tag:blogger.com,1999:blog-22269675209014137492009-07-15T12:09:31.650+05:30अनुनादकविता और कविता के अनुवाद और विचार का ब्लाग ...शिरीष कुमार मौर्यhttp://www.blogger.com/profile/05256525732884716039noreply@blogger.comBlogger277125tag:blogger.com,1999:blog-2226967520901413749.post-34742437097042947712009-07-14T23:18:00.004+05:302009-07-14T23:28:05.576+05:30जहां की ३२% आबादी आदिवासी है...........<div align="justify"><span class=""></span> </div><div align="center"><a href="http://anunaad.blogspot.com/2009/07/blog-post_09.html">यहाँ लगाई गई पोस्ट को कृपया मेरी इस पोस्ट के क्रम में पढ़ें ! </a></div><div align="justify"><span class=""></span> </div><div align="justify">११-१२ जुलाई को नई दिल्ली मे सम्पन्न हुई जन संस्कृति मंच की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में जनांदोलनों और मानवाधिकारों पर क्रूर दमन ढानेवाली छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा १० व ११ जुलाई को प्रायोजित 'प्रमोद वर्मा स्मृति सम्मान" कार्यक्रम में बहुतेरे वाम, प्रगतिशील और जनवादी लेखकों, संस्कृतिकर्मियों की शिरकत को शर्मनाक बताते हुए खेद व्यक्त किया गया। स्व. प्रमोद वर्मा की स्मृति को जीवित रखने के लिए किए जाने वाले किसी भी आयोजन या पुरस्कार से शायद ही किसी कि ऎतराज़ हो, लेकिन जिस तरह छ्त्तीसगढ के पुलिस महानिदेशक के नेतृत्व में इस कार्यक्रम को प्रायोजित किया गया, जिस तरह छत्तीसगढ़ की भाजपा सरकार के मुख्यमंत्री रमन सिंह ने इसला उदघाटन किया, शिक्षा और संस्कृतिमंत्री बृजमॊहन अग्रवाल भी अतिथि रहे और राज्यपाल के हाथों पुरस्कार बंटवाया गया, वह साफ़ बतलाता है कि यह कार्यक्रम एक साज़िशाना तरीके से एक खास समय में वाम, प्रगतिशील और लोकतांत्रिक संस्कृतिकर्मियों के अपने पक्ष में इस्तेमाल के लिए आयोजित था। यह संभव है कि इस कार्यक्रम में शरीक कई लोग ऎसे भी हों जिन्हें इस कार्यक्रम के स्वरूप के बारे में ठीक जानकारी न रही हो। लेकिन जिस राज्य में तमाम लोकतांत्रिक आंदोलन, मानवाधिकार संगठन, बिनायक सेन जैसे मानवाधिकारवादी चिकित्सक, अजय टी.जी. जैसे फ़िल्मकार, हिमांशु जैसे गांधीवादी को माओवादी बताकर राज्य दमन का शिकार बनाया जाता हो, जहां 'सलवा जुडुम' जैसी सरकार प्रायोजित हथियारबंद सेनाएं आदिवासियों की हत्या, लूट, बलात्कार के लिए कुख्यात हों और ३ लाख से ज़्यादा आदिवासियों को उनके घर-गांव से खदेड़ चुकी हों, जहां 'छ्त्तीसगढ़ पब्लिक सिक्योरिट ऎक्ट' जैसे काले कानून मीडिया से लेकर तमाम लोकतांत्रिक आंदोलनों का गला घोंटने के काम आते हों, वहां के पुलिस महानिदेशक विश्वरंजन (जिनके नेतृत्व में यह दमन अभियान चल रहा हो), के द्वारा प्रायोजित कार्यक्रम के स्वरूप की कल्पना मुश्किल नहीं थी। वहां जाकर मुख्यमंत्री रमन सिंह के मुख से विचारधारा से मुक्त रहने का उपदेश और लोकतंत्र की व्याख्या सुनने की ज़िल्लत बर्दाश्त करने से बचा जा सकता था। बहरहाल, यह घटना वामपंथी, प्रगतिशील, जनवादी सांस्कृतिक आंदोलन के लिए चिंताजनक और शर्मसार होने वाली घटना ज़रूर है। हम यह उम्मीद ज़रूर करते हैं कि जो साथी वहां नाजानकारी या नादानी में शरीक हुए, वे सत्ता द्वारा धोखे से अपना उपयोग किए जाने की सार्वजनिक निंदा करेंगे और जो जानबूझकर शरीक हुए थे, वे आत्मालोचन कर खुद को पतित होने से भविष्य में बचाने की कोशिश करेंगे और किसी भी जनविरोधी, फ़ासिस्ट सत्ता को वैधता प्रदान करने का औजार नहीं बनेंगे। </div><div align="justify"><br />हम सब जानते हैं कि भारत की ८०% खनिज संपदा और ७०% जंगल आदिवासी इलाकों में हैं। छत्तीसगढ एक ऎसा राज्य है जहां की ३२% आबादी आदिवासी है। लोहा, स्टील,अल्युमिनियम और अन्य धातुऒं, कोयला, हीरा और दूसरे खनिजों के अंधाधुंध दोहन के लिए; टेक्नालाजी पार्क, बड़ी बड़ी सम्पन्न टाउनशिप और गोल्फ़ कोर्स बनाने के लिए तमाम देशी विदेशी कारपोरेट घरानों ने छ्त्तीसगढ़ के आदिवासी इलाकों पर जैसे हमला ही बोल दिया है। उनकी ज़मीनों और जंगलों की कारपोरेट लूट और पर्यावरण के विनाश पर आधारित इस तथाकथित विकास का फ़ायदा सम्पन्न तबकों को है जबकि उजाड़े जाते आदिवासी और गरीब इस विकास की कीमत अदा कर रहे हैं। वर्ष २००० में स्थापित छ्त्तीसगढ राज्य की सरकारों ने इस प्रदेश के संसाधनों के दोहन के लिए देशी और बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के साथ पचासों समझौतों पर दस्तखत किए हैं। १०००० हेक्टेयर से भी ज़्यादा ज़मीन अधिग्रहण की प्रक्रिया में है। आदिवासी अपनी ज़मीन, आजीविका और जंगल बचाने का संघर्ष चलाते रहे हैं। लेकिन वर्षों से उनके तमाम लोकतांत्रिक आंदोलनों का गला घोटा जाता रहा है। कारपोरेट घरानों के मुनाफ़े की हिफ़ाज़त में केंद्र की राजग और संप्रग सरकारों ने, छ्त्तीसगढ़ में गृहयुद्ध जैसी स्थिति पैदा कर दी है। कांग्रेस और भाजपा ने मिलकर सलवा जुडुम का फ़ासिस्ट प्रयोग चला रखा है। आज देशभर में हर व्यवस्था विरोधी आंदोलन या उस पर असुविधाजनक सवाल उठाने वाले व्यक्तियों को माओवादी करार देकर दमन करना सत्ताधारियों का शगल बन चुका है। दमनकारी कानूनों और देश भर के अधिकाधिक इलाकों को सुरक्षाबलों और अत्याधुनिक हथियारों के बल पर शासित रखने की बढ़ती प्रवृत्ति से माओवादियों पर कितना असर पड़ता है, कहना मुश्किल है, लेकिन इस बहाने तमाम मेहनतकश तबकों, अकलियतों, किसानों, आदिवासियों, मज़दूरॊं और संस्कृतिकर्मियों के आंदोलनों को कुचलने में सत्ता को सहूलियत ज़रूर हो जाती है। </div><div align="right"><br />प्रणय कृष्ण</div><div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2226967520901413749-3474243709704294771?l=anunaad.blogspot.com'/></div>पंकज चतुर्वेदीhttp://www.blogger.com/profile/09534245855325673367noreply@blogger.com0tag:blogger.com,1999:blog-2226967520901413749.post-88933620285956133562009-07-14T20:52:00.000+05:302009-07-14T20:52:00.610+05:30कपिल देव की एक कविता<a href="http://2.bp.blogspot.com/_Dbu2Jbf2gB4/Sldgk_vtL7I/AAAAAAAAAvQ/PWgV5JPzIyA/s1600-h/kapildev.JPG"><img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5356856470483578802" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; WIDTH: 240px; CURSOR: hand; HEIGHT: 180px; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_Dbu2Jbf2gB4/Sldgk_vtL7I/AAAAAAAAAvQ/PWgV5JPzIyA/s400/kapildev.JPG" border="0" /></a><br /><div align="justify">कपिल देव हिन्दी के सुपरिचित आलोचक-समीक्षक हैं। उन्होंने हमें ये कविता भेजी है, जिसके बारे में उनका कहना है कि ये <span class="">कहीं भी छपने वाली उनकी पहली कविता है. अनुनाद पर स्वागत है कपिल जी ! </span><br /></div><div align="justify"><strong><u><span class=""></span></u></strong> </div><div align="justify"><strong><u>यानी मैं<br /></u></strong></div><div><span class=""><span class=""></span>मुनाफाखोर रक्तपाती इतिहासों के </span></div><div><span class=""></span><span class="">सदियों पुराने</span><br />जर्जर पृष्ठों से छिटक कर<br />इक्कीसवीं सदी की बिलासी वैचारिकता की गर्दन पर<br />नख-दंत की तरह धंसा हुआ<br />मैं एक अनवरत इनकार हूं-<br />सृष्टि का आदि अव्यय !<br />जिसे<br />नष्ट करने के अभियानों का इतिहास ही दरअसल<br />सभ्यताओं का इतिहास है<br /><br />मैं एक औजार हूं<br />पिछली सदी से बंद पड़े<br />कारखानों के<br />कबाड़ में से झांकता हुआ<br />साबुत<br /><br />तोरण-द्वार की तरह सजने वाली कविता के खिलाफ<br />उबलता हुआ एक प्रतिवाद हूं मैं<br />जो<br />समझौतापरस्त<br />चालाक और दुनियादार हाथों का रूमाल बनने से<br />इनकार करता है।<br /><br />मैं अपने समय की सुचिक्कणता पर थूकता हूं<br />व्यक्तिवादी अस्मिताओं की चोंच में<br />दाना डाल रहे ‘थिंक-टैंकों’ की आंखो का कांइयापन<br />मेरे रक्तचाप को बढ़ा देता है<br />मैं अपने ही ‘पन’ के साथ जीना चाहता हूं।<br /><br />मुझे जन्म देने वाली सदी को लेकर बहस छेड़ दी गई है<br />अफवाह है कि मैं<br />मनुष्यता की कोख में अनादि काल से छिपा<br />एक अदृश्य विकार हूं<br /><br />मैं इतिहास का अपवाद हूं<br />जिसे<br />अवांछित घोषित करने के लिए<br />संविधान में संशोधन की घोषणा की जा चुकी है<br /><br />गुस्सा और असहमति और प्रश्नाकुलता और असंतोष का<br />उबलता हुआ ज्वार हूं मैं<br />एक अचरज!<br />एक कलछौंह-<br />शीत-ताप नियंत्रित इक्कीसवीं सदी के समृद्ध गालों पर<br /><br />मेरे बध का दिन मुकर्रर किया जा रहा है<br />प्रचारित कर दिया गया है कि<br />मेरी खदबदाहट<br />आधुनिकता की ड्रेनेज से गिरता हुआ बदबूदार झाग है<br /><br />बुद्धिजीवियों के बीच मैं एक तकलीफदेह एजेंडा हूं<br />एक असुविधा<br />.....संस्कृति के जननायकों की पीठ पर<br />मची खुजली<br /><br />मैं<br />बीसवीं सदी के अधबने सपनों को<br />बहुराष्ट्रीय राजमार्गों पर<br />फेंक कर भागती हुई<br />इक्कीसवीं सदी की<br />भविष्य-भीत पीढ़ी के अपराधी-इरादों का<br />चश्मदीद गवाह हूं<br /><br />साक्षी हूं मैं<br />इस सदी के रक्तिम सूर्योदय<br />और<br />उधारी सम्पन्नताओं के मंच पर आयोजित<br />वसन्तोत्सव का<br />जहां भविष्य का स्वामी<br />वृहस्पति<br />सुविधाओं की चैपड़ पर हमारी निष्ठाओं का<br />दांव लगा रहा है<br />और लाल सलाम की गद्दी पर बैठा हुआ<br />बिना चेहरे वाला कामरेड<br />इक्कीसवीं सदी के नराधमों की रहनुमाई में<br />हंसने और<br />खामोंश रहने का प्राणायाम सीख रहा है<br /><br />मैं एक ‘विटनेस बाक्स’ हूं,<br />गूंगा और अशक्त<br />जिसमें खड़ी हो कर<br />यह सदी<br />अपनी सफाई में<br />झूठ की प्रौद्योगिकी का हलफनामा दायर कर रही है<br /><br />मैं एक मुश्किल हूं- विचित्र<br />पता किया जा रहा है<br />मेरे बारे में<br />पूछा जा रहा है दिगन्तों से कि<br />मेरा गुस्सा,मेरी खदबदाहट और मेरा<br />सतत इनकार<br />‘ग्लात्सनोत्स’ के किस अध्याय के किस पृष्ठ पर रह गई<br />प्रूफ की अशुद्धि का खामियाजा है<br /><br />जेड श्रेणी की सुरक्षा से ‘फूलप्रूफ<br />बख्तरबंद टैंकों पर बैठा<br />इक्कीसवीं सदी का महा नायक<br />पूछ रहा है<br />अपने खुफिया एजेंटों से कि<br />इस चक्रवाती सांस्कृतिक<br />रमहल्ले मे कब,<br />कैसे<br />और<br />कहां से आ गया<br />मैं<br />यानी<br />दनदनाता हुआ<br />अवांछित<br />सुच्चा<br />इनकार!</div><div>***</div><div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2226967520901413749-8893362028595613356?l=anunaad.blogspot.com'/></div>शिरीष कुमार मौर्यhttp://www.blogger.com/profile/05256525732884716039noreply@blogger.com1tag:blogger.com,1999:blog-2226967520901413749.post-42919613734295469212009-07-12T08:00:00.016+05:302009-07-12T08:09:26.026+05:30बाग़ीचे के सिपाही - मार्टिन एस्पादा की एक कविता<a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/_74oHzskdI5E/SkwsQRAOkfI/AAAAAAAAA_4/2SvBx3b5ark/s1600-h/neruda.jpg"><img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5353702714990563826" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 192px; CURSOR: hand; HEIGHT: 200px" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_74oHzskdI5E/SkwsQRAOkfI/AAAAAAAAA_4/2SvBx3b5ark/s200/neruda.jpg" border="0" /></a> <div><span class="Apple-style-span" style="font-family:verdana;"><i><span class="Apple-style-span" style="font-family:Georgia;"><span class="Apple-style-span" style="FONT-STYLE: normal"><span class="Apple-style-span" style="font-size:medium;"><br /></span></span></span></i></span></div><div style="TEXT-ALIGN: justify"><span class="Apple-style-span" style="font-family:verdana;"><i><span class="Apple-style-span" style="font-size:small;">आज पाब्लो नेरुदा का जन्म-दिन है. मैं इसे कभी नहीं भूलता क्योंकि इसी दिन मेरी पत्नी का भी जन्म-दिन होता है. आज नेरुदा को याद करते हुए प्रस्तुत है </span></i><i><span class="Apple-style-span" style="font-size:small;">मार्टिन एस्पादा की </span></i><i><span class="Apple-style-span" style="font-size:small;">यह कविता.</span></i></span></div><span class="Apple-style-span" style="LINE-HEIGHT: 25px;font-family:arial;"><span class="Apple-style-span" style="font-family:Verdana;"><span class="Apple-style-span" style="LINE-HEIGHT: normal"><span class="Apple-style-span" style="font-size:medium;"><br /></span></span></span><span class="Apple-style-span" style="font-family:Verdana;"><span class="Apple-style-span" style="LINE-HEIGHT: normal"><span class="Apple-style-span" style="font-size:medium;"><br /></span></span></span><span class="Apple-style-span" style="FONT-WEIGHT: bold; LINE-HEIGHT: normalfont-family:verdana;"><span class="Apple-style-span" style="font-size:medium;"><br /></span></span></span><div><span class="Apple-style-span" style="font-family:verdana;"><b><span class="Apple-style-span" style="font-size:medium;"><br /></span></b></span></div><div><span class="Apple-style-span" style="font-family:verdana;"><b><br /></b></span></div><div><span class="Apple-style-span" style="font-family:verdana;"><b><br /></b></span> </div><div><span class="Apple-style-span" style="font-family:verdana;"><b><br /></b></span></div><div><span class="Apple-style-span" style="font-family:verdana;"><b><br /></b></span></div><div><span class="Apple-style-span" style="font-family:verdana;"><b><br /></b></span></div><div><span class="Apple-style-span" style="LINE-HEIGHT: 25px;font-family:arial;"><span class="Apple-style-span" style="FONT-WEIGHT: bold; LINE-HEIGHT: normalfont-family:verdana;"><span class="Apple-style-span" style="font-size:medium;">बाग़ीचे के सिपाही</span></span><span class="Apple-style-span" style="font-size:medium;"><br /></span><span class="Apple-style-span" style="LINE-HEIGHT: normal;font-family:Verdana;"><span style="font-size:85%;">इएला नेग्रा, <span class="Apple-style-span" style="LINE-HEIGHT: 21px;font-family:Arial;"><span class="Apple-style-span" style="font-size:small;">चीले</span></span>, सितम्बर 1973</span></span><span class="Apple-style-span" style="font-size:medium;"><br /></span><span class="Apple-style-span" style="font-family:verdana;"><span class="Apple-style-span" style="LINE-HEIGHT: normal"><span class="Apple-style-span" style="font-size:medium;"><br /></span></span></span><span class="Apple-style-span" style="LINE-HEIGHT: normal;font-family:verdana;"><span class="Apple-style-span" style="font-family:-webkit-monospace;"><span class="Apple-style-span" style="font-size: small;">तख़्ता</span></span><span class="Apple-style-span" style="font-size: small;">-पलट के बाद,</span></span><span class="Apple-style-span" style="font-size: small;"><br /></span><span class="Apple-style-span" style="LINE-HEIGHT: normal;font-family:verdana;"><span class="Apple-style-span" style="font-size: small;">नेरुदा के बागीचे में एक रात </span></span><span class="Apple-style-span" style="font-size: small;"><br /></span><span class="Apple-style-span" style="LINE-HEIGHT: normal;font-family:verdana;"><span class="Apple-style-span" style="font-size: small;">सिपाही नमूदार हुए, </span></span><span class="Apple-style-span" style="font-size: small;"><br /></span><span class="Apple-style-span" style="LINE-HEIGHT: normal;font-family:verdana;"><span class="Apple-style-span" style="font-size: small;">पेड़ों से पूछ-ताछ करने के लिए लालटेनें उठाते,</span></span><span class="Apple-style-span" style="font-size: small;"><br /></span><span class="Apple-style-span" style="LINE-HEIGHT: normal;font-family:verdana;"><span class="Apple-style-span" style="font-size: small;">ठोकरें खाकर पत्थरों को कोसते.</span></span><span class="Apple-style-span" style="font-size: small;"><br /></span><span class="Apple-style-span" style="LINE-HEIGHT: normal;font-family:verdana;"><span class="Apple-style-span" style="font-size: small;">बेडरूम की खिड़की से </span><span class="Apple-style-span" style="LINE-HEIGHT: 21px;font-family:Arial;"><span class="Apple-style-span" style="font-size: small;">देखे जाने</span></span><span class="Apple-style-span" style="font-size: small;"> पर वे</span></span><span class="Apple-style-span" style="font-size: small;"><br /></span><span class="Apple-style-span" style="font-family:verdana;"><span class="Apple-style-span" style="LINE-HEIGHT: normal"><span class="Apple-style-span" style="LINE-HEIGHT: 21px;font-family:Arial;"><span class="Apple-style-span" style="font-size: small;">किनारों पर लूट मचाने के लिए</span></span></span></span></span></div><div><span class="Apple-style-span" style="LINE-HEIGHT: 25px;font-family:arial;"><span class="Apple-style-span" style="LINE-HEIGHT: normal;font-family:verdana;"><span class="Apple-style-span" style="font-size: small;">समंदर से लौटे,</span></span><span class="Apple-style-span" style="font-size: small;"><br /></span><span class="Apple-style-span" style="LINE-HEIGHT: normal;font-family:verdana;"><span class="Apple-style-span" style="LINE-HEIGHT: 21px;font-family:Arial;"><span class="Apple-style-span" style="font-size: small;">डूब चुके</span></span><span class="Apple-style-span" style="font-size: small;"> जहाजों वाले </span><span class="Apple-style-span" style="LINE-HEIGHT: 21px;font-family:Arial;"><span class="Apple-style-span" style="font-size: small;">मध्य-युगीन</span><span class="Apple-style-span" style="LINE-HEIGHT: normal; WHITE-SPACE: normalfont-family:verdana;"><span class="Apple-style-span" style="font-size: small;"> </span><span class="Apple-style-span" style="LINE-HEIGHT: 21px;font-family:Arial;"><span class="Apple-style-span" style="font-size: small;">आक्रान्ताओं</span></span><span class="Apple-style-span" style="font-size: small;"> की तरह</span></span></span></span></span></div><div><span class="Apple-style-span" style="LINE-HEIGHT: 25px;font-family:arial;"><span class="Apple-style-span" style="LINE-HEIGHT: normal;font-family:verdana;"><span class="Apple-style-span" style="font-size: small;">लग सकते थे.</span></span><span class="Apple-style-span" style="font-size: small;"><br /></span><span class="Apple-style-span" style="font-family:verdana;"><span class="Apple-style-span" style="LINE-HEIGHT: normal"><span class="Apple-style-span" style="font-size: small;"><br /></span></span></span><span class="Apple-style-span" style="LINE-HEIGHT: normal;font-family:verdana;"><span class="Apple-style-span" style="font-size: small;">कवि मर रहा था; </span></span><span class="Apple-style-span" style="font-size: small;"><br /></span><span class="Apple-style-span" style="LINE-HEIGHT: normal;font-family:verdana;"><span class="Apple-style-span" style="font-size: small;">कैंसर उनके शरीर के अन्दर से कौंध गया था </span></span></span></div><div><span class="Apple-style-span" style="LINE-HEIGHT: 25px;font-family:arial;"><span class="Apple-style-span" style="LINE-HEIGHT: normal;font-family:verdana;"><span class="Apple-style-span" style="font-size: small;">और शोलों से लड़ने के लिए </span></span><span class="Apple-style-span" style="font-size: small;"><br /></span><span class="Apple-style-span" style="LINE-HEIGHT: normal;font-family:verdana;"><span class="Apple-style-span" style="font-size: small;">उन्हें छोड़ गया था बिस्तर पर.</span></span></span></div><div><span class="Apple-style-span" style="LINE-HEIGHT: 25px;font-family:arial;"><span class="Apple-style-span" style="LINE-HEIGHT: normal;font-family:verdana;"><span class="Apple-style-span" style="LINE-HEIGHT: 21px;font-family:Arial;"><span class="Apple-style-span" style="font-size: small;">इतने पर भी,</span></span><span class="Apple-style-span" style="font-size: small;"> जब लेफ्टिनेंट ने ऊपरी मंजिल पर धावा बोला,</span></span><span class="Apple-style-span" style="font-size: small;"><br /></span><span class="Apple-style-span" style="LINE-HEIGHT: normal;font-family:verdana;"><span class="Apple-style-span" style="font-size: small;">नेरुदा ने उसका सामना किया और कहा:</span></span><span class="Apple-style-span" style="font-size: small;"><br /></span><span class="Apple-style-span" style="LINE-HEIGHT: normal;font-family:verdana;"><i><span class="Apple-style-span" style="font-size: small;">यहाँ तुम्हें </span></i><span class="Apple-style-span" style="LINE-HEIGHT: 21px;font-family:Arial;"><i><span class="Apple-style-span" style="font-size: small;">सिर्फ</span></i><span class="Apple-style-span" style="LINE-HEIGHT: normal; WHITE-SPACE: normalfont-family:verdana;"><i><span class="Apple-style-span" style="font-size: small;"> एक ही चीज़ से </span></i><span class="Apple-style-span" style="font-family:-webkit-monospace;"><i><span class="Apple-style-span" style="font-size: small;">ख़तरा</span></i></span><i><span class="Apple-style-span" style="font-size: small;"> है: कविता से.</span></i></span></span></span></span></div><div><span class="Apple-style-span" style="LINE-HEIGHT: 25px;font-family:arial;"><span class="Apple-style-span" style="LINE-HEIGHT: normal;font-family:verdana;"><span class="Apple-style-span" style="font-size: small;">लेफ्टिनेंट ने अदब के साथ टोपी उतारकर</span></span><span class="Apple-style-span" style="font-size: small;"><br /></span><span class="Apple-style-span" style="LINE-HEIGHT: normal;font-family:verdana;"><span class="Apple-style-span" style="font-size: small;">श्रीमान नेरुदा से माफ़ी माँगी</span></span><span class="Apple-style-span" style="font-size: small;"><br /></span><span class="Apple-style-span" style="LINE-HEIGHT: normal;font-family:verdana;"><span class="Apple-style-span" style="font-size: small;">और </span><span class="Apple-style-span" style="font-family:-webkit-monospace;"><span class="Apple-style-span" style="font-size: small;">सीढ़ियाँ</span></span><span class="Apple-style-span" style="font-size: small;"> उतरने लगा.</span></span><span class="Apple-style-span" style="font-size: small;"><br /></span><span class="Apple-style-span" style="LINE-HEIGHT: normal;font-family:verdana;"><span class="Apple-style-span" style="font-size: small;">पेड़ों पर के लालटेन एक एक करके बुझते चले गए.</span></span><span class="Apple-style-span" style="font-size: small;"><br /></span><span class="Apple-style-span" style="font-family:verdana;"><span class="Apple-style-span" style="LINE-HEIGHT: normal"><span class="Apple-style-span" style="font-size: small;"><br /></span></span></span><span class="Apple-style-span" style="LINE-HEIGHT: normal;font-family:verdana;"><span class="Apple-style-span" style="font-size: small;">तीस सालों से </span></span><span class="Apple-style-span" style="font-size: small;"><br /></span><span class="Apple-style-span" style="LINE-HEIGHT: normal;font-family:verdana;"><span class="Apple-style-span" style="font-size: small;">हम तलाश रहे हैं </span></span><span class="Apple-style-span" style="font-size: small;"><br /></span><span class="Apple-style-span" style="LINE-HEIGHT: normal;font-family:verdana;"><span class="Apple-style-span" style="font-size: small;">कोई दूसरा मंतर </span></span><span class="Apple-style-span" style="font-size: small;"><br /></span><span class="Apple-style-span" style="LINE-HEIGHT: normal;font-family:verdana;"><span class="Apple-style-span" style="font-size: small;">जो बागीचे से </span></span><span class="Apple-style-span" style="font-size: small;"><br /></span><span class="Apple-style-span" style="LINE-HEIGHT: normal;font-family:verdana;"><span class="Apple-style-span" style="font-size: small;">सिपाहियों को ओझल कर दे.</span></span><span class="Apple-style-span" style="font-size: small;"><br /></span><span class="Apple-style-span" style="font-family:Verdana;"><span class="Apple-style-span" style="LINE-HEIGHT: normal"><span class="Apple-style-span" style="font-size:medium;"><br /></span></span></span></span></div><div><span class="Apple-style-span" style="LINE-HEIGHT: 25px;font-family:arial;font-size:14;"><span class="Apple-style-span" style="font-family:Verdana;"><span class="Apple-style-span" style="LINE-HEIGHT: normal"><span class="Apple-style-span" style="font-size:medium;"><span class="Apple-style-span" style="font-size: small;">*****</span><br /></span></span></span></span></div><div><span class="Apple-style-span" style="font-family:Verdana;"><br /></span></div><div><span class="Apple-style-span" style="LINE-HEIGHT: 25px;font-family:arial;font-size:14;"><span class="Apple-style-span" style="font-family:Verdana;font-size:180%;"><span class="Apple-style-span" style="LINE-HEIGHT: normal;font-size:18;"><div style="TEXT-ALIGN: justify"><span class="Apple-style-span" style="font-family:verdana, sans-serif;"><span class="Apple-style-span" style="font-size:small;"><a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://4.bp.blogspot.com/_74oHzskdI5E/Skwvs-_ikWI/AAAAAAAABAA/MehdyGMiOkI/s1600-h/espada_pic.jpg"><img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5353706506906931554" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 200px; CURSOR: hand; HEIGHT: 134px" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_74oHzskdI5E/Skwvs-_ikWI/AAAAAAAABAA/MehdyGMiOkI/s200/espada_pic.jpg" border="0" /></a><span class="Apple-style-span" style="font-size:small;"> <div style="TEXT-ALIGN: justify"><span class="Apple-style-span" style="font-size: small;">प्वेर्टो-रिकन मूल के अमेरिकी कवि </span><a href="http://www.martinespada.net/"><span class="Apple-style-span" style="font-size: small;">मार्टिन एस्पादा</span></a><span class="Apple-style-span" style="font-size: small;"> 'उत्तरी अमेरिका के पाब्लो नेरुदा' कहे जाते हैं. </span><span class="Apple-style-span" style="font-family:-webkit-monospace;"><span class="Apple-style-span" style="font-size: small;">स्पॅनिश</span><span class="Apple-style-span" style="WHITE-SPACE: normal;font-family:Verdana;"><span class="Apple-style-span" style="font-family:verdana, sans-serif;"><span class="Apple-style-span" style="font-size: small;"> में 'एस्पादा' का अर्थ होता है 'तलवार'. अपने नाम को सार्थक करते हुए एस्पादा एक 'फाइटर' हैं. उनका कवि नस्ली भेद-भाव के </span></span><span><span class="Apple-style-span" style="font-family:verdana, sans-serif;"><span class="Apple-style-span" style="font-size: small;">खिलाफ़</span></span></span><span class="Apple-style-span" style="font-family:verdana, sans-serif;"><span class="Apple-style-span" style="font-size: small;">, </span></span><span><span class="Apple-style-span" style="font-family:verdana, sans-serif;"><span class="Apple-style-span" style="font-size: small;">उत्पीड़न</span></span></span><span class="Apple-style-span" style="font-family:verdana, sans-serif;"><span class="Apple-style-span" style="font-size: small;"> के </span></span><span><span class="Apple-style-span" style="font-family:verdana, sans-serif;"><span class="Apple-style-span" style="font-size: small;">खिलाफ़</span></span></span><span class="Apple-style-span" style="font-family:verdana, sans-serif;"><span class="Apple-style-span" style="font-size: small;">, साम्राज्यवाद के </span></span><span><span class="Apple-style-span" style="font-family:verdana, sans-serif;"><span class="Apple-style-span" style="font-size: small;">खिलाफ़</span></span></span><span class="Apple-style-span" style="font-family:verdana, sans-serif;"><span class="Apple-style-span" style="font-size: small;"> लगातार संघर्षरत है; और अमेरिकी समाज में हाशिये पर पड़े समुदायों के लिए सामाजिक न्याय की लड़ाई में उसकी पक्षधरता एकदम साफ़ है.</span></span></span></span></div><div style="TEXT-ALIGN: justify"><span class="Apple-style-span" style="font-family:Arial;"><span class="Apple-style-span" style="LINE-HEIGHT: 21px"><span class="Apple-style-span" style="font-size: small;">यह कविता इएला नेग्रा,चीले में स्थित पाब्लो नेरुदा के घर को 1973 में दी गई भेंट के दौरान लिखी गई थी और 2006 में प्रकाशित </span><span class="Apple-style-span" style="LINE-HEIGHT: normal; WHITE-SPACE: normalfont-family:verdana;"><span class="Apple-style-span" style="font-size: small;">'रिपब्लिक ऑफ़ पोएट्री'</span><span class="Apple-style-span" style="LINE-HEIGHT: 21px;font-family:Arial;"><span class="Apple-style-span" style="font-size: small;"> में संकलित है.</span></span></span></span></span></div></span></span></span></div></span></span></span></div><div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2226967520901413749-4291961373429546921?l=anunaad.blogspot.com'/></div>भारत भूषण तिवारीhttp://www.blogger.com/profile/12706567132548135848noreply@blogger.com7tag:blogger.com,1999:blog-2226967520901413749.post-64123953718229860022009-07-09T18:46:00.005+05:302009-07-09T18:57:24.479+05:30अध्यक्ष, 'प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान, छत्तीसगढ़' के नाम एक खुला ख़त- पंकज चतुर्वेदी<div align="justify"><br /><br />सेवा में,<br />श्रीयुत विश्वरंजन<br />अध्यक्ष-------'प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान ',<br />छत्तीसगढ़.<br /><br />महोदय,<br />सादर अभिवादन !<br /></div><span class=""></span><div align="justify"><span class=""></span> </div><div align="justify">आशा है, आप अच्छी तरह हैं.<br /></div><span class=""></span><div align="justify">जैसा कि आपको मालूम ही है, आपके द्वारा रायपुर में 10-11 जुलाई, 2009 को आयोजित की जा रही दो--दिवसीय 'राष्ट्रीय आलोचना संगोष्ठी ' के एक सत्र 'आलोचना का प्रजातंत्र ' में अपना वक्तव्य प्रस्तुत करने के लिए आपने मुझे आमंत्रित किया था. इस सम्बन्ध में आपका पत्र ---दिनांक 15 मई , 2009 मुझे ई-मेल की मार्फ़त 18 जून, 2009 को भेजा गया और उसी दिन मिला था. उपर्युक्त संगोष्ठी में अपनी शिरकत की स्वीकृति मैंने आपको ई-मेल के ज़रिए दिनांक 19 जून, 2009 को भेज दी थी और उस पत्र में इस बात की ख़ुशी ज़ाहिर की थी कि आप सार्थक तथा उदात्त चिन्ताओं से प्रेरित होकर यह अहम संगोष्ठी करा रहे हैं और अपनी इस कृतज्ञता को भी व्यक्त किया था कि आपने मुझ जैसे अदना लेखक को इसमें आमंत्रित करने लायक़ समझा. यों रायपुर आने के लिए मैंने रेलवे रेज़र्वेशन्स करा लिए थे.<br /></div><span class=""></span><div align="justify">मगर कल , यानी 6 जुलाई, 2009 को सहसा मेरी नज़र हिन्दी पाक्षिक ' द पब्लिक एजेंडा' के 8 जुलाई, 2009 के पृ . सं. 13 पर छतीसगढ़ के पुलिस महानिदेशक के तौर पर प्रकाशित आपके साक्षात्कार पर गयी और इसे पढ़कर मैं इतना विचलित हुआ कि मुझे उपर्युक्त संगोष्ठी में हिस्सेदारी करने का अपना फ़ैसला रद्द करना पड़ा और रायपुर आने के अपने रेलवे रेज़र्वेशन्स भी. कृपया इस असहयोग के लिए मुझे क्षमा करेंगे और मेरी वैचारिक असहमति को हरगिज़ व्यक्तिगत स्तर पर नहीं ग्रहण करेंगे !<br /></div><span class=""></span><div align="justify">दरअसल आप अपने साक्षात्कार में 'सलवा जुडूम ' सरीखी सरकार द्वारा संरक्षित ,पोषित और संचालित -----साधनहीन, विपन्न और अत्यंत सामान्य मानवाधिकारों से भी महरूम आदिवासियों का दमन करनेवाली-----संस्था का बेझिझक और सम्पूर्ण समर्थन करते हैं, जो मेरे जैसे लोगों के लिए एक बहुत तकलीफ़देह मामला है. आपने कहा है-----"इस समय बस्तर में हम पूरे ज़ोर-शोर से माओवादियों से लड़ रहे हैं. " सवाल है कि ये 'माओवादी ' कौन हैं ? क्या ये वही आदिवासी नहीं हैं, जिन्हें माओवादी बताकर हाल ही में पश्चिम बंगाल पुलिस ने लालगढ़ में न सिर्फ़ उन पर अत्याचार किये<br />हैं ; बल्कि बकौल मशहूर लेखिका महाश्वेता देवी, " उनकी हत्याएँ भी की हैं. " बहरहाल. आपने अपने इस साक्षात्कार में यह आत्मविश्वास भी व्यक्त किया है कि "उनके खिलाफ़ पुलिस ही लड़ेगी और अंत में जीतेगी. " तो महोदय, पुलिस के आखिरकार जीत जाने में भला किसको संशय हो सकता है ? कुछ ही समय पहले दिवंगत हुए महान साहित्यकार विष्णु प्रभाकर ने कभी अपने एक इंटरव्यू में कहा था कि "हमारे देश का सबसे शक्तिशाली आदमी पुलिस कांस्टेबल होता है. " फिर जहाँ पूरे देश की पुलिस लालगढ़ से छत्तीसगढ़ तक आदिवासियों के बेरहम दमन में शामिल हो ; वहाँ उसके अकूत पराक्रम की तो केवल कल्पना की जा सकती है ! इस अद्भुत बल-विक्रम का एक सुबूत पेश करते हुए आपने कहा है -----"उत्तर छत्तीसगढ़ से नक्सलियों को खदेड़ दिया गया है ." गौरतलब है कि आपने यह नहीं बताया कि ऐसे लोगों को खदेड़कर पहुँचाया कहाँ गया है ! दूसरे शब्दों में, उनके पुनर्वास का क्या इंतिज़ाम सरकार ने किया है ? </div><div align="justify"><br />' सलवा जुडूम ' का साथ देते हुए आप कहते हैं कि "इसके खिलाफ़ जिस तरह का दुष्प्रचार किया जा रहा है , उसके लिए माओवादियों को दाद देनी चाहिए ." दिलचस्प है कि फिर आप यह भी जोड़ते हैं-----' सलवा जुडूम ' माओवादियों के खिलाफ़ जनता की बगावत है.' सवाल है कि अगर यह सच है, तो उनकी विचारधारा और उनको उसी "जनता" की सहानुभूति और समर्थन कैसे प्राप्त होता है ? हम हिंसा के रास्ते के हामी नहीं हैं , लेकिन जिनसे उनका सब-कुछ छीन लिया गया हो, कई बार हथियार उठाना उनके लिए अपने वुजूद की रक्षा का आख़िरी उपाय होता है. दूसरे, जिनकी जीवन-स्थितियों में बदलाव और बेहतरी के सारे राजनीतिक रास्ते इस व्यवस्था में सदियों से बंद रहे आते हों और जिनके खुलने की कोई उम्मीद उन्हें आज भी-----आज़ादी मिलने के साठ बरस बाद भी-----नज़र न आती हो, वे आखिर क्या करें , कहाँ जायें, कैसे जियें, इस निज़ाम के नियंताओं से अपने अधिकार और अपने लिए न्याय कैसे माँगें ? इस समूचे अंतर्विरोध, विडम्बना और त्रासदी की भौतिक परिणति आसन्न अतीत में लालगढ़ में दिखायी पड़ी ; जहाँ पूरी दुनिया ने देखा है-----सरकारें चाहे जो कहती रहें-----कि हथियार कथित माओवादियों ने नहीं, बल्कि निरीह आदिवासियों ने उठाये हुए थे, भले उस सबका अंत उनके निर्मम और अप्रत्याशित पुलिस दमन में ही हुआ है. यह सब तब हो रहा है और लगातार हो रहा है, जब दुनिया भर के सामाजिक और मानवाधिकार कार्यकर्ता, बुद्धिजीवी और प्रतिबद्ध राजनीतिग्य एक आवाज़ में यह माँग कर रहे हैं कि इन सभी समस्याओं को राजनीतिक समाधान की ज़रूरत है और यह कि इस सन्दर्भ में राजनीतिक प्रक्रिया को अपनाने का कोई भी मानवीय विकल्प न है, न हो सकता है. इसके विपरीत, आप कहते हैं कि पहले उन्हें "हथियार शासन को सौंपने होंगे, तभी कोई बातचीत संभव है. " सवाल है कि जब उनके पास ये हथियार नहीं थे , तब उनकी समस्याओं का कौन-सा राजनीतिक हल तलाशा गया और जहाँ-जहाँ इन हथियारों और हथियार उठानेवालों को-----आपके ही शब्दों में कहूँ , तो "खदेड़" दिया गया है-----वहाँ वर्तमान में तमाम प्रांतीय और केन्द्रीय सरकारों द्वारा समाधान के लिए कौन-सी राजनीतिक प्रक्रिया चलायी जा रही है ? आपके राज्य छत्तीसगढ़ में तो आलम यह है कि बक़ौल गाँधीवादी सामाजिक कार्यकर्ता हिमांशु कुमार, " सरकार और माओवादियों की लड़ाई में आदिवासी मारे जा रहे हैं और विस्थापित हो रहे हैं . हिंसा का रास्ता छोड़ बातचीत के ज़रिए ही कोई हल निकाला जाना चाहिए , जिसकी पहल न राज्य कर रहा है , न माओवादी. " 'द पब्लिक एजेंडा ' के कार्यालय संवाददाता ( दिल्ली ) अजय प्रकाश के अनुसार-----"हिमांशु कुमार की यही साफ़गोई उनके लिए घातक साबित हुई है और दंतेवाड़ा प्रशासन ने 17 मई , 2009 को उनका आश्रम ढहा दिया . दंतेवाड़ा से लौटकर सामाजिक कार्यकर्ता संदीप पांडेय बताते हैं ,'हिमांशु के बारे में पूरा क्षेत्र जानता है कि ' सलवा जुडूम ' अभियान से विस्थापित और उजड़े आदिवासियों के पुनर्वास जैसा महत्त्वपूर्ण काम कर रहे हैं. लेकिन सरकार हिमांशु को माओवादियों का शुभचिन्तक बताकर दंतेवाड़ा से खदेड़ने की फिराक में है। " </div><div align="justify"><br />लगता है कि " खदेड़ना " छत्तीसगढ़ पुलिस-प्रशासन का तकियाकलाम बन गया है , उसकी केन्द्रीय रणनीति . हिटलर के ' फ़ाइनल सॉल्यूशन ' की तरह . उसका कहना था कि 'जो लोग तुम्हें पसंद न हों , उन्हें ख़त्म कर दो .' यहाँ यह कहा जा रहा है कि जो लोग तुम्हारे आड़े आते हों , उन्हें " खदेड़ " दो ! हालत यह है कि अगर कोई गाँधीवादी भी आपसे असहमत है , तो आपके मुताबिक़ वह "माओवादी " है ! छत्तीसगढ़ में जो सरकार के बताये रास्ते पर बिना कुछ सोचे-समझे नहीं चल रहा है ; वह इन दिनों माओवादी या नक्सली के तौर पर ' ब्रांडेड ' किये जाने , पुलिस उत्पीड़न झेलने , वहाँ से बेदख़ल किये जाने या " खदेड़ " दिये जाने और सज़ा भुगतने को अभिशप्त है. इस ट्रेजेडी का सबसे ज्वलंत उदाहरण डॉ. बिनायक सेन हैं , जो एक डॉक्टर के नाते छत्तीसगढ़ की आम जनता , ख़ास तौर पर वहाँ के आदिवासियों की चिकित्सा-सेवा में संलग्न थे. लेकिन प्रशासन और पुलिस ने उन पर नक्सलियों और माओवादियों का साथ देने का इल्ज़ाम मढ़ते हुए उन्हें जेल पहुँचा दिया. क़रीब तीन साल बाद सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें यह कहते हुए रिहा किया कि उनके खिलाफ़ कोई सुबूत नहीं पाये गये . मगर यह फ़ैसला आने तक एक निर्दोष और जन-सेवी डॉक्टर 3 साल जेल की सज़ा काट चुका था. इससे पुलिस-प्रशासन की अपरिमित दमनकारी ताक़त की कल्पना ही की जा सकती है.<br /></div><span class=""></span><div align="justify">मुझे यह पता चला है कि आप कविता भी लिखते हैं . इसलिए मेरी यह जिज्ञासा है कि अपने इस क़िस्म के सरकारी काम और कवि -कर्म के बीच क्या आपको कोई यातनाप्रद द्वंद्व महसूस नहीं होता या कहीं ऐसा तो नहीं है कि कोई अंतर्विरोध या द्वंद्व हो ही नहीं ? </div><div align="justify"><br />श्री प्रमोद वर्मा , जिनके नाम पर यह आयोजन हो रहा है और पुरस्कार बाँटे जा रहे हैं -----------पहला सवाल तो यह है कि अगर वे कहीं हैं , तो उन्हें कैसा लग रहा होगा ? दूसरी बात यह कि उपर्युक्त सरकारी कृत्यों पर पर्दा डालने के लिए ही क्या यह आयोजन नहीं किया जा रहा है ? कैसी विडम्बना है कि आपने इस संगोष्ठी में " आलोचना का प्रजातंत्र " शीर्षक एक पूरा सत्र ही रखा हुआ है ; जबकि आपके निज़ाम में न आलोचना की कोई वास्तविक गुंजाइश है और न निरीह प्रजा की ही कोई सुनवाई ! यह भी कोई महज़ संयोग नहीं कि पुरस्कृत और उपकृत करने के लिए आपने आलोचकों को ही निशाना बनाया ; जिससे 'आलोचना ' का रहा-सहा साहस , संवेदनशीलता, मूल्य्निष्ठता , प्रश्नाकुलता और विवेक का भी अपहरण किया जा सके और उसे निष्प्रभ एवं निस्तेज बनाया जा सके ! इस सन्दर्भ में मुझे रघुवीर सहाय की एक मशहूर कविता याद आ रही है ; जिसमें उन्होंने लिखा है-----<br />" आतंक कहाँ जा छिपा भागकर जीवन से<br />जो कविता की पीड़ा में अब दिख नहीं रहा ?<br />हत्यारों के क्या लेखक साझीदार हुए<br />जो कविता हम सबको लाचार बनाती है ? "<br /></div><span class=""></span><div align="justify">जहाँ तक मुझे मालूम है , श्री प्रमोद वर्मा , मुक्तिबोध के काफ़ी निकट थे. इसलिए इसे एक काव्य-न्याय ही मानता हूँ कि मुक्तिबोध की इन काव्य-पंक्तियों की स्मृति ने मुझे उपर्युक्त कार्यक्रम में शामिल होने से आखिरकार रोक लिया-----<br /><br />" भीतर तनाव हो<br />विचारों का घाव हो<br />कि दिल में एक चोट हो<br />आये -दिन ठंडी इन रगों को<br />गर्मी की खोज है<br />वैसे यह ज़िन्दगी भोजन है , मौज है . "<br /></div><div align="right"><br />आदर और शुभकामनाओं के साथ <br /><span class=""></span></div><div align="right">आपका <br />पंकज चतुर्वेदी<br />कानपुर</div><div align="left">**** </div><div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2226967520901413749-6412395371822986002?l=anunaad.blogspot.com'/></div>पंकज चतुर्वेदीhttp://www.blogger.com/profile/09534245855325673367noreply@blogger.com15tag:blogger.com,1999:blog-2226967520901413749.post-23731749268734729412009-07-07T22:48:00.002+05:302009-07-08T21:05:26.557+05:30ईरानी कवि सीमा यारी की प्रेमकविता<a href="http://3.bp.blogspot.com/_Dbu2Jbf2gB4/SlS8JZcTmpI/AAAAAAAAAvI/LN6mfi7Kuvw/s1600-h/_sima_yari.jpg"><img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5356112726484818578" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 63px; CURSOR: hand; HEIGHT: 100px" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_Dbu2Jbf2gB4/SlS8JZcTmpI/AAAAAAAAAvI/LN6mfi7Kuvw/s400/_sima_yari.jpg" border="0" /></a><br /><div align="justify">अनुनाद पर चल रहे प्रेम कविताओं के सन्दर्भ में मैं एक साहसी और अनूठी ईरानी कवि सीमा यारी की एक कविता अनुनाद के पाठकों के साथ साझा करना चाहूंगा। मुझे ये कविता बहुत प्रिय है...या यूं कहूं कि पिछले कुछ सालों में मैंने इस कविता से बेहतर कोई प्रेम कविता नहीं पढ़ी...यदि आप इसे इसके भौगोलिक और सांस्कृतिक सन्दर्भों से जोड़कर देखेंगे तो आपकी आंखें चौंधिया जायेंगी।<br /><br />1959 में तेहरान में जन्मी सीमा यारी बेहद प्रतिभावान और प्रखर विद्यार्थी रहीं। गणित की पढ़ाई पूरी करके उन्होंने ईरान की नेशनल यूनीवर्सिटी में अर्थशास्त्र पढ़ने के लिए दाखिला लिया ही था कि शाहविरोधी और धार्मिक रूप से कट्टरवादी क्रांति शुरू हो गई। क्रांति के नाम पर जब यूनीवर्सिटी को बंद कर दिया गया उसके विरोध में आवाज़ उठाने वालों में सीमा अग्रिम पंक्ति में थीं...बस इसी के साथ उन पर शासन का शिंकजा कसता गया। ईरान की किसी भी यूनीवर्सिटी में उनका प्रवेश प्रतिबंधित कर दिया गया। उनकी कविताएं भी इस प्रतिबंध के घेरे मे आयीं और उनकी किताबें तैयार पड़ी रहीं पर उन्हें छापने को कोई प्रकाशक नहीं मिला। बरसों बाद जब ये बंदिश थोड़ी शिथिल पड़ी तो 1998 में उनका पहला संकलन आया जिसे 2000 में साल की सबसे अच्छी किताबों में शुमार किया गया। उनके चार संकलन छपे हैं। उन्होंने अपने कवितापाठ के आडियो कैसेट भी तैयार किए जिनके वितरण और प्रचार-प्रसार पर ईरान की कट्टरपंथी सरकार ने यह कह कर प्रतिबंध लगा दिया कि स्त्री स्वर को जनता के बीच सार्वजनिक रूप से जारी करने से ईरानी नैतिकता और परम्पराओं को आघात लगेगा।<br />इस पसमंज़र के बीच आप पढ़िए सीमा यारी की ये प्रेमकविता<br /><br /><strong><u>अंदाज़े-बयां<br /></u></strong><a href="http://2.bp.blogspot.com/_Dbu2Jbf2gB4/SlNDcn8Ws9I/AAAAAAAAAvA/I2MzZMfjihE/s1600-h/logosimanew.png"><img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5355698540911178706" style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; WIDTH: 144px; CURSOR: hand; HEIGHT: 144px" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_Dbu2Jbf2gB4/SlNDcn8Ws9I/AAAAAAAAAvA/I2MzZMfjihE/s400/logosimanew.png" border="0" /></a><br />यहां एकदम मुमकिन नहीं था कि मैं कह पाती ...<br />मैं करती हूं तुमसे प्यार !<br />हालांकि मैंने टूट कर किया तुमसे प्यार... </div><div align="justify"><br />मैंने ये ही कहा -<br />चौकस रहना, तुम्हारी चाबियां कहीं कमरे में अंदर ही न रह जाएं<br />सीढ़ियों पर संभलकर उतरना, वहां बहुत फिसलन है<br />अपना <span class="">ख़ूब-ख़ूब </span>ध्यान रखना<br /><span class=""></span></div><br /><div align="justify">और सुनो, लालबत्ती पर तब तक धीरज से ठहरे रहना<br />जब तक ये हरी न हो जाए....</div><div align="justify">*** </div><div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2226967520901413749-2373174926873472941?l=anunaad.blogspot.com'/></div>यादवेंद्रhttp://www.blogger.com/profile/15780027946903352259ypande2009@gmail.com8tag:blogger.com,1999:blog-2226967520901413749.post-75856374808760532692009-07-06T21:56:00.008+05:302009-07-07T18:06:05.190+05:30'बेर्टोल्ट ब्रेख्त की एक कविता-'निर्णय के बारे में': अनुवाद - नीलाभ अश्क<div align="justify"><br />( कलात्मक सृजन को किस तरह उत्कृष्ट, सार्थक और प्रासंगिक बनाया जा सकता है ; इस सन्दर्भ में यह एक बेमिसाल कविता है. इसके अलावा इसमें ब्रेख्त ने अपने वक़्त का जो मार्मिक और विचलित <span class="">कर </span>देनेवाला आख्यान किया है ; उसमें हम अपने समय की छायाएँ देख और महसूस कर सकते हैं. कुल मिलकर एक महान कवि की महान कविता, हिन्दी में जिसकी विलक्षण अनुरचना को मुमकिन <span class="">किया </span>है मशहूर कवि -विचारक नीलाभ अश्क ने। )</div><div align="justify"></div><div align="justify"></div><img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5355390265240095282" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; WIDTH: 280px; CURSOR: hand; HEIGHT: 320px; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_Bvx67-p9E1c/SlIrEnk4ijI/AAAAAAAAAA4/C4JUK-SSjWI/s320/Brecht.jpg" border="0" /> <div align="justify"></div><div align="center"><a href="http://images.broadwayworld.com/upload/39865/Brecht.jpg">तस्वीर यहाँ से साभार<br /></a></div><br /><div align="justify"><strong><u>निर्णय के बारे में</u></strong><br /><br />तुम जो कलाकार हो<br />और प्रशंसा या निन्दा के लिए<br />हाज़िर होते हो दर्शकों के निर्णय के लिए<br />भविष्य में हाज़िर करो वह दुनिया भी<br />दर्शकों के निर्णय के लिए<br />जिसे तुमने अपनी कृतियों में चित्रित किया है<br /><br />जो कुछ है वह तो तुम्हें दिखाना ही चाहिए<br />लेकिन यह दिखाते हुए तुम्हें यह भी संकेत देना चाहिए<br />कि क्या हो सकता था और नहीं है<br />इस तरह तुम मददगार साबित हो सकते हो<br />क्योंकि तुम्हारे चित्रण से<br />दर्शकों को सीखना चाहिए<br />कि जो कुछ चित्रित किया गया है<br />उससे वे कैसा रिश्ता क़ायम करें<br />यह शिक्षा मनोरंजक होनी चाहिए<br />शिक्षा कला की तरह दी जानी चाहिए<br />और तुम्हें कला की तरह सिखाना चाहिए<br />कि चीज़ों और लोगों के साथ<br />कैसे रिश्ता क़ायम किया जाय<br />कला भी मनोरंजक होनी चाहिए<br /><br />वाक़ई तुम अँधेरे युग में रह रहे हो<br />तुम देखते हो बुरी ताक़तें आदमी को<br />गेंद की तरह इधर से उधर फेंकती हैं<br />सिर्फ़ मूर्ख चिन्ता किये बिना जी सकते हैं<br />और जिन्हें ख़तरे का कोई अंदेशा नहीं है<br />उनका नष्ट होना पहले ही तय हो चुका है<br />प्रागैतिहास के धुंधलके में जो भूकम्प आये<br />उनकी क्या वक़अत है उन तकलीफ़ों के सामने<br />जो हम शहरों में भुगतते हैं ? क्या वक़अत है<br />बुरी फ़सलों की उस अभाव के सामने<br />जो नष्ट करता है हमें<br />विपुलता के बीच<br />***<br />विशेष : कवि -विचारक नीलाभ अश्क को हाल ही में अरुन्धति रॉय के उपन्यास ' the god of small things ' के हिन्दी अनुवाद 'मामूली चीज़ों का देवता ' के लिए साहित्य अकादेमी पुरस्कार से सम्मानित करने की घोषणा की गयी थी. मगर उन्होंने साहित्य-संस्कृति के प्रति भेदभाव और उपेक्षा से भरे हुए <span class="">सरकारी </span>रवैये और हिन्दी संसार में अंतर्व्याप्त 'पुरस्कारों की विद्वेषपूर्ण राजनीति ' के प्रति अपने वाजिब रचनात्मक आक्रोश का इज़हार करते हुए इस सम्मान को अस्वीकार कर दिया है . सबसे बड़ी बात उन्होंने यह कही है कि "लेखक का वास्तविक सम्मान उसके पाठक हैं, न कि पुरस्कार." बदनसीबी से यहीं वह बात है, जिसे हिन्दी की आत्ममुग्ध दुनिया ने बिसरा रखा है. <span class="">इस </span>बाबत उनके विस्तृत साक्षात्कार के लिए देखिये---------'हिन्दुस्तान ', दैनिक, 5 जुलाई, रविवार, 2009, पृ. 12. हमारे समय में यह दुर्लभ आदर्श सामने रखने के लिए श्री नीलाभ अश्क को हमारी हार्दिक बधाई ! </div><p align="center"><strong><u>एक निवेदन</u></strong> </p><p align="justify">पंकज भाई की इस विचारोत्तेजक पोस्ट के सन्दर्भ में अनुनाद के पाठकों और सहलेखकों से निवेदन है कि <strong>पुरस्कारों की</strong> और <strong>उन्हें स्वीकारने</strong> अथवा <strong>ठुकरा दिए जाने</strong> की <strong>सार्थकता पर</strong> कृपया अपने विचार पूरी स्वतंत्रता से अपनी टिप्पणियों में व्यक्त करें। मुझे अनुनाद पर दिए मेल एड्रेस पर यूनिकोड में मेल भी कर सकते हैं। इस पोस्ट का एक विस्तार मैं आप लोगों की ओर से चाहता हूँ। </p><p align="right">सादर शिरीष </p><p align="justify">*** </p><div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2226967520901413749-7585637480876053269?l=anunaad.blogspot.com'/></div>पंकज चतुर्वेदीhttp://www.blogger.com/profile/09534245855325673367noreply@blogger.com5tag:blogger.com,1999:blog-2226967520901413749.post-59156988169505268502009-07-05T07:59:00.004+05:302009-07-05T23:47:59.156+05:30हिब्रू कवि येहूदा आमीखाई की लम्बी कविता - यरूशलम से समुद्र तक और वापसी<div align="justify"><br />मेरा किया हुआ यह अनुवाद अशोक पांडे और उससे दोस्ती के उन विरल दिनों के <span class="">लिए,</span> जब उसने मुझे येहूदा आमीखाई जैसे कवि से परिचित कराया और उसे अनुवाद करने के लिए उकसाया। ऐसे दिनों का संस्मरण हमेशा बाक़ी रहता है। आमीखाई की इन कविताओं के बीहड़ में भटकना मुझे आज भी बहुत अच्छा लगता है और हमेशा लगता रहेगा।</div><div align="justify"><span class=""></span></div><img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5354616082759300210" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; WIDTH: 270px; CURSOR: hand; HEIGHT: 400px; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_Dbu2Jbf2gB4/Sk9q9RF2NHI/AAAAAAAAAu4/7LyetuhnGe8/s400/amichaiwpipe.jpg" border="0" /><br /><div align="center"><strong>यरूशलम से समुद्र तक और वापसी<br /></div></strong><div align="left"><strong>1. बंद यरूशलम से</strong> </div><div align="left"><br />मैं गया<br />बंद यरूशलम से खुले समुद्र की तरफ़<br />मानो किसी वसीयत के खुलने की तरफ़<br />मैं गया पुरानी सड़क पर<br />रामल्ला से कुछ पहले<br />सड़क के किनारे अभी तक खड़े हैं<br />ऊंचे-ऊंचे अजीब-से विमानघर<br />विश्वयुद्ध में आधे तबाह<br />वहां वे विमानों के इंजनों की जांच किया करते थे<br />जिनका शोर चुप करा देता था सारी दुनिया को<br /><br />महज उड़ने भर को उड़ना कोई छुपा ख़ज़ाना हो गया था तब<br />मेरे पूरे जीवन के लिए!<br /><br /><strong>2. आत्मा</strong></div><div align="justify"><strong><span class=""></span></strong><br />मैं यात्रा करता हूं<br />यात्राएं दुनिया की आत्मा हैं<br />वे बची रहती हैं हमेशा<br /><br />यह बहुत आसान है -<br />बढ़ते हुए पेड़ों और घास से भरा ण्क पहाड़ी ढलान<br />और दूसरी तरफ़<br />एक सूखा पहाड़ी ढलान ग़र्म हवाओं से झुलसा हुआ<br />- मैं इनके बीच यात्रा करता हूं<br /><br />धूप और बरसात का आसान-सा तर्क<br />वरदान और अभिशाप<br />न्याय और अन्याय<br />- मैं इनके बीच यात्रा करता हूं<br /><br />आकाश की हवा और धरती की हवा<br />मेरे <span class="">खिलाफ़ </span>की और मेरे साथ की हवा<br />ग़र्म और ठंडा प्रेम<br />पक्षियों के प्रवास की तरह<br /><br />- करो,<br />यात्रा करो, मेरी कार !<br /><br /><strong>3. मृत्यु से बहुत दूर नहीं </strong></div><strong><div align="justify"><br /></strong></div><p>लाटरून में<br />पहाड़ पर की मृत्यु और इमारतों की ख़ामोशी से बहुत दूर नहीं -<br />एक औरत खड़ी होती है<br />सड़क के किनारे<br /><br />उसके ठीक बाद<br />एक नई चमचमाती कार<br />किसी सुरक्षित स्थान तक खींच लिए जाने की प्रतीक्षा में<br /><br />औरत बहुत सुंदर है<br />उसका चेहरा, उसका आत्मविश्वास और उन्माद<br />उसकी पोशाक एक प्रेम-पताका है<br /><br />एक बहुत कामुक औरत<br />जिसके भीतर खड़े रहते हैं उसके मृत पिता<br />एक ख़ामोश आत्मा की तरह<br /><br />मैं उन्हें जानता था जब वे जीवित थे<br />जब उनसे आगे निकला<br />मैंने उन्हें अपनी शुभकामनाएं दीं !<br /><br /><strong>4. एक पुराना बस-स्टॉप</strong> </p><p><span class=""></span></p><p>मैं गुज़रा एक पुराने बस-स्टॉप से<br />जहां मैं खड़ा होता था कई बरस पहले<br />किसी दूसरी जगह जाने के लिए<br />बस के इंतज़ार में<br /><br />वहां मैं खड़ा होता था<br />संभलता हुआ नुक़सान से पहले<br />और ठीक होता हुआ दर्द से पहले<br />मृत्यु से पहले ही पुनर्जीवित<br />और<br />प्रेम से भरा अलगाव से पहले<br /><br />यहां मैं खड़ा होता था<br />नारंगी के झुरमुटों में फूलों के खिलने की सुगंध<br />इस एक ही दिन<br />आने वाले तमाम दिनों के लिए मदहोश कर देती थी मुझे<br /><br />बस-स्टॉप अब भी वहां है<br />ईश्वर को अब भी पुकारा जाता है `जगह´<br />और मैं कभी -कभी उसे कहता हूं `समय´<br /><br /><strong>5. सूरजमुखी के खेत</strong></p><br /><div align="justify">सूरजमुखी के खेत<br />पकते और सूखते हुए भूरे और तरतीब वाले<br />अब सूरज को नहीं<br />मीठी छांव को तलाशते हैं<br />एक आंतरिक मृत्यु<br />एक दराज़ का भीतरी भाग<br />एक थैला गहरा जैसे आकाश<br />उनका आने वाला संसार<br />एक घर का अंधेरा<br />एक आदमी का अंतर्तम !<br /><br /><strong>6. मैं समुद्र-तट पर</strong> </div><br /><div align="justify">मैं समुद्र पर<br />कई-कई रंगों वाली पालदार नावें<br />तैरती हैं पानी पर<br />उनके ठीक बाद मैं -<br />एक छोटे डेक वाली भद्दी-बेढंगी<br />तेल ढोने वाली नाव !<br />मेरा शरीर भारी और सिर छोटा है<br />सोचता या न सोचता हुआ<br /><br />रेत पर मैंने देखा एक लड़की को<br />एक बड़े तौलिए के नीचे लोगों के बीच कपड़े बदलना सीखते हुए<br />क्या ही अद्भुत उसके शरीर का वह नाच<br />कैसी वह छुपी हुई सर्पीली तत्परता<br />कैसा वह संघर्ष पहनने और उतारने के बीच<br />जैकब और उसके फ़रिश्ते के बीच<br />प्रेमी और प्रेमिका के बीच<br /><br />किसी मूर्ति के अनावरण की तरह<br />उसके बदन से तौलिया गिर जाता है<br />लड़की जीत जाती है<br />वह हंसती है<br />वह इंतज़ार करती है<br />और शायद वे इंतज़ार करते हैं उसका<br />किसी आंसुओं भरी जगह पर<br /><span class=""></span></div><div align="justify">वह मुझसे ज़्यादा ख़ूबसूरत और जवान है<br />पर उससे अधिक भविष्य जानता हूं मैं !<br /><br /><strong>7. और मैं लौटता हूं</strong> </div><div align="justify"><br />और मैं यरूशलम लौटता हूं<br />मैं बैठता हूं अपनी सीट पर<br />लेकिन मेरी आत्मा खड़ी रहती है मेरे भीतर<br />जैसे कि किसी सामूहिक प्रार्थना-सभा में<br /><span class=""></span></div><div align="justify">करो, यात्रा करो, मेरी कार !<br /><br />एक छोटे पहाड़ पर सड़क के किनारे<br />जो टैंक खड़े रहते थे<br />वे अब नहीं हैं<br />अब वहां <span class="">कारोब*</span> के पेड़ हैं<br />सूरज ढलते वक़्त एक नर कारोब और एक मादा कारोब<br />उस दूसरे संसार में<br />जो और कुछ नहीं बस निरा प्यार है<br />हवा में उनकी पत्तियों की झंकार है<br />मानो पवित्र वाद्ययंत्रों की झंकार तोलती हुई अतुलता को<br /><br />और वह छाया<br />जो अभी नमूदार होगी और कहलाएगी रात<br />और हम<br />जो पुकारे जायेंगे हमारे पूरे नामों से<br />जिनसे पुकारा जाता है सिर्फ़ मृत्यु के समय<br />`दोबारा कभी नहीं´ वाली रात फिर आयेगी<br /><br />मैं लौटता हूं<br />यरूशलम में अपने घर की तरफ़<br /></div><span class=""></span><br /><div align="justify">और हमारे नाम !<br />- वे तो खो जायेंगे इन्हीं पहाड़ों में<br />खोजियों के मुख से निकली<br />पुकारों की तरह !<br />***<br />* इज़रायल में पाया जाने वाला एक पेड़. </div><div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2226967520901413749-5915698816950526850?l=anunaad.blogspot.com'/></div>शिरीष कुमार मौर्यhttp://www.blogger.com/profile/05256525732884716039noreply@blogger.com4tag:blogger.com,1999:blog-2226967520901413749.post-45927120080986096262009-07-04T07:00:00.010+05:302009-07-04T16:13:37.969+05:30थॉमस मैक्ग्रा की एक प्रेम कविता<a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://4.bp.blogspot.com/_74oHzskdI5E/SklHBxBVKaI/AAAAAAAAA_A/Wcz3A6Q4_uw/s1600-h/mcgrath.jpg"><img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5352887727770904994" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 142px; CURSOR: hand; HEIGHT: 182px" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_74oHzskdI5E/SklHBxBVKaI/AAAAAAAAA_A/Wcz3A6Q4_uw/s200/mcgrath.jpg" border="0" /></a><span class="Apple-style-span" style="font-family:Arial;"> <div style="MARGIN-TOP: 0px; MARGIN-BOTTOM: 0px; TEXT-ALIGN: justify"><span class="Apple-style-span" style="font-family:verdana;"><br /></span></div><div style="MARGIN-TOP: 0px; MARGIN-BOTTOM: 0px; TEXT-ALIGN: justify"><span style="font-size:0;"><span class="Apple-style-span" style="font-family:verdana, sans-serif;"><span class="Apple-style-span" style="font-size:small;">थॉमस मैक्ग्रा अमेरिकी साहित्य के सर्वाधिक उपेक्षित कवियों में हैं. साहित्यिक मठाधीशों ने रैडिकल वामपंथी विचारों वाले इस कवि को कभी वह अहमियत नहीं दी जिसके वे हकदार थे. छठे दशक में कार्यरत रही कम्युनिस्ट-विरोधी जांच समिति 'हाउस कमिटी ऑन अन-अमेरिकन एक्टीविटीज़' के समक्ष दिया गया उनका वक्तव्य बेमिसाल है. अवसर मिलने पर उस वक्तव्य को अनुनाद पर लगाने का मन है. इस बात के लिए उन्हें ब्लैक-लिस्ट कर दिया गया और लॉस एंजेलेस स्टेट यूनिवर्सिटी में प्राध्यापक की अपनी नौकरी भी गंवानी पड़ी. </span></span></span></div><div style="MARGIN-TOP: 0px; MARGIN-BOTTOM: 0px; TEXT-ALIGN: justify"><span style="font-size:0;"><span class="Apple-style-span" style="font-family:verdana, sans-serif;"><span class="Apple-style-span" style="font-size:small;">थॉमस मैक्ग्रा सर्वाधिक जाने जाते हैं अपनी लम्बी कविता 'लैटर टू अन इमॅजिनरी फ्रेंड' के लिए. इस आत्म-कथ्यात्मक काव्य में वे व्यक्तिगत अनुभवों को राजनैतिक सरोकारों से जोड़ते हैं. लगभग तीन दशकों के लम्बे रचनाकाल में लिखी गई इस कृति में बनते-बिगड़ते अमेरिकी इतिहास और उसके अन्दर आकार लेते कवि के निजत्व के दर्शन होते हैं. </span></span></span></div><div style="MARGIN-TOP: 0px; MARGIN-BOTTOM: 0px; TEXT-ALIGN: justify"><span style="font-size:0;"><span class="Apple-style-span" style="font-family:verdana, sans-serif;"><span class="Apple-style-span" style="font-size:small;">प्रेम कविताओं के सिलसिले में फिलहाल प्रस्तुत है थॉमस मैक्ग्रा की एक कविता।</span></span></span></div><div style="MARGIN-TOP: 0px; MARGIN-BOTTOM: 0px; TEXT-ALIGN: justify"><span style="font-family:Verdana;"></span> </div><div style="MARGIN-TOP: 0px; MARGIN-BOTTOM: 0px"><span class="Apple-style-span" style="font-family:verdana;"><br /></span></div><div style="MARGIN-TOP: 0px; MARGIN-BOTTOM: 0px"><span class="Apple-style-span" style="font-family:verdana;"><span class="Apple-style-span" style="font-family:Arial;"><h3><span class="Apple-style-span" style="font-family:verdana, sans-serif;"><span class="Apple-style-span" style="font-size:medium;">कविता</span></span></h3><h3><span class="Apple-style-span" style="font-family:verdana, sans-serif;"><span class="Apple-style-span" style="font-size:medium;"><span class=""></span></span></span> </h3><div></div><div><span class="Apple-style-span" style="font-family:verdana;"><span class="Apple-style-span" style="font-size:medium;"><span class="">कैसे आ सकता था मैं इतनी दूर<br />(और ऐसी अंधियारी राहों पर हरदम ? )<br />मैंने सफ़र किया होगा रौशनी से ज़रूर<br />जो दमकती थी उन सबके चेहरों में जिन्हें<br />मैंने प्यार किया</span></span></span><span class="Apple-style-span" style="font-family:verdana;"><br /></span></div><div><span class="Apple-style-span" style="font-family:verdana;">****<br /></span></div></span></span></div></span><div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2226967520901413749-4592712008098609626?l=anunaad.blogspot.com'/></div>भारत भूषण तिवारीhttp://www.blogger.com/profile/12706567132548135848noreply@blogger.com3tag:blogger.com,1999:blog-2226967520901413749.post-48207767970337737112009-07-02T00:07:00.002+05:302009-07-02T18:46:22.130+05:30ईरानी कवि अहमद शामलू<div align="center">(ईरान में दमनकारी धार्मिक कट्टरवादियों के खिलाफ़ आंदोलित जनसमूह) </div><a href="http://1.bp.blogspot.com/_Dbu2Jbf2gB4/SkjnLvqM8mI/AAAAAAAAAuo/U4ywqLd7b2M/s1600-h/iran_573958a.jpg"><img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5352782346087887458" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; WIDTH: 400px; CURSOR: hand; HEIGHT: 239px; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_Dbu2Jbf2gB4/SkjnLvqM8mI/AAAAAAAAAuo/U4ywqLd7b2M/s400/iran_573958a.jpg" border="0" /></a><br /><div align="justify"><br />ईरान में उभरे जनआक्रोश और इसका दमन करने के तानाशाही रवैये को ध्यान में रखते हुए यहां प्रसिद्ध ईरानी कवि अहमद शामलू (12 दिसंबर 1925-24 जून 2000) की लोकप्रिय कविता का अनुवाद प्रस्तुत है। शामलू को समकालीन ईरानी कविता का सबसे सशक्त स्वर माना जाता है और उनको ईरान के राष्ट्रकवि के तौर पर सम्मान भी दिया जाता है। लेकिन विडम्बना ये कि पहले शाह के शासन ने और बाद धार्मिक कट्टरवादियों की सरकार ने उन्हें देश से बाहर चले जाने पर मजबूर कर दिया। अमरीका, ब्रिटेन और स्वीडन रहते हुए भी अहमद लगभग आधी शताब्दी तक ईरानी कविता जगत पर छाये रहे। उनके क़रीब बीस संकलन प्रकाशित हैं। उन्हें विश्वसाहित्य के अत्यन्त समर्थ अनुवादक, बालसाहित्य के रचनाकार, पत्रकार, पटकथालेखक और प्रखर दमनविरोधी बुद्धिजीवी तौर पर याद किया जाता है। अठारह साल की उम्र में वे पहली बार जेल गए और फायरिंग दस्ते के सामने तक पहुँचा दिए जाने के बावजूद संयोगवश मुक्त कर दिए गए। बाईस साल की उम्र में पहली कविता संकलन प्रकाशित हुआ। ईरान की वामपंथी पार्टी तुदेह के सक्रिय कार्यकर्ता रहे लेकिन बाद में जैसा कि वामदलों में अकसर होता ही है उन्होंने कुछ मतभेदों के चलते पार्टी की राजनीतिक गतिविधियों से किनारा कर लिया। साहित्य के नोबेल प्राइज़ के लिए नामांकित हुए और ईरानी जनता के बीच अपने प्रभावशाली काव्यपाठ के बहुत सम्मान अर्जित किया।<br /><br />शाह की राजशाही में ईरान छोड़ने को मजबूर हुए अहमद 1978 में शाह के तख़्तापलट के बाद वापस ईरान आए लेकिन जल्द ही उन्हें नई सरकार के धार्मिक कट्टरवाद का सामना करना पड़ा - उनकी रचनाओं पर प्रतिबंध लगा दिया गया, जो अब भी जारी <span class="">है।*</span> उन्हें फिर देश छोड़ना पड़ा और अपनी देश की जनता के चहेते होने के बावजूद एक निर्वासित कवि के रूप में उन्होंने अपनी अंतिम सांसें लीं। ईरान के लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष आंदोलन में अहमद शामलू की कविताएं आज भी सबसे ज़्यादा प्रासंगिक हैं -वर्तमान जनाक्रोश के जो विवरण बाहर आ रहे हैं, उनसे भी यह बात प्रमाणित होती है।<br /><br /><span class=""><strong><u>इस बंद गली में</u></strong> <a href="http://2.bp.blogspot.com/_jb2k7tG4IGw/SkcRu-iBgCI/AAAAAAAAABY/JvNbN9cDbN8/s1600-h/Ahmad_Shamlou.jpg"><img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5352266180910481442" style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; WIDTH: 263px; CURSOR: hand; HEIGHT: 320px" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_jb2k7tG4IGw/SkcRu-iBgCI/AAAAAAAAABY/JvNbN9cDbN8/s320/Ahmad_Shamlou.jpg" border="0" /></a></span></div><br /><div align="justify"><span class=""></span></div><div align="justify">इस बंद गली में<br />सूंघ-सूंघ कर वे देखते हैं तुम्हारी सांसे -<br />कहना नहीं चाहिए था तुम्हें..... `` मैं करती हूं तुमसे प्यार´´<br />वे सूंघ-सूंघ कर देखते हैं दिल तक<br /><br />अजीबोग़रीब दौर है यह मेरी प्रिय ....<br />वे कोड़े बरसाते हैं<br />प्यार पर<br />सड़कों पर सरे-आम खड़ा करके<br />बेहतर होगा हम छुपा दें प्यार<br />कहीं घर के किसी अंधियारे कोने में ....<br /><br />इस कुटिल बंद गली के अंदर<br />अंजर पंजर ढीला कर देने ठंड में<br />लपटों को और खूंखार बनाने के लिए वे<br />झोंकते जाते हैं हमारे गीत और कविताएं.....<br />ऐसे में अपना जीवन सान पर चढ़ाकर<br />नष्ट न होने दो नाहक ही<br /><br />अजीबोग़रीब दौर है यह मेरी प्रिय ...<br />आधीरात में दरवाज़े पर दस्तक देकर<br />अंदर घुसने वाले<br />सबसे पहले तोड़ते हैं तुम्हारा दीपक ही<br />बेहतर होगा कि हम छुपा दें अपनी रोशनी<br />कहीं घर के किसी अंधियारे कोने में ...<br /><br />सभी चौराहों पर तैनात हैं क़ातिल<br />खून से सनी तलवारें और लाठी-डंडे लेकर -<br />अजीबोग़रीब दौर है यह मेरी प्रिय.. </div><br />उनके निशाने पर हैं सब ओर<br />होंटो की मुस्कुराहटें<br />और गीतों की गुनगुनाहटें<br />बेहतर होगा कि हम छुपा दें अपनी खुशियां...<br />कहीं घर के किसी अंधियारे कोने में ....<br /><br />रंग-बिरंगे फूलों की आग जलाकर<br />उसकी आंच में भून रहे हैं वे सुकुमार परिन्दों को<br /><br />अजीबोग़रीब दौर है यह मेरी प्रिय..<br />विजयोन्माद के नशे में धुत्त शैतान<br />पसरकर बैठ जाता है<br />हमारी अंत्येष्टि के भोज में<br />बेहतर होगा कि हम छुपा दें ईश्वर<br />कहीं घर के किसी अंधियारे कोने में ....<br /><div align="justify"></div><br /><div align="justify"><strong><span style="font-size:85%;">*यह कविता इसी प्रकरण से प्रेरित है !</span></strong></div><div align="justify"><span style="font-size:85%;"><a href="http://shamlu.com/">http://shamlu.com</a> </span><span style="font-size:100%;">से साभार - एम0 सी0 हिलमैन के अँग्रेज़ी अनुवाद से रूपांतरित। </span></div><div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2226967520901413749-4820776797033773711?l=anunaad.blogspot.com'/></div>यादवेंद्रhttp://www.blogger.com/profile/15780027946903352259ypande2009@gmail.com7tag:blogger.com,1999:blog-2226967520901413749.post-59239505729282382462009-06-30T14:45:00.009+05:302009-06-30T23:32:38.541+05:30इन्साफ़ की दुआ : शुभा<a href="http://1.bp.blogspot.com/_Dbu2Jbf2gB4/Sko6x8m1y1I/AAAAAAAAAuw/tj9NWtDSPa4/s1600-h/praying+hands.jpg"><img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5353155736840293202" style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; WIDTH: 350px; CURSOR: hand; HEIGHT: 247px" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_Dbu2Jbf2gB4/Sko6x8m1y1I/AAAAAAAAAuw/tj9NWtDSPa4/s400/praying+hands.jpg" border="0" /></a><br /><div align="justify"><strong>जिन्होंने <span class="">दुख </span>का स्वाद नहीं चखा<br /><span class="">उन पर दुख टूट पड़ें</span> </strong></div><strong><div align="justify"><br /><span class="">जो बिछुड़ने के दर्द को नहीं समझते</span><br /><span class="">उनके घर बह जाएँ</span> </div><div align="justify"><br /><span class="">जो मनुष्य की क़ीमत नहीं समझते</span><br /><span class=""><span class="">गुम </span>जाएँ उनके जवान बेटे</span> </div><div align="justify"><br /><span class="">जिन्होंने कभी ख़ुशी नहीं देखी</span><br /><span class="">उन तक पहुंचे कोई ख़ुशी</span><br />**********</strong></div><br /><span class=""></span><div align="justify"><span class=""></span></div><div align="justify"><span class=""></span></div><div align="justify">तीन दिन पहले अचानक यह कविता पढ़ने को मिली. इसने मुझे खासा बेचैन कर रखा है. आपकी राय </div><div align="justify">क्या है?</div><div></div><div align="center"><strong>संजय व्यास की राय </strong></div><div align="justify"><em>कविता भीतर होने वाले तमाम अनुवादों के उपकरणों को सक्रिय होने का मौका दिए बगैर सीधी उतरती है। एक बार में तो इस इन्साफ की दुआ के समर्थन में दुआ उठती है और तुंरत बाद में बौद्धिक विवेक इसके न्यायसंगत होने पर सवाल खड़े करता है. हर बार पढने पर,सच कहा आपने, बहुत बेचैन करती है.जिनको कोई ख़ुशी नहीं मिली वे दुखों की धरती उठाए है. शायद उनके दुखों में से गठरी भर दुःख कम करने की ज़रुरत भी है.</em></div><br /><div align="center"><strong>पंकज चतुर्वेदी की राय </strong></div><div align="justify"><em>यह एक महान, अद्भुत और अविस्मरनीय कविता है। किसी दुर्लभ और जादुई क्षण में मुमकिन हुई होगी। इसमें तमाम काव्य-परम्परा की स्मृतियाँ और अन्तर्ध्वनियाँ भी सुनाई पड़ती हैं। 'महाभारत'में लिखा है कि छः किस्म के शोक होते हैं, जिनमें 'पुत्र-शोक' को 'महा-शोक' या सबसे बड़ा शोक कहागया है। इसी तरह शायद अमीर खुसरो ने लिखा है------"</em></div><div align="justify"><em>जो मैं ऐसा जानती, पीत किये दुख होय! </em></div><div align="justify"><em>नगर ढिंढोरा पीटती , पीत न कीजो कोय!"</em></div><div align="justify"><em>तो कवयित्री शुभा जब असंवेदनशील और ममत्वहीन लोगों को शाप देती हैं, तो इन्हीं दुखों में उनके बर्बाद हो जाने का शाप उन्हें देती हैं। यह इस कविता की बहुत बड़ी ताक़त है। साथ ही, जिस सांस्कृतिक सन्दर्भ में यह कविता मौजूद है या जिसमें इसकी रचना हुई है, वह इसे और भी उदात बना देता है। मगर उस सन्दर्भ की पहचान के लिए भी आखिर शुभा ही सराहना कीअधिकारी हैं. धीरेश जी का बहुत-बहुत शुक्रिया ! </em></div><br /><div align="justify"><em></em></div><div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2226967520901413749-5923950572928238246?l=anunaad.blogspot.com'/></div>Ek ziddi dhunhttp://www.blogger.com/profile/05414056006358482570dhireshsaini@gmail.com16tag:blogger.com,1999:blog-2226967520901413749.post-87570125582994592992009-06-29T09:02:00.068+05:302009-06-29T10:38:24.816+05:30एवरिथिंग इज़ पॉलिटिकल<div style="text-align: justify;"><br /></div><div style="text-align: justify;">"नवेंबर थर्ड क्यों" (यह जॉर्ज डब्ल्यू. बुश के दुबारा राष्ट्रपति पद पर चुने जाने के बाद का दिन था) यह सवाल पूछे जाने के अलावा, <i>दि नवेंबर थर्ड क्लब</i> के सम्पादक के तौर पर जो संवाद ज़्यादातर मेरे साथ होता है वो यह कि लेखक मुझसे कहते हैं उनका कोई राजनैतिक लेखन नहीं है. इसके जवाब में मैं, उस ख़ास दिन मेरे अन्दर मौजूद धीरज के मुताबिक कम-ज़्यादा मात्रा में शालीनता के साथ, बकवास करने पर मजबूर हो जाता हूँ.</div><div style="text-align: justify;">अगर कोई लेखक खोल में नहीं रह रहा हो- और मुझे यकीन है कि कुछ खोल में रह रहे हैं- मेरे लिए यह मानना मुश्किल है कि किसी सुयोग्य लेखक ने ऐसा कुछ भी नहीं लिखा जिसे राजनैतिक माना जा सके. थोड़ा और कुरेदने पर मैं अधिकतर मैं पाता हूँ कि उनका तात्पर्य 'ओवर्टली पॉलिटिकल' से है, मगर वास्तव में वह राजनैतिक साहित्य की सतह की खरोंच मात्र है.</div><div style="text-align: justify;">दिक्कत यह है कि हम राजनीति से तरबतर होते जा रहे हैं. जब मैं अपनी बुढ़ाती हुई फोर्ड एस्कोर्ट में पेट्रोल भरवाने पम्प पर जाता हूँ तो कई सारे राजनैतिक कारक काम कर रहे होते हैं: पेट्रोल की उस दिन की कीमत को अमेरिकी विदेश नीति प्रभावित करती है, मैं जो कार चलाता हूँ उसे बनाने वाले श्रमिक ने अगर अब तक अपनी नौकरी गँवाई नहीं है तो शायद गँवा सकता है; एनवायरनमेंट-फ्रेंडली कार(जो मैं वास्तव में चाहता हूँ) तो दूर की बात रही, मैं एक नई कार तक अफोर्ड नहीं कर सकता. इसी तरह और कई बातें....</div><div style="text-align: justify;">नहीं, हर चीज़ किसी न किसी तरह राजनैतिक है. जब मैं काम से घर लौटकर अपनी पत्नी को गले लगाता हूँ, तो इसमें निहित तथ्य हैं अ) मेरे पास काम है जहाँ से मैं घर लौट सकूँ और आ) जिस व्यक्ति से मैं प्यार करता हूँ उसके साथ मुझे विवाहित बने रहने की मुहलत दी गई है. बहुत सारे लोगों के साथ ऐसा नहीं है, और मैं इस हक़ीक़त से वाक़िफ़ हूँ. मैं खुशनसीब हूँ, और इस बात के लिए शुक्रगुज़ार हूँ.</div><div style="text-align: justify;">एक लेखक के साथ अपनी बातचीत में मैंने इशारा किया कि बहुत सारी कविता पीड़ा, असमानता, असहिष्णुता के अवलोकन से युक्त है और यह सब चीज़ें राजनैतिक हैं मगर क्यों तो हम उन्हें कुछ अलग करके देखते हैं. यह एक देश की गहरी राजनीति है, हम सबके बीच का दर्द इतना सर्वव्यापी है कि हम बड़ी मुश्किल से उसे देख पाते हैं. चूंकि यह सब निर्वाचन-समूहों की सनकों से ज़्यादा नहीं दूर होता , इन्हें राजनैतिक न मान बैठना आसान है. मगर ये बातें राजनैतिक हैं, और आर्थिक बेलआउट जैसी रोज़मर्रा की प्याज़ काटने वाली हरकत से कहीं ज्यादा ताकतवर और बाध्यकारी हैं. ऐसा नहीं है कि वह सब भी महत्त्वपूर्ण नहीं. मगर मेरे कहने का मतलब आप समझते हैं.</div><div style="text-align: justify;">ख़ुद भाषा तक राजनैतिक होती है, अगर आप ऐसा नहीं मानते तो उन लोगों से बात कीजिये जो अंग्रेज़ी को अमेरिका की आधिकारिक भाषा बनाने के लिए संविधान में संशोधन करवाने के लिए लगातार जुगाड़ में लगे हैं. मगर एक छोटे से, अधिक भ्रामक पैमाने पर, ध्यान दें कि सरहद पार की लडाइयों को 'वॉर ऑन टेरर' कहने और 'ओवरसीज़ कंटिनजेन्सी ऑपरेशन' कहने में क्या अंतर है. पहला तो किसी प्रकार की नैतिक जल्दबाज़ी के चलते इराक और अफगानिस्तान में युद्ध झोंकने का बुश प्रशासन का प्रयास था और दूसरा उसे पसारने का ओबामा प्रशासन का प्रयास है. दोनों ही नीतियों के पक्ष और विपक्ष में दलीलें हैं, मगर इसके बावजूद जनाब, किसी चीज़ को कुछ कहने का काम भी राजनैतिक कृत्य है.</div><div style="text-align: justify;">इसलिए, ना. मैं नहीं मानता कि कोई लेखक अराजनैतिक होता है, भले ही कुछ लोग अपनी आख़िरी साँस तक मुझसे इस बारे में बहस करेंगे. ऐसा कई बार राजनीति की अवहेलना के कारण होता है - जैसे किसी ने मुझसे एक बार कहा था कि वे "असली" चीज़ों पर फोकस करना चाहते हैं. दूसरों में नाज़ुक से बाज़ार के बिगड़ जाने का डर होता है. आख़िरकार, किताबें खरीदने वाली जनता आसानी से बिदक जाती है.</div><div style="text-align: justify;">या शायद मैं कुछ ज़्यादा ही सिनिकल हूँ. शायद कुछ चीज़ें हैं इस दुनिया में जो राजनीति की गन्दगी से अछूती हैं. मगर मुझे इस बात पर संदेह है. आख़िरकार, ऊर्जा बनने के लिए ख़ुद हवा तक के दोहन की ज़रूरत होती है, तुरंत.</div>******<div><br /><a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://3.bp.blogspot.com/_74oHzskdI5E/SkhKIXfzXHI/AAAAAAAAA-4/3NpTyIPHspM/s1600-h/infante.jpg"><img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 135px; height: 180px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_74oHzskdI5E/SkhKIXfzXHI/AAAAAAAAA-4/3NpTyIPHspM/s200/infante.jpg" border="0" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5352609664736648306" /></a><div style="text-align: justify;">कवि विक्टर डी. इन्फान्ते पेशे से पत्रकार हैं. उनकी रचनाएँ अमेरिका के कई अखबारों, पत्रिकाओं और संकलनों में प्रकाशित हो चुकी हैं. कुछ काव्य-पुस्तिकाएँ भी छप चुकी हैं; पहला कविता-संग्रह 'सिटी ऑफ़ इनसोम्निया' हाल ही में आया है. इन्फान्ते अपने तीखे राजनैतिक तेवर के लिए विख्यात साहित्यिक वेब पत्रिका <span class="Apple-style-span" style="font-style: italic; "><a href="http://www.november3rdclub.com/">दि नवेंबर थर्ड क्लब</a> <span class="Apple-style-span" style="font-style: normal; "> के मुख्य सम्पादक हैं. ऊपर दिया गया आलेख इसी पत्रिका के वसंत ऋतु अंक के सम्पादकीय लेख का अनुवाद है.</span></span></div></div><div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2226967520901413749-8757012558299459299?l=anunaad.blogspot.com'/></div>भारत भूषण तिवारीhttp://www.blogger.com/profile/12706567132548135848noreply@blogger.com8tag:blogger.com,1999:blog-2226967520901413749.post-82625314473097164112009-06-27T15:45:00.006+05:302009-06-29T21:28:37.532+05:30बेर्टोल्ट ब्रेख्त की एक प्रेम कविता - कमज़ोरियाँ<a href="http://3.bp.blogspot.com/_Bvx67-p9E1c/SkXzHB5TH5I/AAAAAAAAAAw/3IaNmgdQ-BU/s1600-h/bartold+brecht.jpg"><img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5351951034293100434" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; WIDTH: 160px; CURSOR: hand; HEIGHT: 227px; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_Bvx67-p9E1c/SkXzHB5TH5I/AAAAAAAAAAw/3IaNmgdQ-BU/s320/bartold+brecht.jpg" border="0" /></a> <div align="justify"><em>आज तक मैंने जितनी भी प्रेम-सम्बन्धी कविताएँ पढ़ी हैं-------और ज़ाहिर है कि मेरे पढने की बड़ी सीमा है, फिर भी-----उनमें जर्मन कवि बेर्टोल्ट ब्रेख्त की यह कविता मुझे महानतम लगी है. इसलिए आप सभी के साथ अपने इस निहायत निजी एहसास या कहिये कि जुनून को साझा और सेलेब्रेट करना चाहता हूँ. सोचता हूँ , क्यों न मेरी पोस्ट का आगाज़ प्यार से हो . तो दोस्तो, प्रस्तुत है यह छोटी-सी, मगर महान कविता, मेरे लिए तो महानतम.<br /></em><br /><strong>कमज़ोरियाँ तुम्हारी<br />कोई नहीं थीं<br />मेरी थी एक<br />मैं करता था प्यार<br /></strong><br /><span class="">(अनुवाद</span>: मोहन थपलियाल <span class="">)</span> </div><br /><p align="center"><strong>मूल कविता : प्रस्तुति - महेन मेहता </strong></p><p align="center"><strong>Schwaechen </strong></p><p align="center"><strong>hattest du keine</strong></p><p align="center"><strong>Ich hatte eine</strong></p><p align="center"><strong>Ich liebte.</strong></p><p align="center"><strong>*********</strong></p><p> </p><div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2226967520901413749-8262531447309716411?l=anunaad.blogspot.com'/></div>पंकज चतुर्वेदीhttp://www.blogger.com/profile/09534245855325673367noreply@blogger.com12tag:blogger.com,1999:blog-2226967520901413749.post-81759723351159082882009-06-24T21:03:00.007+05:302009-06-25T21:04:08.750+05:30नरेश सक्सेना की कविता<div align="justify"><em><br /></em><br /><strong>धातुएं</strong><br /><br />सूर्य से अलग होकर पृथ्वी का घूमना शुरू हुआ<br />शुरू हुआ चुंबकत्व<br />धातुओं की भूमिका शुरू हुई<br /><br />धातु युग से पहले भी था धातु युग<br />धातु युग से पहले भी है धातु युग<br />कौन कहता है कि धातुएं फलती-फूलती नहीं हैं<br />इन दिनों<br />फलों और फूलों में वे सबसे ज़्यादा मिलती हैं<br />पानी के बाद<br /><br />मछलियों और पक्षियों में होती हुई<br />वे आकाश-पाताल एक कर रही हैं<br /><br />दफ़्तर जाते हुए या बाज़ार<br />या घर लौटते हुए वे हमें घेर लेती हैं धुंए में<br />और ख़ून में घुलने लगती हैं<br /><br />चिंतित हैं धातुविज्ञानी<br />कि असंतुलित हो रहे हैं धरती पर धातु के भंडार<br />कि वे उनके जिगर में, गुर्दों में, नाखूनों में,<br />त्वचा में, बालों की जड़ों में जमती जा रही हैं<br /><br />अभी वे विचारों में फैल रही हैं लेकिन<br />एक दिन वे बैठी मिलेंगी<br />हमारी आत्मा में<br />फिर क्या होगा<br />गर्मी में गर्म और सर्दी में ठंडी<br />खींचो तो खिंचती चली जायेंगी<br />पीटो तो पिटती चली जायेंगी<br /><br />ऐसा भी नहीं है<br />कि इससे पूरी तरह बेख़बर हैं लोग<br />मुझसे तो कई बार पूछ चुके हैं मेरे दोस्त<br />कि यार नरेश<br />तुम किस धातु के बने हो !<br />******<br /><br />(16 जनवरी 1939 को ग्वालियर में जन्मे नरेश सक्सेना हिंदी कविता के उन चुनिन्दा ख़ामोश लेकिन समर्पित कार्यकर्ताओं की अग्रिम पंक्ति में हैं, जिनके बिना समकालीन हिंदी कविता का वृत्त पूरा नहीं होता। वे विलक्षण कवि हैं और कविताओं की गहन पड़ताल में विश्वास रखते हैं, इसका एक सबूत ये है कि 2001 में वे <strong>`समुद्र पर हो रही है बारिश´</strong> के साथ पहली बार साहिबे-किताब बने और 70 की उम्र <a href="http://2.bp.blogspot.com/_Dbu2Jbf2gB4/SkJMnEh1QKI/AAAAAAAAAuY/Vfn6Y6TBWlo/s1600-h/nareshji.jpg"><img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5350923541383823522" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 134px; CURSOR: hand; HEIGHT: 188px" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_Dbu2Jbf2gB4/SkJMnEh1QKI/AAAAAAAAAuY/Vfn6Y6TBWlo/s400/nareshji.jpg" border="0" /></a>में अब तक उनके नाम पर बस वही एक किताब <span class="">दर्ज़ </span>है - इस पहलू से देखें तो वे आलोकधन्वा और मनमोहन की बिरादरी में खड़े नज़र आयेंगे। वे पेशे से इंजीनियर रहे और विज्ञान तथा तकनीक की ये पढ़ाई उनकी कविता में भी समाई दीखती है। वे अपनी कविता में लगातार राजनीतिक बयान देते हैं और अपने तौर पर लगातार एक साम्यवादी सत्य खोजने का प्रयास करते हैं। कविता के लिए उनकी बेहद ईमानदार चिन्ता और वैचारिक उधेड़बुन का ही परिणाम है कि कई पत्रिकाओं के सम्पादक पत्रिका के लिए सार्थक कविताओं की खोज का काम उन्हें सौंपते हैं। कविता के अलावा उनकी सक्रियता के अनेक क्षेत्र हैं। उन्होंने टेलीविज़न और रंगमंच के लिए लेखन किया है। उनका एक नाटक <strong>`आदमी का आ´</strong> देश की कई भाषाओं में पांच हज़ार से ज़्यादा बार प्रदर्शित हुआ है। साहित्य के लिए उन्हें 2000 का <strong>पहल सम्मान</strong> मिला तथा निर्देशन के लिए 1992 में <strong>राष्ट्रीय फि़ल्म </strong><span class=""><strong>पुरस्कार</strong>।</span>) </div><div align="justify">*****</div><div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2226967520901413749-8175972335115908288?l=anunaad.blogspot.com'/></div>शिरीष कुमार मौर्यhttp://www.blogger.com/profile/05256525732884716039noreply@blogger.com11tag:blogger.com,1999:blog-2226967520901413749.post-82655787184218585612009-06-21T20:44:00.007+05:302009-06-22T14:25:04.974+05:30कविता का प्रथम श्रोता - ज्ञानेंद्रपति<div align="center"><strong></strong></div><div align="center"><strong>कविता का प्रथम श्रोता - ज्ञानेंद्रपति</strong></div><br /><a href="http://2.bp.blogspot.com/_Dbu2Jbf2gB4/Sj5WHkHPJEI/AAAAAAAAAuQ/9WnJ7toCdek/s1600-h/gyanendrapati.jpg"><img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5349808095315829826" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; WIDTH: 262px; CURSOR: hand; HEIGHT: 400px; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_Dbu2Jbf2gB4/Sj5WHkHPJEI/AAAAAAAAAuQ/9WnJ7toCdek/s400/gyanendrapati.jpg" border="0" /></a><br /><div align="center"><strong><span class=""></span></strong></div><br /><div align="justify"><strong>कविता का पहला श्रोता किंवा पाठक ! कवि के लिए गुरू-स्थानीय - मेरी तरह के निगुरा कवि के लिए भी। कोई कविता पूरी होते ही - अर्थात उसका पहला मुकम्मल-सा प्रारूप बनते ही उसे ` उपयुक्त प्रथम श्रोता´ को सुनाने की ज़रूरत तड़प की तरह महसूस होती है। `उपयुक्त प्रथम श्रोता´ के यहां से उत्तीर्ण होने पर ही वह कविता मुकम्मल होती है। कविता की पूर्णता में इस प्रथम श्रोता का ज़रूरी योगदान होता है। उदाहरण के लिए `संझा-झंझा´ शीर्षक मेरी कविता को देखा जा सकता है जो तब विजयमोहन सिंह के सम्पादन में निकलने वाली `इंद्रप्रस्थ भारती´ में प्रकाशित हुई। कविता के उस रूप को `गंगातट´ में संकलित विकसित रूप से मिलाकर देखने पर दिखेगा, कितनी कमियां हैं `इं.प्र´ वाले प्राथमिक रूप में। क्योंकि तब तक मैं उस कविता को शिवनाथ बाबा को नहीं सुना सका था - शिवनाथ मांझी जो नब्बे पार के सम्भवत: सर्वाधिक बुज़ुर्ग व्यक्ति हैं बनारस के मल्लाहों के कुनबे में, जल से भरी सांवले मेघ की तरह धीरे धीरे चलते हुए गंगा के किनारे सुबह-शाम दिख जाने वाले। मल्लाहों की जीवनचर्या से जुड़ी उस कविता के `उपयुक्त प्रथम श्रोता´ शिवनाथ मांझी ही हो सकते थे। उनकी अनुभव-सम्पदा का सारांश ही - जितना मैं ग्रहण कर पाया - उस कविता को वह प्रस्फुटित रूप दे सका जो `गंगातट´ वाले रूप में दिखता है। गोया, कविता की अन्तर्वस्तु ही `उपयुक्त प्रथम श्रोता´ को संकेतित करती है, उसको सम्बोधित होती है, उसकी प्रतिक्रियाओं को जज़्ब करती है, समुन्नत होती है। जितना बड़ा आपका परिचय क्षेत्र होगा, उतनी ही बड़ी संख्या में गुरू-स्थानीय प्रथम श्रोता आपको सुलभ होंगे। मुझे लगता है, किसी युग-नियंत्रक आलोचक को अपना स्थायी गुरू नियुक्त करने से कविता संवरने वाली नहीं।</strong> </div><div align="justify">************</div><div align="justify">पुस्तक का नाम - पढ़ते -गढ़ते, अभिधा प्रकाशन, रामदयालु नगर, मुजफ्फरपुर, बिहार- ८४२ ००२ </div><div align="justify">मूल्य - ७५ रूपए </div><div align="justify">प्रथम संस्करण - २००५<br />-------------------------------------------------------------------------------------------------<br /><em><span class="">(<strong>मेरी</strong></span><strong> बात</strong> - आज मैंने ज्ञानेंद्रपति का लिखा एक गद्यखंड यहां लगाया है। पिछले कुछ बरस से मुझे यह सवाल लगातार तंग करता है कि हम कवियों का लक्ष्य किन पाठकों के ह्रदय तक पहुंचना है। मेरे हिसाब से हिंदी में पाठक दो तरह के हैं - पहले, जो स्वयं कवि या रचनाकार भी हैं और दूसरे, जो केवल पाठक हैं - उनका कोई निजी स्वार्थ नहीं, और वही मेरे लिए मेरे पाठक हैं! अग्रज और साथी कवियों को अनदेखा करने की गुस्ताख़ी मैं कतई नहीं कर रहा। ज्ञानेंद्रपति ने ख़ुद को `निगुरा´ कहा है! मैं भी `निगुरा´ ही हूं पर एक पूरी परम्परा का हाथ मेरी पीठ पर है, जिसे मेरी कविताओं में लक्षित किया जा सकता है। मैं उस परम्परा के साथ कितना न्याय कर पाया हूं या कर पा रहा हूं, यह तो सुदूर भविष्य में आंकने की बात होगी और मैं भूल नहीं रहा हूं कि तब भी इतिहास का कूड़ादान खुला होगा! परम्परा का बोध ही मुझे दरअसल पाठकों के बोध तक ले जाता है। हिंदी पट्टी ऐसे पाठकों से भरी पड़ी है और मेरे लिए रांची, मुंगेर, पटना, बोकारो, रायपुर, बांदा, भोपाल, गुना, अल्मोड़ा, पिथौरागढ़, गोपेश्वर, बादशाहीथौल टिहरी, देहरादून, बलिया, आदि अनेक जगहों से आते पत्र और फोन काल्स उन धुकधुकियों के गवाह हैं, जो प्रतिक्रियास्वरूप मेरे ह्रदय को ध्वनि और गति देती हैं......अंत में इतना और कि मेरे पहले पाठक नैनीताल के निकट स्थित ब्रिटिशकालीन <span class="">क़स्बे </span>रामनगर में रहने वाले रम´दा यानी रमेश पांडे हैं, जो अर्थशास्त्र के प्रोफेसर हैं। पिछले कई सालों से उनकी हरी झंडी के बाद ही मेरी कविताएं छपने जाती हैं और साथ ही यह भी बताना मौजूं होगा कि उनके पास मज़बूत और टिकाऊ कपड़े की बनी एक लाल झंडी भी है.......) </em></div><p align="center"><strong>गिरिराज किराडू की प्रतिक्रिया </strong></p><p align="justify">ऐसा तो नहीं कि कवितायेँ लाल, झंडी हरीकवितायेँ हरी, झंडी लाल? :) (शायद) नेरुदा ने कहा था हमारे पास कुछ पाठक तो हैं, 'जनता' नहीं। अब उस 'कुछ' का अर्थ 'कितना' रहा गया है यह उदास और मारक गिनती कोई नहीं करना चाहता।इस पर कवियों की खुली पंचायत होनी चाहिए कि जितना कभी नहीं थी उतनी जनोन्मुखी हो कर भी (कम से कम अधिसंख्य कविता का आत्म-बिम्ब तो यही है) हिंदी कविता क्यों 'कंडीशंड' पाठकों तक सीमित हो गयी है - कभी कभी यह भी लगता है हम कवियों से बहुत अधिक उम्मीद करते हैं, अगर यह दूसरी तरह का और जैसी कवियों की दुनिया में आम सहमति जान पड़ती है 'सबसे भयानक'। 'कठिन', 'मुश्किल.' क्रूर', बाजारू' आदि समय है तो हम कवियों से वही प्रत्याशायें क्यों कर रहे हैं जो किसी कम 'भयानक' कम 'कठिन', कम 'मुश्किल', कम 'क्रूर', कम 'बाजारू' समय के लिए जायज़ थीं? इस समय में कविता की ठीक वही भूमिका नहीं हो सकती यह बिलकुल मुमकिन है. यूं 'बड़े' कवि बनने, बनाये जाने, कहने, कहलाये जाने का उद्यम सदाबहार है चलता रहेगा. 'बड़े' कवि, 'महत्त्वपूर्ण' कवि, 'विशिष्ट' कवि, 'अपना मुहावरा', 'विशिष्ट निजी स्वर' जैसे प्रिय पदों का कोई प्राथमिक मनोवैज्ञानिक पठन भी बहुत दिलचस्प रहेगा - करके देखिये. हर २ महीने में अपना 'निजी विशिष्ट स्वर' रखने वाले एक नौजवान की आमद और हर पांच साल में एक अनुभवी कवि के 'बड़े' कवि में पदोन्न्नत होते रहने के बावजूद हम लोग यह मातम कर रहे हैं तो बेवकूफ कौन? </p><p align="justify">June 22, 2009 10:57 AM</p><p> </p><div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2226967520901413749-8265578718421858561?l=anunaad.blogspot.com'/></div>शिरीष कुमार मौर्यhttp://www.blogger.com/profile/05256525732884716039noreply@blogger.com12tag:blogger.com,1999:blog-2226967520901413749.post-90251212639592459932009-06-19T21:23:00.003+05:302009-06-19T21:30:48.418+05:30अलविदा उस्ताद !<a href="http://3.bp.blogspot.com/_Dbu2Jbf2gB4/Sju1zTCMPmI/AAAAAAAAAuI/ZE4WzFr81UM/s1600-h/ali+akbar+khan.jpg"><img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5349068875320016482" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; WIDTH: 303px; CURSOR: hand; HEIGHT: 228px; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_Dbu2Jbf2gB4/Sju1zTCMPmI/AAAAAAAAAuI/ZE4WzFr81UM/s400/ali+akbar+khan.jpg" border="0" /></a><br /><div>एक तारवाद्य कुछ बोलता है और कुछ बोलने से आवाज़ होती है<br /><br />उस आवाज़ में तारामंडलों जैसी कुछ संरचनाएँ हैं<br />उनमें कुछ सुर दिखाई देते हैं<br /><br />सुरों का तो काम ही है बोलना </div><div><br />वो बोलते हैं कि हमें एक चेहरे की तरह देखो<br />हमें एक नाम की तरह पुकारो<br /><br />मैं पुकारता हूँ - माझ खम्माज !<br />मैं पुकारता हूँ - हेम विहाग !<br />मैं पुकारता हूँ - सिंधी भैरवी !<br /><br />सुरों के सवेरे में एक साँवला आदमी<br />धीरे-धीरे कहीं जाता दीखता है<br /><br />उसे पुकारो तो वह पलटकर देखता और धीरे से मुस्कुराता है<br />और अपने सधे हुए हाथ हिलाता है ! </div><br /><div>****</div><div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2226967520901413749-9025121263959245993?l=anunaad.blogspot.com'/></div>शिरीष कुमार मौर्यhttp://www.blogger.com/profile/05256525732884716039noreply@blogger.com11tag:blogger.com,1999:blog-2226967520901413749.post-57688701636058173062009-06-17T00:13:00.001+05:302009-06-17T00:17:18.635+05:30ईरानी कवि माजिद नफ़ीसी की कविताओं का सिलसिला/ तीसरी और समापन किस्त<div align="center"></div><br /><div align="center"><a href="http://anunaad.blogspot.com/2009/06/blog-post_06.html">कवि के परिचय और अनुवादक के पूर्व कथन के लिए यहाँ क्लिक करें !</a></div><div align="center"></div><div align="justify"></div><br /><p><br /><a href="http://3.bp.blogspot.com/_jb2k7tG4IGw/SjfmtovT28I/AAAAAAAAABQ/Lqw2De6G5cA/s1600-h/majid_naficy.jpg"><img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5347996754230107074" style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; WIDTH: 150px; CURSOR: hand; HEIGHT: 197px" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_jb2k7tG4IGw/SjfmtovT28I/AAAAAAAAABQ/Lqw2De6G5cA/s320/majid_naficy.jpg" border="0" /></a><br /><strong>ख़ाली टोकरियां</strong><br /><br />भोर होते होते<br />दिखाई पड़ती हैं कई ख़ाली टोकरियां<br />रसोई में जिन्हें छोड़ आयी थीं तुम...<br /><br />एक में सहेज देता हूं मैं चीड़ के कोन<br />सुदूर घाटियों से चुन चुन कर जिन्हें ले आयी थीं तुम..<br /><br />और दूसरे में काले रंग वाली ढेरों सीपियां<br />आती है जिनसे गहरे सागरों की गूंज...<br /><br />फिर भी बची रह जाती है एक अदद टोकरी<br />टकटकी लगाकर बार बार देखती हुई मुझे<br />छुपे हुए हैं उसमें जाने कौन कौन से<br />अजाने भेद...<br /><br /><span class=""></span></p><br /><p><strong>धुलाई </strong><br /><br />वाशिंग मशीन की ध्वनि ठहरी रहती है सिर्फ़ जहां की तहां<br />और हमारे कपड़ों से फिसलती जाती हैं रात की सुगंध भरी स्मृतियां एक एक करके...<br /><br />जलती लकड़ी और हरी दूब की गंध<br />तुम्हारी अंगियां पर ठिठक गए शराब के दाग़<br />और मेरी कालर पर बैठ गए पके फलों के धब्बे...<br />तुम्हारे कंधों पर भोर की ओस के छींटे<br />और मेरी पीठ पर चिपके हुए धूसर मिट्टी के दाग़<br /><br />डूबते सितारों के बीच हमारा ढुलमुल ढुलमुल लुढ़कते जाना<br />और लाल गोले-सा सूरज का सहसा उछलकर प्रकट हो जाना...<br /><br />गोल गोल घूमने दो इस चक्के को<br />और उलट पलट करने दो कपड़े...<br /><br />प्रेम तो होता है बिल्कुल बेदाग़ झक्क्क सफ़ेद<br />और इसकी साफ़ सुथरी कमीज़<br />चमकती हुई दिखाई देती है<br />दूर दूर से भी हमेशा...<br /> </p><br /><p><br /><strong>प्रेम मिलना नहीं आसान<br /></strong><br />मुझे चाहिए तुम्हारी अनिमेष टकटकी<br />आंखें नहीं चाहिए तुम्हारी....<br /><br />मुझे चाहिए तुम्हारा चुंबन<br />होंट नहीं चाहिए तुम्हारे ...<br /><br />मुझे चाहिए तुम्हारा आलिंगन<br />बाहें नहीं चाहिए तुम्हारी...<br /><br />मेरी लालसा है प्रेम की<br />क्योंकि<br />प्रेम मिलना नहीं आसान...<br /><br />मुझे चाहिए तुम्हारा मधु<br />छत्ता नहीं चाहिए तुम्हारा...<br /><br /><span class=""></span></p><br /><p><strong>घोंघे के लिए<br /></strong><br />ओ पिद्दी से<br />पूरा घरबार अपनी पीठ पर ही लाद कर चलने वाले...<br />क्या डर नहीं लगता तुम्हें कि मेरा भारी भरकम पांव<br />कहीं मिटा ही न डाले तुम्हारी हैसियत?<br /><br />कल रात बारिश में<br />तुम घुस आए मेरे जूतों के अंदर हिफ़ाजत से<br />बचाने खुद को...<br /><br />आज<br />जब लौट रहे हो तुम अपने हरे भरे आशियाने में वापिस<br />सिर उठाने लगी है मुझमें भी लालसा<br />घरवापसी की...<br /><br /><br /><strong><span class="">ऐडी*</span> का सूना कोना</strong><br /><br />आज पोंछ रही है सड़क से<br />बारिश तुम्हारा लहू<br />अब बचेगी यहां सिर्फ़ तुम्हारी आलोकित मुस्कान...<br /><br />तुम्हारा लम्बा बेसबाल बैट दीवार से टिककर खड़ा है<br />और किताबों से भरा बैग<br />कर रहा है प्रतीक्षा तुम्हारे कंधों की<br /><br />धिक्कार है उन हाथों को जिन्होंने बनाई बंदूक<br />धिक्कार है उन हाथों को जिन्होंने लाकर रखा उन्हें दुकान में<br />धिक्कार है उन हाथों को जिन ने दबाया इसका घोड़ा<br /><br />मैं पड़ता जा रहा हूं बर्फ़ जैसा ठंडा<br />और बुलेट के खोल जैसा खोखला<br /><br />क्योंकि जानता हूं तुम्हारी मां अब कभी लांघ नहीं पाएगी<br />देहरी किसी स्कूल की<br />और न क़दम बढ़ा पाएगी बेसबाल के मैदान की ओर<br />न ही वो दुखियारी<br />गरम कर पाएगी अपनी भट्टी<br />पकाने को कभी तुम्हारी पसंद का कोई पकवान...</p><br /><p align="justify"><br /><strong><span style="font-size:85%;">(28 फरवरी 2006 को शहर के एक स्कूल में अंधाधुंध गोलियां चलाकर कुछ निर्दोष बच्चों को मार डाला गया...अमरीकी समाज में ऐसी घटनाएं आम हैं। कवि ने ऐसी एक बच्ची ऐडी लोपेज़ को श्रदाजंलि देते हुए ये कविता लिखी।)<br /></span></strong><br /><span class=""></span></p><br /><p align="justify"><strong>पुल पर</strong><br /><br />मैं काठ के इस पुल पर लेटा हुआ हूं<br />माथे के नीचे हाथ को तकिया बनाए<br />और फिसल रही हैं तुम्हारी उंगलियां<br />मेरे चेहरे पर...<br /><br />तुम्हारी लुभवनी बतकही से भरकर बहने लगता है मेरे कान का प्याला<br />पानी प्रवेश कर जाता है मेरी शिराओं के अंदर<br />और मैं बहने लगता हूं अनियंत्रित<br />इस रहस्यमय नदी में<br />उतराती हुई किसी आकुल नौका की मानिन्द<br />सघन वन के अंदर से<br />जहां चहचहाते हुए परिंदे हैं<br />और है विकलता भी<br />दूब की चीन्ही हुई गंध के साथ साथ...<br /><br />जाने हम लगेंगे जाकर किस ठौर?<br />तेज बहाव वाले पानी के बीच<br />मेरे पास तो नहीं है कोई कम्पास<br />तुम्हारी फिसलती उंगलियों के सिवा?<br /><br /></p><div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2226967520901413749-5768870163605817306?l=anunaad.blogspot.com'/></div>यादवेंद्रhttp://www.blogger.com/profile/15780027946903352259ypande2009@gmail.com2tag:blogger.com,1999:blog-2226967520901413749.post-44314456656063759742009-06-15T20:49:00.003+05:302009-06-15T21:18:03.906+05:30पहले संकलन की बधाई हरे प्रकाश<div align="justify">मेरे जीवन के अब तक के सबसे व्यस्त दिनों में आज अभी घर लौटने पर हरे प्रकाश उपाध्याय का पहला कविता संकलन हाथ आया तो एक अजीब सा सुक़ून महसूस हुआ ! कुछ कवितायें तुरत पढीं। फ़ुर्सत मिलते ही इस किताब पर कहीं कुछ लिखने का मन है। <span class="">किताब का प्रकाशन ज्ञानपीठ से हुआ है, पृष्ठ 124 और मूल्य 120 रुपए है</span>।</div><div align="justify"><span class=""></span> </div><div align="justify"><span class=""></span> </div><div align="justify"><img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5347580148979149474" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; WIDTH: 257px; CURSOR: hand; HEIGHT: 400px; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_Dbu2Jbf2gB4/SjZr0BPVKqI/AAAAAAAAAuA/DuPMViu5Chc/s400/hare.jpg" border="0" /></div><br /><div align="center"><strong><u>किताब में विश्वनाथ त्रिपाठी का कथन</u></strong> </div><br /><p align="justify">हरे प्रकाश उपाध्याय हिंदी की नई पीढ़ी के संवेदनशील एवं सजग कवि हैं। कविताएं स्वगत या एकालाप शैली में नहीं हैं। एकालाप या स्वगत शैली में ही कवि सम्प्रेषणीयता का तिरस्कार कर सकता है, इस गुमान में कि वह गहरी बात कर रहा है। गहरी बात कहने वाले शमशेर भी कहते थे - बात बोलेगी ! लेकिन अनेक कवियों की बात बोलती नहीं। हरे प्रकाश गूंगी कविताओं के कवि नहीं हैं। वे पाठकों से सीधे और सीधी बात करते हैं। कविताओं के जरिये वे पाठकों को सवाल पूछने की प्रेरणा देते हैं। ऐसे सवाल जो ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक संवेदना को धार देते हैं। शैली और वाक्यों के इस सीधेपन में हमारे समय की युगीन जटिलताएं लिपटी हैं और कविताएं उन जटिल परतों को उद्घाटित करती हैं। फलत: इन कविताओं को पढ़ना अपने समय अपने समय की समस्याओं को पढ़ना है- <em>विवादी समय में पूछना बहुत ज़रूरी है/यह पूछो कि पानी में अब कितना पानी है/आग में कितनी आग है/आकाश में अब भी कितना आकाश है।<br /></em><br />सवाल जितना सीधा है, उतनी ही सीधी भाषा है और उतना ही अनिवार्य है। शायद मानव इतिहास का अभूतपूर्व संकट, यानी पंच महाभूतात्मक संकट। इस सवाल के जरिये आप आज की उस मानवघाती अपसंस्कृति तक पहुंच जायेंगे जो मनुष्य से उसके पंचमहाभूतों तक को छीनकर सीधे बाज़ार में बेचने का उपक्रम कर रही है।<br /><br />हरे प्रकाश उपाध्याय ज़मीनी हक़ीक़त के कवि हैं। जिस ज़मीन पर उनकी संवेदनाएं उगी हैं वह मूलत: उनके गांव-जवार की हैं। कविताओं के पात्र अधिकांश गांव के - विशेषत: नारियां और उनमें लड़कियां और वृद्धाएं हैं। उनका वर्णन, विवरण और यित्कंचित चित्रण कथात्मक है। आज की अच्छी कविता में जो कथात्मकता आ गई है उसका उपयोग-प्रयोग कवित्व को समृद्ध करता है।<br /><br />इस युवा कवि का भावबोध व्यापक है। वह `एकाग्र´ या एकान्तिक नहीं। शब्द शब्द मात्र या ध्वनि मात्र<br />नहीं है - वे रक्त, मज्जा, अस्थि के रूप हैं। कविता पढ़ना काग़ज़ से निकलकर शब्दों के सेतु पार कर उस समाज में पहुंच जाना है जहां गांव की औरतें दिन का इंतज़ार कर रही हैं। ज़ाहिर है कि यह दिन सामान्य दिन नहीं, हमारे समय के घटना-विहीन(आंदोलन विहीन) अंधकार को दूर करके मानवीय भविष्य का दिन है।<br /><br />आप देखेंगे कि ऐतिहासिक परिवर्तन(क्रांति) ठेठ ग्रामीण संस्कृति के रीति-रिवाज़ रचना-संदर्भ में चित्रित है। कवि की यह संवेदना और समझ मुझे आश्वस्त करती है। यथार्थ हमारी धरती का है तो समाधान और बदलाव भी हमारे ही ऐतिहासिक सांस्कृतिक संदर्भ में होगा, उसकी भाषा और काव्य-यात्रा भी हमारी होगी - `खिलाड़ी दोस्त´ तो हमारे दौर की उपज है। मुझे हरे प्रकाश उपाध्याय की कविताएं अच्छी लगती हैं। अगर वे खुद उस विज्ञापनी अपसंस्कृति के शिकार नहीं हुए, जिसका कि ये कविताएं विरोध करती हैं तो <span class=""></span> आगे चलकर बेहतर कविताएं रचेंगे।</p><p align="justify">*****</p><p align="justify"> </p><div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2226967520901413749-4431445665606375974?l=anunaad.blogspot.com'/></div>शिरीष कुमार मौर्यhttp://www.blogger.com/profile/05256525732884716039noreply@blogger.com1tag:blogger.com,1999:blog-2226967520901413749.post-38249681088491921692009-06-15T07:57:00.001+05:302009-06-15T21:21:44.531+05:30अनुनाद के मुद्रित संस्करण से .....<a href="http://1.bp.blogspot.com/_Dbu2Jbf2gB4/SjPWKuN9hjI/AAAAAAAAAt4/W1Gra9mriSI/s1600-h/sadi+yusuf.jpg"><img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5346852662312535602" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; WIDTH: 132px; CURSOR: hand; HEIGHT: 174px; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_Dbu2Jbf2gB4/SjPWKuN9hjI/AAAAAAAAAt4/W1Gra9mriSI/s400/sadi+yusuf.jpg" border="0" /></a> <div align="center"><span class=""></span></div><br /><div align="center"><strong><span style="font-size:130%;">सादी यूसुफ़ की कविता</span></strong><br /><strong><span class="">(अनुवाद</span> : अशोक <span class="">पाण्डे)</span></strong> </div><br /><div align="justify"><br /><br /><strong>फ़कीर<br /></strong><span class=""></span></div><br /><div align="justify"><u>एक </u><br /><br />रात बीतने ही वाली थी<br />जब कवियों ने प्रस्थान किया एक-एक कर<br />उनके पास इतनी रसद भर थी कि किसी ग़रीब आदमी के लिए पर्याप्त होती<br />और वापसी का टिकट<br />मैं उन्हें बताता हूँ : ``इतने तेज़ क़दम मत बढ़ाओ<br />भाइयो, एक घंटा और कर लो प्रतीक्षा<br />रात बीतने ही वाली है´´<br />लेकिन वे चले जाते हैं<br />आसमान बिल्कुल काला नहीं है, बस गहराते बादल हैं...<br />वे काले नज़र आते हैं और सलेटी<br />भोर बेवफ़ा है मगर है तो भोर ही<br />आसमान के एक कोने पर लगातार ठहरे सफ़ेद बादल से<br />मैं कहता हूँ<br />मैं तुम्हारा <span class="">हूँ,</span> हँसिये जैसी मेरी चमक तुम्हारी है<br />मैंने रात भर तुम्हारा... तुम्हारा इंतज़ार किया<br />जबकि तुम यहीं थे - मेरे तकिए के नीचे<br />मेरे बालों को सहलाते-दुलारते<br />तुम रहोगे मेरे साथ यहीं<br />मैं जहाँ होऊँगा तुम भी वहीं<br />मैं आसमान से कहूँगा कि खुल जाए वह<br />मैं घोषणा करूँगा कि तुम हो दिन का उजाला<br />शुभ दिन, प्यारे लड़के !<br />***<br /><u>दो</u><br /><br />कवि चल देते हैं एक के बाद एक<br />कविता का अंत आते-आते ...<br />कैसे पहुंचे तुम यहाँ इस ज़ीरो प्वाइंट पर ?<br />कैसे पहुंचे यहाँ आख़िरकार<br />तुम कहाँ छोड़ आए हमारी लालटेनें, हमारे पर्वतशिखर ?<br />क्या तुमने कभी नहीं देखी बिल्ली की आँखें ?<br />क्या हमने एक पंक्ति का पीछा किया उसके अंत तक ?<br />तब भी तुम चल देते हो यहाँ से<br /><br />इस पहाड़ पर कभी नहीं पड़ेंगी सिलवटें<br />हम जानते हैं इस पहाड़ को<br />इसके कोटरों से हम लेकर आएंगे शहद<br />और मेरी ढाल के लिए बाज के पंख<br />नाम ही नहीं हैं फूलों के पास<br /><br />और चिंदी-चिंदी बसन्त, और गाँवों की गंध टोहते भेड़िए<br />वहाँ दर्रे हैं,<br />और बकरियों और तस्करों के वास्ते पगडंडियाँ<br />यहाँ मेहमान नहीं होते सिपाही<br />संतों की क़ब्रों पर हरे रिबन चढ़ाए गए हैं<br />हम नहीं जानते उन मकानों को - औरतें वहाँ से<br />डबलरोटियाँ और मोमबत्तियाँ लेकर आती हैं<br />शुभ दिन, प्यारे पर्वतो !<br />***<br /><u>तीन </u><br /><br />कवि चल देते हैं एक के बाद एक<br />टहनी का अंत आते-आते<br />नहीं :<br />तुम लोग कैसे छोड़ सकते हो मुझे ?<br />हम कैसे कह सकते हैं : पानी की लहरें हमारी हैं ?<br />हम कैसे कह सकते हैं : टहनियाँ हमारी हैं, और हमारा यह सुनहरा शहद<br />कैसे कि : यह शुरूआत है टहनी की<br />तब भी तुम चल देते हो यहाँ से<br />पेड़ो, तुम हो पवित्र ! तुम फलो-फूलो,<br />तुम पवित्र हो - अपने मोरपंखों और पुरातन पक्षियों की कलगियों समेत !<br />तुम हो पवित्र जहाँ अंडे देती हैं चींटियाँ, सितारे का पीछा करता सेही तुम्हारे गिर्द चक्कर काटता है<br />और टिड्डियों की आवाज़ें तुम्हारी टहनियों से आती है<br />चाँदी जैसी सफ़ेद रात में<br />स्वर्ग से आने वाली हवा तुम्हें पंखा झलती है और सुनहरी धूप में तुमसे टपकती है चाँदी<br />मैं कहूँगा : तुम मेरे पहले पेड़ हो<br />तुम हो मेरा झोपड़ा<br />मेरी समाधि और मेरा मुकुट<br />शुभ दिन, कविता !<br />***<br /><u>चार </u><br /><br />मैं तुम्हें कोई इल्ज़ाम नहीं दूँगा<br />शराब की बंजर धरती से मैं नहीं कहूँगा अलविदा तुम्हें !<br />जब तूफ़ान टूटेगा, मैं सुनूंगा नहीं<br />मैं दोहराता जाऊँगा तुम्हारे नाम ...<br />और तुम्हारे आसमानों को<br />मैं एक वफ़ादार पहरुवे की तरह<br />तुम्हारी छोड़ी चीज़ों का ख़्याल <span class="">रखूँगा </span><br />मैं नहीं बन जाऊँगा धूल का राजकुमार<br />***<br /><u>पाँच</u><br /><br />रात को<br />रात ख़त्म होने पर<br />चिड़ियाँ आएंगी मेरे पास<br />और आएंगे चौड़े चरागाहों की ओस से भीगे भेड़िए<br />और हिरणियाँ आएंगी<br />रात के बीतने पर<br />सात कवि आएंगे<br />मेरी गुफ़ा में शरण लेने को ...<br />***</div><div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2226967520901413749-3824968108849192169?l=anunaad.blogspot.com'/></div>शिरीष कुमार मौर्यhttp://www.blogger.com/profile/05256525732884716039noreply@blogger.com1tag:blogger.com,1999:blog-2226967520901413749.post-14055720774477048892009-06-13T17:51:00.006+05:302009-06-13T19:43:22.447+05:30हबीब तनवीर के नाटकों से कुछ गीत<a href="http://2.bp.blogspot.com/_1VKqa1QxQYA/SjOlcJU8zTI/AAAAAAAAAKI/W_S71FASG78/s1600-h/11402.jpg"><img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5346799085577620786" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; WIDTH: 200px; CURSOR: hand; HEIGHT: 200px; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_1VKqa1QxQYA/SjOlcJU8zTI/AAAAAAAAAKI/W_S71FASG78/s200/11402.jpg" border="0" /></a><br /><div><span class=""></span></div><br /><div>ग़ैब से चलने <span class="">लगी जब</span></div><div>एक ज़हरीली हवा।<br /></div><div></div><br /><div>दिल के फफोलों से भरी</div><div>किस-किसके नालों से भरी</div><div>ख़ामोश चीखों से भरी</div><div>यह कहाँ से उठ रही है ऐसी दर्दीली हवा</div><div>ग़ैब से चलने लगी जब</div><div>एक ज़हरीली हवा</div><br /><div></div><div>एक मौजे लहू आ रही है</div><div>मौत की जैसे बू आ रही है</div><div>कू ब कू, सू ब सू आ रही है</div><div>अपनी बेरंगी में भी है एक ज़रा नीली हवा</div><div><span class="">ग़ैब से चलने लगी जब<br />एक ज़हरीली हवा</span></div><div><span class="">कैसा भभका, कैसी गंध</span></div><div><span class="">हो रही है सांस बंद</span></div><div><span class="">रोशनी आंखों की बंद</span></div><div><span class="">जिस्मों-जां में बस रही है कैसी मटमैली हवा</span></div><div><span class="">ग़ैब से चलने लगी जब</span></div><div><span class="">एक ज़हरीली हवा</span></div><br /><div><span class=""></span></div><div><span class="">कुछ <span class="">ज़रा-</span>सी गर्म भी है, कुछ ज़रा गीली हवा</span></div><div><span class="">ग़ैब से चलने लगी जब एक ज़हरीली हवा</span></div><div><span class="">एक ज़हरीली हवा।</span></div><div><span class=""><strong>(`ज़हरीली हवा` से)</strong> </span></div>****<br /><div><span class=""></span></div><div><span class=""></span></div><br /><div><span class="">आसमान तक उठ रहा है ज़ुल्म का पहाड़ रे </span></div><div><span class="">जी नहीं सकेंगे अब तो लेके इसकी आड़ </span></div><div><span class="">इस तरफ है ख़ार ज़ार गुलिस्तां उधर</span></div><div><span class="">दुख इधर है और सुख की वादियां उधर</span></div><div><span class="">घर भी उजाड़ अपना दिल भी है उजाड़</span></div><div><span class="">आसमान तक उठ रहा है ज़ुल्म का पहाड़।</span></div><div><span class="">दूसरी तरफ तो बह रही है जूए शीर</span></div><div><span class="">इस तरफ़ हवा भी चल रही है जैसे तीर</span></div><div><span class="">इस तरफ़ नज़र में कोई फूल है न झाड़</span></div><div><span class="">आसमान तक उठ रहा है ज़ुल्म का पहाड़।</span></div><div><span class="">इंकलाब ज़िंदाबाद का लगा के शोर</span></div><div><span class="">पंजाए सितम को आज़मा लगा के ज़ोर</span></div><div><span class="">हो सके तो बढ़के इस पहाड़ को उखाड़</span></div><div><span class="">आसमान तक उठ रहा है ज़ुल्म का पहाड़।<strong> </strong></span></div><div><strong>(`दुश्मन` से)</strong></div>****<br /><div><span class=""></span></div><br /><div><span class=""></span></div><div><strong>नेक दिल</strong></div><div><strong></strong> </div><div><span class="">नेक दिल अपने कमज़ोर दिल को तो देख</span></div><div><span class="">क्या ग़रीब आदमी में भलाई नहीं</span></div><div><span class="">क्या ख़तरनाक मौकों पे इंसान ने</span></div><div><span class="">बार-बार अपनी हिम्मत दिखाई नहीं</span></div><div><span class="">तंग नज़री की हद नामुरादी की हद</span></div><div><span class="">तंग नज़री की हद नामुरादी की हद</span></div><div><span class="">तंग नज़री की हद नामुराद </span></div><div><span class=""></span></div><div>****</div><div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2226967520901413749-1405572077447704889?l=anunaad.blogspot.com'/></div>Ek ziddi dhunhttp://www.blogger.com/profile/05414056006358482570dhireshsaini@gmail.com3tag:blogger.com,1999:blog-2226967520901413749.post-86602990107873278722009-06-11T22:48:00.000+05:302009-06-11T22:48:39.129+05:30ईरानी कवि माजिद नफ़ीसी की कविताओं का सिलसिला/ दूसरी किस्त<div><div align="justify">आपने पहली किस्त में माजिद नफ़ीसी के जीवन और उनकी दिवंगता पत्नी पर टिप्पणी पढ़ी और एक कविता भी। इन सारी चीज़ों को मेरे लिए शिरीष ने लगाया। अब पढ़िए माजिद की दूसरी कविता...... </div><div align="justify"> </div><div align="justify"><img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5346119087760535410" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; WIDTH: 320px; CURSOR: hand; HEIGHT: 212px; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_jb2k7tG4IGw/SjE6_EDm73I/AAAAAAAAABI/OG724CYpphI/s320/SuperStock_2483-549236.jpg" border="0" /><br /><strong><span class="">मुझे </span></strong><strong>तुम्हारी दरक़ार नहीं है प्रेट्रोलियम !<br /></strong><br />मुझे तुम्हारी दरक़ार नहीं है प्रेट्रोलियम...<br />अब तक मैं सोचा करता था<br />कि तुम जलते हो मेरे लिए<br />पर अब अहसास हुआ<br />कि जलता रहा हूं उल्टा मैं ही<br />तुम्हारी ख़ातिर ...<br /><br />ये हरगिज़ नहीं नहीं कहूंगा<br />कि हो रही हो जब बर्फ़बारी तो अच्छा नहीं लगता<br />केरोसिन की भट्टी के पास दुबककर बैठना....<br />या उजाड़ पड़े खेतों में<br />पंप से सिंचाई के वास्ते पानी पटाना...<br />फिर भी भरोसा नहीं आ रहा है तुमपर<br />ऐ, सात मुंह वाले दानव<br />तुम्हारे मुंह से अब भी निकल रही हैं धू-धू करती लपटें<br />और इसकी आंच पहुंच रही हैं<br />मेरी मातृभूमि की आत्मा तक<br /><br />तुम्हारे स्कूल ने भी पढ़ाए पाठ हमें दासता के<br />जिसके सहारे क़ुनबे के सरदार<br />भेजने में सफल हो गया अपना बेटा लंदन तक...<br />बादशाही फौज करती है<br />न्याय की तमाम उम्मीदों पर कुठाराघात ...<br />सड़कों पर लहां वहां लावारिस बहता रहा मेरा ही रक्त<br />पर धीरे-धीरे जब यही तरल प्रवाहमान हुआ<br />कलम में रोशनाई बनकर<br />तो इसी ने लिख डाले नये दस्तावेज़ दासता के...<br />झूट का भरी भरकम द्वार खुलने लगा<br />तुम्हारी चाबियों से ही...<br /><br />आज नए नए वायदे करता मसीहा-<br />वो ईश्वरविरोधी गधा-<br />देखो तो अब करता फिर रहा है<br />सवारी तुम्हारी पीठ पर ही बैठकर...<br /><br />तुमने देश को पहुंचा तो दिया<br />स्वर्ग के सिंहासन तक<br />और रगड़ रगड़ कर चमका दिये<br />इसके जूते एकदम चकाचक...<br />और तुमने बुलंद कर दिए इसके सात मुंह वाले हथियार<br />और जब भी मैं बढ़ाता हूं हिम्मत जुटाकर<br />कि कुचल हूं इसके दंभ भरे फन...<br />इसकी भय से कंपित काया को शक्ति प्रदान करने को<br />हर बार लगा देते हो मुसटंडी छड़ें<br />तुम ही...<br />बिल्कुल नहीं... मुझे नहीं दरक़ार...<br /></div><span class=""></span><br /><br /><div>मुझे तुम्हारी दरक़ार नहीं है पेट्रोलियम...<br />ओ, रक्तिम जलधार!<br />अब तक सोचा करता था<br />तुम्हीं भरते हो मेरी शिराओं में रक्त...<br />पर अब समझ आ गया कि नहीं करते तुम कुछ ऐसा<br />बल्कि घाव करके बहा रहे हो<br />तुम मेरा ही रक्त<br />लगातार...<br />**** </div></div><div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2226967520901413749-8660299010787327872?l=anunaad.blogspot.com'/></div>यादवेंद्रhttp://www.blogger.com/profile/15780027946903352259ypande2009@gmail.com0tag:blogger.com,1999:blog-2226967520901413749.post-71697490246404314032009-06-10T21:52:00.003+05:302009-06-10T22:02:59.462+05:30हबीब तनवीर को अलविदा - युगमंच की शोकसभा<a href="http://4.bp.blogspot.com/_Dbu2Jbf2gB4/Si_fvg10BPI/AAAAAAAAAtw/FdFnkkVigQk/s1600-h/640.jpg"><img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5345737290074555634" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; WIDTH: 400px; CURSOR: hand; HEIGHT: 400px; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_Dbu2Jbf2gB4/Si_fvg10BPI/AAAAAAAAAtw/FdFnkkVigQk/s400/640.jpg" border="0" /></a><br /><div align="justify"></div><div align="justify">जननाट्य की विधा को एक नया और ताक़तवर रूप प्रदान करने के लिए दिवंगत हबीब तनवीर भारतीय रंगमंच के इतिहास में अमर रहेंगे। 8 जून को हुए उनके निधन पर शोक व्यक्त करने के लिए नगरपालिका सभागार में नैनीताल के रंगकर्मियों, साहित्यकारों और नगरजनों ने एक सभा का आयोजन किया। </div><br /><div align="justify"><span class=""></span></div><div align="justify">सभा में उत्तराखंड के विख्यात रंगकर्मी तथा जनकवि गिरीश तिवारी `गिर्दा´ ने दिल्ली में तनवीर जी के संगसाथ को याद करते हुए उन्हें अत्यन्त भावाकुल श्रदांजलि दी। समर्पित श्रमजीवी वरिष्ठ पत्रकार राजीवलोचन साह ने हबीव तनवीर के व्यक्तित्व के कई पक्षों को याद किया। इनके अलावा सभा में युगमंच के वरिष्ठ रंगकर्मी जितेंद्र बिष्ट, प्रमोद साह, नवीन बेगाना, अशोक कुमार, अनिल कुमार, विनोद कुमार, दिल्ली से आए जन संस्कृति मंच के प्रतिनिध मुकुल सरल, वाचस्पति डिंयूडी, मोहनलाल साह, राजा साह आदि अनेक जन उपस्थित थे और सभी ने रंगमंच के लिए हबीब तनवीर के लोकधर्मी अवदान को याद करते हुए उन्हें श्रंद्धांजलि अर्पित की।</div><div align="justify"><span class=""></span><br />इतिहासविद् प्रो0 शेखर पाठक ने भूटान से तथा वरिष्ठ कथाकार बटरोही जी ने गोवा से अपनी शोक संवेदनाएं दूरभाष पर व्यक्त कीं। </div><br /><div align="justify"></div><div align="justify">युगमंच के अध्यक्ष ज़हूर आलम ने कहा कि सितम्बर में हम `जिस लाहौर..´ का मंचन करने जा रहे हैं, जो एक अंतर्राष्ट्रीय समारोह का हिस्सा होगा। हबीब साहब ने इस मंचन के दौरान नाटक के लेखक असगर वजाहत के साथ नैनीताल आने का वादा किया था, जो अब कभी नहीं निभाया जा सकेगा, लेकिन नैनीताल के रंगकर्मी सदैव इस वादे और और उसके साथ जुड़े स्नेह को याद रखेंगे।<br /><span class=""></span></div><div align="right"><strong><span style="font-size:85%;">प्रस्तुति - शिरीष मौर्य, सचिव - युगमंच, नैनीताल</span></strong> </div><div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2226967520901413749-7169749024640431403?l=anunaad.blogspot.com'/></div>शिरीष कुमार मौर्यhttp://www.blogger.com/profile/05256525732884716039noreply@blogger.com2tag:blogger.com,1999:blog-2226967520901413749.post-79225417053056867512009-06-09T21:07:00.004+05:302009-06-09T21:31:20.418+05:30जननाट्य के अनूठे और जुझारू योद्धा को अनुनाद का सलाम<div align="center"></div><div align="center"><strong><em>राजेंद्र कुमार और प्रणयकृष्ण/अध्यक्ष (उत्तर प्रदेश) और राष्ट्रीय महासचिव - जन संस्कृति मंच का शोक संदेश</em></strong></div><div align="center"></div><div align="center"><a href="http://4.bp.blogspot.com/_Dbu2Jbf2gB4/Si6EBdPOxlI/AAAAAAAAAto/mHvVUmAAEZc/s1600-h/2005010200570502.jpg"><img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5345354968298604114" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; WIDTH: 351px; CURSOR: hand; HEIGHT: 333px; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_Dbu2Jbf2gB4/Si6EBdPOxlI/AAAAAAAAAto/mHvVUmAAEZc/s400/2005010200570502.jpg" border="0" /></a>( <a href="http://www.hinduonnet.com/thehindu/mag/2005/01/02/images/2005010200570502.jpg">तस्वीर यहाँ से साभार)<br /><span class=""></span></a><br /><div align="justify">कल ८ जून. २००९ के दिन हमारे देश ही नहीं, बल्कि दुनिया के महान रंगकर्मियों में शुमार हबीब तनवीर साहब का भोपाल में ८५ साल की उम्र में निधन हो गया। हबीब साहब का जाना सचमुच एक युग का अंत है। उन्होंने नाटक को ज़िंदगी के इतना करीब ला दिया कि उनके नाटक देख कर यह लगता था कि हर इंसान में एक अदाकार छिपा है। दिल्ली में ओखला की मज़दूर बस्तियों के मज़दूरों, जामिया के छात्रों और छत्तीसगढ़ के लोक कलाकारों को उन्होंने शानदार अदाकारों में ढाल दिया। उन्होंने अदाकारी के लिए बड़े- बड़े संस्थानों में प्रशिक्षित कलाकारों की जगह आम जनता के सामान्य लोगों पर भरोसा किया। देश के वामपंथी आंदोलन, प्रगतिशील आंदोलन और इप्टा के साथ १९४५ से ही उनके सघन जुड़ाव ने उन्हें यह सीख दी थी कि जनता की कला जनता के भीतर से पैदा होगी, न कि अभिजन संस्थानों या फ़िर अपनी दुनिया में रहने वाले बुद्धिजीवियों से। हबीब साहब किसी भी जगह को स्टेज बना सकते थे, फ़िर वह बाज़ार हो, गली मुहल्ले हों या गांव। वे दक्षिण एशिया के बर्टोल्ट ब्रेष्ट थे। सन १९५४ में ही उन्होंने 'आगरा बाज़ार' की प्रस्तुति के ज़रिए अपने रंगकर्म की निराली संकल्पना को अंजाम दिया। नज़ीर अकबराबादी जैसे १९वीं सदी के निराले जनकवि का हबीब साहब ने अपने रंगकर्म के ज़रिए उसी तरह से पुनराविष्कार किया, जैसा कि संगीत के ज़रिए कुमार गंधर्व ने कबीर का। हबीब साहब कवि और अभिनेता भी थे। रिचर्ड एटनबरो की 'गांधी' सहित ९ से ज़्यादा फ़िल्मों में उन्होंने अभिनय किया और फ़िल्मी परदे पर भी वे जहां भी दिखे, बाकी सबको पीछे छोड़ गए। १९६० के दशक से ही वे 'पोंगा पंडित' नाटक खेलते आए थे, लेकिन ९० के दशक में संघ परिवार ने इस नाटक पर बारंबार हमले किए, लेकिन इस निडर कलाकार का वे क्या कर सकते थे?हबीब साहब को सरकारों और अकादमियों ने बहुत से सम्मानों से नवाज़ा- संगीत नाटक अकादमी अवार्ड,फ़ेलोशिप, पद्मश्री, पद्मभूषण, राज्य सभा की सदस्यता वगैरह, लेकिन ये सब उनके कलाकार के सामने बहुत छोटे साबित होते हैं। पांडवानी और नाच जैसी लोक कलाओं को दुनिया के स्तर पर अगर अपने नाटकों के ज़रिए ख्याति दिलाई तो हबीब तनवीर ने। छ्त्तीसगढ़ी भाषा को दुनिया हबीब साहब के चलते जानती है,जो 'चरनदास चोर 'जैसे उनके महान नाटक की भाषा है। आज कितने संस्कृतिकमी ऎसे हैं, जिन्हें विदेशों मे इतना सम्मान मिला,जो योरप के उच्चतम संस्थानों से संबद्ध रहे, लेकिन अपनी माटी के अलावा जिनका न कोई आदि था न अंत, जैसा कि हबीब साहब का? भोपाल गैस त्रासदी पर उनका नाटक २००२ में 'ज़हरीली हवा' नाम से खेला गया और इसी त्रासदी पर एक फ़िल्म जिसमें उन्होंने खुद अभिनय किया है, आने को है। इसी बीच अब वे हमसे विदा ले चुके हैं। हम सब उदास हैं। 'नया थियेटर' उनके बगैर भी ज़िंदा रहे, ये हम सबकी ख्वाहिश है। </div></div><div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2226967520901413749-7922541705305686751?l=anunaad.blogspot.com'/></div>शिरीष कुमार मौर्यhttp://www.blogger.com/profile/05256525732884716039noreply@blogger.com3tag:blogger.com,1999:blog-2226967520901413749.post-64303221731982313242009-06-06T20:29:00.016+05:302009-06-09T18:52:17.568+05:30ईरानी कवि माजिद नफ़ीसी की कविताओं का सिलसिला/ पहली किस्त : प्रस्तुति : यादवेन्द्र<p align="justify"><span style="color:#993300;"><em><span class=""></span></em></span></p><p align="justify"><span style="color:#993300;"><em><span class=""></span></em></span></p><p align="justify"><span style="color:#993300;"><em>ईरानी समाज के बारे में कहा जाता है कि कविता वहाँ भद्र जनों के जीवन का ही हिस्सा नहीं है बल्कि आम आदमी अपने दैनिक क्रियाकलापों में किसी ना किसी कविता की कोई ना कोई पंक्ति ज़रूर इस्तेमाल करता है। इस समाज की विडंबना देखिए कि आज हज़ारों की संख्या में ईरानी कवि (जिनमें से कुछ तो दूसरी पीढ़ी तक पहुच गये) अन्य देशों में .....सबसे ज़्यादा अमरीका में....निर्वासन या राजनीतिक शरणार्थी का जीवन बिताने को मजबूर हैं। 1979 में शाह के तख्तापलट के पहले जो राजनीतिक चेतनासंपन्न कवि थे, उनके दिन शाह की नृशंस पुलिस से लोहा लेते बीते और इस घटना से उन्हें देशवापसी की उम्मीद बँधी. पर अपने धार्मिक उन्माद में दूसरी सत्ता पहली से भी ज़्यादा क्रूर साबित हुई.....लिहाजा देश लौटने की उम्मीद लगाए कवियों की आशा पर पानी फिर गया. माजिद नफ़ीसी इसी श्रेणी के एक ईरानी कवि हैं, जो अमरीका में अपने दिन गुज़ार रहे हैं.... और उन्होंने अपनी भाषा में कविता लिखना जारी रखा है ! </em></span></p><p align="justify"><span style="color:#993300;"><em>1952 में ईरान के सांस्कृतिक नगर इशफहान में बेहद प्रबुद्ध परिवार में उनका जन्म हुआ, जिसकी शोहरत इस बात में थी कि सात पीढ़ियों से ये नामी-गिरामी डाक्टरों का परिवार है! उसकी लाइब्रेरी में 3000 से ज़्यादा साहित्य की पुस्तकें हैं. 13 साल की उम्र में पहली कविता लिखी और 1969 में उनका पहला संकलन आया. बचपन उनकी नज़र बेहद कमज़ोर थी और अब तो अमरीका में रहते हुए वे क़ानूनी तौर पर दृष्टिहीन माने जाते हैं. स्कूल की पढ़ाई ईरान से करने के बाद वे अमरीका चले गये जहाँ उनकी बाक़ी की शिक्षा हुई. अमरीका में पढ़ने के दौरान वे वियतनाम युद्ध का विरोध करने वाले दस्ते में शामिल हो गये. वापस आए शाहविरोधी आंदोलन में कूद पड़े और इसी दौरान उनकी मुलाक़ात अपनी पहली पत्नी (जो आंदोलन की अगुवाई करने वालों में से एक थी) से हुई. दोनों ने शादी तो कर ली पर आंदोलन का तक़ाज़ा ये था कि वे साथ ना रहें.... आज भी नफ़ीसी की टेबल पर पहली पत्नी की आधी फटी हुई फोटो इस बात की गवाह है कि दोनों की एक साथ खींची गयी फोटो पुलिस से बचने के लिए बीच से फाड़ दी गयी थी. 1982 में उनकी पत्नी को गिरफ़्तार कर लिया गया और तेहरान की बदनाम जेल में उनकी हत्या कर दी गयी ! विद्रोहियों को दफ़नाने के लिए ईरान में एक अलग क़ब्रिस्तान है , जिसे काफ़िरों <span class="">का क़ब्रिस्तान </span>कहा जाता है और कवि पत्नी को भी वहीँ दफनाया गया!</em></span></p><p align="justify"><span style="color:#993300;"><em>इस आंदोलन की ख़ातिर नफ़ीसी ने 8 साल तक कविता को स्थगित रखा और राजनीतिक कार्यकर्ता बन कर रहे पर पत्नी की हत्या ने उनमें कविता दुबारा जगा दी। 1983 में वे सरकारी दामन से बचने के लिए तुर्की के रास्ते बाहर निकल गये...फिर कुछ दिन फ्रांस में रहे..... डेढ़ साल बिताने के बाद वे दुबारा अमरीका पहुँचे और अपने बेटे के साथ रहने लगे। अपने इस बेटे के लिए भी उन्होने ढेर सारी मार्मिक कवितायें लिखी हैं। </em></span></p><p align="justify"><span style="color:#993300;"><em>उनके आठ काव्य संकलन मौजूद हैं , बच्चों के लिए एक खूब लोकप्रिय और पुरस्कृत किताब और 4 गद्य पुस्तकें भी उन्होंने लिखी हैं. अपनी कविताओं के बारे में उनका कहना है कि वे सोचते फ़ारसी में हैं और पहला ड्राफ्ट भी फ़ारसी में ही लिखते हैं, बाद उसका अँग्रेज़ी रूपांतरण कर देते हैं. कविता से इतर उनकी एक किताब है : "सर्च आफ जॉय - ए क्रीटिक ऑफ मेल डोमिनेटेड डेथ ओरिएंटेड कल्चर इन ईरान" - जिसमे उन्होने यह खोजने की कोशिश की है कि ईरान के पुरुषप्रधान समाज में ....चाहे शाह का समय हो या उसे हटा कर आए ख़ुमैनी और उनके अनुयायियों का शासन, हिंसा और विरोधियों का सफ़ाया कर देने की प्रवृत्ति दोनों में समान क्यों रही?</em></span> </p><p></p><br /><div align="center"><a href="http://1.bp.blogspot.com/_Dbu2Jbf2gB4/SiqZ1yFVFKI/AAAAAAAAAtQ/e2vjiCQJQZ4/s1600-h/naficy_photo.jpg"><img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5344253057084757154" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; WIDTH: 320px; CURSOR: hand; HEIGHT: 151px; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_Dbu2Jbf2gB4/SiqZ1yFVFKI/AAAAAAAAAtQ/e2vjiCQJQZ4/s320/naficy_photo.jpg" border="0" /></a><strong><span style="font-size:85%;">(काफ़िरों का <span class="">क़ब्रिस्तान, </span>जहाँ कवि की पत्नी दफ़न है!)<br /></span></strong><a href="http://2.bp.blogspot.com/_Dbu2Jbf2gB4/SiqGTo3vkNI/AAAAAAAAAtI/Wf_0vrrC1dU/s1600-h/majid_naficy.jpg"></a><br /><br /><div align="justify"><strong><u>निशान लगा ख़ज़ाना</u></strong><br /><br />फाटक से आठ क़दम दूर<br />और दीवार से सोलह क़दम के फ़ासले पर...<br />है किसी पोथी का लिखा<br />ऐसे किसी ख़ज़ाने के बारे में?<br /><br />ओ मिट्टी !<br />काश मेरी अंगुलियां छू पातीं तुम्हारी धड़कनें<br />या गढ़ पाती तुमसे बरतन...<br /><br />अफ़सोस, मैं हकीम नहीं हूं<br />और न ही हूं कोई कुम्हार<br />मैं तो बस मामूली-सा एक वारिस हूं<br />लुटाए-गंवाए हुए अपना सब कुछ...<br />दर दर भटक रहा हूं तलाश में<br />कि शायद कहीं दिख जाए वो निशान लगा हुआ ख़ज़ाना<br /><br />कान खोलकर सुन लो<br />मुझे दफ़नाने वाले हाथ<br />यही रहेगी पहचान मेरी क़ब्र की भी:<br />फाटक से आठ क़दम दूर<br />और दीवार से सोलह क़दम के फ़ासले पर<br />काफि़रों के क़ब्रिस्तान में ....<br />****<br /><strong><span style="font-size:85%;">(ये कविता कवि ने 7 जनवरी 1982को अपनी क्रांतिकारी साथी और पहली पत्नी इज़्ज़त ताबियां के सरकारी नुमाइंदों द्वारा क़त्ल किए जाने और काफि़रों के क़ब्रिस्तान में बिना किसी निशान की क़ब्र को तलाशते हुए लिखी थी...जिसे ऐसे ही क़दमों से नाप-नापकर पहचाना गया था।) </span></strong></div><div align="justify"><strong><span style="font-size:85%;">****</span></strong></div><div align="justify"></div><div align="center"><strong>इज़्ज़त ताबियां की वसीयत</strong> </div><div align="justify"></div><div align="justify">नाम : इज़्ज़त ताबियां</div><div align="justify">पिता का नाम : सईद जावेद </div><div align="justify">जन्म प्रमाण पत्र संख्या : ३११७१ </div><div align="justify"></div><div align="justify"><span class=""></span> </div><div align="justify">ये जीवन खूबसूरत और चाहने लायक है। औरों की तरह मैने भी जीवन से बे इन्तिहाँ प्यार किया. फिर एक वो भी आता है जब जीवन को अलविदा कहना पड़ता है। मेरे सामने भी खड़ा हुआ है वो समय और मैं उसका इस्तकबाल करती हूँ। मेरी कोई ख़ास ख्वाहिश नहीं है , बस ये कहना चाहती हूँ कि जीवन की खूबसूरती कभी विस्मृत नहीं की जा सकती। जिंदा रहते लोगों को अपने जीवन से ज़्यादा से ज़्यादा खूबसूरती प्राप्त करने के लिए प्रयत्न करते रहना चाहिए। </div><div align="justify"></div><div align="justify"><span class=""></span> </div><div align="justify">मेरे प्यारे अब्बा और अम्मी !</div><div align="justify">जब तक मैं जीवित रही, आप लोगों ने मुझे पालने में बहुत मुसीबतें उठायीं। अपने अन्तिम समय तक भी मैं अब्बा के गट्ठे और छाले पड़े हाथ और अम्मी के काम कर करके काले पड़ गए चेहरे को अपने जेहन से निकल नहीं पाई। मेरे मन में ये कूट कूट कर भरा हुआ है कि जितना आप लोगों ने मेरे लिए किया, उसकी मिसाल आसानी से देखने को नहीं मिलेगी। पर अंत में विदाई की बेला तो आनी ही थी.....इससे बचाव हरगिज़ सम्भव नहीं था। मैं अपने सम्पूर्ण वजूद के साथ आप लोगों से प्यार करती हूँ और अब अलग रस्ते पर जाते जाते भी आप लोगों को चूमना नही भूलूंगी ...हलाँकि आमने सामने देखना अब सम्भव नहीं हो पायेगा। भाइयों और बहनों को मेरा सलाम कहियेगा ...मेरी ओर से उनके गलों को चूम लीजियेगा। मैं उन सबसे बहुत बहुत प्यार करती हूँ। और अब जब मैं नहीं रहूंगी मेरी खातिर और तकलीफें मत उठाइएगा और अपने आप को यातना भी मत दीजियेगा। अपने जीवन आप लोग प्यार और कोमलता के साथ संगती बनाए रखियेगा ...उन सबको मेरी ओर से सलाम दीजियेगा जो आपसे मेरे बारे में पूँछें। </div><div align="justify"></div><div align="justify"><span class=""></span> </div><div align="justify">मेरे प्यारे साथी(पति) !</div><div align="justify">मेरा जीवन बहुत छोटा था और हमें साथ साथ रहने के लिए और भी कम समय मिल पाया। मेरी ख्वाहिश मन में ही रह गई कि आपके साथ ज़्यादा से ज़्यादा समय बिताऊँ...अब तो ये मुमकिन भी नहीं है। आप से इतनी दूर खड़ी हूँ पर यहीं से आपका हाथ पकड़ कर हिला रही हूँ .....और आपकी लम्बी उमर के लिए दुआएं कर रहीं हूँ ...हालाँकि मुझे लग रहा है कि इस वसीयत की किस्मत में आप तक पहुंचना नहीं है </div><div align="justify"></div><div align="justify"><span class=""></span> </div><div align="justify">उन सबको सलाम जिनसे पिछले दिनों में प्यार किया और अब भी करती हूँ ....और सदा सदा के लिए करती रहूंगी। अलविदा ......</div><div align="justify"><span class=""></span> </div><div align="justify">७ जनवरी १९८२</div><div align="justify">इज़्ज़त ताबियां</div><div align="justify"><em><strong><span style="font-size:85%;">(इस वसीयत को माजिद नफ़ीसी ने १९९७ में प्रकाशित अपनी किताब " आई राइट टू ब्रिंग यू बैक" में उद्धृत किया है) </span></strong></em></div><div align="justify"></div></div><div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2226967520901413749-6430322173198231324?l=anunaad.blogspot.com'/></div>शिरीष कुमार मौर्यhttp://www.blogger.com/profile/05256525732884716039noreply@blogger.com4tag:blogger.com,1999:blog-2226967520901413749.post-77257701276581004422009-06-05T21:13:00.006+05:302009-06-05T21:24:55.685+05:30विनोद दास की कविताओं का सिलसिला/ तीसरी कविता<a href="http://1.bp.blogspot.com/_Dbu2Jbf2gB4/Sik_CT54vZI/AAAAAAAAAtA/fT_VHjRdCt0/s1600-h/men31.gif"><img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5343871741787159954" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 67px; CURSOR: hand; HEIGHT: 85px" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_Dbu2Jbf2gB4/Sik_CT54vZI/AAAAAAAAAtA/fT_VHjRdCt0/s320/men31.gif" border="0" /></a><br /><div><strong><span class=""></span></strong></div><br /><div><strong><span class=""></span></strong></div><br /><div><strong><span class=""></span></strong></div><br /><div><strong><span class=""></span></strong></div><br /><div><strong><span class=""></span></strong></div><div><strong><span class=""></span></strong></div><div><strong>युवा </strong><br /><br />घंटी बजाकर<br />आपके दरवाज़े के सामने<br />जो उदग्र युवा<br />कान से मोबाइल सटाए हुए मुस्करा रहा है<br />वह मूलत: इंजीनियर है<br /><br />ऐश्वर्य के जगमगाते रास्तों में<br />उसकी इंजीनियरिंग की अस्थियां दबी हुई हैं<br />और अंधविश्वास की पौधशाला में पला<br />विज्ञान का यह प्रखर छात्र<br />फि़लहाल गले की अपनी ताबीज़ को पवित्र भाव से छू रहा है<br />बार-बार<br /><br />अपने शहर से दर-ब-दर<br />यह अश्वमेधी अश्व<br />दौड़ता ही रहता है हर समय<br /><br />सफ़र और मौत<br />दोनो ही करते रहते हैं इसका पीछा<br />सरीसृपों की तरह<br /><br />घर का पता<br />अब इसके मोबाइल का सिर्फ़ एक नंबर है<br />मुलायम बंदिशों के <span class="">इस </span><span class="">क़ैदखाने </span>में<br />वह जाना नहीं चाहता<br />मां रसोई से पुकारती रहती है<br />लेकिन खो जाती है उसकी आवाज़<br />पीजा-बर्गर के नए-नए स्वाद में<br /><br />रिश्तों को व्यापार में<br />बदलने की कला में पारंगत यह नौजवान अकेला नहीं है<br />मोबाइल, लैपटाप की बटनों में छिपे हैं<br />इसके बेशुमार दोस्त<br /><br />उसके लिए यह सब पचड़ा है<br />कि विदर्भ में कपास<br />खून से लिथड़ रही है<br /><br />ग़रीबों के वोटों से बनी अमीरों की सरकार<br />किसानों की हड़प रही है ज़मीन<br />और उनकी पीठों पर चमक रहे हैं<br />अंग्रेज़ों की नहीं<br />हमारी पुलिस की लाठियों के निशान<br /><br />उसे यह तक दिखाई नहीं देता<br />कि कश्मीर से कन्याकुमारी तक<br />इन दिनों मज़दूर ऐसे चलता है<br />जैसे चल रहा हो<br />अंत्येष्टि यात्रा<br />धीरे-धीरे<br /><br />लेकिन यह अपने देशकाल से<br />इतना भी निरपेक्ष नहीं<br /><br />उसकी चिंता में<br />फि़ल्मी सितारों की रसीली कथाएं हैं<br />या सचिन का नब्बे के आसपास लटका शतक<br /><br />सावधान!<br />अभी यह अपनी मीठी आवाज़ में<br />अपनी कंपनी की बीमा पालिसी बेचने के लिए<br />आपसे मनुहार करेगा<br /><br />फिर सीटी बजाते हुए<br />कई लड़कियों को एक साथ करेगा<br />एस एम एस<br />कोई फूहड़ चुटकुला<br />अथवा घटिया शेर </div><br /><div>****</div><div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2226967520901413749-7725770127658100442?l=anunaad.blogspot.com'/></div>शिरीष कुमार मौर्यhttp://www.blogger.com/profile/05256525732884716039noreply@blogger.com3tag:blogger.com,1999:blog-2226967520901413749.post-4724844707631876432009-06-03T21:52:00.000+05:302009-06-03T21:58:16.995+05:30अनुनाद के मुद्रित संस्करण से ......<div align="justify"><span class=""></span></div><br /><div align="center"><strong><u>विशाल श्रीवास्तव की कविताएँ</u></strong><br /><br /></div><div align="justify"><em>विशाल महत्वपूर्ण युवा कवि हैं। उन्हें 2005 का `अंकुर मिश्र कविता पुरस्कार´ मिला है। उनकी कविताएँ संवेदना के स्तर एक अजब-सी हरारत जगाती हैं। उनके पास अपना डिक्शन और ख़ुद से बाहर लाने वाली एक विशिष्ट अंतर्दृष्टि भी मौजूद है, जिससे ये तय हो जाता है कि वे एक लम्बी काव्य-यात्रा पर निकले हैं। उन्हें अनुनाद की शुभकामनायें।<br /></em><br /><br /><img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5343136408285624834" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; WIDTH: 147px; CURSOR: hand; HEIGHT: 182px; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_Dbu2Jbf2gB4/SiaiQRJSOgI/AAAAAAAAAs4/3KFkJJfwEYI/s320/vishalpp2.jpg" border="0" /><br /><strong>थाने में औरत<br /></strong><br />थाने में मगन दीवान जी हैं<br />और ठीक सामने उकड़ूँ बैठाई गयी है वह औरत<br />कुछ इस तरह<br />जैसे बैठी हो शताब्दियों से<br />और बैठे रहना हो शताब्दियों तक<br /><br />आख़िर किसलिए आई होगी यहाँ पर यह<br />भले घर की औरतें तो आतीं नहीं थाने<br />ज़रूर इसका मर्द या लड़का बन्द होगा भीतर<br />या फिर इसी का हुआ होगा चालान बदचलनी में<br />न हिलती है न डुलती है<br />न बोलती है कुछ<br />बस देखती है टुकुर-टुकुर सन्न सी<br />थाने के विरल आँगन को<br />जो स्वभावत: स्वस्थ और हरा-भरा है<br />आँगन में है आम का पेड़<br />जिस पर जैसे डर के मारे<br />निकल आये हैं नये नकोर बौर<br />इस अप्रैल में ही<br /><br />औरत देखती है उनको<br />और थाने में मुसकाती है अचानक<br />यह जानते हुए भी कि थाने में मुसकाना<br />कितना भयानक हो सकता है<br />जैसे उसका बचपना जाग गया हो उसके भीतर<br />उकडू़ँ बैठे बैठे ही वह मार देती हैं छलाँग बचपन में<br />भूल जाती है कि<br />उसका मरद कि लड़का बन्द है भीतर<br />या उसी का हुआ है चालान<br />इस अप्रैल के जानलेवा घाम में<br />थाने के आँगन में उकड़ूँ बैठी औरत मुसकाती है<br />मैं प्रार्थना करता हूँ मन में<br />कि दीवान को शताब्दियों तक न मिले फुर्सत<br />उसकी ओर देखने की।<br />****<br /><br /><strong>चुप रहो</strong><br /><br />चुप रहो नहीं तो<br />किसी महान शास्त्रीय आलाप की रगड़<br />से रेत दिया जायेगा तुम्हारा गला<br />महान नहीं होने दी जायेगी तुम्हारी मृत्यु<br />गोली नहीं मारी जायेगी तुम्हारी आँखों के बीच<br />तुम्हारे ही शहर में<br />सड़क के पीछे की किसी सुनसान गली में<br />तुम्हारे सर पर झम्म से गिरेगा<br />किसी महान लेखक का आंतकित कर देने वाला शब्द<br />तो अगर नहीं देख सकते हो तुम दुनिया के तमाशे<br />चुप रहो और मुस्कुराओ<br />कि तुम अपने शहर में ज़िन्दा हो<br />****<br /><br /><strong>डॉल्टनगंज के मुसलमान</strong><br /><br />कोई बड़ा शहर नहीं है डाल्टनगंज<br />बिल्कुल आम क़स्बों जैसी जगह<br />जहाँ बूढ़े अलग-अलग किस्मों से खाँसकर<br />ज़िन्दगी का काफ़िया और तवाज़ुन सम्भालते हैं<br />और लड़के करते हैं ताज़ा भीगी मसों के जोश में<br />हर दुनियावी मसले को तोलने की कोशिश<br />छतों के बराबर सटे छज्जों में<br />यहाँ भी कच्चा और आदिम प्रेम पनपता है<br />यहाँ भी कबूतर हैं<br />सुस्ताये प्रेम को संवाद की ऊर्जा बख्शते<br />डॉल्टनगंज के जीवन में इस तरह कुछ भी नया नहीं है<br />यहाँ भी कभी - कभी<br />समय काटने के लिए लोग रस्मी तौर पर<br />अच्छे और पुराने इतिहास को याद कर लेते हैं।<br />इन सारी बासी और ठहरी चीज़ों के जमाव के बावजूद<br />डॉल्टनगंज के बारे में जानने लगे हैं लोग<br />अख़बार आने लगा है डॉल्टनगंज में<br />डॉल्टनगंज में आने लगी हैं ख़बरें<br />आखिरकार लोग जान गये हैं<br />पास के क़स्बों में मारे जा रहे हैं लोग<br />डॉल्टनगंज का मुसलमान<br />सहमकर उठता है अजान के लिए<br />अपनी घबराहट में<br />बन्दगी की तरतीब और अदायगी के सलीकों में<br />अकसर कर बैठता है ग़लतियाँ<br />डॉल्टनगंज के मुसलमान<br />सपने में देखते हैं कबीर<br />जो समय की खुरदरी स्लेट पर<br />कोई आसान शब्द लिखना चाहते हैं<br /><br />तुम मदरसे क्यों नहीं गये कबीर<br />तुमने लिखना क्यों नहीं सीखा कबीर<br />हर कोई बुदबुदाता है अपने सपनों में बार-बार<br />कस्बे के सुनसान कोनों में<br />डॉल्टनगंज के मुसलमान<br />सहमी और काँपती हुई आवाज़ में<br />खुशहाली की कोई परम्परागत दुआ पढ़ते हैं<br /><br />डॉल्टनगंज के आसमान से<br />अचानक और चुपचाप<br />अलिफ़ गिरता है।<br />****</div><div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2226967520901413749-472484470763187643?l=anunaad.blogspot.com'/></div>शिरीष कुमार मौर्यhttp://www.blogger.com/profile/05256525732884716039noreply@blogger.com2