tag:blogger.com,1999:blog-2693843557556416182.post-56691717226308747312007-05-26T15:50:00.000+05:302007-06-02T21:58:56.735+05:30वो चले आये<span style="font-size:130%;">जब धीरे धीरे खिड़की से रात चली आयी,<br />और सन्नाटे ने अपनी चादर बिछाई,<br />तब कोई नही था मेरे पास,<br />एअक छोटा सा बल्ब था साथ ।<br />दरवाजे कि कुण्डी लगी थी,<br />मेरी डायरी भी टेबल पे पडी थी,<br />टेप रिकॉर्डर धीरे धीरे चल रह था,<br />कि इतने मै मै बत्ती चली गयी,<br />रात का एहसास भी ज्यादा होने लगा,<br />सन्नाटा भी अपनी गाथा कहने लगा,<br />ना कुण्डी खटकी ना आहट हुई,<br />नजाने कहॉ से वो चले आये,<br />इतने अँधेरे मै भी साफ नजर आये,<br />हडबडी मै हम उन्हें बिठा भी ना पाये,<br />और चले गए अपनी राम कहानी सुनाये...<br />आज ये हुआ - आज वो हुआ<br />हमने तुम्हारे बारे मै ये सोचा और ये किया,<br />वो थोडा मुस्कराये,<br />हमने भी अपने दात दिखाए,<br />कि<br />कि इतने मै बत्ती आ गयी ...<br /></span><span style="color:#006600;"><strong><span style="font-size:85%;">5/2/1995</span></strong></span>Yatish Jainhttp://www.blogger.com/profile/14283748451497318321noreply@blogger.com