश्वर-अल्लाह इतने बड़े होते है कि ज़ाहिराना तौर पर उन्हें बडी़ और विस्तृत जगह की जरूरत है. इस तीन कि.मी. के इलाके में ८ मस्जिदें हैं और मंदिरों की संख्या तो गिनी ही नहीं जा सकती क्योंकि मस्ज़िदों का एक ढांचा होता है पर मंदिर कई बार पेड़ होते हैं, पुलिया होती है या इस पठारी क्षेत्र में कोई भी पत्थर जिसे सिंधूर से रंगा गया है वह मंदिर ही है, उसे हनुमान कह दो या काला पत्थर हो तो शिव जी पर यह बात आज तक मेरी समझ में नहीं आयी कि अपना लिंग छूकर जब लोग इतनी गंदगी महसूस करते हैं कि पानी से हाथ तक धोते हैं तो फिर पत्थर के लिंग पर दूध क्यों बहाते हैं? खैर इलाके की राजनीतिक स्थिति यह है कि कभी यहाँ के सांसद शिवसेना के सदस्य प्रकाश भार साकडे़ जी हुआ करते थे. विधायक के रूप में अब भी वही हैं पर पार्टी बदल दी है और अब कांग्रेस में आ गये हैं पता नहीं विचारधारा बदली की नहीं, अगर कांग्रेस की कोई विचारधारा है तो. पर हां इतना जरूर है कि विचार कपडे़ नहीं हैं जिन्हें तुरंत बदला जा सके. इस मामले पर हमने वहाँ के लोगों, पत्रकारों, शिक्षकों आदि से बात-चीत कर वास्तविक स्थिति का पता लगाने का प्रयास किया. २३ फरवरी को जब यह घटना हुई उस दिन हिन्दुओं का त्योहार "शिवरात्रि" था. गाँव के एक २५ वर्षीय युवा गजानन विट्ठलराव कराडे़ (एस.सी.) जो कि पेशे से कारपेंटर हैं व शिव सेना के सदस्य भी, शाम के वक्त गाँव के एस.टी. बस स्टैंड की एक दुकान पर अपनी बाइक से आये और सामने की एक पान गुमटी से जब थोडी़ देर बाद लौटे तो उन्हें वहाँ बाइक दिखायी नहीं दी. थोडी़ देर बाद बाइक स्टैंड पर ही एक दुकान के पीछे खडी़ मिली ऎसी स्थिति में गजानन ने मुस्लिम समुदाय को टारगेट करते हुए कुछ गालियाँ देनी शुरू की जिससे वहाँ खडे़ दो मुस्लिम लड़कों जावेद खाँ और यूनुस से झड़प हो गयी पर आस-पास के लोगों ने बीच-बचाव कर मामले को सम्हाल लिया. ठीक इसी रात जहाँ पर यह घटना हुई थी वहाँ पर स्थित एक मंदिर में पथराव हुआ. पथराव के कारण मस्ज़िद के सामानों को क्षति पहुची कारणवस अब पूरा मामला सुबह तक काफी संगीन हो गया. अब यह मामला दो व्यक्तियों का न होकर दो सम्प्रदायों का हो गया और इस स्थिति में दोनों सम्प्रदायों के बीच २४ तारीख की सुबह १० बजे के करीब झड़प हो गयी जिसमे लोगों की तरफ से पत्थरबाजी हुई और तलवारें व इस तरह के आपत्ति जनक सामान भी निकाले गये पर वहाँ के तत्कालीन एस.पी. स्टालिन की सक्रियता के कारण किसी के आहत होने की कोई घटना रोकी जा सकी. पत्थरबाजी के कारण कुछ लोग घायल जरूर हुए और कुछ को चॊटें भी आयी. लोगों के मुताबिक कुछ दुकानों में तोड़ फोड़ भी हुई जिसकी थाने में २६००० रूपये के हानि की रपट दर्ज करवायी गयी. स्थिति के भयावह होने के आसार को देखते हुए एस.पी. स्टालिन द्वारा पूरे क्षेत्र में कर्फ्यू घोषित कर दिया गया और वहाँ के थाना प्रभारी ए.यू. कुरैसी का तबादला कर दिया गया. इसके बावजूद भी ८ दिनों तक पूरे इलाके में कर्फ्यू जारी रहा जिससे वहाँ के व्यापारी से लेकर आमजन काफी परेशान रहे. इस पूरी घटना के दौरान २ मार्च तक तकरीबन २१२ मुस्लिम व २० हिन्दुओं को धारा १४३, ५०४, ५०६,३२३, ४२६,४३५,२७५,२३६, १४७,१४८, १४९, ३२४, ३०६ व १३५ बाम्बे पुलिस एक्ट के तहत गिरफ्तार किया गया. जिनमे से अभी भी अधिकांश लोग अमरावती जेल में बंद हैं जबकि मुख्य आरोपी गजानन विट्ठलराव कराडे़ को शिवसेना के सदस्यों द्वारा जमानत लेने पर रिहा कर दिया गया. परन्तु स्थिति की गम्भीरता का आंकलन इस बात से किया जा सकता है कि वहाँ के मुस्लिम वर्ग के लोग घटना के बारे में कोई भी जानकारी देने से मुकर रहे है. यहाँ तक कि तथ्य संकलन करने गयी टीम के सदस्यों पर कई मुस्लिमों द्वारा यह भी कहा गया कि आप आई.बी. के हो सकते हैं या किसी अन्य संगठन से भी अतः हम आपको जानकारी नहीं दे सकते. जिससे साफ तौर पर पता चलता है कि सरकार से किस तरह का दहसत उनके अंदर है. इसकी एक वज़ह यह भी है कि मुस्लिमों की आबादी आनुपातिक दृष्टि से कम होने के बावजूद भी उनकी गिरफ्तारी भारी संख्या में की गयी है यहाँ तक कि उन मुसलमानों को भी गिरफ्तार किया गया है जो दिशा मैदान के लिये बाहर निकले हुए थे. इस वज़ह से मुस्लिम वर्ग में एक दहसत व खौफ का माहौल बना हुआ है. दूसरी तरफ वहाँ शिव सेना व हिन्दू कट्टरपंथी ताकतों का भी खौफ बना हुआ है. बात-चीत के दौरान श्री राजेन्द्र बंगले ने हमे बताया कि किसी मुसलमान की यह हिम्मत नहीं है कि वह हमारी गली से सिर ऊपर करके निकल जाय, सब चूहे की तरह जाते हैं. पूरे इलाके का ज़ायज़ा लेने के बाद यह तथ्य सामने आया कि यहाँ पर हिन्दू कट्टरपंथी ताकतों ने अपने को उस सामान्य अर्थ में नहीं स्थापित किया है जिन अर्थों में आम तौर पर वे कई जगह अपने को स्थापित करती हैं बल्कि यहाँ कई नये तरीके अपनाये गये हैं. मसलन उच्च शिक्षा का संस्थान सारडा कालेज जो उस क्षेत्र का एक नामचीन कालेज है, शिव सेना के द्वारा स्थापित है जिससे वहाँ के युवाओं की नब्ज़ को बेहतर ढंग से पकडा़ जा सके. इस रूप में पूरे हिन्दू समाज में जिस तरह की कट्टर हिन्दू मानसिकता तैयार की गयी है वह अपने में एक भयावह स्थिति है. साथ में हिन्दू संगठनों द्वारा व्यायामशालायें व साखायें भी चलायी जाती हैं. क्षेत्र के अधिकांसतः युवा बेरोजगार हैं और इन संगठनों से जुड़कर किसी तरह की सक्रियता में अपने को व्यस्त रखना चाहते हैं. गौरतलब बात यह भी है कि इन हिन्दू कट्टरपंथी संगठनों में काम करने वाले अधिकांस युवा ओ.बी.सी. और दलित हैं. पिछले कुछ माह से राजठाकरे की महाराष्ट्र नव निर्माण सेना (मनसे) जो कि शिव सेना का ही एक नया रूप है, आसपास के क्षेत्रों में अपना विस्तार किया है. बल्कि यहाँ तक कि पूरे महाराष्ट्र में कुछ संकीर्ण सवालों को उठाकर एक नया हिन्दूवादी संगठन तैयार किया जा रहा है. ऎसी स्थिति में कई मुस्लिमों से बात करते हुए उनके अंदर एक असहाय युक्त रोष जरूर देखने को मिला. तथ्य संकलन के दौरान यह पता चला कि तकरीबन ५० कि. मी. के क्षेत्र में जिसमे अचलपुर, दरियापुर, निज़ामपुर में साम्प्रदायिक बहुलता के आधार पर छोटे बडे़ कट्टरपंथी संगठन खडे़ हो रहे हैं या साम्प्रदायिक मानसिकता का निर्माण हो रहा है. जिसमे बडे़ स्तर पर युवाओं की भागीदारी है इसके पीछे साफ तौर पर जो कारण दिखायी पडा़ वह यह कि बेरोजगार होने की वज़ह से युवाओं की जो उर्जा है उसे साम्प्रदायिक ताकतें आगे आकर अपने तरीके से इश्तेमाल कर रही हैं. आस-पास के जिलों में भी सड़कों के किनारे लगे पोस्टरों व होर्डिंग्स से पता चलता है कि जनमानस में अपने सम्प्रदाय के प्रति आस्था व सर्वोच्चता का पहला पाठ पढा़या किस तरह से पढा़या जा रहा है. रोज-ब-रोज़ बाबाओं की यात्रायें क्षेत्रों में करायी जा रही हैं ताकि लोग सम्प्रदायों में बंटे रहें और जब तक लोग सम्प्रदायों में बंटे रहेंगे साम्प्रदायिकता फैलाने वाली ताकतें किसी न किसी तरीके से इनका इश्तेमाल आसानी से कर ही लेंगी. पूरे तथ्य संकलन के दौरान एक बात साफ तौर पर निकल कर आयी कि अगर इन साम्प्रदायिक ताकतों के चरित्र को लोगों के बीच जल्द से जल्द नहीं खोला गया, भविष्य में इसकी भयावहता से उन्हें नही मुखातिब कराया गया तो यह असम्भव नहीं कि स्थितियाँ बहुत ही विकट होंगी. दूसरे रूप में एक बडे़ तौर पर यह भी कार्य करने की जरूरत है कि लोगों को धर्म जैसी संकीर्ण मानसिकताओं से उभारा जाये. चूकि धर्म अपने को जितना सहिष्णु कहता है असलियत में वह उतना होता नहीं जिसे अष्टभुजा शुक्ल ने अपने शब्दों में लिखा है. किसी धर्म स्थल के विवाद में तीन हजार लोग बम से दो हजार गोली से एक हजार चाकू से और सौ जलाकर मार डाले जाते हैं चार सौ महिलाओं की इज्जत लूटी जाती है और तीन सौ शिशुओं को बलि का बकरा बनाया जाता है धर्म में सहिष्णुता का प्रतिशत ग्यात कीजिये॥&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;strong&gt;तथ्य संकलन में सहयोगी सदस्य -चन्द्रिका, रजनेश, अनीस, आशीष&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3857696409871553743-3849220663379103197?l=dakhalkiduniya.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dakhalkiduniya.blogspot.com/feeds/3849220663379103197/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.blogger.com/comment.g?blogID=3857696409871553743&amp;postID=3849220663379103197' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3857696409871553743/posts/default/3849220663379103197'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3857696409871553743/posts/default/3849220663379103197'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dakhalkiduniya.blogspot.com/2009/03/blog-post.html' title='अंजन गाँव में हुई साम्प्रदायिक  झड़प पर  तथ्य संकलन के आधार पर तैयार की गयी एक रिपोर्ट:-'/><author><name>चन्द्रिका</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08498808385035641834</uri><email>chandrika.media@gmail.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' name='OpenSocialUserId' value='13859221743332310890'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_06z5ZQ7dCYo/SbD61qNRg2I/AAAAAAAAAkw/7AJxIoTuOW8/s72-c/images.jpg' height='72' width='72'/><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3857696409871553743.post-7604986607082780228</id><published>2009-02-03T13:57:00.002+06:00</published><updated>2009-02-03T14:25:59.705+06:00</updated><title type='text'></title><content type='html'>&lt;p align="justify"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;बीते बरस के हाथ एक पत्र:-&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span class=""&gt;हर बरस कुछ इसी तरह बीतता है कि अपने साथ लेकर चला जाता है न जाने कितनी उन चीजों को जिन्हें अभी बचा रहना था दुनिया में और वे बच ही जाती हैं जिन्हें दुनिया से मिटना था. कि पिछला बरस जाते-जाते कितना कुछ तो लेता गया अपने साथ. नये साल की उम्मीदें जार-जार होती दिखती हैं. फिलिस्तीन को होना ही था आबाद पर ऎसा नहीं हो सका. बचे रहना था महमूद दरवेश को कि किया जा सके पानी और बहते लहू में फर्क, पैदा होते ही बच्चों की सांसो में नहीं जाना था बारूद की गंध पर बीते वर्ष की पीठ पर महमूद दरवेश लद कर चले गये और माओं के गर्भ से पैदा होने के पहले बच्चों ने सुने धमाके. क्या बीते बरस से यह शिकायत करूं कि वे जिन्हें तुम लेकर चले गये, दुनिया बदलने के उनके सपने अभी भी आबाद हैं. लोगों का गुस्सा इतना बढ़ गया है कि दुनिया के सबसे बडे़ तानाशाह पर एक अदना सा पत्रकार जूते मार रहा है. वे लोग जिन्हें रोटी नहीं मिल रही है अपने हाँथ का इश्तेमाल बंदूक के लिये करना सीख रहे हैं. गाँधी के नाम पर जो लोग विश्व अहिंसा दिवस मना रहे हैं उनके हाँथों में इराक का कितना खून सना है इसका जिक्र होना ही चाहिये. जेल की सलाखों से बिनायक सेन को निकलना था पर वर्तमान लोकतंत्र का यही तकाज़ा है. वह सब कुछ जिसे धीरे-धीरे दूर होना था वह लोगों के और करीब हो रहा है चाहे वह भूख हो बेरोजगारी या असमानता. मुम्बई में आतंकी हमले हुए जिनमे सैकडो़ लोग मारे गये क्या यह चंद युवावों का जुनून था कि वे आये और कुछ लोगों को मार कर मर गये या दुनिया की तमाम परिस्थितियों से उभरी हुई घटनाओं में यह भी एक घटना थी जिसके कार्य कारण संबंधों पर बात नहीं की जा सकी और करकरे  की मौत के बाद अचानक अखबारों से हिन्दूवादी आतंक का एक चेहरा "साध्वी" गायब हो जाता है. हमे यह नहीं पता कि कब पड़ोसी देश से युद्ध शुरू हो जाये पर यह जरूर पता है कि अन्ततः दो देशों के सत्ता की लडा़ई में हम ही मारे जायेंगे. जब दुनिया आर्थिक मंदी की मार झेल रही है इसलिये कि दुनिया का आका अमेरिका अपनी अर्थव्यवस्था में ढह रहा है. उस समय बाराक ओबामा के शपथ ग्रहण समारोह के जस्न पर ३७० करोण रूपये खर्च किये जा रहे हैं. ऎसे समय में एक बरस का बीत जाना हासिये पर पडी़ सदी के कलेण्डर की उम्र कम होने से ज्यादा और क्या है? हमे सोचने की जरूरत है कि हम एक रास्ता चुने जहाँ से उम्मीदों का नया साल शुरू हो सके.&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt; &lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#33cc00;"&gt; कविता&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;&lt;span class=""&gt; पंचटीला&lt;/span&gt; और लड़की:-&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;१।&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;वह आयेगी &lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;और धर देगीअपनी उदासी &lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;तुम्हारे भीतर &lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;रात गये तुम गाओगे&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;उसके प्रेम और विछोह के गीत&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;कैसे जानेगा &lt;span class=""&gt;कोई कि&lt;/span&gt; &lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;तुम्हारी कठोरता में &lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;धर दी गयी &lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;हैएक पूरी की पूरी लड़की॥&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;२-&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;लड़की तुम नहीं रहोगी&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;इसके पास &lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;इसकी देह में उतरेगा &lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;हर हमेश&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;हर दिन&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;पूरा सप्ताह&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;उदास होगा पंचटीला&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;अपने दुख में&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;थोडा़ सा टूटेगा रोज&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;दिनों को पूरा करता हुआ॥&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;३-&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;वह तुम्हें &lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;उतना भर करेगी प्रेम&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;जितना भर बचा है उसके पास&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;उमर ढलने के पहले&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;लड़की छोड़ देगी तुम्हें&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;तब किससे पूछोगे तुम&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;कि कब लौटेगी लड़की॥&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;गौहर रज़ा पिछले दिनों हमारे वि.वि. में आये और एक काव्य गोष्ठी के दौरान उनके द्वारा सुनायी गयी नज़्म का आज़ाद अंसारी द्वारा रिकार्डिंग हमें उपलब्ध हुआ जिसे हम यहाँ प्रकाशित कर रहे हैं॥&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;ये साल भी यारॊं बीत गया&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;कुछ खून बहा कुछ घर उजडे़&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;कुछ कटरे जल कर खाक हुए&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;इक मस्जिद की ईटों की तरह &lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;हर मसला दब कर दफ्न हुआ&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;जो खा़क उडी़ वो ज़हनों पर&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;यूं छायी जैसे कुछ भी नहीं &lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;अब कुछ भी नही है करने को&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;घर बैठो डर के अब के बरस&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;या जान गवां दो सड़कों पर&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;घर बैठ के भी क्या हासिल है&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;न मीर रहा न गा़लिब है&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;न प्रेम के जिंदा अफसाने&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;बेदी भी नही मंटो भी नहीं&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;जो आज की दहसत लिख डालें&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;मंसूर कहाँ जो ज़हर पिये&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;गलियों में बहती नफरत का&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;वो भी तो नही जो तकली से &lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;फिर प्यार के ताने बुन डाले&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;क्यों दोष धरो पुरखों पर  तुम &lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;ख़ुद मीर हो तुम गा़लिब भी हो तुम &lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;तुम प्रेम का जिंदा अफसाना&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;बेदी भी तुम्ही तुम मंटो हो &lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;तुम आज की दहसत लिख डालो&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;नानक की नवा चिस्ती की सदा &lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;मंसूर तुम्ही तुम बुल्ले शाह&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;कह दो कि अनल-हक जिंदा है&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;कह दो कि अनल-हक कर देगा &lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;इस नुक्ते पर ग़ल नुक्ती है&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;हर बात यहीं से निकलेगी॥&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;&lt;em&gt;महाश्वेता देवी भारत की एक मात्र लेखिका है जिन्होंने अपने लेखन कर्म व जीवन कर्म को एक साथ जनवादी तरीके से साधा है हाल में जब वे महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय में आयी उस दौरान हमारे साथी देवाषीश प्रसून और प्रत्युष प्रशांत ने उनसे बात-चीत की जिसके अंश का हम प्रकाशन यहाँ कर रहे हैं॥&lt;/em&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;&lt;em&gt;&lt;br /&gt;&lt;/em&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;किसी रचनाकार की रचनाशीलता में उसका जीवन संघर्ष कितना मायने रखता है?&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;आदमी जो देखगा वही लिखेगा उसकी रचना का निर्माण उसके आस-पास के परिवेश से ही आता है इस रूप में किसी रचना कार की रचना शीलता उसके जीवन कर्म पर ही निर्भर करती है । जहाँ वह जीवन जीता है उसके परिवेश पर निर्भर करती है&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;१०८४ की मां की जो विषय वस्तु है या उस राजनीति को आज किस तौर पर देखती है?&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;वह जो राजनीति थी उसका समय अभी नहीं रहा उसका समय बीत चुका है । नक्सलवाडी़ की राजनीति को जिन्होंने समर्थन दिया आज वे उसे प्रांत-प्रांत तक बिखेर चुके हैंऔर वह कई प्रांतों में फैल गया है. कोई अच्छा आंदोलन खत्म हो जाय ऎसा नहीं होता उसमे उतार चढा़व आता है पश्चिम बंगाल में जैसे आज उसका प्रभाव कम है पर पूरे देश में एक बडा़ आंदोलन है वह और चल रहा है उसका चलना ही जरूरी है. यह समय की जरूरत है&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;&lt;strong&gt;देश में पनपती ढेर सारी समस्याओं के बीच जब जगह-जगह छोटेछोटे आंदोलन पनप रहे हैं (सेज, मानवाधिकार, बांध) युवाओं की को कहां देखती हैं?&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;अभी जब हाल में मैं कलकत्ता में थी ठीक आने के पहले उधर जो हुआ था जिसको लेकर केन्द्र सरकार ने एक एक्ट बनाया है जिसके खिलाफ प्रदर्सन भी हुए हैंजिसमे हमने जो बयान दिया है उसमे बोला है ज्यादा से ज्यादा जो मानवाधिकार की लडा़ई लड़ रहे हैं जैसे ए।पी.डी.आर. के आंदोलन ये एक्ट उसके खिलाफ जाता है अतः इसे तुरंत वापस लिया जाना चाहिये इसमे युवा भी हैं कोई आंदोलन खत्म होने की बात नहीं होती है वह अगले आंदोलन को इंस्पायर करता है.&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;नंदी ग्राम के आंदोलन ने संसदवादी कम्युनिस्ट पार्टी के चरित्र को पूरे देश में उजागर किया आप किस रूप में देखती हैं?&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;जिस समय तक वह मार्क्स वादी पार्टी थी उसको जो करने को था किया लेकिन उसका दिन खत्म हो गया इसलिये देखो यही पश्चिम बंगाल में जब पंचायती चुनाव हुआ था पंचायत में वोट देने वाला आदमी बहुत पढा़ लिखा तो नहीं है कामन मैन है पर वह सब कुछ समझता है। ये मजदूर किसान हैं ये सब उस पार्टी के खिलाफ हो गये और पार्टी हार गयी ३० साल से सत्ता में रहते हुए उसने न तो रास्ता बनाया न तो पानी दिया न बिजली कुछ नहीं दिया. जब पश्चिम बंगाल में भुखमरी पडी़ सरकार के पास कितना गेहूँ चावल सब था पर लोगों को मरना पडा़&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;वर्तमान लोकतंत्र में आप सुधार की कितनी गुंजाइश देखती हैं या फिर किसी विकल्प के बारे में सोचती हैं?&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;ज्यादा सोचना नहीं है न तो सोचने का समय है इसमे सोचने का क्या है आंदोलनों से जुडी़ हुई हूँ और यही है कि लडा़ई करने का है तो करने का है और कुछ नहीं.&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;&lt;strong&gt;युवावों के लिये कोई रास्ता सुझायें या कोई संदेस?&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;कोई संदेस नहीं देखो समझो और करो मैं कोई रास्ता क्यों बताऊ अपना रास्ता खुद चुनों लोगों की समस्याओं को देखो और उन्हें बिजली पानी सड़क उपलब्ध करवाओ।&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;श्रद्धांजलि:-&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;strong&gt;लवलीन&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;कथाकार लवलीन नहीं रही। इन निर्मम शब्दों के अलावा और क्या युक्ति है कि बयां हो जाय उनका न रहना. तुम्हें कैसे बताया जाय कि तुम्हारे पाठकों, दोस्तों और चाहने वालों ने किस तरह स्वीकार किया होगा तुम्हारा न रहना.कौन तुमसे बताये कि तुम्हारे चले जाने के बाद भी यह दुनियां उसी तरह आबाद है. कई शाम बीत चुकी है और और लोगों की यादों से हर रोज तुम खिसकती जा रही हो.&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;हेराल्ड पिंटर&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;काश! हेराल्ड पिंटर के नाटकों की तरह यह भी एक नाटक ही होता कि दुनिया के रगमंच पर हुई एक मौत, मौत न होती और बत्तियँ जलने के साथ वह पात्र उठ खडा़ होता और हम सब तालियाँ बजाते हुए उसका अभिवादन करते। अपने आंसुओं को पोछते हुए दर्शक दीर्घा से बाहर निकलते और कहते कि हेराल्ड पिंटर अभी जिंदा हैं.&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;नरेन्द्र मोदी देश के प्रधानमंत्री होने चाहिये:-&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;कुछ दिन पहले ही हमारे देश के दो बडे़ पूजीपतियों अंबानी और मित्तल के द्वारा देश के सबसे अच्छे प्रधानमंत्री के रूप में नरेन्द्र मोदी का नाम प्रस्तावित किया गया। जिसे देश के लगभग समाचार पत्रों ने अपने पहले पन्ने पर छापा. यह चुनाव के पूर्व की तैयारी है जिसमे देश की मजदूर जनता के दो बडे़ शोषकों द्वारा एक बडे़ ह्त्यारे को चुना जा रहा है.जिसने २००२ के गुजरात दंगे में जाने कितने मुस्लिमों का नर संहार करवाया और जबकि आज भी गुजरात में उसके शासन काल में मुश्लिम वर्ग दहसत में जी रहा है. ऎसे में चुनाव के पूर्व अम्बानी मित्तल के इस प्रधानमंत्री पद के चुनाव का निहितार्थ क्या हो सकता है? एक तो यह कि आर्थिक मंदी से जूझ रही इस दुनिया में जब रोजगार दिनों दिन कम होते जा रहे है और बेरोजगारी के शिकार युवावों के लिये इस व्यवस्था ने कोई रास्ता नहीं छोडा़ है. वर्तमान मीडिया देश का सबसे बडा़ आदर्श उन्हें खडा़ कर रही है जिनके हाथ में देश की पूजी लूटने का सबसे बडा़ तंत्र है. ऎसे में इनके द्वारा किसी का भी चुना जाना युवाओं में आदर्शों का चुनाव होगा और यह चुनाव नरेन्द्र मोदी के लिये एक पक्षधरता तय करेगा. इसका दूसरा और अहम पक्ष यह भी है कि पूजीपतियों और हिन्दूवादी ताकतों की गठजोड़ को और मजबूत किया जा सके जिसके लिये नरेन्द्र मोदी वाकई में देश के सबसे उपयुक्त व्यक्ति हैं  जिसने जन प्रतिरोध के चलते सिंगूर से हारकर भागी टाटा कम्पनी को अपने यहाँ संरक्षण दिया. टाटा की यह हार जनता की एक बडी़ जीत थी जिसे जन संघर्षों के इतिहास में दर्ज किया जायेगा. &lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;आर्थिक मंदी से निपटने का कोई रास्ता नहीं है:-&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;अचानक से अमरीकी बैंकों का ध्वस्त होना और सरकारी सहायता से उसे संरक्षित करने का प्रयास बिफल ही होता दिख रहा है  चूंकि पूजी के इस साम्राज्य में अमेरीका के ढहने से दुनिया के सभी राष्ट्रों पर इसका साफ तौर पर प्रभाव दिख रहा है. एक आंकलन के मुताबिक दुनिया के तकरीबन साढे़ छः करोड़ युवा बेरोजगार हुए हैं. ऎसी स्थिति में भारत के वे क्षेत्र जो निर्यात से जुडे़ हुए हैं उन पर गहरा असर पडा़ है खास तौर से मेडिकल आई.टी. आदि . क्योकि निर्यात के लिये जो डालर आते थे अमरीकी आर्थिक मंदी के कारण वे आना बंद हो गये और उन पैसो को वापस ले लिया गया और अचानक यहाँ के शेयर बाज़ार गिर गये. जिससे हुजेरी जो कि तिरुवंतपुरम में स्थित है टाटा जमशेदपुर जैसी फैक्ट्रीयाँ बंद हो गयी. जिन लोगों ने शेयर बाज़ार में पैसे लगाये थे वे धीरे धीरे वापस लेना शुरू कर दिये  और शेयर बाज़ार का हाल बिगड़ता चला गया. अभी हाल में यह फैक्ट सामने निकल कर आया है कि पिछले तीन महीने में ४४ मिलियन डालर का प्रोडक्सन कम कर दिया गया है. ऎसी स्थिति में इस बाज़ार व्यवस्था को ढहता हुआ देखकर कम्पनियों ने अपनी प्लानिंग पर भी रोक लगा दी है जिससे नये रोजगार की संभावना तो खत्म ही दिखती है पर जहाँ से नये रोजगार की सम्भावना खत्म होती दिखती है वहीं से एक नये व्यस्था की सम्भावना खुलती है. क्योंकि आदमी सोचता है इसलिये वह अपने हाथ का बेहतर इश्तेमाल करना जानता है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; &lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3857696409871553743-7604986607082780228?l=dakhalkiduniya.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dakhalkiduniya.blogspot.com/feeds/7604986607082780228/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.blogger.com/comment.g?blogID=3857696409871553743&amp;postID=7604986607082780228' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3857696409871553743/posts/default/7604986607082780228'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3857696409871553743/posts/default/7604986607082780228'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dakhalkiduniya.blogspot.com/2009/02/blog-post.html' title=''/><author><name>चन्द्रिका</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08498808385035641834</uri><email>chandrika.media@gmail.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' name='OpenSocialUserId' value='13859221743332310890'/></author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3857696409871553743.post-5325523992942110275</id><published>2008-12-18T11:33:00.002+06:00</published><updated>2008-12-18T11:40:54.001+06:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='dharma'/><title type='text'>धर्म परिवर्तन और सांप्रदायिक तत्व</title><content type='html'>&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_06z5ZQ7dCYo/SUnheuX6xSI/AAAAAAAAAjs/b4hxky7tKLg/s1600-h/images.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5280999956029293858" style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; WIDTH: 147px; CURSOR: hand; HEIGHT: 197px" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_06z5ZQ7dCYo/SUnheuX6xSI/AAAAAAAAAjs/b4hxky7tKLg/s320/images.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt; &lt;strong&gt;&lt;em&gt;-स्वामी नित्यानंद&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span class=""&gt;किसी का&lt;/span&gt; भी धर्म परिवर्तन अपने धर्म को श्रेष्ठ मानकर करना या कराना निंदनीय है। धर्म परिवर्तन का मुद्दा कंधमाल और बंगलुरू में जारी हिंसा के मद्देनजर फिर विचारणीय हो उठा है। दूसरों के धर्म को दोयम दर्जे का या अपने धर्म से हीन मानना ओछी मानसिकता है। वर्तमान में धर्म परिवर्तन मोक्ष या प्रभु प्राप्ति के उद्देश्य से नहीं वरन संख्या बल बढ़ाने के उद्देश्य से किया जाता है। संख्या बल बढ़ाने के राजनीतिक निहितार्थ होते हैं और इसका लाभ भी संबंिधत पक्षों को मिलता है। गांधी इन बातों को अच्छी तरह समझते थे इसलिए उन्होंने धर्म-परिवर्तन और पुन: परिवर्तन जैसे प्रयासों की निंदा की थी। सच तो ये है कि धर्म किसी को भी सही मायने में इंसान नहीं बना सका। जिन्हें धार्मिक लोग कहा जाता है वो दरअसल असहिष्णुओं की फौज हैं। आरएसएस और उससे जुड़े संगठनों में इनकी भरमार देखी जा सकती है। इन संगठनों का मुख्य कार्य है तथ्यों को तोड़-मरोड़कर या गोलमाल भाषा में पेश करना। तथ्य कुछ भी हो संदर्भ से काटकर विद्रूप रूप से परोसना। इसमें इन्हें महारत हासिल है। भाजपा अच्छी तरह जानती है कि वह विकास के मुद्दे पर असफल हो चुकी है। इसका मोदी मॉडल विकास को लेकर कितना प्रासंगिक है यह समय बताएगा। सत्ता के लिए भाजपा के पास ले-देकर एक ही अस्त्रा है और वो है सांप्रदायिक धु्रवीकरण। क्रिश्चियनों और मुस्लिमों पर हमले इसी खेल का हिस्सा हैं।धर्म परिवर्तन बहुआयामी मुद्दा है। ये व्यापक चर्चा का विषय होना चाहिए। जहां भी धर्म परिवर्तन होता है एकांगी नहीं होता। दोनों तरफ से पहल होती है। कुछ लोग एक धर्म से निकलते हैं तो कुछ नए भी उसमें शामिल होते हैं। हिंदुओं में से कुछ लोग धर्म छोड़कर ईसाई या मुस्लिम बन जाते हैं तो उनमें से भी कुछ लोग हिंदू धर्म में शामिल हो जाते हैं। ये सतत प्रक्रिया है जो चलती रहती है। विशेष रूप से हिंदू धर्म की बात की जाए तो ज्यादातर धर्म परिवर्तन निम्न निधZन तबके में होता है। ये वे लोग हैं जो हिंदू धर्म समाज की परििध पर हैं। पहचान के संकट और न्यूनतम सुविधाओं के अभाव में कष्टकर जीवन जीने को मजबूर हैं। इन परिस्थितियों में ये लोग अन्य धर्म प्रचारकों के लपेटे में आ जाते हैं। यहां यह तथ्य ध्यान देने योग्य है कि बलात् धर्म-परिवर्तन संभव नहीं है। धर्म परिवर्तन का प्रत्याशी जब तक स्वयं न चाहे कोई भी जोर जबर्दस्ती से उसका धर्म परिवर्तन नहीं कर सकता। मगर संघ परिवार इन्हीं स्वाभाविक प्रवृत्तियों को तूल देकर बहुसंख्यक हिंदुओं में भय उत्पन्न कर धु्रवीकरण करके उसका राजनीतिक लाभ उठाना चाहते हैं। यहां विशेष ध्यान रखने योग्य तथ्य है कि 1947 से पूर्व और पश्चात भी रा.स्व.सं, हिंदू महासभा द्वारा निरंतर कहा जाता रहा है कि पचास वर्ष बाद भारत में हिंदू अल्पसंख्यक हो जाएंगे। साठ वर्ष बीत गए। इतिहास और आंकड़े गवाह हैं कि हिंदू भारत में 80 प्रतिशत हैं। जहां तक धर्म परिवर्तन का सवाल है सांप्रदायिक संगठन ये कभी नहीं बतलाते कि इन साठ वषो± में अन्य धमो± से कितने लोग हिंदू धर्म में आए। यह भी कहना प्रासंगिक होगा कि हिंदू धर्म की सतत बड़ाई हांकने वाले मठाधीश हिंदू धर्म में किसी भी प्रकार का सामाजिक विमर्श पेश करने में असफल हैं। सभी संप्रदायों के मठाधीश जातिवादी मानसिकता के प्रेरक और पोषक हैं। चाहे वह ब्रह्म कुमारी मिशन हो, इस्कॉन हो, स्वामी नारायण हो या राधास्वामी या अन्य संप्रदाय। इनके पास अकूत संपत्ति है, विलासितापूर्ण जीवनशैली है। आडंबर और पाखंड है। जिसे धर्म मीमांसा प्रचारित किया जाता है वह दरअसल मिथ्या मीमांसा है। इन मठों और मठाधीशों को हिंदू समाज के वंचित, शोषित तबके से कुछ भी लेना-देना नहीं है, हां इनकी भयंकर उपेक्षा से अलग-थलग पड़े लोग जब अन्य धमो± की ओर रूख करते हैं तो धर्म परिवर्तन का हल्ला मचाने के लिए मठों की थैलियां खुल जाती हैं। जिनका धर्म परिवर्तन हो जाता है उनका हाल-चाल पूछने उक्त संगठनों के गुगेZ कभी उनके पास नहीं जाते। उन कारणों और विपत्तियों को समझने की कभी कोशिश नहीं करते जिसके चलते धर्म परिवर्तन हुआ। उन्हें सांप्रदायिक राजनीति करनी है इसलिए चचो± और मिस्जदों पर हमले कर अपनी ओछी मानसिकता का प्रदर्शन करते रहते हैं। समझदार हिंदू इनके झांसे में नहीं आते पर मूढ़ इनकी मिथ्या अवधारणाओं और प्रचार में उलझ जाते हैं। यह भी विचारणीय है कि क्या अपनी जाति को सुरक्षित कर लेने से धर्म सुरक्षित हो जाता है। सांप्रदायिक संगठन कभी क्यों चाहेंगे कि धर्म परिवर्तन जैसी विकृतियां बंद हो जाएं। इसलिए धर्म परिवर्तन पर वैज्ञानिक विचार जरूरी है। खुले दिल, साफ नीयत और धर्म निरपेक्षता की दृष्टि से सार्वजनिक विचार हो तो समस्या का समाधान आसानी से निकल सकता है। &lt;em&gt;साभार -समयांतर&lt;/em&gt; &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3857696409871553743-5325523992942110275?l=dakhalkiduniya.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dakhalkiduniya.blogspot.com/feeds/5325523992942110275/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.blogger.com/comment.g?blogID=3857696409871553743&amp;postID=5325523992942110275' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3857696409871553743/posts/default/5325523992942110275'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3857696409871553743/posts/default/5325523992942110275'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dakhalkiduniya.blogspot.com/2008/12/blog-post.html' title='धर्म परिवर्तन और सांप्रदायिक तत्व'/><author><name>चन्द्रिका</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08498808385035641834</uri><email>chandrika.media@gmail.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' name='OpenSocialUserId' value='13859221743332310890'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_06z5ZQ7dCYo/SUnheuX6xSI/AAAAAAAAAjs/b4hxky7tKLg/s72-c/images.jpg' height='72' width='72'/><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3857696409871553743.post-2133919204486518173</id><published>2008-11-26T09:55:00.002+06:00</published><updated>2008-11-26T10:06:48.734+06:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अनुराधा गांधी'/><title type='text'>तुम्हारी कहानी कही जानी चाहिये:-</title><content type='html'>&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_06z5ZQ7dCYo/SSzLFJnbzuI/AAAAAAAAAaY/36ScLzr62QM/s1600-h/Image011.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5272812553085112034" style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; WIDTH: 256px; CURSOR: hand; HEIGHT: 320px" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_06z5ZQ7dCYo/SSzLFJnbzuI/AAAAAAAAAaY/36ScLzr62QM/s320/Image011.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt; &lt;span style="color:#ff0000;"&gt;अनुराधा गांधी ने इस दुनिया को विदा कह दिया, उनके दोस्तों के कुछ पत्र जो एक किताब के रूप में अनुराधा को याद करते हुए आये हैं उसका हिन्दी में अनुवाद यहाँ प्रकाशित है&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;span class=""&gt;प्रिय&lt;/span&gt; अनु,&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;जेल की सलाखें लगभग एक इंच मोटी हैं........ जिसमे सूर्य की किरणे हर सुबह थिरकते हुए आती हैं. और अभी गर्मी है.....वे तीखी मजबूत ....जोशीली हैं. ठीक उन्हीं दिनों की तरह जब हम विश्वविद्यालय बिल के खिलाफ चल रहे थे. तुम्हें याद है? सूरज की मारक गर्मी थी, और तुम मोर्चे की पूरी लम्बाई में उदित और अस्त होती दिखती थी. यह मेरा पहला मोर्चा था, मुझ पर तुम्हारी पहली छाप- उर्जा की एक पाँच फुट ऊची बंडल, एक छोटी सी कूद के साथ सूर्य पर प्रत्येक नारे से मुट्ठी का प्रहार करती हुई. जब आप आसमान पर प्रहार करने का निश्चय कर लेते हैं तो ऊचाई की बाधा बमुश्किल मायने रखती है.पहली छाप आवश्यक नहीं की स्थायी रहे. किन्तु साल और दशक इस पहली छवि को बहुत धुधले नहीं कर पाते. कुछ सालों बाद मैने तुम्हें एक मीटींग में तथ्यों, आंकडों और विचारों को मशीनगन की गति से रखते हुए सुना. मैने तुम्हारे विचारों को जाना और सीखा कि तुम चिंतन की जानी मानी विजेता हो. मगर मैं तुम्हारी छवि को चिंतकों के दायरे में बिठा नहीं पाता हूँ. संभवतः वह बहुत पानी कम था. कम-अज-कम जब तुमने न केवल दुनिया को व्याख्यायित बल्कि उसे बदलने का निश्चय किया. तब न केवल विचारों को व्याख्यायित और स्पष्ट करना था, उसे विविध और विस्तृत भूमि में लडा़ जाना था. और उस संघर्ष शील बर्ताव का क्या माने जब तुम नागपुर के लक्ष्मी नगर स्थित अपने कमरे में फरवरी की एक शाम मेरे साथ आयी थी. मैं मुंबई की ताजगी के साथ उस कड़कडा़ती ठण्ड से बचने के लिये खिड़कियों को बन्द करना चाह रहा था.......और तुम्हारे पास उस खोजी की वह कथा थी जिसने दक्षिणी ध्रुव के आक्रमण के लिये खुद को अनुकूलित कर लिया था.वर्षों बाद भी क्या इस स्थिति से मदद मिली थी जब अपने कंधे पर रायफल रखे, बस्तर के आडे़ तिरछे जंगलों से गुजरी थी? जरूर मिली होगी, या उस घुटन के दर्द ने तुम्हें उस पहाडी़ को जीतने की इजाजत नहीं दी.लेकिन इन भौतिक अनुकूलन, सांस्कृतिक, जाति विरोधी, महिला, ट्रेड यूनियन, नागरिक स्वतंत्रता, झुग्गियों, विद्यार्थियों तथा अन्य विविध मोर्चे के सतत युद्ध जैसी स्थितियों की दशा कहीं ज्यादा रही होगी.वैसे दिल जीतने में तुम्हें बमुश्किल ही परेशानी होती थी. लड़ते हुए लोग सभी जगहों पर एक जैसे ही होते हैं और तुम उनके संघर्ष के आम मुहाबरों से आसानी से जुड़ गयी होगी. और जहाँ भाषायी बाधा रही होगी वहाँ तुम इसे आसानी से लांघते हुए एक नई भाषायी बोली को अपना लेती होगी. जबकि हिन्दी, अंग्रेजी, मराठी के अलावे तुम गुजराती गोंदी और यहाँ तक कि तेलगू की अल्पग्य भी थी.और उस दिन इ.पी.डब्ल्यू. में कृष्णा बंदोपाद्यायाय के आख्यान से गुजरते हुए मैं अपने को आश्चर्य चकित होने से नहीं रोक सका कि तुम्हारे आख्यान को कैसे पढा़ जायेगा.तुम्हारे सभी अनुभवों को जो हम सभी पुरूष कामरेडों के बरताव से हुए. लीडर, आर्गनायजर, गुरिल्ला, कमेटी मेम्बर, नीति निर्धारक, एक्टविस्ट बनने के वो सभी अनुभव, खासकर वो सारी परीक्षायें और ट्रायल जो महिला क्रंतिकारी बनने के चयन करने वाली को देना होता है.वस्तुतः मैं केवल बहुत ही परावर्तित और अपरावर्तित रूपों में उन अनुभवों को जान सकता हूँ. जैसे मैं जानता कि श्रेष्ठ कामरेडों की मानक छडी़ से तुम्हारे किसी कार्य की मानक तुलना का मानसिक जोड़ करना हम पुरूष मस्तिस्क के लिये कितना और किसी पुरूष के विवेकी सलाह को फटकार नहीं समझना कितना कठिन है. यह भी कि एक पुरूष का क्रोध महिमा मंडित हो सकता है और स्त्री का क्रोध महज चिड़चिडा़पन, पुरूष के आँसु इतने गम्भीर जबकि स्त्री के ब्लैक मेलिंग से मिलते जुलते. और कैसे किसी महिला को उस पौरूषीय आकांछी रूढ़ धारणा में संभवतः केवल संघर्ष रत होना होता है नकि किसी सांचागत सामर्थ्य में.अनु मैं जानता हूँ कि तुम्हारा हस्तक्षेप पहला होगा जिससे चीजें बदलने लगी. पितृ सत्ता के विरूद्ध सुधारवादी मुहिम पुरुषवादी वर्चस्व के स्तम्भ को अगर धराशायी नहीं कर रहा था (आन्दोलन के अन्दर और बाहर) तो भी नेतृत्व कट के गिर रहे थे. महिला सदस्यों की संख्या में बृद्धि हो रही थी. लेकिन यह भी तुम बेहतर जानोगी कि जब चीजें बदलती हैं तो कुछ ऎसी भी चीजें होती हैं जो यथास्थिति को बरकरार रखना चाहती हैं.और सतत सुधार्वादी लहरों की मांग रखती हैं. वो तुम और तुम्हारी बहनों के उत्कर्ष बिन्दु से कहानी कहने की मांग करती हैं.तुमने चीजों को न केवक अपने अनुभवों से देखा किन्तु उन हजारों कार्यकर्ताओं की दृष्टि से भी देखा, जिनमे तुम्हारा सामना देश के प्रत्येक कोने में हुआ था. तुमने महिलाओं के लिये नीति प्रतिपादन करने में हिस्सेदारी की और उसके कार्यान्वयन के लिये आगे बढी़. तब तुम्हारी कहानी अलग होगी ये वो कहानी है जिसे सुनाया जाना बाकी है.और यही वो था जो मैं तुम्हारे बारे में उस हप्ते लिखना चाहता था. जब अप्रैल के उस हप्ते ई.पी.डब्लू. में कृष्णा अपनी कहानी को सुना रही थी. तुमसे कहने के लिये कि तुम उस कहानी को सुनाने का प्रयास करो जो कृष्णा की कहानी के दशकों पार संवाद कर सकें. एक कहानी जिसे दसियों हजार कहानी कहनी है. आने वाले कल के उन असंख्य लड़के, लड़कियों से कई कृष्णाओं से और कई अनुओं से.लेकिन अनु इससे पहले कि मैं यह आंक पाता कि तुम तक पहुंच संभव है भी या नहीं कि ठीक उसी हप्ते के अखबार से हमे पता चला कि सेरीब्रल मलेरिया तुम्हें शहीद कर चुका है.स्मृतियों के बाढ़ से लहरें उतरती और यकायक आंसुओं को धक्का दे जाती और लगता है कि आँसु का प्रत्येक टुकडा़ कहानी कहने के लिये चीखना चाहता है-जो कहानी तुम्हारी है, उसकी है, हमारी है. एक कहानी जो बगैर नैतिकतावादी हुए सैकडो़ आदर्श/आचार गढे़गी, जो बगैर दाहक हुए लाखों मनों को जला सकती है. उस अनु की कहानी जो किसी दिन कही जायेगी किसी अनु के द्वारा.और अनु, सलाखें लगभग एक इंच मोटी हैं. लेकिन वे अरबों आत्माओं, करोडो़ं मन के लौ के साथ खडे़ रहने के लिये नहीं बने हैं. जैसे हजारों और अब लाखों कार्यकर्ता दृढ़ता से तुम्हारे रास्ते पर चलेंगे, आगे बढे़ंगे और नये क्षितिज मांपेंगे. उनके सामने से सलाखें व अन्य बाधायें उनको बनाये रखने वाले बिखर कर भागेंगे. पूरी दुनिया में और पूरे भारत में भी पुराने तरीके से शासित होने के अस्वीकार घोषणा कर रही गुस्से से उठी जनता की मुट्ठीयों के सामने साम्राज्यवाद और उनके शासक एजेन्ट का संकट निवर्तमान हो जाने को होगा इस प्रकार कि जैसा कि हो सकता है हमने कल्पना भी न की हो. जिस कल का हमने स्वप्न देखा है उसे वे जन्म दे रहे होंगे और हम वहाँ होंगे. तुम्हारा- छोटू, जेल से, मई २००८ &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3857696409871553743-2133919204486518173?l=dakhalkiduniya.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dakhalkiduniya.blogspot.com/feeds/2133919204486518173/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.blogger.com/comment.g?blogID=3857696409871553743&amp;postID=2133919204486518173' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3857696409871553743/posts/default/2133919204486518173'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3857696409871553743/posts/default/2133919204486518173'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dakhalkiduniya.blogspot.com/2008/11/blog-post_26.html' title='तुम्हारी कहानी कही जानी चाहिये:-'/><author><name>चन्द्रिका</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08498808385035641834</uri><email>chandrika.media@gmail.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' name='OpenSocialUserId' value='13859221743332310890'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_06z5ZQ7dCYo/SSzLFJnbzuI/AAAAAAAAAaY/36ScLzr62QM/s72-c/Image011.jpg' height='72' width='72'/><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3857696409871553743.post-1372604850472951666</id><published>2008-11-24T11:55:00.002+06:00</published><updated>2008-11-24T12:16:37.857+06:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अनुराधा गांधी'/><title type='text'></title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#ff6600;"&gt;अनुराधा गांधी को याद करते हुए&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;                    &lt;em&gt; :-रमालू&lt;/em&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span class=""&gt;स्नेह&lt;/span&gt; का एक प्रतीक याद करते हुए आँखें नमनाक हैं. तुम्हारे साथ गुजारे हुए दोस्ती के स्नेही पल अभी भी मेरी मुट्ठी में शेष बचे हैं. ११ अप्रेल को ५४ वर्ष की ही उम्र में दुनिया को तुमने विदा कह दिया.अनुराधा गांधी एक मानवतावादी थी. उनके पिता कुर्ग कर्नाटक से थे जो कम्युनिष्ट पार्टी ट्रेड यूनियन के कार्यकर्ता थे.बाद में वकालत के पेशे के साथ वे बाम्बे आ गये.और अनुराधा की पढा़ई लिखाई बाम्बे में हुई.महाराष्ट्र में नागरिक स्वतंत्रता अधिकार के लिये उसने एक अहम भूमिका अदा की उसने क्रांतिकारी आंदोलन में छ्त्रों के नवजवान भारत सभा में आवाह्ननाट्य मंडल को खडा़ करने में भी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी निभाई. १९७० में आज़ादी के बाद एक नयी पीढी़ नये विचारों के साथ उदित हुई. जिसने इस समाज को पूरी तरह समता पर आधारित बनाना चाहा, अनुराधा उस नौजवान शिक्षित पीढी़ की अगली पंक्ति में थी जो अपने समय के विभिन्न आंदोलनों के साथ खडे़ थे. वह उनमे से एक थी जिन्होंने आराम की जिन्दगी छोड़कर समाज में व्याप्त बुराईयों के खिलाफ संघर्ष का रास्ता चुना.मेरा परिचय उनसे तब हुआ जब बाम्बे में अपनी उच्च शिक्षा को समाप्त कर वे क्रान्तिकारी आंदोलन का एक हिस्सा बन लेक्चरर के रूप में नागपुर आयी.आंदोलन में सांस्कृतिक गतिविधियों की अहमियत को समझते हुए १९८३ में उन्होंने ए.आई.एल.आर.सी. (आल इंडिया लीग फार रिवोल्यूसनरी कल्चर) को बनाने में एक सक्रिय योगदान दिया.१९९६ तक वे इसकी सेन्ट्रल कमेटी की मेम्बर रही और इस दौरान उन्होंने कई सफल कार्यक्रम का आयोजन करवाया अपनी गतिविधियों को पूरा करने के लिये वह एक सायकिल से चला करती थी. जल्द ही नागपुर छोड़कर वे आदिवासी क्षेत्र में एक पूर्णकालिक कार्यकर्ता के रूप में चली गयी.मुझे याद आ रहा है १९८३ में जब ए.आई.एल.आर.सी. द्वारा दिल्ली में पहला कार्यक्रम लिया गया विरसम के कुछ वरिष्ठ सदस्यों (आन्ध्र प्रदेश क्रान्तिकारी लेखक संघ) ने हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाये जाने की तरफदारी की थी यह अनुराधा ही थी जिसने बडी़ स्पष्टता के साथ क्षेत्रीय भाषाओं के विकास को ऎतिहासिक परिप्रेक्ष में समझाया और बताया कि मातृभाषा किस तरह से मानवसमुदाय के लिये सहज ग्राह्य होती है व उसकी क्या प्रक्रिया होती है. सारे प्रश्नों के जबाब को व्याख्यायित करते हुए उसने सबको संतुस्ट कर दिया.जुलाई १९८५ की बात है जब ७ क्रंतिकारी संगठन के प्रतिनिधि के रूप में मैं, वरवर राव, गदर, संजीव, और डोला किस्ट राजू हैदराबाद से पूरे भारत भ्रमण पर निकले थे.हमारा पहला ठहराव नागपुर था. यह अनुराधा गांधी थी जो नागपुर की एक दलित बस्ती में किराये के मकान में रहती थी और बडी़ गर्म जोशी के साथ हमारा स्वागत किया था.उसके बाद उन्होंने आंध्रप्रदेश में क्रान्तिकारी आंदोलन पर हो रहे दमन के खिलाफ सीता बर्डी के एक हाल में एक सभा आयोजित करवायी थी. जाने माने समाज सुधारक बाबा आम्टे इसमे मुख्य अतिथि के रूप में सम्मलित हुए थे.महाराष्ट्र के क्रांतिकारी आंदोलन को उभारने में अनुराधा गांधी ने एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा की उन्होंने कई लेखकों संस्कृति कर्मियों छात्रों और युवाओं को संगठित किया इस मायने में उनके योगदान को कभी भुलाया नहीं जा सकता. क्रंतिकारी आंदोलन के अखिल भारतीय स्तर पर सेमिनार आयोजित करने में मुख्यतः उनके सुझाव और चर्चाओं में वे बडे़ स्तर की अवधारणा को पेश करती थी. क्रांतिकारी आंदोलन में राष्ट्रीयता, जातिप्रथा, महिला के सवालों को लेकर व आंदोलन में छात्रों और कामगार वर्ग के संगठन में नयी उर्जा की सहायक भूमिका आदि विषय पर. उनके प्रयास व कार्य क्रांतिकारी महिला आंदोलन के लिये मार्ग दर्शक होते थे.क्रांतिकारी आंदोलन के ढांचे को व्यापक बनाने में भी उनके सुझाव मदद करते थे. उन्होंने अंबेडकर के विचारों पर जाति के मसले को हल करने को लेकर एक नयी अंतर्दृष्टि दी. महाराष्ट्र में उन्होंने एक ऎसी व्यवस्था विकसित की जहाँ महिलायें महिलाओं के लिये एक विशिष्ट सत्र आयोजित करें. समस्याओं को चिन्हित कर खास समस्याओं के लिये रिजोल्यूसन बनायें और व्यवहारिकता के लिये एक मार्ग दर्शक सूत्र बनायें. उन्होंने जीवन साथी के रूप में कोबड गांधी को चुना और खुद को व्यवहारिक रूप से वर्गच्युत किया. वह आदिवासियॊं के साथ जंगलों में घूमती थी. जंगलों में घूमते हुए उन्हें मलेरिया हुआ और ब्रेन तक पहुचने के कारण उनकी मौत हो गयी. वह आपने कार्यों को बडी़ दिल्लगी के साथ करती थी. एक एक बेहतर कल के लिये वह लोगों को संगठित करती थी और यह सब करते हुए उन्होंने इस दुनिया को अलविदा कह दिया.&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3857696409871553743-1372604850472951666?l=dakhalkiduniya.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dakhalkiduniya.blogspot.com/feeds/1372604850472951666/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.blogger.com/comment.g?blogID=3857696409871553743&amp;postID=1372604850472951666' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3857696409871553743/posts/default/1372604850472951666'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3857696409871553743/posts/default/1372604850472951666'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dakhalkiduniya.blogspot.com/2008/11/blog-post_24.html' title=''/><author><name>चन्द्रिका</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08498808385035641834</uri><email>chandrika.media@gmail.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' name='OpenSocialUserId' value='13859221743332310890'/></author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3857696409871553743.post-1119559260504476163</id><published>2008-11-14T14:23:00.003+06:00</published><updated>2008-11-14T14:39:47.499+06:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='kavita'/><title type='text'>फिलिस्तीनी जन-संघर्षों के कवि महमूद दरवीस की कविता:-</title><content type='html'>लिखो कि&lt;br /&gt;मैं एक अरब हूँ&lt;br /&gt;मेरा कार्ड न. ५०,००० है&lt;br /&gt;मेरे आठ बच्चे हैं &lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_06z5ZQ7dCYo/SR049pHNauI/AAAAAAAAAaQ/PmxIrpPdhDY/s1600-h/images.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5268429770752617186" style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; WIDTH: 95px; CURSOR: hand; HEIGHT: 124px" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_06z5ZQ7dCYo/SR049pHNauI/AAAAAAAAAaQ/PmxIrpPdhDY/s400/images.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;नौवा अगली गर्मी में होने जा रहा है&lt;br /&gt;नाराज तो नहीं हो?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लिखो कि&lt;br /&gt;मैं एक अरब हूँ&lt;br /&gt;अपने साथियों के साथ पत्थर तोड़ता हूँ&lt;br /&gt;पत्थर को निचोड़ देता हूँ&lt;br /&gt;रोटी के एक टुकडे़ के लिये&lt;br /&gt;एक किताब के लिये&lt;br /&gt;अपने आठ बच्चों के खातिर&lt;br /&gt;पर मैं भीख नहीं माँगता&lt;br /&gt;और नाक नहीं रगड़ता&lt;br /&gt;तुम्हारी ताबेदारी में&lt;br /&gt;नाराज तो नहीं हो?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लिखो कि&lt;br /&gt;मैं एक अरब हूँ&lt;br /&gt;सिर्फ एक नाम, बगैर किसी अधिकार के&lt;br /&gt;इस उन्माद धरती पर अटल&lt;br /&gt;मेरी जडें गहरी गई हैं&lt;br /&gt;युगों तक&lt;br /&gt;समयातीत हैं वे&lt;br /&gt;मैं हल चलाने वाले&lt;br /&gt;किसान का बेटा हूँ&lt;br /&gt;घास-फूस की झोपडी़ में रहता हूँ&lt;br /&gt;मेरे बाल गहरे काले हैं&lt;br /&gt;आँखें भूरी&lt;br /&gt;माथे पर अरबी पगडी़ पहनता हूँ&lt;br /&gt;हथेकियाँ फटी-फटी है&lt;br /&gt;तेल और अजवाइन से नहाना पसंद करता हूँ&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेहरबानी कर के&lt;br /&gt;सबसे ऊपर लिखो कि&lt;br /&gt;मुझे किसी से नफरत नहीं है&lt;br /&gt;मैं किसी को लूटता नहीं हूँ&lt;br /&gt;लेकिन जब भूखा होता हूँ&lt;br /&gt;अपने लूटने वालों को&lt;br /&gt;नोचकर खा जाता हूँ&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खबरदार&lt;br /&gt;मेरी भूख से खबरदार&lt;br /&gt;मेरे क्रोध से खबरदार॥&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3857696409871553743-1119559260504476163?l=dakhalkiduniya.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dakhalkiduniya.blogspot.com/feeds/1119559260504476163/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.blogger.com/comment.g?blogID=3857696409871553743&amp;postID=1119559260504476163' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3857696409871553743/posts/default/1119559260504476163'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3857696409871553743/posts/default/1119559260504476163'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dakhalkiduniya.blogspot.com/2008/11/blog-post_14.html' title='फिलिस्तीनी जन-संघर्षों के कवि महमूद दरवीस की कविता:-'/><author><name>चन्द्रिका</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08498808385035641834</uri><email>chandrika.media@gmail.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' name='OpenSocialUserId' value='13859221743332310890'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_06z5ZQ7dCYo/SR049pHNauI/AAAAAAAAAaQ/PmxIrpPdhDY/s72-c/images.jpg' height='72' width='72'/><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3857696409871553743.post-8185778779747607754</id><published>2008-11-12T14:55:00.000+06:00</published><updated>2008-11-12T15:02:35.800+06:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='education'/><title type='text'>संसद में मैकाले हंस रहा था :-</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;एक लम्बे अर्से बाद छः से चौदह वर्ष के बच्चों को अनिवर्य रूप से शिक्षा मुहैया करवाने वाले शिक्षा के अधिकार विधेयक को केन्द्रीय मन्त्रीमण्डल ने कानूनी रूप से स्वीकृति दे दी है.संविधान के नीतिनिर्देशक तत्व में अनुच्छेद ४५ के तहत यह यह अनिवार्यता दी गयी है नीतिनिर्देशक तत्व की यह एक मात्र धारा थी जिसमे १० वर्ष के समय की बचन बद्धता थी. बचन बद्धता के पचास साल बाद शिक्षा के अधिकार की मंजूरी को कुछ विफल एतिहासिक दावों और भविष्य में प्राथमिक शिक्षा से निर्मित  होने वाले समाज के आलोक में देखने की जरूरत है.            १९५५ मेम जब प्रायमरी स्कूलों को आरम्भ करने का निर्णय लिया गया था तब से एक सुधारवादी अवधारणा के साथ यह बात सामने आनी शुरू हुई कि प्राथमिक शिक्षा का उत्तरोत्तर विकास होगा. जिसको लेकर समय समय पर कई समितियां बनायी गयी, और कुछ नये तरह के बदलाव भी किये गये. पर इन ५० वर्ष के दौरान प्राथमिक शिक्षा की जो स्थिति रही और वर्तमान में जो है वह एक निराशाजनक ही कही जा सकती है.. प्राथमिक स्कूलों की स्थिति, पाठ्यपुस्तकें, और शिक्षण की प्रक्रिया के साथ ५७.६१ प्रतिशत छात्र आज भी प्राथमिक शिक्षा को बीच में ही छोड़ देते हैं. ऎसे में इस अधिकार को मंजूरी मिलना आम जन जो अपने बच्चों को पब्लिक स्कूल या महगे शिक्षण संस्थानों की शिक्षा को नहीं खरीद पा रहा है व असमानता की इस खाई में उसका आक्रोश वर्गीय आधार पर बढ़ता जा रहा है कही यह विधेयक उनके सब्र का झुनजुना तो नहीं है. १९८६ मेम नई शिक्षा नीति लागू होने के साथ तत्कालीन शिक्षा मंत्री कृष्ण चंद पंत ने शिक्षा स्थायी समिति के सामने यह बयान दिया था कि १९९० तक सभी को प्राथमिक शिक्षा प्राप्त हो जायेगी पर २२ वर्ष बाद आज जो आंकडे़ हमारे सामने हैं वो इन दावों को खोखला ही साबित करते हैं. प्राथमिक शिक्षा को लेकर १९६४ में डा. डी. एस. कोठारी की अध्यक्षता में गठित आयोग ने शिक्षा दिये जाने की अवधारणा पर सवाल उठाते हुए कहा था कि शिक्षा प्रणाली बच्चों को मूल्य युक्त शिक्षा देने के बजाय उसे एक छोटे से अल्प मत के लिये उपलब्ध करा पाती है जो योग्यता से नहीं बल्कि फीस देने की क्षमता से बनता है. समतावादी आदर्श समाज के विपरीत यह एक अलोकतांत्रिक स्थिति है जिससे आम जन के बच्चे निम्न स्तर की शिक्षा पाने या न पाने को मजबूर हैं. जबकि सम्पन्न वर्ग अच्छी शिक्षा खरीदने में समर्थ है. ऎसी स्थिति में शिक्षा की समता के लिये जन शिक्षा को सर्वमान्य प्रणालि की ओर बढ़्ना होगा. बावजूद इसके कि इसका कार्यान्वयन इमानदारी से किया जाता यह पूरी तरह से रद्दी की टोकरी में पडी़ रही.और १९८६ में नई शिक्षा नीति की समीक्षा के लिये राममूर्ति कमेटी गठित की गयी जिसने मूल्य आधारित शिक्षा के नाम पर धर्म और अवैग्यानिक शिक्षा पर ज्यादा जोर दिया. जब इस पर सवाल उठा तो कोर्ट ने धर्म को उदारवादी अवधारणा के रूप में देखने की बात कही. इस लिहाज से पुस्तकों के लेखकों और सत्ता में आसीन विभिन्न विचारधारा की पार्टीयों को अपने मुताबिक इसे व्याख्यायित करने का मौका मिला. और जब भाजपा केन्द्र में आयी या जिन राज्यों में सत्ता सीन हुई अपने विचारों के अनुरूप किताबों का धार्मिकीकरण और साम्प्रदायिकी करण किया. अब बच्चों को ग से गमला की जगह ग से गणेश हो गया. सवाल यह उठता है कि जब प्राथमिक शिक्षा के अधिकार का विधेयक पास हो चुका है तो उसका आम जन को और सम्पूर्णता मेम समाज को क्या लाभ होने जा रहा है. लोग अंगूठा लगाने के बजाय हस्ताक्षर करना सीख जायेंगे और और साक्षरता का प्रतिशत थोडा़ बढ़ जायेगा जिसे सरकारें विकसित होने की प्रक्रिया में एक उपलब्धि के तौर पर गिनायेंगी पर अगूठा लगाने और हस्ताक्षर करने के बीच कोई खास फर्क नहीं दिखता. और सरकारे उस समझ तक आम जन को नहीं जानें देना चाहती जहा वे अपने हक अधिकार को समझ सकें अपने शोषण के विरुद्ध लड़ सकें. अन्ततः यह शिक्षा अधिकार का कानून किनके हितों की पूर्ति करेगा इस बात को समझने की जरूरत है.              शिक्षा की अवधारणा मानवीय विकास के पीढी़ गत हस्तांतरण को लेकर होनी चाहिये थी. अपने देश के लोगों सहित विश्व की संचित संस्कृतियों के सर्वोत्तम त्त्वों से बच्चों का परिचय सीखने की उत्सुकता व चाहत जगाना अप्ने ग्यान को वे खुद बढा़यें बच्चों में इस तरह की क्षमता पैदा करना होना चाहिये . पर वर्गीय आधार पर स्कूलों का विभाजन जहाँ जिस  वर्ग के पास पब्लिक स्कूल में अपने ब्च्चों को भेजने और महंगी शिक्षा को खरीदने की क्षमता है वह अपने मनमाफिक पाठ्यपुस्तकों को खरीदने के लिये आजाद है. सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले वर्ग के बच्चों को एक ही तरह की पाठ्यपुस्तकें थोप दी गयी हैं. पाठ्यपुस्तकों के सातह जो सबसे बडी़ समस्या दिखती है वह यह कि घटनाओं, व समाज के विकास, इतिहास, को एक कहानी के रूप में चित्रित कर दिया गया है जहाँ बच्चे को यह नही बताया जाता कि यह इतिहास कैसे निकाला गया इसके सही होने के क्या प्रमाण हैं पुस्तकें विवरणों का ढेर बनकर रह गयी हैं जो जिग्यासा को ग्यान की प्रक्रिया नहीं मानती . अतः बच्चों के मनोविग्यान  मेम आस्थावादी भावना को विकसित किया जाता है . दूसरी तरफ पब्लिक स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों को एक ऎसी संस्कृति में ढाला जाता है जहाँ वे टाइ जूते के साथ साफ सफाई युक्त एक खास तरह की संस्कृति में पलत्व हैं और समाज के यथार्थ से दूर रहते हुए समाज की गरीबी भूख बेरोजगारी अन्याय के संघर्षों को जानने से महरूम रह जाते हैं यह मध्यम वर्ग की मानसिकता को विकसित करने का पहला चरण होता है  ऎसे में समान शिक्षा की अवधारणा को लागू करना ही समता की तरफ बढ़ना हो सकता है. शिक्षा का पतन राजनैतिक व सांस्कृतिक पतन है प्राथमिक शिक्षा को सभी के लिये जरूरी है पर यह न तो वर्गीय विभाजन के आधार पर होनी चाहिये न ही थोपी गयी हो बल्कि एक ऎसी व्यवस्था को इजाद करना होगा जहाँ बच्चे ग्यान को खुद से बढा़ने कि क्षमता पैदा कर सकें और आम जन के संघर्षों से जुड़ सकें.&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3857696409871553743-8185778779747607754?l=dakhalkiduniya.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dakhalkiduniya.blogspot.com/feeds/8185778779747607754/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.blogger.com/comment.g?blogID=3857696409871553743&amp;postID=8185778779747607754' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3857696409871553743/posts/default/8185778779747607754'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3857696409871553743/posts/default/8185778779747607754'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dakhalkiduniya.blogspot.com/2008/11/blog-post.html' title='संसद में मैकाले हंस रहा था :-'/><author><name>चन्द्रिका</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08498808385035641834</uri><email>chandrika.media@gmail.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' name='OpenSocialUserId' value='13859221743332310890'/></author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>0</thr:total></entry></feed>