tag:blogger.com,1999:blog-23692617832862228532008-07-04T00:39:32.460-07:00एक युद्धGopal Kumar Azadhttp://www.blogger.com/profile/17026889315614855803noreply@blogger.comBlogger27125tag:blogger.com,1999:blog-2369261783286222853.post-89200507613466871092008-04-29T03:41:00.000-07:002008-04-29T03:54:00.170-07:00अलगावबाद की आवाजजम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री और पीडीपी नेता मुफ्ती मोहम्मद सईद तथा संसद पर हमले के षड्यंत्र के दोषी एसआर गिलानी का भारत विरोधी रवैया क्या रेखांकित करता है?<strong><span style="color:#ff0000;"> विडंबना यह है कि इस तरह की घटनाओं की पुनरावृत्ति के बावजूद तथाकथित सेकुलर खेमा ऐसी अलगाववादी मानसिकता का समर्थन करता है। क्यों? पिछले दिनों जम्मू के रियासी जिले के महोर में एक जनसभा को संबोधित करते हुए मुफ्ती मोहम्मद सईद ने जम्मू-कश्मीर में भारतीय और पाकिस्तानी मुद्राओं का चलन मान्य कर देने की सिफारिश की।</span></strong> इससे पूर्व पिछले साल जम्मू-कश्मीर सरकार के वित्तमंत्री तारीक हमीद कर्रा (पीडीपी नेता) ने प्रदेश के लिए अलग मुद्रा बनाने की बात उठाई थी। सईद का तर्क है कि जिस तरह यूरोपीय संघ के देशों में व्यापार आदि के लिए एक ही मुद्रा का चलन है उसी तरह घाटी में भी पाकिस्तानी मुद्रा का चलन हो ताकि दोनों देशों के बीच व्यापार के साथ आपसी रिश्ते भी बढ़ें। मुफ्ती मोहम्मद सईद के कुतर्को को आगे बढ़ाते हुए पीडीपी के महासचिव निजामुद्दीन भट्ट ने कहा है कि कश्मीर के स्थाई निदान के लिए पीडीपी का जो स्व-शासन का फार्मूला है, दो मुद्राओं के चलन की बात उसी फार्मूले का आर्थिक पहलू है। यूरोपीय संघ का उदाहरण देते हुए सईद यह भूल गए कि संघ के सभी सदस्य देशों में एक-दूसरे की मुद्रा आपसी रजामंदी से चलती है और यह व्यवस्था किसी एक राज्य या देश के लिए नहीं है। कश्मीर में पाकिस्तानी मुद्रा का चलना जम्मू-कश्मीर पर भारत के दावे को कमजोर करेगा। <strong><span style="color:#ff0000;">मुफ्ती का पाकिस्तान प्रेम छिपा नहीं है। कुछ समय पूर्व उनकी पुत्री और पीडीपी अध्यक्षा महबूबा मुफ्ती ने पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में आतंकवादी प्रशिक्षण प्राप्त युवाओं को भारत आने की छूट देने की मांग की थी। स्वयं मुफ्ती मोहम्मद सईद समय-समय पर घाटी से भारतीय फौज हटाने की मांग भी करते रहे हैं-अर्थात घाटी में आतंकवादियों का स्वागत और सेना का विरोध। कभी सेना हटाने तो कभी सीमाओं को खोल देने की वकालत करने वाले सईद पिछले साठ सालों से पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर को भारत में मिलाने की मांग क्यों नहीं करते? पाक अधिकृत कश्मीर में चल रहे आतंकवादी शिविरों को बंद करने की बात क्यों नहीं उठाते? क्या पीडीपी कश्मीर को भारत का अंग नहीं मानती?</span></strong> क्या दो मुद्राओं के चलन की बात 'दो प्रधान, दो विधान, दो निशान' की अलगाववादी मानसिकता का अंग नहीं है?<br />यदि मुफ्ती मोहम्मद सईद अपने बयान को अलगाववादी मानसिकता का पोषक नहीं मानते तो उनकी भारतीयता संदिग्ध है। देश का एक बड़ा जनमानस मुफ्ती मोहम्मद सईद को कश्मीरी आतंकवाद का जन्मदाता मानता है। केंद्रीय गृहमंत्री रहते हुए मुफ्ती मोहम्मद सईद की पुत्री रूबिया का अपहरण और रिहाई के बदले बर्बर आतंकवादियों को छोड़ा जाना इस आशंका के पुख्ता आधार है। संसद पर हमले के आरोप में जब गिलानी को गिरफ्तार किया गया था तब सेकुलर बुद्धिजीवियों का एक बड़ा वर्ग उनके समर्थन में आ खड़ा हुआ था। जांच एजेंसियों और न्यायपालिका पर कीचड़ उछाला गया और गिलानी की राष्ट्रभक्ति के कसीदे काढ़े गए, किंतु पिछले दिनों बरेली की एक संस्था 'पैगामे अमन' द्वारा आयोजित एक सेमिनार में गिलानी ने जो कहा उससे प्रत्येक राष्ट्रभक्त मुसलमान को भी पीड़ा हुई होगी और इसलिए आयोजकों को गिलानी के विचारों से अंतत: असहमति व्यक्त करनी पड़ी। <strong><span style="color:#ff0000;">गिलानी ने कहा था, ''मैं भारतीय नहीं हूं। न ही भारत से मेरा कोई ताल्लुक है। मैं कश्मीरी हूं और कश्मीर भारत का हिस्सा नहीं है। कश्मीर में जो लोग लड़ रहे है वे आतंकवादी नहीं है। कश्मीर के लोगों की नजर में वे जननायक है।'' गिलानी ने आतंकवादियों की तुलना भगत सिंह से कर डाली।</span></strong> आगे उन्होंने भारत की न्याय व्यवस्था को कोसते हुए आरोप लगाया कि अफजल गुरू के खिलाफ कोई प्रमाण नहीं होने के बावजूद न्यायपालिका केवल जनभावनाओं को ध्यान में रखकर उसे फांसी पर लटकाना चाहती है। उच्चतम न्यायालय ने जब संसद पर हमले के मुख्य आरोपी अफजल गुरू को फांसी दिए जाने का आदेश दिया था तो तमाम 'सेकुलरवादी दलों' का राष्ट्रविरोधी चेहरा भी सामने आ गया था। जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री गुलाम नबी आजाद सहित पीडीपी की नेता महबूबा मुफ्ती उसके बचाव में आ खड़ी हुई थीं। आजाद ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर फांसी की सजा नहीं दिए जाने की अपील की थी। अलगाववादी संगठनों के नेतृत्व में घाटी में व्यापक विरोध प्रदर्शन किया गया। इन सबका ही परिणाम है कि आज भी अफजल सरकारी मेहमान बना हुआ है और सेकुलर संप्रग सरकार फांसी की सजा माफ करने की जुगत में लगी है। संसद पर हमला करने आए आतंकवादियों की कार में लगे गृह मंत्रालय के जाली स्टीकर पर यह वाक्यांश लिखा मिला थे-''भारत बहुत बुरा देश है और हम भारत से घृणा करते है। हम भारत को नष्ट करना चाहते है और अल्लाह के फजल से हम ऐसा करेगे। अल्लाह हमारे साथ है और हम अपनी ओर से पूरी कोशिश करेगे।'' गिलानी के ताजा बयान के बाद भी यदि सेकुलर खेमा गिलानी और अफजल जैसे देशद्रोहियों की वकालत करता है तो उनकी राष्ट्र निष्ठा पर संदेह स्वाभाविक है। गिलानी दिल्ली विश्वविद्यालय में अरबी और फारसी पढ़ाता है। उसके नियुक्ति पत्रों की जांच होनी चाहिए और यदि उसने अपनी नागरिकता भारतीय बताई है तो उसे अविलंब बर्खास्त कर देना चाहिए। ऐसे देश द्रोही बतौर अध्यापक नवयुवकों को नफरत और अलगाववाद के सिवा और क्या शिक्षा दे पाएंगे? जम्मू-कश्मीर में कांग्रेस और पीडीपी की गठबंधन वाली सरकार है। विधानसभा चुनाव निकट आते देख पीडीपी का पाकिस्तान प्रेम और अलगाववादी ताकतों को समर्थन देना आश्चर्यजनक नहीं है। अब यह पूरी तरह स्पष्ट है कि मुफ्ती मोहम्मद सईद के बयान की निंदा करने से कतराती कांग्रेस भी वस्तुत: चुनाव को देखते हुए अलगाववादी ताकतों को नाराज नहीं करना चाहती। आखिरकार धारा 370 कांग्रेस की ही तो देन है। पीडीपी का उद्देश्य वस्तुत: 'स्थायी निवासी विधेयक' जैसे कानूनों से धारा 370 की और अधिक किलेबंदी कर जम्मू-कश्मीर को शेष भारत से हमेशा के लिए अलग कर देना है। जम्मू-कश्मीर की वृहत्त स्वायत्तता की मांग इसी दृष्टिकोण को रेखांकित करती है। 'यदि कश्मीर की जनता भारत के साथ नहीं रहना चाहती है तो हम उन्हे उनकी इच्छा के विरुद्ध मजबूर नहीं करेगे,' मार्च 1948 के अपने भाषण में पंडित नेहरू ने श्रीनगर में जो बात कही थी उसका अक्षरक्ष: पालन यदि पीडीपी या कांग्रेस कर रही है तो इसमें आश्चर्य की बात क्या है? 'माई फ्रोजन टरबुलेंस इन कश्मीर' नामक पुस्तक में लेखक जगमोहन ने लिखा है, <strong><span style="color:#ff0000;">''द्वि-राष्ट्र सिद्धांत से जन्मा पाकिस्तान अपने संसाधनों पर जीवित है, किंतु यहां कश्मीर में धारा 370 और स्वायत्तता का मुद्दा इस तरह घालमेल कर बनाया गया है कि भारतीय धन से ही एक सल्तनत या छोटा पाकिस्तान पोषित किया जा रहा है।'' पं. नेहरू की अदूरदर्शिता से जन्मा कश्मीर संकट यदि आज नासूर बना है तो इसके लिए सेकुलर जमात ही प्रमुख कारण है, जो राष्ट्रीय हितों को भी वोट बैंक के पलड़े में तौलता</span></strong> है।<br /><br />लिया गया : दैनिक जागरण संपादकीय २९/०४/२००८Gopal Kumar Azadhttp://www.blogger.com/profile/17026889315614855803noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-2369261783286222853.post-36965590239710271592008-03-07T02:53:00.000-08:002008-03-07T03:03:59.708-08:00आतंक और हमदेश में जब कभी कोई आतंकवादी हमला होता है, तो हमले के लिए जिम्मेदार लोगों या उनके संगठनों अथवा हमलावरों को पनाह देने वाले मुल्क या मुल्कों के नाम रेडिमेड तरीके से सामने आ जाते हैं। आतंकवादियों को कायर, पीठ में छुरा घोंपने वाले या बेगुनाहों का हत्यारा कहकर केंद्र और राज्य सरकारें तयशुदा प्रतिक्रिया व्यक्त कर देती हैं। हमारे नेता भी ऊंची आवाज में चीखकर कहते हैं कि आतंकवाद के साथ सख्ती से निपटा जाएगा।<br />घटनास्थल के दौरे के साथ ही सभी बड़ी-बड़ी बातें खत्म हो जाया करती हैं, और यह श्रंखला आतंकवादियों की अगली करतूत होने पर फिर शुरू हो जाती है, यही सिलसिला चलता रहता है। लोगों ने अब यह भी कहना शुरू कर दिया है कि बढ़-चढ़कर किए गए ऐसे दावों में कोई दम नहीं होता। कुछ लोगों ने मुझसे यहां तक कहा कि अखबारों में छपे ऐसे सियासी बयानों को हम पढ़ते तक नहीं।<br /><strong>25 अगस्त को हैदराबाद के एक एम्यूजमेंट पार्क और फिर एक मशहूर चाट की दुकान पर कुछ ही मिनट के अंतर से एक के बाद एक हुए दो विस्फोटों में पचास से अधिक लोग मारे गए और 75 घायल हो गए</strong>। <strong><span style="color:#ff0000;">राज्य व केंद्र सरकार ने इस हादसे के लिए भी, हर बार की तरह सरहद पार से आए आतंकियों को जिम्मेदार ठहराया। हालांकि इन विस्फोटों के पीछे इस्लामाबाद का हाथ होने संबंधी भारत के आरोप को नकारते हुए पाकिस्तान ने कहा है कि यह आतंकवादियों का कृत्य है और हम इसकी निंदा करते हैं।</span></strong> हम खुद आतंकवाद के शिकार हैं और इसके खिलाफ लड़ने के लिए वचनबद्ध हैं। पाक के मुताबिक अटकलें लगाने की बजाय जांच करना हमेशा बेहतर होता है।<br />अपनी ही जमीन पर आतंकवाद के जिस दानव को उसने खड़ा किया था उसे पाकिस्तान काबू नहीं कर पा रहा है। इस तथाकथित जेहाद ने जिन्हें जन्म दिया है, वही लोग भारत में आतंकी गतिविधियों को अंजाम दे रहे हैं। पाक ने हवा के बीज बोए थे, इसीलिए उसे बवंडर की फसल मिली है।<br />हमारा देश आतंकवाद की सर्वाधिक गंभीर समस्या का सामना कर रहा है। सरकार के आतंकवाद विरोधी प्रयासों में तेजी और मजबूती लाने के लिए हमें आतंकवाद के आधार को निष्क्रिय करने वाले तथा आतंकी हमलों को शुरू होने से पहले ही रोकने वाले अधिक बुनियादी तरीके को अपनाने की तत्काल जरूरत है। मगर सबसे पहले सरकार को यह तय करना होगा कि आंध्रप्रदेश, असम और जम्मू-कश्मीर में उसका प्रस्ताव ठुकरा देने वाले आतंकियों को क्या वह बातचीत के लिए आमंत्रित करना चाहेगी। <strong><span style="color:#ff0000;">अगर सरकार सख्त रवैया अपनाए और आतंकियों के आगे घुटने न टेकने के संकेत दे, तो देश के नागरिक पूरी तरह से सरकार का साथ देंगे।<br /></span><span style="color:#ff0000;">सरकार खुद कहती है कि देशभर में आईएसआई के एजेंट सक्रिय हैं। तो फिर इन्हें खोजने और इनकी घुसपैठ रोकने के लिए सरकार खुफिया एजेंसियों को निर्देश क्यों नहीं देती।</span></strong> विदेश में प्रशिक्षित कोई आतंकी जब भारत या किसी महानगर में आता है, तो उसे रहने की जगह, अधिक से अधिक नुकसान के लिए हमला करने की जगह तक आने-जाने का साधन और संपर्क के लिए मोबाइल फोन के रूप में स्थानीय सहयोग की जरूरत होती है। निश्चित ही उसका कोई स्थानीय मेजबान होता है। खुफिया एजेंसियों को अधिक कुछ करने की जरूरत नहीं है, सिर्फ ऐसे सहयोगियों को खोजकर उन्हें पकड़ना है।<br />सबसे बड़ी चुनौती यह है कि ऐसे आतंकी संगठनों से मुल्क को किस तरह बचाया जाए जिन्हें किसी की जान लेने में कोई संकोच नहीं है और न ही अपने मकसद के लिए जान दे देने का ही कोई डर है। भारी- भरकम फौज का जमावड़ा, परमाणु संहार, अमेरिका की तरह ‘स्टार वार’ शैली और एंटी मिसाइल कवच जैसी रक्षा की पारंपरिक रणनीतियां तेजी से अनुपयोगी होती जा रही हैं और हमला कर भागने वाले आतंकियों को रोक पाने में अक्षम या कम सक्षम हैं। <strong><span style="color:#ff0000;">‘पैटर्न्स ऑफ ग्लोबल टैरेरिज्म’ नामक वार्षिक अमेरिकी रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2000 और 2003 के बीच दुनियाभर में की गईं आतंकी घटनाओं में से 75 फीसदी भारत में हुईं। यह मानना सही होगा कि इनमें से कई हमले, खासतौर पर कश्मीर में हुए हमलों के लिए ऐसे संगठन जिम्मेदार हैं जिनका ठिकाना पाकिस्तान में है। और समर्थन हिंदुस्तान के ही नासूर मुस्लिमों द्वारा दिया जा रहा है ताकि वो घटना को अंजाम देकर आसानी से हिंदुस्तान में अपने शुभचिंतक मुस्लिम जेहादी के यहाँ आराम से शरण पाते हैं और अगर उसके घर की तलाशी ली जाये तो पुलिस के ऊपर मुस्लमान को तंग करने का इल्जाम लगाते हैं<br /></span></strong>रिपोर्ट के मुताबिक भारत में 203 अंतरराष्ट्रीय आतंकी हमले हुए जबकि चीन में एक भी नहीं। यह उस विचार से संबंधित कुछ वास्तविक समस्याएं हैं जिसके मुताबिक-लोकतंत्र सोचने व करने की ऐसी आदतें विकसित कर देगा जिनके चलते आतंकवाद से जुड़ने का इरादा कम हो जाएगा। मगर इनके अलावा तार्किक समस्याएं भी हैं। उदाहरण के लिए आतंकी आमतौर पर हाशिए के ऐसे समूहों का प्रतिनिधित्व करते हैं जिन्हें मुख्यधारा की आबादी से नहीं के बराबर सहयोग हासिल होता है। इस तथ्य की जानकारी के बावजूद वे मानते हैं कि उनकी राह सही है- शायद उन्हें विश्वास होता है कि उनके मकसद को ईश्वर ने अधिकृत कर रखा है।<br />भारत हमारा वतन है और इसकी रक्षा में योगदान देना हममें से हर एक का कर्तव्य है। किसी बस स्टॉप पर या आसपास, रेलवे स्टेशन या सबवे स्टेशन पर किसी संदिग्ध व्यक्ति या कुछ असामान्य दिखने पर कोई सूचना नहीं देता इसीलिए अधिकांश आतंकी बम विस्फोट होते हैं। अगर आप कुछ देखते हैं, तो कुछ कहिए, इस तरह की आसान प्रतिक्रिया खतरों को काफी कम कर सकती है। ऐसी सूचना देने की पहल करने वाले व्यक्ति को सरकार परेशान न करे। ऐसी सूचना किसी आतंकी घटना को होने से रोक सकती है। आतंकवाद के खिलाफ लड़ने के लिए प्रत्येक नागरिक को कानून लागू करवाने वाली एजेंसियों की आंख और कान की तरह काम करना होगा।Gopal Kumar Azadhttp://www.blogger.com/profile/17026889315614855803noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-2369261783286222853.post-19154966006214998342008-03-07T02:33:00.000-08:002008-03-07T02:53:11.977-08:00दारुल उलूम का मुस्लिम सम्मेलन की सच्चाईदारुल उलूम का मुस्लिम सम्मेलन खासी चर्चा में है। बेशक पहली दफा किसी बड़े मुस्लिम सम्मेलन में आतंकवाद की निंदा की गई, लेकिन आतंकवाद के आरोप में जेल में बंद <strong>'असंख्य निर्दोष मुस्लिमों पर हो रहे असहनीय अत्याचारों' पर गहरी चिंता भी जताई गई। आल इंडिया एंटी टेररिज्म कांफ्रेंस की दो पृष्ठीय उद्घोषणा में आतंकवाद विरोधी सरकारी कार्रवाइयों को भेदभाव मूलक कहा गया। इसके अनुसार निष्पक्षता, नैतिकता और आध्यात्मिक मूल्यों वाले भारत में वर्तमान हालात बहुत खराब है। सम्मेलन ने आरोप लगाया कि इस वक्त सभी मुसलमान, खासतौर से मदरसा प्रोग्राम से जुड़े लोग दहशत में जी रहे है कि वे किसी भी वक्त गिरफ्तार हो सकते है। सम्मेलन में सरकारी अधिकारियों पर असंख्य निर्दोष मुस्लिमों को जेल में डालने, यातनाएं देने और मदरसों से जुड़े लोगों को शक की निगाह से देखने का आरोप भी जड़ा गया। सम्मेलन ने भारत की विदेश नीति और आंतरिक नीति पर पश्चिम की इस्लाम विरोधी ताकतों का प्रभाव बताया। देश दुनिया के मुसलमानों से हमेशा की तरह एकजुट रहने की अपील की गई।</strong> ऐलान हुआ कि सभी सूबों में भी ऐसे ही जलसे होंगे। सरकार के कथित मुस्लिम विरोधी नजरिए के संदर्भ में अवाम को बताया जाएगा।<br />सम्मेलन की उद्घोषणा दरअसल आतंकवाद से जारी संघर्ष की हवा निकालने वाली है। <strong><span style="color:#ff0000;">जाहिर है कि जलसे का मकसद दीगर था। आतंकवाद की निंदा की वजहें भी दूसरी थीं। निगाहे मुस्लिम एकजुटता पर थीं,</span></strong> निशाना आतंकवाद से लड़ रहा राष्ट्र था। इराक, अफगानिस्तान, फलस्तीन, बोस्निया और दक्षिण अमेरिकी देशों के मुस्लिम उत्पीड़न की चर्चा की गई। <strong>जेहाद के नाम पर मारे गए हजारों भारतीय निर्दोषों, श्रृद्धा केंद्रों, कचहरी और मेला बाजारों में मारे गए नागरिकों के बारे में शोक संवेदना का एक लफ्ज भी इस्तेमाल नहीं हुआ। आतंकवाद से लड़ते हुए मारे गए सैकड़ों पुलिस जवानों/ सैनिकों की तारीफ के बजाय पुलिस व्यवस्था को ही भेदभाव मूलक बता दिया गया।</strong> <strong><span style="color:#ff0000;">आतंकवाद के आरोपों में बंद 'असंख्य निर्दोष मुस्लिम' वाक्य का इस्तेमाल भारतीय राष्ट्र-राज्य की घोर निंदा है।</span></strong> सम्मेलन की राय में यहां असंख्य मुसलमानों को बेवजह फंसाया जा रहा है। उन पर लगे सारे आरोप मनगढ़ंत है। सम्मेलन के मुताबिक देश के असंख्य मुसलमानों की जिंदगी तबाह है। वे प्रतिपल दहशत में हैं। उन्हे यहां सामान्य नागरिक अधिकार भी प्राप्त नहीं है। <strong><span style="color:#ff0000;">आतंकवाद विरोधी सरकारी कार्रवाई को मुस्लिम विरोधी बताने का काम अध्यक्षीय भाषण में भी हुआ।</span></strong> सम्मेलन के अध्यक्ष मुहम्मद मरगूबउर्रहान ने फरमाया, ''आतंकवादी कार्रवाई के सिलसिले में दोषी या कम से कम संदिग्ध करार देने के लिए न तो किसी विचार-विमर्श की आवश्यकता महसूस की जाती है, न किसी सावधानी से काम लिया जाता है और न तथ्य और प्रमाण इकट्ठा करने का कोई गंभीर प्रयास किया जाता है। उनको दोषी बताने के लिए केवल इतना ही आवश्यक समझा जाता है कि वे मुसलमान है।''<br />मौलाना ने आतंकवाद से निपटने में खास सतर्कता की जरूरत भी बताई। उन्होंने कहा कि इतिहास में अक्सर ऐसा हुआ है कि सरकार के दोषी हीरो कहलाए है-खासतौर से वे जिनके कट्टरवादी व्यवहार के कारण सरकार की ओर से अन्याय और अत्याचार हो। इतिहास के इस तथ्य पर नजर रखते हुए ऐसा काम न किया जाए जिसकी प्रतिक्रिया आतंकवाद के रूप में हो। <strong><span style="color:#ff0000;">यानी आतंकवाद के विरुद्ध नरमी से पेश आना चाहिए, अन्यथा इसकी प्रतिक्रिया में आतंकवाद और भड़केगा। केंद्र सरकार की नरम नीति उलेमा की हिदायत से मिलती-जुलती है।</span></strong> बावजूद इसके केंद्र पर असंख्य निर्दोष मुस्लिमों को जेल में बंद रखने के आरोप भी लगाए। दरअसल, मजहब और पंथ का उदय देश, काल और परिस्थिति में ही होता है। वे प्रत्येक देश, समय और परिस्थिति में उपयोगी नहीं होते। मजहब-पंथ का काम मानवीय सद्गुणों का विकास ही है। दर्शन और विज्ञान यही काम 'सत्य दिखाकर' करते है। पंथ और मजहब यही काम अकीदत और आस्था के जरिए करते हैं। मौलाना ने इस्लाम की तारीफ की। ठीक किया। यह भी कहा कि इस्लाम निष्पक्षता, न्याय और दया की सीख देता है। <strong>उन्होंने कुरान के हवाले से कहा कि इस्लाम में गवाही देते समय परिवार और संबंधी का मोह भी छोड़ने की हिदायत है। वह भूल गए कि कुरान की इसी आयत के बाद कहा गया है, ''जो ईमानवालों/मुसलमानों को छोड़कर इनकार करने वालों को अपना दोस्त बनाते हैं, क्या उन्हे प्रतिष्ठा की तलाश है।'' आगे हिदायत दी गई, ''ऐ ईमानवालो! इनकार करने वालों को अपना मित्र न बनाओ।'' यह भी कहा गया कि जो इस्लाम के अलावा कोई और दीन तलब करेगा उसकी ओर से कुछ भी स्वीकार न होगा और अंतत: वह घाटे में रहेगा।</strong><br /><strong><span style="color:#ff0000;">सह-अस्तित्व और समझौते की बातें भी अध्यक्षीय भाषण में कही गईं, लेकिन कुरान में साफ हिदायत है, ''तुम अपने दीन के अनुयायियों के अलावा किसी पर भी विश्वास न करो।''</span></strong> इस्लामी विचारधारा दुनिया के सभी मनुष्यों को दो हिस्सों में बांटती है। पहला, ईमानवाले यानी मुसलमान और दूसरे वे जिन्होंने इनकार किया। <strong><span style="color:#ff0000;">कुरान में बताया गया कि इनकार करने वालों से कह दो कि वे बाज आएं तो क्षमा है। यदि वे फिर भी वही करेगे तो जैसा पूर्ववर्ती लोगों के लिए किया गया, वही रीति अपनाई जाएगी। उनसे युद्ध करो, यहां तक कि फितना भी बाकी न रहे और दीन पूरा का पूरा अल्लाह के लिए हो जाए।</span></strong> सम्मेलन ने जिन फलस्तीन, इराक आदि का जिक्र किया है वहां इस्लाम के पहले क्या था? भारत नाजुक दौर में है। मौलाना ने बजा फरमाया कि <strong><span style="color:#ff0000;">आतंकवाद हमारे देश की मूल समस्या नहीं है, लेकिन उन्होंने गलत कहा कि यह साम्राज्यवादी देशों द्वारा फैलाया गया। प्राचीन अरब और अरबी सभ्यता पर पहला हमला इस्लामी विस्तारवाद ने ही किया। ऋग्वेद की निकटतम जेंदअवेस्ता वाली महान ईरानी सभ्यता भी इस्लामी हमले में तबाह हुई। यूरोप में स्पेन तक हमला हुआ। इस्लामी विस्तारवाद को भारत और स्पेन में ही टक्कर मिली, जबकि सीरिया, मिस्त्र, फलस्तीन और ईरान तबाह हो गए। मुहम्मद बिन कासिम से लेकर तराई (1192 ई.) की लड़ाई तक वे यहां अपनी स्थायी हुकूमत नहीं बना पाए।<br /></span>इस्लामी गलबे के खिलाफ पृथ्वीराज चौहान, महाराणा प्रताप, गुरु तेग बहादुर, शिवाजी और गुरु गोविंद सिंह सहित हजारों लोग न लड़े होते तो भारत भी फलस्तीन, मिस्त्र, यूनान, ईरान और मध्य एशिया के तमाम इलाकों की तरह प्राचीन संस्कृति और इतिहास से शून्य होता?</strong> मुस्लिम सम्मेलन ने विश्वव्यापी इस्लामी विस्तारवाद की चर्चा नहीं की। <strong>पाकिस्तान द्वारा मुसलसल भारत भेजे जा रहे आतंकवादी गिरोहों पर भी कोई बात नहीं हुई। पाक आतंकी डेली पैसेंजरी नहीं करते। वे भारत के ही लोगों द्वारा सहायता पाते हैं। सम्मेलन ने भारत के ऐसे राष्ट्रद्रोही तत्वों की आलोचना नहीं की</strong>। बावजूद इसके लोग खुश हैं कि सम्मेलन ने आतंकवाद के विरुद्ध बोलकर भारत पर भारी कृपा की है। <strong>विद्वान प्रधानमंत्री बुरे फंसे। वे मुस्लिम सर्वोपरिता और तुष्टीकरण का संगीत बजा रहे है। ये है कि तमाम नाजायज कोशिशों के बावजूद रुष्ट है, तुष्ट होने का नाम भी नहीं लेते और 'असंख्य निर्दोष मुस्लिमों' को जेल में यातना देने का आरोप भी लगा रहे है।</strong>Gopal Kumar Azadhttp://www.blogger.com/profile/17026889315614855803noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-2369261783286222853.post-8282210592607027492008-03-07T02:26:00.000-08:002008-03-07T02:32:08.252-08:00पाकिस्तान राष्ट्र नहीं है।<p>पाकिस्तान राष्ट्र नहीं है। यह कट्टरपंथी जेहादी और विश्व आतंकवाद की प्रापर्टी है। पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी का मालिकाना मसला वसीयत से सुलट गया। 'प्रापर्टी पाकिस्तान' को लेकर मुसलसल जंग है। यहां कोई संप्रभु संवैधानिक सत्ता भी नहीं है। <strong>सिर्फ 60 साल की उम्र के इस मुल्क ने 4 संविधान बनाए। 32 साल तक सेना का राज रहा। इसके अलावा भी 10 साल तक सेना ने ही परोक्ष हुकूमत की, सिर्फ 18 साल ही अप्रत्यक्ष लोकतंत्र रहा। अभी भी सेना का ही राज है।</strong> बेनजीर भुट्टो की हत्या कोई अस्वाभाविक घटना नहीं है। पांच माह पहले ही लाल मस्जिद में कार्रवाई हुई थी। इसके पहले न्यायपालिका का सरेआम कत्ल हुआ। पाकिस्तान जेहादी आतंकवाद की विश्वविख्यात यूनिवर्सिटी है। <strong>{येही है इसलाम और इस्लामी सल्तनत }</strong></p><p><strong><span style="color:#cc0000;">रक्त पिपासु जेहादी आतंकियों पर आईएसआई और सेना का कवच है। आईएसआई और जेहादी आतंकियों के साथ कट्टरपंथी मौलानाओं की दुआएं है। भारत सबका दुश्मन नंबर एक है, लेकिन भारतीय हुक्मरान इससे बेखबर है।</span></strong> पाकिस्तान के जन्म का आधार मजहबी अलगाववाद था। राष्ट्र मजहब से नहीं बनते। राष्ट्र निर्माण का आधार संस्कृति होती है। मजहबी अलगाववादियों ने अपनी प्राचीन सांस्कृतिक विरासत को नहीं स्वीकारा। नई संस्कृति का निर्माण वे कर नहीं पाए। उन्होंने प्राचीन भारतीय इतिहास को भी खारिज किया। नया झूठा इतिहास लिखा गया। <strong>नई पीढ़ी ने भारत को शत्रु पढ़ा। मदरसे जेहाद सिखाने का केंद्र बने। मदरसा तालीम का विरोध बेनजीर ने किया था। अमेरिकी दबाव में मुशर्रफ ने भी किया था, लेकिन जहर मदरसों के आगे भी था। प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो के सलाहकार रहे इतिहासकार केके अजीज ने 'द पाकिस्तानी हिस्टोरियन' नामक शोध में पाकिस्तानी पाठ्य पुस्तकों के जहर की शिनाख्त की है। अजीज की किताब के मुताबिक कक्षा 2 की पाठ्य पुस्तक में उल्लेख है-''पं. नेहरू ने कहा कि आजादी के बाद हिंदुस्तान में हिंदुओं की सरकार होगी। कायदे आजम जिन्ना ने कहा कि यहां मुसलमान भी रहते हैं। मुसलमानों को अलग हुकूमत चाहिए।'' हिंदू विरोध के ही नजरिए से तैयार कक्षा 3 की पाठ्य पुस्तक में लिखा है, ''राजा जयपाल ने महमूद गजनवी के मुल्क में घुसने की कोशिश की। महमूद ने राजा को हरा दिया, लाहौर को हथिया लिया और इस्लामी हुकूमत कायम की।'' सच बात यह है कि पंजाब कभी इस्लाम राज्य नहीं था। महमूद आक्रांता और लुटेरा था। पाकिस्तान की नई पीढ़ी उसे हीरो पढ़ रही है। कक्षा 4 की किताब के अनुसार ''जब अंग्रेज ने इलाके पर हमला किया तो मुसलमानों के खिलाफ गैर मुसलमानों ने उनका साथ दिया। अंग्रेजों ने सारा मुल्क फतेह किया।'' कक्षा 5 की किताब में उल्लेख है-''मुस्लिम और हिंदू सभ्यताओं में विवाद हुआ। आजाद मुल्क (पाकिस्तान) की जरूरत हुई। पाकिस्तान का सिद्धांत आया। भारत (हिंदुओं) की दुष्टता थी। सर सैय्यद अहमद खां ने ऐलान किया कि मुसलमानों को एक अलग राष्ट्र के रूप में संगठित करना चाहिए।'' किताबों में 1965 के भारत-पाक युद्ध में पाकिस्तान को विजयी बताया गया। जेहाद और इसी किस्म के इतिहास को पढ़कर औसत पाकिस्तानी नौजवान आतंकी बनता है। कट्टरपंथी 'मौत के बाद जन्नत' की गारंटी देते है।</strong> कुछ बरस पहले 'जंग' ने लाहौर के करीब स्थित मरकज अलदावत अलअरशद नाम की इस्लामी यूनिवर्सिटी के मुख्य कर्ता-धर्ता और लश्करे तैयबा के प्रमुख प्रो. हाफिज सईद का इंटरव्यू छापा था। उसने भारतीय मुसलमानों से भारत के खिलाफ जेहाद अपील की थी-इसलिए कि हिंदुओं ने मुसलमानों का जीना हराम कर दिया है। 'जंग' ने पूछा कि मुसलमान निकलकर कहां जाएं? क्या पाकिस्तान उन्हे संभाल लेगा? सईद ने जवाब दिया, ''इसका जवाब सरकार दे। <strong><span style="color:#ff6666;">1948, 1965 और 1971 में हमने संधि की, गलती की। यह न करते तो दिल्ली और कलकत्ता पर हमारा कब्जा होता।''</span></strong> सईद जैसे लोग जो कुछ बोलते है वही वहां के बच्चों को पढ़ाया जाता है। सईद ने 'जंग' से कहा कि <strong><span style="color:#ff0000;">हमारे पैगंबर के मुताबिक अधिक बच्चे देने वाली बीबी से निकाह करना चाहिए। बड़ी आबादी वाली कौम ही दूसरों पर छा जाती है। भारत के तमाम हिस्सों में बढ़ी मुस्लिम आबादी से जनसंख्या संतुलन गड़बड़ाया है। तिस पर भी 11वीं योजना के मसौदे में मजहब आधारित 15 सूत्रीय तुष्टीकरण प्रोग्राम नत्थी किया गया।</span></strong> डा.अंबेडकर भारत की हिंदू-मुस्लिम साझा राष्ट्रीयता को असंभव मानते थे। उन्होंने तीखे सवाल उठाए, ''क्या भारत के राजनीतिक विकास के लिए हिंदू, मुस्लिम एकता जरूरी है? यदि तुष्टीकरण से तो कौन सी नई सुविधाएं उन्हें दी जाएं? अगर समझौते से तो शर्तें क्या होंगी?</p><p>'' <strong>सभी पाकिस्तानी हुक्मरान भारत विरोधी थे। भुट्टो भी, बेनजीर भी, नवाज शरीफ भी और परवेज मुशर्रफ भी। पाकिस्तान के पास परमाणु बम है। भारत विरोधी जेहादी जज्बा है।</strong> फिलहाल वहां गृहयुद्ध के हाल हैं, लेकिन विरोधी पड़ोसी के घर गृहयुद्ध का भी असर पड़ोस पर पड़ता है। <strong><span style="color:#ff0000;">पाकिस्तान का भूगोल भारत-पाक सीमाओं पर जरूर खत्म होता है, लेकिन पाकिस्तान एक विचारधारा भी है। पाकिस्तान जैसा उग्र कट्टरपंथ भारत में भी है। इसीलिए आतंकवादी अपने इसी देश में भी मदद पाते हैं।</span></strong> पाकिस्तान की आग का धुंआ भारत में भी है। राष्ट्र इसी धुंए से बेचैन है। पशु-पक्षी भी पड़ोसी धमक सुनकर चौकन्ने होते हैं। अपने ऊपर आती है तो पलटवार भी करते हैं, लेकिन भारतीय राजनीतिज्ञ सिर्फ सेंसेक्स उछाल देखकर ही उछल रहे हैं। </p>Gopal Kumar Azadhttp://www.blogger.com/profile/17026889315614855803noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-2369261783286222853.post-38790638212525646672008-02-26T04:01:00.000-08:002008-02-26T04:13:03.135-08:00मुस्लिम जेहाद और भारतीय राजनीती<span style="color:#cc0000;"></span><br /><br /><span style="color:#cc0000;"><strong>भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार एमके नारायणन के ताजा वक्तव्य ने सबको चौंकाया है। नारायणन ने बीते सप्ताह कहा कि अलकायदा का एक दल भारत आया और कुछ समय रुका, लेकिन उसका मंतव्य पूरा नहीं हुआ। वह जिस योजना पर काम कर रहा था वह असफल हो गई। उन्होंने आगे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के सुर में सुर मिलाया कि भारत का कोई मुसलमान अलकायदा का सदस्य नहीं है।</strong> इस बयान से कई महत्वपूर्ण सवाल उठे है। नारायण सच बोलने के लिए प्रसिद्ध थे, लेकिन इस बार उनकी बात में विचित्र विरोधाभास है। <strong>अलकायदा की टीम यहां रुकी, लेकिन यहां उसके किसी मुसलमान से संबंध भी नहीं हैं। संबंध नहीं तो रुके कैसे? आए कैसे? क्या किसी हिंदू, सिख या ईसाई परिवार ने उसकी आवभगत की?</strong> मसला गंभीर है। प्रधानमंत्री को अलकायदा भ्रमण के प्रश्न पर स्पष्टीकरण देना चाहिए।<br /> अलकायदा विश्व कुख्यात आतंकी संगठन है। इसी तरह के ढेर सारे संगठन जेहाद के नाम पर युद्धरत हैं। जेहादी आतंक का भूमंडलीकरण हो चुका है। <strong>सारी दुनिया को कट्टरपंथी इस्लामी आस्था के लिए मजबूर करने वाले जेहादी युद्ध विश्वव्यापी है और इससे संपूर्ण मानवता आतंकित है। दक्षिण पूर्व में आस्ट्रेलिया इससे पीड़ित है। फिलीपींस, थाईलैंड इसके प्रभाव क्षेत्र हैं। रूस, मिस्त्र, युगोस्लाविया, स्पेन पीड़ित है। अमेरिका खुलकर मैदान में है। पिछले वर्ष अमेरिकी राष्ट्रपति जार्ज बुश ने जेहादी आतंकवाद को 'इस्लामी फासीवाद' कहा था। अमेरिका ने अफगानिस्तान पर की गई सैन्य कार्रवाई को 21वीं सदीं का प्रथम विश्व युद्ध बताया था। अमेरिकी वक्तव्य के अनुसार 'इस्लामी फासीवाद' सारी दुनिया का शत्रु है।</strong> इससे सभी राष्ट्रों का संघर्ष है। अमेरिका ने हाल ही में पाकिस्तान द्वारा आतंकवाद के विरुद्ध की गई ठोस कार्रवाई को आर्थिक सहायता की नई शर्त बताया है। पाकिस्तान आतंकवाद का प्रशिक्षण केंद्र है। <strong>अमेरिका पाकिस्तानी 'इस्लामी फासीवाद' से परिचित था। इसके बावजूद उसने रूस के विरुद्ध तालिबान को सहायता दी। वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हुए हमले से अमेरिका की आंखें खुलीं।</strong> <strong>पाकिस्तान और उसके हुक्मरान जम्मू-कश्मीर के आतंकवादियों को स्वाधीनता संग्राम सेनानी बता रहे थे, तब लाल मस्जिद सहित पाकिस्तान के कोने-कोने में बम फोड़ रहे आतंकी भी स्वाधीनता सेनानी ही होने चाहिए? </strong>जेहादियों ने पहले अपने संरक्षक अमेरिका पर हल्ला बोला और अब अपने पोषक और प्रशिक्षक पाकिस्तान पर। भारत बहुत लंबे अर्से से जेहादी आतंक का निशाना है। <strong>पिछले कुछ वर्षों में अयोध्या, वाराणसी के संकटमोचन मंदिर, अक्षरधाम, रघुनाथ मंदिर और संसद पर जेहादी हमला हो चुका है। मुंबई में बीते बरस ही चलती ट्रेनों में 187 निर्दोष मारे गए। लगभग एक हजार लोग घायल हुए। दिल्ली की दीपावली रक्तरंजित हुई। जम्मू-कश्मीर में धारावाहिक हत्याएं जारी है। उत्तर प्रदेश की राजधानी और पड़ोसी जिले उन्नाव में आरडीएक्स मिला। राज्य विधानसभा में सरकार ने 34 जिलों को आतंकी गतिविधियों से युक्त बताया। पूरा भारत आतंकवाद की गिरफ्त में है। कुछ समय पहले अमेरिकी खुफिया विभाग ने दिल्ली और मुंबई को अलकायदा के निशाने पर बताया था, लेकिन भारत के सत्ताधीश मजे में हैं।</strong> <strong>प्रधानमंत्री और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार की सफाई भी सांप्रदायिक है। वे गर्वपूर्वक यह भी कह सकते थे कि भारत का कोई भी नागरिक अलकायदा का सदस्य नहीं है, लेकिन उन्होंने सिर्फ मुसलमानों पर सफाई दी।</strong> सत्ता के शिखर से आए ऐसे बयानों का आखिरकार मतलब क्या है? <strong>आतंकवादी मानवता का शत्रु होता है। उसका कोई मजहब नहीं होता, लेकिन आतंकवाद से लड़ने के लिए अधिनियमित कानून पोटा हटाने का कारण मजहबी था।</strong> भारत इतिहास से सबक नहीं लेता इसीलिए अदने से पड़ोसी मुल्क द्वारा प्रायोजित आतंकवाद के सामने भी पिट जाता है। <strong>भारत के सत्ताधीश विश्वव्यापी जेहादी आतंकवाद के फलसफे पर गौर नहीं करते। वे उनकी हिंसक विचारधारा, युद्ध क्षमता और रणनीति को भी नजरअंदाज करते हैं। वे राष्ट्रीय सुरक्षा और एकता पर विचार नहीं करते। वे जेहादी आतंकवाद के बजाए मुस्लिम वोट की दहशत में थर-थर कांपने के आदी हैं।</strong> दुनिया दो भागों में विभाजित है। एक तरफ जेहादी आतंकी हैं और दूसरी तरफ समूची मानवता। जेहादी आतंकवाद तीसरे विश्वयुद्ध की शक्ल ले चुका है। तीसरा विश्वयुद्ध अनोखा है। इस युद्ध का ऐलान राष्ट्र नहींकरते। इसमें राष्ट्र और राज्यों की सेनाएं पक्ष प्रतिपक्ष नहीं हैं। दुनिया की समूची सैन्य शक्ति, राष्ट्र राज्य व्यवस्थाएं, अत्याधुनिक परमाणु हथियार और मिसाइलें भी जेहादी आतंकवाद के सामने मिमिया रही हैं।<br /> <strong>जेहाद एक बेबाक युद्ध विचारधारा है। निर्दोषों की हत्या, हिंसा, लूटपाट इसमें अपराध नहीं साधन होते हैं</strong>। यह दुनिया को दो हिस्सों में बांटता है। <strong>जमात-ए-इस्लामी के संस्थापक सैय्यद अबुल मौदूही के मुताबिक कुरान सारी दुनिया में सिर्फ दो पार्टियां देखता है। जमीयत ए उलेमा हिंद जैसे संगठनों के अनुसार जेहाद का मकसद इस्लामी हुकूमत और बाकी दीगर धर्मों पर इस्लाम का गलबा कायम करना है। बोस्निया, कोसोवो, काकेशश, चेचन्या, इंडोनेशिया, फिलीपीन्स, उत्तरी अफ्रीका और इजरायल जैसे देशों में मुसलमानों और गैरमुसलमानों के बीच ऐसे संघर्षों की अनेक गाथाएं हैं। भारत मोहम्मद बिनकासिम के समय से लेकर गौरी, गजनी और औरंगजेब जैसे खलनायकों का निशाना बना,</strong> लेकिन नए किस्म के जेहादी युद्ध में दुश्मन की शिनाख्त आसान नहीं होती। यह युद्ध सीमा पर नहीं लड़ा जाता। सेना और पुलिस कानून के बंधन में रह कर सुरक्षा करते हैं जबकि आतंकी दनदनाते हुए किसी को भी मार डालते हैं। वे आत्मघाती मानव बम बना रहे हैं। उन्हें मारे जाने पर जन्नत की गारंटी है। आश्चर्य है कि भारत इस युद्ध से आंखें चुरा रहा है।</span>Gopal Kumar Azadhttp://www.blogger.com/profile/17026889315614855803noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-2369261783286222853.post-31843346165040475822008-02-26T03:42:00.000-08:002008-02-26T03:44:51.103-08:00गांधी हत्या : उचित या अनुचित ?<span style="color:#ff6666;">मेरी दृष्टि में महात्मा गांधी जी जैसे महान पुरुष की सैद्धान्तिक मौत तो भारत के विभाजन के समय ही हो चुकी थी। अतः शारीरिक रूप से गोली मार कर हुतात्मा नाथूराम गोडसे ने उन्हें अमरता का पर्याय ही बनाया। महापुरुषों के जीवन में उनके सिद्धान्तों और आदर्शों की मौत ही वास्तव में मौत होती है। <strong>14 अगस्त, 1946 में मुस्लिम लीग के गुण्डों को आह्वान और कलकत्ता में 6,000 हिन्दुओं का कल्तेआम पर गांधी की चुप्पी। जब लाखों माताओं, बहनों, के शील हरण तथा रक्तपात और विश्व की सबसे बड़ी त्रासदी द्विराष्ट्रवाद के सिद्धान्त के आधार पर पाकिस्तान का निर्माण हुआ, उस समय महात्मा गांधी के लिए हिन्दुस्तान की जनता में जबर्दस्त आक्रोश फैल चुका था। रही-सही कसर पाकिस्तान को 55 करोड़ रुपये देने के लिए महात्मा गांधी के अनशन ने पूरी कर दी। वास्तव में सारा देश महात्मा गांधी का उस समय घोर विरोध कर रहा था और भगवान से उनकी मृत्यु की आराधना कर रहा था। लोगों की जुबान पर बूढ़ा सठिया गया है-भगवान् इसको जल्दी उठा लें, जैसे शब्द थे। कई सभाओं में तो उन पर अण्डे, प्याज और टमाटर आदि भी फेंके गये तथा उनका तिरस्कार एवं बहिष्कार लोगों ने अपनी-अपनी तरह करना शुरू कर दिया था।</strong> हिन्दुस्तान की जनता के दिलों में महात्मा गांधी के झूठे अहिंसावाद और नेतृत्व के प्रति घृणा पैदा हो चुकी थी। महात्मा गांधी प्रायः कहते थे-हिन्दू-मुस्लिम एकता के बिना स्वतंत्रता प्राप्ति का कोई महत्व नहीं है। एक बार तो उन्हें यह भी कहना पड़ा कि हिन्दू कायर और मुस्लिम पंगेबाज हैं। बहुत कम लोग जानते हैं कि मुस्लिमों को प्रसन्न करने के लिए रामायण में बेगम सीता, बादशाह राम और मौलवी वशिष्ठ जैसे नामों का भी सुझाव दिया गया। इसी अवधारणा से मुस्लिम तुष्टिकरण का जन्म भी हुआ जिसके मूल से ही पाकिस्तान का निर्माण हुआ है। <strong>1946-47 में प्रायः प्रत्येक की जुबान पर एक ही बात थी कि महात्मा गांधी मुसलमानों के सामने घुटने टेक चुके हैं। महात्मा गांधी का कथन-‘‘उनकी लाश पर पाकिस्तान बनेगा’’, कोरा झूठ साबित हुआ। यह सर्वविदित है कि खण्डित भारत का निर्माण महात्मा गांधी की लाश पर नहीं, अपितु 25 लाख हिन्दू सिखों की लाशों तथा असंख्य माताओं और बहनों के शीलहरण पर हुआ।</strong> स्मरण रहे हमारे 62 जिले और 298 धर्मस्थल पाक-बांग्लादेश की इस्लामिक कैद में हैं और उन्हें मुक्त कराना हमारा राष्ट्रीय कर्तव्य है। मेरा विश्वास है कि जब तक पाक-बांग्लादेश इस धरती पर रहेगा-न तो जेहादी इस्लामिक आतंकवाद समाप्त होगा और न ही हिन्दुस्तान में शान्ति। अतः ‘‘अखण्ड भारत’’ ही एकमात्र हल है। </span><br /><span style="color:#ff6666;"></span><br /><span style="color:#ff6666;">VANDEMATRAM</span><br /><span style="color:#ff6666;">जयहिन्द !</span><br /><span style="color:#ff6666;">125 करोड़ भारतीयों में है कोई माई का लाल ???????????????? </span>Gopal Kumar Azadhttp://www.blogger.com/profile/17026889315614855803noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-2369261783286222853.post-78115402031767201332008-02-07T07:53:00.000-08:002008-02-07T08:04:58.830-08:00कम्युनिस्टों के ऐतिहासिक अपराध<span style="color:#ff0000;">दुनिया भर के प्रमुख विचारकों ने भारतीय जीवन-दर्शन एवं जीवन-मूल्य, धर्म, साहित्य, संस्कृति एवं आध्यात्मिकता को मनुष्य के उत्कर्ष के लिए सर्वोत्कृष्ट बताया है, लेकिन इसे भारत का दुर्भाग्य कहेंगे कि यहां की माटी पर मुट्ठी भर लोग ऐसे हैं, जो पाश्चात्य विचारधारा का अनुगामी बनते हुए यहां की परंपरा और प्रतीकों का जमकर माखौल उड़ाने में अपने को धन्य समझते है। इस विचारधारा के अनुयायी 'कम्युनिस्ट' कहलाते है। विदेशी चंदे पर पलने वाले और कांग्रेस की जूठन पर अपनी विचारधारा को पोषित करने वाले 'कम्युनिस्टों' की कारस्तानी भारत के लिए चिंता का विषय है। हमारे राष्ट्रीय नायकों ने बहुत पहले कम्युनिस्टों की विचारधारा के प्रति चिंता प्रकट की थी और देशवासियों को सावधान किया था। आज उनकी बात सच साबित होती दिखाई दे रही है। सच में, माक्र्सवाद की सड़ांध से भारत प्रदूषित हो रहा है। आइए, इसे सदा के लिए भारत की माटी में दफन कर दें। कम्युनिस्टों के ऐतिहासिक अपराधों की लम्बी दास्तां है- </span><br /><span style="color:#ff0000;">• सोवियत संघ और चीन को अपना पितृभूमि और पुण्यभूमि मानने की मानसिकता उन्हें कभी भारत को अपना न बना सकी। </span><br /><span style="color:#ff0000;">• कम्युनिस्टों ने 1942 के 'भारत-छोड़ो आंदोलन के समय अंग्रेजों का साथ देते हुए देशवासियों के साथ विश्वासघात किया। </span><br /><span style="color:#ff0000;">• 1962 में चीन के भारत पर आक्रमण के समय चीन की तरफदारी की। वे शीघ्र ही चीनी कम्युनिस्टों के स्वागत के लिए कलकत्ता में लाल सलाम देने को आतुर हो गए। चीन को उन्होंने हमलावर घोषित न किया तथा इसे सीमा विवाद कहकर टालने का प्रयास किया। चीन का चेयरमैन-हमारा चेयरमैन का नारा लगाया।</span><br /><span style="color:#ff0000;">• इतना ही नहीं, श्रीमती इंदिरा गांधी ने अपने शासन को बनाए रखने के लिए 25 जून, 1975 को देश में आपातकाल की घोषणा कर दी और अपने विरोधियों को कुचलने के पूरे प्रयास किए तथा झूठे आरोप लगातार अनेक राष्ट्रभक्तों को जेल में डाल दिया। उस समय भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी श्रीमती इंदिरा गांधी की पिछलग्गू बन गई। डांगे ने आपातकाल का समर्थन किया तथा सोवियत संघ ने आपातकाल को 'अवसर तथा समय अनुकूल' बताया। </span><br /><span style="color:#ff0000;">• भारत के विभाजन के लिए कम्युनिस्टों ने मुस्लिम लीग का समर्थन किया। </span><br /><span style="color:#ff0000;">• कम्युनिस्टों ने सुभाषचन्द्र बोस को 'तोजो का कुत्ता', जवाहर लाल नेहरू को 'साम्राज्यवाद का दौड़ता कुत्ता' तथा सरदार पटेल को 'फासिस्ट' कहकर गालियां दी।ये कुछ बानगी भर है। आगे हम और विस्तार से बताएंगे। </span><br /><span style="color:#ff0000;"></span><br /><span style="color:#ff0000;">भारतीय कम्युनिस्ट भारत में वर्ग-संघर्ष पैदा करने में विफल रहे, परंतु उन्होंने गांधीजी को एक वर्ग-विशेष का पक्षधर, अर्थात् पुजीपतियों का समर्थक बताने में एड़ी-चोटी का जोड़ लगा दिया। उन्हें कभी छोटे बुर्जुआ के संकीर्ण विचारोंवाला, धनवान वर्ग के हित का संरक्षण करनेवाला व्यक्ति तथा जमींदार वर्ग का दर्शन देने वाला आदि अनेक गालियां दी। इतना ही नहीं, गांधीजी को 'क्रांति-विरोधी तथा ब्रिटीश उपनिवेशवाद का रक्षक' बतलाया। 1928 से 1956 तक सोवियत इन्साइक्लोपीडिया में उनका चित्र वीभत्स ढंग से रखता रहा। परंतु गांधीजी वर्ग-संषर्ष तथा अलगाव के इन कम्युनिस्ट हथकंडों से दुखी अवश्य हुए। साम्यवाद (Communism) पर महात्मा गांधी के विचार-महात्मा गांधी ने आजादी के पश्चात् अपनी मृत्यु से तीन मास पूर्व (25 अक्टूबर, 1947) को कहा- 'कम्युनिस्ट समझते है कि उनका सबसे बड़ा कत्तव्य, सबसे बड़ी सेवा- मनमुटाव पैदा करना, असंतोष को जन्म देना और हड़ताल कराना है। वे यह नहीं देखते कि यह असंतोष, ये हड़तालें अंत में किसे हानि पहुंचाएगी। अधूरा ज्ञान सबसे बड़ी बुराइयों में से एक है। कुछ ज्ञान और निर्देश रूस से प्राप्त करते है। हमारे कम्युनिस्ट इसी दयनीय हालत में जान पड़ते है। मैं इसे शर्मनाक न कहकर दयनीय कहता हूं, क्योंकि मैं अनुभव करता हूं कि उन्हें दोष देने की बजाय उन पर तरस खाने की आवश्यकता है। ये लोग एकता को खंडित करनेवाली उस आग को हवा दे रहे हैं, जिन्हें अंग्रेज लगा लगा गए थे।' </span>Gopal Kumar Azadhttp://www.blogger.com/profile/17026889315614855803noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-2369261783286222853.post-45880017330204138882008-01-14T00:38:00.000-08:002008-01-14T00:47:54.360-08:00बंगलादेशी घुसपैठ कितना खतरनाक ?भारत की स्वतंत्रता के उपरान्त से ही जिस प्रकार विभिन्न देशों से लोग यहां आये उनमें से अनेक तो शरणार्थी के रूप में थे और अनेक चोरी छिपे घुसपैठिये थे। इससे भारत में जहां जनसंख्या में असंतुलन उभरा वहीं देश में अनेक प्रकार की समस्याएं खडी हो गईं। गत दस वर्षों में बांग्लादेश से लगभग 5.8 करोड की एक बडी आबादी ने भारत में अवैध रूप से घुसपैठ कर ली है जिससे देश में अनेक सीमावर्ती जिले इन घुसपैठियों के लगभग कब्जे में ही आ गये है। <strong>परन्तु सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह है कि देश के तथाकथित गैर साम्प्रदायिक राजनीतिक नेता इन अवैध घुसपैठियों की बांग्लादेश में वापसी के लिए कोई पहल नहीं कर रहे हैं तथा जो राजनेता इनको वापिस भेजने की मांग करते हैं उनको साम्प्रदायिक कह कर गाली दी जाती है ।अब भारत की एकता व अखण्डता भी खतरे में पडती जा रही है । बढ़ती घुसपैठ व बढती जनसंख्या के असंतुलन से देश की आंतरिक सुरक्षा भी खतरे में पड गई है।</strong> देश को बाह्य आक्रमण से बचाने के लिए देश की सम्पूर्ण जनता जाति, बिरादरी, मजहब व पंथ को छोड कर एकजुट हो जाती है लेकिन आंतरिक आक्रमण-घुसपैठ होने से आंतरिक असुरक्षा उत्पन्न हो जाती है जिसको सामान्य जन के साथ-साथ हमारे राजनेता भी गम्भीरता से नहीं लेते है। इससे आतंकवाद को शरण मिल जाती है। बढते आतंकवाद ने अब तक कई लाख लोगों को लील लिया है वहीं अरबों रुपये की राष्ट्र की सम्पत्ति को हानि पहुंची है एवं देशवासी भी एकजुट होकर इस आतंकवाद से लड़ने में स्वयं को तैयार नहीं कर पाते हैं <strong>।भारत ने स्वतंत्रता के अपने साठ साल के जीवन में पांच प्रमुख युध्द झेले है जिनमें हमारे रणबांकुरों ने दुश्मनों के दांत खट्टे किये है, परन्तु युध्दोपरांत वार्ता की मेज पर दृढ़ राजनैतिक इच्छाशक्ति के अभाव व अल्पसंख्यक वोट बैंक की राजनीतिक दुष्प्रवृति व मानसिकता के कारण भारत का जीता हुआ युध्द भी सदैव पराजित होता रहा है। लगभग वैसी ही स्थिति बांग्लादेश से हो रही घुसपैठ को लेकर हमारे राजनीतिक दलों की हो रही है। विदेश मंत्री प्रणव मुखर्जी ने तो भारत में रह रहे बांग्लादेशी नागरिकों की कुल संख्या ही घटा कर 15 से 20 लाख बतायी है</strong> जिसे विपक्ष ने लोकसभा में सफेद झूठ बताया है। दिल्ली में ही विभिन्न क्षेत्रों में लगभग पांच लाख से अधिक बांग्लादेशी घुसपैठिए निवास करते हैं। मुम्बई, कोलकाता तथा पश्चिमी बंगाल के विभिन्न हिस्सों में राजनेताओं की कृपा दृष्टि से तीस लाख से अधिक बांग्लादेशी बसे हुए हैं। असम के कई जिलों में इन घुसपैठियों के कारण आबादी में (भारतीय व विदेशी घुसपैठियों के बीच) संतुलन का खतरा पैदा हो गया है। राष्ट्रवादी शक्तियां इन अवैध घुसपैठियों से देश में बढ़ते हुए खतरे को लेकर चिन्तित रहती है। परन्तु पूर्वोत्तर राज्यों के राजनेता एकदम से आंख मूंदे हुए हैं । <strong>समूचे भारत में लगभग 5.8 करोड बांग्लादेशी निवास करते हैं जिनके कारण भारत में सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक (खाद्यान्न सहित) तानाबाना तहस-नहस हो रहा है। देश की एकता व अखंडता निरन्तर खतरे में पडती जा रही है सो अलग।यह कई बार साबित हो चुका है कि मुस्लिम आतंकवादी पकिस्तान की गुप्तचर एजेंसी आईएसआई बांग्लादेश के लोगों व जमीन का उपयोग भारत विरोधी गतिविधियों के लिए कर रहे हैं । पाकिस्तान से प्रशिक्षित आंतकवादी बांग्लादेश के रास्ते भारत में प्रवेश कर जाते हैं ।</strong> बांग्लादेश से भारत में आ रहे बांग्ला घुसपैठिए महज रोजी रोटी के लिए भारत की सीमाओं का उल्लंघन नहीं कर रहे हैं। भारत में पकडे गये आतंकवादियों से खुलासा हुआ है कि उन्होंने बांग्लादेश की कई बार यात्रा की है। हमारे राजनेताओं के दब्बूपन और सत्ता के लिए वोट बैंक की राजनीति ने राष्ट्र को एक गम्भीर खतरे की ओर बढा दिया <strong>है।केन्द्र सरकार की ढिलाई के कारण प्रतिदिन 12,000 बांग्लादेशी घुसपैठिए अवैध रूप से भारत की सर-जमीन पर दाखिल हो जाते हैं। भारतीय सुरक्षा बलों के कुछ भ्रष्ट सिपाहियों व अधिकारियों को मात्र हजार पांच सौ रुपये देकर बांग्लादेशियों को भारत की सीमा में चुपचाप दाखिल करवा दिया जाता है। भारत में घुसे इन अवैध घुसपैठियों को फिर भारतीय राजनेताओं का राजनीतिक संरक्षण प्राप्त हो जाता है तथा भारत में रहने के लिए आवश्यक सभी प्रपत्र फर्जी रूप से तैयार करवा दिये जाते हैं। </strong>अवैध घुसपैठियों के कारण भारत के मूल नागरिकों के काम धन्धे पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा हैं ।भारत में बांग्लादेश से हो रही अवैध घुसपैठ रोकने के लिए सरकार को दृढ़ इच्छाशक्ति से प्रारम्भ में दो काम करने चाहिए-अवैध रूप से भारत में रहने वालों को वापस खदेडा जाए तथा बांग्लादेश की पूरी सीमा को कंटीले लोहे के तारों से सील किया जाए वरना तो भारत का एक बडा हिस्सा भारत से पृथक हो <strong>जायेगा।सन् 1800 में अफगानिस्तान व ईरान भारत के ही हिस्से थे किन्तु विदेशी आक्रमणकारियों से उत्पन्न हुए आतंक के कारण ही यह हिस्सा भारत से अलग हो गया। कश्मीर में फैलता आतंकवाद व 1960 से शुरू हुआ माओ आतंक भारत की आंतरिक सुरक्षा को भेदने का निरन्तर प्रयास कर रहा है। 21 वीं शताब्दी में विश्व में दो बडे आतंकवादी हमले हुए है। अमेरिका के पैंटागन और वर्ल्ड सेंटर पर हुआ हमला जिसने अमेरिका जैसी महाशक्ति को हिला कर रख दिया और दूसरा हमला विश्व के सबसे बडे लोकतंत्र भारत की संसद पर किया गया जिससे पाक प्रायोजिक आतंकवाद बेनकाब हुआ ।</strong> 1971 में हमारे वीर सैनिकों ने अपना खून बहा कर जिस बांग्लादेश का निर्माण किया वही आज भारत के लिए सबसे बड़ी समस्या बन चुका <strong>है।5.8 करोड से अधिक बांग्लादेशी भारत की संस्कृति, आंतरिक सुरक्षा व रोजगार में सेंध मार रहे हैं वहीं प्रतिदिन 3,90,000 कुंतल खाद्यान्न चट कर जाते है। परन्तु अल्पसंख्यकों के तुष्टीकरण में तल्लीन हमारे राजनेता इस महत्वपूर्ण समस्या को गम्भीरता से नहीं ले रहे है तथा घुसपैठियों से उत्पन्न हुआ रोग अब नासूर बन चुका है</strong> जिसका एक बड़ा ऑपरेशन शीघ्र अतिशीघ्र करना आवश्यक हो गया है। जिसमें बांग्लादेश की सीमा पर 100 प्रतिशत तार बंदी शामिल है।Gopal Kumar Azadhttp://www.blogger.com/profile/17026889315614855803noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-2369261783286222853.post-65798239140731140642008-01-14T00:34:00.000-08:002008-01-14T00:35:34.168-08:00Gopal Kumar Azadhttp://www.blogger.com/profile/17026889315614855803noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-2369261783286222853.post-14352726059890977592008-01-07T04:27:00.000-08:002008-01-07T04:34:01.077-08:00हिंदुत्व<p> <a class="new" title="वीर सावरकर" href="http://hi.wikipedia.org/w/index.php?title=%E0%A4%B5%E0%A5%80%E0%A4%B0_%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A4%95%E0%A4%B0&action=edit">वीर सावरकर</a> ने हिन्दुत्व और हिन्दूशब्दों की एक परिभाषा दी थी जो हिन्दुत्ववादियों के लिये बहुत महत्त्वपूर्ण है उन्होंने कहा कि हिन्दू वो व्यक्ति है जो <a title="भारत" href="http://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%A4">भारत</a> को अपनी पितृभूमि और अपनी पुण्यभूमि दोनो मानता है । हिन्दुत्व शब्द फ़ारसी शब्द हिन्दू और संस्कृत प्रत्यय -त्व से बना है ।<br /></p><ul><li>हिन्दुत्ववादी कहते हैं कि हिन्दू शब्द के साथ जितनी भी भावनाएं और पद्धतियाँ, ऐतिहासिक तथ्य, सामाजिक आचार-विचार तथा वैज्ञानिक व आध्यात्मिक अन्वेषण जुड़े हैं, वे सभी हिन्दुत्व में समाहित हैं।हिन्दुत्व शब्द केवल मात्र हिन्दू जाति के कोरे धार्मिक और आध्यात्मिक इतिहास को ही अभिव्यक्त नहीं करता। हिन्दू जाति के लोग विभिन्न मत मतान्तरों का अनुसरण करते हैं। इन मत मतान्तरों व पंथों को सामूहिक रूप से हिन्दूमत अथवा हिन्दूवाद नाम दिया जा सकता है । आज भ्रान्तिवश हिन्दुत्व व हिन्दूवाद को एक दूसरे के पर्यायवाची शब्दों के रूप में प्रयोग किया जा रहा है। यह चेष्टा हिन्दुत्व शब्द का बहुत ही संकीर्ण प्रयोग है । </li><li>हिन्दुत्ववादियों के अनुसार हिन्दुत्व किसी भी धर्म या उपासना पद्धति के ख़िलाफ़ नहीं है ।<br />वो तो भारत में सुदृढ़ राष्ट्रवाद और नवजागरण लाना चाहता है । उसके लिये हिन्दू संस्कृति वापिस लाना ज़रूरी है ।<br />अगर समृद्ध हिन्दू संस्कृति का संरक्षण न किया गया तो विश्व से ये धरोहरें मिट जायेंगी । आज भोगवादी पश्चिमी संस्कृति से हिन्दू संस्कृति को बचाने की ज़रूरत है । </li><li>हिन्दुत्व और हिन्दू धर्म सर्वधर्म समभाव के सिद्धान्त में विश्मास रखता है । (ईसाई और मुसलमान ये नहीं मानते)<br />हिन्दुत्व गाय जैसे मातासमान पशु का संरक्षण करता है । </li><li>ईसाई और इस्लाम धर्म हिन्दू धर्म को पाप और शैतानी धर्म मानता है । इस्लाम के अनुसार हिन्दू लोग क़ाफ़िर हैं ।<br />मुसलमान हिन्दू बहुल देशों में रहाना ही नहीं चाहते । वो एक वृहत्-इस्लामी उम्मा में विश्वास रखते हैं और भारत को दारुल-हर्ब (विधर्मियों का राज्य) मानते हैं । वो भारत को इस्लामी राज्य बनाना चाहते हैं । </li><li>मुसलमान हिंसा से और ईसाई लालच देकर हिन्दुओं (ख़ास तौर पर अनपढ़ दलितों को) अपने धर्म में धर्मान्तरित करने में लगे रहते हैं ।</li><li>इतिहास गवाह है कि मुसलमान आक्रान्ताओं ने मध्य-युगों में भारत में भारी मार-काट मचायी थी । उन्होंने हज़ारों मन्दिर तोड़े और लाखों हिन्दुओं का नरसंहार किया था । हमें इतिहास से सीख लेनी चाहिये । </li><li>इस्लामी बहुमत पाकिस्तान (अखण्ड भारत का हिस्सा) भारत को कभी चैन से जीने नहीं देगा । आज सारी दुनिया को इस्लामी आतंकवाद से ख़तरा है । अगर आतंकवाद को न रोका गया तो पहले कश्मीर और फिर पूरा भारत पाकिस्तान के पास चला जायेगा ।</li><li>कम्युनिस्ट इस देश के दुश्मन हैं । वो धर्म को अफ़ीम समझते हैं । उनके हिसाब से तो भारत एक राष्ट्र है ही नहीं, बल्कि कई राष्ट्रों की अजीब मिलावट है । रूस और चीन में सभी धर्मों पर भारी ज़ुल्मो-सितम ढहाने वाले अब भारत में इस्लाम के रक्षक होने का ढोंग करने के लिये प्रकट हुए हैं । </li><li>अयोध्या का राम मंदिर हिन्दुओं के लिये वैसा ही महत्त्व रखता है जैसे काबा शरीफ़ मुसलमानों के लिए या रोम और येरुशलम के चर्च ईसाइयों के लिये । फिर क्यों एक ऐसी बाबरी मस्जिद के पीछे मुसलमान पड़े हैं जहाँ नमाज़ तक नहीं पढ़ी जाती, और जो एक हिन्दू मन्दिर को तोड़ कर बनायी गयी है ? </li><li>भारत में मुसल्मन संगठित हैं--एक समुदाय के रूप में । हिन्दू जात-पात, साम्प्रदाय, भाषा आदि में बँटे हैं । हिन्दुत्व सभी हिन्दुओं को संगठित करता है । </li><li>आधुनिक भारत में नकली धर्मनिर्पेक्षता चल रही है । बाकी लोकतान्त्रिक देशों की तरह यहाँ सभी धर्मावलम्बियों के लिये समानाचार संहिता नहीं है । यहाँ मुसलमानों के अपने व्यक्तिगत कानून हैं जिसमें औरत के दोयम दर्ज़े, ज़बानी तलाक़, चार-चार शादियों जैसी घटिया चीज़ों जो कानूनी मान्यता दी गयी है ।</li></ul>Gopal Kumar Azadhttp://www.blogger.com/profile/17026889315614855803noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-2369261783286222853.post-43457613332771646542008-01-05T02:16:00.000-08:002008-01-05T02:21:26.395-08:00ऐतिहासिक परिपेक्ष्य में जिहादद्वारा डैनियल पाइप्सन्यूयार्क सन31 मई, 2005<br /><br />राइस विश्वविद्यालय के डेविड कुक ने “अन्डर-स्टेंडिंग जिहाद” नाम से एक बहुत अच्छी और बोधगम्य पुस्तक लिखी है .युनिवर्सिटी औफ कैलीफोर्निया प्रेस द्वारा प्रकाशित इस पुस्तक का विमोचन अभी शीघ्र ही हुआ है ...इस पुस्तक में डेविड कुक ने 11 सितम्बर के पश्चात जिहाद पर आरंभ हुई निचले स्तर की बहस के स्वरुप को निरस्त किया है कि क्या यह एक आक्रामक युद्द पद्धति है या फिर व्यक्ति के नैतिक विकास का प्रकार है...<br /><br />कुरान मुसलमानों को स्वर्ग के बदले अपनी जान देने को आमंत्रित करता है ..हदीथ , जो कि मोहम्मद के क्रियाकलापों और व्यक्तिगत बयानों का लेखा जोखा है ,कुरान के सिद्दांतो की और अधिक व्याख्या करता है .इसमें संधियों, धन का वितरण , युद्द में प्राप्त सामग्री य़ा पुरस्कार , बंदियों, विभिन्न नीतियों का उल्लेख है ..मुसलिम विधिशास्त्र ने कालांतर में इन व्यावहारिक विषयों को सूत्रबद्ध कर इसे एक कानून का स्वरुप दे दिया ....<strong>पैगंबर ने अपने शासनकाल के दौरान औसतन प्रतिवर्ष नौ सैन्य अभियानों में हिस्सा लिया ...अर्थात प्रत्येक पाँच या छ सप्ताह में एक सैन्य अभियान , इस प्रकार अत्यंत आरंभ से जिहाद इस्लाम को परिभाषित करने में सहायक है ...गैर मुसलमानों पर विजय प्राप्त करना और उन्हें अपमानित करना यह पैगंबर के जिहाद का प्रमुख अंग है ...<br /></strong>इस्लाम की प्रारंभिक शताब्दियों मे “जिहाद की व्याख्या निश्चित रुप से आक्रामक और विस्तारवादी रही ” . जब विजय का सिलसिला थम गया साथ ही गैर मुसलमानों को धमकाना कम हो गया तब सैन्य शब्द के समानांतर जिहाद की सूफी अवधारणा विकसित हुई जिसका मतलब था ..आत्म – विकास.<br />क्रूसेड के माध्यम से पवित्र भूमि पर नियंत्रण स्थापित करने के शताब्दियों के यूरोपियन प्रयास ने जिहाद के नए “शास्त्रीय” सिद्दांत को विकसित करने की आवश्यकता महसूस की .स्वयं को रक्षात्मक मुद्रा में देखकर मुसलमानों ने अपना व्यवहार और अधिक कठोर बना लिया ....<br />तेरहवीं शताब्दी में मंगोलों के विजय अभियान ने अधिकांश मुस्लिम विश्व को पदाक्रांत कर लिया , यह पीड़ा कुछ मेगेलों द्वारा इस्लाम स्वीकार कर लेने से थोडी मात्रा में कम अवश्य हो गई ...इस दौरान कुछ चिंतक सामने आए जिसमें विशेष रुप से सन् 1328 के इब्न तेमिया शामिल हैं ..जिन्होने सच्चे और झूठे मुसलमान के बीच विभेद करते हुए जिहाद को नया महत्व दिया ..उनके अनुसार जिहाद के संदर्भ में किसी व्यक्ति की प्रामाणिकता इस बात पर निर्भर करती है कि उस व्यक्ति में जिहाद आरंभ करने की इच्छा शक्ति कितनी है ...<br />19 वीं शताब्दी का “शुद्दीकरण जिहाद ” अनेक क्षेत्रों में साथी मुसलमानों के विरुद्ध ही आरंभ हुआ ...इन सबमें सबसे कट्टर और प्रतिक्रियावादी अरब का वहाबी जिहाद था .इब्न तेमिया से प्रेरणा लेते हुए इन्होनें गैर वहाबी मुसलमानों को काफिर बताकर उनकी निंदा की और उनके विरुद्ध जिहाद छेड़ दिया .<br />भारत , काकेशस , सोमालिया , सूडान , अल्जीरिया<br />और मोरक्को जैसे देशों में यूरोपियन साम्राज्यवाद ने जिहादी प्रतिरोध को प्रेरित किया जिससे इन क्षेत्रों में जिहाद असफल रहा .इस आपदा का अर्थ था जिहाद पर नए सिरे से विचार करना .इस्लामवादियों का नया विचार भारत और मिस्र में 1920 में आरंभ हो गया परंतु इसने समकालीन कट्टर आक्रामक युद्ध पद्धति 1966 में मिस्र के विचारक सैयद कुतब के समय में प्राप्त की .कुतब ने इब्न तेमिया की भाँति ही सच्चे और झूठे मुसलमान के मध्य विभेद करते हुए गैर इस्लामवादियों को गैर- मुसलमान करार दिया और उनके विरुद्ध जिहाद घोषित कर दिया . 1981 में अनवर अल सादात की हत्या करने वाले गुट ने एक और विचार जोड़ते हुए जिहाद को विश्व पर नियंत्रण स्थापित करने का एक रास्ता बताया .<br /><strong>अफगानिस्तान में रुस के विरुद्ध हुआ युद्ध जिहाद के अबतक के विकास का अंतिम चरण है . अफगानिस्तान में पहली बार पूरी दुनिया के मुसलमान इस्लाम के नाम पर युद्ध करने के लिए एक जगह एकजुट हुए.1980 में एक फिलीस्तीनी अब्दुल्ला अज्जाम ने वैश्विक जिहाद का विचार दिया .इसके अंतर्गत जिहाद इस्लाम का प्रमुख अंग मानते हुए प्रत्येक मुसलमान के बारे में फैसला जिहाद के बारे में उसकी भूमिका के आधार पर किया गया तथा जिहाद को इस्लाम और मुसलमानों की मुक्ति का मार्ग माना गया. इसी विचार में से समकालीन आतंकवाद और बिन लादेन का जन्म हुआ .<br /></strong>जिहाद की वर्तमान अवधारणा इस्लामिक इतिहास के किसी भी युग की तुलना में कहीं अधिक कट्टर है ..Gopal Kumar Azadhttp://www.blogger.com/profile/17026889315614855803noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-2369261783286222853.post-65386940300540182362008-01-05T01:57:00.000-08:002008-01-05T02:03:06.307-08:00मुस्लिम वोटों की लालचपिछले दिनों जब असम में उग्रवादी संगठनों ने हिन्दी भाषी लोगों को निशाना बनाया तो एक बार फिर एक साथ अनेक सवाल उठकर खड़े हो