tag:blogger.com,1999:blog-32145305.post-66008637346899379892007-04-11T20:18:00.000-07:002007-04-11T20:18:00.000-07:00जो थोड़ी-बहुत दुनिया अभी तक देख-समझ पायी हूँ उसके आ...जो थोड़ी-बहुत दुनिया अभी तक देख-समझ पायी हूँ उसके आधार पर कहूँगी की कैलेंडर वाली स्त्री निठारी वाली स्त्री से भी अधिक खो चुकी है, अन्दर ही अन्दर! और यदि आधुनिक बनने की होड़ में वो इस सत्य को स्वीकारने की हिम्मत ना जुटा पाये, जिसकी की आशंका अधिक है, तो इसमे भी कोई आश्चर्य नही। कैलेंडर वाली स्त्री ने तो दिखावे की दुनिया में पल-पल आत्मसम्मान रुपी संतान खोयी, और निथारी वाली स्त्री की तरह वो किसी से अपनी करुना भी ना बाँट पायी। मॅन ही मॅन घुट रही है और ऊपर ही ऊपर दिखावटी मुस्कान लिए कैलेंडर के लिए पोज़ दे रही है, संतान्विहीन होते हुए भी, संतान को खोने समान दुःख लेकर। अब ये बात तो स्वयं से ही पूछ्नी होगी की उसकी संतान भी क्या कोई मोहिंदर चुरा ले गया?shweta sirohi guptahttp://www.blogger.com/profile/01511895275321173035noreply@blogger.com