tag:blogger.com,1999:blog-1791661064823014117.post-71461066371053417442007-10-23T23:09:00.000-07:002007-10-23T23:09:00.000-07:00ए भइया, हम ठेठ शहरवालों को आप कदम से बूडबक समझते ह...ए भइया, हम ठेठ शहरवालों को आप कदम से बूडबक समझते हैं का। बात किए कडाही के और फोटू दिखा रहे हैं भात पकावेवाला तसला के। अच्छा इ बताइ इ तसला के का दाम पड़ी,एगो खरीद के रख लेम।जे दिन हॉस्टल बंद रहतै, उ दिन झोल भात पकाइव।<BR/>मान गए सर, आपकी हर पोस्ट हमें जबरदस्ती बचपन में ठेलती है। चाची की जगह मेरी मां होती तो कहती कि आपही के लि चरचल्ला से उतर के आएं हैं और दाम कम नहीं करिएगा और फिर कोशिश करती कि दूकान के रिजेक्टेड कपडे से कडाही बदलकर ले ले ।<BR/>मजा आ गया सर, लेकिन फोटू यही सबका लगाइए, गांव में बिकनेवाली गुलाबी हवा मिठा की नहीं, अपने को रोकना मुश्किल होगा।विनीत कुमारhttp://www.blogger.com/profile/09398848720758429099noreply@blogger.com