tag:blogger.com,1999:blog-280375042008-07-16T18:10:44.751-07:00भीड़ में भी हैं तन्हा....गायत्रीhttp://www.blogger.com/profile/10115781717096712010noreply@blogger.comBlogger37125tag:blogger.com,1999:blog-28037504.post-41459972559662987822008-06-20T05:22:00.001-07:002008-06-20T05:49:29.408-07:00कांचकांच है ....चटक गया तो क्या<br />देखो तो जुड़ कर अब भी खड़ा है.......<br /><span class=""></span><br /><span class="">वो "पैटर्न " जो दीखता है उस पर</span><br /><span class="">तितली है या जैसे जुगनू हो फैले </span><br /><span class="">चटक की "लाईनों " से गुज़र कर</span><br /><span class="">रोशन हो जाए "पैटर्न "जैसे .......</span><br /><span class=""></span><br /><span class="">जैसे ...... मर्यादा औरत की </span><br /><span class=""> ठोकर लगने पर भी हर दिन </span><br /><span class="">जिंदगी को </span><span class="">नए मायने देती है </span><br /><span class="">चटक की "लाइन " </span><span class="">से गुज़र के </span><br /><span class="">जिंदगी<span class=""> को </span></span><span class="">रौशनी से भर देती है ....</span><br />************************************गायत्रीhttp://www.blogger.com/profile/10115781717096712010noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-28037504.post-25038627994980064342008-06-20T04:58:00.000-07:002008-06-20T05:21:18.327-07:00तन्हा - तनहाशादी में "Titan" का जोड़ा मिला था<br />रिश्ते की छाप पड़ गयी है शीशो पर<br /><span class=""></span><br />सिर्फ सुइया मिलती है अब एक वक़्त पर<br />*************************************<br />तुम सोचती थी तो मैं मुस्कुराता था<br />मैं देख लूँ तो लज्जा जाती थी तुम<br /><span class=""></span><br />लकीरे सिमट गई है अब चेहरों पे<br />***********************************<br />एक तेरे और एक मेरे हाथ का छापा<br />घर के चौखट पे दोनों ने लगाया था<br /><span class=""></span><br />दरार पड़ गई है दरवाज़े में वही<br /><br />***************************गायत्रीhttp://www.blogger.com/profile/10115781717096712010noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-28037504.post-11644789709864499342008-05-30T06:55:00.000-07:002008-05-30T07:44:58.446-07:00ख्वाब बड़े और कमरे छोटे......ख़्वाब संजोया है हमने<br /><span class="">छुई मुई सा मद्धम मद्धम </span><br /><span class="">पर देख हकीकत आह भरें </span><br /><span class="">है ख़्वाब बड़े पर </span><span class="">कमरे कम.........</span><br /><br /><span class=""></span><br /><span class="">ख़्वाब बड़े और कमरे छोटे</span><br /><span class="">आसमा पर ग़र कुछ घर होते </span><br />बादलों से घर भर लेते<br />मुट्ठी <span class=""> <span class="">मे </span>बाँध कर तारो को </span><br /><span class="">घर अपना जग मग कर लेते </span><br />हे ख्वाब बड़े और कमरे छोटे .....<br /><span class=""></span><br /><br /><span class="">आँख बाँध कर सपने सजोंये </span><br />पंख पखेरू साथ ले लाये <br />आस्मां में उड़ भर <span class=""> आए</span><br /><span class=""> <span class="">बहुत </span>खेल ली </span><br /><span class=""></span><span class="">लुक्का छुप्पी .......</span><br /><br />छोटे छोटे कमरों<span class=""> मे भर </span><br />खुशिया बड़ी बड़ी सजाये<br /><span class="">सुंदर सरल मनमोहक</span><br />अपना इक आशियाँ बसाए ....<br /><br />***ख्वाब बड़े पर दिल नही छोटे ***<br /><br /><br /><span class=""></span><br /><br /><span class=""></span><br /><br /><span class=""></span>गायत्रीhttp://www.blogger.com/profile/10115781717096712010noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-28037504.post-52148551036098196302008-04-16T10:04:00.000-07:002008-04-16T10:16:26.058-07:00भीड़किसी ने था दामन खींचा और किसी ने सर से था घसीटा<br />हाथ कई उस पर पड़े थे ,कई लातो ने ठोकर जड़े थे<br />बस कसूर एक ही था उसका ,अबला थी -अकेली थी वो<br />कोशिश कर रही थी ज़िंदा रखने की<br />अपने अस्तित्वा को<br />अकेले ही ,अपने दम पर ,बिना किसी सरमाये के ....<br /><span class=""></span><br />"आप बस नाम बताइए सज़ा हम दिलवाएँगे<br />इसकी तार तार हुईअस्मत पर<br />इंसाफ़ का साफ़ा हम पहनाएँगे "<br /><span class=""></span><br />क्या बताए दारोगा बाबू<br />भीड़ की शक्ल तो नही होती<br />हाथ वो थे जो पाक दामन को छू ना पाए थे पहले<br />थी ज़ुबाने वो जिनकीछींटाकसी बेअसर थी पहले<br />आँखे वो थी जो हया से पारहुई जाती थी<br />रूह वो थी जो दफ़्न हो चुकी थीबेकासी के तमाशे के नीचे<br /><br />दे सके तो हिम्मत दे अभागी को , दे सके तो दे विश्वास इसे<br /><span class=""></span>कि इंसानियत अभी भी ज़िंदा हे, इन्साफ यहाँ मिलता है<br /><br />मैं एक अजनबी हूँ चलता हू ....<br />होश मे आए तो इसे कहना<br />भीड़ से निकले इक इंसान ने छोटी सी कोशिश कि थी<br />इंसानियत के पाक दामन से छींटो को कम करने की<br />हो इसका खुदा हाफिज़ हे यही दुआ मेरी<br /><span class=""></span><br /><span class=""></span><br /><span class=""></span><br /><span class=""></span><br /><span class=""></span><br /><span class=""></span><br /><br /><span class=""></span>गायत्रीhttp://www.blogger.com/profile/10115781717096712010noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-28037504.post-40488550416036388372008-01-25T09:11:00.000-08:002008-01-25T09:15:51.059-08:00मैं .....कौन.....पथ पर ...कारवाँ गुज़र गये<br /> मैं कही नही गया <br /> बीती सदियान कई<br />था वक़्त मेरा थम गया ....<br /><br />कितने राज पाट देखे<br />राजा बन फकीर देखे<br /> फ़ासले घटते रहे<br />तूफान भी गुज़र चले<br /> पर था खड़ा जहाँ<br /> मैं कभी नही हिला ..... <br /><br />मैं.....मील का पत्थर...<br /> गुज़रे इतिहास का गवाह...<br /><br />रास्तो के किनारे पे<br />आज भी वहीं खड़ा <br />जहाँ मैं गाड़ा गया था<br />कई सदियों पहले बन निशाँ .....<br /><br />बन इत्तिहास का मौन गवाह<br /> मैं... मील का पत्थर.....<br /> मैं....मौन दर्शक......<br />मैं ....मूक श्रोता .......गायत्रीhttp://www.blogger.com/profile/10115781717096712010noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-28037504.post-6342624453461170272008-01-11T08:59:00.000-08:002008-01-11T09:31:38.520-08:00कोई अनजाना सा .....एक अनोखा सा भाव हे जों <br />हर पल महसूस हुए मुझको<br />तेरे आने की हर आहट पर<br />मॅन कहता हे ऐसे कुछ तो<br /><br />अब तक तो मैंने सबसे<br />रक्खा था छुपा के तुझको<span class=""></span><br />तू सोचे वही जों मैं सोचूं<br />तू समझे वही जों मैं कह <span class="">दूँ<br /></span><br />जिस दिन से हम तुम है जुडे<br />मैंने है दिए तुझे संस्कार मेरे<br />अपने कोख की परतों में<br />अपने ख्वाबो की बस्ती में......<br /><br />एक अनजाना भय है फिर भी<br />आ आ के सताता हे पल छिन<br />क्या तू बन पायेगा<br />जों चाहे बनाना मेरा दिल<br /><br />क्या इस दुनिया के रंगो में<br />रंग जाएगा तू भी इक दिन<br />या फिर मेरे नक्शे कदम पे<br />रख पायेगा अपने पद चिह्न .....<br /><br />पर मेरे बच्चे है मुझे यकीन<br />तू होगा इक कच्ची मिटटी<br />गड़ पाऊँगी अपने रंग ढंग <span class="">में<br /></span>गड़ पाऊँगी में तेरी हस्ती<br /><br />आखिर तेरा मेरा रिश्ता था जुडा<br />दुनिया से महीनों पहले का<br />अब नही कोई डर इस दिल में<br />बस है इक आस तन मन <span class="">में<br /></span>है एक इंतज़ार.......<br /><br />....तुझे भर अपनी बाहों में<br />सुनाऊं लोरिया कानो में<br />मेरे नन्हें <span class="">सपने </span>,<br />मेरे अन्जन्मे मुन्ने .गायत्रीhttp://www.blogger.com/profile/10115781717096712010noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-28037504.post-71051894773713861292008-01-07T09:51:00.000-08:002008-01-07T10:10:35.824-08:00कल् रात भर ....सर्द मौसम से दामन बचाते ही<br /><br />रजाई गिलाफो में खुद को छुपाते ही<br /><br />काफ़ी की गरमा गरम चुस्की लगाते ही<br /><br />यूं ही अचानक....<br /><br />तेरी याद आ के सताती रही...<br /><br />कल् रात भर.....<br /><br /><br /><br />याद हे तुमको, हॉस्टल की छत पर<br /><br />रिमझिम सौंधी हलकी बारिश में<br /><br />गर्म काफ़ी के मग भर लेकर<br /><br />कितनी शा<span class="">में </span>काटी थी<br /><span class=""></span><br /><span class=""></span>यूं ही ..ऐवें ही ....बतियाते हुए<br /><br />शाम भर....सुबाह तक॥<br /><br /><br /><p>तुझसे बांटे वो फलसफे </p><p>मेरे जीने का सबब हे अब तक .....</p><p> </p><br />मेरी दोस्त और हमराज़ थी तुम<br /><br />साँझे गम की हमसाज़ थी हम<br />फिर छोड़ गयी यूं अचानक<br /><br />मेरे मॅन के कैनवास को<br /><br />खाली ...सफ़ेद ....सपाट <span class="">तुम<br /></span><br />हमने वादे किये थे<br /><br />दोस्ती निभाने के उम्र तमाम<br /><br /><span class="">पर </span>तुम निकली दगाबाज ...<br /><br />यू गयी छोड़ मुझे तनहा बेसाज़<br /><br /><br /><br />कल् का ही दिन था न वो<br /><br />बहुत साल पहले जब..<br /><br />.मेरी बाहों में सर रख के<br /><br />तुमने कहे थे आखिरी शब्द<br /><br />"मुस्कराहट तेरे लबों से<br /><br />कभी कहीं न बिचडे...<br /><br />सदा खुश रहना मेरी दोस्त....."<br /><br /><br /><br />मैंने अपने वादा निभाया,<br /><br />खुशी को सदा गले से लगाया<br /><br />आंसुओं ने न साथ दिया पर ..<br /><br />तेरी याद आ आ<span class="">के </span>सताती रही<br /><br />कल् रात भर......गायत्रीhttp://www.blogger.com/profile/10115781717096712010noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-28037504.post-45044080124169646682007-10-06T13:12:00.000-07:002007-10-06T13:44:28.429-07:00आत्म-........वो सड़क पर पड़ा था<br />पसीने से तराबोर<br />ख़ून से लथपथ<br />असहाय निराधार<br /><br />कुछ ने मुह फेर लिया<br />कईयों ने बस घेर लिया<br />काना फूसी चलने लगी<br />"लगता भले घर का लगता हे भाई<br />कुछ मज़बूरी रही होगी"<br /><br />अमबुलंस बुला दो कोई<br />भीड़ मे से एक आवाज़ आयी<br />"चलो,चलो,पुलिस केस हे<br />२०वि मंज़िल से छलांग हे लगाई"<br /><br />भीड़ की फुसफुसाहट मे<br />उसकी आहे दब सी गयी<br />जब तक अमबुलंस आयी<br />साँसे थम थी गयी<br /><br />एक क्षण के ग़ुस्से में<br />एक गलती उसने की<br />दूसरे पल के किस्से में<br />गलती औरों से हो गयी<br /><br />एक बहते भाव की रवानी मे<br />एक और जिन्दगी फना हो गयी.......गायत्रीhttp://www.blogger.com/profile/10115781717096712010noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-28037504.post-36042988263784458072007-09-22T02:32:00.000-07:002007-09-22T02:42:19.663-07:00नया जहाँआओ एक नया जहाँ बसाए<br />इक दूजे में हम समां जाये<br /><br />अब दुनिया से मन भर गया हे<br /><br />कुछ सपनो की दीवारे बनाए<br />हसीं खयालों से उन्हें <span class="">सजाए<br /></span><br />ईंट पत्थर से ना हो वास्ता<br /><br />आओ कुछ मिटटी गारा ले आये<br />कुछ तुमसा कुछ मुझसा बनाए<br /><br />अब खिलोने से दिल भर गया<br /><br />आओ कहीँ दूर निकल जाये<br />शांति और अमन को अपनाए<br /><br />ख़ून खराबे से हो किसका भलागायत्रीhttp://www.blogger.com/profile/10115781717096712010noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-28037504.post-24717001476619388962007-09-14T04:56:00.000-07:002007-09-14T05:01:55.824-07:00कुछ त्रिवेनियाँ .......धीमी सी हैं साँसें मेरी<br />बहुत तेज़ पर रफ़्तार तेरी<br /><br /> ए मौत तू जीतेगी जंग आज......<br />************************************<br />ख़रीद-ओ-फ़रोख़्त का बाज़ार है गरम साहिब<br />हुस्न,इश्क़ और जज़्बात बहुत बिकते हैं यहाँ<br /><br />वफ़ा और क़ुर्बानी की क़ीमत पर है बहुत कम....<br />*************************************<br />जोड़ के रक्खा था जिसने सबको<br />तागा वो आज पर चटक हीगया<br /><br />टूटे टुकड़े ज़ख़्म छोड़ गये गहरे......<br />*************************************<br />जादूगर ज़ो छू मंतर बोलेगा<br />दिखते को ग़ायब कर देगा<br /><br />नफ़रत करे फ़ना तो शफा मानू ........<br />**************************************<br />मा के पल्लू में छुपा करती थी जो कल् तक <br />आज शर्मा के अपने आँचल में सिमटी बैठी है<br /><br />पराया धन है ज़ो ले जाएँगे डोली में कहार.......<br />**************************************गायत्रीhttp://www.blogger.com/profile/10115781717096712010noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-28037504.post-31293210281382490172007-09-05T21:32:00.000-07:002007-09-05T23:00:05.863-07:00कांच के रिश्तेकुछ कच्चे घरोंदो को<br />जब शक्ल देनी चाही <br />तो हाथ खुद ब खुद ही<br />मिटटी में सन् गए हैं<br /><br />कोशिश हमारी ये थी<br />की हो जाये चराग रोशन<br />दिया बाती की जलती लौ ने<br />दमन फकत किये हैं<br /><br />दूजे के कांधे<br />को हम<br />दीवार<br /><span class=""></span>तो हे समझे<br />पर औरों की क्या परवा<br />उनको पडे ज़रूरत<br />तो आँचल में अपने छुप कर<br />आगे निकल रहे हैं<br /><br />हमने तो सिर्फ था चाहा<br />एक नेक काम करना<br />शर्मिंदगी से हम ही<br />खुद मे सिमट रहे हैं<br /><br />हे कांच के सब रिश्ते<br />पल भर में चिट्कते हे <br /><br />ऐसी फकत ही दुनिया<br />ऐसे फकत हे नाते<br />क्या कहे क्या सुने हम<br />सम् मौन अब रखते हैंगायत्रीhttp://www.blogger.com/profile/10115781717096712010noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-28037504.post-33389693497255568112007-09-04T22:04:00.000-07:002007-10-08T06:47:37.981-07:00वंश वृद्धि"किस तरह की माँ हे ये ?" अखबार को नीचे रखते हे मेरे मुँह से आह निकली .<br />नारी जननी से भक्षक कैसे बन सकती हे। मेरे मॅन को ये सवाल कचोट रहा था।<br />"क्या हुआ बहु जी , क्यों परेशान हो रही हो ?" कमरे मे झाड़ू लगाती मेरी मेहरी उषा ने पूछा ।<br />उषा और उसकी पन्द्रह साल की बेटी पूजा हमारे यहाँ झाड़ू कटके का काम करती हे। २ बेटे और ४ बेटियों की माँ उषा हमारे यहाँ कई सालो से हे . बेटे निकम्मे हे और पति शराबी ,इसलिये उसकी लड़कियां काम मे उसकी मदद करके घर चलता हे । कितनी बार उसने मार के निशाँ दिखाए हे जों उसके बेटो और पति के अत्याचार की कहानी कहते हे।<br /><br />"लिखा हे , दो हफ्तों में ये दूसरी घटना हे की एक माँ ने अपनी नवजिवित कन्या का गला दबा कर हत्या कर दी थी। क्या लड़की होना इतना बड़ा अभिशाप हे?" मैने बताया.<br /><br />"नही बहु जी, उनकी कोई मज़बूरी रही होगी।अपना जना कोई क्यों मरेगा भला, अभागी लड़की ही जनि हो . वैसे एक लड़का होना भी तो ज़रूरी हे . <span style="font-size:+0;"></span><span style="font-size:+0;"></span>मैं तो कहती हूँ भगवन तुम्हे भी इस बार लड़का ही दे, पिछले बार लड़की हो गयी सो हुई . वंश को भी तो आगे बदना हे।" उषा का जवाब था.<br /><br />मैं निशब्द थी और हैरान भी। हमारे देश मे रुदिवादिता ने ऐसा डेरा डाला हे की एक औरत ही औरत के महत्त्व को नही समझती। क्या ये समय बदलेगा ???गायत्रीhttp://www.blogger.com/profile/10115781717096712010noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-28037504.post-84992866496436210392007-08-12T10:03:00.000-07:002007-08-12T10:52:01.346-07:00अम्मा जी :भाग IIलोधी कॉलोनी पहुँचते हुए लगभग सात बज गए थेय.हाल में घुस कर शेखर पुरस्कृत लोगों की रो मे चले गए और नंदिनी और सूरज पीछे की रो में बैठ गए ।<br /><br />सम्मानित होने वाले और सम्मान देने वालो में बहुत नामी हस्तिया थी.नंदिनी के लिए ये एक नया अनुभव था। उसने हौले से सूरज से पूछा "शेखर भाई साहब को किस किताब के लिए सम्मान मिल रहा हे "<br />" शेखर ने अपनी माँ की जीवन पर एक नोवेल लिखा हे "अम्माजी :कांटो से गुज़रा जीवन" ,बेस्ट सेलर रहा हे और उसी के लिए सर्कार उसे सम्मान दे रही हे "सूरज ने नंदिनी को बताया ।<br />"शेखर जी की माँ,कहॉ रहती हैं?"<br />" भोपाल मे, शेखर उनसे मिलने ही पिछले महीने आया था ,यहाँ से फिर उनके पास जाएगा .नंदू पता हे,शेखर की माँ विधवा थी, बहुत जतन से उसको पाल पोस कर उसे इतना लायक बनाया ".<br />कहीँ अम्माजी के बेटे शेखर जी तो नही...??? नंदिनी ने मन ही मन सोचा और बहुत उदास हो गयी ।<br /><br />स्टेज पर अवार्ड घोषित हो रहे थे। अब शेखर की बारी थी ...<br />" सम्मान को स्वीकारते हुए शेखर की आंखो मे आंसू थे ...स्वीकृति स्पीच मे शेखर ने अपनी माँ को अपनी जीवन की प्रेरणा बताया ,वे बोले " मेरी माँ ने जीवन मे कुछ नही माँगा ,सिर्फ मेरी तरक्की और भले की कामना रखी। मे आज तक सोचता रहा की मैंने उन्हें फ़ोन करके, पैसा भेज कर,साल मे दो बार मिल कर अपना फ़र्ज़ पूरा करता रहा और अब उनके जीवन पर किताब लिख कर ,दुनिया को उनके संगर्ष के बारे मे बता कर अपने बेटे होने का कर्ज़ उतार दिया पर मे कितना गलत था .....आज जब मैंने ओने मित्र की धरम्पतनी,नंदिनी भाभी के मुँह से अपनी माँ जैसी एक और वृधा की कथा सुनी तो मुझे एहसास हुआ की माँ को उन सब चीजो की ज़रूरत नही जों मैं उन्हें भेजता था,जीवन एक अन्तिम छोर पर उन्हें मेरे प्यार और साथ की ज़रूरत हे। मुझे अनजाने ही सही,पर ये बोध कराने के आपका बहुत शुक्रिया भाभी......"<br /><br />सारा हाल तालियों से गूँज रहा था और बहुत कुछ आंखें नम थी।अप्रवासी दिवस पर माँ की प्रभुद्ता को इतना बड़ा सम्मान जों मिल था।<br /><br />शायद कुछ और अम्माजी अपने परिवारो का अब साथ पा जायेंगी। छलकते आंसुओं को रोकते हुए नंदिनी के होंठों पर एक हलकी सी मुस्कराहट फेल गयी ।<br /><br />**************************एक नयी शुरुवात *****************************गायत्रीhttp://www.blogger.com/profile/10115781717096712010noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-28037504.post-69572128875099890502007-07-18T00:28:00.000-07:002007-10-08T07:00:13.205-07:00अम्मा जीं :भाग I" अजी सुनती को, कल् शाम की फ्लाईट से शेखर आ रहा हे " फोन का रिसीवर नीचे रखते ही सूरज ने आवाज़ लगायी।<br /><br />" कौन शेखर ? " रसोईघर से निकलने नंदिनी ने पूछा .<br /><br />"अरे ,मेरा कालेज के समय का घनिस्ष्ट मित्र था ,कालेज के बाद साथ नही रहा . फिर पिछले महीने <span class="">मैं </span>भोपाल गया था ,वही "जहाँ आरा "मे अचानक हे गए । बात तो नही हो पायी , उसकी फ्लिघ्त का वक्त था ,बस नुम्बेर बदले "सूरज बोले<br /><br />" फिर "?<br /><br />" फिर, अभी फोन आया ही की कल् रात की फ्लाईट से आ रहा हे तीन दिन के लिए "<br /><br />"कैसे आना हो रहा हे उनका "नंदिनी ने पूछा<br /><br />"अप्रवासी भारतीय दिवस हो रहा हे आयी एच सी मे,सरकार शेखर को सम्मानित कर रही हे,कल् रात को पहूचेगा और दो तीन दिन हमारे यहाँ ही ठहरेगा"सूरज बोले<br />"अच्छा "<br /><br />*********************************************************************<span class=""></span><br /><span class=""></span><br />अगले दिन :<br /><br />"लो शेखर,पहुच गए घर"टेक्सी का दरवाजा बंद करते हुये सूरज बोले<br />"भाभी जी।कैसी ही आप?"<br /><span class=""></span><br />"नमस्कार भाईसाहब। आपका सफ़र कैसा रहा "<br />"अछा था भाभी. एक प्याला गरम गरम चाय मिल जाये तो मज़ा आ जाएगा"शेखर<span class="">बोले </span><br /><span class=""></span><br />"जी,अभी लायी" नंदिनी दौडती हुई रसोई गयी और चाय नाश्ता ले लायी।<br /><br />पूरी रात दोनो दोस्तो की बातो मे गुज़र <span class="">गयी .......<br /></span><br />*******************************************************************************<br />अगला दिन:<br /><br />सूरज आपने दफ़्तर चले गए और शेखर जैट लेग की वजह से देर दोपहर तक सोते रहे<br /><span class=""></span><br />दोपहर बाद का समय बनती और सोनू के साथ खेलने मे बिता दिया।बहुत जल्दी घुल मिल गए थे शेखर दोनो के लिए बहुत सारे खिलोने और चोक्लेत भी लाए <span class=""></span><br /><span class=""></span><br />प्रोग्राम शाम के सात बजे क था और शेखर ने हम दोनो को साथ चलाने का न्योता दिया <span class=""></span><br /><span class=""></span><br />दोपहर बाद से ही बादल घिर आये थे,५ बजते बजते ज़ोर दार बारिश शुरू हो गयी।<br />"बारिश के मौसम मे पकोदो का मज़ा ही अलग हे भाभी" आसमान को देखते हुये शेखर <span class=""></span><br /><span class=""></span><br />"जी,ज़रूर, अभी बनाति हू चाय के साथ"मैने मुस्कुराते हुएय जवाब दिया।मुझे शेखर क स्वभाव अछा लगा,सौम्य,शान्त,घमन्ड का लेश मात्र भी नही।<br /><br />शेखर भी गैस्ट रूम से ड्राइन्ग रूम मे आ गये। कमरे मे बैठे हुए उनकी नज़र शो केस मे लगी तस्वीरो पर पडी।तभी अचानक एक तस्वीर को देख कर ठिठक से गए.<span class=""></span><br /><br /><p>"पकोडे तैय्यार हे भाइसाहब"नन्दिनी कमरे मे आते हे बोली </p><p>'अरे हा,हां लाईये ना भाभी और आपकी चाय कहॉ हे :"</p><p>"जी अभी आयी" कबसे सोच रही थी शेखर से उनके सम्मान के बारे मे पूछ्ना ,तो अब पूछूँगी </p><p>"ये तस्वीरे बहुत प्यारी हे,आप लोग घूमना पसन्द करते हे"शेखर ने पूछा।</p><p>"जी बहुत नही,साल मे एक बार गर्मियो क छुट्टियों मे कही चले जाते हे,पर कभी इन्डिया से बाहर नही गये"नन्दिनी <span class=""></span></p><p>"वहा कोने मे जो एक तस्वीर हे,एक बुजुर्ग महिला हे,वो आपकी……।"</p><p>"जी, वो अम्मा जी हे,मेरी मा…"</p><p>"आपकी मा…???"</p><p>"जनम तो नही दिया पर बहुत प्यर दिया था अम्माजी ने मुझे"नन्दिनी <span class=""></span></p><p>"बात पिछले साल की हे,सूरज का तबादला दिल्ली हो गया था पर बच्चो के स्चूल की वजह से मुझे भोपाल मे एक साल अकेले रहना पडा। एक बार मे बहुत बीमार पड गयी और बच्चे बुरी तरह से घबरा गये बस तभी मुलाक़ात हुई अम्माजी से। हुमारे पडोस मे रहती थी वो, बच्चे मदद मान्गने के लिये गये और वो तुरन्त आ गयी।मेर पूरा घर सम्भाला,मेरी सेवा की और जब तक मे ठीक नही हुई वो हुमारे साथ । </p><p>मेरी माँ नही हे भाईसाहब,अम्माजी मे मुझे माँ मिली" </p><p>"उनका परिवार……।" शेखर ने <span class=""></span></p><p>"एक बेटा हे,कही विदेश मे हे आपने परिवार के साथ ,कभी बताया नही उन्होने उसके बारे मे, बहुत स्वाभिमानी थी अम्माजी,उनका बेटा जो पैसे भेजता था,वो सारे अनाथालय मे दान कर देति। आपको पता हे,विधवा थि अम्मा जी,बडे जतन से बेटे को पाला पोसा,और वो उन्हे भूल गया। सोचा कि माँ को हर महीना पैसा भेज कर,एक फोन करके फ़र्ज़ पूरा हो गया' </p><p>"आपके आने के बाद फिर मुलाक़ात हुइ,कोई सम्पर्क …॥"शेखर ने पूछा<br />"नही,मे घर सेट करने मे बिसी हो गयी,पर अब ज़रूर एक दिन फोने करुन्गी"<br />"वो भाभी,दरसरल्……"इतना की कहा था शेखर ने कि नीचे से टेक्सी के होर्न की आवाज़ आयी।<br />"सूरज आ गये,जल्दि से तैयार होति हूँ ,आप भी तैयार हो जाये" कहते ही नंदिनी अपने कमरे कि तरफ़ दौडी </p><p>"तुम लोग तैयार नही हुये ,६ बज गये हे,दिल्ली का ट्रेफ़िक पता हे ना,लोधी कोलोनी पहुन्चते एक घन्टा लग जायेगा"सूरज भन्भनाते हुए बोले </p><p>"बस,अभी आयी"नन्दिनी ने आवाज़ दी॥ </p><p>क्रमश...</p><p><br />***********************************************************</p><p></p>गायत्रीhttp://www.blogger.com/profile/10115781717096712010noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-28037504.post-59418981003064397922007-07-14T03:28:00.000-07:002007-07-14T03:44:46.919-07:00एक अलसायी सी दोपहर ......ख़ामोशी कह जाती है चुप से<br />कानो में कुछ मीठे बोल<br />आओ मिल जुल के बैठे<br />समय बड़ा ही है अनमोल<br />करे मनन्न आज हम तुम<br />इस अलसायी दोपहर को.....<br /><br />जागती आँखों में बुनते<br />सपनो के ताने बाने को<br />चढ़ने दो परवान<br />इश्क़ है<br />मिलने दो ,अनजानो को.....<br /><br />उलझा दो ख़ुद को सांसो मे<br />रोको ना उठते तूफ़ानो को<br />कल का पता किसे हे मौला ,<br />ये पल जी लेने दो परवानो को......<br /><br />एक आल्साई सी दोपहर मे<br />भर दो रंग सतरंगी तुम<br />शाम की लाली फिर निखर के<br />आसमान में कोई एक <br />इंद्रधनुष उगा जाए......<br /><br />उस शाम की सुबह भी शायद <br />कल जल्दी से आ जाए.......गायत्रीhttp://www.blogger.com/profile/10115781717096712010noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-28037504.post-40927647776555122342007-06-29T02:43:00.000-07:002007-06-29T03:56:46.908-07:00खुद को खुद से मिला कर तो देखों .....दिल मे दर्द जगा के तो देखो<br />प्यार की लौ जला के तो देखो<br />वातानाकूलित हवा से निकल कर<br />बसंती पवन का मज़ा ले के देखो<br />बत्तियों की चमचमाती रौशनी से बाहर<br />सूरज की किरणे सहला कर तो <span class="">देखों<br /></span><br />बहुत हो लिए परेशान औरो की खातिर<br /><span class="">आज </span>.....<br />खुद को खुद से मिला कर तो <span class="">देखों </span><br /><br />तो .......<br />उदासी तेरी उड़ जायेगी<br />तनहाई भी ना सतायेगी<br />बनेगा तू राजा<br />जहान् का वो पहला<br />जिसके मन मे होगा<br />विश्वास इतना<br />की<br />दुनिया की सब दौलत मिल जायेगी<br />जब खुद की खुद से ही बन जायेगी ........गायत्रीhttp://www.blogger.com/profile/10115781717096712010noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-28037504.post-49305419637771790292007-05-29T23:32:00.000-07:002007-05-29T23:50:47.213-07:00रिश्तों को रिसते देखा है हमने..रिश्तों को रिसते देखा है हमने<br /> बरसों से संजोइ इक पौध दी<br /> प्यार और विश्वास से सांवारी हुई <br /> वक़्त की आँधियों से उसे<br /> जद्द से उखाड़ाते<br /> देखा है हमने...<br /><br /> एक चुप्प बरसी है आँगन में <br />सीली दीवारों से निकल कर<br /> गरजते बादलो को बरसते <br /> देखा है हमने .......<br /><br /> एक चोट लगी थी हल्की सी <br />मरहम की ज़रूरत भी ना थी <br />खरॉंचों को नासूर बन सड़ाते<br /> देखा है हमने .......<br /><br /> दुनिया के काँधे पे सर रख <br />जब सिसकियाँ भरी हमदर्दी के लिए<br /> अपने गमो पर ग़ैर आँखों को <br /> जमकर हँसते<br /> देखा है हमने .....<br /><br /> तेरे शहर से दिल भर गया है शॉना <br /> तीरे कूचे गलियों को <br /> धीरे से सरकते <br /> देखा है हमने ......<br /><br />रिश्तों को रिसते देखा है हमने॥गायत्रीhttp://www.blogger.com/profile/10115781717096712010noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-28037504.post-6924434289732275132007-05-29T00:29:00.000-07:002007-05-29T01:15:59.972-07:00बहुत जल्दी में हूँ ........ग्यांन स्त्रौत कहीं सूख ना जाए<br />लिख लूं बहुत जल्दी में हूँ<br /> मॉरपंखी कलाम की स्याही<br />कहीं सूख ना जाए<br />लिख लूं बहुत जल्दी में हूँ<br /><span class=""></span><br /><span class=""></span>व्यापक विचार समेटे खड़ा मन<br />साँझ के अंतिम छ्होर पर<br />लेख तार कोई टूट ना जाए<br /> लिख लूं बहुत जल्दी में हूँ<br /><br /> विचार विमर्श उत्पीड़न उलांगना<br /> द्वंध प्रतिद्वंध आँचल में समेटे <br />ह्रदय गति कहीं रुक ना जाए<br /> लिख लूं बहुत जल्दी में हूँ ........गायत्रीhttp://www.blogger.com/profile/10115781717096712010noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-28037504.post-26702277500345148212007-05-26T13:53:00.000-07:002007-05-27T04:31:07.376-07:00इन्द्रधनुश के उस पार्…एक कहानी"टन,टन,टन,टन्……॥'राधिका ने घबरा कर घडी की तरफ़ देखा।<br />" नौ बजने को आये हे,ना जाने कहा रह गयी ये लडकी " पिछ्ले आधे घन्टे मे अन्गिनत बार दरवाज़ा खोल कर देख आयी थी पर सन्ध्या का कोई नामो निशान नही था<br />"अगर सन्ध्या के बाबा ुसके आने से पहले घर आ गये तो तूफ़ान आ जायेगा" धीरे से मुन्ह मे बुदबुादाते हुये राधिका रसोई की तरफ़ जैसे ही मुडी ,दरवाज़े पर घन्टी बजीदौड कर दरवाज़ा खोला ,बाहर सन्ध्या खडी थी॥<br />"कितनी देर लगा दी सन्ध्या,मेरी तो जान निकले जा रही थी,क्या हुआ,कहा रह गयी थी,दिन मे जब फोन किया था तूने तो पूरी बात नही बतायी"<br />"अन्दर चले मा,सारी बात यही पूछ लोगी क्या"सन्ध्या ने हल्के से मुस्कुराते हुए बोली<br />""अरे हा, अन्दर आ बेटा,मै बस यू ही परेशान हो रही थी,तूने शाम से कुछ खाया क्या"<br />सन्ध्या ने ना मे सर हिला दिया<br />"अछा,मैने पोहा बनाया हे,अभी लाती हु"बोलते हुए राधिका रसोइघर मे घुस गयी<br />"पोहा बहुत टेस्टी बना हे मा"प्लेट नीचे रखते हुए सन्ध्या बोली<br />"अब बता,कहा गयी थी"राधिका बहुत बेचैन थी<br />"तुम्हे याद हे मा,मैने फ़्लोरिडा यूनिवर्सिटी मे आर्ट और डिसाइन के कोर्स की स्कोलरशिप की अर्जी भरी थी"<br />"हा,याद हे,तुम्हारे बाबा से आज तक छुपा कर रखी हे ये बात हमने" राधिका बोली।<br />"क्या हुआ उसका'<br />"आज उनके यहा फ़ाइनल काल था"<br />"फिर"<br />सन्ध्या के चेहरे पर एक मुस्कान फेल गयी"मेरा सेलेक्शन हो गया हे मा" केहते हुए उसने मा को बाहो से जकड लिया"<br />"सच्………मे बहुत खुश हू" राधिका मुस्कुरायी ,पल भर मे उस्की मुस्कान चिन्ता की लकिरो मे बदल गयी<br />मा बेटी ने एक दूसरे का चेहरा देखा,दोनो के मन मे एक ही खयाल था"बाबा को कौन मनाएगा"<br /><br />बाबा यानी बाबू विश्वास राव पाटिल्…1970 मे कोहलापुर से अपनी नयी दुल्हन को ले कर मुम्बई आये थे।किस्मत ने साथ दिया और उन्हे बी।एम्।सी मे अकौन्टन्ट की नौकरी मिल गयी थीथाने की एक चाव्ल मे दो बेडरूम की अपनी खोली बना ली थी इतने सालो मे।<br />उनकी पहली सन्तान लडकी थी……उ्न्होने नाम दिया पूर्निमा…दूज के चान्द सी उजली थी उनकी बेटी…"कोई बात नही बाउ,अगली बार बेटा होगा,पेहली कन्या लक्श्मी हे" आयि ने तस्सली दी <span class=""></span><br /><span class=""></span><br />पर प्राराब्द्द तो तेह हे,बद्लेगा <span class=""></span><br /><span class=""></span><span class=""></span><br />दूसरी बार फिर उन्हे लड़की हई…अमाव्स्या सी काली…।भारी मन से उस्का नाम सन्ध्या रखा। सन्ध्या की डिलिवरी के वक़्त हुइ कोम्प्लिके्शन्स की वजह से डाकटर ने राधिका को फिर से मा ना बनने की सलाह दी<br /><br /><span class="">बेटा ना होने का दुख पाटिल बाबू को हमेशा नासूर की तरह चुबता रहाऔर उन्होने शायद राधिका को और अपनी बेटियो को इस बात के लिये कभी माफ़ नही किया</span><br />श्री पाटिल मानते थे कि लड्कियो की जगह चुल्हा चौका और घर ग्रेह्स्ती तक ही सीमित<span class=""> हे</span><br /><span class="">पूर्निमाका</span> विवाह उनहोने 19 साल की उम्र मे ही कर दिया था पर राधिका के ज़ोर देने पर सन्ध्या को उन्होने मिठीबाई कालेज मे आर्ट्स पड्ने की ईजाज़त दे दी थी पर इसी शर्त पर कि बी ए पास करते ही वो उसकी शादी कर के अपनी ज़िम्मेदारी से मुक्त हो जायेन्गे<br />सन्ध्या की रुचि बचपन से ही कला मे थी…कागज़ पर आडी तिरछी रेखाए बनाकर उनमे रन्ग बरना उसका शौक था…राधिका को सन्ध्या के टेलेन्ट का आभास था और मन ही मन उसके साथ थी पर अपने पति से डरती थी<br />सन्ध्या की सहेली म्रिनाल को सन्ध्या के अध्बुत टेलेन्ट का अहसास था और उसने ही फ़्लोरिडा यूनिवर्सिटी के पूरी फोर्मलिटिस को पूरा करने मे मदद की थी और सारी फ़ाइनेस का इन्तेज़ाम किया था<br />पर अब बाबा को मनाये कौन और कैसे?<br /><br />""ट्रिन ट्रिन" दरवाज़े की घन्टी बजी…<span class=""></span><br /><span class=""></span>उदेड बुन से बाहर निकल कर राधिका ने दरवाज़ा खोला<br />"इतनी देर लगा दी दरवाज़ा खोलने मे,कब से घन्टी बजा रहा हु,कहा थी …।" दरवाज़े मे घुसते हुए झनझनाते हुए श्री पाटिल बोले<br />"जी,वो रसोइ मे……॥"इतना ही बोल पायी राधिका<br />"ठीक हे,ठीक हे भोजन पारोसा,महारा माथा मगज्री ना करा" अपनी टोपी दीवार पर टन्गी कील पर टिकाते हुए<span class=""> बोले</span><br />सन्ध्या ने राधिका की तरफ़ देखा और मौन मे दोनो ने अग्री किया कि आज की रात स्चोलर्शिप की बात करने के लिये ठीक नही हे<br />और जो अगले दिन हुआ उसने पाटिल बाबू की सोच बदल दी<br /><br />"ट्रिन ट्रिन" दरवाज़े की घन्टी बजी…<br />राधिका आन्खे मलते हुए उठी घडी मे छ्ह बज रहे थे।"इतनी सुबह सुबह कौन हो सकता हे "<br />दरवाज़ा खोला तो सामने पूर्निमा खडी थी और साथ मे उसका 4 साल का बेटा ऊत्कल था<br />"पूनी " राधिका ने घबरा के बोला<br />"आई" पूर्निमा बिलखती हुइ राधिका से लिपट गयी<br /><br />"क्या हुआ बेटा ,और ये सामान्… अचानक राधिका की नज़र दरवाज़े पर पडे सूट्केस पर पडी<br /><br />"सन्कल्प मुझे हमेशा के लिये यहा छोड गये हे…।'पूर्निमा की सुबकिया सुन कर श्री पाटिल और राधिका भी बाहर आ गये<br />पूरी बात जान कर श्री पाटिल ने अपना सर पकड लिया।उन्हे एह्सास था कि उनका दामाद उनकी बेटी से बद सलूकी से पेश आता था,पर बात यहा तक पहुच जायेगी उन्होने सोचा ना था<br /><br />"बाबा,वो बोले कि तुम फ़ूहड हो, तुम्हारे मा बाबा ने अन्पड भैन्स मेरे गले बान्ध दी हे,बताओ बाबा इसमे मेरा क्या कुसूर्……"<br />पाटिल बाबू ने सहमे से खडे ऊत्कल को गले लगा लिया<br /><br /><br />कुछ दिन बीत गये,अपने दामाद से मिल कर बात करने की कोशिश भी की पर कोइ फ़ायदा नही हुआ…पूर्निमा ने भी अपनी नियती से जैसे समझोता कर लिया<br /><br />"मा, आज जवाब देने का आखिरी दिन हे"सन्ध्या<br />पूर्निमा के साथ हुए वाकयात की वजह से राधिका ये भूल ही गयी थी<br />"ह्म्म …आज देखते हे बेटा"<br /><br />शाम को जब बाबा घर आये,सन्ध्या चाय का प्याला लेकर उनके सामने जा बैठी<br />"चाय बाबा'<br />"हा बेटी,आज बहुत थक गया हू मे"<br />"बाबा,वो आपसे कुछ बात करनी थी"<br />"हा, बोल"<br />डरते डरते सन्ध्या ने स्चोलर्शिप की सारी बात कह दी<br /><br />"अमेरिका…।" खडे होते हुए गस्से से पाटिल बाबू बोले<br />"तुने सोचा भी कैसे…।'<br />"और तुम, तू जानती थी इस सब के बारे मे…लड्की को बाहर भेजेगी" राधिका की तरफ़ बड्ते हुए तमतमाते हुए वे बोले<br />"हा,मे उसके साथ हू" ना जाने कहा से हिम्मत आ गयी थी राधिका मे, वो अपने पति का सामना करने को खडी हो गयी<br />और बाबा,आप चाहते हे कि सन्ध्या का हाल भी मेरी तरह हो…।ज़माना बहुत आगे निकल गया है बाबा, बस आप पीछे रह गये "पूर्निमा बोली<br /><span class="">"बाबा,मुझे अपनी ज़िन्दगी जीने का मौका दीजिये,मे आपका बेटा बन कर आपका नाम रोशन करना चाह्ती हु"हाथ जोड कर भीगी पल्को से सन्ध्या ने आखिरी विनती की </span><br /><span class=""></span><br />हवाइजहाज़ की खिड्की से बाहर देखते हुए सन्ध्या का मन छलान्गे मार रहा था …अपनी मन्ज़िल कि ओर बड्ने को…।<br />पूर्निमा वापस अपने घर चली गयी थी और फ़ेशन डिसाइन का कोर्स शुरु किया था<br />बाबा ने इजाज़त दे दी थी उसे पन्ख फैला कर उडने की<br />अपने बाबा का आशिर्वाद और मा का प्यार लिये वो अपने सन्जोने चली थी वो…इन्द्रधनुश के उस पार्…॥<br /><span class=""></span><br /><br /><br /><br /><br /><br /><br /><br /><br /><br /><br /><span class=""></span>गायत्रीhttp://www.blogger.com/profile/10115781717096712010noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-28037504.post-15565991920644887882007-05-26T12:45:00.000-07:002007-05-26T13:05:45.779-07:00मेरे प्रियइन बैरागी नैनन का चित्त ना जाने कोई<br />देख तुम्हे अनदेखा कर दे<br />ना देखे तो व्याकुल होये......<br />इन् मदमाते अधरो का<br />भेद ना जाने कोई<br />संग तुम हो तो मौन रहे<br />तुम जाओ तो तेरा नाम जप लोय.....<br /><span class=""></span><br />इन् बैरन कदमो का<br />राज़ ना जाने कोई<br />साथ तुम्हारे ना चले,<br />तुम जाओ तो पीछे होये.....<br /><br />मन मे बसे तुम सान्वरे<br />तुम क्यू ये ना समझे<br />ना मेरी मे हां हे छुपी<br />क्या तुम समझे<br />हा, तुम अब समझे…<br /><br />और अब, मे पूर्ण तेरी हुई प्रियगायत्रीhttp://www.blogger.com/profile/10115781717096712010noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-28037504.post-86932639596994090672007-05-24T00:30:00.000-07:002007-05-24T06:53:42.070-07:00बस एक कदम.....उठो, जागो, कदम बढाओ<br />ज़िन्दगी के हर मोड पर <br />प्रारब्ध की मिलती हस्ती हे <br />बस एक कदम बढाने<br />की ज़रूरत हे क्यूंकि<br />हर कदम पर जिन्दगी बहती हे ....<br /><br /><br />बंद कमरो में घुटी साँसे हे<br />बंद खिड़की खोल कर हवा को<br />बहने दो<br />एक हाथ बढाने पर<br />हवाएँ रुख बदलती हे .....<br /><br />किसी का दर्द बाँचो <span class=""></span><br /><span class=""></span>कुछ अपनी कहो <br />मन खोलो,कुछ बोलो <span class=""></span><br /><span class=""></span>एक मौन की चुप के पार<br />कोई एक ज़िंदगी उबरती हे.....गायत्रीhttp://www.blogger.com/profile/10115781717096712010noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-28037504.post-79130928779579177452007-05-19T14:30:00.000-07:002007-05-19T14:42:59.195-07:00सलवटे.....उठी सुबाह तो खुद को मुस्कुराते पाया<br /> लगा कल रात सपने में था तू आया<br />तेरी उँगलियों की थर्कन बदन पर मिली<br />पलट के देखा तो बिस्तर पर<br />सलवटे थी पडी ......<br /><br />लगा कल रात तू यही था यही<br />मेरी सान्सो में तेरी खुश्बू थी बसी<br />ख्वाब था शायद या था हक़ीक़त<br />तू यही था मेरे करीब ...<br />बहुत ही करीब.....गायत्रीhttp://www.blogger.com/profile/10115781717096712010noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-28037504.post-83300014252128363272007-05-19T12:48:00.000-07:002007-05-19T14:27:45.996-07:00निर्वान मार्गसड़क पर इन्सानो कि भीड़<br />आस्मान मे सितारो कि भीड़<br /><span class=""></span>राशन के लिये कतारे और भीड<br />कहा है शान्ति का मार्ग…<br /><br />बाज़ारो मे सामानो कि भीड<br />कब्रीस्तान में मज़ारो कि भीड <span class=""></span><br /><span class=""></span>हस्पताल मे बीमारो कि भीड<br />कहां है निर्वान का द्वार …<br /><br />मन्दिर मे भक्तो कि भीड़<br />सीणेमा मे आसक्तो कि भीड़<br />पहाडों पर सैलानियो की भीड<br />कहां है मुक्ति का मार्ग्……<br /><br />घर पर मेहमानो कि भीड़ <span class=""></span><br />मन मे सवालो कि भीड<br />समाज मे रुडिवादियो कि<span class=""> भीड </span><br /> कहा है ग्यान का मार्ग्…॥<br /><br />इस भीड़भाड़ से निकल के<br />एक कोने मे छुपे बेअदब<br />बेलगाम बचपन को<br />अमर करने का<br />मार्ग दिखा दे<br />ए मौला……<br /><br />इसके पाक मन के सहारे<br />मैंऔर करु मोक्श कि प्रप्ति<br />तब जीवन से तर जाऊं .....गायत्रीhttp://www.blogger.com/profile/10115781717096712010noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-28037504.post-89920132987875794842007-05-15T03:27:00.000-07:002007-05-27T04:32:26.007-07:00मंज़िल मंज़िल......एक कहानी"क्या मैं यहाँ बैठ सकता हूँ ?" ये शब्द सुनकर मेरा ध्यान उन की तरफ गया जों रेलवे प्लेटफार्म पर मेरी सीट के पास खडे थे।<br />" जी" सकपका कर मैंने सीट पर फैला अपना समान समेटा और वो बैठ गए<br />" शताब्दी का इंतज़ार कर रही हो बेटी ? "........<br /><br />" जी " जवाब देकर मैंने अपना ध्यान प्रेमचंद की "सेवासदन" की तरफ़ फिर से करना चाहा .<br /><br />"क्या दिल्ली जा रही हो बेटी ? वो फिर बोले ।<br /><br />बचपन में माँ ने सिखाया था" अजनबियों से बात नही करते " अधेढ़ उम्र हो गयी और दो बच्चो कि मा हूँ पर बरसो पहले की इस सीख ने कितने अनजाने रिश्तों को बनने से पहले ख़त्म दिया था ....पर ना जाने कैसी आत्मीयता और स्नेह था उनकी आवाज़ में, कि मैं अनायास ही बोल पड़ी " जी, मेरा मायक़ा हे मेरा वहाँ "।<br /><br /><br />" सामान बहुत हे बेटी, लंबे समय के लिए जा रही हो ?", "जी' कहते मेरा गला भर आया ."अध्यापिका हूँ पहले यहीं अलीगंज में पढ़ाती थी, अब दिल्ली तबादले की अर्ज़ी दी है "<br /><br />"और तुम्हारा परिवार..पति <span class="">,बच्चे </span>......?"<br /><br /><br />मेरी चुप्पी शायद बहुत कुछ कह गयी थी....जो लब ना कह सके,भीगी पलकों ने बयान कर दिया ...<br /><br /><br /><br /><span class="">कुछ देर की मौन के बाद वो मेरी तरफ़ मुड कर बोले </span>"मेरे दो बेटे है ,बेटी...दोनो ख़ुश है अपने परिवारों के साथ ..........एक डॉक्टर है कनाडा में और दूसरा एंजिनीर, नेवार्क में ..कभी, कभी जाता हूँ उनसे मिलने...पर यहाँ से दूर नही रहा जाता...अपने वतन की ख़ुश्बू और इसमे दफ़न हुई यादें वापस खींच लाती है ....<br /><br /><br /><span class=""></span>"मेरी बहन है दिल्ली में...गर्मियों की छुट्टियों में उनके पास चला जाता हूँ ,वहाँ उसके पोते- पोती हे ,दिल लगा रहता है उनके साथ ... "<br /><br />" और आपकी पत्नी...." अनायास मेरे मुँह से निकल गया.<br /><span class=""></span><br />बहुत देर शांत रहे और फिर बोले " बहुत साल पहले, मेरी पत्नी और मेरे बीच हुए एक झगड़े की वहज़ह से वो अपने मायक़े चली गयी ...... उसे लगता था की शायद मेरे पास उसके लिए वक़्त नही था, शायद मैं कभी उसे बता नही पाया वो मेरे लिए क्या मायने रखती है .........मैने ग़ुस्से में उसे घर छोड़ने के लिए कहा, और वो छोड़ गयी ........... बच्चे मेरे पास थे...कुछ दिन बीत गये और एक दिन ये ख़बर आई की कानपुर से लखनऊ आते वक़्त एक सड़क दुर्घटना में वो गंभीर रूप से घायल हो गयी थी ......."<br /><br /><span class=""></span><span class="">मैने देखा कि उनकी आँखें</span> नम थी ... आँखों से चश्मा उतार कर साफ़ करते हुए वो आगे बोले " मैं जब तक हस्पताल पहुँचा, वो अपनी अंतिम साँसें ले रही थी .....बस जाते जाते एक मुझे एक चिट्ठी थमा गयी जो शायद रैलवे प्लएटफ़ॉर्म पर बैठ कर मुझे लिखी थी " .......<br /><span class=""></span><br />"<span class="">क्या था उस </span>चिट्ठी में" मेरे गले से धीमी सी आवाज़ निकली।<br /><br /><span class=""></span>एक पुराना काग़ज़ ,जिसने वक़्त की मार देती थी , मेरी तरफ़ बड़ा दिया... उसमे लिखा था,<br /><br />"प्रिय पतिदेव,<br /><br />कभी- कभी हम सुई को हाथी और हाथी को सुई समझ लेते है .....अगर छोटी छोटी बातों को भुला कर हम एक दूसरे कई भावनाओ का सम्मान करें , तो जीवन कितना सुखमय हो...<br />मैं कभी तुम्हे ये ना कह सकी जो आज लिख रही हूँ ---------<br />काश आप मुझे कभी बोल सकते की आप मुझे कितना चाहते है ......मैं दुनिया के सारे कष्ट सह सकती हूँ पर आपकी रुसवाई और बेरूख़ी मेरे सम्मान को मंज़ूर नही ...आज आपने मुझे घर छोड़ने के लिए कहा, मैं घर से निकल गयी ..... काश, अपने एक बार मुझे रुकने के लिए कहा होता.... जो बात आप आज नही समझे, मेरे जाने के बात समझेंगे"...<br /><br />आपकी, सिर्फ़ आपकी,<br /><br />"उर्मी"......<br /><br />काग़ज़ को वापस जेब में डालते हुए वो बोले "इससे मैं हमेशा अपने पास रखता हूँ और अब <span class="">मेरेएकाकी </span>जीवन का यही सहारा है ..... उर्मिला की बात तो मैं समझा , जब तक समझा वो चली गयी थी,अकेले......"<br /><br />बहुत सन्नाटा सा छा गया था हुमरे आस पास तभी दूर से आती हुई ट्रैन की सीटी से हुमारा ध्यान भंग हुआ<br /><span class=""></span><br /><span class=""></span>डब्बा जैसे लगा ,बुज़ुर्गवार के कूलीए ने उनका समान गाड़ी में डालना शुरू किया. " आ रही हो बेटी?" उन्होने पूछा। "<br />"nahi बाबा, मैं घर जाऊंगी" मैं बोली...<br /><span class=""></span><span class=""></span><span class=""></span>उनके चहरे पर हलकी सी मुस्कान फैल गयी ....<br />फिर मिलेंगे बेटी....मेरी मंज़िल तो यही ही है"........ चलती गाड़ी से हाथ हिलते हुए उन्होने मुझसे अलविदा ली और मैंने घर जाने के लिए कुली को आवाज़ दी. हाथ में मोड़ा हुआ काग़ज़ मैने किताब के पन्नो में सहेज दिया......<br />**************************************************************<br />शाम को दरवाज़े की डोर बेल की आवाज़ पर दरवाज़ा खोला तो सामने बहुत थके हुए सुधीर दिकाई दिए आँखें लाल थी, लग रहा था की रोए थे शायद...<br />" सुधा, तुम ....." उनका गला भर आया और उन्होने जकड़ कर मुझे अपने आंलिनगान में ले लिया "मुझे लगा था शायद.........."<br />"शह्ह, ......मैने उनके होंठों पर उंगली रख उनके काँधे से सर लगा कर रो पड़ी...<br />बाहर सूरज ढल रहा था, अंधेरो का अब डर नही था मुझे ,मेरी मंज़िल जो अब मेरे साथ थी...दोबारा.... " धन्यवाद बाबा" ...मैने धीरे से मन बोला.......गायत्रीhttp://www.blogger.com/profile/10115781717096712010noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-28037504.post-91654067885435945432007-05-13T04:19:00.000-07:002007-05-15T04:05:49.152-07:00कशमकश .....एक कशमकश है , है नाम - ज़िंदगी<br />कभी ख्वाब दिखती , कभी रवानगी<br /><br />दौड़ता रहा पीछे जिसके तू दिन भर<br />तेरी परछाई थी , साथ चली तेरे दिलबर<br />अब हुई शाम और तू मुड़ा है अब<br />कहाँ है वो.......<br />वो घुल गयी साँझ की किरणो के साथ<br />शाम ढले आने वाली शब बन कर<br /><br />'शेष कल' ....गायत्रीhttp://www.blogger.com/profile/10115781717096712010noreply@blogger.com