tag:blogger.com,1999:blog-18449440.post-61535201198383631492008-03-08T05:32:00.000-08:002008-03-08T05:32:00.000-08:00लाल्टू भाईउम्मीद से ज़्यादा दिनों बाद ही सही पर रस...लाल्टू भाई<BR/>उम्मीद से ज़्यादा दिनों बाद ही सही पर रसीला लेख आपका पढने को मिला। जब आप दस साल पहले ख़ुद को अवसादी कहा करते थे, तो बात समझ में ठीक से नहीं आती थी। आईएस बनने की चाहत थी, फिर सुखी गृहस्थी बनाने की चाहत थी, कुछ प्रसिद्ध होने की भी लालसा भी थी । अब थोड़ा साँस आना शुरू हुआ है अपने आप से। अवसाद की दो-चार गोलियां रोज़ खा लेता हूँ। कल शाम कॉलेज वालों ने भी एक टीका लगा दिया था। बस काम चल रहा है अब तो। निराशा को सात्विक कहने का भी ड्रामा नहीं कर पा रहा हूँ। उम्मीद की रस्सिओं से झूलने की सज़ा बीच-बीच में आकर फिर पकड़ लेती है। उसका अभी तक कोई इंतजाम नहीं हो पाया। शायद काफिर-गिरी करते-करते वो भी कोई रास्ता छोड़ जाए। आप का सारा ब्लॉग पढ़ के ऐसा लगता है की दो कुह्निओं से पहाड़ तो शायद नहीं हिला पर उसे यह अड़चन तो ज़रूर हो रही होगी की यह भाई साहिब, खुजली करने से बाज़ नहीं आ रहे।Sunil Aggarwalhttp://www.blogger.com/profile/00644421164005859010noreply@blogger.com