tag:blogger.com,1999:blog-273246742008-07-06T01:47:48.569-07:00arvind dasArvind Dashttp://www.blogger.com/profile/04454157250490714006noreply@blogger.comBlogger22125tag:blogger.com,1999:blog-27324674.post-57553640558714345672008-06-27T02:15:00.000-07:002008-07-06T01:47:48.599-07:00एक किताबघर का जाना...<div align="justify"><img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5216489368029130898" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" src="http://bp1.blogger.com/_g5wsSaKfaXw/SGSxcSv6cJI/AAAAAAAAAno/6IYkcMDMtWU/s320/Anil+arora.JPG" border="0" /> <strong>दिल्ली</strong> के कनाट प्लेस में स्थित किताब की चर्चित दुकान 'बुकवर्म' की अकाल मौत हो रही है. </div><div align="justify">तीस वर्ष पुराने इस किताबघर में सत्यजीत राय, अमिताभ घोष, सुनील गावस्कर और प्रकाश करात जैसी शख़्सियतें और देश-विदेश के किताबी कीड़े आते रहे हैं. </div><div align="justify">दिल्ली में इस दुकान की एक ख़ास पहचान रही है. जैसे छोटे शहरों और क़स्बों की दुकानों से आपका एक निजी रिश्ता रहता है उसी तरह ग्राहकों के साथ इस दुकान का भी एक निजी संबंध रहा है. </div><div align="justify"><br />ऐसा नहीं कि कनॉट प्लेस में किताबों की और दुकानें नहीं हैं, पर साहित्य, कला, संस्कृति और अकादमिक जगत की किताबों का जैसा संग्रह यहाँ मिलता था वैसा दिल्ली में अब इक्की-दुक्की दुकानों पर ही मिलता है. </div><div align="justify">दिल्ली और इसके आस-पास हाल के वर्षों में 'मॉल संस्कृति' ख़ूब पनपी है जहाँ किताब की दुकानें भी काफ़ी नज़र आने लगी हैं.</div><div align="justify"></div><div align="justify">लेकिन मॉल में वही किताबें मिलती है जिनकी बिक्री से बहुत फ़ायदा हो या जिन्हें लेकर मीडिया में काफ़ी चर्चा हो रही हो. वहाँ कॉफ़ी टेबल' को सज़ाने वाली किताबें आसानी से मिल जाती हैं पर अकादमिक रुचि या साहित्य की किसी दुर्लभ किताब को ढूँढ़ना बेहद मुश्किल है. </div><div align="justify"><br /></div><div align="justify"><strong>किताबों में घटती रूचि</strong></div><span class=""></span><div align="justify"><br /></div><div align="justify">ऐसे में इस किताबघर का बंद होना मायूस करता है. </div><div align="justify"></div><div align="justify"><span class=""></span></div><div align="justify">मायूस बुकवर्म के मालिक अनिल अरोड़ा भी हैं. अपने पुस्तक प्रेम के कारण इन्होंने अपने पुश्तैनी शराब के व्यवसाय को छोड़ कर किताबों के बीच अपनी जवानी गुज़ारी. </div><div align="justify">लेकिन वे कहते हैं कि अब बहुत हो गया, कुछ भी करुँगा किताब का व्यवसाय नहीं करुँगा. </div><div align="justify">वे कहते हैं, "पहले की तुलना में हाल के वर्षों में लोगों की रुचि इन किताबों में नहीं रही. अब उतना फ़ायदा नहीं होता जितना होना चाहिए. साथ ही बाज़ार में नकली और सस्ती किताबें मौजूद है, फिर क्यों कोई अपना पैसा बर्बाद करेगा." </div><div align="justify">उनका कहना ग़लत भी नहीं है. अरुंधति राय की 'द गॉड ऑफ़ स्मॉल थिंग्स' की क़ीमत दुकान में क़रीब तीन सौ रुपए है. दुकान के ठीक बाहर फ़ुटपाथ पर मोल-भाव करने पर वही 'नक़ली किताब' सौ रुपए में मिल रही है. अनिल कहते हैं कि मॉल में बड़े व्यावसायियों की दुकानों में किताबों की बिक्री हो न हो उन्हें बहुत फ़र्क़ नहीं पड़ता, लेकिन उन जैसे स्वतंत्र दुकानदारों को इससे बहुत फ़र्क़ पड़ता है. </div><div align="justify">दिल्ली भले ही राजनीतिक गतिविधियों का केंद्र हो लेकिन यह साहित्य-संस्कृति की भी नगरी है. ऐसे में बुकवर्म का जाना हमारे समय में शहर की बदल रही संस्कृति पर भी एक टिप्पणी है. </div><div align="justify">दिल्ली स्थित जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय में पिछले तीस वर्षों से किताब की दुकान चलाने वाले अशोक मजुमदार कहते हैं, "अब छात्रों और यहाँ तक की शिक्षकों में भी पुस्तकों को लेकर वह उत्सुकता और उत्कंठा नहीं दिखती जो 10-20 वर्ष पहले तक थी." </div><div align="justify"><br /><strong>कमी खलेगी </strong></div><strong><div align="justify"><br /></strong>दो तल्लों में फैली बुकवर्म में मौजूद क़रीब 20 हज़ार किताबों पर आज-कल भारी छूट है. इससे पहले इस दुकान में ऐसा कभी नहीं हुआ. छपे हुए दामों पर ही यहाँ किताबें मिलती रही है. </div><div align="justify">इस किताबघर के बंद होने से दुकान के पुराने ग्राहक काफ़ी दुखी है. अनिल अरोड़ा कहते हैं, "यह ख़बर सुन कर की जुलाई के आख़िर तक यह दुकान बंद हो जाएगी लोग महज़ अपना दुख व्यक्त करने आ रहे हैं. ऐसा लग रहा है कि वे किसी सगे-संबंधी के गुज़र जाने पर शोक व्यक्त करने आ रहे हों." </div><div align="justify"></div><div align="justify"><span class=""></span></div><div align="justify">पिछले बीस वर्षों से इस दुकान में आने वाले आस्ट्रेलिया के रिचर्डस कहते हैं, "मुझे काफ़ी बुरा लग रहा है. जब जब मैं दिल्ली आता हूँ यहाँ ज़रुर आता हूँ. इस दुकान की कमी मुझे बहुत खलेगी" </div><div align="justify"></div><div align="justify"><span class=""></span></div><div align="justify">पिछले दशकों में भारत में उभरे नए मध्यम वर्ग के पास जिस अनुपात में शिक्षा और पैसा बढ़ा है उसी अनुपात में पढ़ने की फ़ुरसत भी कम हुई है. </div><div align="justify"><span class=""></span></div><div align="justify">किताबों के बजाय अब लोग अपना समय इंटरनेट, टेलीविज़न देखने या सैर-सपाटे में गुज़ारना पसंद करते हैं.</div><div align="justify"></div><div align="justify"><span class=""></span></div><div align="justify">आज की, कल की और आने वाले कल की' बात करती नोम चोमस्की, कामू, और अरुंधति राय की किताबें 'बुकवर्म' में उदास पड़ी है.</div><div align="justify">दुकान न हो तो इन लेखकों को अपना पाठक कैसे मिलेगा? फिर ये किताबें किस से बातें करेंगी? </div><div align="justify"><em>(बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए, साभार, 6 जून 2008) </em><em>(चित्र में बुकवर्म के मालिक अनिल अरोड़ा एक पुस्तक प्रेमी के साथ)</em></div>Arvind Dashttp://www.blogger.com/profile/04454157250490714006noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-27324674.post-27685033271375864102008-01-27T09:06:00.000-08:002008-04-18T10:52:52.068-07:00गुल, नज़ूरा और रामचंद पाकिस्तानी<a href="http://bp1.blogger.com/_g5wsSaKfaXw/R5zANszJ7kI/AAAAAAAAAE4/XxG_QgERy6A/s1600-h/DSC_0292.JPG"><img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5160210614656298562" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" src="http://bp1.blogger.com/_g5wsSaKfaXw/R5zANszJ7kI/AAAAAAAAAE4/XxG_QgERy6A/s320/DSC_0292.JPG" border="0" /></a><br /><div align="justify"><a href="http://bp0.blogger.com/_g5wsSaKfaXw/R5y9eczJ7iI/AAAAAAAAAEo/--ane2s0fjQ/s1600-h/DSC_0323+_fresh.JPG"><img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5160207603884224034" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" src="http://bp0.blogger.com/_g5wsSaKfaXw/R5y9eczJ7iI/AAAAAAAAAEo/--ane2s0fjQ/s320/DSC_0323+_fresh.JPG" border="0" /></a> गुलरुख़ ने लिखा है कि सोशल नेटवर्किंग साइट ओरकुट के एलबम में जो आपने लोदी गार्डन की तस्वीर डाल रखी है उसका क्रेडिट मुझे मिलनी चाहिए. गुल इस्लामाबाद में रहती हैं.<br /><br />वर्षों से दिल्ली में रहते हुए भी लोदी गार्डन की हवा कभी नहीं खाई. जिसका मुझे मलाल भी रहा है. ऐसे में जब इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में हो रहे एक वर्कशाप के बीच में हवाखोरी के लिए ख़ूबसूरत और ज़हीन गुल ने लोदी गार्डन घूमने का न्यौता दिया तो भला मैं कैसे इंकार करता!<br /><br />हम जिन्हें नहीं जानते या जिनसे हमारा परिचय नहीं होता है उनके बारे में हम तरह-तरह के ख़्याल बुनते हैं. ये ख़्याल आम तौर पर ‘निगेटिव’ ही होते हैं. और यदि वह शख़्स पाकिस्तान से ताल्लुक़ रखता हो तो हमारा पूर्वाग्रह अपने चरम पर होता है.<br /><br />पाकिस्तान के बारे में सामान्य ज्ञान को छोड़ कर जो कुछ भी जानकारी हमें भारतीय पॉपुलर मीडिया से मिलती है वह आधी-अधूरी होती है. पाकिस्तान की वही ख़बरें हमारे अख़बारों की सुर्खियाँ बनती हैं जो अमूमन ‘मौत की ख़बरों’ से वाबस्ता होती है या जिससे हमारे राष्ट्र और राष्ट्रीयता को प्रत्यक्षतः किसी तरह का नुकसान पहुँचने की संभावना नहीं रहती है.<br /><br />पाकिस्तान के मामले में भारतीय मीडिया राज्य और सत्ता के नज़रिए से ही ख़बरों को देखने और उन्हें विश्लेषित करने को अभिशप्त लगता है. किसी भी महीने यदि आप भारतीय अख़बारों पर नज़र डालें तो इस तरह की सुर्खियाँ जो दिसंबर, 2007 में नवभारत टाइम्स, दिल्ली में छपी हैं- पाकिस्तानी क्रूज मिसाइलों का जवाब है हमारे पास , एफएम मौलाना बोला- खून बहाने को तैयार, पाक ने टेस्ट की एटमी मिसाइल आदि, आदि देखने को मिल जाएँगी. और ख़बरिया चैनलों की बात जितनी कम की जाए उतना बेहतर. वर्ष 2001 में भारत के संसद भवन पर हुए आतंकवादी हमले के बाद ‘आजतक’ जैसे चैनलों ने युद्ध का समां बाँधने और युयुत्सु मानसिकता तैयार करने में जो भूमिका अदा कि थी वह जगज़ाहिर है.<br /><br />पिछले महीने दक्षिण एशिया के क्षेत्र में संघर्ष निवारण और शांति स्थापना के लिए काम कर रही दिल्ली स्थित एक संस्था विसकाम्प (Women in Security Conflict Management and Peace) के हफ़्ते भर के एक वर्कशाप में जब तक़रीबन 25 युवा पाकिस्तानी शोधार्थियों, ऐक्टिविस्टों से बात-चीत करने और उनके संग उठने-बैठने का मौक़ा मिला तो मीडिया की वज़ह से जो ‘स्टरियोटाइप’ छवि मन में बैठी हुई थी उसमें ज़बरदस्त मोड़ आया. </div><br /><div align="justify"></div><div align="justify">गुल, नज़ूरा और फ़ैजा की चितांएँ हमसे अलग कहाँ थी. सरमद और गुलाम भाई तो हमारी तरह ही यारबाश हैं. कैसे अर्शी और नबिहा रात के 10-11 बजे जेएनयू की फिजाओं में इस्लामाबाद के क़ायदे आज़म यूनिवर्सिटी की खुशबू ढूँढ रहीं थी. गुल दिल्ली हाट और ख़ान मार्केट में तो ऐसे तफ़रीह कर रहीं थी जैसे वो कराची या लाहौर में हो. संभव है कि यदि मैं भी लाहौर के बाज़ार में घूमूँ तो मुझे भी कुछ ऐसा ही लगे. कब से सुनता-पढ़ता आ रहा हूँ कि ‘जिन ने लाहौर नहीं वेख्या, वो जमया ही नहीं.’ पर यह कब संभव होगा?<br /><br />इससे पहले नवंबर 2006 में एक सेमिनार में पाकिस्तान के एक शोधार्थी जवाद सैयद से आस्ट्रेलिया में मुलाक़ात हुई थी. साहित्य-संगीत में रूचि होने के नाते फ़ैज़ की शायरी और फ़रीदा ख़ानम की ग़ज़लों से इश्क तो पुराना था लेकिन किसी पाकिस्तानी नागरिक से पहली बार मेरा मुखामुखम इस तरह हुआ.<br /><br />मिलते ही ऐसा लगा कि जैसे हम एक-दूसरे को वर्षों से जान रहे हो. उनकी दिलचस्पी मीर, ग़ालिब और फ़ैज में काफ़ी थी. वे कहने लगे कि मेरी उर्दू काफ़ी अच्छी है और मैं कहता रहा कि आपकी हिन्दी. बहरहाल उनसे हुई दोस्ती का सिलसिला जारी है. आजकल वे लंदन में हैं. अपनी ख़तो-किताबत उनसे होते रहती है.<br /><br />सवाल है कि हम अपने पड़ोसी देश पाकिस्तान के बारे में कितना जानते हैं? या जो जानते हैं वो कितना सच है, कितना झूठ. ठीक इसी तरह एक आम पाकिस्तानी भारत के बारे में कितना कुछ जानता है जिसमें झूठ-सच दूध-पानी की तरह मिला होता है, जिसे अलगाना मुश्किल है.<br /><br />राजनीति के अलावे सामाजिक-साँस्कृतिक एक-सी ज़मीन जो दोनों देशों के बीच है उस पर कितनी दूर हम इन साठ सालों में चल पाएँ हैं? दो देशों के बीच चली आ रही राजनीतिक लड़ाई में सबसे ज़्यादा साझी संस्कृति की जो बुनियाद है वही प्रभावित हुई है. क्योंकि राजनीतिक लड़ाई इन्हीं साँस्कृतिक हथियारों से लड़ी जाती रही है.<br /><br />अमरीकी पत्रिका न्यूज़वीक कहती है कि ‘पाकिस्तान धरती पर सबसे ख़तरनाक जगह है’ और भारतीय मीडिया इस ख़बर को लपक कर कहती है कि हम तो यह कबसे कह रहे थे.<br /><br />लेकिन ख़बरें और भी हैं, जो पाकिस्तानी लेखक मोहसिन हामिद की ‘रिलकटेंट फंडामेंटलिस्ट’ जैसी किताबें पढ़ने पर हमें झकझोरती हैं या पाकिस्तानी नागरिकों से रू-ब-रू होने पर हमें पता चलता है.<br /><br />वर्कशाप में ही प्रसिद्ध पाकिस्तानी फिल्म निर्देशक जावेद जब्बार की अगले महीने रिलीज़ होने वाली फ़िल्म ‘रामचंद पाकिस्तानी’ की कुछ झलकियाँ देखने को मिली. यह अपने आप में पहली पाकिस्तानी फ़िल्म है जो पाकिस्तान में रहने वाले अल्पसंख्यक हिन्दू समुदाय के जीवन के इर्द-गिर्द घूमती है. इस फ़िल्म में अभिनेत्री नंदिता दास समेत कई भारतीय कलाकारों का योगदान है. जावेद कहते हैं कि यह फ़िल्म भारत-पाकिस्तान के लोगों में मन में जो ‘स्टरियोटाइप’ छवियाँ बैठी हुई है उन्हें तोड़ने की एक कोशिश है. साथ ही वे कहते हैं- Unfamiliarity breeds contempt. यानि यदि मेल-जोल न हो तो एक-दूसरे के प्रति तिरस्कार या अवज्ञा का भाव ही मन में जन्म लेता है.<br /><br />आलोचक रामचंद्र शुक्ल ने भी तो वर्षों पहले यही कहा था कि बिना परिचय का प्रेम संभव नहीं है. भारत-पाकिस्तान संबधों के परिप्रेक्ष्य में भी यह उतना ही सच है जितना दिलों के मामले में. </div><div align="justify"><em><span style="font-size:85%;">(पहली तस्वीर में बाएँ से नूरअली, सरमद, अर्शी, आमिर, तारिक, फैज़ा, सहर और हूमेरा. दूसरी तस्वीर में गुलरुख़ के साथ लेखक)</span></em></div>Arvind Dashttp://www.blogger.com/profile/04454157250490714006noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-27324674.post-42708830781745002402007-11-25T10:31:00.000-08:002007-11-25T22:42:37.196-08:00कामगार के हाथ<a href="http://bp2.blogger.com/_g5wsSaKfaXw/R0nA3JQjGNI/AAAAAAAAACs/KsUVS4jjOu0/s1600-h/DSC_0001.JPG"><img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5136848903603427538" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" src="http://bp2.blogger.com/_g5wsSaKfaXw/R0nA3JQjGNI/AAAAAAAAACs/KsUVS4jjOu0/s200/DSC_0001.JPG" border="0" /></a><br /><a href="http://bp0.blogger.com/_g5wsSaKfaXw/R0nA3pQjGOI/AAAAAAAAAC0/PVTUaZ7EzZ4/s1600-h/DSC_0009.JPG"><img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5136848912193362146" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" src="http://bp0.blogger.com/_g5wsSaKfaXw/R0nA3pQjGOI/AAAAAAAAAC0/PVTUaZ7EzZ4/s200/DSC_0009.JPG" border="0" /></a><br /><a href="http://bp3.blogger.com/_g5wsSaKfaXw/R0nA4ZQjGPI/AAAAAAAAAC8/ohgUM3W6FnA/s1600-h/DSC_0014.JPG"><img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5136848925078264050" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" src="http://bp3.blogger.com/_g5wsSaKfaXw/R0nA4ZQjGPI/AAAAAAAAAC8/ohgUM3W6FnA/s200/DSC_0014.JPG" border="0" /></a><br /><img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5136848933668198658" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" src="http://bp1.blogger.com/_g5wsSaKfaXw/R0nA45QjGQI/AAAAAAAAADE/nFbcSjLimrE/s200/DSC_0093.JPG" border="0" /><br /><div align="justify"><strong><span style="color:#ff6666;">पिछले </span></strong>बारह सालों से दिल्ली में हूँ लेकिन अंतरराष्ट्रीय व्यापार मेला देखने, घूमने का मौका कभी नहीं मिल पाया. इस बार एक मित्र के आग्रह पर व्यापार मेला घूमा तो जरूर पर ‘बाज़ार से गुजरा हूँ लेकिन ख़रीदार नहीं हूँ’ का भाव लिए हुए ही.<br /><br />मेले में घूमते हुए उत्तर आधुनिकतावादी चिंतक ज्याँ बौद्रिला का कहना, ‘पूँजीवीदी समाज में केंद्रीय स्थान उत्पादन को नहीं बल्कि उपभोग को है’ मन में कौंधता रहा.<br /><br />मेले में भीड़ काफ़ी थी. मैं एक स्टॉल पर बनारसी साड़ी की बारीकियों से उलझता रहा...पर खरीदार वहाँ नहीं थे.<br /><br />बनारस से आए बुनकर बिलाल के चेहरे पर माल नहीं बिकने का दर्द स्पष्ट झलकता था. कबीर की रहँटा की याद आई.<br /><br />कबीर याद आए-‘सुखिया सब संसार है खावे और सोवे, दुखिया दास कबीर है जागे और रोवे.’<br /><br />मित्र ने थाईलैंड के स्टॉल से लकड़ी के बने खूबसूरत एक स्त्री के दुआ में जुड़े हाथ मुझे भेंट किए. मैं उन हाथों को हाथ में लिए सोचता रहा- ‘दुनिया को हाथ की तरह गर्म और सुंदर होना चाहिए’ </div>Arvind Dashttp://www.blogger.com/profile/04454157250490714006noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-27324674.post-46363329694751872612007-11-10T10:18:00.000-08:002007-11-16T07:48:42.812-08:00इस बार जेएनयू का रंग कैसा<a href="http://bp2.blogger.com/_g5wsSaKfaXw/RzX7LpSp7hI/AAAAAAAAACM/kbWfJSlRuMw/s1600-h/DSC_0078.JPG"><img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5131283527939780114" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" src="http://bp2.blogger.com/_g5wsSaKfaXw/RzX7LpSp7hI/AAAAAAAAACM/kbWfJSlRuMw/s200/DSC_0078.JPG" border="0" /></a> <div><a href="http://bp0.blogger.com/_g5wsSaKfaXw/RzX5gJSp7gI/AAAAAAAAACE/UdRmKPKSJyg/s1600-h/DSC_0210.JPG"><img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5131281681103842818" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" src="http://bp0.blogger.com/_g5wsSaKfaXw/RzX5gJSp7gI/AAAAAAAAACE/UdRmKPKSJyg/s200/DSC_0210.JPG" border="0" /></a> </div><div align="justify"></div><div align="justify"><a href="http://bp0.blogger.com/_g5wsSaKfaXw/RzX3nJSp7fI/AAAAAAAAAB8/Y3nU0O2H9H0/s1600-h/DSC_0123.JPG"><img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5131279602339671538" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" src="http://bp0.blogger.com/_g5wsSaKfaXw/RzX3nJSp7fI/AAAAAAAAAB8/Y3nU0O2H9H0/s200/DSC_0123.JPG" border="0" /></a> <strong><span style="color:#cc0000;">जेएनयू </span></strong> छात्रसंघ चुनाव में इस बार भी मार्क्स, लेनिन, भगत सिंह के नारे लगे. लेकिन...इस बार जेएनयू का रंग कैसा- आइसा, आइसा का नारा बुलंदी पर रहा. </div><div align="justify"></div><div align="justify">जेएनयू छात्रसंघ में पहली बार आइसा चारों पदों (अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, महासचिव और संयुक्त सचिव) पर विजयी रही. पहली बार जेएनयू के इतिहास में एसएफआई -एआईएसएफ का सफ़ाया हुआ. ज़ाहिर है नंदीग्राम, सिंगुर का मुद्दा चुनाव में हावी रहा. आरक्षण के मुद्दे ने भी अपना रंग दिखाया, दो पदों पर 'यूथ फॉर इक्वलिटी' के प्रत्याशी दूसरे स्थान पर रहे.</div><div align="justify"></div><div align="justify">पारंपरिक 'प्रेसिडेंसिल डिबेट' की रात 'राम के नाम' पर घमासान हुआ.पहली बार डिबेट पूरी नहीं हो पाई. जबकि ऐसा लग रहा था कि चुनाव स्थगित हो सकता है जेएनयू की जनता ने भारी मतों से चुनाव को सफल बनाया. लोकतंत्र फिर जीता.</div>Arvind Dashttp://www.blogger.com/profile/04454157250490714006noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-27324674.post-16955213467037266612007-09-19T11:42:00.000-07:002007-09-19T23:34:28.695-07:00एक संपूर्णता के लिए<div align="justify"><strong><span style="color:#ff0000;">‘</span><span style="color:#ff6666;">घु</span></strong>घुआ मना उपजे घना’ गाते-झूलते हुए सुनी दादी-नानी की कहानी अब याद नहीं। याद हैं उनके जीवनानुभव जो उन्होंने भोगे थे। माँ ने कभी कहानी नहीं सुनाई। शायद उनके पास उन अनुभवों का अभाव था जो कहानी कहने के लिए जरूरी होता है, या संभव है कि अपने अनुभवों <img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5111994210947691074" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" src="http://bp0.blogger.com/_g5wsSaKfaXw/RvFzpn1j8kI/AAAAAAAAAB0/J5KeVbZs_zg/s200/24th+july+013.jpg" border="0" />को हमसे बाँटना उचित न समझा हो। बहरहाल, कविता-कहानी से जुड़ाव छुटपन में ही हो गया था। बड़े भाई साहित्य के छात्र थे। जिस साल मैंने गाँव से दसवीं पास किया उसी साल उन्होंने हिंदी साहित्य में एम.ए करने के लिए अपना नामांकन जेएनयू में करवाया था। छुट्टीयों में घर आने पर उन्होंने जेएनयू की बहुत सी बातों के अलावा वहाँ पर पढ़ाई गई कहानियों की चर्चा की थी। वीर भारत तलवार उन्हें कहानियाँ पढ़ाते थे। वे कहते थे कि तलवार जब कहानी पढ़ाते हैं उनके चेहरे पर रसाभास स्पष्ट देखा जा सकता है। कहानी पढ़ाते समय उनका चेहरा सुर्ख हो जाता है । कभी भावुक, कभी आह्लादित तो कभी आवेशित हो उठते हैं।<br /></div><div align="justify"><br />जहाँ से मैं ने एम.ए किया वहाँ कहानी पढ़ाने के नाम पर लीपा-पोती का काम ज्यादा हुआ। वैसे भी कहानी के बारे में अक्सर सुनने को मिलता है कि कहानी पढ़ाने की नहीं, पढ़ने की चीज है। और छात्रों को खुद पढ़ लेने की ‘नेक’ सलाह अधिकांश शिक्षक दिया करते हैं। कुछ साल पहले जब मैं ने जेएनयू में एम. फिल हिन्दी में दाखिला लिया भाई साहब की बातें अनायास याद हो आई थी। मैं ने अनुमति लेकर एम.ए के छात्रों के संग कथा-साहित्य की कक्षाँए की।</div><div align="justify"><br />तलवार जब कहानी पढ़ाते हैं तो पूरी नेम-टेम और नियम-निष्ठा के साथ। कहानी पढ़ाते समय वे इस बात का विशेष ख्याल रखते हैं कि छात्रों की रूचि पाठ में आद्योपांत बनी रहे । विशेषकर नई कहानी पढ़ाते समय वे कहानीकारों के छुए-अनछुए प्रसंगों की चर्चा करते चलते हैं। व्यक्तिगत संस्मरण भी इसमें शामिल रहता है। लेकिन इसके बाद वे हठात कहानी पढ़ाने नहीं लग जाते। कहानीकार की अन्य कहानियों के ताने-बाने से उस कहानी तक पहुँचते हैं, फिर उसके बरक्स कहानी की व्याख्या करते हैं। फिर भी तलवार इस बात को स्वीकार करते हैं कि कहानी कैसे और कहाँ से बताई जाए, उनके लिए हमेशा एक सवाल रहा है। कहानी पढ़ाते समय वे अपने पहनावे का भी खासा ध्यान रखते हैं। कहानी अगर प्रेम कहानी हुई तो उनका पहनावा वैसा नहीं होता जैसा अन्य कहानी पढ़ाते समय। ‘कफ़न’ और ‘रसप्रिया’ के लिए अलग-अलग पहनावा। </div><div align="justify"><br />यहाँ पर एक कहानी ‘कोसी का घटवार’ की चर्चा प्रासांगिक होगा। अदभुत प्रेम कहानी है यह। सच है कि जैसी प्रेम कहानी नई कहानी के दौर में लिखी गई वैसी कहानी हिन्दी साहित्य में दुर्लभ हैं। हां! ‘उसने कहा था’ एक अपवाद कही जाएगी। इस प्रेम में वाचालता नहीं है। पूरी कहानी में प्रेम जैसा कोई शब्द नहीं है। पर स्थायी भाव के रूप में वह पूरी कहानी में व्याप्त है। एक पीड़ा भरी प्रतीक्षा, जिसे नामवर सिंह ने नई कहानी की एक प्रमुख विशेषता कहा है, कहानी पढ़ने-सुनने वालों को देर तक कचोटती रहती है। इस प्रेम में ईर्ष्या नहीं है। द्वेष नहीं है। कोई प्रतिशोध नहीं है। कहानी का पाठ और आलोचना के बाद सवालों का दौर चलता है। छात्रों के सवाल का जबाब आमतौर पर तलवार सीधे नहीं देते। ढूँढों! खोजो! पता लगाओ! उनका प्रिय जुमला है। इस कहानी में एक प्रसंग है –गुसाई ने गौर से लछमा के मुख की ओर देखा। वर्षों पहले ज्वार और तूफान का वहाँ कोई चिह्न नहीं था। यह पूछने पर कि लछमा के चेहरे पर विगत प्रेम प्रसंग की कोई छाप न हो, कोई छाया न उभरे, कोई हलचल न दीखे... यह कैसे संभव है ? अगर प्रेम सच्चा है तो वर्षों बाद भी, एक सीमा में रह कर ही सही, फूटेगा जरूर। कितना ही सामाजिक मान-मर्यादाओं में बँध कर रहे आदमी। तलवार का जबाब था- मैं इस सवाल का जबाब नहीं दूँगा, बेहतर है कहानी के लेखक शेखर जोशी हिन्दी विभाग बुलाये जाएँ और उनसे ही यह सवाल किया जाए।</div><div align="justify"><br />साहित्य अपने समय और समाज से अलहदा नहीं होता । वह हमें यंत्रवत होने से बचाता है। खुद को टटोलने को मजबूर करता है। अगर यह सच है कि प्रेम करने के बाद आदमी पहले जैसा नहीं रह जाता है, तो सच यह भी है कि आदमी अगर संवेदनशील हो तो एक अच्छी कहानी या कविता पढ़ कर वही आदमी नहीं रह जाता है जो उस कविता कहानी पढ़ने के पहले था। साहित्य के अच्छे लेखक, शिक्षक-आलोचक हमारी संवेदनशीलता को बढ़ाते-बचाते हैं। सर्वग्रासी बाजार के इस दौर में विषय के नाम पर चर्चा अर्थशास्त्र, कंप्यूटर या प्रबंधन जैसे विषयों की ही की जा रही है। साहित्य के विभाग विश्वविद्यालयों में हाशिये पर धकेले जा रहे हैं । साहित्य जैसी विषयों की प्रासांगिकता पर प्रश्नचिह्न लगाया जा रहा है। हिंदी-उर्दू के छात्र हीनताबोध की ग्रंथि के शिकार हुए जा रहे हैं। जबकि मानवीय संवेदनाओं को भोथरा होने से बचाने के लिए साहित्य का पठन-पाठन हर दौर में जरूरी है, वर्तमान में कहीं ज्यादा। युवा कवि पंकज चतुर्वेदी के कुछ शब्द ले कर कहें तो- समाज के शरीर में/ एपेन्डिक्स की तरह/ अनावश्यक लगते हुए हैं हम/ फिर भी/ न जाने क्यों/ जरूरी से हैं/ एक संपूर्णता के लिए/ वह अर्थ की हो या व्यर्थता की। </div><div align="justify"></div><div align="justify"><span style="font-size:85%;"><em>(20 सितम्बर 1947 को जन्मे वरिष्ठ आलोचक वीर भारत तलवार जीवन के साठ साल पूरे कर रहे हैं, चित्र में प्रो. तलवार के साथ लेखक। )</em></span> </div>Arvind Dashttp://www.blogger.com/profile/04454157250490714006noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-27324674.post-63734557446081587162007-09-03T02:05:00.000-07:002007-09-03T22:10:06.273-07:00हिंदी पखवाड़े के बहाने हिंदी पर कुछ नोट्स<div align="justify"><strong><span style="color:#ff0000;">हि</span></strong>न्दी है मालिक की<br />तब आज़ादी से लड़ने की भाषा फिर क्या होगी?<br />हिन्दी की माँग<br />अब दलालों की अपने दास-मालिकों से<br />एक माँग है<br />बेहतर वर्ताव की<br />अधिकार की नहीं<br /><br />कवि-पत्रकार रघुवीर सहाय ने बजरिए कविता यह बात तकरीबन पच्चीस-तीस साल पहले कही थी। तब समकालीन भूमंडलीकरण का उड़नखटोला भारत नहीं पहुँचा था। पर ये पंक्तियाँ मौजूदा समय में हिन्दी का सूरते-हाल बखूबी बयाँ करती है। करोड़ो वंचितों, दलितों, स्त्रियों के संघर्ष की भाषा होने के कारण ही महात्मा गांधी जैसे नेताओं ने आजादी के आंदोलन के दौर में राष्ट्रभाषा हिन्दी के पक्ष में पुरजोर ढंग से वकालत की थी। उन्होनें हिन्दी को स्वराज से जोड़ा । आज हिन्दी संघर्ष की भाषा होने की ताक़त खोती जा रही है। आम जन से भाषा की दूरी बढ़ती जा रही है। हिन्दी पर बाजार और संचार के माध्यमों का दबाव है। दशकों से सत्ता की घोर उपेक्षा झेल रही हिन्दी को लेकर भारतीय समाज में गहरी उदासीनता है।<br /><br />भूमंडलीकरण एक ऐसा कनखजूरा है जिसके बावन हाथ हैं। मानव जीवन का कोई पहलू, कोई कोना इससे अछूता नहीं है। 90 के दशक में भारत में उदारीकरण, बाजारीकरण और भूमंडलीकरण की प्रकिया ने अपने साथ संचार क्रांति लेकर आया, या कहना चाहिए कि संचार माध्यमों के रथ पर चढ़ कर ही भूमंडलीकरण ने भारत में अपना पाँव फैलाया। वर्तमान में केबल, इंटरनेट, मोबाइल के माध्यम से एक नई हिंदी गढ़ी जा रही है। यह हिन्दी फिल्मों, सिरीयलों, विज्ञापनों, समाचार पत्रों और खबरिया चैनलों के माध्यम से तेजी से फैल रही है। सच है कि देश-विदेश में हिन्दी की पहुँच इससे काफी बढ़ी है। सच है कि ‘ठंडा मतलब कोका कोला ’ सहज ही लोगों के दिल में जगह बना लेता है । पर यह भाषा भूमंडलीकरण के साथ फैल रही उपभोक्ता संस्कृति की है, विमर्श की नहीं। इस भाषा में लोक-राग और रंग नहीं है जहाँ से हिंदी अपनी जीवनीशक्ति पाती रही है ।<br /><br /><strong>मीडिया और हिन्दी</strong><br /><br />किसी भी भाषा के विकास और प्रचार-प्रसार में संचार माध्यमों का विशिष्ट योगदान रहा है। हिंदी इसका अपवाद नहीं है। उन्नीसवी सदी के आखिरी तथा बीसवीं सदी के शुरूआती दशकों में हिन्दी भाषा, विशेष रूप से हिंदी गद्य के विकास और परिमार्जन में हिन्दी के पत्र-पत्रिकाओं के योगदान का ऐतिहासिक महत्व है। पर पिछले दशकों में हिन्दी के स्वरूप में काफी तेजी से बदलाव हुआ है। खास तौर पर हिन्दी अखबारों में, जिसकी पहुँच भारत के कोने-कोने में बढ़ती ही जा रही है। 90 के दशक में तकनीक उपलब्धता, फैलते बाजार तथा सरकार की उदारीकरण की नीतियों के कारण देश में हिन्दी के दर्जनों खबरिया चैनलों का प्रवेश हुआ। हिन्दी अखबारों की भाषा पर इन चैनलों का खासा प्रभाव दिखता है। 80 के दशक के किसी भी अखबार की सुर्खियाँ दो टूक, स्पष्ट और संक्षिप्त हुआ करती थी। आज अखबारों की सुर्खियाँ चुटीली, मुहावरेदार और अंग्रेजी से छौंकी हुई होती है। बजट और चुनाव जैसी महत्वपूर्ण खबरों को भी मनोरंजक भाषा में प्रस्तुत करने का चलन जोर पकड़ रहा है। मीडिया विशेषज्ञ सुधीश पचौरी हिन्दी अखबारों की इस भाषा शैली का समर्थन करते हैं। एक लेख में वे लिखते हैं कि, “बाजार की शक्तियाँ और उनके सहयोगी माध्यम टीवी ने यह मसला सुलझा दिया है कि कौन सी भाषा जनसंचार में सक्षम है, जो सक्षम है वह बड़ी भाषा है। यह हिंदी है जिसे आप वर्णसंकर, भ्रष्ट, हिंग्रेजी कह सकते है। ” हिन्दी समाचार पत्रों के कई संपादक इस भाषा के पक्ष में दलील देते हुए मिलते हैं। पर सवाल है कि हिन्दी समाज का वह कौन सा वर्ग है जो इस हिंग्रेजी या हिंग्लिश या भ्रष्ट भाषा अपना कर गौरवान्वित हो रहा है, और जिसके प्रतिनिधित्व का दावा हिन्दी के अखबार तथा खबरिया चैनल आज कर रहे है?</div><div align="justify"><br />भाषा महज अभिव्यक्ति का साधन ही नही है। भाषा में मनुष्य की अस्मिता स्वर पाती है। उसमें सामाजिक-साँस्कृतिक चेतना की अभिव्यक्ति होती है। भाषा को प्रवाहमयी कहा गया है। समय के साथ होने वाले सामाजिक-साँस्कृतिक परिवर्तनों की अनुगूँज उसमें सुनाई पड़ती है। भूमण्डलीकरण के बाद हिन्दी के अखबारों में भाषा का रूप जितनी तेजी से बदला है उतनी तेजी से हिन्दी मानस की सामाजिक-साँस्कृतिक चेतना नहीं बदली है। फलतः यह बदलाव अनायास न होकर सायास है। एक खास उभर रहे उपभोक्ता वर्ग को ध्यान में रखकर इस तरह की भाषा ( हिंग्रेजी) का इस्तेमाल किया जा रहा है। यह शहरी नव धनाढ्य वर्ग है जिसकी आय में अप्रत्याशित वृद्धि उदारीकरण, बाजारीकरण और भूमण्डलीकरण के दौर में हुई है। यही वर्ग खुद को इस भाषा में अभिव्यक्त कर रहा है। इस वर्ग में हिन्दी क्षेत्र के बहुसंख्यक किसान, मजदूर, स्त्री तथा दलित नहीं आते।<br /><br /><strong>राजनीतिक स्वार्थपरता के दलदल में </strong><br /><br />हिंदी के साथ शुरू से ही यह विडंबना रही है कि कुछ निहित राजनीतिक स्वार्थों के चलते कभी इसे उर्दू, कभी तमिल तो कभी अंग्रेजी के बरक्स खड़ा किया जाता रहा। स्वाभाविक हिन्दी जिसे बहुसंख्य जनता बोलती-बरतती है, का विकास इससे बाधित हुआ । राजभाषा हिन्दी को वर्षों तक ठस, संस्कृतनिष्ठ, उर्दू-फारसी शब्दों से परहेज के तहत तैयार किया गया। क़ाग़ज पर भले ही राष्ट्रभाषा-राजभाषा हिंदी का विशाल भवन तैयार किया जाता रहा, सच्चाई यह है कि हिन्दी की जमीन लगातार कमजोर होती गई। राजनीतिक स्वार्थपरता, सवर्ण मानसिकता तथा राष्ट्रभाषा-राजभाषा के तिकड़म में सबसे ज्यादा दुर्गति हिंदी की हुई। 1960 के दशक में उत्तर भारत में ‘अंग्रेजी हटाओ’, और दक्षिण भारत में ‘हिंदी हटाओ’ के राजनीतिक अभियान में भाषा किस कदर प्रभावित हुई इसे हिंदी कवि धूमिल ने इन पंक्तियों में व्यक्त किया था-<br />तुम्हारा ये तमिल दुःख<br />मेरी यह भोजपुरी पीड़ा का<br />भाई है<br />भाषा उस तिकड़मी दरिंदे का कौर है।<br /><br />हिन्दी की अस्मिता विभिन्न क्षेत्रीय भाषाओं, बोलियों और उर्दू से मिलकर बनी हैं। कबीर से लेकर बाबा नागार्जुन की कविता इसका दृष्टांत है। जनता की इसी भाषा मे हिंदी के समकालीन रचनाकार साहित्य रच रहे हैं। हिंदी भाषा का विकास और प्रसार इन्हीं बोलियों, क्षेत्रीय भाषाओं के साथ संवाद के माध्यम से संभव है। तब कहीं जाकर सही मायनों में हिंदी अखिल भारतीय भाषा होने का दावा कर सकती है।<br /><br />सरकारी संस्थानों ने, जिनका काम हिंदी के प्रचार-प्रसार में सहयोग देना है, हिन्दी का प्रचार-प्रसार कम, अपकार ज्यादा किया है। आठवें विश्व हिंदी सम्मेलन का गर्दो-गुबार अभी थमा नहीं है। हिन्दी के चर्चित कवि मंगलेश डबराल कहते हैं, “इन आठ सम्मलेनों में हिन्दी का क्या भला हुआ कोई नहीं जानता। ” सरकार और उसके कारिंदे हिंदी को लेकर कितना चिंतित है इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि नामवर सिंह, केदारनाथ सिंह, राजेन्द्र यादव, अशोक वाजपेयी, मंगलेश डबराल जैसे साहित्यकारों ने आठवें विश्व हिंदी सम्मेलन में जाने से इंकार कर दिया। सरकार और उसकी सहयोगी संस्था हर साल बस हिन्दी दिवस मना कर अपने कर्तव्य की इति श्री समझ लेती है। असल में, हिन्दी दिवस के नाम पर सरकारी संस्थानों में हिंदी का मर्सिया पढ़ा जाता है!<br /><br /><strong>शोध की निराशा जनक स्थिति</strong><br /><br />आजादी के साठ सालों के बाद भी समाज विज्ञान, विज्ञान और तकनीक जैसे विषयों पर कोई ढंग का हिंदी में मौलिक लेखन ढूढ़ने पर भी नहीं मिलता। हिंदी में कायदे की कोई शोध पत्रिका नहीं मिलती जिसमें शोध लेख छपवाया जा सके। देश के प्रतिष्ठित उच्च अध्ययन संस्थानों में सारा शोध अंग्रेजी भाषा में हो रहा है। देश की बहुसंख्यक जनता की जिसमें कोई हिस्सेदारी नहीं है। सारा शोध जिन गरीबों, पिछड़ों, दलित-आदिवासियों, स्त्रियों को केंद्र में रख कर किया जाता उसकी पहुँच उन तक कभी भी नहीं हो पाती। पर्यावरणविद् अनुपम मिश्र की ‘आज भी खड़े हैं तालाब’ जैसी किताबें, जिसकी सफलता और पहुँच असंदिग्ध है, उन लोगों पर करारा व्यंग्य है जो इस बात का रोना रोते है कि हिन्दी में लोक-मन को छूने वाली भाषा में साहित्य से इतर कोई रचना संभव ही नहीं है। राजनीतिकशास्त्री रजनी कोठारी ‘भारत में राजनीति’ जैसी किताब की हिन्दी में पुनर्रचना कर एक नई पहल की शुरूआत करते हैं। कभी समाजशास्त्री के.एल शर्मा ने एन सी ई आर टी की समाजशास्त्र की किताब मूल हिन्दी में लिख कर साबित किया था कि स्कूल-कालेज की समाजविज्ञान की किताबें हिंदी में लिखना संभव है। दिक्कत यह है कि हिन्दी क्षेत्र के विद्वान अंग्रेजी और हिंदी दोनों में दक्ष होने के बावजूद हिंदी में लिखने का जहमत मोल नहीं लेते। इसकी वजह सिर्फ आर्थिक नहीं, कहीं गहरे अवचेतन में हिन्दी के प्रति हीनमन्यता बोध से ग्रस्त होना भी है।<br /><br /><strong>अंग्रेजी-हिंदी का द्वंद</strong></div><div align="justify"><strong><br /></strong>भूमंडलीकरण के इस दौर में अंग्रेजी का ऐसा हौव्वा खड़ा किया जा रहा है कि हिन्दी के पक्ष में की गई किसी भी बात को दकियानूसी विचार करार दिया जाता है। निहित स्वार्थ के कारण हिंदी के एजंडे को हिंदी और अंग्रजी के प्रभुवर्गों ने आपसी गठजोड़ कर हथिया लिया है।<br /><br />निस्संदेह अंग्रेजी अंतरराष्ट्रीय संपर्क की भाषा है। आप इस भाषा के माध्यम से एक बड़े समूह तक अपनी बात पहुँचा सकते हैं। इस भाषा की जानकारी भूमंडलीकरण के इस दौर में हमारी जरूरत है। इस बात से शायद ही किसी को कोई गुरेज हो कि अंग्रेजी के बूते अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारतीयों की एक पहचान बनी हैं। पर अंग्रेजी अखिल भारतीय स्वरूप का प्रतिनिधि कभी नहीं कर सकती। देश-विदेश में रह रहे भारतीयों की अस्मिता, उसकी असली पहचान निज भाषा में ही संभव है। कवि विद्यापति ने सदियों पहले इसी को लक्ष्य कर ‘ देसिल बयना सब जन मिट्ठा ’ कहा होगा। अंतरराष्ट्रीय व्यापार में भारत एक बड़ा बाजार है। इस बाजार में हिन्दी में अंग्रेजी के शब्दों को ठूँस कर हिन्दी को विश्व भाषा बनाने की मुहिम आज चल रही है। कई अखबारों में हिंदी को रोमन लिपि में लिखने का प्रयोग जोर पकड़ रहा है। क्या यह हास्यास्पद नहीं कि जो भाषा ठीक से ‘राष्ट्रीय’ ही नहीं बन पाई हो उसे ‘ अंतरराष्ट्रीय ’ बनाये जाने की कोशिश की जा रही है ?<br /><br />20वीं सदी के आरंभिक दशकों में उपनिवेशवाद, साम्राज्यवाद से लड़ कर हिन्दी ने सार्वजनिक दुनिया( पब्लिक स्फ़ियर) में अपनी एक भूमिका अर्जित की थी। इस दुनिया में विभिन्न सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक मुद्दों पर बहस-मुबाहिसा संभव था। आजादी के बाद प्रतिक्रियावादी, सवर्ण प्रभुवर्ग जिनका साठगांठ अंग्रेजी के अभिजनों के साथ था, हिन्दी की सार्वजनिक दुनिया पर क़ाबिज़ होते गये। इससे हिन्दी की सार्वजनिक दुनिया किस कदर सिकुड़ती और आमजन से कटती चली गई प्रो.आलोक राय ने विस्तार से अपनी पुस्तक ‘हिंदी नेशनल्जिम’ में बताया है। एक बार फिर हिन्दी को महज बोल-चाल के माध्यम तक ही सीमित रखने का कुचक्र चल रहा है।<br /><br /><strong>इंटरनेट पर हिन्दी</strong><br /><br />भूमंडलीकरण का सबसे प्रभावी औजार है सूचना । यह सूचना इंटरनेट के माध्यम से पूरे भूमंडल के फासले को चंद लम्हों में नापने का माद्दा रखती है। लेकिन चूँकि सत्ता की भाषा अंग्रेजी है, इंटरनेट की भाषा भी अंग्रेजी ही है। बहरहाल, हिन्दी देर ही सही अंग्रेजी के गढ़ में सेंध लगाने में कामयाब हो रही है। इसका सबूत है विभिन्न वेव साइटों पर मौजूद हिंदी के अखबार और पत्र-पत्रिकाएँ। इससे हिंदी का प्रसार और पहुँच देश-विदेश में तेजी से हो रहा है। साथ ही हाल के दो-एक वर्षों में जिस तेजी से हिन्दी के ब्लौग( चिट्ठे) इंटरनेट पर फैलें है, एक उम्मीद बंधती है कि ‘ठेठ हिंदी का ठाठ’ फिर से जीवित होगा। क्योंकि यहाँ हर लेखक को अपनी भाषा में कहने-लिखने की छूट है। इसका अंदाजा विभिन्न ब्लौगों की भाषा पर एक नजर डालने पर लग जाता है। हाल ही में प्रकाशित एक लेख में प्रसिद्द भाषाकर्मी अरविंद कुमार ने ठीक ही नोट किया है कि, “ आज हिंदी में 500 से ज्यादा चिट्ठे हैं। हिंदी वाले के जोश को देखते हुए एक-दो सालों में यह संख्या 5,000 तक पहुँच जाए तो अचरज नहीं होना चाहिए। ” पर कोई भी तकनीक निर्गुण नहीं सगुण होती है। तकनीक की उपयोगिता उसके इस्तेमाल करने वालों पर निर्भर करती है। सवाल है कि जिस समाज में सूचना तकनीक का इस्तेमाल एक छोटे तबके तक ही सीमित हो, जिस भाषा में कीबोर्ड तक उपलब्ध नहीं वह भाषा-समाज किस तरह इंटरनेट का इस्तेमाल कर आगे बढ़ेगी ? </div><div align="justify"><br /></div><div align="justify"><span style="color:#ff0000;"><strong>बढ़ता कारवाँ</strong><br /></span><br /><span style="color:#ff6666;"><strong>अं</strong></span>तरराष्ट्रीय जगत में भारत एक उभरती हुई आर्थिक शक्ति है। विश्व का एक बड़ा बाजार होने के कारण सबकी निगाहें भारत पर टिकी है। ऐसे में भारत की भाषा, संस्कृति को नजरअंदाज करना किसी भी देश के लिए संभव नहीं है। चीन की मंदारिन के बाद हिंदी विश्व की दूसरी सबसे बड़ी भाषा है (?)। </div><div align="justify"><br />देश और विदेश में तकरीबन 49 करोड़ लोगों द्वारा हिंदी बोली-बरती जाती है। वर्षों पहले दक्षिण अफ्रिका, मॉरीशस जैसे देशों में गए गिरमिटिया अपने साथ अपनी भाषा और संस्कृति भी ले गए। इन देशों में हिन्दी पीढ़ी दर पीढ़ी सहेजी गई। आज अमेरिका, इटली, जापान, चीन आदि देशों के कई विश्वविद्यालयों में हिंदी भाषा एवँ साहित्य का पठन-पाठन हो रहा है। भारतीय उच्च अध्ययन संस्थानों में भी हिन्दी की पढ़ाई करने वाले विदेशी छात्रों की संख्या में उत्तरोत्तर वृद्दि हो रही है। हिंदी मीडिया में बढ़ते रोजगार के कारण इस साल दिल्ली विश्वविद्यालय के नामचीन कॉलेजों में पहले कट ऑफ लिस्ट में ही हिन्दी( आनर्स) की सीटें भर गई थी। जाहिर है कि देश-विदेश में हिंदी पढ़ने वालों की रूचि बढ़ी है। हिन्दी फिल्मों ने वर्षों से हिंदी का प्रचार-प्रसार न सिर्फ देश के अहिंदी भाषी राज्यों में, बल्कि विदेशों में भी काफी किया है। यह अपने आप में स्वतंत्र शोध का विषय है।<br /><br />अंग्रेजी भले ही सत्ता की भाषा हो, पिछले दो दशकों में भारतीय राजनीति में हुए परिवर्तनों ने इसे सत्ताधारियों की भाषा के रूप में स्थापित किया है। हिंदी क्षेत्रों में बढ़ती शिक्षा, हिंदी की ताकत है। अपनी जड़ों से रस लेकर स्वाभाविक रूप से आगे बढ़े, राजनीतिक इच्छा शक्ति यदि बाज़ार की चुनौतियों को स्वीकार करते हुए सही दिशा दें, तो वह दिन दूर नहीं जब हिंदी सचमुच एक विश्व भाषा के रूप में स्थापित होगी। </div>Arvind Dashttp://www.blogger.com/profile/04454157250490714006noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-27324674.post-46848491335430176732007-05-30T00:18:00.000-07:002007-09-03T06:21:54.457-07:00मधुबनी पेंटिंग का अनुपम सौंदर्य<div align="justify"><a href="http://bp2.blogger.com/_g5wsSaKfaXw/Rl1MW438f0I/AAAAAAAAAAs/BOxlyxJPu6Y/s1600-h/अंतरराष्ट्रीय+आतंकवाद.JPG"><img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5070292711596916546" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" src="http://bp2.blogger.com/_g5wsSaKfaXw/Rl1MW438f0I/AAAAAAAAAAs/BOxlyxJPu6Y/s320/%E0%A4%85%E0%A4%82%E0%A4%A4%E0%A4%B0%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%9F%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80%E0%A4%AF+%E0%A4%86%E0%A4%A4%E0%A4%82%E0%A4%95%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%A6.JPG" border="0" /></a> <strong><span style="color:#ff6666;">मि</span></strong>थिला या मधुबनी पेटिंग के नाम से प्रसिद्ध कलाकृतियों को देख कर मन सहसा विद्यापति, बाबा नागार्जुन की कविताओं की ओर भागने लगता है। इन रंगों में मिथिला की लोक संस्कृति रची-बसी है। पिसे हुए चावल, दूध, सिंदूर, और हल्दी के रंगों से मिथिला की औरतें घर की दीवारों पर सदियों से चित्रों को उकेरती रही है। समय के साथ ये चित्र दीवारों से काग़ज पर उतर आये। पहले कोहबर, पूरइन, सामा-चकेवा और देवी-देवता ही इन चित्रों में थे। अब इनमें देश-विदेश की राजनैतिक घटनाएँ और सामाजिक चिंताएँ भी आकार लेती हुई दिखती है। पिछले दशकों में मिथिला पेंटिंग ने अमेरिका, आस्ट्रेलिया, जापान, दक्षिण अफ्रीका जैसे देशों में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है। पर भारत के कलाजगत और कलाप्रेमियों के बीच अब भी यह अपना एक मुकाम तलाश रही है।<br /><br />सदियों पुराने कला के इस रूप को देश-विदेश की मुख्यधारा में लाने का श्रेय विदेशी विद्वानों और कलाप्रेमियों को जाता है। भारतीय प्रशासनिक सेवा के ब्रिटिश अधिकारी डब्लू. जी. आर्चर 1930 के दशक में तस्वीरों के माध्यम से मिथिला पेंटिंग को पहली बार दुनिया के सामने लाए। मिथिला क्षेत्र में 1934 में आये भीषण भूकंप के दौरान क्षतिग्रस्त मकान की दीवारों पर उन्होनें कोहबर, रेल वगैरह के चित्रों को देखा। 1970 के दशक में अमेरिकी मानवशास्त्री रेमण्ड ओएंस और जर्मनी की इरेका मोसर ने मधुबनी पेंटिंग को मिथिला जा कर देखा-परखा और शोध किया। अमेरिका स्थित एथनिक आर्टस फाउण्डेशन ने दिल्ली के इंडिया हैबीटेट सेंटर में एक प्रदर्शनी ‘मिथिला पेंटिंगः एक कला रूप का विकास’ का आयोजन पिछले महीने ( 14-26 जनवरी) किया था । यह संस्था पिछले पच्चीस सालों से मिथिला पेंटिंग का प्रचार-प्रसार कर रही है। संस्था के अध्यक्ष प्रो. डेविड सेण्टन कहते हैं, “मिथिला पेंटिंग में अपार संभावनाएँ हैं। जरूरत है प्रतिभाओं को पहचान कर उन्हें अनुकूल सुविधाएँ मुहैया कराई जाने की।” इस संस्था ने सन् 2003 में मधुबनी में ‘मिथिला कला संस्थान’ की स्थापना की। यह संस्थान हर साल बीस छात्रों को छात्रवृत्ति दे कर मिथिला पेंटिंग को प्रोत्साहित करता है।<br /><br /><br />संस्थान के निदेशक चित्रकार संतोष कुमार दास कहते हैं “गंगा देवी और सीता देवी की राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय प्रसिद्धि के बाद जिस तरह से इस कला को प्रोत्साहन मिलना चाहिए था, वह नहीं मिल पाया। शिक्षा और मूलभूत सुविधायों के अभाव में कलाकार किसी तरह इस पुराने कला रूप को बचाए हुए हैं।” महिलाओं की विशेष उपस्थिति इस पेंटिंग की विशेषता रही है। पीढ़ी दर पीढ़ी परंपरा के रूप में इन्होनें इसे बचाए रखा। राँटी की दलित कलाकार उर्मिला देवी कहती हैं “दिक्कत, सब चीजों का दिक्कत है। खेती-बारी कुछ नहीं है। सरकार कोई सहायता नहीं करती है। किसी तरह हम जी रहे है। बिचौलिए को औने-पौने दाम पर हम अपनी कला बेचने को मजबूर हैं।”<br /><br />इस कला में कायस्थों और ब्राह्मणों की उपस्थिति शुरू से ही रही है पर पिछले कुछ सालों में दलित विशेषकर, दुसाधों ने निजी जीवन की धटनाओं और वीर-योद्धा राजा सलहेस की कहानियों को चित्रों में उतार कर इसे एक नई भंगिमा दी है। ब्राह्मणों की भरनी और कायस्थों की कछनी शैली से इतर दलितों ने गोदना शैली को अपनाया है।<br /><br />मिथिला पेटिंग में अब प्राकृतिक रंगों के बदले एक्रिलिक रंगों का प्रयोग होने लगा है। इससे पेंटिंग के जल्दी बिखरने का खतरा नहीं रहता है। मिथिला के रीति- रिवाजों के साथ अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद , सांप्रदायिकता और भ्रूण हत्या जैसी पेंटिंग को देख कर इसके फैलाव और विकास की झलक मिलती है। पुरूषों की भागेदारी ने इस कला को एक नया तेवर दिया है। पर सवाल है कि मूलभूत सुविधाओं से वंचित कलाकार किस तरह इस कला को जीवित रख पायेंगे ।<br /></div><div align="justify"><em>(राजस्थान पत्रिका,जयपुर से 10 मई 2007 को प्रकाशित</em>)</div><br /><br /><div align="justify"></div>Arvind Dashttp://www.blogger.com/profile/04454157250490714006noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-27324674.post-1165930203267690102006-12-12T05:26:00.000-08:002006-12-12T05:30:03.270-08:00City of Perth<a href="http://photos1.blogger.com/x/blogger/2607/2875/1600/368184/05240058.jpg"><img style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" src="http://photos1.blogger.com/x/blogger/2607/2875/320/862237/05240058.jpg" border="0" /></a>Arvind Dashttp://www.blogger.com/profile/04454157250490714006noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-27324674.post-1165929876737483342006-12-12T05:19:00.000-08:002006-12-13T11:12:08.746-08:00At Curtin University of Technology, Perth<a href="http://photos1.blogger.com/x/blogger/2607/2875/1600/225729/05240048.jpg"><img style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" src="http://photos1.blogger.com/x/blogger/2607/2875/320/999055/05240048.jpg" border="0" /></a>Arvind Dashttp://www.blogger.com/profile/04454157250490714006noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-27324674.post-1165929357687582382006-12-12T05:10:00.000-08:002006-12-12T05:31:58.566-08:00With Film Director Shyam Benegal at the Seminar<a href="http://photos1.blogger.com/x/blogger/2607/2875/1600/256228/05240019.jpg"><img style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" src="http://photos1.blogger.com/x/blogger/2607/2875/320/371482/05240019.jpg" border="0" /></a>Arvind Dashttp://www.blogger.com/profile/04454157250490714006noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-27324674.post-1165523110660821022006-12-07T12:19:00.000-08:002006-12-07T12:29:11.006-08:00Globalisation and Hindi Media<div align="justify">Unprecedented changes have been taking place, in the last two decades, in the realm of media. Hindi media or regional journalism in India is no exception. Global technologies, which paved the way for Information Revolution, are part and parcel of globalisation process. With the onset of liberalisation, privatisation and globalisation in 1991 in India, Hindi journalism gained a new confidence vis-à-vis its English counterparts. It has become global and local at the same time. It is being published from many regional centers with the help of new found technologies. Now packaging and designing is good. Pages have increased drastically. More supplements are coming out.<br /><br />If we compare today’s any Hindi newspaper with that of, say fifteen or twenty years ago, we can conclusively say that it is more market oriented. In other words Hindi journalism is an industry now. What media analyst and critic Adorno and Horkhemier had said of culture industry is becoming true for Hindi journalism today, which had played a leading role in India’s independence struggle. Contents are being determined by the prevailing forces of market and advertising departments. Relationship between production departments and editorial board is fast changing.<br /><br />This paper will analyse the impact of global technologies on Hindi journalism in India, taking Nav Bharat Times, Delhi a prominent Hindi daily, as a case study.<br /><br />( Abstract of the paper titled"Impact of Global Technologies on Hindi Journalism: A<br />Case Study of Navbharat Times, New Delhi" presented at <em>Media: Policies, Cultures and Futures in the Asia Pacific Region Conference</em> organised by MARG at Curtin University of Technology, Perth, Western Australia on 27-29 November 2006)</div>Arvind Dashttp://www.blogger.com/profile/04454157250490714006noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-27324674.post-1161163266071216322006-10-18T02:18:00.000-07:002006-11-02T04:45:18.796-08:00गरीबी को सम्मान<a href="http://photos1.blogger.com/blogger/2607/2875/1600/images[3].jpg"><img style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" src="http://photos1.blogger.com/blogger/2607/2875/320/images%5B3%5D.jpg" border="0" /></a><br /><div align="justify">शांति के संदर्भ में निर्धनता निवारण को नोबल पुरस्कार से सम्मानित करना एक ऐतिहासिक बदलाव का प्रतीक है। यूरोप के देशों में औधोगिक क्रांति और साम्राज्यवाद के फैलाव के बाद आई संपन्नता ने उन्हें गरीबी से उदासीन बना दिया। मध्ययुग की गरीबी की स्मृतियाँ उनके लिए आज कोई मानी नहीं रखता। उन्होंने अशांति को युद्ध से जोड़ कर अपने को मुक्त कर लिया। पर अस्तित्व की रक्षा का सवाल बुनियादी सवाल है जो अशांति का गहरा कारण है।<br />गरीबी का सवाल हर सभ्यताओं के अनुभवों का अहम हिस्सा रही है। टॉलस्टाय से लेकर गाँधी तक ने इसे बखूबी पहचाना। गाँधी ने संपन्नता की बजाय सादगी की तरफ ले जाने वाली नीतियों, मूल्यों पर जोर दिया। धर्म और राजनीति के साझे सरोकार से गरीबी को चुनौती देने की वकालत उन्होंने की।<br />मोहम्मद यूनुस ने समाज के सबसे बुनियादी सवाल गरीबी के सवाल को अपनी नीतियों का हिस्सा बनाया है। इससे पहले गुर्याड मेंडल और अर्मत्य सेन जैसे अर्थशास्त्रियों ने इस सवाल को सामाजिक संपन्नता के लिए जरूरी बताया था पर हमारे राजनेताओं की आँखे नहीं खुली। संपन्नता के सतही सपने- बड़े बाँध, बड़े हवाई अड्डे, महानगर आदि – वे दशकों से लोगों को दिखाते रहे हैं। साथ ही गरीबी में निहित असहायता, आक्रोश की वे अनदेखी करते रहे हैं ।<br />यूनुस के ग्रामीण बैंक में स्त्रियों की केंद्रीय भूमिका है। वर्तमान में बाजार को असीमित महत्व देकर समाज की असली शक्ति समुदाय को पंगु बना दिया गया है । स्त्री का सशक्तीकरण कर ही समुदाय की आधारशिला परिवार को मजबूत बनाया जा सकता है । राष्ट्र के सम्यक् और सम्रग नवनिर्माण के लिए जरूरी है कि इस तरफ ध्यान दिया जाए।<br />भारत और बांग्लादेश कि साझी संस्कृति और तकरीबन एक से सामाजिक और आर्थिक स्थिति के कारण युनूस की अवधारणा भारत के लिए सही बैठती है। भारत में पिछले दो दशकों से यह प्रयोग चल रहा है। भारतीय ग्रामीण बैंक, सेवा( सेल्फ इम्पलॉयड वीमेंस एसोशिऐसन) और परिवर्तन जैसे संगठन इसमें अग्रणी भूमिका निभा रहे हैं ।<br /><br />भूमंडलीकरण के इस दौर में गरीबी उन्मूलन तीसरी दुनिया और नवस्वाधीन राष्ट्रों के नीति निर्माताओं और सरकारों के लिए बड़ी चुनौती है। मोहम्मद यूनुस को सम्मानित करना गाँधी के उस तावीज को दुनिया के सामने लटकाने जैसा है जिसमें उन्होंने स्पष्ट कहा है कि जब भी तुम्हारे मन में अगले कदम के बारे में दुविधा हो उस अंतिम व्यक्ति को याद करो जो अपनी असहायता और अभाव से जुझ रहा है और खुद से सवाल करो कि तुम्हारा यह कदम उसकी सहायता कर पायेगा कि नहीं ? यदि सहायता कर पायेगा तो निस्संदेह आगे बढ़ो।<br /><br />( जेएनयू में समाजविज्ञान के प्रोफेसर आनंद कुमार से अरविंद दास की बातचीत पर आधारित )</div>Arvind Dashttp://www.blogger.com/profile/04454157250490714006noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-27324674.post-1159104974020989062006-09-24T06:24:00.000-07:002006-09-24T06:36:14.030-07:00अरावली की पहाड़ियो पर..<a href="http://photos1.blogger.com/blogger/2607/2875/1600/Foto-Aravali-Guest-House[1].jpg"><img style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" src="http://photos1.blogger.com/blogger/2607/2875/320/Foto-Aravali-Guest-House%5B1%5D.jpg" border="0" /></a>Arvind Dashttp://www.blogger.com/profile/04454157250490714006noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-27324674.post-1159000146549571582006-09-23T01:22:00.000-07:002006-10-05T09:22:21.416-07:00ये क्या जगह है दोस्तो<div align="justify"><strong><span style="color:#33cc00;">छात्र – छात्राओं की खुली दुनिया का जिक्र आते ही जेएनयू का नाम आता है । इसीलिए यहाँ पढ़ने की हसरत हर युवा में होती है । जिनकी साध पूरी हो जाती है वे तालीम के एक नये माहौल से साक्षात्कार करते हैं । साथ ही एक सामुदायिक रिश्ते और चेतना की परिभाषा समझते हैं । यहाँ की इसी खूबी के कारण आज ‘ जेएनयू संस्कृति ’ नाम का जुमला विश्वविद्यालयी संसार में आम हो चुका है । इस संस्कृति और खुले माहौल को करीब से देखने की कोशिश की है </span><span style="color:#ff6666;">अरविंद दास</span> <span style="color:#33cc00;">ने</span> </strong><strong><span style="color:#009900;">। </span></strong><br /><br />नवल – नवेलियों का<br />उन्मुक्त लीला-प्रांगण<br />यह जेएनयू<br />असल में कहा जाए तो कह ही डालूं<br />बड़ी अच्छी है यह जगह<br />बहुत ही अच्छी<br />और क्या कहूँ ।<br /><br /><span style="font-size:130%;color:#ff0000;">बा</span>बा नागार्जुन ने यह बात बजरिए कविता सन 1978 में कही थी । ‘यह जेएनयू ’शीर्षक से लिखी इस कविता में आगे वे इस विश्वविद्यालय में दाखिला लेने की अपनी इच्छा जाहिर करते हैं। नागार्जुन की यह तमन्ना असल में देश के उन युवाओं की हसरत व्यक्त करती हैं जो मानसून के आते ही हर साल इस विश्वविद्यालय के दरवाजे पर दस्तक देने आ जाते हैं ।<br />वैसा ही मंजर है आजकल जेएनयू में । अपने जीवन का सबसे पुरउम्मीद दौर गुजारने के लिए छात्र- छात्राएँ परिसर को गुलजार करने में लगे हैं । एक खुली दुनिया में कदम रखने का अहसास उनके साथ है । इस सत्र में नामांकन शुरू हो चुका है । अकादमिक स्थलों , विभिन्न स्कूलों ,कैंटीन की दीवारों पर चिपके पोस्टरों , इबारतों में नए रंग की खुशबू महसूस की जा सकती है । पुराने छात्र , कामरेड नए छात्र- छात्रओं की नामांकन प्रकिया में बढ़ – चढ़कर सहयोग दे रहे हैं । हां ! जेएनयू में रैगिंग के लिए कोई जगह नहीं। आप बतौर मेहमान यहाँ स्वीकार किए जाते हैं । जेएनयू का यह खास रिवाज पीढ़ी-दर-पीढ़ी कायम है । शायद यहीं से इस संस्थान की विशिष्टता शुरू हो जाती है ।<br />अरावली की पहाड़ियों पर पुराने बरगद, नीम, और पीपल के पेड़ों के बीच बोगनबेलिया, अमलतास और गुलमोहर से सजे जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में अगर आप पहली बार पधारे हैं तो इस बात से शायद ही इंकार करें कि यहाँ की फिजा दिल्ली में हो कर भी ‘दिल्ली में नहीं’ का अहसास कराती है । असल में जेएनयू की एक अलग ही तहजीब है जो इसे अन्य विश्वविद्यालयों से अलग बनाती है । लगता है, यह पंडित नेहरू ख्वाब की वह ताबीर है जिससे जुड़ने का सपना देश के हर कोने का युवा करता है ।<br />भले ही यह संस्थान एक खास खयाल का पोषक कहलाए और इस पर मास्को- बीजिंग की घुट्टी पिलाने का तोहमत लगे, मगर एक जनतांत्रिक माहौल सभी को प्रभावित करता है । पूरी तरह आवासीय इस विश्वविद्यालय में छात्र-छात्राओं और शिक्षकों के रिश्ते भी एक खुलेपने को दर्शाते हैं । इनके आवास को एक –दूसरे के करीब बनाया गया है ताकि एक स्वस्थ, सामुदायिक नाता विकसित हो । यहां का जनतांत्रिक माहौल बनाने में वाद-विवाद और बहस-मुबाहिसों का बड़ा योगदान है । प्रश्न करने की प्रवृति और वाद-विवाद की संस्कृति यहाँ महज कक्षा तक ही सीमित नहीं है, बल्कि देर तक होने वाली पब्लिक मीटिगों और ढाबा तक फैली हुई है ।<br />छोटे शहरों –गाँवों से आने युवाओं के लिए विश्वविद्यालय के शुरूआती दिन तरह-तरह के अनुभव वाले होते हैं । किसी को अंग्रेजीदां, बिंदास लड़कियों की माया भरमाती है तो किसी को यहाँ का इंकलाबी माहौल। कहते हैं यह वह जगह है जहाँ हर साल कई ‘ रामसजीवन ’ बनते हैं। आज यहाँ जिस ‘ अफलातूनी मोहब्बत ’ की बात होने लगी है उनका विकास यों ही चंद दिनों में नहीं हो गया । कई पुराने बताते हैं : ‘हम तो हंसी तो फंसी के फलफसे वाले समाज से आए थे। बड़ा वक्त जाया होने के बाद जाना कि वह हंसी तो और ही कुछ कहती थी। अक्सर ही यह हंसी दोस्ती का आमंत्रण थी। लेकिन आज वक्त बदल चुका है। दूर से आने वाले युवा भी इतनी उम्मीद का भार लेकर नहीं आते कि भरभरा कर गिरने की नौबत आ जाए।<br />हिंदी में पीएचडी कर रही निधि अपना तजुर्बा बताती हैं: ‘शुरू शुरू में जब मैं अपने सहपाठी से बातचीत करती थी तो आभास नहीं था कि वह दोस्ताना संबंध को प्रेम मानने लगेगा। उसे समझाना मेरे वश में नहीं था। आखिर में मुझे दोस्ती तोड़नी पड़ी। ’ हालांकि बिहार-यूपी या सुदूर इलाकों से आने वाले नए छात्र इस बात को मानने को तैयार नहीं कि यहाँ कि चमकीली दुनिया में वे प्रेम और दोस्ती का फर्क ही भूल जाएं। आज के युवा करियर को लेकर ज्यादा खबरदार हैं।<br /><span style="font-size:130%;color:#ff0000;"><strong>बा</strong></span>त मजाक में कही गई है, लेकिन सच है कि जेएनयू बंगाल, त्रिपुरा और केरल के बाद भारत का एक ऐसा राज्य है जहाँ पर मार्क्सवादी व्यवस्था और विचार हावी रहे हैं। शुरूआती दिनों से लेकर अब तक कैंपस के औसत छात्र-छात्राओं और अध्यापकों का रूझान वामपंथी विचारधारा की तरफ दिखता है। यहाँ की दाखिला नीति ही ऐसी है कि जिसमें गरीब, पिछड़े इलाकों से आने से आने वाले छात्रों का प्रवेश आसान हो सके । इसके लिए उन्हें अतरिक्त ‘डेप्रिवेशन पांइट्स ’ दिए जाते हैं। हालांकि 1984 में इस नीति को रद्द कर दिया गया। दस साल बाद 1994 में छात्रों के आंदोलन के बाद यह दाखिला नीति फिर लागू की गई। 2003-2004 के आकादमिक सत्र में 1318 छात्रों का नामांकन हुआ जिसमें से 594 छात्र निम्न तथा मध्य आय वर्ग से थे। 724 छात्र उच्च आय वर्ग से थे। साथ ही 354 छात्र ऐसे थे जिनकी शिक्षा पब्लिक स्कूलों में हुई थी जबकी 964 छात्र ऐसे थे जिनकी शिक्षा म्यूनिसिपल एवं गैर-पब्लिक स्कूलों में हुई।<br />जेएनयू में भले ही खास विचारधारा का फरहरा लहराता रहा, पर बदलाव की हवा यहाँ भी पुरअसर रही। दो दशक पहले यहाँ हिन्दी एक सहमी हुई भाषा थी। आज वह एक ताकत है। कैंपस में व्यवहार की भाषा के रूप में हिन्दी की स्वीकार्यता अंग्रेजी से कम नहीं है। हिन्दी भाषियों के दबदबे के अलावा टीवी चैनलों ने हिंन्दुस्तानी को यहाँ कि सहज भाषा बना दिया है। एक पुराने कामरेड हंसकर कहते हैं कि हमारे वक्त में ‘प्रेम’ करने के लिए अंग्रेजी के शब्दकोश चाटे जाते थे। अब लगता है हिन्दी में भी प्यार किया जा सकता है । यह बात भले ही हल्केपन में कही गई है, पर आमिताभ बच्चन से लेकर टीवी के नामी प्रस्तोताओं, फिल्मी सितारों की हिन्दी ने अपनी भाषा के हक में माहौल तो बना ही दिया है। जेएनयू में हिन्दी को लेकर हीनभावना के दिन लद गए लगते हैं।<br />पहरावे के जिक्र के बिना यहाँ की बात अधूरी ही रहेगी। जिस जींस-कुर्ते और झोले की शोहरत पूरे देश के रोशनख्याल परिसर में रही, उसका जनक जेएनयू ही है। कभी यहाँ पैंट-कोट पहन कर चलने वाला असहज हो जाता था, क्योंकि जेएनयू की फक्कड़ी का श्रृंगार जींस-कुर्ते से ही संभव था। अब बाजारवादी रूझान ने माहौल बदला है। पहरावे चाल-चलन में रंगीनी यहाँ भी आई है। लंबी कारें, मोबाइल एक नया समाज साफ दिखाने लगे हैं। ठाठ का मजाक उड़ाने वाले भी गाड़ियों के मॉडल और माइलेज पर मुबाहिसा करते दिख जाऐंगे। उदारीकरण के जीत का एक नमूना यहाँ भी देखा जा सकता है। हालांकि अभिनव कामरेड सफाई में कहते हैं कि उपभोक्तावादी दौर में हम डिब्बाबंद नहीं रह सकते।<br />बहरहाल जेएनयू के छात्र-छात्राओं की वर्ग चेतना किसी भी संस्थान को पाठ पढ़ा सकती है। ये चेतना उन्हें जाति, धर्म, आय-भेद से ऊपर बौद्धिक स्तर पर एक-दूसरे से जुड़ने को प्रेरित करती है। समाजशास्त्र में एमए कर रहे राजस्थान के बाबूलाल भील बताते हैं: ‘मेरे मन में अपनी आर्थिक-सामाजिक पृष्ठभूमि का ख्याल हर वक्त रहता है, पर सहपाठी, मित्रों, और शिक्षकों ने किसी भी तरह की हीनमन्यता को मेरे अंदर घर नहीं करने दिया।<br />सेंट स्टीफेंस कॉलेज से स्नातक, इतिहास में शोधरत सरोज झा कहते हैं : ‘वहाँ मैं खुद को मिसफिट पाता रहा। एक तरह का ‘स्नाबिश एटीट्यूड’ वहाँ मिलता है। जेएनयू आकर आप अपने समय और समाज से साक्षात्कार करते हैं।’<br />निजी आजादी की भी बड़ी नजीर आपको यहीं मिलेगी। इसका उदाहरण लैंगिक जागरूकता को लेकर बनाया गया फोरम ‘अंजुमन’ है। इसके सदस्य मारियो कहते हैं:मुबंई के जिस कॉलेज से मैंने स्नातक किया था वहाँ ऐसी किसी संस्था के बारे में सोचा भी नहीं जा सकता। यहाँ हर किसी को अपना स्पेस मिला है। मैं अगर समलैंगिक हूँ, इससे दूसरों को क्या परेशानी है ?’<br />लेकिन ऐसा नहीं है कि यह स्पेस मुँहमांगे मिल गया हो। इसके लिए छात्रों ने काफी संघर्ष किया है। कैंपस के अंदर यौन-उत्पीड़न को रोकने के लिए बना संगठन जीएसकैश जिसका उदाहरण है। इसका गठन आठ मार्च 1999 को किया गया। अंतरराष्ट्रीय अध्ययन संस्थान से पीएचडी कर रही ग्रेसी सिंह कहती हैं: यहाँ के छात्रों की बौद्धिक जागरूकता उन्हें पूर्वग्रह से मुक्त करती है। लिंग, जाति,धर्म या क्षेत्र के प्रति किसी भी तरह का भेदभाव छात्रों के मन में नहीं दिखता है।’ इसी प्रकार जाति के आधार पर किसी भी तरह के भेदभाव को रोकने के लिए कैंपस में समान अवसर कार्यालय का गठन किया गया है।<br />विश्वविद्यालय सही मायनों में अखिल भारतीय स्वरूप का प्रतिनिधित्व करता है। केरल से लेकर कश्मीर तक और उत्तर-पूर्व राज्यों से लेकर मध्य भारत के कोने-कोने से यहाँ छात्र शुरूआती दिनों से आते रहे हैं। यह आवासीय परिसर छात्र – छात्राओं को एक-दूसरे को नजदीक से जानने का अवसर देता है। जो कुछ भी भ्रांतियाँ या पूर्वग्रह अन्य जाति या धर्म के प्रति रहते हैं, धीरे-धीरे खत्म होने लगते हैं। अरबी भाषा और साहित्य में शोधरत अताउर रहमान कहते हैं:‘मदरसा से पढ़ने के बाद जामिया मिलिया इस्लामिया में जब मैंने दाखिला लिया, वहाँ अपनों के बीच ही सिमटा रहा। यहाँ आकर पहली बार दुनिया को दूसरों की नजर से देखा।’<br />इसके बावजूद विदेशी छात्रों को अपनी ओर आकर्षित करने में विश्वविद्यालय अभी तक सफल नहीं हो पाया है। एक सत्र में बमुश्किल 50-60 विदेशी छात्र नामांकन लेते हैं। दो साल पहले समाजशास्त्र विभाग ने ग्लोबल स्टडीज प्रोग्राम शुरू किया था जिससे विदेशी छात्रों का आना बढ़ा है। कहना होगा कि विदेशी छात्रों को कैंपस की आबो-हवा में ढलते देर