tag:blogger.com,1999:blog-30371899.post-8268601385909836632008-03-24T13:21:00.000+05:302008-03-24T13:21:00.000+05:30एक तरफ़ हैं चाँद पर, इंसानों के पाँव,और इधर अंधेर ...एक तरफ़ हैं चाँद पर, इंसानों के पाँव,<BR/>और इधर अंधेर में, सदियों से हैं गाँव....<BR/>वाह निखिल जी वाह...बहुत खूब लिखा है आप ने.<BR/>दुष्यंत जी का एक शेर याद आ गया:<BR/>"कहाँ तो तय था चिरागाँ हर एक घर के लिए<BR/>यहाँ चिराग मय्यसर नहीं शहर के लिए "<BR/>आप की पूरी रचना ही समसामयिक है और सूचने को मजबूर करती है. ऐसे विलक्षण रचना के लिए बधाई.<BR/>नीरजनीरज गोस्वामीhttp://www.blogger.com/profile/07783169049273015154noreply@blogger.com