tag:blogger.com,1999:blog-361051132008-05-03T09:08:57.954-07:00सुखसागर से.....जुड़िये गँठजोड़ मित्र समुदाय से! (gathjod.com)http://www.blogger.com/profile/09998235662017055457noreply@blogger.comBlogger114125tag:blogger.com,1999:blog-36105113.post-38610295716094763422007-08-01T21:03:00.000-07:002007-08-01T21:08:42.949-07:00तमसा के तट परप्रजाजनों को रथ के पीछे दौड़ते देखकर राम ने रथ को रुकवाया और उन्हें सम्बोधित करते हुये बोले, "प्रिय अयोध्यावासियों! मैं जानता हूँ कि तुम लोगों का मेरे प्रति अटूट और निश्छल प्रेम है इसीलिये तुम लोग मुझे बार-बार अयोध्या लौट चलने का आग्रह कर रहे हो। मेरे लिये तुम्हारे इस प्रेम को टालना भी अत्यन्त ही कठिन है। किन्तु मैं तुम लोगों से आग्रह करता हूँ कि तुम लोग मेरी विवशता को समझने का प्रयास करो। क्या जुड़िये गँठजोड़ मित्र समुदाय से! (gathjod.com)http://www.blogger.com/profile/09998235662017055457noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-36105113.post-84931789105718317822007-07-31T05:08:00.000-07:002007-07-31T05:15:06.012-07:00मेरी पसंद की कुछ काव्य रचनाएँअपने कम्प्यूटर को फॉर्मेट करते समय गलती से मेरी महाभारत संबंधी सामग्री भी मिट गई इसलिये कुछ समय के लिये मैं महाभारत को मुल्तवी कर रहा हूँ। ज्योंही महाभारत संबंधी लेखों को मैं फिर से पूरा करूँगा, आपकी सेवा में हाजिर कर दूँगा। तब तक के लिये मैं अपनी पसंद की काव्य रचनाओं से आपको अवगत कराता हूँ।
हरि हरसे हरि देखकर, हरि बैठे हरि पास।
या हरि हरि से जा मिले, वा हरि भये उदास॥
(अज्ञात)
उपरोक्त दोहा जुड़िये गँठजोड़ मित्र समुदाय से! (gathjod.com)http://www.blogger.com/profile/09998235662017055457noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-36105113.post-33050218569709769822007-02-23T00:09:00.000-08:002007-02-23T00:11:02.665-08:00युद्ध - भीष्म की मृत्युचतुर्थ से नवम दिवस तक का युद्ध रोज की तरह सामान्य रूप से चलता रहा। अर्जुन, भीम और अभिमन्यु के साथ ही साथ अन्य पाण्डवगण कौरवों की सेना का महासंहार कर रहे थे। पाण्डव पक्ष की अपेक्षा कौरव पक्ष का ही अधिक नाश हो रहा था। इधर कौरवों के पक्ष से लड़ते हुये भीष्म पितामह ने पाण्डव सेना में तहलका मचा दिया था। वे अकेले ही समस्त पाण्डवों को भारी पड़ रहे थे। नौवें दिन के युद्ध में तो उन्होंने ऐसे पराक्रम का जुड़िये गँठजोड़ मित्र समुदाय से! (gathjod.com)http://www.blogger.com/profile/09998235662017055457noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-36105113.post-77587318724538819842007-02-20T23:45:00.000-08:002007-02-20T23:46:28.476-08:00युद्ध - तृतीय दिवससंजय बोले, "तृतीय दिवस भीष्म पितामह ने गरुड़ व्यूह की रचना की तो धृष्टद्युम्न ने अर्धचन्द्राकार व्यूह की। व्यूह रचना होते ही दोनों पक्षों के मध्य घोर संग्राम आरम्भ हो गया। रणभूमि में शवों, तथा सैनिकों के कटे हुये अंगों के ढेर लगने लगे और रक्त की नदियाँ बहने लगीं। भीमसेन, घटोत्कच, सात्यकी, अभिमन्यु कौरव सैनिकों को गाजर-मूली के जैसे काटने लगे। अर्जुन जिधर से भी नकल जाते थे उधर कौरव सैनिकों में जुड़िये गँठजोड़ मित्र समुदाय से! (gathjod.com)http://www.blogger.com/profile/09998235662017055457noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-36105113.post-14257272829499564202007-02-19T00:07:00.000-08:002007-02-19T00:08:07.858-08:00युद्ध - द्वितीय दिवसप्रथम दिवस के युद्ध की समाप्ति के पश्चात् व्याकुल होकर युधिष्ठिर श्री कृष्ण के पास पहुँचे और बोले, "हे केशव! आज के युद्ध में भीष्म पितामह के पराक्रम को देखकर प्रतीत होता है कि हम लोगों के विजय की संभावना ही नहीं है; इसलिये अब मैं इन राजाओं का व्यर्थ नाश नहीं कराना चाहता। मैं शेष जीवन वन में ही रहकर व्यतीत कर दूँगा।" इतना कहते-कहते उनकी आँखों में अश्रु भर आये। इस पर भगवान श्री कृष्ण ने कहा, "हे जुड़िये गँठजोड़ मित्र समुदाय से! (gathjod.com)http://www.blogger.com/profile/09998235662017055457noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-36105113.post-62829817467114987912007-02-16T20:03:00.000-08:002007-02-16T20:05:04.014-08:00युद्ध - प्रथम दिवससंजय बोले, "हे राजन्! युद्ध के आरम्भ होते ही दोनों सेनाएँ परस्पर भिड़ गये। कुन्तीतनय भीमसेन दहाड़-दहाड़ कर आपके पुत्रों पर ऐसे टूट रहे थे जैसे कि सिंह मृगों के समूह पर टूट पड़ता है। देखते ही देखते उन्होंने अनेक वीरों को यमलोक पहुँचा दिया। उनके इस पराक्रम से कौरव सेना में खलबली मच गई और वे मैदान छोड़ भागने लगे। अपनी सेना का मनोबल टूटते देखकर आपके पुत्र दुर्योधन, दुःसह, शल, दुःशासन, दुर्मर्षण, विविंशति जुड़िये गँठजोड़ मित्र समुदाय से! (gathjod.com)http://www.blogger.com/profile/09998235662017055457noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-36105113.post-74440913178617247282007-02-15T13:34:00.000-08:002007-02-15T13:40:14.761-08:00एक बार फिर कुछ औरहमारे मध्य श्री गुप्त जी हैं जिनके ब्लॉग में मैंने कल एक टिप्पणी की थी तथा उसके प्रकाशित होने के लिये पूरे एक दिन की प्रतीक्षा की, किन्तु उनके चिट्ठे में अन्य लोगों की टिप्पणियाँ तो नज़र आईं पर मेरी टिप्पणी कहीं भी नहीं दिखी। इसलिये मैंने आज फिर से उनके चिट्ठे पर टिप्पणी मे लिखा है कि आखिर मेरी टिप्पणी में ऐसी क्या खामी थी कि उसे उन्होंने प्रकाशित होने नहीं दिया। टिप्पणी थी उनके लेख "ढोल गँवार जुड़िये गँठजोड़ मित्र समुदाय से! (gathjod.com)http://www.blogger.com/profile/09998235662017055457noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-36105113.post-25410651289360618742007-02-14T22:10:00.000-08:002007-02-14T22:13:38.364-08:00आज फिर एक बार कुछ औरपरसों जब मैं 'कौन बनेगा करोड़पति' देख रहा था तभी वहाँ के कुछ प्रश्नों को सुनकर तथा उसके उत्तर में अज्ञानता को देख कर मेरे दिमाग में कौंधा कि आखिर हिंदी और हिंदू संस्कृति का हश्र क्या होने वाला है। प्रश्नों के उत्तर देने के लिये चयन हुआ था दिल्ली के युवा श्री सिद्धार्ध मिश्र जी का। प्रश्न था कि हिंदी के कहावत 'गागर में सागर' में गागर का अर्थ क्या है और विकल्प थे गिलास, घड़ा, बाल्टी तथा कुआँ। श्रीजुड़िये गँठजोड़ मित्र समुदाय से! (gathjod.com)http://www.blogger.com/profile/09998235662017055457noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-36105113.post-26655536204404284982007-02-13T21:11:00.000-08:002007-02-13T21:12:19.071-08:00अर्जुन का विषाद भंगसंजय धृतराष्ट्र से बोले, "इसके बाद भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन को कर्म-सन्यास योग, ध्यान योग, ज्ञान-विज्ञान योग, अभ्यास योग, राजगुह्य योग, विभूति योग, भक्ति योग, क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ विभाग योग, गुणत्रय विभाग योग, पुरुषोत्तम योग, देवासुर सम्पद्विभाग योग, श्रद्धात्रय विभाग योग, मोक्ष सन्यास योग आदि के गूढ़ रहस्यों को समझाकर अपने विश्व रूप का दर्शन कराया। इस प्रकार अर्जुन के विषाद का नाश हो गया और जुड़िये गँठजोड़ मित्र समुदाय से! (gathjod.com)http://www.blogger.com/profile/09998235662017055457noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-36105113.post-3633125363990479432007-02-12T23:43:00.000-08:002007-02-12T09:50:36.583-08:00ज्ञान कर्म सन्यास योगभगवान श्री कृष्ण बोले, "हे अर्जुन! अब मैं तुम्हारे समक्ष उस अविनाशी योग का वर्णन करता हूँ जिसे सहस्त्रों वर्ष पूर्व मैंने सूर्य को सुनाया था। अर्जुन ने जिज्ञासा प्रकट की, "प्रभु! आपका जन्म तो कुछ काल पूर्व ही हुआ है फिर आपने सूर्य को इसे सहस्त्रों वर्ष पहले कैसे सुनाया था?" श्री कृष्ण ने उत्तर दिया, "हे पार्थ! मेरे और तेरे न जाने कितने जन्म हो चुके हैं। उस सब को तू नहीं जानता, किन्तु मैं अवश्य जुड़िये गँठजोड़ मित्र समुदाय से! (gathjod.com)http://www.blogger.com/profile/09998235662017055457noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-36105113.post-38587490455992895022007-02-11T19:58:00.000-08:002007-02-11T02:55:40.073-08:00कर्म योगभगवान श्री कृष्ण के वचनों को सुनकर अर्जुन ने कहा, "हे जनार्दन! जब आप कर्मों की अपेक्षा ज्ञान को श्रेष्ठ तथा मान्य बताते हैं तो फिर मुझे कर्म करने के लिये क्यों कह रहे हैं? आपकी बातें मेरी बुद्धि को भ्रमित कर रही हैं।" श्री कृष्ण बोले, "हे निष्पाप! इस संसार में दो प्रकार की निष्ठायें हैं, एक तो है ज्ञान जिसे सांख्य योगी करते हैं और दूसरा है कर्म जिसे कर्म योगी करते हैं। प्रत्येक मनुष्य के लिये ये जुड़िये गँठजोड़ मित्र समुदाय से! (gathjod.com)http://www.blogger.com/profile/09998235662017055457noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-36105113.post-10897300662664368402007-02-11T00:28:00.000-08:002007-02-10T10:50:53.996-08:00सांख्य योगअर्जुन की इस दशा को देख कर भगवान श्री कृष्ण ने कहा, "हे पार्थ! तुझे इस असमय में ऐसा मोह कैसे प्राप्त हो गया। यह न तो श्रेष्ठ पुरुषों को शोभा देता है और न ही स्वर्ग प्रदान करने वाला है। अतः हे परंतप! अपनी तुच्छ दुर्बलता को त्याग कर युद्ध के लिये तत्पर हो जा।" उनके वचनों को सुनकर अर्जुन बोले, "हे माधव! युद्ध में मैं भीष्म पितामह और द्रोणाचार्य जैसे गुरुजनों का वध कैसे कर सकूँगा? इन को मारके राज्य जुड़िये गँठजोड़ मित्र समुदाय से! (gathjod.com)http://www.blogger.com/profile/09998235662017055457noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-36105113.post-45765498523200865532007-02-09T21:07:00.000-08:002007-02-09T19:25:20.322-08:00अर्जुन का विषाद योगधृतराष्ट्र ने संजय से पूछा, "हे संजय! धर्मभूमि कुरुक्षेत्र में युद्ध की कामना लेकर उपस्थित मेरे तथा पाण्डु के पुत्रों ने क्या किया?" संजय बोले, "हे राजन्! आपके तथा पाण्डु के पुत्रों ने अपनी-अपनी सेनाओं को व्यूहाकार देकर परस्पर एक दूसरे के समक्ष खड़ा कर दिया और हर्षित होकर शंख, भेरी, तुरही आदि वाद्यों से युद्धोचित ध्वनि निकालने लगे। उस समय व्यूह बनाये हुये आपके पुत्रों को देखकर अर्जुन ने हृषीकेश जुड़िये गँठजोड़ मित्र समुदाय से! (gathjod.com)http://www.blogger.com/profile/09998235662017055457noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-36105113.post-63052985313694150462007-02-08T21:26:00.001-08:002007-02-08T00:52:51.138-08:00युद्ध के नियमपाण्डवों ने अपनी सेना का पड़ाव समन्त्र पंचक तीर्थ के बाहर डाला और कौरवों ने उत्तम और समतल स्थान देखकर अपना पड़ाव डाला। उस संग्राम में बालक, स्त्रियों और वृद्धों को छोड़कर शेष सभी पुरुष भाग लेने आये थे। उसमें हाथी, घोड़े और रथों की कोई गणना नहीं थी। दोनों दलों के एकत्र होने पर कौरव-पाण्डव तथा अन्य सोमवंशी राजाओं ने मिलकर युद्ध के कुछ नियम बनाये। उनके बनाये हुये नियमों के अनुसार प्रतिदिन युद्ध सूर्योदयजुड़िये गँठजोड़ मित्र समुदाय से! (gathjod.com)http://www.blogger.com/profile/09998235662017055457noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-36105113.post-49917091305681642172007-02-08T00:45:00.000-08:002007-02-08T00:44:57.527-08:00बर्बरीक वधपोस्ट आरम्भ करने के पूर्व एक सूचना देना चाहता हूँ कि आज से मैंने "वाल्मीकि रामायण" नाम से एक नया ब्लॉग आरम्भ किया है जिसमें मैं संक्षिप्त में आदिकवि वाल्मीकि रचित महाकाव्य "रामायण" का हिंदी रूपांतर दे रहा हूँ। आशा करता हूँ कि ब्लॉंग आप सभी को पसंद आयेगा। इस नये ब्लॉग का url है http://vramayan.blogspot.com
वैसे यह हिंदी रूपांतर मेरे वेबसाइट में पहले से है किन्तु ब्लॉग को लोग अधिक पसंद करते हैं जुड़िये गँठजोड़ मित्र समुदाय से! (gathjod.com)http://www.blogger.com/profile/09998235662017055457noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-36105113.post-35637307664278599632007-02-06T22:31:00.000-08:002007-02-06T22:33:57.194-08:00शिखण्डी की कथाउलूक ने कौरवों के शिविर में पहुँचकर दुर्योधन को पाण्डवों के द्वारा दिया गया संदेश ज्यों का त्यों सुना दिया। जब अन्त में उसने कहा कि शिखण्डी ने कहा है कि 'इस युद्ध में मेरा केवल एकमात्र उद्देश्य है - भीष्म के प्राण हरण करना।' तो दुर्योधन बोला, "पितामह जैसे पराक्रमी योद्धा को भला शिखण्डी क्या मार पायेगा?" उसकी बात सुनकर वहाँ पर उपस्थित भीष्म पितामह ने कहा, "दुर्योधन! शिखण्डी पूर्व जन्म में स्त्री जुड़िये गँठजोड़ मित्र समुदाय से! (gathjod.com)http://www.blogger.com/profile/09998235662017055457noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-36105113.post-19249936802566737712007-02-05T22:10:00.000-08:002007-02-06T22:35:20.903-08:00दुर्योधन का संदेशश्री कृष्ण की अध्यक्षता और धृष्टद्युम्न के सेनापतित्व में पाण्डवों की सेना ने प्रस्थान किया। कुरुक्षेत्र पहुँचकर एक युधिष्ठिर ने एक अच्छा स्थान देखकर पड़ाव डाल दिया। सहायता के लिये साथ आये सभी राजाओं के लिये उनके पद के अनुसार शिविर लगाये गये। उन सभी शिविरों में भोजन, औषधियाँ, अस्त्र-शस्त्र आदि की पर्याप्त व्यवस्था कर दी गई।
इधर दुर्योधन ने अपनी सेना को ग्यारह भागों में विभाजित कर कृपाचार्य, जुड़िये गँठजोड़ मित्र समुदाय से! (gathjod.com)http://www.blogger.com/profile/09998235662017055457noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-36105113.post-15316912741508819312007-02-04T22:22:00.001-08:002007-02-06T22:36:29.305-08:00कुन्ती-कर्ण संवादमहाभारत का युद्ध निश्चित हो जाने पर कुन्ती व्याकुल हो उठीं। वे नहीं चाहती थीं कि कर्ण का अन्य पाण्डवों के साथ युद्ध हो। वे कर्ण को समझाने के उद्देश्य से उनके पास पहुँची। कुन्ती का आया देखकर कर्ण उनके सम्मान में उठ खड़े हुये और झुक कर बोले, "आप प्रथम बार मेरे यहाँ आई हैं अतः आप इस 'राधेय' का प्रणाम स्वीकार कीजिये।"
कर्ण के इन वचनों को सुनकर कुन्ती का हृदय व्यथित हो गया और उन्होंने कहा, "पुत्र! जुड़िये गँठजोड़ मित्र समुदाय से! (gathjod.com)http://www.blogger.com/profile/09998235662017055457noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-36105113.post-1451659800419194912007-02-03T20:30:00.000-08:002007-02-06T22:37:09.049-08:00राजा नहुष की कथापाण्डवों ने युद्ध का निमत्रण मद्रदेश के राजा शल्य के पास भी भेजा। राजा शल्य पराक्रमी होने के साथ ही साथ नकुल और सहदेव के मामा भी थे। वे पाण्डवों के सहायतार्थ अपनी एक अक्षौहिणी सेना लेकर चले किन्तु दुष्ट दुर्योधन ने मार्ग में ही उनसे मिलकर उनकी अनेक प्रकार से सेवा करके तथा चिकनी-चुपड़ी बातें करके उन्हें अपनी ओर मिला लिया। जब बाद में विराट नगर के समीप जब युधिष्ठिर से उनकी भेंट हुई तो शल्य को जुड़िये गँठजोड़ मित्र समुदाय से! (gathjod.com)http://www.blogger.com/profile/09998235662017055457noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-36105113.post-74042764892033268052007-02-02T21:29:00.000-08:002007-02-02T21:31:30.150-08:00कृष्ण से सहायता की माँगपाण्डवों को राज्य न देने के अपने निश्चय पर दुर्योधन के अड़ जाने के कारण दोनों पक्ष मे मध्य युद्ध निश्चित हो गया तथा दोनों ही पक्ष अपने लिये सहायता जुटाने में लग गये।
एक दिन दुर्योधन श्री कृष्ण से भावी युद्ध के लिये सहायता प्राप्त करने हेतु द्वारिकापुरी जा पहुँचा। जब वह पहुँचा उस समय श्री कृष्ण निद्रा मग्न थे अतएव वह उनके सिरहाने जा बैठा। इसके कुछ ही देर पश्चात पाण्डुतनय अर्जुन भी इसी कार्य से जुड़िये गँठजोड़ मित्र समुदाय से! (gathjod.com)http://www.blogger.com/profile/09998235662017055457noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-36105113.post-72367395288580721402007-02-02T00:20:00.000-08:002007-02-06T22:39:31.073-08:00पाण्डवों का राज्य लौटाने का आग्रहराजा सुशर्मा तथा कौरवों को रणभूमि से भगा देने के बाद पाण्डवों ने स्वयं को सार्वजनिक रूप से प्रकट कर दिया। उनका असली परिचय पाकर राजा विराट को अत्यन्त प्रसन्नता हुई और उन्होंने अपनी पुत्री उत्तरा का विवाह अर्जुन के पुत्र अभिमन्यु के साथ बड़े ही धूमधाम के साथ कर दिया। इस विवाह में श्री कृष्ण तथा बलराम के साथ ही साथ अनेक बड़े-बड़े राजा-महाराजा भी सम्मिलित हुये।
अभिमन्यु के विवाह के पश्चात् पाण्डवों ने जुड़िये गँठजोड़ मित्र समुदाय से! (gathjod.com)http://www.blogger.com/profile/09998235662017055457noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-36105113.post-56086089886624738052007-01-31T23:24:00.000-08:002007-02-06T22:40:13.570-08:00कौरवों की पराजयअर्जुन के देवदत्त शंख की ध्वनि रणभूमि में गूँज उठी। उस विशिष्ट ध्वनि को सुनकर दुर्योधन भीष्म से बोला, "पितामह! यह तो अर्जुन के देवदत्त शंख की ध्वनि है, अभी तो पाण्डवों का अज्ञातवास समाप्त नहीं हुआ है। अर्जुन ने स्वयं को प्रकट कर दिया इसलिये अब पाण्डवों को पुनः बारह वर्ष का वनवास और एक वर्ष का अज्ञातवास भोगना होगा।" दुर्योधन के वचन सुनकर भीष्म पितामह ने कहा, "दुर्योधन! कदाचित तुम्हें ज्ञात नहीं हैजुड़िये गँठजोड़ मित्र समुदाय से! (gathjod.com)http://www.blogger.com/profile/09998235662017055457noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-36105113.post-17241507141964418272007-01-30T21:40:00.000-08:002007-02-06T22:40:55.017-08:00विराट नगर पर आक्रमणकीचक के वध की सूचना आँधी की तरह फैल गई। वास्तव में कीचक बड़ा पराक्रमी था और उससे त्रिगर्त के राजा सुशर्मा तथा हस्तिनापुर के कौरव आदि डरते थे। कीचक की मृत्यु हो जाने पर राजा सुशर्मा और कौरवगण विराट नगर पर आक्रमण करने के उद्देश्य से एक विशाल सेना गठित कर लिया। कौरवों ने सुशर्मा को पहले चढ़ाई करने की सलाह दी। उनकी सलाह के अनुसार सुशर्मा ने उनकी सलाह मानकर विराट नगर पर धावा बोलकर उस राज्य की समस्त जुड़िये गँठजोड़ मित्र समुदाय से! (gathjod.com)http://www.blogger.com/profile/09998235662017055457noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-36105113.post-69045598791905439852007-01-29T21:32:00.000-08:002007-02-06T22:41:31.215-08:00कीचक वधपाण्डवों को मत्स्य नरेश विराट की राजधानी में निवास करते हुये दस माह व्यतीत हो गये। सहसा एक दिन राजा विराट का साला कीचक अपनी बहन सुदेष्णा से भेंट करने आया। जब उसकी दृष्टि सैरन्ध्री (द्रौपदी) पर पड़ी तो वह काम-पीड़ित हो उठा तथा सैरन्ध्री से एकान्त में मिलने के अवसर की ताक में रहने लगा। द्रौपदी भी उसकी कामुक दृष्टि को भाँप गई। द्रौपदी ने महाराज विराट एवं महारानी सुदेष्णा से कहा भी कि कीचक मुझ पर जुड़िये गँठजोड़ मित्र समुदाय से! (gathjod.com)http://www.blogger.com/profile/09998235662017055457noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-36105113.post-48407853162947176252007-01-28T21:11:00.000-08:002007-02-06T22:42:03.845-08:00अज्ञातवास का आरम्भवनवास के बारहवें वर्ष के पूरे होने पर पाण्डवों ने अब अपने अज्ञातवास के लिये मत्स्य देश के राजा विराट के यहाँ रहने की योजना बनाई। उन्होंने अपना वेश बदला और मत्स्य देश की ओर निकल पड़े। मार्ग के एक भयानक वन के भीतर के एक श्मशान में उन्होंने अपने अस्त्र-शस्त्रों को छुपा कर रख दिया और उनके ऊपर मनुष्यों के मृत शवों तथा हड्डियों को रख दिया जिससे कि भय के कारण कोई वहाँ न आ पाये। उन्होंने अपने छद्म नाम भीजुड़िये गँठजोड़ मित्र समुदाय से! (gathjod.com)http://www.blogger.com/profile/09998235662017055457noreply@blogger.com