tag:blogger.com,1999:blog-23262232.post-1142714579037099952006-03-18T12:39:00.000-08:002006-03-18T12:42:59.056-08:00रक़ीब से- फैज़ अहमद फैज़<p>आ कि वाबस्ता हैं उस हुस्न की यादें तुझ से<br />जिसने इस दिल को परीख़ाना बना रक्खा था</p><p>जिसकी उल्फ़त में भुला रक्खी थी दुनिया हमने<br />दहर को दहर का अफसाना बना रक्खा था</p><p>आशना हैं तेरे कदमों से वो राहें जिन पर<br />उसकी मदहोश जवानी ने इनायत की है</p><p>कारवां गुज़रे हैं जिन से उसी रा'नाई के<br />जिसकी इन आखों ने बेसूद इबादत की है</p><p>तुझसे खेली हैं वो महबूब हवाएं जिनमें<br />उसके मलबूस की अफ़सुर्दा महक बाकी है</p><p>तुझ पे भी बरसा है उस बाम से महताब का नूर<br />जिस में बीती हुई रातों की कसक बाकी है</p><p>तूने देखी है वो पेशानी, वो रूख़्सार, वो होंट<br />ज़िन्दगी जिनके तसव्वुर में लुटा दी हमने</p><p>तुझ पे उट्ठी हैं वो खोई हुई साहिर आंखे<br />तुझ को मालूम है क्यों उम्र गंवा दी हमने</p><p>हम पे मुश्तरिका हैं एहसान ग़मे-उल्फ़त के<br />इतने एहसान कि गिनवाऊं तो गिनवा न सकूं<br />हमने इस इश्क में क्या खोया है क्या सीखा है<br />जुज़ तेरे और को समझाऊं तो समझा न सकूं</p><p><br />अजिज़ी सीखी, गरीबों की हिमायत सीखी,<br />यासो-हिर्मार के, दुख-दर्द के माने सीखे<br />ज़ेरदस्तों के मुसाइब को समझना सीखा,<br />सर्द आहों के, रूखे़-ज़र्द के मने सीखे</p><p><br />जब कहीं बैठ के रोते हैं वो बेकस जिनके,<br />अश्क आंखो मे बिलकते हुए सो जाते हैं<br />नातुवानों के निवाले पे झपटते हैं उकाब़<br />बाज़ू तोले हुए मंडलाते हुए आते हैं</p><p><br />जब कभी बिकता है बाज़ार में मज़दूर का गोश्त<br />शाहराहों पे ग़रीबों का लहू बहता है<br />आग-सी सीने में रह-रह के उबलती है, न पूछ<br />अपने दिल पे मुझे काबू ही नहीं रहता है</p>Moglihttp://www.blogger.com/profile/10882385754551486879noreply@blogger.com