tag:blogger.com,1999:blog-30371899.post-49606882786596551102007-12-16T12:37:00.000+05:302007-12-16T12:37:00.000+05:30''न मिली थीं माँ की थपकियाँ--अब खो दी प्रेमिका की ...''न मिली थीं माँ की थपकियाँ--अब खो दी <BR/>प्रेमिका की स्मित मुस्कान----दबा गया कोमल भाव-- <BR/>--अकेलेपन का सताया--<BR/>डूबा वह शतरंज की क्रीड़ा में <BR/>मोहरा बना ---फूट पड़ा एक दर्दनाक प्रतिशोध <BR/>-गाज गिरी जो मिट्टी को मथकर<BR/>राक्षस का उद्‌गम''<BR/>यह कुछ पंक्तियाँ आप की कविता में बहुत ही सशक्त हैं और सारी कविता को अपने कन्धों पर लेकर चल रही हैं-बहुत खूबसूरती से आप ने भावों को कविता का रूप दे दिया है-कैसे भीतर का आक्रोश एक नकारात्मक रूप ले सकता है यह बताने की अच्छी कोशिश की है.किसी भी गंभीर विषय पर लिखना आसान नहीं होता,लेकिन आप ने बहुत हद तक सफल कोशिश की है.<BR/>हरिहर जी, मैंने आप की पुरानी कवितायेँभी आज ही हिंद युग्म पर पढीं ,यह आप की अब तक की प्रकाशित रचनाओं में सबसे बेहतर लगी. बधाई स्वीकारिये-Alpana Vermahttp://www.blogger.com/profile/08360043006024019346noreply@blogger.com