tag:blogger.com,1999:blog-18436534.post-72873180824713816632007-03-15T21:38:00.000+05:302007-03-15T21:38:00.000+05:30@ जी योगेश।। यह आपकी ही/भी दुनिया है@ संजय आपका जव...@ जी योगेश।। यह आपकी ही/भी दुनिया है<BR/>@ संजय आपका जवाब धुरविरोधी ने दिया है और नीलिमा ने भी। मैं आपके तर्क को एक भला तर्क मानता हूँ, इसी को अपने ट्रेडमार्क संयम के साथ सुनीलजी ने इन शब्दों में व्यक्त किया था-<BR/>शायद यह सच हो, पर गुमनाम हो कर लिखने का सोच कर मुझे लगता है जैसे कि हममें अपनी बात कहने की हिम्मत नहीं थी इसलिए इसे छुप कर कहते हैं. पर अगर गुमनामी के बदले विभिन्न भेष बदल कर, बहरूपिया बन कर अलग अलग दृष्टिकोणों से बातों को सोचा जाये और उनके बारे में अलग अलग चिट्ठों में विभिन्न नामों से लिखा जाये, यह मुझे अधिक रोचक लगता है, हाँ उसके लिए समय कहाँ से आयेगा, उसकी दिक्कत हो सकती है.<BR/>पर यकीन मानो ये मुखौटा भी 'आपका' ही होता है और हिम्मत और तर्क के बिना यहॉं भी काम नहीं चलता।<BR/>@ मान्या नहीं आपने कुछ बुरा नहीं कहा, काश कुछ कहने के बाद ऐसा कोई अपराध बोध न हो- मुखौटा लगाकर कहने की कोशिश कीजिए- प्रभावी होता है।<BR/>धुरविरोधी, नीलिमा...शुक्रिया।<BR/>एक बात और...पता नहीं क्यों इसे संस्थाओं के विरुद्ध कोई आगाज़ की तरह देखा जा रहा है। (मैं तो नारद को अपनी सेवाएं प्रस्तुत करने का विचार प्रस्तुत करने वाला था....चलो कोई नहीं) नहीं ऐसा नहीं है। और यह भी कि यदि मैं आलोचक होता तो भी मुझे ये बचकानापन वगैरह नहीं लगता...लेकिन सच यह है कि मैं आलोचक नहीं हूँ। किसी क्षमा या सजा की जरूरत नहीं है....अनूपजी। अगली मीट में हो सकता है आलोचक, नोटपैड, मसिजीवी सब ही मिल जाएं।masijeevihttp://www.blogger.com/profile/07021246043298418662noreply@blogger.com