tag:blogger.com,1999:blog-341569992008-10-08T21:07:28.223-07:00दुष्यन्त कुमारडॉ॰ व्योमhttp://www.blogger.com/profile/10667912738409199754noreply@blogger.comBlogger9125tag:blogger.com,1999:blog-34156999.post-1158769590441881802006-09-20T09:23:00.000-07:002006-10-15T05:20:15.770-07:00दुष्यन्त कुमार<a href="http://www.geocities.com/dr_vyom/dushyant.jpg"><img style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 401px; CURSOR: hand; HEIGHT: 272px" height="203" alt="" src="http://www.geocities.com/dr_vyom/dushyant.jpg" border="0" /></a><br /><br /><span style="color:#990000;"></span><br /><span style="color:#990000;"></span><br /><span style="color:#990000;"></span><br /><span style="color:#990000;"></span><br /><span style="color:#990000;"></span><br /><span style="color:#990000;"></span><br /><span style="color:#990000;"></span><br /><span style="color:#990000;"></span><br /><span style="color:#990000;"></span><br /><span style="color:#990000;"></span><br /><span style="color:#990000;"></span><br /><span style="color:#990000;"></span><br /><span style="color:#990000;"></span><br /><span style="color:#990000;"></span><br /><br /><span style="color:#990000;">[मंच पर बैठे हुए सर्व श्री डॉ॰ जगदीश व्योम, संजीव गौतम, प्रताप दीक्षित, विनोद सोनकिया, ओमप्रकाश नदीम, नासिर अली नदीम, सोम ठाकुर, कमलेशभट्ट कमल, भावना तिवारी, शास्त्री नित्यगोपाल कटारे, जमुनाप्रसाद उपाध्याय, अशोक रावत]<br /></span><br /><br /><br /><br /><br /><br /><br /><br /><br /><br /><br /><br /><a href="http://www.geocities.com/dr_vyom/dushyant.jpg">दुष्यन्त कुमार</a>डॉ॰ व्योमhttp://www.blogger.com/profile/10667912738409199754noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-34156999.post-1157891002162795432006-09-10T05:22:00.000-07:002006-09-20T09:11:45.736-07:00परिचयपरिचयडॉ॰ व्योमhttp://www.blogger.com/profile/10667912738409199754noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-34156999.post-1157890901357160702006-09-10T05:19:00.000-07:002006-09-10T05:21:41.356-07:00कहीं पे धूप की चादरकहीं पे धूप की चादर बिछा के बैठ गए<br />कहीं पे शाम सिरहाने लगा के बैठ गए।<br /><br />जले जो रेत में तलवे तो हमने ये देखा<br />बहुत से लोग वहीं छटपटा के बैठ गए।<br /><br />खड़े हुए थे अलावों की आंच लेने को<br />सब अपनी अपनी हथेली जला के बैठ गए।<br /><br />दुकानदार तो मेले में लुट गए यारों<br />तमाशबीन दुकानें लगा के बैठ गए।<br /><br />लहू लुहान नज़ारों का ज़िक्र आया तो<br />शरीफ लोग उठे दूर जा के बैठ गए।<br /><br />ये सोच कर कि दरख्तों में छांव होती है<br />यहां बबूल के साये में आके बैठ गए।<br /><br /><div align="center"><span style="color:#990000;">-दुष्यन्त कुमार</span></div>डॉ॰ व्योमhttp://www.blogger.com/profile/10667912738409199754noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-34156999.post-1157890766097007192006-09-10T05:17:00.000-07:002006-09-10T05:19:26.100-07:00आज सड़कों पर लिखे हैंआज सड़कों पर लिखे हैं सैकड़ों नारे न देख<br />पर अंधेरा देख तू आकाश के तारे न देख।<br /><br />एक दरिया है यहां पर दूर तक फैला हुआ<br />आज अपने बाज़ुओं को देख पतवारें न देख।<br /><br />अब यकीनन ठोस है धरती हकीकत की तरह<br />यह हक़ीक़त देख लेकिन खौफ़ के मारे न देख।<br /><br />वे सहारे भी नहीं अब जंग लड़नी है तुझे<br />कट चुके जो हाथ उन हाथों में तलवारें न देख।<br /><br />ये धुंधलका है नज़र का तू महज़ मायूस है<br />रोजनों को देख दीवारों में दीवारें न देख।<br /><br />राख कितनी राख है, चारों तरफ बिखरी हुई<br /> राख में चिनगारियां ही देख अंगारे न देख।<br /><br /><div align="center"><span style="color:#990000;">-दुष्यन्त कुमार</span></div>डॉ॰ व्योमhttp://www.blogger.com/profile/10667912738409199754noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-34156999.post-1157890649767460522006-09-10T05:16:00.000-07:002006-09-10T05:17:29.766-07:00इस नदी की धार मेंइस नदी की धार में ठंडी हवा आती तो है<br />नाव जर्जर ही सही, लहरों से टकराती तो है।<br /><br />एक चिनगारी कही से ढूँढ लाओ दोस्तों<br />इस दिए में तेल से भीगी हुई बाती तो है।<br /><br />एक खंडहर के हृदय-सी, एक जंगली फूल-सी<br />आदमी की पीर गूंगी ही सही, गाती तो है।<br /><br />एक चादर साँझ ने सारे नगर पर डाल दी<br />यह अंधेरे की सड़क उस भोर तक जाती तो है।<br /><br />निर्वचन मैदान में लेटी हुई है जो नदी<br />पत्थरों से, ओट में जा-जाके बतियाती तो है।<br /><br />दुख नहीं कोई कि अब उपलब्धियों के नाम पर<br />और कुछ हो या न हो, आकाश-सी छाती तो है।<br /><br /><div align="center"><span style="color:#990000;">-दुष्यन्त कुमार</span></div>डॉ॰ व्योमhttp://www.blogger.com/profile/10667912738409199754noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-34156999.post-1157890517275397122006-09-10T05:13:00.000-07:002006-09-10T05:15:17.276-07:00हो गई है पीर पर्वत-सीहो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए<br />इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए।<br /><br />आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगी<br />शर्त लेकिन थी कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए।<br /><br />हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गाँव में<br />हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए।<br /><br />सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं<br />सारी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।<br /><br />मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही<br />हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए।<br /><br /><div align="center"><span style="color:#990000;">-दुष्यन्त कुमार</span></div>डॉ॰ व्योमhttp://www.blogger.com/profile/10667912738409199754noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-34156999.post-1157890399535785762006-09-10T05:11:00.000-07:002006-09-10T05:13:19.536-07:00बाढ़ की संभावनाएँबाढ़ की संभावनाएँ सामने हैं<br />और नदियों के किनारे घर बने हैं ।<br /><br />चीड़-वन में आँधियों की बात मत कर<br />इन दरख्तों के बहुत नाज़ुक तने हैं ।<br /><br />इस तरह टूटे हुए चेहरे नहीं हैं<br />जिस तरह टूटे हुए ये आइने हैं ।<br /><br />आपके क़ालीन देखेंगे किसी दिन<br />इस समय तो पाँव कीचड़ में सने हैं ।<br /><br />जिस तरह चाहो बजाओ इस सभा में<br />हम नहीं हैं आदमी, हम झुनझुने हैं ।<br /><br />अब तड़पती-सी ग़ज़ल कोई सुनाए<br />हमसफ़र ऊँघे हुए हैं, अनमने हैं ।<br /><br /><div align="center"><span style="color:#990000;">-दुष्यन्त कुमार</span></div>डॉ॰ व्योमhttp://www.blogger.com/profile/10667912738409199754noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-34156999.post-1157890233233204892006-09-10T05:07:00.000-07:002006-09-10T05:10:33.233-07:00मत कहो, आकाश मेंमत कहो, आकाश में कुहरा घना है<br />यह किसी की व्यक्तिगत आलोचना है ।<br /><br />सूर्य हमने भी नहीं देखा सुबह से<br />क्या करोगे, सूर्य का क्या देखना है ।<br /><br />इस सड़क पर इस क़दर कीचड़ बिछी है<br />हर किसी का पाँव घुटनों तक सना है ।<br /><br />पक्ष औ' प्रतिपक्ष संसद में मुखर हैं<br />बात इतनी है कि कोई पुल बना है।<br /><br />रक्त वर्षों से नसों में खौलता है<br />आप कहते हैं क्षणिक उत्तेजना है ।<br /><br />हो गई हर घाट पर पूरी व्यवस्था<br />शौक से डूबे जिसे भी डूबना है ।<br /><br />दोस्तों ! अब मंच पर सुविधा नहीं है<br />आजकल नेपथ्य में संभावना है ।<br /><br /><span style="color:#990000;">-दुष्यन्त कुमार</span>डॉ॰ व्योमhttp://www.blogger.com/profile/10667912738409199754noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-34156999.post-1157888983009746422006-09-10T04:47:00.000-07:002006-09-10T05:07:25.890-07:00प्रतिक्रियाप्रतिक्रियाडॉ॰ व्योमhttp://www.blogger.com/profile/10667912738409199754noreply@blogger.com