tag:blogger.com,1999:blog-302561552009-07-04T03:52:58.872-07:00रजनीगन्धारजनी भार्गवhttp://www.blogger.com/profile/08154642819162396396noreply@blogger.comBlogger44125tag:blogger.com,1999:blog-30256155.post-61261101001469142452009-07-03T18:53:00.000-07:002009-07-03T18:55:37.150-07:00जेठ बुलाएउड़ती फ़ूस<br />कटी-कटी धूप<br />गुड़-गुड़ करती<br />बाबा के हुक्के की मूँज<br /><br />जेठ दुपहरी<br />छाँव तले गिलहरी<br />किट-किट करती<br />अम्मा की सुपारी दिन सून<br /><br />लम्बे दिन<br />लम्बी तारीखें<br />औंधे मुँह ऊँघती<br />जीजी की किताबें, परचून<br /><br />गुम हवा<br />झुलसी धरा<br />मेढ़ पर सोचती<br />उसकी आँखें लगी, सब सून<br />_____________<div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/30256155-6126110100146914245?l=rajnigandhaa.blogspot.com'/></div>रजनी भार्गवhttp://www.blogger.com/profile/08154642819162396396noreply@blogger.com5tag:blogger.com,1999:blog-30256155.post-87368293386042241602009-04-19T06:11:00.000-07:002009-04-20T05:32:46.943-07:00दुआबचपन से दुआएँ साथ चलती हैं<br /><br />आँगन को बुहारती<br />टीन के डिब्बे में आम की पौध सी पलती हैं<br /><br />मेरे हाथ की लकीरों में<br />गली में स्टापू सी खेलती हैं<br /><br />रात में सपनों सी<br />दिन में पूजा के आचमन सी मिलती हैं<br /><br />बाँस के झुरमुट में<br />मेरे तलवे के नीचे धूप सी खिलती है<br /><br />नन्हे पैरों से विचरती<br />आँगन में ओस की बूँदों सी झरती हैं<br /><br />बट पर मन्नतों में<br />मेरी कलाई में मौली से बँधी मिलती है<br /><br />बचपन से दुआएँ साथ चलती हैं<br />दीवारों पर फूल के बूटों सी मिलती हैं।<br /><br /><br />_____________________<div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/30256155-8736829338604224160?l=rajnigandhaa.blogspot.com'/></div>रजनी भार्गवhttp://www.blogger.com/profile/08154642819162396396noreply@blogger.com6tag:blogger.com,1999:blog-30256155.post-90198433460414156302009-03-17T19:39:00.000-07:002009-03-17T19:40:51.945-07:00सैलाबदर्द का सैलाब रुक गया था<br />कागज़ के कोने पर<br />अहसास हो रहा था<br />कोने से टपक कर गिरी जो एक भी बूँद<br />अन्तराल की गहराईयों तक जाएगी<br />जहाँ अँधेरा<br />काली चिकनी चट्टान सा<br />शून्य सा जड़<br />आहिल्या की तरह पाषाण सा होगा<br />और दर्द की बूँद जब टपक कर गिरेगी<br />अन्तर्नाद करती हुई<br />एक उल्का<br />अनगणित फुलझड़ियाँ सी जलेगी।<br /><br />_______________<div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/30256155-9019843346041415630?l=rajnigandhaa.blogspot.com'/></div>रजनी भार्गवhttp://www.blogger.com/profile/08154642819162396396noreply@blogger.com12tag:blogger.com,1999:blog-30256155.post-8309104848116341572009-01-16T17:41:00.000-08:002009-01-17T16:38:28.519-08:00सुरमई शामचुपके से सुरमई हो गयी थी शाम<br />रात ने सर रख दिया था काँधे पर<br />तारों ने बो दिये थे चन्द्रकिरण से मनके वीराने में<br />धवल, चमकीली चाँद की निबोली<br />अटकी रही थी नीम की टहनी पर<br />नीचे गिरी तॊ बाजूबंद सी खुल गई<br />सुरमई शाम रात के काँधे पर<br />सर रख कर सो गई ।<br /><br />________________<div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/30256155-830910484811634157?l=rajnigandhaa.blogspot.com'/></div>रजनी भार्गवhttp://www.blogger.com/profile/08154642819162396396noreply@blogger.com17tag:blogger.com,1999:blog-30256155.post-74049178270787391742008-10-01T21:00:00.000-07:002008-10-01T21:02:09.448-07:00कुछ हायकुटूटते तारे<br />लान में लेटे हुए<br />अगस्त माह<br /><br />गाँव में चाँद<br />बावड़ी में भीगा है<br />अमा आ गई<br /><br />धुला सूरज<br />जंगले आती धूप<br />चाय की चुस्की<br /><br />गरजे मेघ<br />कानाफ़ूसी करते<br />ऊँचे शीशम<br /><br />नन्ही मछली<br />पोखर है हाथ में<br />जमी है काई<br /><br />मेपल पत्ती<br />डायरी के पन्ने<br />झड़ रहे हैं<br /><br />__________<div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/30256155-7404917827078739174?l=rajnigandhaa.blogspot.com'/></div>रजनी भार्गवhttp://www.blogger.com/profile/08154642819162396396noreply@blogger.com18tag:blogger.com,1999:blog-30256155.post-4626837753008849532008-09-18T19:31:00.000-07:002008-09-18T19:33:02.391-07:00आरिगामीधूप और पत्तों की आरिगामी<br />मेरी खिड़की पर बन रही थी,<br />सुबह के बदलते पहर<br />मुड़ते, खुलते<br />खिड़की के एक कोने पर<br />सीमित रह गए थे।<br />उस आरिगामी में रह गई थी अब,<br />एक मैना,<br />एक पत्ती,<br />एक टुकड़ा धूप।<br /><br />धूप सरकी,<br />पत्ती टूटी,<br />मैना उड़ गई,<br />और,<br />अब रह गया है<br />सिर्फ़ कोरा कागज़<br />दूसरे पहर के रंग में ढलने के लिये<br />नई आरिगामी बनने के लिये।<br /><br />_________________<div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/30256155-462683775300884953?l=rajnigandhaa.blogspot.com'/></div>रजनी भार्गवhttp://www.blogger.com/profile/08154642819162396396noreply@blogger.com25tag:blogger.com,1999:blog-30256155.post-76248940198343312382008-09-02T17:12:00.000-07:002008-09-02T17:24:51.989-07:00नानाजी की टोपीमैं नानाजी की टोपी,<br />चाँद की किरण से सीती थी।<br /><br />अंदर से टोपी उधड़ गई थी।<br />उम्र में बड़ी हो गई थी।<br />थकी-हारी कुछ बेजान सी लगती थी।<br />जब तागे निकल जाते थे तो<br />झूमर से लहराते थी।<br />बड़े छोटे बेतरतीब से माथे पर नज़र आते थे।<br /><br />टोपी अब भी पुख्ता थी।<br />ऐसे लगता था जैसे कोई मनौती हो,<br />दुआ सी असर करती थी।<br />नानाजी को ठंड से बचाए रखती थी।<br /><br />चाँद की किरण तिलस्मी होती है,<br />अम्बर की परी नानाजी की सहेली होती थी।<br />टोपी जब ठीक हो जाती थी<br />ढेरों आशीषों की बरसात होती थी।<br />नानाजी के पास चाँद की किरण होती थी,<br />मेरे पास आशीषों की बरसात।<br /><br />_____________________<div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/30256155-7624894019834331238?l=rajnigandhaa.blogspot.com'/></div>रजनी भार्गवhttp://www.blogger.com/profile/08154642819162396396noreply@blogger.com17tag:blogger.com,1999:blog-30256155.post-20996954958019594612008-06-02T20:59:00.001-07:002008-06-02T21:01:53.771-07:00आकांक्षाआकाश को कितनी ही बार<br />अपने हाथों में ले कर<br />दूधिया बादल से नहाई हूँ मैं,<br /><br />आकांक्षाओं को कई बार<br />अपनी आँखों में संजो कर<br />रंग भरी पिचकारी सी छूटी हूँ मैं,<br />और फिर,<br />गुलमोहर की तरह गर्व से<br />तुम पर बिखर गई हूँ मैं,<br /><br />क्षितिज का प्रथम पहरेदार<br />आकाश में वो जो ध्रुव तारा है,<br />उसे तुम्हे सौंप कर<br />रात में चाँदनी बन कर छिटक गई हूँ मैं<br /><br />तुम जानो या न जानो<br />अहसासों के इस गुलदान में<br />बादलों से नहाई हूँ,<br />रंगों से भीगी हूँ,<br />चाँदनी सी छिटकी हूँ,<br />और इन्ही खूबसूरत अहसासों से,<br />संदली हवा की तरह<br />महक गई हूँ मैं।<div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/30256155-2099695495801959461?l=rajnigandhaa.blogspot.com'/></div>रजनी भार्गवhttp://www.blogger.com/profile/08154642819162396396noreply@blogger.com12tag:blogger.com,1999:blog-30256155.post-3376815980235859002008-05-21T09:03:00.000-07:002008-05-21T09:10:03.166-07:00सभ्यताज़िन्दगी के पलों को<br />गुणा, भाग कर ,<br />घटा, जोड़ कर ,<br />बहा दिया था नदी में एक दिन मैने ।<br /><br />नदी -<br />जो ज़मीन के नीचे,<br />पुरखों के पांव तले<br />और मेरे पाँव के नीचे भी<br />बहती रही है सदियों से ।<br /><br />मैं देखती हूँ<br />कि उभर आये हैं भित्तिचित्र<br />नदी के मुहाने पर ।<br />और...<br />ये भी देख रही हूँ मैं<br />कि इतिहास के संदर्भों की दरारों में<br />ठहर गया है पानी,<br />और इसी पानी में<br />खिल गये हैं कमल के फ़ूल ।<br /><br />चकित हूँ मैं<br />इस दृश्य को देख कर<br />कि इसी नदी के मुहाने पर<br />किलकारी ले रही है नई सभ्यता<br />ठीक ऐसे ही<br />जैसे हँसता है नवजात शिशु<br />माँ की गोद में आकर । ....<div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/30256155-337681598023585900?l=rajnigandhaa.blogspot.com'/></div>रजनी भार्गवhttp://www.blogger.com/profile/08154642819162396396noreply@blogger.com8tag:blogger.com,1999:blog-30256155.post-53996654375841809622008-05-16T18:15:00.000-07:002008-05-16T18:18:26.181-07:00मेरे अपने सपनेमेरे सपने मेरे अपने हैं,<br />कोई भी इस हाशिए पर लिखे<br />ये फ़िर भी मेरे अपने हैं.<br />मौजों पर सवार ये तख्ती,<br />बहुत थपेड़े सहती है.<br />क्षितिज तक पहुँचने की चाह में<br />खुद ही मीलों तक बहती है.<br /><br />_________________<div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/30256155-5399665437584180962?l=rajnigandhaa.blogspot.com'/></div>रजनी भार्गवhttp://www.blogger.com/profile/08154642819162396396noreply@blogger.com7tag:blogger.com,1999:blog-30256155.post-17468727806261025502008-03-21T10:09:00.000-07:002008-03-21T10:26:27.669-07:00होली- कुछ चित्रखुलते जाते सब गठबँधन<br />आसमान से हटते पहरे<br />जब से फागुन ले कर आया<br />पीत पराग रँग कुछ गहरे।<br />---<br />पीली हल्दी, सजी किनारी<br />खिली धूप की चादर ओढ़ी<br />आँगन पूरा हरसिंगार सा<br />और वसंत खड़ी है ड्योढ़ी।<br />---<br />पच पच पच करती पिचकारी<br />रँगों की बहती फुलवारी<br />मल गुलाल सिहरी दोपहरी<br />मेघों का सुन गर्जन भारी<br />---<br />आँगन में फ़ैली है किच-पिच<br />रंग सुनहरे, चूनर गीली<br />सूर्य किरण अब उन्हें सोख के<br />खेल रही गलियों में होली।<br />______________<br /><br />होली की शुभकामनाओं सहित<div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/30256155-1746872780626102550?l=rajnigandhaa.blogspot.com'/></div>रजनी भार्गवhttp://www.blogger.com/profile/08154642819162396396noreply@blogger.com8tag:blogger.com,1999:blog-30256155.post-6613721962965914922008-02-07T19:21:00.000-08:002008-02-08T08:55:32.705-08:00सवालवो पल वहीं ठहर गया था,<br />जिस पल खिड़की से छनती धूप ने,<br />तुम्हे हताश और निढाल पाया था,<br />मेरी आँखों से कुछ सवाल करते पाया था।<br /><br />वो सवाल अभी भी उघड़े पड़े हैं,<br />उस पोस्टकार्ड की तरह जो आया था<br />पहाड़ियों की बर्फ से भीग कर,<br />दराज़ में अब भी पड़ा है<br />कुछ सिकुड़ा हुआ।<br /><br />चलो,<br />अब हताश लकीरों को ताक पर रख दें,<br />एक नए पोस्टकार्ड पर ट्यूलिप्स और क्रोकस बनाते हैं,<br />बसंत को बुलाते हैं,<br />कुछ बादल छँट जाएँगे,<br />तुम्हे मेरे कुछ जवाब मिल जाएँगे|<br /><br />__________________<div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/30256155-661372196296591492?l=rajnigandhaa.blogspot.com'/></div>रजनी भार्गवhttp://www.blogger.com/profile/08154642819162396396noreply@blogger.com20tag:blogger.com,1999:blog-30256155.post-70802756950525853052008-01-18T17:45:00.000-08:002008-01-18T17:50:06.447-08:00प्रार्थनाधूप में लिपटी एक प्रार्थना,<br />कुछ चुप, कुछ कहती हुई,<br />दूब के साथ उग रही थी।<br />मेरी कोट की जेब में<br />भूली हुई मेवा की तरह<br />अंगुलियों में कुलमुला रही थी।<br /><br />मुट्ठी में भर कर,<br />मन में कुछ बुदबुदा कर,<br />फूँक मारी थी।<br /><br />तुम्हारी आँखों के अथाह सागर में<br />गुम हुई खामोशी बता रही है,<br />शायद वो दुआ तुम तक पहुँची है।<br /><br />__________________<div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/30256155-7080275695052585305?l=rajnigandhaa.blogspot.com'/></div>रजनी भार्गवhttp://www.blogger.com/profile/08154642819162396396noreply@blogger.com6tag:blogger.com,1999:blog-30256155.post-44473028225429638142008-01-14T19:58:00.000-08:002008-01-14T20:00:37.068-08:00चेतना के फूलकमरे में थी एक मेज़,<br />दो कुर्सियाँ,<br />सीलिंग से लटके लैम्प की<br />रोशनी गोल सीमित दायरे में.<br /><br />उससे परे थे कुछ साए,<br />खिड़की में रखे गमले के,<br />कांउटर पर कप और प्लेट के,<br />खूँटी पर टँगे कपड़ों के.<br /><br />समय के सन्नाटे में,<br />झाँक रहा था सूरज का एक टुकड़ा,<br />आधा मेज़ पर और आधा फ़र्श पर लेटा हुआ,<br />धीरे-धीरे फ़र्श पर उतरते हुए<br />रह गई थी अब एक लकीर<br />जो घुल-मिल गई थी मेरी हाथ की लकीरों से,<br />चेतना के फूल खिल गए थे इस जज़ीरे पर।<br />समय के गठबँधन खुल गए थे किनारे पर।<br />___________________<div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/30256155-4447302822542963814?l=rajnigandhaa.blogspot.com'/></div>रजनी भार्गवhttp://www.blogger.com/profile/08154642819162396396noreply@blogger.com8tag:blogger.com,1999:blog-30256155.post-76384100870676927582008-01-09T18:04:00.000-08:002008-01-09T18:14:49.766-08:00नया सालआया नया साल<br />ढलते दिन के साथ,<br />साँसे बह चली,<br />लिये नूतन दिवस के पराग।<br /><br />आया नया साल<br />बदलती तिथि के साथ,<br />अहसासों की गिलौरी में<br />बस गई है मीठी आस<br /><br />आया नया साल<br />पुराने दिनों के साथ<br />आस्था की मौली बाँधी,<br />नए सूर्योदय के साथ।<br /><br />आया नया साल<br />गुज़रते सपनों के साथ,<br />खुरदरे समय पर लिखी<br />तराशी हुई कहानियाँ आज।<br /><br />_________________<div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/30256155-7638410087067692758?l=rajnigandhaa.blogspot.com'/></div>रजनी भार्गवhttp://www.blogger.com/profile/08154642819162396396noreply@blogger.com6tag:blogger.com,1999:blog-30256155.post-21783695887381532702007-12-10T04:40:00.000-08:002007-12-10T05:04:46.342-08:00बिखरे खतकुछ खत पहुँचे, कुछ पहुँचे ही नहीं,<br />कुछ उत्तरी दिशा में देवदारों पर अटक गए,<br />कुछ दक्षिण दिशा में संदल बन में भटक गए.<br />दरवाज़े की ओट में किसी की नज़र में रह गए,<br />किसी राह में साँझ के साथ डूबते चले गए,<br />तुम्हारे साथ चलते हुए कुछ लिखे गए<br />पर टूटे माणिक से हर जगह बिखर गए,<br />आरज़ू बीनते हुए मन के हर पृष्ठ पर लिखे<br />पर कुछ मन की बारिश में भीगते हुए यूँ ही धुल गए,<br />कुछ खत पहुँचे, कुछ पहुँचे ही नहीं।<br /><br />______________________<div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/30256155-2178369588738153270?l=rajnigandhaa.blogspot.com'/></div>रजनी भार्गवhttp://www.blogger.com/profile/08154642819162396396noreply@blogger.com13tag:blogger.com,1999:blog-30256155.post-6837968566962318732007-12-03T13:08:00.000-08:002007-12-03T13:14:37.953-08:00अम्मा की रसोईअम्मा की रसोई में<br />सुबह शाम जलता चूल्हा,<br />बच्चों का उपर नीचे कूदना,<br />किसी का झिड़की खाना<br />तो किसी का आंचल में छुप जाना,<br />दिन गुज़रता था ऐसे<br />हर पल सँवरता हो जैसे।<br />कितने प्रश्न अम्मा के सामने जा बैठते थे,<br />अम्मा उन्हें हर कोने से उठा कर<br />तरतीब से लगाती थी,<br />जैसे अँगीठी में जलते कोयलों को<br />अँगुलियों से ठीक तरह लगाती हों।<br />दिन भर प्रश्नों से जूझना,<br />साँझ ढले उन्हे गोद में ले कर सो जाना,<br />अम्मा ने भेद लिया था संसार का सार,<br />सृष्टि का किया था नव निर्माण।<br />रूढियों में बँध कर पाला था ये संसार,<br />जो रोपा था दहलीज़ के इस पार,<br />बाँट दी धरोहर आज सब उस पार।<br /><br />_____________________<div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/30256155-683796856696231873?l=rajnigandhaa.blogspot.com'/></div>रजनी भार्गवhttp://www.blogger.com/profile/08154642819162396396noreply@blogger.com13tag:blogger.com,1999:blog-30256155.post-2285263716948184192007-10-14T18:53:00.000-07:002007-10-14T18:55:32.288-07:00युगतुम्हारी याद में एक युग समाया है,<br />गुज़रता है तो पुरवाई बन साँसों में समा जाता है,<br />हर राह सरल पगडंडी बन जाती है<br />जंगल की बीहड़ वीरानियाँ किनारे पर रह जाती है,<br />नागफ़नी पर ओस की बूँदें,<br />बादल बन धूप में घुल जाती हैं,<br />तुम्हारी आँखों की लकीरें हँसती हुई,<br />मेरे को तकती हैं<br />अनवरत कदमो से बढ़ती हुई,<br />मेरी हँसी को छूती हैं,<br />पिघलती यादें फ़िर से<br />एक युग में बहती हैं।<div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/30256155-228526371694818419?l=rajnigandhaa.blogspot.com'/></div>रजनी भार्गवhttp://www.blogger.com/profile/08154642819162396396noreply@blogger.com7tag:blogger.com,1999:blog-30256155.post-90438581849566829362007-09-18T05:17:00.000-07:002007-09-18T05:19:05.660-07:00रात की कहानीसुराही से रिसता पानी<br />छत की मुँडेर के पास ठहर गया था।<br />रात ने चाँद को सकोरे में उड़ेल कर<br />मुझे दिया था।<br />मैं अँजुरी में चाँद भर रही थी।<br />अँगुलियों से रिसती चाँदनी<br />अँजुरी में मावस भर रही थी।<br />सोच रही थी,<br />जब दूज का चाँद निकलेगा<br />तो अँजुरी फ़िर भरूँगी।<br />तुमसे रात की कहानी फ़िर<br />सुनूँगी।<div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/30256155-9043858184956682936?l=rajnigandhaa.blogspot.com'/></div>रजनी भार्गवhttp://www.blogger.com/profile/08154642819162396396noreply@blogger.com11tag:blogger.com,1999:blog-30256155.post-71433763623730431692007-09-06T03:55:00.000-07:002007-09-06T03:58:51.460-07:00क्लैडिस्कोपकल रात मुझसे लिपट कर<br />सोई थी एक गज़ल,<br />सुबह अशआर टिके थे अम्बर पर,<br />दर्द टिका था कोरों पर,<br />खनखनाती और रँग बिरँगी किरचों से<br />उभर आए हैं नए आयाम.<br />अनजाने अहसास से एक क्लैडिस्कोप<br />बना लाई है शाम ।<br /><br />_____________<div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/30256155-7143376362373043169?l=rajnigandhaa.blogspot.com'/></div>रजनी भार्गवhttp://www.blogger.com/profile/08154642819162396396noreply@blogger.com5tag:blogger.com,1999:blog-30256155.post-66135468898448051652007-09-03T10:13:00.000-07:002007-09-03T10:16:57.684-07:00अमलतासजेठ की दुपहरी में<br />अलसाई धूप को लपेटे,<br />अमलतास लेता है अँगड़ाई,<br />मैं सिहर जाती हूँ,<br />छू जाती है जब ठँडी पुरवाई.<br /><br />सूरज की किरणें जब पीले गुँचों में<br />नज़र आती हैं.<br />आँखों में फ़िरकनी घूम जाती है.<br /><br />गुम दोपहरी में मैं,<br />पीले सूखे फूल मुट्ठी में भर कर,<br />बाबा को दे आती थी,<br />बाबा फ़ूँक मारते थे तो<br />हज़ारों तितलियाँ उड़ जाती थीं.<br /><br />अमलतास के गले लग कर<br />हम अपनी बाँहों का घेरा नापते थे,<br />मेरा घेरा बढ़ता रहता था पर<br />बाबा का घेरा नहीं बढ़ता था.<br />मैं इंतज़ार करती रही कि<br />बाबा का घेरा कब बढ़ेगा.<br /><br />घर के अहाते में आज<br />मेरे बिटिया की मुट्ठी में पीले सूखे फूल हैं,<br />फ़ूँक मारो तो हज़ारों तितलियाँ उड़ जाती हैं.<br />मेरा घेरा लेकिन अब नहीं बढ़ता,<br />लगता है अमलतास भी उतना का उतना ही है ।<div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/30256155-6613546889844805165?l=rajnigandhaa.blogspot.com'/></div>रजनी भार्गवhttp://www.blogger.com/profile/08154642819162396396noreply@blogger.com6tag:blogger.com,1999:blog-30256155.post-34336051306036012762007-08-17T19:07:00.000-07:002007-08-17T19:10:58.890-07:00मौन प्रतीकसाँझ के रँगों में<br />उदय होता वो पहला तारा,<br />मेरी आँखों में तैर रहा था,<br />रात भर सपनों में गूँथा,<br />सुबह आँख के कोरों से बह गया था,<br />सिरहाने सिर्फ़ उसका अहसास था,<br />भूलते हुए स्वप्न का<br />वह मौन प्रतीक था.<div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/30256155-3433605130603601276?l=rajnigandhaa.blogspot.com'/></div>रजनी भार्गवhttp://www.blogger.com/profile/08154642819162396396noreply@blogger.com5tag:blogger.com,1999:blog-30256155.post-27693598404475343842007-07-31T16:43:00.000-07:002007-07-31T16:49:52.316-07:00पल की बरसातबारिश बरसी गली चौबारे,<br />ऐसी बरसी पाँव पसारे,<br />लोग गीले, भीगे,<br />ढूँढने चले छ्प्पर किनारे.<br /><br />चिड़िया भीगी पेड़ पर,<br />घने पत्तों के नीचे टहनी पर<br />चुहक-चुहक कर<br />गुस्सा करती सावन पर.<br /><br />चौराहा, आँगन और चौपाल<br />धुले हैं ज्यों आज,<br />झाड़ू बुहार दी हो जैसे<br />आगुंतक के आने की खुशी में आज.<br /><br />प्यासा गुलमोहर और अमलतास<br />तृप्त हुआ बौछारों से आज,<br />कहा, ठहर जाओ,<br />सजी है सेज लाल पीले फूलों से आज.<br /><br />सुन लिया जैसे सावन ने<br />धनक के रँग घोल दिए नभ में,<br />तूलिका को ले कर<br />साँझ को सिन्दूरी किया पल में.<br /><br />बारिश बरसी पल दो पल,<br />मैं सूखी भिगो रही थी पल,<br />तुम्हारे हाथ को थामें<br />सावन से मोती चुरा रही थी कल.<br /><br />_____________________<div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/30256155-2769359840447534384?l=rajnigandhaa.blogspot.com'/></div>रजनी भार्गवhttp://www.blogger.com/profile/08154642819162396396noreply@blogger.com4tag:blogger.com,1999:blog-30256155.post-77031682656483783842007-07-22T20:12:00.000-07:002007-07-22T20:15:53.188-07:00उम्मीदउम्मीद आसुँओं में बसी रहती है<br />बहती हुई यूँ हीं सफ़र तय करती है<br /><br />मन में बेचैनी घनी धुँध सी रहती है<br />कोहरा छटे तो अजब तपिश सी लगती है<br /><br />तुम जब लौट-लौट कर आते हो<br />ज़िन्दगी अध्यायों में बँटी लगती है<br /><br />अक्षर जब तुम्हारा अनुसरण करते हैं<br />तुमसे लिखी हुई कहानी अच्छी लगती है<br /><br />साँझ के काले साए जब और गहरे होते हैं<br />उससे रची भोर की अरूणिमा सुन्दर लगती है.<div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/30256155-7703168265648378384?l=rajnigandhaa.blogspot.com'/></div>रजनी भार्गवhttp://www.blogger.com/profile/08154642819162396396noreply@blogger.com6tag:blogger.com,1999:blog-30256155.post-86365480906464894752007-04-22T19:11:00.000-07:002007-04-22T19:14:39.245-07:00आवरणमुझसे मेरा परिचय करा दो<br />पेड़ की छाल से मेरा आवरण हटा दो<br />एक नवअंकुरित पौध<br />मिट्टी को खगाल<br />अभी-अभी फूटी है,<br />लचीली, कच्ची टहनी<br />नभ को छूने उठी है,<br />प्रभात की वेला में<br />गरमाहट उसको मिली है,<br />अमराई में चमकती हुई<br />मकड़ी के जालों सी खिली है<br />इससे पहले की वो बड़ी हो<br />परत दर परत गठे,<br />उस नवअंकुरित अहसास को<br />हवा में उड़ा दो,<br />मेरे पोर-पोर में बसा दो,<br />उनसे उपजित क्षणों को<br />कोई सुरभित संज्ञा दे दो,<br />मुझसे मेरा परिचय करा दो ।<div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/30256155-8636548090646489475?l=rajnigandhaa.blogspot.com'/></div>रजनी भार्गवhttp://www.blogger.com/profile/08154642819162396396noreply@blogger.com3