tag:blogger.com,1999:blog-232571052009-07-06T12:21:09.526+05:30उड़न तश्तरी ....--ख्यालों की बेलगाम उड़ान...कभी लेख, कभी विचार, कभी वार्तालाप और कभी कविता के माध्यम से......
<p>हाथ में लेकर कलम मैं हालेदिल कहता गया<br>काव्य का निर्झर उमड़ता आप ही बहता गया.</p>Udan Tashtarihttp://www.blogger.com/profile/06057252073193171933sameer.lal@gmail.comBlogger315125tag:blogger.com,1999:blog-23257105.post-41883238435408929012009-07-06T06:25:00.002+05:302009-07-06T06:25:01.488+05:30मैं नॉन प्रेक्टिकल कहलाया..निहायत फालतू!!पिछले हफ्ते किसी परिवारिक प्रयोजन में मॉन्ट्रियल जाना हुआ.<br /><br />६०० किमी की यात्रा और ड्राईविंग लगभग ५ से सवा ५ घंटे की.<br /><br />पत्नी बाजू में बैठे बतियाती हुई पूरे ५ से सवा ५ घंटे जागृत रखने में सक्षम फिर भी कॉफी साथ में रख ही ली कि आराम रहेगा.<br /><br />हाईवे घर से बाजू में ही है तो ५ मिनट में पहुँच गये और स्पीड पूरे १२० किमी प्रति घंटे की रफ्तार से मिलाकर सामने और पीछे वाली गाड़ी से एक समदूरी बना कर जाँच लिया कि वो भी १२० पर हैं और क्रूज लगा कर गाना सुनने में मग्न हो गये. <span style="font-weight: bold;">पत्नी की समझ से उसकी बात सुनने में, जिसमें मात्र हां हूं करना ही एकमात्र उपाय है. बहस या तू तकड़ की गुँजाईश ही नहीं.</span> (डिटेल न पूछना)<br /><br />क्रूज यह सुविधा दे देता है कि<span style="font-weight: bold;"> जिस स्पीड पर आपने क्रूज लगा दिया, गाड़ी उसी पर चलती रहेगी.</span> अब आपको एक्सीलेटर या ब्रेक पर पाँव धरे रहने की जरुरत नहीं. सड़कें भी अधिकतर एकदम सिधाई में चलती हैं तो स्टेरिंग पर भी एक उँगली धरे रहना पर्याप्त है.<br /><br />बीच बीच में पीछे वाली गाड़ी को बैक मिरर में देख ले रहे थे और सामने वाली तो दिख ही रही थी.<br /><br />सामने ट्रक था, जिसमें ढेरों सुअर लदे चले जा रहे थे और पीछे नीले रंग की पोन्टियक. एक भद्र महिला उसे चला रही थी लगभग ३५ से ४० साल के बीच की. यह उम्र यूँ हीं नहीं लिख दी है. एक लम्बा अनुभव है इसे आँकने का, कम से कम महिलाओं के मामले में. अब तक तो ९९% सही ही गया है. यह बालों की सफेदी जो आप मेरे फोटो में देखते हैं वो घूप की वजह से नहीं है. अनुभव है मित्र. <span style="font-weight: bold;">धूप ने तो सिर्फ चेहरे के रंग पर कहर बरपाया है</span>.<br /><br /><td><a href="http://picasaweb.google.ca/lh/photo/QvPK4UrXMmrhWbETOjh0wA?authkey=Gv1sRgCODw9bi80dW-qwE&feat=embedwebsite"><img src="http://lh6.ggpht.com/_N7sdMZXEIvI/SlEppxyV6YI/AAAAAAAADpI/eIAqvKHdQ1c/s800/pig_truckin.jpg" /></a></td></tr><tr><td style="font-family:arial,sans-serif; font-size:11px; text-align:right"><a href="http://picasaweb.google.ca/sameer.lal/Totaram?authkey=Gv1sRgCODw9bi80dW-qwE&feat=embedwebsite">सुअरों से लदा ट्रक</a></td><br /><br />जब बैक मिरर में नज़र डालूँ वो देखती मिले. मैं मुस्कराऊँ ( अरे, संस्कार का तकाजा है और कुछ नहीं) और वो मुस्कराये. बस, और क्या?<br /><br />सामने का ट्रक- सुअर लादे, सुअर की तरह घूँ घूँ की आवाज के साथ चला जा रहा है. हालांकि खिड़कियाँ बंद होने के कारण घूँ घूँ की आवाज डिस्टर्ब नहीं कर रही थी. उसके साईड मिरर में ड्राईवर नजर आ रहा है. उम्र न जाने क्या हो, पुरुष की उम्र, मैं आँकने में सक्षम नहीं क्यूँकि पुरुष तो किसी भी उम्र में कब क्या कर गुजरे, कहना मुश्किल है. विकट मानसिकता होती है उसकी और अजब फितरत.<br /><br />कुछ ही समय में एक सबंध सा स्थापित हो गया. हमसफरों को रिश्ता. कुछ दूर ही सही, तुम मेरे साथ चलो..टाईप. सामने ट्रक देखने की आदत पड़ गई और पीछे उस महिला को. अरे, उसने तो सिगरेट जला ली. मन किया कि उसे मना करुँ, यह अच्छी आदत नहीं. मगर कैसे और किस अधिकार से? फिर भी एक जुड़ाव की भावना, मात्र कुछ देर कदम से कदम मिला कर चलने पर. लगता है कि डांटूं उसे. मगर सोचता हूँ कि बड़ी हो गई है. अच्छा बुरा समझती है, क्या कहना उससे. कहते हैं कि जब बेटे के पैर में अपने जूते आने लगे तो अधिकार छोड़ उसे दोस्त मान लेने में ही भलाई है. बुढ़ापा ठीक कटेगा. यही कुछ सोच कर जाने देता हूँ.<br /><br />सामने ट्र्क को देखता हूँ. सुअर लदे हैं.<span style="font-weight: bold;"> एक छेद से मूँह निकाले ठंडी हवा की मौज लेने की फिराक में दिखा.</span> उसे क्या पता कि गंतव्य पर पहुँचते ही मशीन उसे फाइनल नमस्ते कहने का इन्तजार कर रही है. उस पर गुलाबी निशान है और बहुतों की तरह. शायद गुलाबी मतलब, पहला स्टॉप. तो वहीं कटेगा और फैक्टरी में से दूसरी तरफ पैकेट में पैक निकलेगा पीसेस में बिकने को.<br /><br /><td><a href="http://picasaweb.google.ca/lh/photo/RaNHgG-V6sDw1WISeFjTAA?authkey=Gv1sRgCODw9bi80dW-qwE&feat=embedwebsite"><img src="http://lh5.ggpht.com/_N7sdMZXEIvI/SlEpp4JEWeI/AAAAAAAADpM/tbMF3NYkzO4/s800/pig%20transporting.jpg" /></a></td></tr><tr><td style="font-family:arial,sans-serif; font-size:11px; text-align:right"><a href="http://picasaweb.google.ca/sameer.lal/Totaram?authkey=Gv1sRgCODw9bi80dW-qwE&feat=embedwebsite">छेद से झाँकता सुअर</a></td><br /><br /><span style="font-weight: bold;">वैसे ये तो हमें भी पता नहीं कि कौन सा निशान हम पर लगा है</span>, तभी तो गाना सुनते, कॉफी पीते, पत्नी की चैं चैं (सॉरी, बातचीत) सुनते, पिछली कार में महिला को ताकते, कोई बुरी नजर से नहीं, चले जा रहे हैं खुशी खुशी.<br /><br />अगर निशान कब मिटेगा पता चल जाये तो आज जीना दुभर हो जाये एक पल को भी. सही है सुअर महाराज, लूटो मजे ठंडी हवा के. मस्त है यह पावन पवन और बहती समीर!!<br /><br />३०० किमी पर ऑटवा को मुड़ने का एक्जिट आता है और ट्रक निकल लेता है उस पर. हमें सीधे जाना है मांट्रियाल की तरफ. मन में एक खालीपन सा आ जाता है कि कहाँ चला गया मेरा हमसफर. जाने किस हाल में चले जा रहा होगा. <span style="font-weight: bold;">खैर, मिलना, बिछुड़ना जीवन का क्रम है, यह सोच मन को मना लेता हूँ </span>और पीछे बैक मिरर पर नजर डालता हूँ.<br /><br />वो मुस्कराती है, मैं मुस्कराता हूँ. वो सिगरेट पी रही है और मैं कॉफी. उसे शायद कॉफी के खतरे मालूम होंगे और वो भी मुझे रोकना चाहती हो. कौन जाने?<br /><br />१०० किमी और बीते. इस बीच चार पाँच बार झूटमूठ मुस्कराये. फिर कोबर्ग आया और वो भी निकल गई उस राह और मै अकेला..मांट्रियल गंत्वय के लिए..आगे बढ़ता..और मन गुनगुना रहा है फुरसतिया जी के मित्र <a href="http://hindini.com/fursatiya/?p=366">’प्रमोद तिवारी’ </a> का गीत:<br /><br />राहों में भी रिश्ते बन जाते हैं<br />ये रिश्ते भी मंजिल तक जाते हैं<br />आओ तुमको एक गीत सुनाते हैं<br />अपने संग थोड़ी सैर कराते हैं।..... (बाकी <a href="http://hindini.com/fursatiya/?p=366">लिंक</a> पर पढ़ें, सुन्दर गीत हैं)<br /><br /><br />-<span style="font-weight: bold;">कहाँ जा पाये मंजिल तक</span>..राह में ही साथ छोड़ गये. मगर यह तय है कि एक रिश्ता कायम कर गये. उन्हें तव्वजो देना या न देना, यही सारी बात तो हमारा खुद का स्वभाव निर्धारित करता है. शायद साथ की मंजिल वही रही हो.<br /><br />चाहें तो उसे भूल जाये, मगर मैं नहीं भूल पाता...भूल जाना बेहतर माना जाता है...कुछ लोग इसे प्रेक्टिकल होना कहते हैं.<br /><br />-<span style="font-weight: bold;">मैं नॉन प्रेक्टिकल कहलाया</span>..निहायत फालतू विचारधारा का पालक!!<br /><br /><br /><br />रिश्तों और नातों के<br />बीच कुछ<br />इस तरह से<br />बंट गया हूँ मैं..<br />कि<br />खुद से..<br />कट गया हूँ मैं....<br /><br />-समीर लाल ’समीर’<div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/23257105-4188323843540892901?l=udantashtari.blogspot.com'/></div>Udan Tashtarihttp://www.blogger.com/profile/06057252073193171933sameer.lal@gmail.com14tag:blogger.com,1999:blog-23257105.post-778402815107731252009-07-01T06:25:00.002+05:302009-07-01T06:25:00.973+05:30ॐ जय बेनामी देवा!!!<span style="font-weight: bold;">आजकल पूरे ब्लॉगजगत में बेनामियों का तहलका है.</span> बिना नाम के मन मर्जी अनाप शनाप, अच्छी बुरी जैसा जी आया, टिप्पणी कर गये, अब आप आपस में लड़ते रहो. वो बीच बीच में आकर हवन सामग्री और घी डालते रहेंगे. न जाने उनके पक्ष विपक्ष में, उनसे बचने के उपायों पर कितने आलेख लिखे जा चुके, सब बिना किसी हल के ही रहे. कोई भी एकदम सफल और कारगर उपाय बताने में असक्षम रहा. <span style="font-weight: bold;">कुछ तो उन्हें पकड़ने के लिए अभी भी जाल बिछाये बैठे हैं</span> मगर हाथ लग रहा है वही सिफर.<br /><br /><span style="font-weight: bold;">बचपन से समझाया गया है</span> कि जब कोई रास्ता न दिखे तो बस, ईश्वर की शरण में चले जाओ. खूब आरती भजन पूजन में मन लगाओ, कुछ न कुछ हल भगवान दिखा ही देगा. उसके पास और कोई काम भी क्या है, <span style="font-weight: bold;">बाकी तो सब इन्सानों ने उससे छीन ही लिया है. </span><br /><br />बस, उन्हीं संस्कारों की गठरी बाँधे हम तो शुरु हो गये हैं-<span style="font-weight: bold;">दिन में दो बार पूरे झाम से बेनामी याने बिन नामियों की आरती उतारने में.</span> बड़ा फायदा लग गया है. अतः, विचारा कि आम जन की साहयतार्थ स्वामी समीरानन्द जी के आश्रम से यह आरती सब लोगों तक पहुँचाई जाये.<br /><br /><td><a href="http://picasaweb.google.ca/lh/photo/0EGSyNCwok3E5WL-mbEb6A?authkey=Gv1sRgCODw9bi80dW-qwE&feat=embedwebsite"><img src="http://lh4.ggpht.com/_N7sdMZXEIvI/Skom3_WWDXI/AAAAAAAADnI/MgU2CSFjbZI/s800/sld.jpg" /></a></td></tr><tr><td style="font-family:arial,sans-serif; font-size:11px; text-align:right"><a href="http://picasaweb.google.ca/sameer.lal/Totaram?authkey=Gv1sRgCODw9bi80dW-qwE&feat=embedwebsite">बेनामी महाराज!! </a></td><br /><br /><span style="font-weight: bold;">चाहें तो </span>इस रिकार्डिंग को अपने ब्लॉग पर लगा लें और सुबह शाम बजा दिया करें या जैसे ही कम्प्यूटर ऑन करें, इसे गाकर फिर ब्लॉगलेखन में जुटें, निश्चित फायदा मिलेगा. फायदे का वादा वैसा ही है जैसा मानसून को बुलाने और गरमी को भगाने जगह जगह आरतियों और यज्ञों के पंडाल से किया जा रहा है इस वक्त भारत में. कितनी जगह तो इन आरतियों के प्रताप से मानसून बड़ी सून आ गया और बाकी जगह भी आ ही जायेगा. मानो कि आरती न होती तो मानसून आता ही न!! जय हो!!<br /><br />तो<span style="font-weight: bold;"> नीचे आरती सुनिये, पढ़िये, समझिये, गुनिये और गुनगुनाईये. </span>धुन और आवाज इलाहाबद के एक पंडे से कॉपी करने की कोशिश की है: :)<br /><br /><object classid="clsid:d27cdb6e-ae6d-11cf-96b8-444553540000" codebase="http://fpdownload.macromedia.com/pub/shockwave/cabs/flash/swflash.cab#version=8,0,0,0" width="335" height="28" id="divplaylist"><param name="movie" value="http://www.divshare.com/flash/playlist?myId=7787445-8ea"><embed src="http://www.divshare.com/flash/playlist?myId=7787445-8ea" width="335" height="28" name="divplaylist" type="application/x-shockwave-flash" pluginspage="http://www.macromedia.com/go/getflashplayer"></embed></object><br /><br /><br />ॐ जय बिन नामी देवा, स्वामी जय बे नामी देवा<br />तुमको पकड़ न पाये, गुगल की सेवा.<br /><br />ॐ जय बिन नामी देवा....<br /><br />क्म्प्यूटर के जोधा, करते हैं धंधे<br />तुमको खोज सके न, हो गये वो अंधे<br /><br />ॐ जय बिन नामी देवा....<br /><br />तुम नर हो या नारी, सब अनुमान करें<br />ब्लॉगजनों मे हर कोई, हर पल खूब डरें<br /><br />ॐ जय बिन नामी देवा....<br /><br />कितनी मेहनत करके, टिप्पणी हो करते<br />फिर काहे को अपना, नाम नहीं धरते.<br /><br />ॐ जय बिन नामी देवा....<br /><br />तेरी सब पर नजरें, तुम से कौन बचा<br />ब्लॉगजगत में कितना, तुमसे विवाद मचा..<br /><br />ॐ जय बिन नामी देवा....<br /><br />तुम हो अगम अगोचर, कभी नहीं थकते<br />किस बिधि बचूँ दयामय, गाली तुम बकते.<br /><br />ॐ जय बिन नामी देवा....<br /><br />तुमसे उसने सीखा, कैसे बात करें<br />कुछ न कुछ तो कह दें, काहे मौन धरें...<br /><br />ॐ जय बिन नामी देवा....<br /><br />तुम हो ज्ञान के सागर, अपना ब्लॉग लिखो<br />छुप कर के क्या जीना, खुल कर खूब दिखो!!<br /><br />ॐ जय बिन नामी देवा....<br /><br /><br /><br />-समीर लाल ’समीर’<br /><br /><span style="font-weight: bold;">निवेदन: </span><br /><span style="font-weight: bold;">१</span>.कोई भक्त अगर इसे करयोके पर मय ढपली, मंजिरा और शंखनाद आदि के संग गाये तो कृप्या रिकार्डिंग आश्रम तक भी पहुँचाये और साथ ही स्वामी समीरानन्द का क्रेडिट भी लगा देगा तो स्वामी जी प्रसाद स्वरुप टिप्पणियों की मानसून का वादा करते हैं.<br /><br /><span style="font-weight: bold;">२</span>. यदि किसी की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँची हो तो कृप्या बेनामी टिप्पणी न करें, हम तो पहले ही क्षमा मांग लेते हैं. :)<div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/23257105-77840281510773125?l=udantashtari.blogspot.com'/></div>Udan Tashtarihttp://www.blogger.com/profile/06057252073193171933sameer.lal@gmail.com119tag:blogger.com,1999:blog-23257105.post-48729565268095155722009-06-29T06:31:00.002+05:302009-06-29T06:31:01.221+05:30किस बात का गुस्सा? कहीं कोई भय तो नहीं?पहली मंजिल की खिड़की पर बैठा बैकयार्ड में बगीचा देख रहा हूँ. मौसम बहुत सुहाना लग रहा है.<br /><br /><span style="font-weight: bold;">विज्ञान ने यह संभव कर दिया है</span> कि मौसम चाहे कैसा भी गरम या ठंडा क्यूँ न हो, आप अपने घर का तापमान अपने मन के अनुरुप ढाल कर बाहर शीशे से निहारें और प्रसन्न रहें. क्या फरक पड़ता है बाहर के तापमान से, जब कमरे में ही बैठे रहना हो.<br /><br />ऐसी सुविधा विज्ञान ने तन के लिए दी और <span style="font-weight: bold;">हम ऐसे आदी हुए कि मन नें भी वही आदत बना ली. </span>तन की संगत का असर होगा. कहते हैं न कि संगत अपना प्रभाव छोड़ ही देती है. अब तो कौन कितनी तकलीफ में है या खुश हैं, उससे मन न तो विचलित होता है और न खुश. मायने रखता है तो बस इतना कि क्या हम पर दुख गिरा है या हमें खुशी मिली है. बस, वही कमरे का तापमान. सब कुछ उसी भी निर्भर है. हीटिंग ऑन कर दी तो गरम और कूलिंग चालू तो ठंडा. कितना गरम हो या कितना ठंडा, सब अपने ही हाथ तो है. <span style="font-weight: bold;">अखबार की खबरें मात्र शब्द बन कर रह गई हैं. </span>कोई अन्तर नहीं पड़ता. संवेदनाऐं मृत प्राय हो चली है.<br /><br />खिड़की से देखता हूँ कि सेब के पेड़ में नये फूल आ गये है. कल यही फूल फल बन जायेंगे-<span style="font-weight: bold;">मीठे मीठे लाल लाल सेब. एक स्वास्थयवर्धक और स्वादिष्ट फल. </span>तभी एक काली, नारंगी रंग की मिली जुली चिड़िया जंगल से उड़ कर यहाँ चली आई है. सुना है उसे मैने बोलते. घर के बाजू में जंगल है. अक्सर टहलने जाते समय देखा है इस प्रजाति को. बहुत सुन्दर गाती है, बेहद मीठा. जंगल में टहलते, सामने ओन्टारियो लेक से आती शीतल बयार और उसके साथ इसका गायन, मन को आहलादित कर देता है. <span style="font-weight: bold;">आज पहली बार उसे अपने बगीचे में देख रहा हूँ.</span><br /><br /><td><a href="http://picasaweb.google.ca/lh/photo/Oz1iCco9AbegUUeU2WXIXg?authkey=Gv1sRgCODw9bi80dW-qwE&feat=embedwebsite"><img src="http://lh4.ggpht.com/_N7sdMZXEIvI/Ske0xT63VZI/AAAAAAAADlo/VLwafzxOJ0w/s800/oriole.jpg" /></a></td></tr><tr><td style="font-family:arial,sans-serif; font-size:11px; text-align:right">जंगल से आई: <a href="http://picasaweb.google.ca/sameer.lal/Totaram?authkey=Gv1sRgCODw9bi80dW-qwE&feat=embedwebsite">चिड़िया</a></td><br /><br />न जाने किस बात का गुस्सा है. <span style="font-weight: bold;">सारे सेब के फूल नोंच नोंच कर बिखराती जा रही है.</span> बीच बीच में दो तीन और चिड़िया भी आ जाती है. कुछ इस तहस नहस में उसका साथ देती है. कुछ जोर जोर से चूँ चूँ कहती लड़ती हैं.<span style="font-weight: bold;"> शायद इनको समझा रही होंगी </span>कि क्यूँ नुकसान कर रही हो? क्यूँ तोड़ रही है इन नई आती कलियों को और फूलों को? कुछ सब्र करो, फल तो आ जाने दो, तब खा लेना. पेड़ खुद खुशी खुशी खिलायेगा. पेड़ अपने फल खुद तो खाता नहीं, तुम्हारे लिए ही तो हैं. फिर ऐसी क्या नाराजगी कि तुम फूलों को ही खत्म किये दे रही हो.<br /><br /><span style="font-weight: bold;">समझाती होगी </span>कि देखो, यही फूल हैं जिस पर आकर भ्रमर बैठेगे, गुनगुनायेंगे इस पेड़ से उस पेड़. साथ ही झील से आती पावन पवन भी इसके फूलों से पराग अपने साथ बहा कर दूसरे पेड़ तक ले जायेगी और नव सृजन होगा. नये पेड़ होंगे, नये फूल आयेंगे. नये फल होंगे. कितना खुशहाल वातावरण होगा.<br /><br /><span style="font-weight: bold;">कहती होगी</span> कि अगर तुम फूलों का ही नाश कर दोगी तब फिर यह सब कैसे संभव हो पायेगा. नव सृजन ही रुक जायेगा. ये पेड़ भी पूरे परिपक्व होने के पहले ही खत्म हो जायेंगे. सूख कर बस ठूंठ. <span style="font-weight: bold;">विचारो मित्र, हर तरफ बस ठूंठ ही ठूंठ. </span>तुम्हारा तो सीमित जीवन है. अब तक उपलब्ध पेड़ पौधों से कट जायेगा पर आने वाली भावी पीढ़ियाँ, तुम्हारे बच्चे..उनका क्या होगा. वो क्या खायेंगे और कहाँ चहकेंगे?<br /><br /><span style="font-weight: bold;">मगर वो माने तब न!! </span>अपने सुन्दर गाने का ऐसा दंभ, ऐसा धमंड कि फूलों की सुन्दरता कैसे बरदाश्त हो. बस, मिटा गई दिन भर में बगिया के दोनों सेब के पेड़.<br /><br /><span style="font-weight: bold;">अब उसमें इस बरस सेब नहीं आयेंगे.</span> क्या पता आने वाले साल में भी आते हैं या नहीं. कल उन हरे भरे पेड़ों की जगह मेरी सुन्दर बगिया में भी ठूंठ होंगे. सोच कर ही दिल दहल जाता है. कितने प्यार से सींचा, संजोया था इस बगिया को. सब बस उस पागल चिड़ियों के दंभ के चलते मिट गया. वो तो वैसे भी जंगल में रहती थी और रह ही रही है, उसे क्या जरुरत आन पड़ी थी इस करीने से सजी बगिया में. शायद जंगल में अपनी पहचान ठीक से काबिज न कर पा रही हो या इस सुन्दर बगिया से घबरा गई हो कि इस बगिया के रहते भला जंगल में कौन आयेगा हरियाली निहारने और उसके गीत सुनने.<br /><br />कैसे समझाऊँ उसे कि <span style="font-weight: bold;">तुम्हारी महत्ता तुम्हारी जगह है ही</span> और अगर बगिया में आती हो तो भी स्वागत करने सब फूल पत्ती फल खुला दिल लिए खड़े ही हैं फिर ऐसी क्या नाराजगी? <br /><br /><span style="font-weight: bold;">आज मुझे जंगली चिड़ियों की भाषा न आ पाने का बहुत दुख हुआ.</span> काश, भाषा समझता होता तो मैं उनका मनतव्य तो जान लेता और उसके अनुरुप ही, उनमें न सही अपनी बगिया में ही कुछ बदलाव या सुधार कर लेता.<br /><br /><span style="font-weight: bold;">तो हे कलमपीरों, हे तथाकथित साहित्यकारों!!</span> हमें दुख है कि हम आपकी भाषा नहीं बोल पाते, हम आपकी भाषा नहीं समझ पाते हैं!! हमारी अपनी छोटी सी बगिया है. नये पौधे रोपें जा रहा हैं. बड़े प्यार से उन्हें सींचा जा रहा है. स्नेह से दुलराकर बड़ा किया जा रहा है. कुछ में फूल भी आने लगे हैं. कुछ तो फलदायी वृक्ष भी हो गये हैं. स्वागत आपका भी है इस बगिया मे.<br /><br /><span style="font-weight: bold;">आप तो ज्ञानी हैं इसलिये भले हम न समझ पायें, आप तो हमारी बात समझ ही जायेंगे.</span> बस!! अपने अहंकार पर काबू पा लिजिये और अपने दंभ को किनारे रख कर आईये. हम तो आपके आने से लाभांवित ही होंगे मगर, यह तहस नहस कैसी? कैसी यह नाराजगी? क्यूँ फूलों को नोंच ले रहे हैं. क्या पा लेंगे इससे?<span style="font-weight: bold;"> कहीं यह अपना असतित्व खो जाने का भय या इसी तरह की कुंठा तो नहीं?</span><br /><br />ऐसा मत करों वीरों. याद है न वो ठूंठ वाली दुनिया. क्या आप वैसी दुनिया चाहते हो!!<br /><br /><span style="font-weight: bold;">चलिये, ऐसा कर लिजिये</span> कि अगर नव-आगंतुको को उत्साहित करने से आपका कद घटता हो तो कम से कम हतोत्साहित न करिये.<br /><br />वैसे, चलते चलते एक बात और बता दूँ,<span style="font-weight: bold;"> सेब का पेड़ भारत में लगे, जंगल में लगे या फिर विदेश में</span>-सेब तो सेब ही होता है.मीठे मीठे लाल लाल सेब. एक स्वास्थयवर्धक और स्वादिष्ट फल.<br /><br /><td><a href="http://picasaweb.google.ca/lh/photo/nP6aagBnOsX8mp6Etqdnaw?authkey=Gv1sRgCODw9bi80dW-qwE&feat=embedwebsite"><img src="http://lh5.ggpht.com/_N7sdMZXEIvI/Ske2mzTuXOI/AAAAAAAADls/_SDsJs9UGe8/s800/Man_Smoking_Pipe%20copy.jpg" /></a></td></tr><tr><td style="font-family:arial,sans-serif; font-size:11px; text-align:right"><a href="http://picasaweb.google.ca/sameer.lal/Totaram?authkey=Gv1sRgCODw9bi80dW-qwE&feat=embedwebsite">ऐसे ही तो हैं?</a></td><br /><br /><span style="font-weight: bold;">नोट: </span>अभी पिछले दिनों किसी कवि की कविता को लेकर किसी वरिष्ट साहित्यकार ने बहुत हंगामा खड़ा किया था कि उन्हें कविता लिखना नहीं आती, फिर भी लिख रहे हैं. फिर, दो-चार दिन पहले किसी वरिष्ट साहित्यकार द्वारा विदेशों में किये जा रहे हिन्दी लेखन को दौ कौड़ी का घोषित कर देना मन दुखी कर गया और उपरोक्त भाव उभरे.<div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/23257105-4872956526809515572?l=udantashtari.blogspot.com'/></div>Udan Tashtarihttp://www.blogger.com/profile/06057252073193171933sameer.lal@gmail.com86tag:blogger.com,1999:blog-23257105.post-92048992901074414672009-06-25T06:23:00.003+05:302009-06-25T06:23:01.719+05:30कुछ विल्स कार्ड और...दो रोज पहले हॉस्टल के मित्र, जो उस जमाने में मेरा रुम मेट हुआ करता था, का पत्र प्राप्त हुआ भारत से. बड़ा आश्चर्य का विषय था कि आज के जमाने में कोई पत्र लिखे. ईमेल से काम चला जा रहा है. लेकिन उसने मेरे ब्लॉग पर <a href="http://udantashtari.blogspot.com/2009/05/blog-post_14.html">विल्स कार्ड पर उतरी बातें</a> पढी और फिर यह पत्र भेजा.<br /><br /><span style="font-size:85%;"><span style="color: rgb(102, 102, 102);">(</span></span><span style="font-style: italic; color: rgb(102, 102, 102);font-size:85%;" >याद है मुझे सालों पहले, जब मैं बम्बई में रहा करता था, तब मैं विल्स नेवीकट सिगरेट पीता था. जब पैकेट खत्म होता तो उसे करीने से खोलकर उसके भीतर के सफेद हिस्से पर कुछ लिखना मुझे बहुत भाता था. उन्हें मैं विल्स कार्ड कह कर पुकारता......</span><span style="font-size:85%;"><span style="color: rgb(102, 102, 102);">)</span></span><br /><br />जाने कब और किस मूड में लिखे मेरे कुछ कार्ड उसके पास रखे हुए थे, वही उसने पत्र के माध्यम से भिजवाये. सोचता हूँ <span style="font-weight: bold;">ऐसा कुछ खास था भी नहीं उसमें</span>, फिर भी बस याददाश्त बतौर शायद रखे रहा होगा सहेज कर. इतने सालों से सहेजे इन चन्द कागज के टुकड़ों को अपने से अलग करते क्या अहसासा होगा उसने. <span style="font-weight: bold;">एक टीस तो उठी होगी</span>. मैं तो भूल भी चुका था फिर क्यूँ उसने वो मुझे वापस भेजा.बस सोच रहा हूँ. बरसों बीते उससे मुलाकात हुए भी. बहुत यादें जुड़ी हैं उस समय के साथ, उन प्यारे दोस्तों के साथ बम्बई की सड़के नापते, सारा समय अपना, अपनी मौज.<br /><br /><span style="font-weight: bold;">क्या भूलूँ क्या याद करुँ</span> को चरितार्थ करता.<br /><br />ज्यादा नहीं लिखता. भावुकता जकड़ने लगती है फिर उससे उबरने की जद्दोजहद, तो इतना ही लिख वो <a href="http://udantashtari.blogspot.com/2009/05/blog-post_14.html">विल्स कार्ड नोट्स </a> पेश कर देता हूँ.<br /><br /><br /><a href="http://picasaweb.google.ca/lh/photo/3xb54R12ms9mInSHtrhGag?authkey=Gv1sRgCISf1_uP1MyA_wE&feat=embedwebsite"><img src="http://lh4.ggpht.com/_N7sdMZXEIvI/SkKQyVZ4kaI/AAAAAAAADlM/kIzOXz9KuWU/s800/marine1.jpg" /></a><a href="http://picasaweb.google.ca/sameer.lal/BloggerPictures?authkey=Gv1sRgCISf1_uP1MyA_wE&feat=embedwebsite"></a><br /><br /><span style="font-weight: bold;">-१-</span><br /><br />कल मैं नहीं रहूँगा..<br /><br />यह तय है..<br /><br />रहोगे तो तुम भी नहीं..<br /><br />फिर ये अकड़ कैसी ?<br /><br /><br /><br /><span style="font-weight: bold;">-२-</span><br /><br />कब्र पर<br /><br />खारे आंसूओं का सबब<br /><br />कुछ अनकही बातें<br /><br />और<br /><br />अपूर्ण वादों का पाश्चाताप.<br /><br /><br /><br /><span style="font-weight: bold;">-३-</span><br /><br />वो नहीं रहे...<br /><br />अति दुखद..<br /><br />रहोगे तो तुम भी नहीं..<br /><br />ऐसा कुछ कर जाओ<br /><br />कि कोई तो कहे..<br /><br />अति दुखद!!<br /><br /><br /><span style="font-weight: bold;">-४-</span><br /><br />एक आम आदमी मर गया...<br /><br />क्या आंसूं बहाना....<br /><br />वो तो मरा ही पैदा हुआ था!!<br /><br /><br /><br /><span style="font-weight: bold;">-५-</span><br /><br />वो मर गया<br /><br />चलो,<br /><br />आज उसका शरीर फूँक आयें...<br /><br />आत्मा तो अपनी<br /><br />उसने सालों पहले ही फूँक दी थी...<br /><br />-नेता था हमारा!!<br /><br /><br /><span style="font-weight: bold;">-६-</span><br /><br />( <span style="font-weight: bold;">बम्बई के छोटे से फ्लैट में रह रहे मेरे दोस्त के दादा जी मृत्यु पर मेरे दोस्त की माता जी के व्यक्तव के आधार पर-आज का भौतिकवाद</span>)<br /><br />बाबू जी नहीं रहे!!<br /><br />हमारे परिवार की बगिया को<br /><br />बिन माली कर गये....<br /><br />बस, तसल्ली इतनी है कि<br /><br />कमरा खाली कर गये!!<br /><br /><br /><span style="font-weight: bold;">-७-</span><br /><br />मेरी कलम से<br /><br />निकलते<br /><br />वो<br /><br />नीले आँसूं<br /><br />बरबस ही<br /><br />खींच लाते हैं<br /><br />तेरी आँखों से<br /><br />वो<br /><br />पनीले आँसूं<br /><br />जो<br /><br />लुढ़क कर<br /><br />जब जा मिलते हैं<br /><br />मेरी कलम के<br /><br />उन नीले आँसूंओं से<br /><br />तब छा जाता है<br /><br />एक धुंधलका सा<br /><br />अपने साथ लिए<br /><br />सन्न सन्नाटा<br /><br />और<br /><br />गहरी उदास उदासी!!<br /><br /><br /><br />-समीर लाल ’समीर’<div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/23257105-9204899290107441467?l=udantashtari.blogspot.com'/></div>Udan Tashtarihttp://www.blogger.com/profile/06057252073193171933sameer.lal@gmail.com90tag:blogger.com,1999:blog-23257105.post-54718515333458003872009-06-22T06:22:00.001+05:302009-06-22T06:22:00.753+05:30आप जलूल आना.....चोनू!!जिन्दगी का सफ़र भी कितना अजीब है. रोज कुछ नया देखने या सुनने को मिल जाता है और रोज कुछ नया सीखने. पहले भी <a href="http://udantashtari.blogspot.com/2007/09/blog-post_06.html">इसी पहलु </a>पर कुछ सीखा था और आज नया सीखा.<br /><br />पता चला कि <span style="font-weight:bold;">दफ्तर की महिला सहकर्मी का पति गुजर गया.</span> बहुत अफसोस हुआ. गये उसकी डेस्क तक. खाली उदास डेस्क देखकर मन खराब सा हो गया. यहीं तो वो चहकती हुई हमेशा बैठे रहती थी. यादों का भी खूब है, तुरन्त चली आती हैं जाने क्या क्या साथ पोटली में लादे. उसकी खनखनाती हँसी ही लगी गुँजने कानों में बेवक्त. आसपास की डेस्कों पर उसकी अन्य करीबी सहकर्मिणियाँ अब भी पूरे जोश खरोश के साथ सजी बजी बैठी थी. न जाने क्या खुसुर पुसुर कर रहीं थी. लड़कियों की बात सुनना हमारे यहाँ बुरा लगाते हैं, इसलिए बिना सुने चले आये अपनी जगह पर. हालांकि मन तो बहुत था कि <span style="font-weight:bold;">देखें, क्या बात कर रही हैं?</span><br /><br />जो भी मिले या हमारे पास से निकले, <span style="font-weight:bold;">उसे मूँह उतारे भारत टाईप बताते जा रहे थे</span> कि जेनी के साथ बड़ा हादसा हो गया. उसका पति गुजर गया. खैर, लोगों को बहुत ज्यादा इन्टरेस्ट न लेता देख मन और दुखी हो गया. भारत होता तो भले ही न पहचान का हो तो भी कम से कम इतना तो आदमी पूछता ही कि क्या हो गया था? बीमार थे क्या? या कोई एक्सीडेन्ट हो गया क्या? कैसे काटेगी बेचारी के सामने पड़ी पहाड़ सी जिन्दगी? अभी उम्र ही क्या है? फिर से शादी कर लेती तो कट ही जाती जैसे तैसे और भी तमाम अभिव्यक्तियाँ और सलाहें. मगर यहाँ तो कुछ नहीं. अजब लोग हैं. <span style="font-weight:bold;">सोच कर ही आँख भर आई और गला रौंध गया.</span><br /><br /><span style="font-weight:bold;">हमारे यहाँ तो आज मरे </span>और गर सूर्यास्त नहीं हुआ है तो आज ही सूर्यास्त के पहले सब पहुँचाकर फूँक ताप आयें. वैसा अधिकतर होता नहीं क्यूँकि न जाने अधिकतर लोग रात में ही क्यूँ अपने अंतिम सफर पर निकलते हैं. होगी कोई वजह..वैसे टोरंटो में भी रात का नजारा दिन के नजारे की तुलना में भव्य होता है और वैसा ही तो बम्बई में भी है. शायद यही वजह होगी. सोचते होंगे कि <span style="font-weight:bold;">अब यात्रा पर निकलना ही है तो भव्यता ही निहारें.</span> खैर, जो भी हो मगर ऐसे में भी अगले दिन तो फूँक ही जाओगे.<br /><br />मगर<span style="font-weight:bold;"> यहाँ अगर सोमवार को मर जाओ तो शनिवार तक पड़े रहो अस्पताल में.</span> शानिवार को सुबह आकर सजाने वाले ले जायेंगे. सजा बजा कर सूट पहना कर रख देंगे बेहतरीन कफन में और तब सब आपके दर्शन करेंगे और फिर आप चले दो गज जमीन के नीचे या आग के हवाले. आग भी फरनेस वाली ऐसी कि ५ मिनट बाद दूसरी तरफ से हीरा का टुकड़ा बन कर निकलते हो जो आपकी बीबी लाकेट बनवाकर टांगे घूमेगी कुछ दिन. गज़ब तापमान..<span style="font-weight:bold;">हड्ड़ी से कोयला, कोयले से हीरा जैसा परिवर्तन जो सैकड़ों सालों साल लगा देता है, वो भी बस ५ मिनट में. </span><br /><br /><td><a href="http://picasaweb.google.ca/lh/photo/blLTAv7FIfIoJkI2EWpzDw?feat=embedwebsite"><img src="http://lh4.ggpht.com/_N7sdMZXEIvI/Sj6yuXiQAVI/AAAAAAAADkY/jfpL5Ck66as/s800/mourner.jpg" /></a></td></tr><tr><td style="font-family:arial,sans-serif; font-size:11px; text-align:right">साभार: <a href="http://picasaweb.google.ca/sameer.lal/BloogerMeet?feat=embedwebsite">गुगल</a></td><br /><br />खैर, पता लगा कि जेनी के पति का फ्यूनरल शनिवार को है. अभी तीन दिन हैं. घर आकर दुखी मन से <a href="http://udantashtari.blogspot.com/2007/07/blog-post_05.html">भाषण भी </a> तैयार कर लिया शेर शायरी के साथ जैसा भारत में मरघट पर देते थे. शायद कोई कुछ कहने को कह दे तो खाली बात न जाये इतने दुखी परिवार की. <span style="font-weight:bold;">बस, यही मन में था और क्या.</span><br /><br />शुक्रवार को दफ्तर में औरों से पूछा भी कि भई, कितने बजे पहुँचोगे? कोई जाने वाला मिला ही नहीं. बड़ी अजीब बात है? इतने समय से साथ काम कर रहे हैं और इतने बड़े दुखद समय में कोई जा नहीं रहा है. हद हो गई. सही सुना था एक शायर को, शायद यही देखकर कह गया होगा:<br /><br /><span style="font-weight:bold;">’सुख के सब साथी, दुख का न कोई रे!!’</span><br /><br />आखिर मन नहीं माना तो अपने एक साथी से पूछ ही लिया कि भई, आप क्यूँ नहीं जा रहे हो?<br /><br />वो बड़े नार्मल अंदाज में बताने लगा कि <span style="font-weight:bold;">वो इन्वाईटेड नहीं है.</span><br /><br />लो, अब उन्हें फ्यूनरल के इन्विटेशन का इंतजार है. हद है यार, क्या भिजवाये तुम्हें कि:<br /><span style="font-weight:bold;"><br />’भेज रही हूँ नेह निमंत्रण, प्रियवर तुम्हें बुलाने को,<br />हे मानस के राजहंस, तुम भूल न जाने आने को.’<br /></span><br />हैं? मगर बाद में पता चला कि वाकई उनका फ्यूनर है <span style="font-weight:bold;">STRICTLY ONLY BY INVITATION</span> याने कि निमंत्रण नहीं है तो आने की जरुरत नहीं है.<br /><br /><span style="font-weight:bold;">गजब हो गया भई.</span> तो निमंत्रण तो हमें भी नहीं आया है. फिर कैसे जायेंगे. कैसे बाँटूं उसका दर्द. हाय!!<br /><br />सोचा कि शायद इतने दुख में भूल गई होगी. इसलिये अगले दिन सुबह फोन लगा ही लिया. शायद फोन पर ही इन्वाईट कर ले. चले जायेंगे. भाषण पढ देंगे. दो बूँद आँसूं बहा कर कँधा आगे कर देंगे कि वो भी सर रख कर इस दर्द भरी घड़ी में हल्की हो ले. इन्सानयित का तकाज़ा तो यही कहता है और इसमें अपना जाता भी क्या है. <span style="font-weight:bold;">कँधा कोई शक्कर का तो है नहीं कि उस दुखिया के आँसूओं से गल जायेगा.</span><br /><br />पता चला कि ब्यूटी पार्लर के लिए निकल गई है <span style="font-weight:bold;">फ्यूनरल मेकअप के लिए.</span> भारतीय है तो थोड़ा गहराई नापने की इच्छा हो आई और जरा कुरेदा तो पता चला कि ब्लैक ड्रेस तो तीन दिन पहले ही पसंद कर आई थी आज के लिए और मेकअप करवा कर सीधे ही फ्यूनरल होम चली जायेगी. कफन का बक्सा प्यूर टीक का डिज़ायनर रेन्ज का है फलाना कम्पनी ने बनाया है और गड़ाने की जमीन भी प्राईम लोकेशन है मरघटाई की. अगर इन्विटेशन नहीं है तो आप फ्यूनरल अटेंड नहीं कर सकते हैं मगर अगर चैरिटी के लिए डोनेशन देना है तो ट्रस्ट फण्ड फलाने बैंक में सेट अप कर दिया गया है, वहाँ सीधे डोनेट कर दें एण्ड एक स्पेशल हिदायत, स्वाईन फ्लू के चलते, कृप्या फ्लावर्स न भिजवायें. स्वीकार्य नहीं होंगे.<br /><br />हम भी अपना मूँह लिए सफेद कुर्ता पजामा वापस बक्से में रख दिए और सोचने लगे कि अगर हमारे भारत में भी ऐसा होता तो भांजे का स्टेटमेन्ट भी लेटेस्ट फैशन के हिसाब से निमंत्रण पत्र में जरुर रहता:<br /><br /><span style="font-weight:bold;">"मेले मामू को छनिवाल को फूँका जायेगा. आप जलूल आना....चोनू"</span><div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/23257105-5471851533345800387?l=udantashtari.blogspot.com'/></div>Udan Tashtarihttp://www.blogger.com/profile/06057252073193171933sameer.lal@gmail.com89tag:blogger.com,1999:blog-23257105.post-5199132651814105082009-06-15T06:25:00.002+05:302009-06-15T15:58:10.735+05:30गज़ल मुझसे रुठी है..पिछले तीन हफ्तों से हर हफ्ते तीन चार दिन बाहर जाना हो रहा है. मौका ही नहीं लग पा रहा है कि ब्लॉगजगत की बहुत सुध ली जाये मगर फिर भी प्रयास जारी है. अगला हफ्ता फिर व्यस्त है. उसके बाद शायद कुछ राहत हो. अभी दो हफ्ते पहले कैलिफोर्निया यात्रा के दौरान इन प्यारे तोताराम जी से मुलाकात हुई और कुछ बात हुई. <br /><br /><td><a href="http://picasaweb.google.ca/lh/photo/z9QLyEpLr-84BAfPzHJStw?authkey=Gv1sRgCODw9bi80dW-qwE&feat=embedwebsite"><img src="http://lh6.ggpht.com/_N7sdMZXEIvI/SiiHqEGdnHI/AAAAAAAADfc/-mRbS7JDMiE/s288/DSC00997.JPG" /></a></td></tr><tr><td style="font-family:arial,sans-serif; font-size:11px; text-align:right"><a href="http://picasaweb.google.ca/sameer.lal/Totaram?authkey=Gv1sRgCODw9bi80dW-qwE&feat=embedwebsite">तोताराम</a></td><br /><br /><span style="font-weight:bold;">कैद!!</span><br /><br /><br />कुछ सोच की <br />आसमानी सरहदें..<br />कुछ अनुभव के <br />नुकीले किनारे..<br /><br />कुछ सामाजिक मर्यादाओं की<br />चहारदीवारियाँ..<br />कुछ कुटुम्बीय मान्यताऐं<br />मानिंद खेत की मेढ़ें..<br /><br />कुछ व्यक्तिगत व्यवहारजनित<br />मान्यताऐं..<br /><br />इन सबके भीतर<br />सिमटता हुआ<br />इक<br />मेरा जहाँ..<br /><br />और<br /><br />मैं<br /><br />उस जहाँ को सोचता हूँ!!<br /><br />-<span style="font-weight:bold;">कैद में कौन कब खुश रहा है?</span><br /><br /><br /><br /><br /><br /><br /><span style="font-weight:bold;">अहमियत!!</span><br /><br /><br />उपर से चौथी पंक्ति में <br />बायें से तीसरा शब्द<br />दायें से गिनों<br />तो पाँचवां<br />और नीचे से हिसाब लगायें<br />तो <br />सातवीं पंक्ति..<br /><br />ये वो जगह है<br />जहाँ बहर टूटी है<br />और<br />गज़ल मुझसे रुठी है..<br /><br />कितनी अहमियत है <br />हर स्थल की!!!<br /><br /><br />-समीर लाल 'समीर'<br /><br /><br /><br /><span style="font-weight:bold;">एक जरुरी सूचना: मेरी पुस्तक ’बिखरे मोती’ जीतने का सुनहरा मौका</span><br /><br />आप कविता लिखते हैं और हिन्दी ब्लॉगरों के बीच ख़ास मुकाम बनाना चाहते हैं? आप कविता के अच्छे पाठक हैं, कविताओं की समालोचना में यक़ीन रखते हैं। तो <span style="font-weight:bold;">हिन्द-युग्म</span> की <a href="http://kavita.hindyugm.com/2009/06/blog-post.html">यूनिकवि एवं यूनिपाठक प्रतियोगिता के जून 2009 अंक में भाग लीजिए</a> और उपहार स्वरूप ले जाइए मेरी नवीनतम प्रकाशित कविता-संग्रह 'बिखरे मोती' की एक प्रति। अंतिम तिथि- 15 जून 2009। अधिक जानकारी के लिए <a href="http://kavita.hindyugm.com/2009/06/blog-post.html">यहाँ</a> देखें।<br /><br /><br /><a href="http://kavita.hindyugm.com/2009/06/blog-post.html" target="_blank"><img src="http://i173.photobucket.com/albums/w76/bharatwasi001/Unikavi_Awam_Unipathak/June_2009_Pratiyogita_470X60.jpg"/></a><div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/23257105-519913265181410508?l=udantashtari.blogspot.com'/></div>Udan Tashtarihttp://www.blogger.com/profile/06057252073193171933sameer.lal@gmail.com87tag:blogger.com,1999:blog-23257105.post-4900541783468653512009-06-10T06:27:00.001+05:302009-06-10T06:27:01.691+05:30कमबख्त, पसीने की बू नहीं जाती!!!कमरे में वापस आ गया हूँ. दिन थकान भरा रहा हमेशा की तरह.<br /><br /><span style="font-weight:bold;">गगनचुंबी इमारत की गगन के पास वाली फ्लोर</span>. <br /><br />यह है टोरंटो की 'क्वीन्स के' नामक सड़क पर..ओन्टारियो लेक से सटी हुई अभिजात्य रहवासी कॉलोनी.<br /><p><br /><table style="width:auto;"><tr><td><a href="http://picasaweb.google.co.in/lh/photo/c-9btiRQg5zkpSqt7oueqw?authkey=_wEyoP91z4Q"><img src="http://lh3.ggpht.com/_N7sdMZXEIvI/SSqpLmVqp4I/AAAAAAAAA3A/MUPKpjpb1XU/s400/toronto.jpg" /></a></td></tr><tr><td style="font-family:arial,sans-serif; font-size:11px; text-align:right"><a href="http://picasaweb.google.co.in/sameer.lal/BloggerPictures?authkey=_wEyoP91z4Q">टोरंटो</a></td></tr></table></p><br /><br />कल रात यहीं तो इसी कमरे में<span style="font-weight:bold;"> मैं और लिंडा बैठे थे वाईन सुड़कते हुए,</span> एक दूसरे से सटे हुए भारत की हालत पर बात कर रहे थे. एक निहायत थकी हुई बात. <span style="font-weight:bold;">यहाँ के हिसाब से बेबात की बात.</span><br /><br />हाँ, पिछले साल ही तो मैं और लिंडा भारत गये थे. लिंडा पहली बार भारत गई थी कितनी ही किताबें पढ़कर, मुझसे सुन कर और तस्वीरें देखकर ख्वाब सजाये. उन्हें सच होता देखने.<br /><br />यहाँ से दिल्ली तक का थकाऊ २२ घंटे का हवाई सफर-बैठे बैठे. बीच में पेरिस के ४ घंटे का अल्प विराम कैसे गुजरा टर्मिनल बदलते कि पता ही नहीं चला कि कहीं रुके भी.<br /><br />एयरपोर्ट से बाहर निकलते ही गर्म हवा का भभका और <span style="font-weight:bold;">साथ घुली पसीने की खुशबू</span>-(लिंडा उसे बदबू की संज्ञा दे गई-बेवकूफ!!)<br /><br />फिर रेल में जबलपुर और आगे सिवनी के पास गांव तक की रोडवेज की यात्रा. लगा कि कहाँ आ गये. सब तरफ उड़ती धूल..उधड़ी सड़कों पर चलते..<span style="font-weight:bold;">हवा में गोबर की महक.</span> लिंडा की गोरी चमड़ी देख ग्रमिणों की अचरज भरी आंखें और <span style="font-weight:bold;">अपनी ओर ध्यानाकर्षण करवाने विचित्र भाव भंगिमा बनाते लोग.</span><br /><br />मैं भी बिना ज्यादा चले थका हुआ साथ चलता रहा<span style="font-weight:bold;"> एक खीज, एक घृणा का दायरा अपने आसपास साधते.</span>.कैसे लोग हैं बिल्कुल अनपढ़...एकदम लिंडा जैसी सोच हो गई मेरी भी. २१ दिन की यात्रा..तालाब के किनारे मंदिर. बरगद के नीचे सिंदूरी पत्थर याने हनुमान जी-बुझी हुई अगरबत्तियो की जलती खुशबू. कोई सार्थकता नहीं बस एक निष्ठ भाव. भूली हुई पुरानी यादों का साक्षी, जो मुझे न जाने क्या क्या याद दिला जाता है और <span style="font-weight:bold;">लिंडा नाक पर रुमाल रखे पास से आती पैशाब और पैखाने की बदबू से एक हारी लड़ाई लड़ती हुई </span>और मैं उस हवा की महक में अपना बचपन अहसासता.<br /><br />बस, एक दिन में ही २१ दिन की यात्रा १५ दिन में बदल गई. <br /> <br />मै भी भारत की स्थितियों की बुराई करते हुए उसी के साथ वापस आ गया. उसी शाश्वत झिड़कन के साथ कि यह हालात कभी नहीं सुधरेंगे जबकि भीतर से मैं ही जानता था कि कितना कुछ बदल चुका है. <br /><br />मगर लिंडा तो अपने जेहन में बसे किताब वाला भारत, दूध दही की नदियों वाला भारत, सोने की चिड़िया वाला भारत, दुनिया के माथे की बिंदिया वाला भारत, जान से प्यारा मेहमान को मानने वाला भारत और न जाने कौन कौन सा भारत खोज रही थी.<span style="font-weight:bold;"> वो नाक पर रुमाल रखे तलाशती थी उस भारत को</span> जिसके दामन से आने वाली हवाओं को सलाम करने का जी चाहता है वो उसे कहाँ दिखाता? उसे कैसे बताता कि यही वो दामन से उठने वाली हवा है, यही वो माहौल है जो मुझे वापस बुलाता है..मुझे मेरा अतीत याद दिलाता है. मुझे मेरा अपना लगता है. मेरा दिल इन्हें ही सलाम करने को मचलता है. <span style="font-weight:bold;">वो नहीं समझेगी.</span><br /><br />आज खिड़की के नजदीक जाता हूँ..इतने उपर..सामने आकाश..सामने तैरता ओन्टारियो लेक..मानो जैसे लेक नहीं महासागर हो. खिडकी से सट कर सड़क देखता हूँ तो लगता है कि सड़कों पर कारें नहीं हजारों चिटिंया कतार बनाये घूम रही हैं.<br /><br />बचपन में गांव के खेत में लाल चीटीं की बांबि पर पैर रख दिया था अनजाने में. सब पैर पर चढ़ गईं थी और जी भर के काटा. मैं रोने लगा था तब माँ ने पुचकारते हुए उस पर घी और नमक मिला कर लगाया था तब जाकर जलन कम हुई थी... मन में सिरसिरी सी चढ़ जाती हैं. अचकचा कर खिड़की से दूरी बना लेता हूँ. गोड़ झटक लेता हूँ, तब थोड़ा ठीक लगता है. आँख पोंछ कर देखता हूँ,<span style="font-weight:bold;"> न जाने कहाँ से आज फिर एक नमी सी है बस पुचकारने वाला कोई नहीं. </span>घी नमक लगाने वाला कोई नहीं. मैं और बस मैं-निपट अकेला.<br /><br />सब मन की उड़ान है.<br /><br />आज से मुझे, न जाने क्यूँ, लिंडा अच्छी नहीं लगती. <span style="font-weight:bold;">अब नहीं मिलूँगा उसे.</span><br /><br />लगता है कि अभी मर जाऊँ इतने उपर की मंजिल में..तो जितना समय इस फ्लोर से जमीन तक जाने में लगेगा..उतने ही समय में ही उपर पहूँच जाऊँगा.. <span style="font-weight:bold;">आधा रास्ता तय कर लिया है अपनी जड़ों को छोड़ कर.</span><br /><br />मन नहीं मानता..दराज खोल लेता हूँ..१३ साल पहले भारत छोड़ते समय टीका लगाते हुए माँ ने लिफाफा दिया था....उसे आज खोलता हूँ...१०१ रुपये हैं - १०० का नोट और १ का सिक्का. यह कह कर कि रास्ते के लिए रख ले. क्या पता कब काम आ जाये. सच, अभी रास्ते में ही हूँ..देखो, आज आ ही गया. <span style="font-weight:bold;">माँ की फिर से याद हो आई.</span> लिफाफे ने उनके होने का अहसास दिया. पैर में जलन कुछ राहत पा गई.<br /><br />आँख भर आई है. उठ कर बाथरुम में आ गया हूँ..आईना देखता हूँ ..मैं दिखता हूँ उसमें. आँख मे नमी लिए. मगर खुद से आँख मिलाने की हिम्मत कहाँ....सर झटक देता हूँ...यथार्थ में लौटने के लिए.<br /><br />कमरे में वापस आ जाता हूँ.<br /><br />मैं तो अब भारतीय ही नहीं रहा...मगर यहाँ का भी तो नहीं हो पाया. <span style="font-weight:bold;">ब्राउन स्किन्ड, हाऊ कैन यू बिकम व्हाईट स्किन्ड गाय!!!</span><br /><br />ए सी कमरे में मैं घबरा कर अदबदाया सा पसीने में भीग जाता हूँ.. पसीने की बू..काँख से उठती हुई.. वही..गांव वाली....<br /><br /><span style="font-weight:bold;">कमबख्त..पसीने की बू नहीं बदलती</span>...क्या करुँ? क्यूँ नहीं जाती यह..कोलोन और महक वाले साबुन..सब इस्तेमल कर लिए...!! और फिर मैं तो भारत में रहता भी नहीं. इतने साल हो गये यहाँ रहते..शायद ये मेरे खून में रची बसी है. मेरे साथ ही जायेगी.<br /><br />नाईट सूट गड़ने लगता है. न जाने क्यूँ..<span style="font-weight:bold;">आज लूँगी न होने की कमी खली. </span><br /><br />वरना घुटने तक उसे खींचें अधलेटा सा मसनद टिकाये पड़ा रहता, पिता जी की तरह जब वो टूर से थक कर लौटते थे. मैं भी तो बहुत थक गया हूँ. कितना दूर चला आया हूँ.<br /><br />वाईन का गिलास!! इसे बदल देता हूँ स्कॉच से. वो ज्यादा स्ट्रांग होती है. शायद कुछ बेहतर अहसास दे. एक भ्रम ही सही मगर और रास्ता भी क्या है?<br /><br />मैं फिर स्कॉच का गिलास लिये खिड़की पर खड़े उस आईलेन्ड को निहारने लगता हूँ<span style="font-weight:bold;"> जिसे लोग सेन्ट्रल आईलेण्ड कहते हैं.</span><br /><br />टोरंटो का मुख्य आकर्षण केन्द्र. दिन भर सेलानियों का फेरी से आने जाने का तांता लगा रहता है.<br /><br />चारों तरफ सिर्फ पानी मगर फिर भी अपना जमीनी अस्तित्व बरकरार रखे हुये लोगों को आकर्षित करता!! <br /><br />लेकिन मेरा अस्तित्व, उसे मैं बरकरार नहीं रख पाया और न ही मुझमें अब कोई आकर्षण शेष रहा!!!<br /><br />यही हाल होता है अपनी जड़ों से दूर-उपर से महकती क्लोन की खुशबू और भीतर से उठती पसीने की वही गांव वाली बू!!<br /><br />दोनों की मिली जुली गंध- <span style="font-weight:bold;">तेजाब से तीखी गंध का भीतरी अहसास</span>-जो सिर्फ मैं महसूस कर सकता हूँ. उस गंध की जलन से मेरी आँखें जलने लगती हैं और बह निकलती है एक अविरल अश्रुधारा. <br /><br /><span style="font-weight:bold;">ऐसे आँसू, जो किसी को नहीं दिखते.</span> दिखती है तो सिर्फ मेरी वो मुस्कराहट और आती है सिर्फ मेरे उस कोलोन की खुशबू, जिसमें दफन किये फिरता हूँ अपने इन आँसूओं को और <span style="font-weight:bold;">उस गांव वाली पसीने की बू को.</span><div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/23257105-490054178346865351?l=udantashtari.blogspot.com'/></div>Udan Tashtarihttp://www.blogger.com/profile/06057252073193171933sameer.lal@gmail.com95tag:blogger.com,1999:blog-23257105.post-49070984044563664972009-06-09T06:53:00.002+05:302009-06-09T06:59:47.353+05:30मृत्यु का बुलावा जब भेजेगा तो आ जाऊँगा....आज सुबह सुबह एक<span style="font-weight:bold;"> हृदय विदारक दुखद समाचार</span> मिला.<br /><br />एक सड़क दुर्घटना में मंच के लोकप्रिय कवि ओम प्रकाश आदित्य, नीरज पुरी और लाड सिंह गुज्जर का निधन हो गया और ओम व्यास तथा ज्ञानी बैरागी गंभीर रूप से घायल हुए हैं. सभी विदिशा से भोपाल एक इनोवा द्वारा म.प्र. संस्मृति विभाग द्वारा आयोजित कवि सम्मेलन में भाग ले कर वापस आ रहे थे.<br /><br />एक शोक सूचना और- वरिष्ठ रंग-कर्मी हबीब तनवीर का भोपाल में ८६ वर्ष की उम्र में निधन हो गया. रंगमंच की एक महत्वपूर्ण कठपुतली को जगत-नियंता ने अपने पास वापस बुला लिया.<br /><br /><span style="font-weight:bold;">हबीब तनवीर जी, आदित्य जी, नीरज पुरी जी, और लाड सिंह गुज्जर जी</span> को अश्रुपूरित श्रद्धांजलि <br /><br />और <br /><br /><span style="font-weight:bold;">ओम व्यास तथा बैरागी जी</span> शीघ्र स्वास्थय लाभ की कामना.<br /><br />वाकई, <span style="font-weight:bold;">आज का दिन "मंच" पर वज्रपात का दिन है.</span><br /><br /><span style="font-weight:bold;">आदित्य जी</span><br /><br /><td><a href="http://picasaweb.google.ca/lh/photo/ZzNnhxb2R5PfxOhsSuPXSQ?authkey=Gv1sRgCISf1_uP1MyA_wE&feat=embedwebsite"><img src="http://lh6.ggpht.com/_N7sdMZXEIvI/Si23490pYpI/AAAAAAAADhc/OEZGOJuugg8/s800/OM%20PRAKASH%20ADITYA.jpg" /></a></td></tr><tr><td style="font-family:arial,sans-serif; font-size:11px; text-align:right"><a href="http://picasaweb.google.ca/sameer.lal/BloggerPictures?authkey=Gv1sRgCISf1_uP1MyA_wE&feat=embedwebsite"></a></td><br /><br /><span style="font-weight:bold;">नीरज पुरी जी</span><br /><br /><td><a href="http://picasaweb.google.ca/lh/photo/EXtFOaSOcS_ASaYc-4k2yQ?authkey=Gv1sRgCISf1_uP1MyA_wE&feat=embedwebsite"><img src="http://lh6.ggpht.com/_N7sdMZXEIvI/Si235K5QJnI/AAAAAAAADhk/xxKeazsF7Ok/s800/niraj-puri.jpg" /></a></td></tr><tr><td style="font-family:arial,sans-serif; font-size:11px; text-align:right"><a href="http://picasaweb.google.ca/sameer.lal/BloggerPictures?authkey=Gv1sRgCISf1_uP1MyA_wE&feat=embedwebsite"></a></td><br /><br /><br /><span style="font-weight:bold;">लाड सिंह गुज्जर जी</span><br /><br /><td><a href="http://picasaweb.google.ca/lh/photo/qlyVGvdxq6CGYalziZvVzQ?authkey=Gv1sRgCISf1_uP1MyA_wE&feat=embedwebsite"><img src="http://lh5.ggpht.com/_N7sdMZXEIvI/Si2345qIxEI/AAAAAAAADhY/0W2_rHb5PCM/s800/gurjar%5B11%5D.jpg" /></a></td></tr><tr><td style="font-family:arial,sans-serif; font-size:11px; text-align:right"><a href="http://picasaweb.google.ca/sameer.lal/BloggerPictures?authkey=Gv1sRgCISf1_uP1MyA_wE&feat=embedwebsite"></a></td><br /><br /><span style="font-weight:bold;">हबीब तनवीर जी</span><br /><br /><td><a href="http://picasaweb.google.ca/lh/photo/xaAVuBBLwfUqfstjf7AU1w?authkey=Gv1sRgCISf1_uP1MyA_wE&feat=embedwebsite"><img src="http://lh6.ggpht.com/_N7sdMZXEIvI/Si235BjUHTI/AAAAAAAADhg/zRe5KdQL17Q/s800/habib_tanvir.jpg" /></a></td></tr><tr><td style="font-family:arial,sans-serif; font-size:11px; text-align:right"><a href="http://picasaweb.google.ca/sameer.lal/BloggerPictures?authkey=Gv1sRgCISf1_uP1MyA_wE&feat=embedwebsite"></a></td><br /><br />जब जब ख्याल आता है तो <span style="font-weight:bold;">आदित्य जी की यह रचना</span> उनकी विशिष्ट स्वर लहरी में कानों में गुँजने लगती है.<br /><br /><br />दाल रोटी दी तो दाल रोटी खाके सो गया मैं<br />आँसू तूने दिये आँसू पीये जा रहा हूँ मैं<br />दुख तूने दिये मैने कभी न शिकायत की<br />सुख दिये तूने सुख लिए जा रहा हूँ मैं<br />पतित हूँ मैं तो तू भी पतित पावन है<br />जो तू कराता है वही किए जा रहा हूँ मैं<br /><span style="font-weight:bold;">मृत्यु का बुलावा जब भेजेगा तो आ जाऊँगा<br />तूने कहा जिये जा तो जिये जा रहा हूँ मैं</span><br />बचपन में खिलौने, जवानी में जोश <br />और बुढ़ापे में आदमी का धन साथ देता है<br />संपत्ति में साथ देने तो हजारों आ जाते हैं<br />विपत्ति में प्रभु का मनन साथ देता है<br />तन स्वस्थ रहे तो ये मन भी न होता पस्त<br />मन मस्त रहे तो ये तन साथ देता है<br />हिम्मत के हथियार हाथ से जो खिसके तो<br />तन साथ देता है न मन साथ देता है.<br /><br /><br />-बस, आज इतना ही. अगर इस रचना को आदित्य जी की आवाज में सुनने का मन हो तो <a href="http://www.youtube.com/watch?v=8OYHhoi9Em4">यू ट्यूब पर यहाँ</a> सुनें.<div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/23257105-4907098404456366497?l=udantashtari.blogspot.com'/></div>Udan Tashtarihttp://www.blogger.com/profile/06057252073193171933sameer.lal@gmail.com71tag:blogger.com,1999:blog-23257105.post-36226347848813040492009-06-01T06:49:00.003+05:302009-06-01T07:05:15.155+05:30कुछ निवेदन और पहेली का जबाब एवं विजेताजब कालेज में पढ़ा करते थे, <span style="font-weight:bold;">अमिताभ बच्चन टॉप पर थे.</span> जो फिल्म आये, हिट होती थी. हॉल में नई फिल्म में सुबह ६ बजे से शो शुरु हो जाते थे और रात १२ बजे तक चलते रहते थे. <br /><br /><span style="font-weight:bold;">जमाने में बहुत कुछ नहीं बदला</span>, उनमें से एक बात यह भी नहीं बदली कि तब भी टिकिट के ब्लैकिये तबीयत से पुलिस की मिलिभगत में कारोबार करते थे और आज भी. अमिताभ की किसी भी नई फिल्म के शुरुवाती हफ्ते उनके लिए धन्धे का व्यस्त समय होते थे.<br /><br />अब का पता नहीं मगर तब अमिताभ का ऐसा क्रेज होता था कि कालेज के आधे से ज्यादा लड़के, जिसमें हम खुद भी शामिल थे, <span style="font-weight:bold;">कान को ढके बाल के साथ उल्टा सेवन वाली कलम रखा करते थे.</span> फिल्म खत्म होने पर यही वीर दोनों हाथ पाकेट में डाले सर झुकाये टहलते हुए निकलते थे <span style="font-weight:bold;">मानो खुद ही अमिताभ हों.</span> हर चेहरे पर उसी के समान गुस्सा और एक विद्रोह का भाव.<br /><br />हमारे साथ पढ़ते थे नीरज शर्मा.<span style="font-weight:bold;"> एक मात्र योग्यता के आधार पर कि वह ६ फुट से कुछ ज्यादा थे, </span>वो अपने आप को अमिताभ बच्चन समझते थे. वही स्टाईल बिल्कुल कॉपी. शायद शीशा देखने के आदी न रहे होंगे तो मुगालते में पलते रहे.<br /><br /><span style="font-weight:bold;"> हम दोस्तों का सच्चा झूठा प्रोत्साहन तो साथ रहता ही था बाफर्ज,</span> सब उसे अमित कह कर ही पुकारते थे और वह दिन भी आ गया, जब वो एक ऑर्केस्ट्रा के साथ <span style="font-weight:bold;">अमिताभ बच्चन की नकल करते मंच पर नज़र आने लगे.</span> मंच की चकाचौंध, स्टाईल ,चश्मा, बाल आदि में वो वाकई अमिताभ सा ही लगता था दर्शक दीर्घा से.<br /><span style="font-weight:bold;"><br />देखा, प्रोत्साहन का नतीजा!!</span><br /><br />यह सूत्र जीवन हर क्षेत्र में लागू होता है. लेखक या कवि लिख रहा है, माना कि नया है और बहुत अच्छा न भी लिख रहा हो मगर एक मुगालते में तो है ही कि वो लेखक है या कवि है. ६ फुट से ज्यादा होने की तरह एकाध क्वालिटी तो है ही तभी तो कम्प्यूटर पर लिख पा रहा है ब्लॉग खोल कर.<span style="font-weight:bold;"> उसे भी लाइम लाईट में लाओ भाई.</span> <br /><br />जरुरत है बस तुम्हारे प्रोत्साहन की और तुम हो कि अपनी लेखनी पर फूले पिचके मूँह फुलाये बैठे हो. कुछ बोलते ही नहीं. <span style="font-weight:bold;">कभी अपने शुरुवाती लेखन को भी देखना और फिर आज का.</span> क्या शुरु से ही ऐसा ही लिख रहे हो. फिर?? वो भी नया आया है लेखन में जैसे कभी तुम आये थे. बस, दरकार है उसे तुम्हारे प्रोत्साहन की. <span style="font-weight:bold;"><br /><br />भय मत खाओ कि वो तुम्हें पीछे छोड़ कर आगे निकल जायेगा.</span> सो तो अपने इस दंभ के तले यूँ भी छूट जाओगे. विश्वास करो प्रोत्साहन देने से तुम्हारा कुछ नहीं बिगड़ेगा मगर उसका बहुत कुछ बन जायेगा.<br /><br />बस, आज इतना ही. किसी की ईमेल आई है<span style="font-weight:bold;"> जिसने ब्लॉग जगत में आई टिप्पणियों की मंदी और पुराने लिख्खाड़ों द्वारा नये लोगों के ब्लॉग पर टिप्पणी न देने पर चिन्ता और मायूसी जाहिर की गई है.</span> बात उनकी सही लगी, तो निवेदन दर्ज कर दिया.<br /><br /><br /><span style="font-weight:bold;">अब, पिछली पोस्ट पर पूछी गई पहेली:</span><br /><br />पहली बात तो उस आलेख का उदगम स्थल था निशान्त मिश्र जी का ब्लॉग <a href="http://hindizen.com/">हिन्दी जेन</a> पर २९ मई को पूछी गई पहेली पर आई बेनामी जी की टिप्पणी.<br /><br /><span style="font-weight:bold;">पहेली के चित्र:</span><br /><br /><td><a href="http://picasaweb.google.ca/lh/photo/u7BZGb3R_HNNdyWnFBaX8Q?feat=embedwebsite"><img src="http://lh6.ggpht.com/_N7sdMZXEIvI/SiBpEKiRunI/AAAAAAAADVQ/DRU5yGbhtVg/s800/teen%20blogger.jpg" /></a></td></tr><tr><td style="font-family:arial,sans-serif; font-size:11px; text-align:right"><a href="http://picasaweb.google.ca/sameer.lal/BloogerMeet?feat=embedwebsite"></a></td><br /><br />का <span style="font-weight:bold;">सही जबाब:</span><br /><br />ऊपर: <a href="http://halchal.gyandutt.com/">श्री ज्ञान दत्त पांडे</a> <br /><br />चश्मा: <a href="http://shabdavali.blogspot.com/">श्री अजीत वडनेकर</a> <br /><br />नीचे: <a href="http://anuragarya.blogspot.com/">डॉ अनुराग आर्या</a> <br /><br /><td><a href="http://picasaweb.google.ca/lh/photo/Zsnn-8KxW8t4sLHUX5lVag?feat=embedwebsite"><img src="http://lh6.ggpht.com/_N7sdMZXEIvI/SiMnaVSFTeI/AAAAAAAADV8/hY_UogcI-zg/s800/3in1.jpg" /></a></td></tr><tr><td style="font-family:arial,sans-serif; font-size:11px; text-align:right"><a href="http://picasaweb.google.ca/sameer.lal/BloogerMeet?feat=embedwebsite"></a></td><br /><br /><span style="font-weight:bold;">विजेता रहे:</span><br /><br /><span style="font-weight:bold;">प्रथम:</span> <a href="http://taau.taau.in/">ताऊ रामपुरिया</a> <br /><br /><td><a href="http://picasaweb.google.ca/lh/photo/TRrmJjizBF5VvaPdwXYc1g?feat=embedwebsite"><img src="http://lh6.ggpht.com/_N7sdMZXEIvI/SiMnaRBpRTI/AAAAAAAADWA/TXByNl879jo/s800/ufo_award.jpg" /></a></td></tr><tr><td style="font-family:arial,sans-serif; font-size:11px; text-align:right"><a href="http://picasaweb.google.ca/sameer.lal/BloogerMeet?feat=embedwebsite"></a></td><br /><br /><span style="font-weight:bold;">द्वितीय:</span> <a href="http://www.laviza.com/">सैयद</a> <br /><br /><span style="font-weight:bold;">तीसरे नम्बर पर:</span> <a href="http://sanjusandesha.blogspot.com/">संजय तिवारी ’संजू’</a> <br /><br /><span style="font-weight:bold;">चौथे:</span> <a href="http://halchal.gyandutt.com/">श्री ज्ञान दत्त पांडे जी</a> <br /><br /><br /><span style="font-weight:bold;">विजेताओं को बधाई.</span><br /><br /><br />सभी प्रतिभागियों का बहुत आभार और बधाई.<br /><br /><br /><span style="font-weight:bold;">चलते चलते:</span> <br /><br />तीन चार पोस्ट पहले कविता पर एक टिप्पणी आई:<br /><br /><span style="font-weight:bold;">’सहनीय रचना’</span><br /><br />हम चकित. सब इतनी तारीफ मचाये हैं और ये भाई जी कह रहे हैं ’सहनीय रचना’. रात भर जागे रहे कि ये क्या हुआ. फिर एकाएक सुबह के सूरज के साथ दिमाग खुला कि <span style="font-weight:bold;">टंकण त्रुटि</span> के चलते <span style="font-weight:bold;">’सराहनीय रचना’</span> की जगह <span style="font-weight:bold;">’सहनीय रचना’</span> लिख गया होगा. बस, पूरे उत्साह से टिप्पणीकर्ता को ईमेल लिखी गई और निवेदन किया गया कि शायद टंकण त्रुटि रह गई है और <span style="font-weight:bold;">प्रोत्साहन की आदत के चलते जोड़ दिया कि अक्सर जल्दबाजी में ऐसा हो जाता है.</span> जबाब आने में जरा भी समय नहीं लगा. लिखा कि ’<span style="font-weight:bold;">भाई उड़न जी,</span> आपसे सहमत हूँ कि जल्दबाजी में ऐसा हो जाना संभव है किन्तु यह टिप्पणी तो जल्दबाजी में नहीं लिखी है. <span style="font-weight:bold;">दरअसल मैं वही कहना चाह रहा था जो आप पढ़ रहे हैं. </span><br />अब??<br /><br />अब क्या-<span style="font-weight:bold;">रिजेक्ट</span>-मॉडरेशन का फायदा उठा लिया. इसीलिए कहता हूँ कि मॉडरेशन लगाओ. यह तो अच्छी सलाह थी जिसने मुझे अपनी रचनाओं पर पुनर्विचार का मौका दिया, बस जरा दंभ आड़े आ गया. इन्सान हूँ और गलत फैसले लेना इन्सानी स्वभाव, मैं कैसे अछूता रह सकता हूँ तो हो गया गलत फैसला रिजेक्ट करने का. मगर अक्सर लोग उट पटांग बातें लिख कर भाग जाते हैं, यहाँ तक की गाली गलोज भी. उसे <span style="font-weight:bold;">तो आप कंट्रोल कर ही सकते हो मॉडरेशन से बात बढ़ाने की बजाये.</span><div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/23257105-3622634784881304049?l=udantashtari.blogspot.com'/></div>Udan Tashtarihttp://www.blogger.com/profile/06057252073193171933sameer.lal@gmail.com69tag:blogger.com,1999:blog-23257105.post-76263233311779763562009-05-30T07:19:00.005+05:302009-05-30T07:34:18.027+05:30क्या बूझूँ, क्या याद करुँ? : पहेलियों का माया जाल!!<span style="font-weight:bold;">लिखने के पहले साफ कर दें</span> कि हम तो खुद ही पहेली बूझने सबसे पहली पंक्ति में खड़े रहते हैं और <a href="http://taau.taau.in/">ताऊ पहेली</a> पर हैट्रिक लगाकर <span style="font-weight:bold;">’महा ताऊ श्री’</span> एवं संचालक मंडल का हिस्सा भी बन गये हैं लेकिन यह आलेख किसी बेनामी की भावनाओं की गिरफ्त में लिखा जा रहा है. अब बूझ के बताओ कि उस बेनामी नें कब और कहाँ ऐसी टिप्पणी की कि इस आलेख का जन्म हुआ. <br /><br /><span style="font-weight:bold;">वैसे भी सदाचार का भाषण देने के लिए सदाचारी होना कोई जरुरी थोड़े ही है</span> वरना तो बाबा लोगों के मंचो पर आकाल पड़ जायेगा. ये दूसरी बात है कि मोटी चमड़ी वाले ये बाबा आकाल के बाद भी मासूम किसानों की तरह आत्म हत्या नहीं करने वाले. इनका क्या है, नेता हो लेंगे.<br /><br />आजकल पूरा ब्लॉगजगत लाल बुझक्कड़ बना हुआ है. <br /><br /><span style="font-weight:bold;">लाल बुझक्कड बूझ गए,और ना बूझा कोय<br />पैर में चक्की बांध के हिरणा कूदा होय</span><br /><br />जिसे देखो, एक ठो तस्वीर लिए चला आ रहा है कि <span style="font-weight:bold;">’पहचानों कौन?’</span> और हम जैसे दसियों पीर जुटे हैं अटकल लगाने में. जितनी देर लगती है एक पहेली का जबाब ढ़ूंढने में, उतनी देर में कम से कम दस ब्लॉग को जिन्दाबाद कर आये होते. <span style="font-weight:bold;">भारत जैसा हाल है, जितने का गबन हुआ, उससे कई गुना ज्यादा जाँच समितियाँ निपटा गईं और हाथ आया सिफर.</span><br /><br />मगर नाम का मोह छूटे जब न!! यहाँ भी हमारा नाम रहे, वहाँ भी और वहाँ भी. कई बार तो खुद से कहने लगता हूँ कि अरे महाराज, जितना गुगल पर दौड़ रहे हो जबाब ढूंढने, इतने का दस परसेन्ट भी अगर ब्लॉगजगत के बाहर दौड़ लगाई होती तो इतनी सॉलिड और छरहरी बॉडी बन जाती कि खुद का फोटू लगा कर पूछ सकते थे, <span style="font-weight:bold;">’पहचान कौन?’</span><br /><br /><span style="font-weight:bold;">लोग अटकलें लगाते</span> कि पक्का अमिताभ है, कोई कहता सलमान है तो कोई कहता शाहरुख मगर कोई सच न बता पाता. फिर हम क्लू देते कि हैं उन्हीं टाईप, वेरी क्लोज मगर वो नहीं हैं. दाई ओर देख, बाईं ओर देख और जाने क्या क्या क्लू!!<br /><br /><span style="font-weight:bold;">अब आजकल तो हिट ही हो रही है.</span> किसी भी ब्लॉगर का फोटू उठाया, फोटो शॉप खोली, स्मज टूल पकड़ा और लगे फोटू की बैण्ड बजाने और चिपका दिया-’पहचान कौन?’ क्या खाक पहचानें? जिसकी है वो तक तो पहचान नहीं पा रहा. यहाँ तक कि अगर पूछने वाले के पास से नाम गुम जाये तो पहेली का परिणाम घोषित करना भारी पड़ जाये.<br /><br /><span style="font-weight:bold;">फोटो पर कुछ कलाकारी करो</span> कि जैसे आँख किसी की, मूँह पर आधा किसी का और आधा किसी का, फिर पूछो कि तीनों को पहचानों, तो फिर भी समझे. पूरा रगड़ मारो और फिर पूछो कि ’पहचान कौन?’ यह तो नाईन्साफी है. इतना भी पूछ लेते कि यह क्या है तो भी न बता पाते कि किसी ब्लॉगर की तस्वीर है. बस, आधे कहते कि फूल है, कोई कहता समुन्द्र तो कोई आसमान बताता. <span style="font-weight:bold;">ऐसी हालत कर देते हो तुम फोटू की.</span><br /><br />इनके लफड़े में पड़े तो अपनी आदत खराब हुई जा रही है. कहीं फोन करो अगला नेचुरली पूछता है कि कौन बोल रहे हैं और हम बिगड़ी आदत लिए, ’बूझो तो जाने?’. फिर वो कहता है कि ’नहीं पहचान पा रहे हैं’ हम इधर से पूछ रहे हैं कि ’क्लू दूँ क्या?’ <span style="font-weight:bold;">दोस्त पागल सा समझने लगे हैं.</span><br /><br />कहीं पत्ती मिल जाये, मरा जानवर मिल जाये, टूटा फल मिल जाये, कोई उल्टा टंगा दिख जाये-बस, लगे फोटो लेने. पत्नी पूछा रही है कि इस फोटू का क्या करोगे तो बस एक जबाब, ’पहेली पूछूँगा’.. मानो पहेली न हुई, किसी गरीब का हाल हो गया. जो नेता आ रहा है, पूछ कर चला जा रहा है. बूझने को कोई बूझ नहीं पा रहा है. अब, पत्नी ने भी ध्यान देना बंद कर दिया है. <span style="font-weight:bold;">पागल के साथ जीना भी इन्सान सीख ही जाता है खास तौर पर अगर वो आपकी पत्नी हो.<br /></span><br /><br />अब तुम पहेलीबाजों से क्या कहूँ कि एक तो ये बूझने, पूछने वाली नित नौटंकी फैलाये हो फिर उस पर से तुर्रा यह कि <span style="font-weight:bold;">’यह १०० वीं पोस्ट है’ बधाई दो..</span>अरे, अगर यही पोस्ट है तो हफ्ते भर में १०० कर डालें. :) फिर देते रहना ’साप्ताहिक बधाई’.<br /><br />पहेली वो पूछ मेरे आका जिससे कुछ ज्ञान बढ़े. वाकई कुछ जानकारी मिले. ब्लॉगर कायदे के पन्नों में जाकर स्मारकों को, ज्ञानियों को ढूंढे और उनके बारे में जाने. <span style="font-weight:bold;"><a href="http://taau.taau.in/">ताऊ</a> को देखो, एक से एक स्मारक ला रहा है, ऐतिहासिक महत्व की और फिर उसके बारे में पूरी जानकारी.</span> कितना ज्ञावर्धन होता है. कुछ तो सीखो. <br /><br /><td><a href="http://picasaweb.google.ca/lh/photo/vnfJsRSP-2qMrov-1eECpg?feat=embedwebsite"><img src="http://lh4.ggpht.com/_N7sdMZXEIvI/SiBxV7KcrUI/AAAAAAAADVU/Px8b_BPOQYY/s800/birdcatcher.jpg" /></a></td></tr><tr><td style="font-family:arial,sans-serif; font-size:11px; text-align:right"><a href="http://picasaweb.google.ca/sameer.lal/BloogerMeet?feat=embedwebsite"></a></td><br /><br />सिर्फ खेल खेल करना है तो आओ, <span style="font-weight:bold;">ताश वाला जुआ खेलें.</span> अगर समय खोटी जाये तो कुछ कमाई धमाई का जुगाड़ भी बैठे.<br /><br />वैसे तो जिसको जो खेल खिलाना हो, खिलाओ. हम तो बस मौज लेने निकले थे सो ले ली.<br /><br /><span style="font-weight:bold;"><br />अब बुरा लगा हो तो इसका जबाब देना:</span><br /><br /><td><a href="http://picasaweb.google.ca/lh/photo/u7BZGb3R_HNNdyWnFBaX8Q?feat=embedwebsite"><img src="http://lh6.ggpht.com/_N7sdMZXEIvI/SiBpEKiRunI/AAAAAAAADVQ/DRU5yGbhtVg/s800/teen%20blogger.jpg" /></a></td></tr><tr><td style="font-family:arial,sans-serif; font-size:11px; text-align:right"><a href="http://picasaweb.google.ca/sameer.lal/BloogerMeet?feat=embedwebsite">तीन ब्लॉगर्स</a></td><br /><br /><span style="font-weight:bold;">इस एक फोटो में तीन ब्लॉगर है.</span> माथा और उपर-एक, चश्मा और आँख-दो और आधी नाक और उसके नीचे-तीन. तीन के तीनों नामी गिरामी धाकड़ ब्लॉगर. <br /><br /><span style="font-weight:bold;">पहचानो कौन??</span><br /><br />वैसे, मैं इस फील्ड में नहीं आ रहा हूँ तो निश्चिंत रहो. आज पूछ इसलिए लिया कि तुम्हारे पास कहने को रहे कि तुम भी तो वही कर रहे हो. <span style="font-weight:bold;">माईनोरटि में जाते डर लग रहा है न इसलिए.</span><br /><br /><span style="font-weight:bold;">अंत मे:</span> कोई बुरा मत मान जाना भाई. आज कहीं एक बेनामी टिप्पणी पढ़ी, उसी का सार संक्षेप है. :)<br /><br /><br /><span style="font-weight:bold;">जरुरी सूचना:</span> <span style="font-style:italic;">कल ५ दिन के लिए <span style="font-weight:bold;">केलिफोर्निया</span> जा रहे हैं. ७ घंटे की लम्बी दूरी की हवाई यात्रा है. नेट से दूरी रहेगी मगर पहुँच कर जुड़ने का प्रयास रहेगा.</span><div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/23257105-7626323331177976356?l=udantashtari.blogspot.com'/></div>Udan Tashtarihttp://www.blogger.com/profile/06057252073193171933sameer.lal@gmail.com83tag:blogger.com,1999:blog-23257105.post-4788872792916474442009-05-28T06:51:00.001+05:302009-05-28T06:58:21.154+05:30सावधानी हटी और दुर्घटना घटीकल कहीं एक <span style="font-weight:bold;">बहुत बेहतरीन चेतावनी</span> पढ़ रहा था:<br /><br />’यदि आपकी उम्र ५० से अधिक है और सुबह नींद खुलने पर आपके शरीर के किसी भी हिस्से में दर्द नहीं है तो शायद आप मर चुके हैं. <span style="font-weight:bold;">जरा, चैक कर लिजिये</span>.’<br /><br />अब मर ही गये हैं तो क्या खाक चैक करें जी. मरे ही ठीक. डले रहेंगे. कोई न कोई मरघट तक पहुँचा ही देगा.<br /><br />मुझे लगता है कि<span style="font-weight:bold;"> यह पंक्ति बदली जा सकती है</span>:<br /><br />’यदि आप<span style="font-weight:bold;"> ब्लॉगर हैं या कम्प्यूटर पर ३ घंटे से ज्यादा समय बिताते हैं</span> तो आप ने उम्र पर विजय प्राप्त कर ली है. आपको ५० का होने की जरुरत नहीं. किसी भी उम्र में उपरोक्त वाक्य सिद्ध माना जा सकता है.’<br /><br /><span style="font-weight:bold;">मर जाने का उम्र से क्या लेना देना</span>. आजकल तो २२-२३ साल के युवाओं को हार्ट अटैक आये जा रहे हैं.<br /><br />ऐसे नहीं कि इन पर विजय नहीं प्राप्त की जा सकती.<span style="font-weight:bold;"> निश्चित ही अनुशासित जीवन, नियमित और पौष्टिक खुराक और सही व्यायाम के साथ इनको हराया जा सकता है.</span> <br />(मेरी तस्वीर इतने आश्चर्य से क्या देख रहे हो? <span style="font-weight:bold;">ज्ञान बाँटने के लिए ज्ञानी होना जरुरी थोड़े है</span> और ज्ञान बाँटने वाला अगर सारी बातों पर अमल करे तो ये जितने बाबा हवाई जहाज से आकर मंच पर तुम्हें भाषण देकर ऐश कर रहे हैं, वो भीख मांग रहे होते और जंगल में रहते)<br /><br />तो बात करें सही व्यायाम की. ५० के बाद वाले छोड़ो, उसे तो हम भी छोड़े ही हुए हैं. अभी तो बस वो कम्प्यूटर पर ३ घंटे से ज्यादा बिताने वालों की देखो. वो ज्यादा जरुरी हैं तुम्हारे लिए क्योंकि जब यह ब्लॉग पढ़ रहे हो तो कम्प्यूटर प्रेमी तो होगे ही वरना तो अंग्रेजी की कुछ वेब साईट देख कर खिसक लेते. <br /><br /><span style="font-weight:bold;">मैं एक ऐसे सज्जन को जानता हूँ</span> जो रोज नियम से सुबह आधा घंटे नेट पर टाईम्स ऑफ इंडिया पढ़ते हैं और बस!! इसके सिवाय कम्प्यूटर से कुछ लेना देना नहीं. पान की दुकान में गर्व से सीना चौड़ा कर बताते हैं कि हम तो न्यूज कम्प्यूटर पर ही देखते हैं. भले आदमी, सिर्फ टाईम्स ऑफ इंडिया पढ़ने के लिए कम्प्यूटर और फिर नेट का कनेक्शन, कम्प्यूटर ढ़कने की चादर, टेबल, कुर्सी, एसी और जाने क्या क्या इन्वेस्टमेन्ट कर डाला.<span style="font-weight:bold;"> अब समझे मंदी का असल जिम्मेदार कौन.</span> सारा का सारा डेड इन्वेस्टमेन्ट.<br /><br />उनकी वो जाने आप तो व्यायाम देखो:<br /><br /><td><a href="http://picasaweb.google.ca/lh/photo/lv9XK_e2_sh0_ktOCi6A8w?feat=embedwebsite"><img src="http://lh5.ggpht.com/_N7sdMZXEIvI/Sh3jGzbslvI/AAAAAAAADUc/XhSwrrGVQ5A/s800/compu%20exercise.jpg" /></a></td></tr><tr><td style="font-family:arial,sans-serif; font-size:11px; text-align:right"><a href="http://picasaweb.google.ca/sameer.lal/BloogerMeet?feat=embedwebsite">व्यायाम</a></td><br /><br /><span style="font-weight:bold;">१.</span> कभी २० मिनट से ज्यादा स्क्रीन पर लगातार मत देखो.<br /><br />-हर २० मिनट बाद, आँख कम्प्यूटर स्क्रीन से हटाकर चार बार एक आँख जोर से मींचो और चार बार दूसरी और फिर चार बार दोनों एक साथ. फिर दोनों हथेलियों को आपस में ७ से ८ बार घिसो, घिसो और दोनों आँखों पर हथेली लगाओ. फिर घिसो, फिर लगाओ-ऐसा भी चार बार करो. अब फिर से काम करने को तैयार. समय खर्च हुआ ३० सेकेंड से कम और आँख रहे चकाचक.<br /><br /><span style="font-weight:bold;">सावधानी:</span> अगर दफ्तर में या साईबर कैफे में हो, तो आँख मींचने के पहले देख लो कि मूँह किसी लड़की की ओर तो नहीं. वरना आँख तो सही हो जायेगी और जो मार पड़ेगी, उससे बाकी हड्डियाँ हिल सकती हैं.<br /><br /><span style="font-weight:bold;">२.</span>कुर्सी पर बैठे बैठे काम करते करते पंजे के बल ऐड़ी उपर उठाओ, कुछ देर रुको और फिर ऐड़ी जमीन पर छुलाओ. ऐसा जब भी याद आये, कर लो. कोई समय सीमा नहीं, कोई निश्चित आवृति नहीं. पैरों का ब्लड सर्कूलेशन बना रहेगा. कई जो <span style="font-weight:bold;">धुटने में दिमागधारी हैं, उनके लिए तो रामबाण</span>.<br /><br /><span style="font-weight:bold;">सावधानी:</span> सिर्फ ऐड़ी उठाना है, खुद को नहीं वरना अगर हमारी जैसी कायाधारी हो तो मोच आ सकती है और दूसरा पड़ोस के क्यूबिकल में बैठी सुकन्या को गलतफहमी हो सकती है कि तुम उचक उचक कर उसे ताक रहे हो. कहीं कम्पलेन्ट कर दी तो मंदी में तो दूसरी नौकरी भी मिलने से रही.<br /><br /><span style="font-weight:bold;">३.</span> हर १ से १.३० घंटे में अपने दोनों हाथ सामने सीधे फैला लो. दोनों हथेली जमीन को देख रही हो. फिर हाथ को यथास्थिति में रखते हुए हथेली के उपर उठाओ ताकि वो सामने की दीवाल देखने लगे, जितना ज्यादा देख सके. फिर उसे नीचे झुकाओ ताकि अब वो उल्टा हो तुम्हें देखे और उँगलियों की पोर जमीन को. ऐसा दस बार करो. फिर हाथ सीधा रखते हुए १० बार मुट्ठी भींच कर बंद करो और पूरी हथेली फैला कर खोलो. फिर पांच बार बंद मुठ्ठी को कलाई से बाईं ओर घुमाओ और पांच बार दाईं ओर. फिर हाथ सामन्य स्थिति में ले आओ और काम पर लग जाओ.<br /><br /><span style="font-weight:bold;">सावधानी:</span> समझदार तो हो ही. मुठ्ठी खोलते और बंद करते वक्त कंडिका १ वाली ही सावधानी बरतो, वरना कोई सिर फिरी हुई तो कंडिका १ वाली ही परेशानी हो सकती है. ये उपर वाले फोटो से कन्फ्यूज मत होना. इन्हें तो कहीं भी बिना सावधानी कुछ भी करना एलाउड है. इनका साथ देने हजार आ जायेंगे और तुमको पीटने भी हजार. <br /><br /><span style="font-weight:bold;">४.</span> दिन में कम से कम दो से तीन बार दोनों हथेलियों को बैठे बैठे गरदन के पीछे ले जाओ और हथेलियों की आपस में उँगलियों से फंसा लो. फिर दोनों हथेलियों को गरदन से धक्का दो. सामान्य हो जाओ और फिर धक्का दो जब तक बरदाश्त हो. ऐसा कम से कम पाँच बार करो, फिर सामान्य स्थिति में आ जाओ.<br /><br /><span style="font-weight:bold;">सावधानी:</span> इसमें क्या सावधानी?? आदत पड़ गई सावधानी पूछने की ३ ही बार में तो चलो बता देते हैं: ध्यान रखो कि बॉस आस पास न हो वरना इस मुद्रा में वो समझेगा कि तुम काम से बोर हो गये हो. फिर अन्जाम तो तुम जानते ही हो.<br /><br /><br />और भी अनेक व्यायाम है मगर अभी के लिए इतना करते रहो. ज्यादा समय तक कम्प्यूटर पर बैठ पाओगे और<span style="font-weight:bold;"> इसके लिए तैयार नहीं हो तो ब्लॉग डिलिट करो और चाय की दुकान पर जा कर पहले की तरह गपियाओ और पान खाकर चले आना.</span> मुद्दे बहस के वहाँ भी खूब हैं, बोर नहीं होगे.<br /><br /><span style="font-weight:bold;">पान की दुकान पर सावधानी:</span> यहाँ ब्लॉग पर फालतू बहस करने में लिख कर गाली पड़ती है और वहाँ चाय की दुकान पर फालतू बहस करने पर सीधे गरियाये जाओगे और लतियाये जाने का भी खतरा है.<div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/23257105-478887279291647444?l=udantashtari.blogspot.com'/></div>Udan Tashtarihttp://www.blogger.com/profile/06057252073193171933sameer.lal@gmail.com79tag:blogger.com,1999:blog-23257105.post-2407978646552399742009-05-26T07:03:00.002+05:302009-05-27T19:56:41.554+05:30मैं अनाथ हुआ!!<span style="font-weight:bold;"><br />आज कुछ भी भूमिका बाँधने की न तो इच्छा है और न ही जरुरत!!</span> <br /><br />सीधे पढ़िये मनोभाव, बड़े अजीब से हैं:<br /><br /><td><a href="http://picasaweb.google.ca/lh/photo/Xy_ZaGz6dWEsxItmrhAltA?feat=embedwebsite"><img src="http://lh5.ggpht.com/_N7sdMZXEIvI/ShtF8gTLQvI/AAAAAAAADSE/gzIOFdODGtc/s800/sad_man.jpg" /></a></td></tr><tr><td style="font-family:arial,sans-serif; font-size:11px; text-align:right"><a href="http://picasaweb.google.ca/sameer.lal/BloogerMeet?feat=embedwebsite">जाने क्या सोचता रहता हूँ?</a></td><br /><br />माँ<br />नही रही...<br /><br />और<br /><br />पिता जी..<br /><br />उन्होंने कत्ल कर दिया..<br /><br />अपने जीने की<br /><br />चाहत का...<br /><br />बतौर सजा,<br /><br />कर लिया<br /><br />कैद <br /><br />खुद को<br /><br />खुद के भीतर...<br /><br />एक अँधेरी काल कोठरी में..<br /><br />और<br /><br /><br />पाल ली एक नफरत<br /><br />जिन्दगी से...<br /><br /><br />बना ली<br /><br />एक दूरी<br /><br />हर शख्स से...<br /><br />किन्तु<br /><br />मैं..?<br /><br />मैं तो<br /><br />जिन्दा हूँ अभी....<br /><br />और<br /><br />वो<br /><br />होते हुए..<br /><br />नहीं रहे!!<br /><br />-<span style="font-weight:bold;">मैं अनाथ हुआ!</span>!<br /><br />-समीर लाल ’समीर’<div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/23257105-240797864655239974?l=udantashtari.blogspot.com'/></div>Udan Tashtarihttp://www.blogger.com/profile/06057252073193171933sameer.lal@gmail.com72tag:blogger.com,1999:blog-23257105.post-25501265065525945062009-05-21T06:24:00.002+05:302009-05-21T06:24:00.759+05:30लुटी जवानी तेरे दर पर!!टिप्पणी के माध्यम से संदेश प्राप्त हुआ:<br /><br /><span style="font-weight:bold;">आदरणीय तश्तरी जी,</span><br /><br />मान्यवर, <span style="font-weight:bold;">अत्यन्त दुखद समाचार है.</span> <br /><br />सारी रात इसी सोच में गुजर गई कि किस तरह यह खबर आपको दूँ? कुछ समझ नहीं आता. मैं आपका अपराधी हूँ और आज नहीं तो कल, आपको पता लग ही जाना है तो क्यूँ न मैं ही सीधे आपको बता दूँ. <span style="font-weight:bold;">फिर आप जो सजा तय करेंगे, वो मैं भुगतने को तैयार हूँ</span>. यूँ तो जितना टूट कर आपने उसे प्यार दिया है, बचपन से आजतक कि मैं केवल नाममात्र का स्वामित्व लिए था बाकी तो सब आपकी हौसला अफजाई और स्नेह का ही नतीजा था.<br /><br />दरअसल, परसों दफ्तर से दिन भर का थका हारा, भीषण गर्मी झेलता जब देर शाम घर पहुँचा तो कुछ भी लिखने पढ़ने का मन नहीं था. भरपूर स्नान के बाद कुछ तरावट आई और एक प्याली चाय ने हिम्मत बँधाई तो सोचा, कुछ लिखा जाये. <span style="font-weight:bold;">आप इन्तजार कर रहे होंगे.</span><br /><br />गरमी इतनी भीषण पड़ रही है कि थोड़ा सा काम करो और शरीर जबाब देने लगता है किन्तु फिर आपका ख्याल आया तो किसी तरह लिखता चला गया और रात एक बज गई. आपके स्नेह और प्रेम वर्षा के सामने मेरी थकन की कीमत दो कौड़ी की नहीं है.<br /><br /><span style="font-weight:bold;">किसी तरह पोस्ट शेड्यूल करके बस बिस्तर पर लुढ़क गया.</span> फिर ख्याल आया कि कल सुबह कुछ साज सजावट भी कर दूँगा ताकि आप जैसे स्नेही स्वजनों को अच्छा लगे और आप अपने स्नेह आशीषों के पनपते परिणामों को देख खुश हों. यह मेरा दायित्व एवं कर्तव्य भी है आपके प्रति.<br /><br />सुबह सुबह ६ बजे उठकर जल्दीबाजी में कुछ फॉण्ट, कुछ ले आऊट आदि में फेर बदल की और बस, उसी समय, शायद नींद पूरी न होने की वजह से, एक ऐसी घटना हुई कि मेरा तो मानो जीवन ही बदल गया.<br /><br /><span style="font-weight:bold;">सब कुछ लुट गया.</span> मैं कंगाल हो गया. आपके स्नेहाशीष में बढ़ रहा वृक्ष बस फल देने ही वाला था कि मानो मुझ माली ने अपने ही हाथों उसे काट दिया. <span style="font-weight:bold;">जाने कैसे कौन सा बटन दब गया और जल्दबाजी में मैने क्या कनफर्मेशन दबा दिया कि आपका पसंदीदा ब्लॉग अब नहीं रहा.</span> पूरा कुछ डिलीट हो गया, भाई साहब. मैं हत्यारा हूँ, मैं तो आपको मूँह दिखाने के काबिल भी नहीं रहा.<br /><br /><td><a href="http://picasaweb.google.ca/lh/photo/krYzWgOtwI2Qpo2KrdO07g?feat=embedwebsite"><img src="http://lh3.ggpht.com/_N7sdMZXEIvI/ShQTqWFhxrI/AAAAAAAADPg/_-80vJOLNC8/s800/deleteblog.jpg" /></a></td></tr><tr><td style="font-family:arial,sans-serif; font-size:11px; text-align:right"><a href="http://picasaweb.google.ca/sameer.lal/BloogerMeet?feat=embedwebsite">राम नाम सत्य!!</a></td><br /><br /><span style="font-weight:bold;">अपराध तो अपराध ही है</span> किन्तु शायद यदि मैंने बैक-अप रखा होता तो कुछ हद तक क्षम्य होता. अब तो कोई चारा भी नहीं.<br /><br />मैं अपना गुनाह बिना किसी साफ सफाई के कबूल करता हूँ और आपसे निवेदन करता हूँ कि आप जो भी सजा देना चाहें, दें. मैं उसे सहर्ष कबूल करुँगा.<br /><br /><span style="font-weight:bold;">आज मेरे हाथों इस साहित्य जगत में वो क्षति हुई है</span>, जिसका पूरा किया जाना अब संभव नहीं. आप तो तकनीक के ज्ञाता भी हैं. यदि आप उचित समझें तो अपने प्रभाव से गुगल को लिख कर बात कर सकते हैं कि क्या ऐसी स्थितियों में कुछ किया जा सकता है.<br /><br />अतयन्त दुखी मन से,<br /><br />आपका अपराधी<br />मैं अभागा<br /><br /><span style="font-weight:bold;">संजय</span><br /><br /><br /><br /><br /><span style="font-weight:bold;">अब जबसे यह टिप्पणी आई है, चमकने की बारी हमारी है.</span> <br /><br />अव्वल तो यह बालक है कौन? <br /><br />दूसरा, आदरणीय <span style="font-weight:bold;">तश्तरी जी</span>- अभिवादन कर रहा है कि हमारी तस्वीर देखकर मजाक उड़ा रहा है?<br /><br />भाई मेरे, हमारे ब्लॉग का नाम उड़न तश्तरी है और हमारा समीर लाल. <span style="font-weight:bold;">कहीं क्न्फ्यूजन तो नहीं कि हमारा सरनेम तश्तरी और नाम उड़न है. </span> और समीर लाल इनके चपरासीनुमा पॉयलट. ये अनुमान भी तस्वीर देख लगा लिया हो, तो कोई अतिश्योक्ति न होगी.<br /><br />कहीं वो यह गलतफहमी तो नहीं पाल बैठा कि हम मात्र और एक मात्र ब्लॉग उसी का पढ़ते हैं. <span style="font-weight:bold;">वैसे पाल भी ली हो तो आश्चर्य नहीं.</span> जो हमारे नाम को लेकर गलतफहमी पाल सकता है, उसे हमारी टिप्पणी से इस तरह की गलतफहमी और फिर यह भी, साहित्यजगत में तुम्हारा योगदान अतुलनीय है, हो जाना बहुत सहज और स्वभाविक सी बात है.<br /><br />माना भाई, <span style="font-weight:bold;">मगर जरा ब्लॉग का नाम भी तो बता देते</span> तो पता तो रहता कि किसकी याद में आँसूं बहाऊँ और किसे अश्रुपूरित श्रृद्धांजलि अर्पित करुँ.<br /><br />इनके नाम पर क्लिक करो तो कहीं जाता ही नहीं. हो सकता है कि इतना दुखी हों कि हिल डुल भी न पा रहे हों और ब्लॉग तो डिलिट हो गया है तो उसके माध्यम से तो टिप्पणी कर न पाये होंगे. <span style="font-weight:bold;">कम से कम मृत आत्मा का नाम तो बताना ही था.</span><br /><br />दिमाग पर जोर डाल रहा हूँ कि कौन सा ऐसा ब्लॉग था जिसे मैने उसके जन्म से ही अपना स्नेह दिया और देता चला गया. वो बढ़ कर वृक्ष हो गया और वो फल भी देने वाला था. वो साहित्य में योगदान कर रहा था. वो लिखता बहुत सटीक था. मैं उसकी हौसला अफजाई किया करता था. उसे बेहतरीन कहता था. उसकी अगली पोस्ट का इन्तजार करता था. सर फटा जा रहा है बोरा भर नामों में से एक नाम छांटने में. <span style="font-weight:bold;">संजय गुगल करो तो हजार ब्लॉग निकल आते हैं, उसमें से बीसों डिलिटेड होंगे तो वो राह लेना ही बेकार है.</span><br /><br />अपने ब्लॉग की <span style="font-weight:bold;">ग्यारह हजार टिप्पणियों में से सब संजय क्लिक करता घूम भी लूँ </span>और एक दो डिलिटेड पर चले भी जायें, तो ढ़ाढ़स बँधाने कहाँ जाऊँगा जब तक ईमेल एड्रेस न हो और डिलिटेड ब्लॉग की प्रोफाईल तो दिखेगी भी नहीं कि ईमेल मिल जाये और मैं उनके दर्द में सहभागी बन पाऊँ.<br /><br />और जहाँ तक रही उनके मूँह न दिखा पाने की बात तो जब हमें कुछ याद ही नहीं तो दिखाओ या न दिखाओ, क्या फरक पड़ेगा. <span style="font-weight:bold;">सभी सूरमाओं को मैं जानता हूँ ऐसा भी नहीं.</span><br /><br />डर लगता है कि इतना संवेदनशील और भावुक व्यक्ति, जो अपनी थकन भूल, सिर्फ इसलिये इतनी गर्मी में लिखने बैठ गया और लिखता चला गया जब तक निढाल होकर बिस्तर में न गिर पड़ा कि मैं उसके लिखे का इन्तजार कर रहा हूँगा, वो इतनी हृदय विदारक घटना पर, मेरे किसी भी जबाब को न पाकर कुछ ऐसा वैसा न कर बैठे. यूँ भी वो अपने आपको हत्यारा अपराधी माने बैठा है, <span style="font-weight:bold;">कहीं बतौर-ए-सजा वो खुद को.................न..हीं........!! </span>ऐसा नहीं होना चाहिये.<br /><br />कोई तो राह सुझाओ, <span style="font-weight:bold;">मित्रों कि करुँ क्या? </span><br /><br /><span style="font-weight:bold;">इस बीच मेरे परमप्रिय संजय जी</span>, आपने कोई अपराध नहीं किया है. यह मानवजन्य भूलवश हुई क्रिया है जो किसी के साथ भी हो सकती है. अपराधबोध मन से निकाल दें. उपर पढ़कर आप समझ ही गये होंगे, आपका दिल भी टुकड़े टुकड़े हो गया होगा कि मैं आपको पहचान तक नहीं पा रहा हूँ, जबकि आज तक आपको यह मुगालता पलवाता रहा, अपरोक्ष रुप से ही सही, कि आप हैं तो ब्लॉगजगत है और जो कुछ है बस आप ही हैं.<br /><br />तो मैं क्षमाप्रार्थी हूँ. आपकी तरह ही भूलवश मैने आपको इस मुगालते की सबसे उपर वाली मंजिल पर ला खड़ा किया. आगे से टिप्पणी करते वक्त ध्यान रखूँगा कि कोई और आपकी तरह ही परेशान हो अपराधबोध न पाल बैठे.<br /><br />वैसे सत्य तो यह है कि <span style="font-weight:bold;">आज की दुनिया में शिष्टाचार और किसी के स्नेहवर्षा को इतनी संवेदनशीलता और भावुकता से लेने वालों को बेवकूफ ही कहा जाता है</span> और अंततः ऐसे लोग अपनी सजा खुद ही मुकर्रर करते हैं. सामने वाला तो क्या सजा देगा. सामने वाले पर चलोगे तो फिर तो <span style="font-weight:bold;">इस देश में अफज़ल की फाँसी भी माफ है-इसका यह अर्थ तो कतई नहीं कि हत्या अपराध नहीं है.</span><br /><br /><td><a href="http://picasaweb.google.ca/lh/photo/v-Ns9f8ayQGp_zqiLDuVqQ?feat=embedwebsite"><img src="http://lh6.ggpht.com/_N7sdMZXEIvI/ShQVbYrwl6I/AAAAAAAADPk/TDcx8c_Maxw/s800/samsadh.jpg" /></a></td></tr><tr><td style="font-family:arial,sans-serif; font-size:11px; text-align:right">तश्तरी और तश्तराईन<a href="http://picasaweb.google.ca/sameer.lal/BloogerMeet?feat=embedwebsite">लंदन में</a></td><br /><span style="font-weight:bold;"><br />चलते चलते: </span><br /><br />फोटू तो आप देख ही रहे हैं. २० दिन पहले की है. उम्र भी मुझे कम से कम अपनी तो सही ही मालूम है. अभी कोई खास तो है नहीं और <span style="font-weight:bold;">बाल भी फैशनवश ही सफेदी झलका रहे हैं</span> वरना तो कब का रंग लेते. <br /><br />मगर इसी तरह के स्नेहियों ने नाम के साथ <span style="font-weight:bold;">आदरणीय, परम श्रद्धेय, माननीय, अंकल जी, महोदय, पित्रतुल्य, पूज्यनीय आदि</span> न जाने क्या क्या लगा लगा कर ऐसा बुढ़ापे का एहसास कराया है कि कई बार तो अपना <span style="font-weight:bold;">डेट ऑफ बर्थ प्रमाणपत्र और केलकुलेटर</span> लिए पूरा दिन गुजार देता हूँ, फिर भी हल नहीं ढ़ूंढ़ पाता.बस, कान बजते रहते हैं:<br /><br />दिल में इक तूफां और आँखों में ये नमीं सी क्यूँ है......<br /><br /><span style="font-weight:bold;"> कहीं यह मुझ युवा के खिलाफ कोई षणयंत्र तो नहीं?</span><br /><br />ब्लॉगजगत में आकर मात्र यही एक घाटा लगा है कि <span style="font-weight:bold;">हम अपना युवत्व असमय खोते नजर आ रहे हैं.</span><div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/23257105-2550126506552594506?l=udantashtari.blogspot.com'/></div>Udan Tashtarihttp://www.blogger.com/profile/06057252073193171933sameer.lal@gmail.com84tag:blogger.com,1999:blog-23257105.post-88767033938978830112009-05-18T06:24:00.002+05:302009-05-18T16:35:21.002+05:30जिन्दगी की बैलेंस शीट पर ’प्रेमी’ से ’समीर’ के बदलते हस्ताक्षरपिछली पोस्ट में जब मैने <a href="http://udantashtari.blogspot.com/2009/05/blog-post_14.html">’विल्स कार्ड’</a> वाली रचनाओं का जिक्र किया, आप सबके स्नेह ने मुझे अभिभूत कर दिया. मजबूर हो गया कि उस <strong>’विल्स कार्ड’</strong> के बंडल में से कुछ और कार्ड खिंचूँ, जो इस बार भारत से ढ़ूँढ़ कर लाया हूँ. <br /><br />अभी पहला ही कार्ड पढ़ रहा था कि लगा: <strong>अरे, आज के मायने में इसका क्या अर्थ होगा?? </strong>वो पंक्तियाँ जो समीर लाल <strong>’प्रेमी’</strong> ने लिखीं थी, उसे समीर लाल <strong>’समीर’</strong> बढ़ाकर आज तक ले आये वजन आँकते हुए.<br /><br /><strong>जब समीर लाल ’प्रेमी’ थे तो हॉस्टल के कमरे में दोस्तों को कविता झिलवाते थे:</strong><br /><br /><table style="width:auto;"><tr><td><a href="http://picasaweb.google.ca/lh/photo/54Qlqut-B6hrp8L7LJpk7g?feat=embedwebsite"><img src="http://lh6.ggpht.com/_N7sdMZXEIvI/Sg7Odk1NQJI/AAAAAAAADLM/mOEQSnShwYs/s400/Image001.jpg" /></a></td></tr><tr><td style="font-family:arial,sans-serif; font-size:11px; text-align:right"><a href="http://picasaweb.google.ca/sameer.lal/BloogerMeet?feat=embedwebsite"></a></td></tr></table><br /><br /><strong>अब, समीर लाल ’समीर’ हो कर रेडियो मिर्ची से झिलवाते हुए:</strong><br /><br /><table style="width:auto;"><tr><td><a href ="http://picasaweb.google.ca/lh/photo/3B2N-ypJ4dLISYxs5aE2Yg?feat=embedwebsite"><img src="http://lh6.ggpht.com/_N7sdMZXEIvI/Sg7OdmLFjQI/AAAAAAAADLQ/LZ38IZXvHz4/s800/sl%20on%20fm.jpg" /></a></td></tr><tr><td style="font-family:arial,sans-serif; font-size:11px; text-align:right"><a href="http://picasaweb.google.ca/sameer.lal/BloogerMeet?feat=embedwebsite"></a></td></tr></table><br /><br /><br />यकीं जानें, रचना का पहला हिस्सा जो समीर लाल ’प्रेमी’ ने ’विल्स कार्ड’ पर उकेरा था, वो जस का तस है और फिर आगे समीर लाल ’समीर’ नें सिर्फ एक आंकलन किया है. <br /><br />यूँ तो पहले ख्याल आया कि फॉण्ट का रंग जुदा रखूँ ’प्रेमी’ और ’समीर’ में भेद करने को..मगर मैं खुद नहीं जानता कि <strong>कब वो अल्लहड़ ’प्रेमी’ इस संवेदनशील ’समीर’ में बदल गया </strong>और उनके बीच जिन्दगी ने रंग नहीं जुदा किये तो फिर मैं कौन होता हूँ उनके बीच भेद खड़ा करने वाला. <br /><br />हालांकि मैने कोई भेद नहीं किया है फिर भी आप जान जायेंगे कि किस पंक्ति से समीर लाल ’समीर’ ने कलम थामी. ये मेरा दावा है.<br /><br /><br /><td><a href="http://picasaweb.google.ca/lh/photo/FDCANqweNOrkeTjGQgBxoQ?authkey=Gv1sRgCISf1_uP1MyA_wE&feat=embedwebsite"><img src="http://lh6.ggpht.com/_N7sdMZXEIvI/Sg4EUBUP7kI/AAAAAAAADKw/0pr6ky71uH0/s800/balancesheet.jpg" /></a></td></tr><tr><td style="font-family:arial,sans-serif; font-size:11px; text-align:right"><a href="http://picasaweb.google.ca/sameer.lal/BloggerPictures?authkey=Gv1sRgCISf1_uP1MyA_wE&feat=embedwebsite"></a></td><br /><br /><br />हॉस्टल की<br />चौथी मंजिल पर स्थित<br />अपने कमरे की खिड़की<br />से बाहर देखता हूँ..<br /><br />मौसम आज कुछ गीला है<br />न जाने क्यूँ...<br />मैं तो आज रोया भी नहीं..<br /><br />दूर नीले आसमान में<br />दिखाई देता है...<br />मेरी याद में रोता हुआ<br />वो चेहरा<br />माँ का..<br /><br />घर की पीछे वाली बिल्डिंग की<br />छत पर इन्तजार में<br />खड़ी वो..<br /><br />और<br /><br />बेटे की सफलता <br />के लिए आशांवित, आँखें,<br />पिता की....<br /><br />जला लेता हूँ सिगरेट, मैं..<br /><br />खिंच जाता है<br />धुऐं का परदा सा,<br />बीच में,<br />मेरे और आसमान के..<br /><br />और याद आता है <br />मुझे अपना कैरियर..<br />जिसे संवारने के लिए<br />आ गया हूँ<br />घर से दूर<br />बम्बई!!<br /><br />लौट आती है सोच<br />धरातल पर ..<br /><br />अगले हफ्ते ही तो इम्तिहान है<br />सी ए फाईनल का..<br />पहला परचा..<br />एकाउन्टिंग...<br /><br />नफा हो या नुकसान<br />बैलेंस शीट के दोनों पाले<br />तो बराबर करने ही होंगे<br />इम्तिहान पास करने के लिए...<br /><br />आज इतने बरसों बाद<br />अपनी जमीं से इतनी दूर..<br />जब जिन्दगी की<br />बैलेन्स शीट पर नजर डालता हूँ..<br />दोनों पाले बराबर दिखते हैं...<br />और<br />नया जमाना<br />भौतिक सम्पन्नता को<br />सफलता का पैमाने माने<br />चार्टर्ड एकाउन्टेन्ट बना<br />मेरी जिन्दगी की बैलेन्स शीट को<br />सत्यापित करता है..<br /><br />शायद इसीलिए <br />मैं सबकी नजरों में<br />जिन्दगी के इम्तिहान में<br />सफल नजर आता रहा...<br /><br />सिर्फ मैं जानता हूँ...<br />नहीं..<br />हर रोज की तरह..<br />आज झूठ नहीं कहूँगा..<br /><br />सब विंडो ड्रेसिंग* है!!!<br /><br />मैं भी नहीं जानता..<br /><br />नफा हुआ<br />या<br />नुकसान!!<br /><br />-समीर लाल ’प्रेमी’ से समीर लाल ’समीर’ तक<br /><br />* विंडो ड्रेसिंग- बनावटी आधार पर कम्पनी की स्थितियाँ सुदृढ़ दिखाने और अनियमितताऐं छिपाने के लिए बैलेंस शीट में किये गये उपाय. (राजू वाली सत्यम- ताजा उदाहरण)<br /><br /><strong>सोचता हूँ कि </strong><br /><br />-कुछ नहीं बदला है न ’प्रेमी’ और ’समीर’ हो जाने में. बदला है सिर्फ नज़रिया और उद्देश्य. तब सीए का इम्तिहान पास करने की मशक्कत थी और आज जिन्दगी का इम्तिहान.<br /><br />-हम सभी की जिन्दगियों की बैलेन्स शीट तो विन्डो ड्रेस्ड हैं, <strong>काश!! हम इस विन्डो ड्रेसिंग से उबर पाते. </strong> उस पार तो विदाउट ड्रेस ही जाना है, फिर ये आडंबर क्यूँ. शायद, यही जीने का सलीका हो और वो मरने का!!! मैं तो कुछ भी नहीं जानता, <strong>कितना बेवकूफ हूँ मैं!!</strong><div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/23257105-8876703393897883011?l=udantashtari.blogspot.com'/></div>Udan Tashtarihttp://www.blogger.com/profile/06057252073193171933sameer.lal@gmail.com69tag:blogger.com,1999:blog-23257105.post-86322027771310745862009-05-14T06:24:00.001+05:302009-05-14T06:24:00.591+05:30विल्स कार्ड पर उतरी बातेंयाद है मुझे सालों पहले, जब मैं बम्बई में रहा करता था, तब मैं विल्स नेवीकट सिगरेट पीता था. जब पैकेट खत्म होता तो उसे करीने से खोलकर उसके भीतर के सफेद हिस्से पर कुछ लिखना मुझे बहुत भाता था.<strong> उन्हें मैं विल्स कार्ड कह कर पुकारता.</strong> न जाने कितने विल्स कार्ड मेरी पुरानी दराज़ों से निकल कर अटेचियों और बक्सों में इधर उधर बिखरे पड़े हैं. कभी टटोलता हूँ उन बक्सों को खाली समय में तो कुछ हाथ लगता है..जिसे मैं पहचानने की कोशिश करता हूँ कि <br /><br /><strong>अरे, ये मैने कब लिखा?</strong><br /><br />हर पैकेट के खत्म होने पर एक अलग मूड होता था और वही मूड उस पर अंकित हो जाता शब्दों के माध्यम से. <strong>सिगरेट के धूँऐं सी अलग अलग आकार लेकर धीरे से विलुप्त होती बातें शब्दों का रुप ले लेती. </strong><br /><br />कोई कविता नहीं होती थी वो..बस, यूँ ही कुछ जुड़ते-उड़ते हुए विचारों का शब्दांकन. <br /><br /><td><a href="http://picasaweb.google.ca/lh/photo/YsRERAQKgFDWLFRL5gS1fQ?feat=embedwebsite"><img src="http://lh6.ggpht.com/_N7sdMZXEIvI/SgH0Dc0XeNI/AAAAAAAADGA/8ZFOFzF-byI/s800/wilscard1.jpg" /></a></td></tr><tr><td style="font-family:arial,sans-serif; font-size:11px; text-align:right">पुराना विल्स कार्ड:बारिश में स्वाहा!! <a href="http://picasaweb.google.ca/sameer.lal/BloogerMeet?feat=embedwebsite"></a></td><br /><br />उसी में से इस भारत यात्रा के दौरान कुछ हाथ लगा था और आज कहीं किसी संदर्भ में बात चलने लगीं तो याद आया:<br /><br /><strong>(१)</strong><br /><br />आँसू<br />अमृत की बूंदें<br /><br />इन्हें मैं रोकता नहीं...<br />तुम भी मत रोकना.<br /><br />सींचना इनसे<br />अपने दुखों की बगिया को..<br /><br />जानती हो..<br /><br />कांटों पर ही<br />खिलते हैं...<br />गुलाब !!<br /><br />कितने सुन्दर होते हैं न...<br />गुलाब!!!<br /><br /><br /><strong>(२)</strong><br /><br />पत्थर!!<br /><br />न हँसते हैं<br /><br />न रोते हैं...<br /><br />मौन<br /><br />बस!!<br /><br />मौन रहकर<br /><br />सारी ठोकरें <br /><br />और अपमान<br /><br />सहते हैं...<br /><br />इसीलिये शायद!!<br /><br />सजाकर उन्हें<br /><br />हम<br /><br />भगवान<br /><br />कहते हैं!!<br /><br /><br /><strong>(३)</strong><br /><br />मैरीन ड्राईव,<br /><br />बम्बई...<br /><br />समुन्द्र के किनारे<br /><br />दीवार पर बैठे<br /><br />उस लहर को<br /><br />आते देखता हूँ..<br /><br />आती है<br /><br />टकराती है..<br /><br />लौट जाती है...<br /><br />हार नहीं मानती...<br /><br />फिर से<br /><br />एक नई उमंग,<br /><br />एक नये उत्साह के साथ<br /><br />आती है..<br /><br />टकराती है..<br /><br />लौट जाती है...<br /><br /><br />बरसों से यह <br /><br />सिलसिला <br /><br />अनवरत जारी है!!<br /><br /><br />-समीर लाल ’समीर’<br /><br /><strong>बस यूँ ही:</strong><br /><br /><strong>१.</strong>कुछ विल्स कार्डों पर देखा: मैने अभिव्यक्ति के बाद अपना नाम <strong>समीर लाल ’प्रेमी’</strong> लिखा था उस जमाने में. शायद जवानी की हिलोर रही होगी या फिर बम्बई का असर. नहीं पता... :)<br /><br /><strong>२.</strong> बात कुछ जंचती नजर आ रही हो तो और ढ़ूंढ़े जायें विल्स कार्ड वरना तो समय के साथ बारिश और दीमक तो चमत्कार कर ही लेंगे अपना.<br /><br />विल्स कार्ड पर उतरी बातें<br />यादों में बसती हैं यादें...<br />जो मोती बन न रुक पाई..<br />भिगो गई उनको बरसातें.<br /><br />-<strong>काश!! आँसूओं की बारिश से बचने का कोई छाता होता</strong>.<div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/23257105-8632202777131074586?l=udantashtari.blogspot.com'/></div>Udan Tashtarihttp://www.blogger.com/profile/06057252073193171933sameer.lal@gmail.com75tag:blogger.com,1999:blog-23257105.post-75868877924923154512009-05-11T06:24:00.004+05:302009-05-15T23:04:15.229+05:30हूँह्ह!! दीज़ ब्लॉगर्स!अब तो कोई उपलब्धि गिनाते हुए शरम सी आ जाती है कि न जाने लोग यह न समझ बैठे कि रोज कुछ न कुछ उठाकर ले आते हैं और लगते हैं बधाई लेने. मगर क्या करें, आये दिन कुछ न कुछ ऐसा हो जाता है कि बताना पड़ता है.<br /><br />अब आज की ही ले लो. पोस्ट करने जा रहे थे कुछ और नजर प़ड़ी तो देखा अरे, <strong>यह तो तीन सौवीं पोस्ट है.</strong> न बतायें तो भी गलत. जब १०० वीं बताई थी, फिर २०० वीं बताई थी तो ३०० वीं के साथ ही ज्यादती क्यूँ कि न बताई जाये.<br /><br /><strong>वैसे उपलब्धियों की महत्ता ही अपनों के द्वारा मनाई गई खुशी और बधाईयों से है. </strong>वरना, तो जंगल में मोर नाचा, किसने देखा.<br /><br />याद है, जब कॉलेज के बाद स्कूटर खरीदा था. बड़े शान से सब दोस्तों के घर जा जाकर दिखाया, खूब बधाई बटोरी, पार्टी की और सीना फुलाये दोस्तों को बैठाया घूमते रहे. ये होती है खुशी.<br /><br />और एक अब है, यहाँ कनाडा में बैठे बड़ी भारी कार भी खरीद ली. खुद देखी. खुद खुश हुए. सो गये. भला बताओ, ये भी कोई खुशी हुई. <strong>इसीलिए तो मजा ही नहीं आता है जी यहाँ पर. </strong><br /><br />तो हम बताये दे रहे हैं कि तीन सौवीं पोस्ट है. <br /><br />उम्मीद तो यह भी की थी कुछ माह पूर्व कि जब हम तीसरा सैकड़ा लगा रहे होंगे तो हमारे बिरादर <strong>बवाल</strong>, <a href="http://lal-n-bavaal.blogspot.com/">लाल एण्ड बवाल</a> पर साथ ही सैकड़ा लगवायेंगे मगर वो जाने कहाँ कहाँ और जाने कौन कौन से गम लादे घूम रहे हैं कि न तो दिख रहे हैं और न ही याद कर रहे हैं. <strong>वहाँ आँकड़ा ९१ पर अटका पिछले एक माह से.</strong><br /><br />हमारी कितनी ही गज़लें और गीत उनकी आवाज का इन्तजार कर रही हैं. शायद, तीसरा सैकड़ा देखकर वो जागें, यही उम्मीद करता हूँ.<br /><br /><br /><strong>आगे समाचार यह है</strong> कि १५ अप्रेल की सुबह ७ बजे ब्रसल्स, बेल्जियम के एयरपोर्ट पर जेट के विमान से उतरा तो एक अलग सी उमंग थी. शायद कुछ घंटो में बेटे बहु के पास पहुँच जाने की, या यूरोपीय यूनियन की राजधानी ब्रसल्स पहुँच जाने की, या कुछ देर बाद <strong>विश्व विख्यात ट्रेन ’यूरोस्टार’ </strong>से लंदन तक की यात्रा करने की या फिर इस यात्रा के दौरान इन्गलिश चैनल को पार करने के लिए उसके नीचे बनी <strong>’यूरो टनल’</strong> जिसे ’चनल’ भी कहते हैं, उसमें से गुजरने के अहसास की. जाने क्या, पर एक उमंग थी.<br /><br />वहीं ब्रसल्स एयरपोर्ट पर नाश्ता किया. <strong>यूरिनल जाने के ५० यूरो सेन्ट याने लगभग ३० रुपये की मांग देख कर खांटी हिन्दुस्तानी मन नें नेचर्स कॉल तक रोक ली</strong> कि ट्रेन में चले जायेंगे, इतनी जल्दी भी क्या है.. :)<br /><br />कुछ देर में यूरो स्टार में बैठने का सपना साकार हुआ और शुरु हुई दो घंटे की ब्रसल्स से लंदन ’सेन्ट पेन्क्राज़’ स्टेशन की यात्रा.<br /><br /><td><a href="http://picasaweb.google.ca/sameer.lal/BloogerMeet?feat=embedwebsite#5334247842028137666"><img src="http://lh5.ggpht.com/_N7sdMZXEIvI/SgcOJnf7LMI/AAAAAAAADHw/JUh0bfLxyFg/s800/EurostarTrain.jpg" /></a></td></tr><tr><td style="font-family:arial,sans-serif; font-size:11px; text-align:right"><a href="http://picasaweb.google.ca/sameer.lal/BloogerMeet?feat=embedwebsite">यूरोस्टार ट्रेन</a></td><br /><br />लिलि यूरोप स्टेशन एक मात्र स्टॉपेज था और बस, उसके बाद ’यूरो टनल’ फिर लंदन ’सेन्ट पेन्क्राज़’ स्टेशन. <br /><br />जैसे ही ’यूरो टनल’ शुरु हुई, मन में न जाने कैसी भावना घर कर गई. घड़ी देखते रहे. <strong>पूरे २५ मिनट लगे इन्गलिश चैनल के एवरेज लगभग २५ मीटर नीचे से गुजरते.</strong><br /><br /><td><a href="http://picasaweb.google.ca/sameer.lal/BloogerMeet?feat=embedwebsite#5334247849835191954"><img src="http://lh5.ggpht.com/_N7sdMZXEIvI/SgcOKElRXpI/AAAAAAAADH0/FaegwfooEoM/s800/eurotunnel.jpg" /></a></td></tr><tr><td style="font-family:arial,sans-serif; font-size:11px; text-align:right"><a href="http://picasaweb.google.ca/sameer.lal/BloogerMeet?feat=embedwebsite">यूरो टनल</a></td><br /><br />इस दौरान इन्गलिश चैनल के नाम पर <strong>मिहिर सेन</strong> याद आये. मिहिर सेन ने सन १९५८ में इसी इन्गलिश चैनल को १४ घंटे ४५ मिनट में तैर कर पार किया था. हमने उसी इन्गलिश चैनल को २५ मिनट में पार कर लिया. <br /><br />ब्लॉगर मन सोचने लगा <strong>’तो क्या हम मिहिर सेन से बेहतर कहलाये. क्या मिहिर सेन नें प्रासंगिगता खो दी.’</strong><br /><br /><td><a href="http://picasaweb.google.ca/lh/photo/7s3yRpHRsCVZZT_QvpmKSQ?feat=embedwebsite"><img src="http://lh4.ggpht.com/_N7sdMZXEIvI/SecRTmQeAjI/AAAAAAAABnU/MSSas4KX7So/s800/Mihir1.jpg" /></a></td></tr><tr><td style="font-family:arial,sans-serif; font-size:11px; text-align:right"><a href="http://picasaweb.google.ca/sameer.lal/BloogerMeet?feat=embedwebsite">मिहिर सेन</a></td><br /><br />विचार उठा तो समझ आया कि उनका उद्देश्य इन्गलिश चैनल पार करना नहीं, वरन <strong>तैराकी का प्रदर्शन था.</strong> उसमें वो आज भी प्रासंगिग है मगर उद्देश्य सिर्फ ’इन्गलिश चैनल’ पार करना होता तो आज उनकी औकात दो कौड़ी की हो जाती.<br /><br />सोचता हूँ <strong>उद्देश्य का किसी भी विचार के साथ जुड़ा होना कितना जरुरी है उसकी गहराई आँकने के लिए</strong>, चाहे वो साहित्यकारी ही क्यूँ न हो.<br /><br />अगर बुद्दिमत्ता, रचना-धर्मिता आदि की बात हो तो दीगर तरह से विचार करना पड़ेगा मगर इन्गलिश चैनल पार करने भर की बात की तरह यदि साहित्य के प्रचार, प्रसार और विस्तार की बात हो तो आज के युग मे यूरोस्टार की तरह, <strong>मूँह मे चुरट दबाये ब्लॉग और नेट की प्रासंगिगता को हूँह!! दीज़ ब्लॉगर्स! कहना मूर्खता का परिचायक ही कहलाया.</strong><br /><br />मगर मूर्खता करने से कौन किसे कब किस युग में रोक पाया है जो हम आज रोक लेंगे. ये तो अपने आप अपनी गति मारी जाती रही है, अबकी बार भी मर जायेगी, चिन्ता की कोई बात नहीं.<br /><br /><br /><br /><strong>एक समीक्षा: एक लाईना</strong><br /><br />फिल्म का नाम: विदेश (<strong>हेवन ऑन अर्थ</strong>)<br /><br /><td><a href="http://picasaweb.google.ca/sameer.lal/BloogerMeet?feat=embedwebsite#5334283468325961138"><img src="http://lh3.ggpht.com/_N7sdMZXEIvI/SgcujVzOvbI/AAAAAAAADIk/ZNp5YJRFh1M/s800/HeavenOnEarth.jpg" /></a></td></tr><tr><td style="font-family:arial,sans-serif; font-size:11px; text-align:right"><a href="http://picasaweb.google.ca/sameer.lal/BloogerMeet?feat=embedwebsite"></a></td><br /><br />भारत में बनी बड़ी भारी कोई नौटंकी फिल्म, कनाडा में बनी इस नौटंकी के सामने फीकी पड़ जाये. दिखाते हैं कि अगर सच बोला तो साँप नहीं काटेगा, वरना काट लेगा. साँप प्रिति जिन्टा का चरित्र निर्धारण कर रहा है और पूरा परिवार बैठा साँप के जजमेन्ट का इन्तजार करता है. गजब भई, ऐसा कनाडा है.<br /><br />न सिर, न पैर<br />बेवजह प्रवासियों से बैर. <br /><br />ऐसा कहीं होता है क्या यार..<br />कि सिर्फ विदेशी ग्रांट मिलने से प्यार <br /><br />( <strong>कहो, दीपा जी-कुछ तो कहो!!!</strong> )<br /><br />माना कि थोड़ा बहुत कुछ सही होगा<br />मगर फिल्म बनाने लायक नहीं होगा.<br /><br />छोड़ो ये सब,<strong> एक उचित और सार्थक कार्य करो </strong>इस मौके पर केक मांगने के बदले:<br /><br /><strong>”धरा बचाओ, पेड़ लगाओ’</strong> अभियान शुरु कर रहा हूँ...दायें पैनल में इसके कोड है, अपने ब्लॉग पर लगा कर जरा इस अभियान में योगदान दो न इस मौके पर. <strong>बहुत साधुवाद होगा आपका और ३०० वीं पोस्ट लिखना सार्थक हो जायेगा:</strong><br /><br /><td><a href="http://picasaweb.google.ca/sameer.lal/BloogerMeet?feat=embedwebsite#5332835620783926306"><img src="http://lh5.ggpht.com/_N7sdMZXEIvI/SgIJvhZgLCI/AAAAAAAADGg/uNS9gAcB_68/s800/earth.jpg" /></a></td></tr><tr><td style="font-family:arial,sans-serif; font-size:11px; text-align:right"><a href="http://picasaweb.google.ca/sameer.lal/BloogerMeet?feat=embedwebsite"></a></td><div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/23257105-7586887792492315451?l=udantashtari.blogspot.com'/></div>Udan Tashtarihttp://www.blogger.com/profile/06057252073193171933sameer.lal@gmail.com93tag:blogger.com,1999:blog-23257105.post-36982709973654629902009-05-07T06:24:00.003+05:302009-05-07T06:24:00.636+05:30ओ परदेशी, अब बस कर...कल ही प्रवासी साहित्य पर आधारित एक पत्रिका पलट रहा था. जड़ से बिछड़ जाने की वेदना मानो चहु ओर छितरी पड़ी हो. हर कलम रो रो कर बस एक ही धुन में गा रही थी-<strong>हाय!! मेरी जड़.</strong> जाने क्यूँ!!<br /><br /><strong>कविमना प्रवासी हुआ</strong> और बस, बह निकला जड़ से बिछड़ जाने की वेदना लिए एक झर झर झरना. सब सेट फार्मेट से-वो बरगद के पेड़, गांव की माटी की सौंधी खुशबू, ताल तलैया, लछ्छो मौसी, बचपन का साथी बिसाहू और जाने क्या क्या.<br /><br />इतनी वेदना कि जड़ तो जड़, धरती रो पड़े. हाय, यह क्यूँ छूटा? कैसे जोड़ लूँ फिर इसे.<br /><br />सोचता हूँ पूछ कर देखूँ कि कभी सोचा है उनके बारे में जो वहीं जु़ड़े हुए हैं, जहाँ से तुम टूटे..कभी जाना उनका हाल? <strong>कभी रख कर देखा उनके जूते में अपना पैर?</strong><br /><br /><strong>बहुत जिगरा चाहिये जड़ से जुड़े रहने में. </strong>माना तुम भी कभी उसी जड़ से जुड़े बहुत खुशी से जी रहे थे. सो तो तुम एक जमाने में साइकिल से स्कूल भी जाया करते थे. अब कार से चलते हो..एक दिन फिर से साइकिल से दफ्तर जाने की बात सोच कर देखना. क्या हुआ? जाते तो थे न बचपन में वो दूर तक स्कूल में हँसते हँसते दोस्तों के साथ.<br /><br />शायद इसी विचार श्रृंखला में उभरी है यह रचना या फिर शायद इतने दिन तक भारत में था, उससे कुछ निकला हो या फिर कहीं वैसी हालत तो नहीं, <strong>जब किसी अंग में दर्द बहुत बढ़ जाये तो इन्सान उस अंग को ही अलग कर डालने की कामना कर बैठता है.</strong><br /><br />नहीं मालूम, आप ही बतायें:<br /><br /><td><a href="http://picasaweb.google.ca/lh/photo/gvJHbMkkHjLdJYcH6ij04g?authkey=Gv1sRgCISf1_uP1MyA_wE&feat=embedwebsite"><img src="http://lh5.ggpht.com/_N7sdMZXEIvI/SgCxxgLGSsI/AAAAAAAADEY/eC9g4z66vKc/s800/pardes.jpg" /></a></td></tr><tr><td style="font-family:arial,sans-serif; font-size:11px; text-align:right"> <a href="http://picasaweb.google.ca/sameer.lal/BloggerPictures?authkey=Gv1sRgCISf1_uP1MyA_wE&feat=embedwebsite">परदेश</a></td><br /><br /><br /><br /><br />देखता हूँ तुम्हारी हालत<br />पढ़ता हूँ कागज पर<br />उड़ेली हुई<br />तुम्हारी वेदना...<br />जड़ से छूट जाने की<br />जड़ से टूट जाने की...<br /><br /><br />थक गया हूँ<br />सुन सुन कर<br />तुम्हारा वो दर्द<br />बार बार..<br />कान से मवाद बन कर<br />बहने लगी है<br />तुम्हारी यह<br />कागजी चित्कार...<br /><br />किस जड़ से टूटने की<br />बात करते हो तुम..<br />किस जड़ से वापस<br />जु़ड़ जाना चाहते हो तुम..<br /><br />वो जड़ <br />जिसे तुम्हारे ही अपनों ने<br />दीमक की तरह <br />चाट चाट कर<br />खोखला कर दिया है... <br /><br />सच कहूँ दोस्त!!<br />तुम्हारी वेदना भी <br />कुछ वैसी ही है<br />जैसे..<br /><br />कितना मनभावन लगता है<br />रेल के उस वातानकुलित <br />डिब्बे में बैठकर देखना...<br /><br />गर्मी के तेज तपन के बीच<br />तलाब में कूद कर <br />नहाते बच्चे,<br />धूल में सने पैर लिए<br />आम के पेड़ के नीचे<br />सुस्ताते ग्रमीण<br />उपलों पर थापी रोटी को<br />प्याज के साथ खाते <br />लोग..<br /><br />जिसे तुम कागज पर<br />लिखते हो <br />कविता बनाकर...<br /><br />वो बच्चों की स्वछन्दता,<br />पेड़ों की ठंडी छाँव में<br />आराम करते <br />निश्चिंत ग्रमीण..<br />मुट्ठे से तोड़ कर प्याज <br />से साथ<br />उपलों पर सिकीं<br />रोटी का सौंधा स्वाद..<br /><br />कितना अच्छा लगता है...<br /><br />बस, लेकिन सिर्फ देखना<br />हाँ, सिर्फ देखना<br />वो भी उस वातानकुलित डिब्बे से..<br /><br />आसमान में उड़ कर<br />तुम शहर का मानचित्र तो बना सकते हो..<br />मगर शहर की धड़कन तो<br />शहर में आकर ही सुनाई देगी..<br />मैं जानता हूँ<br />तुम उन धड़कनों की नाद<br />नहीं झेल पाओगे..<br />बहरे हो जाओगे तुम.<br /><br /><br />बुरा मत मानना,<br />मगर अब तुम इस <br />काबिल ही नहीं बचे<br />कि इन जड़ों से जु़ड़ सको...<br /><br />सुविधायें बहुत जल्दी <br />अपना गुलाम बना लेती हैं और<br />सुविधा की गुलामी की जंजीरे<br />इतनी आसानी से नहीं टूटती..<br /><br />क्या तुम जी सकोगे..<br />जब इस भीषण गर्मी में<br />बिना बिजली, पानी के<br />सारी रात बस<br />करवटें बदलोगे और<br />पसीने में भीगे<br />लगेगा मानो<br />सारे बदन को<br />सैकड़ों चीटियाँ<br />काट रही हैं...<br /><br />सारी रात सुबह होने का इन्तजार<br />और सुबह से इस इन्तजार में कि<br />रात हो जाये <br />तो चैन आये..<br /><br />भूल जाओगे <br />जड़ से टूटने<br />का गम...<br /><br />जब खुद को खुद<br />साबित करने के लिए..<br />चक्कर लगाओगे <br />किसी सरकारी दफ्तर के..<br />हाथ में मतदाता परिचय पत्र लिए,<br />साथ में टेलिफोन या बिजली का बिल,<br />दो खुद के चित्र,<br />खुद के साथ होते हुए भी,<br />किसी और से सत्यापित करवाये हुए..<br />एक हलफनामा कि<br />मैं मैं ही हूँ..<br /><br />और फिर भी न साबित कर पाओगे<br />उस बाबू को<br />कि तुम तुम ही हो..<br />जब तक बाबू की हथेली<br />न गरम कर दो...<br /><br />कागज पर लिख देने<br />जितना आसान नहीं है..<br />दिल और दिमाग के बीच<br />पर्याप्त दूरी रखते हुए<br />करनी को अंजाम देना..<br />रोज जीने की जद्दो जहद में<br />रोज मरना...<br /><br /><br />मतदान करके इठलाना<br />अपने अधिकार के प्रयोग पर,<br />यह जानते हुए भी कि<br />एक बार फिर हमने<br />हमें ही लूटने के लिए<br />एक नया लुटेरा चुन लिया है...<br /><br />कभी इत्मिनान से सोचना..<br /><br />किसका दर्द वाकई दर्द है...<br />जो तुमने कागज पर<br />उड़ेल दिया है...<br />या फिर वो<br />जो किसी ने जड़ से जुड़े<br />आदतन झेल लिया है....<br /><br />--समीर लाल ’समीर’<div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/23257105-3698270997365462990?l=udantashtari.blogspot.com'/></div>Udan Tashtarihttp://www.blogger.com/profile/06057252073193171933sameer.lal@gmail.com80tag:blogger.com,1999:blog-23257105.post-51847416535432591942009-05-05T07:52:00.003+05:302009-05-05T07:59:16.127+05:30गज़ब किया समीर जी आपने..देखा आंकड़ा!!अभी देखा का <strong>आवाजाही गणक १०००००</strong> दिखा रहा है. कसम से, लगाते समय ० से शुरु किया था और वो भी ब्लॉग शुरु करने के साल भर बाद. याद भी नहीं कब.. क्या फरक पड़ता है.<br /><br />इस अवसर पर ऐसी तस्वीर फबेगी:<br /><br /><br /><td><a href="http://picasaweb.google.ca/lh/photo/W9zcJ1kJ2BzlZzetIugh0g?authkey=Gv1sRgCISf1_uP1MyA_wE&feat=embedwebsite"><img src="http://lh5.ggpht.com/_N7sdMZXEIvI/Sf-inDAhkfI/AAAAAAAADD4/zCAz7gaXTM0/s400/samport.jpg" /></a></td></tr><tr><td style="font-family:arial,sans-serif; font-size:11px; text-align:right"><a href="http://picasaweb.google.ca/sameer.lal/BloggerPictures?authkey=Gv1sRgCISf1_uP1MyA_wE&feat=embedwebsite">बॉस तो बॉस ही है!!</a></td><br /><br /><br />कोई पोस्ट का शतक बना रहा है. कोई टिप्पणी का आंकड़ा बता रहा है. कोई कुछ और कोई कुछ. एक को तो कुछ न सुझा तो यही बता गये कि कल से नियमित लिखेंगे. लिखना भाई, हम भी कल से ही नियमित पढ़ेगे.<br /><br />एक रोचक बात, अभी पिछले दिनों एक पोस्ट की थी..<a href="http://udantashtari.blogspot.com/2009/04/blog-post_29.html">बेचारा सुअर </a>उस पर टिप्पणियों का सिलसिला चला. उस पोस्ट में चार फोटो चैंपी गई थी. एक सुअर की, एक हमारी, एक पत्नी की और एक पाकिस्तान के पत्रकार की. अब उस पर एक मित्र की टिप्पणी मिली:<br /><br /><em>प्रियवर समीर लाल जी!<br />आपकी पूरी यात्रा बड़े मनोयोग से पढ़ी। <strong>सूअर के सुन्दर चित्र भी देखे।</strong> बाथरूम का काँच भी देखा। बाथरूम के सामने एक सुन्दर छवि के भी दर्शन का भी सौभाग्य प्राप्त हुआ। शायद वो अपकी जीवन-संगिनी होंगी। उनको मेरा अभिवादन पहुँचाने की कृपा करें। </em><br /><br />-<strong>जीवन संगिनी वाली बात समझ आई</strong> कि वो हमारी पत्नी के लिए है और उसके लिए हमारा आभार एवं साधुवाद. धन्यवाद तो उसकी तरफ से भी है.<br /><br />अब बच गया दूसरा स्टेटमेन्ट:<br /><br /><strong>सूअर के सुन्दर चित्र भी देखे।</strong> <br /><br />-एक तो यह बहुवचन में है और उस पर से इसके सिवा और कोई और स्टेटमेन्ट भी नहीं है याने सुअर और वो पाकिस्तानी पत्रकार (यहाँ तक सही है) और उस पर से मैं..सारे चित्र इसी तरह याने सब सुअर पसंद आये...गज़ब किया भाई..<strong>हमें तो बक्श देते</strong>. खैर, आपकी जैसी इच्छा. :)<br /><br /><br />अब नमस्ते!<br /><br />आपके मनोयोग को साधुवाद!!!<br /><br /><strong>आज ही कनाडा पहुँचा हूँ सही मायने में </strong>और अपने आपको इस माहौल में ढालने के प्रयास में लगा हूँ. सरल है स्मूथ माहौल में ढालना जहाँ परेशानियों से साबका न पड़े. तो ढल ही जाऊँगा...मगर तब तक यह पोस्ट जरुरी थी. इसलिये कर दी. <strong>अगली बार ऐसी पोस्ट करुँगा कि हिल जाओगे.</strong> यह उम्मीद मैं हर बार करता हूँ..पिछली बार भी की थी. :)<br /><br />अब नमस्ते!!<br /><br /><strong>जरा बधाई तो दे दो!! १ लाख की आवा जाही पूरी होने पर..</strong><div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/23257105-5184741653543259194?l=udantashtari.blogspot.com'/></div>Udan Tashtarihttp://www.blogger.com/profile/06057252073193171933sameer.lal@gmail.com83tag:blogger.com,1999:blog-23257105.post-85214323075978063342009-05-01T06:23:00.002+05:302009-05-01T06:23:00.278+05:30९९ का फेरा: हिन्दी ब्लॉगिंग को घेराकल से हिन्दी ब्लॉगजगत में <a href="http://hindi.amitgupta.in/2009/04/30/99-things-hitlist/">अमित भाई</a> एक खेला शुरु किए हैं और लोग टप टपा टप खेलते जा रहे हैं. खेल ऐसा चला कि एक तो एकदमे सोए <a href="http://www.jitu.info/merapanna/?p=1184">जीतू</a> जागकर उठ बैठे और लगे खेलने और दूसरे उनींदे से <a href="http://www.tarakash.com/blogs/mantavya/?p=884">पंकज बैगाणी</a>, वो भी चले आये.<br /><br />खेला, <strong>अमित</strong> ने किसी <strong>अमरीकी ब्लॉगर</strong> के ब्लॉग से लिया है जिसमें ९९ आईटम की लिस्ट है और आपको उसमें से <strong>जो काम आप कर चुके हो, उसे अपने ब्लॉग पर लिस्ट में बोल्ड करके दिखाना है.</strong> <br /><br />जब हमने देखा तो लगा ऐसी लिस्ट हिन्दी ब्लॉगर्स के लिए, जो कि अधिकतर भारत में है और न जाने कितने ही कभी भारत के बाहर भी न निकले हों, उचित नहीं प्रतीत होती. <strong>मात्र एक प्रश्न, क्या आप कभी भारत के बाहर गये हैं? बोल्ड न कर पाओ तो २५ से ज्यादा प्रश्न तो आपके लिए बने ही नहीं हैं.</strong> <br /><br />वैसे ही-<br />क्या आप पेरिस गये हैं? नहीं. <br />क्या आपने पैरिस में ऐफिल टॉवर के शीर्ष से नज़ारा किया ? अरे, जब पेरिस ही नहीं गये तो यह कैसा प्रश्न? <br /><br />ये तो वैसा ही नहीं हो गया-<br />क्या आपकी शादी हो गई? नहीं. <br />आपके कितने बच्चे हैं? ये लो...खैर, आजकल दूसरे प्रश्न का उत्तर आ भी सकता है पहले का न होते हुए भी. <strong>समाज काफी विकास कर गया है. </strong><br /><br />वैसा ही शायद तकनिकी विकास भविष्य में ऐसा हो जाये कि बिना गये यह सब बातें संभव हो जायें किन्तु अभी तो संभव नहीं है. अमित टेक्नालॉजी के महारथी हैं, शायद भविष्य के नजरिये से पूछा हो. वैसे, <strong>इस तरह के खेल आज के हिन्दी ब्लॉगजगत में सिर्फ अमित ही ला सकते हैं,</strong> यह भी तय है. जागरुक बंदा है और हमारे लिए तो खैर उसका ब्लॉग पसंदीदा जगह है ही.<br /><br /><td><a href="http://picasaweb.google.co.uk/lh/photo/nXfUBB2o7c3033CQN-aYIg?authkey=Gv1sRgCISf1_uP1MyA_wE&feat=embedwebsite"><img src="http://lh6.ggpht.com/_N7sdMZXEIvI/SfmEHSNHPlI/AAAAAAAADDM/6xj8EBUxWdE/s800/computer_monkey.gif" /></a></td></tr><tr><td style="font-family:arial,sans-serif; font-size:11px; text-align:right"><a href="http://picasaweb.google.co.uk/sameer.lal/BloggerPictures?authkey=Gv1sRgCISf1_uP1MyA_wE&feat=embedwebsite">जरा बोल्ड कर दूँ लिस्ट</a></td><br /><br />इसी विचार से हिन्दी चिट्ठाजगत को मद्दे नजर रख दूसरे ९९ आईटम, जिससे आप जुड़ा महसूस कर अधिक से अधिक बोल्ड कर पायेंगे. नियम वही, <strong>अमित</strong> के शब्दों में:<br /><br /><strong>’करना कुछ अधिक नहीं है, बस यह लिस्ट कॉपी कर अपने ब्लॉग पर चेप लें और इनमें से जितने तीर-तोप चला चुके हैं उनको बोल्ड कर दें और बाकी को सामान्य रखें और पोस्ट छाप दें। यानि कि मामला एकदम आसान है!!’ </strong><br /><br />अमित की लिस्ट का पहला प्रश्न<strong> ’अपना ब्लॉग आरंभ किया ’</strong> इसलिए नहीं ले रहा हूँ कि नहीं खोला होगा तो फिर लिस्ट चैपेगा कहाँ इस प्रश्न को बोल्ड करने के लिए. :)<br /><br /><strong>तो लिजिये लिस्ट:</strong><br /><br /><br />१.छद्म नाम से ब्लॉग खोला.<br /><br />२.बेनामी जाकर टिपियाये.<br /><br />३.किसी विवाद के सेन्टर पाईंट बने.<br /><br />४.फुरसतिया जी की पोस्ट एक सिटिंग पूरी में पढ़ी.<br /><br />५.शास्त्री जी ने आपके बारे में लिखा.<br /><br />६.अजदक की कोई पोस्ट समझ में आई.<br /><br />७.टंकी पर चढ़े.<br /><br />८.लोग टंकी से उतारने आये.<br /><br />९.टंकी से खुद उतर आये.<br /><br />१०.खुद की आवाज में गाकर पॉडकास्ट किया.<br /><br />११.किसी ने अगली बार से न गाने की सलाह दी.<br /><br />१२.अगली बार से न गाने की सलाह मानी.<br /><br />१३.किसी ने आपका कार्टून बनाया.<br /><br />१४.किसी की पोस्ट चोरी करके अपने ब्लॉग पर अपने नाम से छापी.<br /><br />१५. चोरी की पोस्ट छापने के बाद पकड़े गये.<br /><br />१६. चोरी की पोस्ट छापकर पकड़े जाने के बाद भी बेशर्मों की तरह सीना जोरी करते रहे.<br /><br />१७. साहित्यकार होने का भ्रम पाला.<br /><br />१८. लिखने के साथ यह भी बताना पड़ा कि यह गज़ल है और यह व्यंग्य.<br /><br />१९. अपनी पोस्ट पढ़ने के लिए ईमेल से निमंत्रित किया.<br /><br />२०. ईमेल निमंत्रण के जबाब में कोई फटकार खाई कि आगे से ऐसी मेल न भेंजे.<br /><br />२१. फटकार के बावजूद ईमेल भेजते रहे.<br /><br />२२.दो ब्लॉगर के बीच झगड़ा करवाया.<br /><br />२३. दो ब्लॉगर के बीच झग़ड़ा करवाकर शांत कराने पहुँचे.<br /><br />२४. किसी सामूहिक ब्लॉग के सदस्य बने.<br /><br />२५. किसी सामूहिक ब्लॉग की सदस्यता त्यागी.<br /><br />२६. किसी सामूहिक ब्लॉग से निकाले गये.<br /><br />२७. बाथरुम में बैठकर ब्लॉग पोस्ट की.<br /><br />२८. ट्रेन से कोई पोस्ट लिखी.<br /><br />२९. ताऊ की पहेली बूझी.<br /><br />३०. पोस्ट लिखने और पोस्ट करने के बाद डिलिट की.<br /><br />३१. ब्लॉगवाणी में आज की पसंद पर पहले नम्बर आये.<br /><br />३२. चिट्ठाजगत की धड़ाधड़ में १ नम्बर पर आये.<br /><br />३३. किसी के ब्लॉग पर झूठी तारीफ की.<br /><br />३४. किसी फिल्म की समीक्षा पोस्ट की.<br /><br />३५. ब्लॉग पोस्ट के माध्यम से दूसरे ब्लॉगर से तू तू मैं मैं की.<br /><br />३६. कोई ऐसी पोस्ट की जिसे किसी ने पढ़ा ही नहीं.<br /><br />३७. तरकश चुनाव लड़े उदीयमान ब्लॉगर ऑफ द ईयर वाला.<br /><br />३८. किसी की पोस्ट पढ़कर लगा कि काश! मैं भी ऐसा लिख पाता.<br /><br />३९. किसी की पोस्ट पढ़कर ऐसा लगा कि हे भगवान!! कभी गल्ति से भी मैं ऐसा न लिख दूँ.<br /><br />४०. बिना उस स्थल पर गये वहाँ का यात्रा संस्मरण लिखा.<br /><br />४१. कभी अपनी कविता किसी विदेशी कवि के नाम से चैंपी.<br /><br />४२. कभी आपकी किसी हास्य प्रधान पोस्ट को किसी ने टिप्पणी में अति मार्मिक बताया.<br /><br />४३. बिना पोस्ट पढ़े टिप्पणी की.<br /><br />४४. कभी अपने ही लिखे पर शरम आई.<br /><br />४५. कभी काफी दिनों तक न लिख पाने की माफी मांगी, इस भ्रम में कि लोग इन्तजार कर रहे होंगे.<br /><br />४६. जब दिन भर टिप्पणी नहीं आई तो खुद से टिप्पणी करके चैक किया कि टिप्पणी बॉक्स काम कर रहा है कि नहीं.<br /><br />४७. कहीं टिप्पणी लम्बी हो जाती इसलिए उसे पोस्ट बना कर पोस्ट किया.<br /><br />४८. कभी अपनी बात उल्टी पड़ जाने पर बचने के लिए ऐसा कहा कि ’हम तो मौज ले रहे थे.’<br /><br />४९. कभी अखबार में आपके ब्लॉग का जिक्र हुआ.<br /><br />५०. अखबार में आपके ब्लॉग के जिक्र को स्कैन करा के ब्लॉग पोस्ट बना कर छापा.<br /><br />५१. अखबार की स्कैन कॉपी मित्रों और रिश्तेदारों को ईमेल से भेजी.<br /><br />५२. ’आज कुछ लिखने का मन नहीं है’ कह कर २५ लाईन से ज्यादा की पोस्ट लिखी.<br /><br />५३. एक ही पोस्ट को अपने ही पाँच ब्लॉगों से छापा.<br /><br />५४. अपनी पोस्ट बिना टिप्पणी के एग्रीगेटर के दूसरे पन्ने पर चले जाने से उसे डिलिट कर फिर से छापा ताकि वो फिर से उपर आ जाये.<br /><br />५५. गुस्से में अपने ब्लॉगरोल से किसी का ब्लॉग अलग किया.<br /><br />५६. एक दिन मे २५ से ज्यादा ब्लॉग पर टिपियाया.<br /><br />५७. किसी और की पोस्ट पढ़ने के लिए अपने ब्लॉग पर सिर्फ उसका लिंक देकर एक पोस्ट बनाई.<br /><br />५८. कभी कोई ब्लॉगर मीट अटेंड की.<br /><br />५७. कभी ब्लॉगर मीट अटेंड करके उसकी रिपोर्ट लिखी.<br /><br />५८. कभी किसी शोक समाचार पर भूल से बधाई दी.<br /><br />५९. कभी किसी से पोस्ट पर मजाक किया और सामने वाले ने बुरा मान लिया.<br /><br />६०. कभी आपकी खिलाफत करती किसी ने ब्लॉग पोस्ट लिखी.<br /><br />६१. क्या ’साधुवाद’ टाईप किसी जुमले से आपकी अलग पहचान बनी.<br /><br />६२. क्या ब्लॉग पोस्ट पर आपका कोई तकिया कलाम है.<br /><br />६३. कभी छत पर बैठ कर कोई ब्लॉग पोस्ट लिखी.<br /><br />६४. कभी कुछ लिखना चाहा किन्तु किसी को बुरा न लग जाये इसलिए नहीं लिखा.<br /><br />६५. कभी पूरी पोस्ट तैयार हो जाने के बाद भूल से डिलिट हो गई.<br /><br />६६. क्या इस भूल से डिलिट हुई पोस्ट के लिए एक पोस्ट की कि पोस्ट डिलिट हो गई और अब फिर से लिख पाना संभव नहीं.<br /><br />६७. क्या यह बताने के लिए कि ’अब अगले पाँच दिन नहीं लिख पाऊँगा’ पोस्ट लगाई जबकि यूँ भी आप एक महिने से नहीं लिख रहे थे.<br /><br />६८.कभी आपका ब्लॉग एग्रीगेटर से अलग किया गया.<br /><br />६९. क्या कभी तकनिकी कारणों से पोस्ट एग्रीगेटर पर न दिखने पर आपने एग्रीगेटर की तानाशाही पर पूरा ब्लॉगजगत सर पर उठा लिया. <br /><br />७०. कभी किसी को अपने ब्लॉग का सदस्य बनाने निमंत्रण भेजा.<br /><br />७१. कभी किसी से उसके ब्लॉग का सदस्य बनने का निमंत्रण मिला.<br /><br />७२. कभी किसी को अपने ब्लॉग का सदस्य बनाने निमंत्रण भेजा और उसने ठुकरा दिया.<br /><br />७३. कभी किसी से उसके ब्लॉग का सदस्य बनने का निमंत्रण मिला और आपने ठुकरा दिया.<br /><br />७४. आपकी गज़ल के बेबहर होने पर किसी ने टोका.<br /><br />७५. क्या आपने माईक्रो गद्य लिखा और लोगों ने उसे कविता समझ कर बधाई दी.<br /><br />७६. इंक ब्लॉगिंग की.<br /><br />७७.अपनी टिप्पणी में अपना यू आर एल लिख छोड़ा ताकि लोग क्लिक करके आयें.<br /><br />७८. टिप्पणी में वर्तनी दोष सुधारने के लिए फिर से टिप्पणी की.<br /><br />७९. आपके नाम से कोई और टिप्पणी कर गया.<br /><br />८०. आपके नाम से कोई और टिप्पणी कर गया और आप इस पर पोस्ट लिखने की बजाय हर तरफ स्पष्टीकरण देते घूमे.<br /><br />८१. अपनी प्रोफाईल में अपनी जगह दूसरे की तस्वीर चैंप दी.<br /><br />८२. अपनी हर पोस्ट के शीर्षक के साथ डेश लगाकर अपना नाम लिखा.<br /><br />८३. अपनी पोस्ट में अपना ही मजाक उड़ाया.<br /><br />८४. ’तू मेरी पीठ खुजा, मैं तेरी’ को ब्रह्म वाक्य मान कर ब्लॉगिंग की.<br /><br />८५. एड सेन्स लगाकर हिन्दी ब्लॉग पर कमा लेने का भ्रम पाला.<br /><br />८६. आये दिन एड सेन्स खाता चैक किया कि कितने पैसे जमा हो गये.<br /><br />८७. एड सेन्स खाते का बैलेन्स जीरो होने के बावजूद भी एड सेन्स के हिन्दी में बन्द होने पर उदास हुए.<br /><br />८८. नम्बर ८७ के उदासी के आलम में पोस्ट लिखी.<br /><br />८९. ब्लॉग पर स्टेट काऊन्टर लगाया.<br /><br />९०. दिन में तीन बार स्टेट काऊन्टर पर आवा जाही चेक की.<br /><br />९२. शतकीय पोस्ट की सूचना पोस्ट लिखी.<br /><br />९३. स्टेट काऊन्टर के १०००० या २०००० पार करने की सूचना पोस्ट लिखी.<br /><br />९४. स्टेट काऊन्टर को मेन्यूलि बढ़ा कर लगाया.<br /><br />९५. अपने ब्लॉग पर आवाजाही का ग्राफ बना कर पोस्ट कर गौरवान्वित महसूस किया.<br /><br />९६. पत्नि का ब्लॉग बनवाया.<br /><br />९७. पत्नि के नाम से खुद ही पोस्ट लिख कर डाल दी.<br /><br />९८. अपनी हर पोस्ट पर पत्नि का और उसकी हर पोस्ट पर अपना कमेंट डाला.<br /><br />९९. अपना ब्लॉग डिलिट किया. <br /><br /><strong>नोट: हमारे तो लगभग सभी बोल्ड टाईप ही हैं, कुछ को छोड़ कर. :)</strong> आप तो अपनी बताओ.<div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/23257105-8521432307597806334?l=udantashtari.blogspot.com'/></div>Udan Tashtarihttp://www.blogger.com/profile/06057252073193171933sameer.lal@gmail.com68tag:blogger.com,1999:blog-23257105.post-23860702588850559702009-04-29T06:30:00.002+05:302009-04-29T13:21:43.879+05:30बेचारा सुअर....<strong>कल देर रात लंदन की यात्रा से लौटे.</strong> यहाँ से याने यॉर्क से लंदन की ३.३० घंटे की ड्राईव थी और लौटते वक्त नॉरिच शहर वाया केम्ब्रीज लौटे. नॉरिच में एक मित्र परिवार के साथ लंच था तो वापास आते पूरे ७ घंटे की ड्राईव हो गई.<br /><br />यहाँ हालाँकि भारत की तरह ही लेफ्ट में गाड़ी चलाते हैं और हैं भी मेन्यूल गियर मगर फिर भी <strong>स्पीड कनाडा से ज्यादा </strong>थी. लगभग पूरा सफर १३० किमी की रफ्तार से गाड़ी चलाने में आनन्द आ गया. रास्ता भी बहुत हरियाली से भरा हुआ और मौसम भी उतना ही सुहाना. <strong>बीच बीच में वो सरसों के खेत भी मिले </strong>जिनमें कभी काजोल दौड़ी थी फिल्म ’दिल वाले दुल्हनिया ले जायेंगे’ के लिए.<br /><br /><strong>इस बीच मेनचेस्टर भी हो आये हैं.</strong> बहुत कुछ है बताने को इन शहरों के बारे में, इनकी तस्वीरें और यहाँ आने के लिए बेल्जियम से यहाँ तक<strong> यूरोस्टार रेल से यादगार यात्रा</strong>. लगता है ३ तारीख को कनाडा पहुँच कर ही तस्सली से लिखना होगा.<br /><br />हाँ, कनाडा जाने के नाम पर एकाएक आज <a href="http://indianscifiarvind.blogspot.com/2009/04/blog-post_26.html">अरविन्द मिश्रा जी की पोस्ट</a> पर नजर पड़ी. टीवी पर तो खैर देख ही रहे थे कि कनाडा-अमरीका में <strong>स्वाइन-फ्लू का प्रकोप हुआ है </strong>और इसके महामारी बन जाने का खतरा विश्व स्तर पर मंडरा रहा है.अखबार और टीवी देखता हूँ तो हर अमरीकी और कनैडियन परेशान और हैरान. साबुन से बीस बार हाथ धोये जा रहे हैं. हर बार डिसइन्फेक्टेन्ट लगा रहे हैं जैसे बर्ड फ्लू के समय एतिहात बरते जा रहे थे. <strong>लग रहा है मानो इससे बच गये तो अमर हो जायेंगे. फिर कभी नहीं मरेंगे. </strong><br /><br /><em>एक पतले से धागे का फासला है जिन्दगी और मौत के बीच. धागा टूटा नहीं कि आप उस पार. फिर भी जीजीविषा की मोटी रस्सी आपको उस धागे से पार जाने से रोके रखने का अंतिम क्षणों तक प्रयास करती रहती है. न जाने क्यूँ?</em><br /><br />खैर, <a href="http://indianscifiarvind.blogspot.com/2009/04/blog-post_26.html">मिश्र जी को पढ़ा</a>, टीवी देखा, अखबार पढ़ा-जाना और समझा. जाना तो वहीं है. तसल्ली ये लग गई कि यह महामारी सूअर के माध्यम से फैल रही है. <strong>बहुत राहत लगी कि हम तो सूअर खाते नहीं.</strong> ये तो गोरे जाने, उनकी परेशानी है.<br /><br />मन ही मन बड़े खुश और लगे सोफे पर लेटकर मूवी देखने ’रब ने बना दी जोड़ी’. प्रिन्ट शायद थो़ड़ा खराब था तो मन भटका. विचार फिर मन में कौंधे कि आखिर मैं कितना सेफ हूँ सिर्फ इसलिए कि सूअर नहीं खाता. अवलोकन करते ही चौंक पड़ा-अरे, <strong>काहे का सेफ!!! सूअर भी तो सूअर कहाँ खाते हैं?</strong> फिर भी मेन रोल में वो ही हीरो हैं इस एपिसोड के. फिर अपने काहे के सेफ?<br /><br /><td><a href="http://picasaweb.google.co.uk/lh/photo/kIpfLro7JLPDIswOi1NEoA?authkey=Gv1sRgCISf1_uP1MyA_wE&feat=embedwebsite"><img src="http://lh3.ggpht.com/_N7sdMZXEIvI/SfcRaVdGjzI/AAAAAAAADCc/06csVuzLWbQ/s800/pig.jpg" /></a></td></tr><tr><td style="font-family:arial,sans-serif; font-size:11px; text-align:right"><a href="http://picasaweb.google.co.uk/sameer.lal/BloggerPictures?authkey=Gv1sRgCISf1_uP1MyA_wE&feat=embedwebsite">बेचारा सूअर</a></td><br /><br />चलो, देखी जायेगी. <strong>जाना तो है ही है. कनाडा भी और उपर भी.</strong> जब जो जो बदा होगा, तब वो वो झेलेंगे.<br /><br /><strong>एक मजेदार बात तो भारत से निकलते वक्त</strong> ऐसी हुई कि क्या कहें.<br /><br />अक्सर ही कनाडा आते समय जबलपुर से दिल्ली फ्लाईट के दो दिन पूर्व आ जाता हूँ ताकि मन भी शांत हो ले और इत्मिनान से निकलें. पीछे छूटे परिवार के सदस्य और साथी भी इस सेटलमेंट टाइम में सेटल हो जाते हैं कि अभी तो भारत में ही है. <strong>सब सोच का खेल है.</strong> हर बार ग्रेटर नोएडा में चाचा के घर ही रुकना होता है. इस बार चलते वक्त बेटे का फोन आ गया कि हयात होटल के पाइंट पड़े हैं, आप इस्तेमाल कर लिजिये. हमने भी सोचा, चलो <strong>हयात में रुक लेते हैं </strong>और भीका जी कामा प्लेस वाले हयात में कमरा बुक करा लिया. <br /><br />बार बार रुकते रुकते बेटा उनके डायमंड कल्ब का मेम्बर हो लिया है तो होटल वाले जरा एकस्ट्रा सजग थे और हमसे पूछा कि <strong>सर, आप और मैडम आ रहे हैं तो रुम अपग्रेड कर दें.</strong> हमें भी क्या, हमने कह दिया-कर दो.<br /><br />होटल पहुँचे तो बेहतरीन रुम इन्तजार कर रहा था. पहुँचते ही नहाने चले गये और जब निकल कर आये तो<strong> पत्नी हा हा करके हँसते मिली.</strong> माजरा कुछ समझ नहीं आया. जब उसकी हँसी रुकी तो जो उसने बताया कि हम तो मानो इस उम्र में आकर शर्म से लाल टाईप हो गये.<br /><br />दरअसल, <strong>अपग्रेड में हयात नें हमें हनीमून वाला कमरा दे दिया </strong>जिसके बाथरुम की दीवाल पूरे काँच की थी. कमरे में चूँकि रोशनी एकदम मद्धम थी तो हमें तो बाथरुम से कमरा ज्यादा नहीं दिखा और न ही उस ओर ध्यान गया किन्तु कमरे से पूर्ण रोशन बाथरुम का एक एक नल नजर आ रहा था. बताईये, यह भी कोई बात हुई. <strong>भले ही कोई हनीमून पर भी आया हो, नहाते हुए क्या देखना भाई!!</strong> हमारी तो खैर समझ के बाहर है. <br /><br /><strong>यूँ तो पारदर्शिता बहुत अच्छी बात है किन्तु हर जगह नहीं. सारी भैंसे एक ही लाठी से नहीं हाँकी जाती.</strong><br /><br />शाम को कुछ गेस्ट भी आमंत्रित थे कमरे में. हम सोचने लगे कि अगर उन्हें बाथरुम जाना हुआ तो? और वैसे भी पता लगने के बाद तो हम खुद ही न इस्तेमाल कर पाते. तुरंत फ़्रंट डेस्क को फोन किये. अपना कमरा दूसरा करवाये..नार्मल बाथरुम वाला, तब जा कर चैन में चैन आया.<br /><br /><td><a href="http://picasaweb.google.co.uk/lh/photo/YD8a52bE28u2aQa8Dmmlqg?authkey=Gv1sRgCISf1_uP1MyA_wE&feat=embedwebsite"><img src="http://lh3.ggpht.com/_N7sdMZXEIvI/SfcRaFcnmxI/AAAAAAAADCU/QzsyH3VLSFA/s400/HayyatRoom.jpg" /></a></td></tr><tr><td style="font-family:arial,sans-serif; font-size:11px; text-align:right"><a href="http://picasaweb.google.co.uk/sameer.lal/BloggerPictures?authkey=Gv1sRgCISf1_uP1MyA_wE&feat=embedwebsite">वो पीछे: बाथरुम की काँच की दीवाल</a></td><br /><br />हाँ, अगली रात एक मित्र परिवार के साथ<strong> जामा मस्ज़िद के पास वाले करीम पर जाकर खाना खाया</strong>-जबदस्त और अद्भुत अनुभव. बहुत पुरानी तमन्ना थी वहाँ जाकर खाना खाने की, सो चलते चलते पूरी हुई. जितनी ख्वाईशें ऐसे ही पूरी होती चलें, बस काफी है वरना तो:<br /><br /><strong>हजारों ख्वाईशें ऐसी की हर ख्वाइश पर दम निकले</strong><br /><br /><td><a href="http://picasaweb.google.co.uk/lh/photo/CYiJHIZLWbxM6RTill_1-g?authkey=Gv1sRgCISf1_uP1MyA_wE&feat=embedwebsite"><img src="http://lh3.ggpht.com/_N7sdMZXEIvI/SfcRYmPpEOI/AAAAAAAADCM/Cqw0WEg_eFQ/s400/hayaatBar.jpg" /></a></td></tr><tr><td style="font-family:arial,sans-serif; font-size:11px; text-align:right"><a href="http://picasaweb.google.co.uk/sameer.lal/BloggerPictures?authkey=Gv1sRgCISf1_uP1MyA_wE&feat=embedwebsite">हयात:जरा बार का रुख करें</a></td><br /><br /><br /><strong>अब यूँ ही एक विडियो जो यू ट्युब पर मिला:</strong><br /><br /><object width="425" height="344"><param name="movie" value="http://www.youtube.com/v/EjOfJMFvQW0&hl=en&fs=1"></param><param name="allowFullScreen" value="true"></param><param name="allowscriptaccess" value="always"></param><embed src="http://www.youtube.com/v/EjOfJMFvQW0&hl=en&fs=1" type="application/x-shockwave-flash" allowscriptaccess="always" allowfullscreen="true" width="425" height="344"></embed></object><div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/23257105-2386070258885055970?l=udantashtari.blogspot.com'/></div>Udan Tashtarihttp://www.blogger.com/profile/06057252073193171933sameer.lal@gmail.com68tag:blogger.com,1999:blog-23257105.post-71733906708150887412009-04-21T06:28:00.003+05:302009-04-21T06:28:00.716+05:30मैं अभागा!! जड़ से टूटा!!जब कनाडा आने को जबलपुर से दिल्ली आने को स्टेशन आते समय घर से कार निकलती है, तो उसमें बैठ कर सिर्फ मैं नहीं निकलता..न जाने क्या क्या निकल जाता है. <strong>पूरा बचपन निकल जाता है</strong>..रुक जाने को मचलता है. जवानी चित्कार करती है कि क्यूँ जाते हो..अब तक का सारा बीता समय उस घर में..उस शहर में..<strong>न रुकता देख धिक्कारने लगता है</strong>..कि ये क्या कर रहा है तू मूरख. पछतायेगा एक दिन!!<br /><br />ट्रेन पकड़ता हूँ..शहर छूटता है..फिर दिल्ली एयरपोर्ट पर..कस्टम क्लिरेंस के बाद...बस बस, लगता है कि देश ही छूट गया..<strong>मैं खुद खुद से छूट गया</strong>..अब वापसी का कोई उपाय नहीं अगली बार तक. <br /><br />हवाई जहाज हवाई पट्टी पर दौड़ता है..मन जाने कितने पीछे तक लौटता है और यह हवाई पट्टी छूटी...<strong>उपर उठे जमीन से...मन से खुद की नजर में नीचे गिरे.</strong>पाताल से भी गहरे...देश छूटा और मैं अहसासता हूँ कि <strong>मैं जड़ से टूटा...सूखा पत्ता...जिसे हवा बहाये ले जा रही है</strong>..यह हवायें जो मेरी मजबूरियाँ है..उनका रुख भी तो मेरे ही हाथ ही है बदलना-फिर क्यूँ नहीं..नहीं जानता..या नहीं जानना चाहता...!<br /><br />सारे दोस्त यार, बचपन की गलियाँ, आज तक के नाते रिश्ते...<strong>सूखी आँख में गीले इन्तजार की ललक लिए बुजुर्ग</strong>..न जाने किस उम्मीद को पाले..और किस उम्मीद पर जीते..<strong>हम जैसे खुदगर्ज बेवतनों से आस लगाये...</strong>और उनके हाथ है सहारा देने को हमारे बदले<strong> एक काठी की लाठी...</strong><br /><br />हर बार भारत छो़ड़ता हूँ..तो कुछ दिन पूर्व से कुछ दिन बाद तक असहज ही रहता हूँ...मानव हूँ फिर अपनी दुनिया में रम जाता हूँ..<br /><br /><strong>इसी ट्रांजिशन के दौर में उपजी मनोव्यथा उजागर करती रचना</strong>:<br /><br /><strong><br />नोट:</strong> अभी यॉर्क, यू.के. याने लन्दन से नार्थ में दो घंटे पर हूँ. ३ मई को कनाडा वापसी है. कई मित्रों को लगा कि मैं न्यूयार्क आ गया हूँ, उनसे क्षमाप्रार्थी-मेरे लिखने में कुछ कमी रह गई होगी. मुझे स्पष्ट लिखना चाहिये था.<br /><br /><td><a href="http://picasaweb.google.co.uk/lh/photo/xvokMvrZ3ysQMnfUiGHv7A?feat=embedwebsite"><img src="http://lh5.ggpht.com/_N7sdMZXEIvI/SecRTYfAYYI/AAAAAAAABnM/NFggZiw6UMg/man%20with%20stick.jpg" /></a></td></tr><tr><td style="font-family:arial,sans-serif; font-size:11px; text-align:right"><a href="http://picasaweb.google.co.uk/sameer.lal/BloogerMeet?feat=embedwebsite">काठी की लाठी</a></td><br /><br /><br />इक<br />लाठी<br />वो <br />काठी<br />वाली....<br /><br />सरदी, गरमी और बरसातें<br />सुख और दुख की <br />वे सौगातें....<br /><br /><br /><strong>हरदम ही<br />वो<br />साथ रही थी...</strong><br /><br /><br />और<br /><br />मुझे भी देख जरा लो<br />..<br /> <br />इक<br />मैं था<br />कितना अलबेला...<br /><br />छोड़ के जड़ को<br />दूर हुआ, <br />था निपट अकेला...<br /><br />कुछ तो थी पाने की आशा<br />बदलूँ <br />जीवन की परिभाषा...<br /><br /><br /><strong>जिससे<br />उनको<br />आस रही थी....</strong><br /><br /><br />वो लाठी भी<br />कुछ कहती थी...<br />सब कुछ<br />हंसते ही सहती थी...<br /><br /><br />वो भाषा<br />अब समझ रहा हूँ...<br /><br />जब मैं आज<br />उसी लाठी की..<br />राहों पर से<br />गुजर रहा हूँ....<br /><br /><br />सचमुच!!<br />बहुत देर तक सोया...<br /><br />कुछ पाने की आशा लेकर<br />कितना कुछ है<br />मैने खोया !!!!!!<br /><br /><br />सोच रहा हूँ<br />समझ रहा हूँ..<br /><br />मेरे ही पागलपन से तो,<br />वह इक नाता<br />छूट <br />गया था...<br /><br />वो <br />डाली<br /><strong>एक पेड़ से टूटी..</strong><br /><br />मैं <br />जड़ से ही<br /><strong>टूट गया था....</strong><br /><br /><br />-समीर लाल ’समीर’<br /><br /><br />( यह रचना समर्पित है <strong>हर उस बुजुर्ग को जिनके सहारे (बेटे या बेटियाँ) उनके साथ नहीं है</strong> चाहे किसी भी मजबूरी के तहत-कुछ भी कारण उस दूरी को जस्टिफाई न कर पायेगा-सब बहाने ही होंगे एक मायने में)<div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/23257105-7173390670815088741?l=udantashtari.blogspot.com'/></div>Udan Tashtarihttp://www.blogger.com/profile/06057252073193171933sameer.lal@gmail.com104tag:blogger.com,1999:blog-23257105.post-80556801324201040482009-04-14T06:25:00.000+05:302009-04-14T06:25:00.967+05:30यूँ बन गई गज़लसूरज डूब चुका है. रोशनी अब भी बाकी है. छत पर अकेले चाय के साथ बैठना सुकुन दे रहा है. न जाने कौन है वो जो सामने के मोहल्ले में हर वक्त गाना बजाता रहता है. शायद कोई पान की दुकान पर बजता है ऐसा रामदीन बताता था. एक से एक चुनिंदा पुराने गानों की पसंद है उसकी. बजाता है:<br /><br /><strong>देख तेरे संसार की हालत, क्या हो गई भगवान,<br />कितना बदल गया इन्सान!!</strong><br /><br />वाकई कितना बदल गया है इन्सान. चुनाव का मौसम है. दोपहर ही एक नेता हाथ जोड़ कर वादा करते हुए मिल कर गये हैं. न पुराने वादों को पूरा न करने अपराध बोध और न ही अभी किए जा रहे वादों की नींव में झूट की बुनियाद से कोई हिचकिचाहट-बस चेहरे पर घाघी मुस्कराहट.<br /><br />विचारों के सागर में डूबने लगता हूँ.<br /><br />कितनी बदल चुकी है दुनिया. दो पड़ोसी, भाई भाई की तरह खुशी खुशी जिन्दगी बसर कर रहे हैं. कभी मन में भी नहीं आया कि ईद मुसलमान की और दीवाली हिन्दु की. मगर क्या करें इन सियासतदारों का. इन्होंने ने इसी सियासी खेल में अपना उल्लू सीधा करने के लिए कैसी फूट डाल दी. सरहदें बाँट दीं और दिलों में नफरत भर दी. आज पूरे फक्र से उन्हीं बिछड़ों पर राज करते हैं न जाने किस मूँह से:<br /><br />बाँट डाला है दिलों को, सरहदों के नाम पर<br />शर्म भी आती नहीं है उनको अपने काम पर.<br /><br />ऐसा गंदा खेल हो चुकी है यह सियासत कि अब आदमी दूसरों का तो क्या कहें, खुद का खुद पर भरोसा खो चुका है. बस, एक भ्रम में सियासी खेल खेले चले जा रहा है. न कोई अंकुश और न कोई मर्यादा :<br /><br />नाक तक डूबा हुआ है, वो सियासी खेल में,<br />किस तरह करता भरोसा, खुद के ही इमान पर.<br /><br />क्या सही क्या गलत जैसे कोई सरोकार ही नहीं बचा इन सब बातों से. वादा खिलाफी तो फिर भी काबिले-बर्दाश्त है, इतने बरसों से आदत सी हो गई है इनकी वादा खिलाफी को झेलना. मगर अब तो उनकी नजरों में सब सही है और मानो कानून नाम से तो कोई डर ही नहीं रहा इन कानून बनाने वालों को. खुद बनाते हैं जैसे तोड़ने के लिए ही. किसी भी हद तक गिर जाते हैं और किस किस तरह के केसों में इनके नाम निकल कर आते हैं:<br /><br />करके वादा तोड़ देना, ये तो फितरत में रहा,<br />किस तरह हंसता रहा वो, हर लगे इल्जाम पर.<br /><br />हर सीख बेकार जा रही है. कभी कहते थे जल्दबाजी में किया हर काम किसी भी अंजाम तक नहीं पहुँचाता. एक शास्वत नियम सा है कि एक एक कदम साधकर चलो अगर मंजिल पाना है और उस पर अपना परचम लहराना है. कितनी ही कहानियाँ सुनाई गई इस पाठ को सिखाने के लिए. याद है वो खरगोश और कछुए की दौड़ मगर देखो आज के नेताओं को, आज संपर्क में आये, कल जीते और परसों करोड़पति और साथ में तमगे के बतौर हजारों विचाराधीन मुकदमें. इसी कुछ तर्ज पर आज के युवा भी जाने क्या पाने की आस लिए भागे चले जा रहे हैं, हालांकि नेताओं और इन युवाओं की मंजिलों में फरक है और इन नेताओं का तो कुछ नहीं बिगड़ता मगर आज का युवा-कौन मान रहा है ये सीख:<br /><br />दौड़ कर के सीढ़ियाँ, लाँध कर जो चढ़ गया<br />हाँफ कर वो गिर गया, पहुँचा जब मुकाम पर.<br /><br /><br />वाकई, कितना बदल गया है इन्सान और कितना बदल गया है यह जमाना. अब तो बदले जमाने के हिसाब से जीना सीखना होगा. वरना तो बसर ही मुमकिन नहीं. जिन्दा लाशों के बीच रहने वाले मौत का मातम नहीं मनाते बल्कि वो तो मुक्ति का और खुशी का मौका बन चुका है:<br /><br />ये जमाना वो नहीं है, जिससे सीखा था ’समीर’<br />मत बहा तू अश्क अपने, आज कत्ले-आम पर.<br /><br />और इसी तरह की सोच में डूबे शेर दर शेर बन कर निकलती है एक गज़ल. हम्म, पर चाय ठंडी हो गई. नई बनवा कर मंगवाता हूँ. <strong>तब तक आप गज़ल पढ़ो:</strong><br /><br />बाँट डाला है दिलों को, सरहदों के नाम पर<br />शर्म भी आती नहीं है उनको अपने काम पर.<br /><br />नाक तक डूबा हुआ है, वो सियासी खेल में,<br />किस तरह करता भरोसा, खुद के ही इमान पर.<br /><br />करके वादा तोड़ देना, ये तो फितरत में रहा,<br />किस तरह हंसता रहा वो, हर लगे इल्जाम पर.<br /><br />दौड़ कर जो सीढ़ियाँ, लाँध कर के चढ़ गया<br />हाँफ कर वो गिर गया, पहुँचा जब मुकाम पर.<br /><br />ये जमाना वो नहीं है, जिससे सीखा था ’समीर’<br />मत बहा तू अश्क अपने, आज कत्ले-आम पर.<br /><br /><br />-समीर लाल ’समीर’<br /><br /><td><a href="http://picasaweb.google.co.in/lh/photo/j1IrGzJOg8T5L_zWhGcByg?feat=embedwebsite"><img src="http://lh6.ggpht.com/_N7sdMZXEIvI/SeNmdOUW1gI/AAAAAAAABmk/6-alZFIxioY/khud1.jpg" /></a></td></tr><tr><td style="font-family:arial,sans-serif; font-size:11px; text-align:right"><a href="http://picasaweb.google.co.in/sameer.lal/BloogerMeet?feat=embedwebsite"></a></td><br /><br /><strong> नोट:</strong> <br /><br />१. बस, एक अलग तरह का प्रयोग करने की कोशिश मात्र है. बताईयेगा, कैसा रहा यह प्रयास?<br /><br />२. यह आलेख तैयार जबलपुर में हो गया था मगर पोस्ट दिल्ली से किया जा रहा है. जब आप इसे पढ़ रहे होंगे, मैं वापसी की तैयारी में हूँगा. देर रात ब्रसल्स के लिए फ्लाईट है और वहाँ से दिन में लंदन और फिर यॉर्क, बेटे, बहु के पास. कुछ दिन उनके साथ रहकर फिर कनाडा वापसी. अब नेट पर १५/१६ अप्रेल को ही आना होगा, ऐसा लगता है.<br /><br />३. वापसी की तैयारी में ही पिछले कुछ दिनों से व्यस्तता बनी हुई है और वही नेट से दूर रखे है-न कोई पठन, न लेखन और न ही टिप्पणी. जल्द पूरे जोर शोर से वापस आते हैं.<div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/23257105-8055680132420104048?l=udantashtari.blogspot.com'/></div>Udan Tashtarihttp://www.blogger.com/profile/06057252073193171933sameer.lal@gmail.com76tag:blogger.com,1999:blog-23257105.post-86443157820478493062009-04-08T06:26:00.000+05:302009-04-08T06:26:00.234+05:30मेरी माँ लुटेरी थी-याद आया बिखरे मोती के अंतरिम विमोचन में<a href="http://sanjusandesha.blogspot.com/">बिखरे मोती के अंतरिम विमोचन की रिपोर्ट यहाँ </a>पढ़िये और उस वक्त जो याद आया वो यहाँ नीचे:<br /><p><br /><img border="0" src="http://2.bp.blogspot.com/_XQyeaYRtFiI/SdS56VdCZeI/AAAAAAAAAzU/feU9REl9jQQ/s320/sameer+ji+12.jpg" width="218" height="320"><br /></p><br /><br /><strong>मेरी माँ लुटेरी थी...</strong><br /><br />माँ!! <br /><br />तेरा<br />सब कुछ तो दे दिया था तुझे <br />विदा करते वक्त<br />तेरा<br />शादी का जोड़ा <br />तेरे सब जेवर<br />कुंकुम,मेंहदी,सिन्दूर<br />ओढ़नी<br />नई <br />दुल्हन की तरह <br />साजो<br />सामान के साथ <br />बिदा<br />किया था... <br /><br />और हाँ<br />तेरी छड़ी<br />तेरी एनक,<br />तेरे नकली दांत<br />पिता<br />जी ने<br />सब कुछ ही तो<br />रख दिये थे<br />अपने हाथों... <br />तेरी<br />चिता में <br /><br />लेकिन <br />फिर भी<br />जब से लौटा हूँ घर<br />बिठा कर तुझे<br />अग्नि रथ पर<br />तेरी छाप क्यों नजर आती है?<br /><br />वह धागा<br />जिसे तूने मंत्र फूंक<br />कर दिया था जादुई<br />और बांध दिया था<br />घर<br />मोहल्ला,<br />बस्ती<br />सभी को एक सूत्र में<br /><br />आज<br />अचानक लगने लगा है<br />जैसे टूट गया वह धागा<br />सब कुछ<br />वही तो है<br />घर<br />मोहल्ला<br />बस्ती<br />और वही लोग<br />पर घर की छत<br />मोहल्ले का जुड़ाव<br />और<br />बस्ती का सम्बन्ध<br />कुछ ही तो नहीं<br />सब कुछ लुट गया है न!!<br /><br />हाँ माँ!<br /><br />सब कुछ<br />और ये सब कुछ<br />तू ही तो ले गई है लूट कर<br />मुझे पता है<br />जानता हूं न बचपन से<br />तेरा लुटेरा पन.<br />तू ही तो लूटा करती थी<br />मेरी पीड़ा<br />मेरे दुख<br />मेरे सर की धूप<br />और छोड़ जाती थी<br />अपनी लूट की निशानी<br />एक मुस्कान<br />एक रस भीगा स्पर्श<br />और स्नेह की फुहार<br />अब सब कुछ लुट गया है!!<br /><br />स्तम्भित हैं<br />पिताजी तो<br />यह भी नहीं बताते<br />आखिर<br />कहां लिखवाऊँ<br />रपट अपने लुटने की<br />घर के लुटने की<br />बस्ती और मोहल्ले के लुटने की<br /><br />और सबसे अधिक<br />अपने समय के लुट जाने की....<br /><br /><br />-समीर लाल ’समीर’<div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/23257105-8644315782047849306?l=udantashtari.blogspot.com'/></div>Udan Tashtarihttp://www.blogger.com/profile/06057252073193171933sameer.lal@gmail.com98tag:blogger.com,1999:blog-23257105.post-88489877591792552332009-04-06T06:26:00.001+05:302009-04-06T06:26:00.321+05:30किसकी संगत कर ली, यार!!आपकी पहचान यह नहीं होती कि आप क्या हैं या कौन हैं-<strong>समाज आपको आप किनके साथ उठते बैठते हैं, उससे आंकता है.</strong><br /><br />आप जिनके साथ उठते बैठते हैं, ज्यादा समय बिताते हैं वो निश्चित ही आपके व्यक्तित्व को प्रभावित करते हैं. (इसके कुछ अपवाद आपको अपने ब्लॉगजगत में भी मिलेंगे जो सुधरने का नाम नहीं लेते मगर बड़े बड़ों के संरक्षण में पले जा रहे हैं-खैर, उनसे क्या करना, <strong>उन्हें तो इग्नोर करते रहूँ</strong>, उसी में मेरी भलाई है और उनका अंत). <br /><br />शायद इसीलिए कहा गया होगा <strong>’संगत कीजे साधु की’</strong><br /><br />कुछ सालों पहले जब ब्लॉगिंग शुरु की तो एकाएक वाह वाह कहने की आदत सी पड़ गई. पत्नी घर पर खाना परोसे और हम कह उठें-<strong>वाह वाह, बहुत खूब!! </strong>इस चक्कर में वैसी ही तरोई और लौकी की सब्जी तीन तीन दिन तक खाना पड़ी मगर आदत के चलते मजबूर.<br /><br />दो साल पहले पूरे <a href="http://masijeevi.blogspot.com/2007/06/blog-post_07.html">मसिजीवी</a> परिवार को हमसे साधुवाद की ऐसी छूत लगी थी कि पहाड़ों पर घूमते वो परिवार बादल से लेकर जल तक का <a href="http://masijeevi.blogspot.com/2007/06/blog-post_07.html">साधुवाद</a> करता रहा और कहता रहा आकाश से कि क्या चित्र उकेरा है, बहुत खूब!!<br /><br />आज जब ब्लॉगजगत का विचरण करता हूँ तो पाता हूँ कि <strong>कितने ही एक दूसरे से प्रभावित हैं.</strong> जिसे देखो वो कहता है कि बहुत उम्दा...बेहतरीन अभिव्यक्ति...अति भावपूर्ण. और भी जाने क्या क्या.<br /><br />एक नया सा चलन आजकल देखने में आ रहा है-जो भी दस दिन से ज्यादा अंतराल के बाद लिख रहा है वो पहले अपनी अनुपस्थिति की क्षमा मांगता है कि <strong>माफ करियेगा इतने दिन आपके बीच नहीं आ पाया.</strong> वैसे सच सच कहें तो अगर वो बताते नहीं तो हमें पता तक न चलता कि वो इतने दिन से आये नहीं. <strong>किसे इन्तजार था भाई. </strong><br /><br />ये तो वो जगह है दोस्तों, जहाँ आ गये तो वाह वाह-न आये तो वाह वाह!! टंकी पर चढ़ जाओ तो वाह वाह!! उतर आओ तो वाह वाह!! वहीं रह जाओ तो भी वाह वाह!! हो चुका है ऐसा और लोग अपनी मूँह की खाये उतरते भी दिखे हैं. <strong>अगर दस दिन से ज्यादा का अन्तराल क्षमा मांगने का तय हो जाये तो जाने कितने ब्लॉगर ’क्षमा देहि’ का कटोरा लिए घूमते नजर आयें.</strong> जीतू (अरे वो नारद वाले) तो खुद ही कटोरा बन जायें ऐसा अन्तराल रहता है उनका.<br /><br />कई बार सोचता हूँ कि काश, यह ’व्यवहार बदलाव’ ’प्लेटफॉर्म इन्डिपेन्डेन्ट’ (<strong>मंच उदासीन</strong>-ज्ञान जी से एफेक्टेड) (<strong>उन्मुक्त जी</strong> सुन रहे हो) होता तो कितना बढ़िया होता. <strong>ब्लॉगर से साहित्यकार प्रभावित होते और साहित्यकारों से ब्लॉगर.</strong> दूसरा हिस्सा जरुर दुखदायी और कष्टप्रद रहता मगर पहले हिस्से के लाभों को देखते हुए उसे हम सह जाते. जैसे कई बार <strong>पूरे शरीर में जहर न फैल जाये इस लिहाज से पैर काट कर अलग कर देना</strong> इन्सान झेल जाता है अन्य लाभ देखते हुए.<br /><br /><strong>आम जन से नेता प्रभावित होते और नेता से आम जन.</strong> पुनः, दूसरा हिस्सा जरुर दुखदायी और कष्टप्रद रहता मगर पहले हिस्से के लाभों को देखते हुए उसे हम सह जाते. शायद कोई नेता इस प्रभाव में कह उठता कि आम जन तकलीफ में है, नेताओं को कुछ करना चाहिये. कुछ तो भला हो ही जाता.<br /><br />कुछ समय पहले ब्लॉगजगत का प्रभाव कुछ यूँ होना शुरु हुआ कि मैं तो घबरा ही गया.<br /><br />एकाएक एक मित्र से दूसरे मित्र के बारे में पूछा और साथ में कहा कि यार, वो कुछ स्वभाव से ठीक नहीं लगता.<br /><br />आम आदमी के स्वभाव की तरह उस मित्र ने भी हाँ मे हाँ मिला दी और हमने जाकर दूसरे मित्र को बता दिया कि यार, तुम्हारा स्वभाव उस मित्र को पसंद नहीं.<br /><br />बस, बात का बतंगड़ बन गया. कुछ मित्रों ने बैठ कर मसला हल कराया तो बात खुल कर सामने आई और हम फंसने लगे. अब क्या रास्ता था. बस दांत चियारे हम कह उठे कि <strong>अरे भई, हम तो यूँ ही मौज ले रहे थे और आप सब इतने छुईमुई कब से हो गये कि बुरा मान गये.</strong><br /><br />बात आई गई तो हो गई मगर हमने इस कुप्रभाव को तुरंत झटक कर अपने से अलग किया. तुरंत समझ गये कि इस तरह की बातें ठीक नहीं. <strong>इसमे ध्यान देने योग्य है कि हम समझ गये वरना कौन समझ पा रहा है. :)</strong><br /><br />इधर कुछ दिनों से मेरी आदत और भी कुछ ज्यादा ही प्रभावित हुई है. <br /><br />कल पत्नी मोहित हुई और कहने लगी कि <strong>क्या तुम भी मुझे उतना ही चाहते हो, जितना की मैं?</strong><br /><br />अब बताओ, क्या जबाब है इसका और वो भी इस उम्र में? बहु, बच्चों के घर में ऐसी बातें, क्या शोभा देती हैं?<br /><br />ब्लॉग प्रभावित हम कह उठे: <strong>’बूझो तो जानें?" </strong><br /><br />आजकल जिस ब्लॉग पर देखो, यही तो है. यहाँ तक की <strong><a href="http://bloggarpehchan.blogspot.com/2009/04/blog-post_05.html">रचना जी</a> भी इसी काँटे में अटक गई हैं,</strong> इससे तो उनका खौफ लोगों पर से जाता रहेगा, मगर उन्हें समझाये कौन? :) (स्माईली प्रोटेक्शन के लिए, हालांकि उनसे ठिठोली करना मेरा हक है और मुझे स्माईली की जरुरत नहीं, कम से कम रचना जी के सामने)<br /><br />अब पत्नी का पारा तो सातवें आसमान पर कि इसमें वो क्या बूझे. किसी तरह मनाया और उसने बुझे मन से पूछा, ’खाने में क्या खाओगे आज?’<br /><br />हम तो प्रभावित वातावरण के जीव, पूछ बैठे कि ;"<strong>क्या खिलाओगी, कुछ क्लू तो दो, <a href="http://rampyariko.blogspot.com/">रामप्यारी</a> </strong>"<br /><br />अब ये <a href="http://rampyariko.blogspot.com/ ">रामप्यारी</a> कौन है, इस पर बखेड़ा मचा है और हम <a href="http://rampuriapc.blogspot.com/">ताऊ रामपुरिया</a> का फोन ट्राई कर रहे हैं जो कह रहा है कि <strong>’आप कतार में हैं, कृप्या प्रतिक्षा करें</strong>.”<br /><br />न जाने और कौन कौन क्या लफ़ड़ा कर बैठा है और<strong> ताऊ</strong> से बात कर रहा है.<br /><br />अब आजकल की आदत के अनुसार:<br /><br /><strong>मै कौन: बूझो तो जरा!! </strong>(क्लू नीचे देखो)<br /><br /><td><a href="http://picasaweb.google.co.in/lh/photo/9voEgz9EDgkTpro9AtM5Ww?feat=embedwebsite"><img src="http://lh5.ggpht.com/_N7sdMZXEIvI/SdhIa5K1B-I/AAAAAAAABa0/P380onsjxrU/ss3.jpg" /></a></td></tr><tr><td style="font-family:arial,sans-serif; font-size:11px; text-align:right"><a href="http://picasaweb.google.co.in/sameer.lal/BloogerMeet?feat=embedwebsite">कौन सा वाला?</a></td><br /><br /><br /><a href="http://rampyariko.blogspot.com/">रामप्यारी</a> का क्लू:<br /><br /><td><a href="http://picasaweb.google.co.in/lh/photo/ck-XwZaGRJhWHeTc0KsQ3g?feat=embedwebsite"><img src="http://lh5.ggpht.com/_N7sdMZXEIvI/SdhIbJkYGuI/AAAAAAAABa8/VVPe5rzqtLk/s400/P1020597.JPG" /></a></td></tr><tr><td style="font-family:arial,sans-serif; font-size:11px; text-align:right"> <a href="http://picasaweb.google.co.in/sameer.lal/BloogerMeet?feat=embedwebsite">जय हो!!</a></td><div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/23257105-8848987759179255233?l=udantashtari.blogspot.com'/></div>Udan Tashtarihttp://www.blogger.com/profile/06057252073193171933sameer.lal@gmail.com65tag:blogger.com,1999:blog-23257105.post-25890020169809069302009-04-03T06:26:00.002+05:302009-04-03T06:33:44.454+05:30जैसे दूर देश के टावर में-गुलालहमारे खास हितचिन्तकों का (विशेष तौर पर <strong>संजय बैंगाणी जी</strong>) कहना है कि मुझे फिल्म देखने देने पर बैन लग जाना चाहिये क्यूँकि मुझे कोई फिल्म पसंद ही नहीं आती. वैसे <strong>मैने खुद पर बैन लगा रखा है</strong> मगर पत्नी की जिद पर कोई बैन लगवा दे, तो <strong>आजीवन आभारी रहूँगा</strong>. वैसे आभारी तो मल्टी पलेक्स का हूँ ही जो रिकलाईनर के माध्यम से इतना बढ़िया सोने का इन्तजाम कर दिये हैं पिक्चर हॉल में.<br /><br />उस दिन कलकत्ता में था. रात पत्नी और साली की जिद हुई कि मूवी देखने चलें तो टाल न पाया. अब देखो क्या हाल हुआ: IMOX का थियेटर और पेट भर भोजन के बाद गद्दीदार लेटने योग्य सीट के साथ फिल्म देखने की शुरुवात.<br /><br />अच्छा, ऐसा मानो कि<strong> ब्लॉगर्स को लेकर फिल्म बनायें</strong>. चलो, <strong>फुरसतिया जी</strong> हीरो..थोड़ी देर काम करवाया-पसंद नहीं आये, हटाओ और अब <strong>डॉ अनुराग </strong>हीरो, अरे, वो भी नहीं जमे. चलो जाने दो, अब <strong>समीर लाल</strong> हीरो..वो भी फिस्स..फिर कोई और. फिर कोई और..हीरोईन जो भी बन जाओ. कोई नहीं जमा. सब एक दूसरे को गोली मार दो. सब मर जाओ. अब, हरी शंकर शर्मा हीरो और रुकमणी देवी हीरोईन. बाकी <strong>सब मर गये</strong>, क्या पूछ रहे हो यार?? कि ये <strong>हरी शंकर शर्मा हीरो और रुकमणी देवी हीरोईन</strong>-ये कौन लोग हैं. <strong>इनको तो कभी ब्लॉग पर देखा नहीं.</strong> सही है, हमारी तरह ही गुलाल देख कर भी आखिर में हीरो हीरोईन के बारे में यही कहोगे-उनको भी कभी देखा नहीं. आखिर में सबके मरने पर एकाएक भये प्रकट कृपाला टाईप आ गये. शायद कुछ लोग जानते हों तो वो तो हरी और रुक्मणी को भी जानते होंगे तो उससे क्या लेना देना.<br /><br /><p><br /><img border="0" src="http://1.bp.blogspot.com/_kpNgJThFDLA/ScN8HN47KlI/AAAAAAAAAWs/0ECLMK5ZGnk/s320/18ayesha1.jpg" width="150" height="175"></p><br /><br /><br />यूँ <strong>भड़ास ब्लॉग </strong>से गुरेज कि गाली गलौज सब लिखी होती है. जो भी बात गले में अटक गई हो, उसे उगल दी जाती है और इस फिल्म पर वाह वाह!! सिर्फ इसलिये कि फिल्म है और अनुराग कश्यप की है. नाम की महिमा भी अपरंपार है. <strong>भड़ास की गालियों और भाषा की तो फिर भी वजह है </strong>कि भड़ासी लय में गाली बक कर हल्का हो लेता है और शायद उद्देश्य भी यही है मगर यहाँ तो बगैर वजह, निरुदेश्य और बिना सुर ताल के सब चालू रहे और लोग बैठे देखते रहे.<br /><br /><strong>ऐसे देश में</strong> ,जहाँ हर नेता अपने कुकर्मों की कालिख अपने मूँह पर पोते घूम रहा हो और हम उसे फिर भी अलग से पहचान कर अनजान बने हुए हैं, सिर्फ इसलिए कि हमने इसे अपनी किस्मत मान हालातों से समझौता कर लिया है. <strong>ऐसे देश में </strong>जहाँ की एक बहुसंख्यक आबादी अपने आपका असतित्व बचाये रखने के लिए मुखौटा लगाये घूम रही हो. वहाँ चेहरे पर गुलाल पोत कर, भले ही सांकेतिक, एक रंग होना न जाने किस आशय और मकसद की पूर्ति कर रहा है, यह समझ पाना मुश्किल सा रहा. फिल्में देश और काल के मद्दे नज़र न बनें तो जादू देखना ज्यादा श्रेयकर होगा. संपूर्ण तिल्समि दुनिया. क्या आधा अधूरा देखना.<br /><br /><strong>ऐसे देश में,</strong> जो खुद ही अभी विखंडित होने की मांग से आये दिन जूझता हो, कभी खालिस्तान, तो कभी गोरखालैण्ड तो कभी आजाद कश्मीर, इस तरह का एक और बीज बोना, आजाद राजपूताना, जिसकी अब तक सुगबुगाहट भी न हो, क्या संदेश देता है? <strong>क्या वजह आन पड़ी यह उकसाने की</strong>-समझ से परे ही रहा.<br /><br />अक्सर फिल्म की कहानी को भटकते देखा है मगर इस फिल्म में तो कहानी भटकी, डायरेक्शन भटका, हीरो हीरोईन भटके और यहाँ तक कि दर्शक भी भटक गये. <strong>ऐसे भटके कि घर आने का रास्ता खोजना पड़ा</strong>. <br /><br />गीतों के नाम पर कविताओं की पैरोडी और उन पर झमाझम नाचती, बल खाती बाला.पियूष मिश्रा के गीत पर-<strong>जैसे दूर देश के टावर में घुस गयो रे ऐरोप्लेन</strong>...नाचते देख तब्बू की हमशक्ल को लगा कि यही हीरोईन है मगर वो नहीं थी. दूसरी ही निकली जिसकी कतई उम्मीद न थी. <strong>अरे, वही, उपर फोटो वाली गुलाल पोते.</strong><div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/23257105-2589002016980906930?l=udantashtari.blogspot.com'/></div>Udan Tashtarihttp://www.blogger.com/profile/06057252073193171933sameer.lal@gmail.com71