tag:blogger.com,1999:blog-324174162009-02-20T21:36:52.297-08:00गीत गाना चाहता हूँ(गीतकार - डॉ. अजय पाठक)जयप्रकाश मानसnoreply@blogger.comBlogger61125tag:blogger.com,1999:blog-32417416.post-75313787342815533182007-04-09T12:26:00.000-07:002007-04-09T12:35:55.203-07:00क्यों पढ़े इन गीतों को - जयप्रकाश मानस<div align="center"><strong><span style="color:#ffffff;">आत्मीयता की पुनर्स्थापना के लिए कशमकश</span></strong></div><div align="center"><strong><span style="color:#ffffff;"></span></strong></div><div align="right"><br /><span style="color:#ffffff;">0 जयप्रकाश मानस<br />संपादक, सृजनगाथा डॉट कॉम<br /></span></div><div align="justify"><br /><br /><span style="color:#ffffff;"><strong>अ</strong>जय पाठक की कविता आत्मसंतोषी नहीं, असंतोषी है । उसके भूगोल में घर-संसार की पूर्णता के लिए छटपटाहट है । अजय पाठक की कविता अनात्मीय नहीं, वहाँ आत्मीयता की सुक्ष्म पुनर्स्थापना के लिए एक कशमकश भी है । पाठकीय मन आज की सामाजिक संबंधों की शुष्कता, प्रजातांत्रिक इकाईयों की बदचलनी और नये समय की कुटिल शक्तियों (बाजार, मशीनीकरण) से पीड़ित-प्रताड़ित जनजीवन वाले जनपद में पहुँच जाता है । उसकी अपनी छटपटाहट जनपद की छटपटाहट में एकाकार हो जाती है । तो अजय पाठक की जो अंसतोषी कविता है वह समकालीन मध्यमवर्गीय जिंदगी की अपूर्णता और प्रगति के बरक्स नयी-पुरानी बाधाओं से लिंक्ड हैं न कि उसकी काव्य-कला से । इन कविताओं को जरा गौर से सुनें तो नयी बाधा के रूप में बाजारवाद की धमक सुनाई देती है। और अपनी समग्रता में अब तक परफेक्ट नहीं हो सके इंसान के कुटिल आचरणों की विस्फोट भी, जो पुरानी बाधा है । इन सबों के बीच कविता की सीमा में जगह-जगह सावन, बादल, चाँदनी, पखेरु दिखाई देते हैं; जो केवल प्राकृतिक उपादान की तरह कविता में नहीं आ धमके हैं । सच मानें तो यह इंसानियत को प्राकृतिक यानी सहज, सरल, सरल यानी नेचुरल बनाने का कवि-ध्येय भी है ।<br /><br />गीत गाना चाहता हूँ में सग्रहित गीतों में प्रायोजित पोज नहीं है, कोई सायास भंगिमा नहीं, कोई मसीहाई ठाठ नहीं, कोई कवि-सुलभ स्वप्निल आकांक्षा भी नहीं । डगर चलते कवि को जो कुछ दिख जाता है, या कवि को अपने घेरे में ले लेता है, वही काव्य-वस्तु का रूप धारण कर लेता है । वे अपने स्पष्टीकरण में कहते भी हैं – “ये गीत विसंगतियों के साक्षात्कार से उपजी भावनाओं की शाब्दिक अभिव्यक्ति भी हैं ।” ये हड़बड़ी में उपजे गीत नहीं हैं । अनुभूतियों की सांद्रता में आयी मनोहारी रचनाएं हैं –<br /><br />कई बरस तक मन के भीतर<br />बैठा रहा अबोला ।<br />आज भोर से वही पखेरू<br />ज़ोर-ज़ोर से बोला ।<br /><br />या फिर –<br /><br />रामू-श्यामू के घर उनकी<br />घरवाली जब से आई ।<br />बँटवारे को लेकर दिनभर,<br />लड़ते हैं दोनों भाई ।<br /><br />दरअसल इन गीतों में आम जन का समकालीन बोध मुखरित हुआ है । एक सचेत मामूली आदमी जीवन-पथ में चलते हुए तजुर्बे हासिल करता है । ये तजुर्बे प्रचलित संस्कारों, मान्य मूल्यों और सांस्कृतिक निषेधों के निकष ही होते हैं । यदि इन गीतों का गीतकार विशिष्ट मन या नवविकसित दुनिया का मन वाला कवि होता तो जाहिर है यहाँ सामान्य जनों की ओर से उमड़ने वाला पाठकीय आग्रह की संभावना कदाचित् क्षीण होती । ऐसे में यह गीत संग्रह ज्यादा से ज्यादा ड्राइंग रूम की सजावटी किताब बन पाती । वह मामूलियत ही मूल में है जिसकी उत्प्रेरणा में अजय पाठक ने अपनी इस किताब में हिंदी के प्रचलित खास छांदस शैलियों को अपनाया है । यहाँ गीत हैं, ग़ज़लें भी हैं । और दोहेनुमा कुछ काव्य पंक्तियाँ भी ।<br /><br />इन छंदो को आम जन का बोध कहने के पीछे एक कारण और भी है और वह है - कविता के प्रचलित प्रतिमानों की पकड़ । इन दिनों कविता का मुख्य ट्रांसमीटर है – लोक-संस्कृति । फूहड़ आधुनिकता, प्रौद्योगिकी केंद्रित कुंठित परिवेश और उपभोक्तावाद के विरूद्ध लोक का बखान और बयान इधर हिंदी कविता में एक कारगर अस्त्र के रूप में उभर कर आया है । यह कविता ही नहीं साहित्य की सभी विधाओं में परखा जा सकता है । यह दीगर बात है कि गीतों में वह शुरू से ही संश्लिष्ट रहा है । ग्राम्य बिंबो, कथनों, मुहावरों और चीजों से हिंदी गीत को अलगाना लगभग कठिन है ।<br /><br />तो डॉ. अजय पाठक की काव्य-भूमि छत्तीसगढ़ का ग्राम्यांचल है । - गीत गाना चाहता हूँ - में लोक-जीवन की छवियाँ यत्र-तत्र भिलमिलाती हैं । इस झिलमिलाहट की सतह में लोक-जीवन गहरे यथार्थ की परछाई भी है । यदि ऐसा न होता तो डॉ. पाठक जाने-अनजाने उस खतरे के शिकार भी हो जाते और तब उनके गीतों में लोक-वस्तुएं समकालीन कविता में फैशन की तरह प्रयुक्त दिखाई देतीं । यहाँ यह कहना लाज़िमी होगा कि गीतकार की सबसे बड़ी ताकत है - लोकराग एवं लोकलय, जो उनके यहाँ धीरे-धीरे विकासमान है । वे इन दोनों रंगों से अपने गीतों में शनै-शनै चमक भर रहे हैं –<br /><br />अलगू भैया कुछ मत पूछो<br />हाल बुरे हैं गाँव के ।<br /><br />पगडंडी पर शूल बिछे हैं,<br />दिशा-दिशा है धुँआ-धुँआ ।<br />नदियाँ सूखी पनघट सूना,<br />पत्थर-पत्थर, कुँआ-कुँआ ।<br /><br />बरगद-पीपल सूख चुके हैं,<br />पंछी है बिन छाँव के ।<br /><br />यहाँ इस और ऐसे अनेक गीतों में प्रयुक्त काव्य-वस्तुएँ सिर्फ किसी प्रतीक के रूप में नहीं अपितु उस लोक चेतना के दबाब में आयी हैं जो गीतकार की सांस्कारिक पूंजी है । यह पंगड़डी, यह कुँआ, ये पनघट लोक-संस्कृति की ही पगडंडियाँ, कुँआ और पनघट हैं, जहाँ भारतीय जीवन-परम्परा का अक्षय कोष भरा पड़ा है । यहाँ ‘अलगू’ शब्द अपने आप में एक प्रकाश-वलय है । उसके आलोक में बरबस प्रेमचंद याद आ जाते हैं । अतीत का वह भारतीय गाँव याद आता है । चौपाल का चित्र खिंच- खिंच जाता है । चौपाल के घनघोर असमंजस में भी अंततः न्याय की जयघोष सुनाई देती हैं । गीतकार ने कहीं भी पंचायती राज व्यवस्था की बात नहीं की है । टूटते हुए गाँव और उसकी समृद्ध परंपरा की बात भी नहीं छेड़ी है । फिर भी जुम्मन मियाँ की तस्वीर क्या इस एक शब्द ‘अलगू’ से नहीं उभरती हमारे स्मृतियों में ! यहीं गीतकार के शब्दानुशासन का अंदाज भी पता चलता है । और यही वह अंदाज भी है, जिसमें गीतकार के यहाँ स्मृतियाँ अभिव्यक्त होती हैं । गीत गाना चाहता हूँ की रचनाएँ भी यही सिद्ध करती हैं कि पुराने क्लासिकल साहित्य की उपयोगिता इस गद्यात्मक सदी में और विकसित होगी, घटेगी नहीं ।<br /><br />कविता की समग्रता से चतुराई पूर्वक विलगायी नई कविता और इधर शुष्क से शुष्कतम होती जाती समकालीन गद्यात्मक कविता के नाम पर चाहे शिविरबाजी चरम पर पहुँच जाये । चाहे गीतों के साथ अस्पृश्य व्यवहार दिखाने वाले समीक्षकों की कुंभकरणी निद्रा भी न टूटे, फिर भी हिंदी गीत अपने मुकाम की ओर क्रमशः गतिशील बने रहेंगे । यही विश्वास अजय पाठक के गीत संग्रहों की खेपों से भी झलकता है ।<br /><br />इधर समकालीन कविता की अपेक्षाकृत सरल तराजू में स्वयं को खरा सिद्ध करने के बजाय गीत की कठिन और दुर्धर्ष ज़मीन पर पाँव जमाने के लिए जिन गीतकारों को पहचाना जाना चाहिए उनमें अजय पाठक भी एक हैं । एक गीतकार के रूप में उनकी उपलब्धियों को जब कभी आँका जायेगा उसमें उनका यही निर्णय कारगर कारणों में गिना जायेगा । यद्यपि अजय पाठक की उपलब्धियाँ खोटी नहीं है, न वे छोटी हैं । छंद, लय, तुक आदि पर उनके वशीकरण का प्रभाव है । भाषा बहुकोणीय है । वाक्य विन्यास साफ-सुथरा है । कुछ स्थलों को यदि जानबुझकर नकार दें तो अभिरुचि भी लगभग दोषहीन । यहाँ भी वे उस साधारण मनुष्य का प्रतिनिधित्व करते हैं जो अपनी श्वेत-श्याम चरित्रों के लिए साधारण बना रहता है । दोनों गुणों से एक दूसरे की समीक्षा करते हुए और स्वयं को और अधिक पूर्ण बनाते हुए ।<br /><br />जब हम साधारण मनुष्य को सभी कोणों से देखते हैं तो उसके आसपास उदासियाँ और हताशा पसरी दिखाई पड़ती हैं । यह आज का सच नहीं प्रत्युत साधारण मनुष्य का स्थायी सच है । हर कालवधि में साधारण मनुष्य़ अपनी उब, उकताहट, निराशा, सीमाओं के साथ जीता है । जागता भी है इसी की आवाज़ से । इस जागरण को अजय पाठक के गीतों में भी जब हम देखने का प्रयास करते हैं तो वह पहले पाठ में नहीं दिखाई देता परंतु दूसरे-तीसरे पाठ में वह अपने धुँधलकों को चीर कर सम्मुख आ खड़ा होता है । इस दृष्टि से अजय पाठक के गीतों में उदासी, हताशा की मोहरी बज रही है पर यह यथार्थ से पलायन-नाद नहीं बल्कि कवि की असमाप्त बेचैनी है जो पृथ्वी, परिवेश, परिवार और पर्सनल दुख की सतत् वृद्धि से पैदा हुई है । वेचैनी में हताशा और उदासी स्वाभाविक है । उनकी – पार्थ के सम्मुख- गीत का उदाहरण लेते हैं –<br /><br />आजकल के देवता को<br />क्या भला अर्पित करें हम ।<br />पाप को वरदान हासिल<br />पुण्य ही निष्फल रहा है ।<br /><br />एक गीत और लेते हैं – परिचय । यह परिचय दरअसल गीतकार अजय पाठक का निजी परिचय नहीं वह आम दुखी जन, हताश जन, उदास जन का परिचय ही है । वे कहते हैं –<br /><br />दावानल के बीच नगरिया<br />चलकर आता-जाता हूँ ।<br />पीड़ा की अनवरत कथाएँ<br />गीत व्यथा के गाता हूँ ।<br /><br />दरअसल इन उदासियों में संघर्ष के जुगनू भी टिमटिमाते हैं और यही टिमटिमाहट आम जन के भीतर सोया हुआ आशावाद है ।<br /><br />मुझे अक्सर एक प्रश्न मथता रहता है । कविता में कितनी गोपनीयता हो सकती है और कितना खुलापन ? क्या सचमुच कविता में गोपन का स्पेस होना चाहिए । विज्ञान के शब्दों में कहें तो वह कितना भौतिक हो सकती है और उसका रसायन कैसा होना चाहिए ?<br /><br />इसी अनुप्रसंग में अजय पाठक के एक गीत पर चर्चा लाजिमी है । कदाचित् मेरी राय की झलक भी आपको मिल जाये । पृष्ठ 71-72 में संग्रहित उनका गीत है- गजरा ।<br /><br />गजरा टूटा<br />कजरा फैला<br />अस्त-व्यस्त हो गई बेडियाँ<br />बिंदिया सरकी<br />आँचल ढरका<br />धुली महावर लगी एड़ियाँ ।<br />साँसों की संतूर बजी थी<br />पायन की खनखन यारों<br />जेठ माह की भरी दुपहरी<br />बरस गया सावन यारो<br /><br />कंगना खनका<br />संयम बहका<br />प्यासा-प्यासा मन भीगा ।<br />चूड़ी टूटी<br />बिछुआ सरका<br />और पाँव तक तन भीगा ।<br />बिखर गई बंधन की डोरी<br />निखर गया तन मन यारो<br /><br />कुंकुंम फैला<br />रोली भीगी<br />अक्षत-चंदन गंध घुली ।<br />अलकें बोझिल<br />निद्रालस में<br />लगती हैं अधखुली-खुली<br />सांसों की वीणाएं गूंजी ।<br />दूर हुआ अनबन यारो<br /><br />इस गीत में एकबारगी प्रणय की छवि नहीं उभरती पर अपनी भाव-भंगिमा में शुद्ध और निष्कलुश प्रणय की मुद्रा है यहाँ । यह संग्रह की अन्य सभी गीतों से वज़नी भी है । वज़नी इसलिए कि इस रचना में पाठकों के लिए अर्थों के मायावी संसार में भटकने और वास्तविक अर्थ को पकड़ने का सूत्र भी है। यहाँ सारे बिंबों को सर्वनिष्ठ बनाये बगैर कवि द्वारा रचे गये वास्तविक चित्र को नहीं पकड़ा जा सकता है । दरअसल यह प्रणय-क्षणों का रागात्मक श्लील चित्र है । श्लील इसलिए कि सब कुछ का अर्थ देने वाले शब्द निहायत श्लील और शांत हैं । उनमें कहीं भी मर्यादा का उल्लंघन नहीं है । जीवन के स्थायी किंतु गोपन कार्य व्यापार की सांस्कारिक अभिव्यक्ति जिस कला के साथ पाठक ने दी है वह साबित करता है कि गीतकार के कदम ऊँचे पायदानों की ओर है ।<br /><br />दरअसल कविता कुछ हद तक गोपन भी है । कविता अनकहा भी है । वह बिना कहे भी कुछ न कुछ कहना चाहती है । और शायद यही कविता को बहुकोणीय बनाती है । जो कवि या गीतकार कहता है वह अंतिम संप्रेषित अर्थ नहीं होता । उसमें ऐसा कुछ जरूर होता है जो नये अर्थों के साथ पाठकों तक पहुँचता है । हम इसके कारणों पर जाकर बिषयांतर नहीं होवेंगे । जैसा कि यह सच है तो कविता के अर्थ में यह एक रासायनिक परिवर्तन है । यह कविता का रसायन है । केवल भौतिक अर्थों या कवि द्वारा लक्ष्यित या निर्दिष्ट अर्थों की पहुँच के लिए तो महज कोई कवितायी नहीं करता । कम से कम एक गंभीर कवि तो कदापि नहीं । यदि यही करना है तो कवितायी में काहे को माथा गरम करना । कविता यहीं पर भाषण से इतर विधा है । वह संबोधन होकर भी शुष्क वार्तालाप नहीं है । यदि ऐसा है तो वह प्रलाप है ।<br /><br />प्रगतिशील कविता में भाषा जनता तक पहुँचने की गरज से लगातार सरलीकरण का शिकार होती चली गयी है । वह कदाचित् अनपढ़, रीजिड़, नासमझ, दलित, दमित और पिछड़ी जनती तक पहुँची भी हो किन्तु वह अपनी तथाकथित कविताओं से उन रसों का वितरण नहीं कर सकी होगी जिसे कविता का अनिवार्य उद्देश्य कहा जाता रहा है ।<br /><br />वैसे तो एक सच्ची कविता मन का आलाप है । मन का संताप है । बुद्धि का आक्रोश है । विचार का उद्घोष है । पर वहाँ केवल शब्द नहीं होते । वहाँ केवल अलंकार भी नहीं होते । मात्र अर्थ भी नहीं । इस सबसे से अधिक महत्वपूर्ण एक समग्र आल्हाद भी होता है । इस आल्हादकारी मनोक्रियाओं से मनुष्य अपने होने की सार्थकता से जुड़ता चला जाता है । या यह कहें कि कविता इतनी ही उत्प्रेरणा तो अवश्य है । डॉ. पाठक के पास साधारण मनुष्य के साधारण मनोभाव श्रृंखलायें होने के बावजूद उनके यहाँ विकसित होता कलात्मकता का आग्रह भी है । कला कवि की जादुगरी है । और थोड़ी सी भी जादुगरी एक सक्रिय कवि में नहीं है तो अच्छा है कि वह कविता के जनपद से प्रवासित हो जाये ।<br /><br />गीत गाना चाहता हूँ में मात्र परपंरात्मक भावों का मनुहार ही नहीं है वहाँ उसे उसके अपने रचनात्मक सरोकार के लिए भी पढ़ा जाने का आमंत्रण भी है । कहते हैं कि सरोकारो से संश्लिष्ट कविता एक तरह से राजनीतिक कार्य व्यवहार भी है । इस संदर्भों में कविता कवि की निष्पाप, निद्वंद्व और आध्यात्मिक राजनीति भी है । अर्थात् कविता एक चेतनावान् और परिवर्तनकामी नागरिक की राजनीति है । कविता शब्दशिल्पियों की शाब्दिक और सांस्कृतिक राजनीति है । आज के दौर में राजनीति और कविता दोनों को अलग करके देखना ज़रा कठिन है । यह इसलिए नहीं कि आज का समय राजनीति से संचालित होता है । यह राजनीति स्वयं में दशा नहीं है, समाज की, युग की, पीढ़ी की दिशा भी है । इसलिए कला भी है और विज्ञान भी । जीवन की जरूरी चीज भी । उसे साधे बिना जीवन का कार्य-व्यापार कठिन है ।<br /><br />भारतीय राजनीति पत्थरों का मरुस्थल है । वहाँ संवेदना की किलायें ध्वस्तीकरण के कगार पर हैं । विगत 5-6 दशको में स्वप्नों का चीरहरण बदस्तुर जारी है । विकास की सारी रणनीतियाँ एक-एक कर ध्वस्त होती चली जा रही हैं । आम भारतीय इससे सर्वाधिक पीड़ित और चिंतित हैं । यही चिंता अजय पाठक की कविता का तीसरा मुख्य़ टोन है । इस श्रेणी में उनके कई गीतों को एक बौद्धिक हस्तक्षेप के रूप में लिया जाना चाहिए । खासकर – बिखरे हुए घर-बार, सियासत, वीर लोग, गाँव, रस्ता कट जाएगा, मंजर देख ज़रा, हाल बुरे हैं, मर्यादा, प्रणय गीत कैसे गाएं, लोकतंत्र आदि शीर्षक वाले गीतों को । लोकतंत्र की एक बानगी देख ही लेते हैं जहाँ प्रचलित संविधान की कमजोरियों से रोज हो रही धोखाओं के विरूद्ध एक आक्रोश है –<br /><br />भारत के मानसरोवर पर कौबे जब तक मंडरायेंगे<br />हंसो के हिस्सों की मोती ये मूरख चुगते जायेंगे<br />सब हंस व्यथाओं के चलते जब रोयेंगे पछतायेंगे<br />कौबो ने छोड़ दिया जिसको उस जूठन को ही खायेंगे<br />तब तक यारों मैं समझूँगा यह गंदा एक अखाड़ा है ।<br />यह लोकतंत्र इक दलदल है या सुअर का बाड़ा है ।<br /><br />नये समय की प्रौद्योगिकी के धवल चरित्र पर हम विश्वास करना जान लें और इसी अनुक्रम में अभिव्यक्ति के तकनीक आधारित माध्यम इंटरनेट या अंतरजाल से छपे हुए कागज की तरह जरा सा भी जुड़ जायें तो वह सच्चे अर्थों में साहित्य और प्रकारांतर से हिंदी के लोकव्यापीकरण की दिशा में भी एक खास कदम सिद्ध होगा । श्रेय का श्रेय और प्रेय का प्रेय । ठीक उस तरह से जिस तरह से डॉ. अजय पाठक के नाम अंकित है । डॉ. अजय पाठक का यह गीत संग्रह छत्तीसगढ़ का पहला ऐसा गीत संग्रह है जो अंतरजाल पर भी अपनी कलात्मता के साथ कई देशों में पढ़ा जा रहा है । बकायदा प्रतिक्रिया के साथ भी – वाशिंगटन से रेणु आहूजा कहती हैं इसगीत का संग्रह प्रस्तुतिकरण निःसंदेश अपने आप में अनोखा प्रयास है । वे कबीरा नामक गीत की पंक्तियों – </span></div><div align="justify"><br /><span style="color:#ffffff;">पीर बहुत है भीतर गहरी । कैसे पाएं थाह कबीरा ।। पर कहती हैं – यह दो पंक्तियाँ मानव मन के अंतरमन की दशा का बखान करती हैं । अजय जी हम तो इतना ही कहना चाहेंगे कि बखान करे जो मन की पीरा । गीत वही सांचा कबीरा । जब कोई रचना नयी कुछ रचने की उर्जा से भरी हुई हो तो फिर क्या कहिए । और यह उर्जा प्रमाणित तौर पर अजय पाठक में हैं । अन्यथा रेणु जी दूर देश में बैठी ये पंक्तियाँ क्यों कर लिख सकती । </span></div><div align="justify"><br /><span style="color:#ffffff;">21 वीं सदी के हिंदी गीतकारों की सूची में समीक्षक अपनी-अपनी दृष्टि से उन्हें चाहे किसी के भी आगे-पीछे सरका सकते हैं । पर उनका वह स्थान अब कोई छीन नहीं सकता जो उन्हें अभिव्यक्ति के नये और सर्वव्यापी माध्यम इंटरनेट ने दिया है और वह है उनकी इस कृति का अंतरजाल पर ब्लॉग तकनीक पर निर्मित संपूर्ण विश्व में प्रथम ऑनलाइन पूर्ण गीत संग्रह होना । </span></div><br /><div align="center"><span style="color:#ffffff;">(कृति के ऑनलाइन संस्करण के विमोचन अवसर पर समीक्षा आलेख )<br />-----------0000----------</span></div><div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/32417416-7531378734281553318?l=ajaypathak1.blogspot.com'/></div>जयप्रकाश मानसnoreply@blogger.com0tag:blogger.com,1999:blog-32417416.post-17091016187751029702007-03-15T11:38:00.000-07:002007-03-15T11:42:12.085-07:00परिचय<div align="center"><strong><span style="color:#993399;"><span style="color:#000099;">।।</span> डॉ. अजय पाठक </span><span style="color:#000099;">।।</span></strong></div><div align="justify"><br /><span style="color:#000099;"><span style="color:#ff0000;"><strong>जन्मः</strong> </span><br />14 जनवरी 1960</span></div><div align="justify"><br /><span style="color:#000099;"><strong><span style="color:#ff0000;">शिक्षाः</span></strong><br />विज्ञान, पत्रकारिता एवं जनसंचार में स्नातक<br />प्राणीशास्त्र, हिंदी, भारतीय इतिहास एवं समाजशास्त्र में स्नातकोत्तर<br />मुगलकालीन शिक्षा-साहित्य एवं ललित कलाओं पर पीएच.डी </span></div><div align="justify"><br /><span style="color:#000099;"><strong><span style="color:#ff0000;">प्रकाशित किताबें :</span></strong><br />- यादों के सावन<br />- महुए की डाली पर उतरा बसंत<br />- जीवन एक धुएँ का बादल<br />- दशमत </span></div><div align="justify"><br /><span style="color:#000099;"><span style="color:#ff0000;"><strong>प्रकाशनाधीनः</strong><br /></span> -व्यंग्यसंग्रह</span></div><div align="justify"><br /><span style="color:#000099;"><span style="color:#ff0000;"><strong>उपाध्यक्षः</strong><br /></span>राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, छत्तीसगढ़ </span></div><div align="justify"><br /><span style="color:#000099;"><span style="color:#ff0000;"><strong>संप्रतिः</strong> </span><br />संयुक्त नियंत्रक, नाप तौल<br />छत्तीसगढ़ शासन </span></div><div align="justify"><br /><span style="color:#000099;"><strong><span style="color:#ff0000;">संपर्कः</span></strong><br />लेन-3, विनोबा नगर, बिलासपुर<br />छत्तीसगढ़<br />मोबाइलः 98271-85785<br />दूरभाषः 07752-509217</span></div><div align="justify"><span style="color:#ff0000;">**************************************</span></div><div align="justify"><span style="color:#ff0000;">**************************************</span></div><div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/32417416-1709101618775102970?l=ajaypathak1.blogspot.com'/></div>जयप्रकाश मानसnoreply@blogger.com0tag:blogger.com,1999:blog-32417416.post-1156458980838797482006-08-24T15:32:00.000-07:002006-08-24T15:36:20.840-07:00पाषाण हूँ अब<a href="http://photos1.blogger.com/blogger/3622/2073/1600/Dew%20Drop.jpg"><img style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; WIDTH: 182px; CURSOR: hand; HEIGHT: 187px" height="217" alt="" src="http://photos1.blogger.com/blogger/3622/2073/320/Dew%20Drop.jpg" width="258" border="0" /></a><br /><br /><br /><span style="color:#33ffff;">फूल था, पाषाण हूँ अब<br /><br />रंग मेरा धो गई हैं,<br />शीत में गिरती फुहारें ।<br />गंध लेकर के गई है,<br />लौटकर जाती बहारें ।<br /><br />कोष मधु का पी गयी हैं,<br />तितलियाँ कुछ मनचली सी,<br />जीर्ण पत्तों की तरह,<br />उतरा हुआ परिधान हूँ अब,<br /><br />फूल था, पाषाण हूँ अब<br /><br />काम आता ही रहा मैं,<br />अनवरत संपूर्तियों के ।<br />आरती बनकर जला हूँ,<br />सामने जिन मूर्तियों के ।<br /><br />एक पल को ही बुझा तो,<br />कोप का कारण बना मैं ।<br />बोध सारा खो गया हो,<br />अस तरह अंजान हूँ अब ।<br /><br />फूल था, पाषाण हूँ अब<br /><br />हाँ कभी था मैं धरा का<br />जगमगाता वह सितारा,<br />सामने जिसके दिवाकर का सभी आलोक हारा ।<br /><br />आज अंबर की निशा के<br />गर्त में आकर पड़ा मैं,<br />जो अंधेरों में घिरा हो<br />वह जटिल अज्ञान हूँ अब<br /><br />फूल था, पाषाण हूँ अब ।<br /><br /><strong><span style="color:#ff99ff;">By- </span></strong><a href="http://www.srijangatha.com/"><strong><span style="color:#ff99ff;">www.srijangatha.com</span></strong></a></span><div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/32417416-115645898083879748?l=ajaypathak1.blogspot.com'/></div>जयप्रकाश मानसnoreply@blogger.com0tag:blogger.com,1999:blog-32417416.post-1156458736810356812006-08-24T15:29:00.000-07:002006-08-24T15:32:16.813-07:00<a href="http://photos1.blogger.com/blogger/3622/2073/1600/images8.jpg"><img style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; CURSOR: hand" alt="" src="http://photos1.blogger.com/blogger/3622/2073/320/images8.jpg" border="0" /></a><br /><span style="color:#33ffff;">गीत गाना चाहता</span><span style="color:#33ffff;"> हूँ<br />आज मन की रुद्र वीणा को,<br />बजाना चाहता हूँ ।<br />मैं तुम्हारी अस्मिता के गीत,<br />गाना चाहता हूँ ।<br /><br />आज बरसों बाद सुधियों की,<br />नई खिड़की खुली है ।<br />तारिकाएँ झिलमिलाती,<br />चाँदनी-रस में घुली है ।<br />प्राण है बिलकुल अकेला,<br />मंदिरों की मूर्तियों-सा ।<br />इसलिए उसको कहानी,<br />मैं सुनाना चाहता हूँ ।<br /><br />कौन जान कब तलक है<br />आज पलकों पर सवेरा<br />कालिमा की रात लेकर<br />आ न जाए फिर अँधेरा ।<br />आज माटी के दीयों में<br />भावना की बातियों से<br />रोशनी का एक दीपक<br />मैं जलाना चाहता हूँ ।</span><br /><span style="color:#33ffff;"><br />दृष्टि का सूरज सनातन<br />आज बादल में घरा है<br />हर तरफ अंधड़-बगूले<br />रातभर सावन गिरा है ।<br />प्यास जागी है अधर पर<br />कंठ सूखे जा रहे हैं,<br />तृप्ति पाने को सुधा की<br />बूँद पाना चाहता हूँ ।<br /><br /><br /><strong><span style="color:#ffcc00;">By- </span></strong><a href="http://www.srijangatha.com/"><strong><span style="color:#ffcc00;">www.srijangatha.com</span></strong></a></span><br /></span><div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/32417416-115645873681035681?l=ajaypathak1.blogspot.com'/></div>जयप्रकाश मानसnoreply@blogger.com0tag:blogger.com,1999:blog-32417416.post-1156458555735506132006-08-24T15:27:00.000-07:002006-08-24T15:29:15.736-07:00देश में<a href="http://photos1.blogger.com/blogger/3622/2073/1600/images12.jpg"><img style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; CURSOR: hand" alt="" src="http://photos1.blogger.com/blogger/3622/2073/320/images12.jpg" border="0" /></a><br /><br /><span style="color:#66ffff;"><br />इस कदर परिवर्तनों का दौर है परिवेश में,<br />आदमी दिखता नहीं है आदमी के भेष में ।<br /><br />रक्त, भाषा, जाति, मज़हब पर बंटा है आदमी,<br />अस्मिता उलझा हुआ है आपसी विद्वेष में ।<br /><br />आग बढ़ती जा रही है आँधियों के साथ ही,<br />युक्ति खोजी जा रही है शांति के संदेश में ।<br /><br />युद्ध को उन्मत मानव क्यों समझ पाता नहीं,<br />युद्ध ही बाक़ी बचेगा युद्ध के अवशेष में ।</span><br /><span style="color:#66ffff;"></span><br /><strong><span style="color:#ffff00;">By- </span></strong><a href="http://www.srijangatha.com/"><strong><span style="color:#ffff00;">www.srijangatha.com</span></strong></a><br /><span style="color:#66ffff;"></span><div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/32417416-115645855573550613?l=ajaypathak1.blogspot.com'/></div>जयप्रकाश मानसnoreply@blogger.com0tag:blogger.com,1999:blog-32417416.post-1156458421510875632006-08-24T15:24:00.000-07:002006-08-24T15:27:01.513-07:00हर जगह<span style="color:#33ffff;">चाँद-परियों की कहानी हर जगह,<br />एक गुड़िया, एक नानी हर जगह । <a href="http://photos1.blogger.com/blogger/3622/2073/1600/images7.jpg"><img style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; WIDTH: 109px; CURSOR: hand; HEIGHT: 118px" height="99" alt="" src="http://photos1.blogger.com/blogger/3622/2073/320/images7.jpg" width="146" border="0" /></a><br /><br />इश्क काँटों से गुज़रता हर क़दम,<br />फूल-सी खिलती जवानी हर जगह ।<br /><br />वस्ल पहले, फिर जुदाई रूह की,<br />एक राजा, एक रानी हर जगह ।<br /><br />इस जमीं पर एक था कान्हा कभी,<br />अब कहाँ मीरा दीवानी हर जगह ।<br /><br />ताज है, सरताज अब भी प्यार का,<br />है कहाँ ऐसी निशानी हर जगह ?</span><br /><span style="color:#33ffff;"></span><br /><strong><span style="color:#ffcc33;">By- </span></strong><a href="http://www.srijangatha.com/"><strong><span style="color:#ffcc33;">www.srijangatha.com</span></strong></a><br /><span style="color:#33ffff;"></span><div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/32417416-115645842151087563?l=ajaypathak1.blogspot.com'/></div>जयप्रकाश मानसnoreply@blogger.com0tag:blogger.com,1999:blog-32417416.post-1156458262642397992006-08-24T15:21:00.000-07:002006-08-24T15:24:22.643-07:00बाते कर तलवार की<p align="justify"><span style="color:#33ffff;"><img style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; WIDTH: 159px; CURSOR: hand; HEIGHT: 128px; TEXT-ALIGN: center" height="148" alt="" src="http://photos1.blogger.com/blogger/3622/2073/320/CAK1WRUB.jpg" width="184" border="0" /></p><br />मृगनयनी के नयन कटीले,<br />कुंतल केश, सिंगार की ।<br />गुलशन गुलचें और गुलों की,<br />भंवरे और बहार की ।<br />महासमर में क्यों करता है,<br />बातें यह बेकार की ।<br /><br />मृगनयनी के नयन कंटीले,<br />कुंतल केश, सिंगार की ।<br /><br />सागर की लहरों पर उठता,<br />कैसा घोर उफान यहाँ ।<br />देख इधर आने को आतुर,<br />लगता है तूफ़ान यहाँ।<br />गिनता है क्यों आज लहर को,<br />चिंता कर पतवार की ।<br /><br />हाथ मिलाने से क्या होगा ?<br />अपना सीना ठोंक ज़रा ।<br />अपनी ऊर्ज़ा संचित कर ले,<br />और समर में झोंक ज़रा ।<br />गीत अमन के फिर गा लेना,<br />बातें कर तलवार की ।<br /><br />घर- घर में साहस का परचम,<br />गाँव, गली, चौबारों के ।<br />आशा के नवदीप जला दे,<br />चौखट पर अँधियारों के ।<br />अब चिंतन का समय कहाँ है ।<br />बेला है संहार की ।<br /><br />किसी रूपसी के यौवनकी,<br />चर्चा करना व्यर्थ यहाँ ।<br />कोलहल में किसी गीत का,<br />रह जाता है अर्थ कहाँ ?<br />समर यहाँ घनघोर छिड़ा है,<br />मत कर बातें प्यार की ।<br /></span><br /><span style="color:#33ffff;">मृगनयनी के नयन कटीले,<br />कुंतल-केश, सिंगार की ।</span><br /><span style="color:#33ffff;"></span><br /><span style="color:#33ffff;"></span><br /><strong><span style="color:#ffff00;">By- </span></strong><a href="http://www.srijangatha.com/"><strong><span style="color:#ffff00;">www.srijangatha.com</span></strong></a><br /></span><div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/32417416-115645826264239799?l=ajaypathak1.blogspot.com'/></div>जयप्रकाश मानसnoreply@blogger.com0tag:blogger.com,1999:blog-32417416.post-1156458059021983442006-08-24T15:19:00.000-07:002006-08-24T15:20:59.023-07:00सुन ले मेरे<a href="http://photos1.blogger.com/blogger/3622/2073/1600/11072.jpg"><img style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; CURSOR: hand; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://photos1.blogger.com/blogger/3622/2073/320/11072.jpg" border="0" /></a><br /><span style="color:#33ffff;">तेरे भीतर ही काबा है, तेरे भीतर काशी रे,<br />क्यों बनता है पीर पयंबर हठयोगी सन्यासी रे ।<br /><br />धर्म वही जो धारण करके मानवता का मान बढ़े,<br />और इसी के लिए हुए थे, राम यहाँ बनवासी रे ।<br /><br />परमारथ ऐसे करना कि हरदम इसकी चाह रे,<br />जैसे प्रियतम हों अंखियों में अंखियाँ फिर भी प्यासी रे ।<br /><br />ऊँच-नीच की बात नहीं कर, सब हैं एक समान यहाँ,<br />धरती माता के बेटे हैं इसके सभी निवासी रे ।<br /><br />परमारथ ही महाधरम है, बाक़ी सब है व्यर्थ यहाँ,<br />रामानंदी, नाथ, अधोरी या फिर मौन-उदासी रे ।</span><br /><span style="color:#33ffff;"></span><br /><strong><span style="color:#ffffff;">By- </span></strong><a href="http://www.srijangatha.com/"><strong><span style="color:#ffffff;">www.srijangatha.com</span></strong></a><br /><span style="color:#33ffff;"></span><div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/32417416-115645805902198344?l=ajaypathak1.blogspot.com'/></div>जयप्रकाश मानसnoreply@blogger.com0tag:blogger.com,1999:blog-32417416.post-1156457911367172752006-08-24T15:15:00.000-07:002006-08-24T15:18:31.370-07:00चाँदनी<a href="http://photos1.blogger.com/blogger/3622/2073/1600/bsl49025.jpg"><img style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; CURSOR: hand; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://photos1.blogger.com/blogger/3622/2073/320/bsl49025.jpg" border="0" /></a><br /><span style="color:#66ffff;">बह रही है चाँदनी जैसे पिघलकर,<br />चाँग भी चलने लगा थोड़ा सम्हलकर ।<br /><br />ख़्वाहिशें रंगीनियों की मुंतज़िर थीं,<br />याद ने दस्तक दिए कपड़े बदलकर ।<br /><br />है अजब-से रंग में डूबा समंदर,<br />और लहरे बह रहीं थोड़ा उछलकर ।<br /><br />है फिज़ाओं में वही खुशबू घुली सी,<br />लग रहा वह आ गए जैसे टहलकर ।<br /><br />वस्ल की नाकामियों का हश्र है कि,<br />एक बच्चा रो रहा जैसे मचलकर ।<br /><br />तेज़ लहरें फिर जिगर को धो गई हैं,<br />जख्म सारे आ गए बाहर निकलकर ।</span><br /><span style="color:#66ffff;"></span><br /><strong><span style="color:#ffff00;">By- </span></strong><a href="http://www.srijangatha.com/"><strong><span style="color:#ffff00;">www.srijangatha.com</span></strong></a><div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/32417416-115645791136717275?l=ajaypathak1.blogspot.com'/></div>जयप्रकाश मानसnoreply@blogger.com0tag:blogger.com,1999:blog-32417416.post-1156457715417937612006-08-24T15:10:00.000-07:002006-08-24T15:15:15.420-07:00मौन हूँ मैं<a href="http://photos1.blogger.com/blogger/3622/2073/1600/DSC00036.jpg"><img style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; CURSOR: hand; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://photos1.blogger.com/blogger/3622/2073/320/DSC00036.jpg" border="0" /></a><br /><span style="color:#66ffff;">मौन हूँ मैं, मौन हो तुम !<br />मैं व्यथा हूँ, कौन हो तुम ?<br /><br />मैं गहन संवेदना की,<br />बात तुमसे रह रहा हूँ ।<br />रिक्त अंतर है, उसी की-<br />शून्यता को भर रहा हूँ ।<br />चाहता विस्तार हूँ मैं,<br />किन्तु केवल गौण हो तुम ?<br /><br />साधना के पंथ पर मैं,<br />चल रहा हूँ पग पढ़ाए मैं,<br />चल रहा हूँ पग बढ़ाए ।<br />चाहता हूँ इस विजन में,<br />साथ कोई और आए ।<br />जानकर मेरी विकलता,<br />अब भला क्यों मौन हो तुम ?<br /><br />देख लो मुझको निकट से,<br />अस्मिता मेरी वही है ।<br />रंग मेरा है पुराना,<br />रूप भी बिल्कुल वही है ।<br />कल्पना में रंग भरते,<br />स्वप्न देखा जो,<br />मौन हो तुम । मौन हूँ मैं, </span><br /><span style="color:#66ffff;">मैं व्यथा हूँ, कौन हो तुम ?</span><br /><br /></span><br /><p><span style="color:#66ffff;"><span style="color:#ffff00;"><strong>By- </strong></span><a href="http://www.srijangatha.com/"><span style="color:#ffff00;"><strong>www.srijangatha.com</strong></span></a></p></span><div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/32417416-115645771541793761?l=ajaypathak1.blogspot.com'/></div>जयप्रकाश मानसnoreply@blogger.com0tag:blogger.com,1999:blog-32417416.post-1156457427463653862006-08-24T15:07:00.000-07:002006-08-24T15:10:27.476-07:00मेरे कवि<a href="http://photos1.blogger.com/blogger/3622/2073/1600/DSC00023.jpg"><img style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; CURSOR: hand; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://photos1.blogger.com/blogger/3622/2073/320/DSC00023.jpg" border="0" /></a><br /><br /><span style="color:#ff99ff;">मेरे कवि तुम कब सोते हो<br />कलम चलाकर रात-रात भर,<br />जगती के कल्मष धोते हो ।<br />मेरे कवि तुम कब सोते हो<br /><br />वंचित इच्छाओं की खातिर,<br />तुम पाते हो कष्ट अपरिमित ।<br />सोचा करते हो शोषण की,<br />काया कैसे होगी सीमित ।<br />हँसते हो निष्प्राण जगत पर,<br />और द्रवित होकर रोते हो ।<br />मेरे कवि तुम कब सोते हो<br /><br />कंचन वर्ण कुसुम कलियों का,<br />सौरभ-गंध लिए तन-मन में,<br />ताल, सरोवर, नदियाँ, झरनें,<br />विचरण करते हो गिरि-वन में ।<br />अपलक देखा करते हो तुम,<br />और वहीं पुलकित होते हो ।<br />मेरे कवि तुम कब सोते हो<br /><br />नीति, मूल्य, मर्यादा ढहती,<br />सुखवादी भौतिक धारा में ।<br />वैभव के हाथों बंदी है,<br />मानवता जैसे कारा में ।<br />क्या होगा यह सोच-सोच कर,<br />तुम कितने व्याकुल होते हो ।<br />मेरे कवि तुम कब सोते हो<br /><br />कभी गीत के छंद-छंद की,<br />रचना करके गान सुनाते ।<br />योगी और वियोगी मन को,<br />संबल देखवे बोते हो ।<br />मेरे कवि तुम कब सोते हो<br /><br />रहते हो कल्पित संसृति में,<br />जिसके सिरजनहार तुम्हीं हो ।<br />उसके संहारक हो तुम ही,<br />पोषक-पालनहार तुम्हीं हो ।<br />उसके संहारक हो तुम ही,<br />पोष्क-पालनहार तुम्हीं हो ।<br />मिलन-विरह की इस दुनिया में,<br />दो पल का सुख भी खोते हो ।<br />मेरे कवि तुम कब सोते हो </span><br /><span style="color:#ff99ff;"></span><br /><span style="color:#33ff33;"><strong>By- </strong></span><a href="http://www.srijangatha.com/"><span style="color:#33ff33;"><strong>www.srijangatha.com</strong></span></a><div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/32417416-115645742746365386?l=ajaypathak1.blogspot.com'/></div>जयप्रकाश मानसnoreply@blogger.com0tag:blogger.com,1999:blog-32417416.post-1156457238741129902006-08-24T15:04:00.000-07:002006-08-24T15:07:18.743-07:00थकी दुपहरी साँझ ढली रे<a href="http://photos1.blogger.com/blogger/3622/2073/1600/DSC00005.0.jpg"><img style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; CURSOR: hand; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://photos1.blogger.com/blogger/3622/2073/320/DSC00005.0.jpg" border="0" /></a><br /><span style="color:#ff99ff;">श्रम का सूरज अस्ताचल में,<br />बैठ गया जाकर सुस्ताने ।<br />दूर क्षितिज के तारा पथ से,<br />लगी चाँदनी आने-जाने ।<br />ठंडी-ठंडी वहा चली रे,<br />थकी दुपहरी, साँझ ढली रे ।<br /><br />लौट चले हैं थकन भुलाने,<br />परदेशी पंछी बेचारे ।<br />कलरव का नवताल मुखर है,<br />डाल-डाल बैठे हैं सारे ।<br />लगती यह गुंजार भली रे,<br />थकी दुपहरी, साँझ ढली रे ।<br /><br />राह-राह पर अब लगती है,<br />पगध्वनियों की आहट मद्धिम ।<br />जैसे तोड़ रहा है कोई,<br />साँसों की सीमाएँ अंतिम ।<br />मौन रही सुनसान गली रे,<br />थकी दुपहरी, साँझ ढली रे।</span><br /><br /><strong><span style="color:#33ffff;">By- </span></strong><a href="http://www.srijangatha.com/"><strong><span style="color:#33ffff;">www.srijangatha.com</span></strong></a><div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/32417416-115645723874112990?l=ajaypathak1.blogspot.com'/></div>जयप्रकाश मानसnoreply@blogger.com0tag:blogger.com,1999:blog-32417416.post-1156457019020252142006-08-24T14:58:00.000-07:002006-08-24T15:03:39.023-07:00वही पखेरू<a href="http://photos1.blogger.com/blogger/3622/2073/1600/DSC00042.jpg"><img style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; CURSOR: hand; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://photos1.blogger.com/blogger/3622/2073/320/DSC00042.jpg" border="0" /></a><br /><span style="color:#00cccc;">कई बरस तक, मन के भीतर,<br />बैठा रहा अबोला ।<br />आज भोर में वही पखेरू,<br />ज़ोर-जोर से बोला ।<br /><br />धीरे-धीरे खामोशी की,<br />टूटी है तनहाई,<br />सपने सारे जाग उठे हैं,<br />ले-ले कर अगड़ाई ।<br />तेज़ हवाएँ चली,<br />पेड़ का पत्ता-पत्ता होला ।<br />आज भोर में वही पखेरू,<br />ज़ोर-ज़ोर से बोला ।<br /><br />सर्द हवाएँ सम्मोहित कर,<br />बाँ गई बंधन में ।<br />चांदी-जैसी धूप सुबह की,<br />बैठ गई आँगन में ।<br />सुधइयों ने चुपचाप कथा का,<br />पट धीरे से खोला ।<br />आज भोर में वही पखेरू,<br />ज़ोर-ज़ोर से बोला ।<br /><br />मधु के दिन कितने बीते हैं ,<br />कितनी ही पतझारें ।<br />जितनी चंद्रकलाएँ देखीं,<br />उतने टूटे तारे।<br />आँखों पर आ कर के ठहरा,<br />फूलों वाला डोला।<br />आज भोर में वही पखेरू,<br />ज़ोर-ज़ोर से बोला ।<br /><br />सपना देखा<br />भूखे-प्यासों की बस्ती है,<br />तू भी कोई अपना देख ।<br />भूख तो बैठ कहीं पर,<br />दाल-भात का सना देख ।<br /><br />तुझ पर रहमत है अल्ला की,<br />अब तक भी तू ज़िंदा है ।<br />जो भूखा है पाँच दिनों से,<br />उसका आज तड़पना देख ।<br /><br />तेरा शक्कर तेरा सीधा,<br />हलुआ खाते पंडित जी ।<br />बैठ वहीं चुपचाप जमीं पर<br />राम नाम का जपना देख ।<br /><br />तेरे मुंह से लिया निवाला,<br />वे तुझसे भी भूखे हैं ।<br />भूखे श्वानों को रोटी पर,<br />फिर से आज झपटना देख ।<br /><br />आज पेट की ज्वाला में जो,<br />लपटें उठती गिरती हैं ।<br />उसकी भट्ठी गिरती हैं ।<br />उसकी भट्ठी में जीवन का,<br />लोहे-जैसा तपना देख ।</span><br /><span style="color:#00cccc;"></span><br /><strong><span style="color:#ffcc00;">By- </span></strong><a href="http://www.srijangatha.com/"><strong><span style="color:#ffcc00;">www.srijangatha.com</span></strong></a><div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/32417416-115645701902025214?l=ajaypathak1.blogspot.com'/></div>जयप्रकाश मानसnoreply@blogger.com0tag:blogger.com,1999:blog-32417416.post-1156456711435656922006-08-24T14:54:00.000-07:002006-08-24T14:58:31.436-07:00गजरा टूटा<a href="http://photos1.blogger.com/blogger/3622/2073/1600/DSC00040.jpg"><img style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; CURSOR: hand; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://photos1.blogger.com/blogger/3622/2073/320/DSC00040.jpg" border="0" /></a><br /><span style="color:#33ffff;">गजरा टूटा, कजरा फैला,<br />अस्त-व्यस्त हो गई बेड़ियाँ ।<br />बिंदिया सरकी, आँचल ढरका,<br />धुली महावर लगी एड़ियाँ ।<br />साँसों की संतूर बजी थी,<br />पायल की खनखन यारों....<br />जेठ माह की भरी दुपहरी,<br />बरस गया सावन यारों ।<br /><br />कंगना खनका, संयम बहका,<br />प्यास-प्यासा मन भीगा ।<br />चूड़ी टूटी, बिछुआ सरका,<br />और पाँव तक तन भीगा।<br />बिखर गई बंधन की डोरी,<br />निखर गया तन मन यारों....<br />जेठ माह की भरी दुपहरी,<br />बरस गया सावन यारों ।<br /><br />कुंकुंम फैला,<br />रोली भीगी,<br />अक्षत-चंदन गंध धुली।<br />अलकें बोझिल, निद्रालस में,<br />लगती हैं अधखुली-खुली,<br />सांसों की वीणाएँ गूंजी ।<br />दुर हुआ अनबन यारों ।<br />जेठ माह की भरी दुपहरी,<br />बरस गया सावन यारों ।</span><br /><span style="color:#33ffff;"></span><br /><strong><span style="color:#ffcc33;">By- </span></strong><a href="http://www.srijangatha.com/"><strong><span style="color:#ffcc33;">www.srijangatha.com</span></strong></a><div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/32417416-115645671143565692?l=ajaypathak1.blogspot.com'/></div>जयप्रकाश मानसnoreply@blogger.com0tag:blogger.com,1999:blog-32417416.post-1156456467175947452006-08-24T14:51:00.000-07:002006-08-24T14:54:27.176-07:00पार्थ के सम्मुख<a href="http://photos1.blogger.com/blogger/3622/2073/1600/prabhakar40.jpg"><img style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; CURSOR: hand; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://photos1.blogger.com/blogger/3622/2073/320/prabhakar40.jpg" border="0" /></a><br /><span style="color:#66ffff;">सृष्टि में सर्जना का,<br />दौर ऐसा चल रहा है।<br />पार बैठा है अँधेरा,<br />और दीपक जल रहा है ।<br /><br />कौन किसके साथ,<br />कैसा मीत, क्या रिश्ते यहाँ ।<br />पूछ मत अपना बनाकर,<br />कौन किसको छल रहा है<br /><br />जड़ हुई जाती यहाँ,<br />संवेदना को देख ले ।<br />फूल-सा मन किस तरह से,<br />पत्थरों में ढल रहा है ।<br /><br />आजकल के देवता को,<br />क्या भला अर्पित करें हम ।<br />पाप को वरदान हासिल,<br />पुण्य ही निष्फल रहा है ।<br /><br />धर्म तो संघर्ष का ही,<br />नाम है जैसे यहाँ,<br />पार्थ के सम्मुख हमेएशा,<br />कौरवों का दल रहा है ।</span><br /><span style="color:#66ffff;"></span><br /><strong><span style="color:#ffcc00;">By- </span></strong><a href="http://www.srijangatha.com/"><strong><span style="color:#ffcc00;">www.srijangatha.com</span></strong></a><div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/32417416-115645646717594745?l=ajaypathak1.blogspot.com'/></div>जयप्रकाश मानसnoreply@blogger.com0tag:blogger.com,1999:blog-32417416.post-1156456278331593832006-08-24T14:48:00.000-07:002006-08-24T14:51:18.333-07:00हम प्रणय गीत कैसे गाएँ<a href="http://photos1.blogger.com/blogger/3622/2073/1600/prabhakar33.jpg"><img style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; WIDTH: 251px; CURSOR: hand; HEIGHT: 320px; TEXT-ALIGN: center" height="320" alt="" src="http://photos1.blogger.com/blogger/3622/2073/320/prabhakar33.jpg" width="341" border="0" /></a><br /><span style="color:#33ffff;">हम प्रणय-गीत कैसे गाएँ<br /><br />जब चारों ओर निराशा हो,<br />सन्नाटा और निराशा हो ।<br />मन आकुल हो जब दीन-हीन,<br />तन बेसुध भूखा-प्यासा हो ।<br />रोदन की हाहाकारों में,<br />तुम कहते हो कि मुस्काएँ ।<br />हम प्रणय-गीत कैसे गाएँ ?<br /><br />जलता हो भीतर दावानल,<br />लोहा भी जाता उबल-उबल ।<br />मथ सागर को मँदरांचल से,<br />पाते हैं केवल महा गरल ।<br />इस महाभयंकर पीड़ा को,<br />हम विषपायी हो सह जाएँ ?<br />हम प्रणय-गीत कैसे गाएँ ?<br /><br />अंतर में केवल रहा क्लेश,<br />अब नहीं यहाँ कुछ बचा शेष ।<br />पथ निर्जन, बंजर और कठिन,<br />आँखें हैं श्रम से निर्निमष ।<br />क्या संभव है कि ऐसे में,<br />यह अधर भला कुछ कह पाएँ ?<br />हम प्रणय-गीत कैसे गाएँ ?<br /><br />घेरे हैं चार दिशाओं से,<br />जनजीवन की यह आकुलता ।<br />वह शापित कारक और व्यथा,<br />वह निर्बलता यह दुर्बलता ।<br />जब जीवन, ज्वाला में जलता,<br />क्या गाल बजाते रह जाएं ?<br />हम प्रणय-गीत कैसे गाएँ ?<br /><br />इस परधीन-से जीवन में,<br />अब हर्ष रहा किसके मन में ?<br />बस गयी विकलता ठौर-ठौर,<br />कस गए नियति के बंधन में ।<br />इस अवसर पर कुछ संभव है,<br />अवरोधक थोड़े ढह जाएँ ?<br />हम प्रणय-गीत कैसे गाएँ ? </span><br /><span style="color:#33ffff;"></span><br /><span style="color:#33ffff;"></span><br /><span style="color:#ff6600;"><strong>By- </strong></span><a href="http://www.srijangatha.com/"><span style="color:#ff6600;"><strong>www.srijangatha.com</strong></span></a><br /><span style="color:#33ffff;"></span><div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/32417416-115645627833159383?l=ajaypathak1.blogspot.com'/></div>जयप्रकाश मानसnoreply@blogger.com0tag:blogger.com,1999:blog-32417416.post-1156456054993645432006-08-24T14:41:00.000-07:002006-08-24T14:47:34.996-07:00उसने देखा<p align="left"><a href="http://photos1.blogger.com/blogger/3622/2073/1600/prabhakar25.0.jpg"><img style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; CURSOR: hand; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://photos1.blogger.com/blogger/3622/2073/320/prabhakar25.0.jpg" border="0" /></a></p><br /><span style="color:#66ffff;">उसने देखा आज हमारी आँखों में,<br />जैसे बिजली चमकी हो बरसातों में ।<br /><br />सहारा ने सागर का पानी सोख लिया,<br />ऐसा ही एहसास हुआ जज़्बातों में ।<br /><br />तन्हाई में रहना अच्छा लगता है,<br />खुद ही से बातें करते हैं रातों में ।<br /><br />आँखों में रंगीन फ़िज़ाओं का मंज़र,<br />सच्चाई को ढूँढ़ रहा है बातों में ।<br /><br />रूह तलक महके हैं ऐसा लगता है,<br />कोई खुशबू घोल गया है साँसों में ।</span><br /><span style="color:#66ffff;"></span><br /><span style="color:#66ffff;"></span><br /><span style="color:#ffcc33;"><strong>By- </strong></span><a href="http://www.srijangatha.com/"><span style="color:#ffcc33;"><strong>www.srijangatha.com</strong></span></a><div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/32417416-115645605499364543?l=ajaypathak1.blogspot.com'/></div>जयप्रकाश मानसnoreply@blogger.com0tag:blogger.com,1999:blog-32417416.post-1156455700771050172006-08-24T14:38:00.000-07:002006-08-24T14:41:40.773-07:00सपने सजाऊँ<a href="http://photos1.blogger.com/blogger/3622/2073/1600/1%20(2).jpg"><img style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; CURSOR: hand; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://photos1.blogger.com/blogger/3622/2073/320/1%20%282%29.jpg" border="0" /></a><br /><span style="color:#ff9966;">आँख में सपने सजाऊँ<br />प्रेम की बाती जलाऊँ,<br />कौन-सा मैं गीत गाऊँ, यह समझ आता नहीं है ।<br />गीत का मुखड़ा तुम्हारे बिन सँवर पाता नहीं है ।</span><br /><br /><span style="color:#ff9966;">चाँदनी बेचैन होकर,<br />देखती है राह कब से ।<br />खुशबुओं से तर हवाएँ,<br />पूछती हैं बात हमसे ।<br />लाज के परदे हटाओ,<br />दूरियाँ अब तो घटाओ,<br />रूप के लोभी नयन से अब रहा जाता नहीं है ।<br />गीत का मुखड़ा तुम्हारे बिन सँवर पाता नहीं है ।</span><br /><br /><span style="color:#ff9966;">आज खाली है जिगर में,<br />प्रीत की पीली हवेली ।<br />बन गई अन्जान सारी,<br />ज़िन्दगी जैसे पहेली ।<br />आज मन में नेह भर दो,<br />प्राण को संतृप्त कर दो,<br />तन-बदन की इस जलन को अब सहा जाता नहीं है ।<br />गीत का मुखड़ा तुम्हारे बिन सँवर पाता नहीं है ।</span><br /><br /><span style="color:#ff9966;">ज़िदगी एक दूसरा ही,<br />नाम है जैसे हवन का ।<br />होम करने को मिला हो,<br />एक पल जैसे मिलन का ।<br />ध्येय सारे छोड़ आओ,<br />बंधनों को तोड़ आओ,<br />वक्त जालिम है प्रिये, वह लौट कर आता नहीं है ।<br />गीत का मुखड़ा तुमहारे बिन संवर पाता नहीं है ।</span><br /><br /><span style="color:#ffcc00;"><strong>By- </strong></span><a href="http://www.srijangatha.com/"><span style="color:#ffcc00;"><strong>www.srijangatha.com</strong></span></a><div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/32417416-115645570077105017?l=ajaypathak1.blogspot.com'/></div>जयप्रकाश मानसnoreply@blogger.com0tag:blogger.com,1999:blog-32417416.post-1156455465322313692006-08-24T14:33:00.000-07:002006-08-24T14:37:45.326-07:00मधुपान करा दो<a href="http://photos1.blogger.com/blogger/3622/2073/1600/DSC00005.jpg"><img style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; CURSOR: hand; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://photos1.blogger.com/blogger/3622/2073/320/DSC00005.jpg" border="0" /></a><br /><span style="color:#66ffff;">जलते वन के इस तरुवर को,<br />पावस का संज्ञान करा दो ।<br />आज प्रिये मधुपान करा दो ।<br /><br />सुख-दुख के ताने-वाने में,<br />उलझा रहा चिरंतर...दुर्गम पथ पर,<br />चोटिल पग ले,<br />चलता रहा निरंतर....<br />जीलित हूँपर, जीवन क्या है<br />इसका मुझको भान करा दो,<br />आज प्रिये मधुपान करा दो ।<br /><br />थके हुए निर्जल अधरों में,<br />फिर से प्यास जगी है ।<br />सुलग रही यह काया भीतर,<br />जैसे आग लगी है ।<br />देको मेरी ओर नयन भर,<br />तृष्णा का अवासान करा दो ।<br /><br />जैसे दूर हुए जाते हैं,<br />हम खुद ही अपने से ।<br />अच्छे दिन जो बीत चुके हैं,<br />लगते हैं सपने-से ।<br />मन में श्याम-निशाएँ गहरी,<br />उसका एक विहान करा दो ।<br />आज प्रिये मधुपान करा दो ।</span><br /><span style="color:#66ffff;"></span><br /><strong><span style="color:#ffcc33;">By- </span></strong><a href="http://www.srijangatha.com/"><strong><span style="color:#ffcc33;">www.srijangatha.com</span></strong></a><div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/32417416-115645546532231369?l=ajaypathak1.blogspot.com'/></div>जयप्रकाश मानसnoreply@blogger.com0tag:blogger.com,1999:blog-32417416.post-1156455205797304082006-08-24T14:30:00.000-07:002006-08-24T14:33:25.800-07:00मर्यादा<a href="http://photos1.blogger.com/blogger/3622/2073/1600/vil001.jpg"><img style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; CURSOR: hand; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://photos1.blogger.com/blogger/3622/2073/320/vil001.jpg" border="0" /></a><br /><span style="color:#ffffcc;">अपनी मर्यादाएँ फूहड़,<br />उनकी...शोख अदाएँ चंचल ।<br />उनकी बातें ब्रह्म-वाक्य है,<br />अपनी बोली बात अनर्गल ।<br /><br />आँखों में लाली विलास की,<br />दिखती है, खाली गिलास की ।<br />ए, सी, कमरा मुर्ग-मसल्लम्,<br />होठों पर बातें विकास की ।<br />उनकी आमद भाग्य जगाए,<br />अपना दर्शन.. महा अमंगल ।<br /><br />देश-प्रेम की बात करे हैं<br />भीतर में उन्माद भरे हैं ।<br />उनके षडयंत्रों के चलते,<br />जाने कितने लोग मरे हैं ।<br />उनके आँसू गंगाजल हैं ।<br />उनके आँसू गंगाजल हैं,<br />अपनी.. बहते नाली का जल<br /><br />नैतिकता के पाठ पढ़ाएँ,<br />घर को सोने से मढ़वाएँ ।<br />अपने स्वारथ की वेदी पर,<br />समरसता को भेंट चढ़ाए ।<br />उनका भाषण अमर गान हैं,<br />अपना शब्द-शब्द विश्रृंखल ।<br />अपनी मर्यादाएँ फूहड़,<br />उनकी... शोख अदाएँ चंचल</span><br /><span style="color:#ffffcc;"></span><br /><strong><span style="color:#33ff33;">By- </span></strong><a href="http://www.srijangatha.com/"><strong><span style="color:#33ff33;">www.srijangatha.com</span></strong></a><div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/32417416-115645520579730408?l=ajaypathak1.blogspot.com'/></div>जयप्रकाश मानसnoreply@blogger.com0tag:blogger.com,1999:blog-32417416.post-1156455027317521262006-08-24T14:27:00.000-07:002006-08-24T14:30:27.320-07:00गहरे पानी में<span style="color:#ffff00;">गहरे पानी में पत्थर मत फेंको,<br />ऐसा करने से हलचल हो जाती है ।<br />झिलमिल पानी में लहरें उठती हैं, <a href="http://photos1.blogger.com/blogger/3622/2073/1600/vil003.jpg"><img style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; WIDTH: 254px; CURSOR: hand; HEIGHT: 175px" height="180" alt="" src="http://photos1.blogger.com/blogger/3622/2073/320/vil003.jpg" width="264" border="0" /></a><br />ये लहरें चलकर दूर तलक जाती हैं ।<br /><br />पत्थर तो आखिर पत्थर होता है,<br />क्या रिश्ता उसका जल से या दर्ऱण से ।<br />निर्मोही जिससे टकराता है,<br />उसके अंतर से आह निकल जाती है ।<br /><br />ठहरे पानी में कंपन की पीड़ा,<br />उसके भीतर का मौन समझ सकता है ।<br />सागर से गहरे-गहरे अंतर में,<br />भीतर ही भीतर और उतर जाती है ।<br /><br />पर, लहरों का तो जीवन होता है,<br />जो अपनी बीती आप कहा करती है ।<br />इनकी भाषाएए आदिम भाषाएँ<br />हर बोली इनकी अनहद कहलाती है ।<br /><br />ये लहरें जो कुछ बोला करती हैं,<br />मैं उन शब्दों पर ग़ौर किया करता हूँ ।<br />कुछ व्यक्त हुई उन्मत्त हिलोरों में...<br />कुछ बातें उनके भीतर रह जाती हैं ।</span><br /><p><span style="color:#ffff00;"></span></p><p><span style="color:#ffff00;"><strong><span style="color:#ffcc33;">By- </span></strong><a href="http://www.srijangatha.com/"><strong><span style="color:#ffcc33;">www.srijangatha.com</span></strong></a></p></span><br /><br /></span><div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/32417416-115645502731752126?l=ajaypathak1.blogspot.com'/></div>जयप्रकाश मानसnoreply@blogger.com0tag:blogger.com,1999:blog-32417416.post-1156454842578361682006-08-24T14:24:00.000-07:002006-08-24T14:27:22.580-07:00पहली किरण<span style="color:#66ffff;">हिल गए निर्णाण सारे,<br />नींव ढहती जा रही है ।<br />प्राण के नेपथ्य से फिर,<br />आज कोयल गा रही है ।<br /><a href="http://photos1.blogger.com/blogger/3622/2073/1600/vil002.jpg"><img style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; WIDTH: 274px; CURSOR: hand; HEIGHT: 161px" height="138" alt="" src="http://photos1.blogger.com/blogger/3622/2073/320/vil002.jpg" width="320" border="0" /></a><br />काँपते तन को लिए मैं,<br />आज बेसुध-सा खड़ा हूँ ।<br />अण्डहर के बीत कोई,<br />एक पत्थर-सा पड़ा हूँ ।<br />और ऊपर से प्रलय की,<br />धार बहती जा रही है ।<br /><br />आज सुधियों में उभरती,<br />एक भूली-सी कहानी ।<br />और नयनों से उमड़कर,<br />बह गया दो बूँद पानी ।<br />बंधनों की फिर सरकती,<br />डोर छूटी जा रही है ।<br /><br />भोर ही पहली किरण है,<br />लुप्त हैं नभ के सितारे ।<br />शून्य मन की चेतना है,<br />मौन हैं आंगन-दुआरे ।<br />भोर लंबी वेदना की,<br />बात कहती जा रही है ।</span><br /><span style="color:#66ffff;"></span><br /><span style="color:#66ffff;"></span><br /><strong><span style="color:#ffff66;">By- </span></strong><a href="http://www.srijangatha.com/"><strong><span style="color:#ffff66;">www.srijangatha.com</span></strong></a><div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/32417416-115645484257836168?l=ajaypathak1.blogspot.com'/></div>जयप्रकाश मानसnoreply@blogger.com2tag:blogger.com,1999:blog-32417416.post-1156454622157080552006-08-24T14:18:00.000-07:002006-08-24T14:23:42.170-07:00माया<span style="color:#ffcccc;">माया !<br />अद्भूत रूप द्खाए,<br />ज्यों बादल में बिजली चमके<br />और पुनः छिप जाए ।<br /><br />कभी नेह का रंग चढ़ाकर,<br />भरमाए आँखों को ।<br />रुचिर-सरस नवगंध सनाए,<br />महकाए साँसों को ।<br />जितनी बार निहारें उसको,<br />उतनी और सुहाए ।<br />माय अद्भुत रूप दिखाए !<br /><br />मन के पोकर में लहराए, <a href="http://photos1.blogger.com/blogger/3622/2073/1600/vil005.0.jpg"><img style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; WIDTH: 195px; CURSOR: hand; HEIGHT: 232px" height="298" alt="" src="http://photos1.blogger.com/blogger/3622/2073/320/vil005.0.jpg" width="235" border="0" /></a><br />भोली प्राण पछरिया,<br />उसके चारों ओर फिराए,<br />माया एक रसरिया,<br />उसके चारों ओर फिराए,<br />माया एक रसिरया ।<br />मधुर फांस के फंदे डाले,<br />बैठी जाल बिछाए ।<br />माया अद्भुत रूप दिखाए !<br /><br /><br /><br />सुनेपन का लाभ उठाकर,<br />आए शांत भुवन में ।<br />मंथर पदचापों को धरते,<br />पहुँचे सीधे मन में ।<br />दिन भर उन्मत करे ठिठोली,<br />सांझ हुए सकुचाए ।<br /><br />माया !<br />अद्भुत रूप दिखाए,<br />ज्यों बादल में बिजली चमके<br />और पुनः छिप जाए ।</span><br /><span style="color:#ffcccc;"><br /><strong><span style="color:#ffff00;">By- </span></strong><a href="http://www.srijangatha.com/"><strong><span style="color:#ffff00;">www.srijangatha.com</span></strong></a></span><div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/32417416-115645462215708055?l=ajaypathak1.blogspot.com'/></div>जयप्रकाश मानसnoreply@blogger.com0tag:blogger.com,1999:blog-32417416.post-1155242120773075882006-08-10T13:32:00.000-07:002006-08-10T13:35:20.776-07:00लोकतंत्र<span style="color:#ff9966;"><br />जब तक<br />भूखे की रोटी का इल्हाम नहीं,<br />इंतज़ाम नहीं ।<br />दर-दर फिरते<br />बेकारों के हाथं को,<br />कोई काम नहीं ।</span><br /><span style="color:#ff9966;"><br />मेहनतकश लोगों के हाथो<br />मेहनत का वाजिब दाम नहीं ।<br />जब तक प्रतिभा का<br />यथायोग्य आदर,<br />उनका सम्मान नहीं ।<br /><br />तब तक यारों मैं समझूँगा<br />यह संविधान<br />इक धोखा है ।<br />निरर्थक बातों से भरा हुआ<br />केवल काग़ज़ का पौधा है ।<br /><br />जब तक हत्यारे<br />संसद की कुर्सी पर<br />बेसुध सोयेंगे ।<br />हम लोकतंत्र की<br />लाशो को अपने<br />कंधे पर ढोयेंगे ।<br /><br />जब तक प्रतिनिधि<br />बन कर यह ढोंगी<br />सज्जन का भेष धरायेंगे ।<br />यह नर-पिशाच्<br />मानवता की अस्थि<br />और मज्जा खायेंगे ।<br /><br />तब तक यारों मैं समझूँगा<br />संसद कचरे का डब्बा है<br />यह लोकतंत्र के माथे पर<br />गहराता काला धब्बा है ।<br /><br />भारत के<br />मानसरोवर पर<br />कौवे जब तक<br />मंडारायेंगे,<br />हंसों के हिस्सों के मोती<br />ये मूरख चुगते जायेंगे ।<br /><br />सब हंस व्यथाओं के चलते<br />जब रोयेंगे पछतायेंगे।<br />कौबों ने छोड़ दिया<br />जिसको,<br />उस जूठन को ही खायेंगे ।<br /><br />तब तक यारों मैं समझूँगा<br />यह गंदा एक<br />अखाड़ा है ।<br />यह लोकतंत्र इक दलदल है ।<br />या फिर सुअर का बाड़ा है ।</span><br /></span><div align="right"><br /><span style="color:#ffffff;">***********************<br /> <span style="color:#cc9933;">By- </span><a href="http://www.srijangatha.com"><span style="color:#cc9933;">www.srijangatha.com</span></a><br />***********************</span></div><div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/32417416-115524212077307588?l=ajaypathak1.blogspot.com'/></div>जयप्रकाश मानसnoreply@blogger.com0tag:blogger.com,1999:blog-32417416.post-1155241893989347402006-08-10T13:29:00.000-07:002006-08-11T09:32:17.873-07:00अंतिम पहर<span style="color:#ffcccc;">रात के अंतिम पहर में,<br />आस का दीपक जलाए ।<br />देर से कोई खड़ा है,<br />द्वार पे कंधा टिकाए ।</span><br /><span style="color:#ffcccc;"><br />बोलता भी है नहीं वह,<br />डोलता भी है नहीं वह ।<br />शब्द जैसे पी गया,<br />मुँह खोलता भी है नहीं वह ।<br />कौन जाने कौन होगा ?<br />मैं पुकारूँ तो लजाए ।<br /><br />आँख लगती भी नहीं है,<br />और जगती भी नहीं है ।<br />सामने सब कुछ निहारे,<br />और थकती भी नहीं है ।<br />क्या बताएँ किस लिए वह,<br />रात भर हमको सताए ?<br /><br />रोशनी है झिलमिलाती,<br />तारिकाएँ गीत गातीं ।<br />ओस में भींगे सुमन हैं,<br />और कलियाँ खिलखिलातीं ।<br />आज फूलों के अधर से,<br />गीत कोई गुनगुनाए ।</span><br /></span><span style="color:#ffcccc;"><div align="right"><br /></span></div><span style="color:#ffcc00;">***********************<br /><span style="color:#33ff33;">By- </span><a href="http://www.srijangatha.com"><span style="color:#33ff33;">www.srijangatha.com</span></a><br />***********************</span><div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/32417416-115524189398934740?l=ajaypathak1.blogspot.com'/></div>जयप्रकाश मानसnoreply@blogger.com0