tag:blogger.com,1999:blog-16550446542196127862008-02-19T23:24:08.984+05:30cinema- सिलेमाPramod Singhhttp://www.blogger.com/profile/11952815871710931417noreply@blogger.comBlogger81125tag:blogger.com,1999:blog-1655044654219612786.post-55683317090586635482008-02-17T10:24:00.005+05:302008-02-17T10:59:35.324+05:30द बैंड्स विज़िट<a href="http://bp3.blogger.com/_5ov4XIuU0i0/R7e_VWR9ojI/AAAAAAAACKM/nKFqwj9i5qg/s1600-h/the+bands+visit.jpg"><img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://bp3.blogger.com/_5ov4XIuU0i0/R7e_VWR9ojI/AAAAAAAACKM/nKFqwj9i5qg/s200/the+bands+visit.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5167809470910014002" /></a>चिरकुट भावुक नौटंकियों से अलग सिनेमा में अब भी उम्मीद है? बहुत ऐसे मौके बनते हैं? और बनते हैं तो हमें देखने को कहां मिलते हैं? मगर कल देखने को मिला और देखते हुए हम धन्य हुए. सतासी मिनट की इज़राइली फ़िल्म ‘<a href="http://www.imdb.com/title/tt1032856/" target="_blank">द बैंड्स विज़िट</a>’ बड़े सीधे लोगों की बड़ी <a href="http://www.cinematical.com/2008/02/08/review-the-bands-visit-jeffreys-take/" target="_blank">सीधी-सी कहानी है</a>. फ़िल्म का डिज़ाईन भी सरल व कॉमिक है, मगर इसी सरलता में बड़ी ऊंची व गहरी बातें घूमती रहती हैं. ओह, मन तृप्त हुआ.. <br /><br />मिस्त्र से एक नये अरब संस्कृति केंद्र के उद्घाटन के सिलसिले में इज़राइल पहुंचा <em>अलेक्सांद्रिया सेरेमोनियल पुलिस बैंड</em> के पुरनिया, सिंपलटन सिपाही अपनी बस से उतरने के बाद उत्साह में इंतज़ार कर रहे हैं कि उनकी अगवानी के लिए फूल लिये कोई दस्ता आयेगा. फूल तो क्या कोई बबूल लिये भी नहीं पहुंचता. ग्रुप के एक नौजवान सदस्य के भाषाई कन्फ़्यूज़न में दस्ता एक ऐसे सूनसान उजाड़ पहुंच जाता है जहां अरब हैं न संस्कृति. जगह ऐसी है कि रात गुजारने के लिए एक होटल तक नहीं. उस बियाबान में कुछ सीधे-टेढ़े स्थानीय चरित्र हैं, मजबूरी में जिनकी संगत में यह बेसुरा फूंक-फूंक के समय गुजारना है. और इस थोड़े से एक दिन के चंद घंटों के समय में ही उखड़े, बिखरे, बेमतलब हो गए लोगों की संगत में मानवीयता की हम एक प्यारी सी झांकी पा लेते हैं. <a href="http://www.youtube.com/watch?v=thBNR3Jp5ns&feature=related" target="_blank">यू ट्यूब पर फिल्म के ट्रेलर की एक झांकी</a> आप भी पाइए. <a href="http://www.indiewire.com/people/2008/02/indiewire_inter_135.html" target="_blank">एरान कॉलिनिन</a> की पहली फ़िल्म है. खुदा करे आगे भी वह ऐसी ही सरल व सन्न करते रहनेवाली फ़िल्में बनायें. <br /><br />एरान कॉलिनिन से <a href="http://www.emanuellevy.com/article.php?articleID=7289" target="_blank">एक और इंटरव्यू</a>..Pramod Singhhttp://www.blogger.com/profile/11952815871710931417noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-1655044654219612786.post-80553371611148024312008-02-15T12:15:00.004+05:302008-02-15T12:27:29.526+05:30मिथ्या<a href="http://bp2.blogger.com/_5ov4XIuU0i0/R7U3gmR9ofI/AAAAAAAACJs/dwFg_T0NoD8/s1600-h/mithya.jpg"><img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://bp2.blogger.com/_5ov4XIuU0i0/R7U3gmR9ofI/AAAAAAAACJs/dwFg_T0NoD8/s200/mithya.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5167097180648743410" /></a>डाइरेक्टर: <a href="http://www.imdb.com/name/nm0438494/" target="_blank">रजत कपूर</a><br />लेखन: रजत कपूर, सौरभ शुक्ला<br />कैमरा: <a href="http://www.imdb.com/name/nm0576456/" target="_blank">राफे महमूद</a><br />साल: 2008<br />रेटिंग: **<br /><br />मिथ्या के साथ एक बड़ा सच यह है कि फ़िल्म बड़ी ‘मीठी’ है. बेसिक कहानी व उसकी एब्सर्ड त्रासदी की बुनावट ऐसी है (<em>एक एक्टर क्या करे जब उसका अभिनय ही उसकी पहचान खा जाये?</em>) कि ढेरों कड़वाहट के मौके बनते हैं, लेकिन फ़िल्म उन कड़वाहटों में धंसती नहीं. बाजू-बाजू लुत्फ़ उठाती रहती है. डिटैचमेंट बना रहता है. तो मीठे के सुर का यह बेसिक कथात्मक बेसुरपना ही फ़िल्म का डिज़ाईन बनकर मिथ्या का बंटाधार कर देती है. <em>बात समझ में नहीं आई?</em> इससे ज़्यादा मैं समझा भी नहीं सकता. क्योंकि मिथ्या की मुश्किलों की इतनी ही समझ मेरी भी बन पा रही थी. लचर और ढीली फ़िल्म कहकर फ़िल्म से हाथ झाड़ लेने के आसान रास्ते पर मैं जाना नहीं चाहता. क्योंकि जिन्होंने रजत की दूसरी फ़िल्में देखी हों उनके रेफरेंस में फिर याद कर लेना चाहता हूं कि मिथ्या रजत की सबसे बेहतर फ़िल्म है- अपने क्राफ्ट पर कंट्रोल के लिहाज़ से. कहानी व उसे कहने के सुर का कंट्रोल नहीं है मगर शायद वह रजत की फिल्ममेकिंग है नहीं. आनेवाले समयों में भी दिखेगी, मुझे नहीं लगता. <br /><br />सस्ते में स्मार्ट फ़िल्ममेकिंग का जो रजत ने एक खास स्टाईल इवॉल्व किया है, वह काबिले-दाद है. मिथ्या में वह काफी रिफांइड लेवल की है. छोटे-छोटे सिनेमेटिक इंडलजेंसेस हैं जो कभी उसे फ्रेंच कॉमिक फ़िल्मों के पज़लिंग लोक में उतार देते हैं, तो कभी फ़िल्म में हल्के से कोई ‘बुनुएलियन’ टच चला आता है. नेहा धूपिया जैसी सपाट एक्टर फ्रेंच मिस्टीक अक्वायर किये रहती है, यह अपने में अचीवमेंट नहीं लेकिन अम्यूज़िंग ज़रूर है. <a href="http://www.imdb.com/name/nm1249116/" target="_blank">रणवीर</a> को एक्टिंग करते देखना और देखते रहने से पूरी फ़िल्म में आप कभी थकते नहीं. इतने थोड़े समय में टीवी पर डीजेगिरी करते हुए रणवीर ने एक्टिंग में जो हाई जंप्स लिये हैं वह हिंदी फिल्मों के संदर्भ में सचमुच बड़ा अचीवमेंट है. छोटे रोल में विनय पाठक, ब्रिजेंद्र काला समेत बाकी एक्टरों को देखना भी कंटिन्युसली एंटरटेन किये रहता है. कहानी के लोचे हैं, अग्रीड, लेकिन वह रजत के साथ हमेशा रहेंगे, अदरवाइस मिथ्या वैसी मिथ्या नहीं है जैसी बॉक्स ऑफिस की खिड़की पर नज़र आ रही है. <br /><br />सिर्फ़ कहानी देखने के लिए आप फ़िल्म देखनेवाले दर्शक न हों, और रजत की फ़िल्ममेकिंग में आपकी कुछ दिलचस्पी हो तो एक मर्तबा मिथ्या देख आइए. <strong>रेकमेंडेड</strong>.Pramod Singhhttp://www.blogger.com/profile/11952815871710931417noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-1655044654219612786.post-75742907506188221482008-01-31T09:10:00.000+05:302008-01-31T09:23:06.453+05:30संडे<a href="http://bp0.blogger.com/_5ov4XIuU0i0/R6FE-AidwBI/AAAAAAAACE8/qXss1FN-VCg/s1600-h/sunday.jpg"><img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://bp0.blogger.com/_5ov4XIuU0i0/R6FE-AidwBI/AAAAAAAACE8/qXss1FN-VCg/s200/sunday.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5161482480030433298" /></a>वर्ष: 2008<br />भाषा: हिंदी<br />लेखक: रॉबिन भट्ट और जाने कौन-कौन<br />डायरेक्टर: रोहित शेट्टी<br />रेटिंग: ?<br /><br /><strong>चिरकुटई</strong> की कोई सीमा होती है? बहुत बार हिंदी फ़िल्म देखते हुए लगता है नहीं होती. <a href="http://www.imdb.com/title/tt1039989/" target="_blank">संडे</a> देखते हुए कुछ ऐसी ही विरल अनुभूति हुई. सिनेमा हॉल में मालूम नहीं कितने अभागे (या सुभागे?) थे, छूटे हुए पटाखों की तरह हीं-खीं हंस रहे थे. मुंह ही से हंस रहे थे. हमें समझ नहीं आ रहा था कैसे और कहां से हंसें.. कस्बाई शादियों के बारात में दलिद्दर ऑर्केस्ट्रा के लौंडे हाथ में माइक थामे जो रोमांचकारी मनोरंजन मुहैय्या करवाते हैं, कुछ वैसा ही आह्लादकारी मनोरंजन रोहित शेट्टी की यह फ़िल्म ठिलठिला रही थी. डायरेक्टर के आदर्श काफी कॉस्मिक ऊंचाइयों को छूते कभी अब्बास-मुस्तान तो कभी अनीस बज़्मी जैसी उन्नत प्रतिभाओं के पीछे दौड़ती कला, कौशल और कॉमर्स की नयी मंज़िलें तय करती रहती है. डायरेक्टर और <strong>संडे</strong> लिखनेवालों की कल्पनाशीलता की ही तरह अजय देवगन की एक्टिंग भी लगातार दंग करती रहती है. चेहरे पर ऐसी-ऐसी सूक्ष्म अनुभूतियां आती हैं कि आदमी सोचने पर मजबूर हो जाये कि भई, भावप्रवण अभिनय का यह चरम तो सुनील शेट्टी के चेहरे पर कहीं ज्यादा इंटेंसिटी से एक्सप्रेस होता है! फ़िल्म के लगभग सभी ही डिपार्टमेंट ऐसी ही सूक्ष्म और उन्नत कलात्मक भागदौड़ मचाये रहते हैं.. आपका दिमाग उन्नत हो तो आप सीट पर बैठे-बैठे दौड़ते हुए वैसी ही उन्नतावस्था की हींहीं-ठींठीं में अपने दो घंटे सार्थक कर सकते हैं.. हमारी तरह फंसी दिमाग के मालिक हों तो फ़िल्म देखने से बचिये क्योंकि संडे आपकी नाक में दम कर सकता है.. नाक ही नहीं शरीर के अन्य हिस्सों की फंक्शनिंग भी दुलम कर सकता है..Pramod Singhhttp://www.blogger.com/profile/11952815871710931417noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-1655044654219612786.post-16343088670850527782008-01-27T21:12:00.000+05:302008-01-27T21:22:02.966+05:30रिज़र्वेशन रोड<a href="http://bp1.blogger.com/_5ov4XIuU0i0/R5ynSgidv9I/AAAAAAAACEc/j4C-qi8wDCE/s1600-h/reservation+road.jpg"><img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://bp1.blogger.com/_5ov4XIuU0i0/R5ynSgidv9I/AAAAAAAACEc/j4C-qi8wDCE/s200/reservation+road.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5160183209473720274" /></a>साल: 2007 <br />भाषा: अंग्रेजी <br />लेखक: जॉन बर्न्हम श्वॉटर्ज़ व टेरी जॉर्ज <br />निर्देशक: <a href="http://www.imdb.com/name/nm0313623/" target="_blank">टेरी जॉर्ज</a><br />रेटिंग: ** <br /><br /><strong>हमारी आत्मा</strong> में झांके फ़िल्म हमारे यहां इतना विकसित माध्यम नहीं. गाहे-बगाहे आंख में झांक जाये उतने से ही हम आत्मा जुड़ा लेते है. नहीं तो औसतन तो यही होता है कि ज़्यादा वक़्त किसी ‘<em>संडे</em>’, किसी ‘<em>वेलकम</em>’ की संगत में हेंहें-ठेंठें करते हैं और नहीं करनेवाले को बिना बोले नज़रों से जवाब देते हैं कि इसमें अजीब क्या है.. टेरी जॉर्ज़ की ‘<a href="http://www.imdb.com/title/tt0831884/" target="_blank">रिज़र्वेशन रोड</a>’ की यही खूबी है कि वह आत्मा में झांकती नहीं, फ़िल्माअवधि के अधिकांश में वहीं बनी रहती है. कभी इतनी-इतनी देर तक रहती है कि फ़िल्म के क़िरदारों के साथ हम भी वही तक़लीफ़ें और संत्रास जीने लगते हैं जिसने एक पारिवारिक दुर्घटना में उलझाकर एकदम से उनका धरातल बदल दिया है. बाज वक़्त लगता है त्रासदी में इन्वॉल्व्ड ये चरित्र हाड़-मांस की देह नहीं, मन:स्थितियों का विशुद्ध गैस और इमोशन हैं! थोड़ी नाटकीयता का रिस्क लेते हुए कहना चाहूंगा कि इन अर्थों में फ़िल्म के चरित्र जैसे लगातार एक दोस्तॉव्स्कीयन दुनिया में मूव करते रहते हैं. टेरी जॉर्ज़ की एक सबसे सराहनीय बात है कि कहानी की महानाटकीयता के बावजूद फ़िल्म कहीं भी नाटकीय लटकों में नहीं फंसती. फ़िल्म के शुरुआती दस मिनटों में अलबत्ता इस ख़तरे की आशंका होती है.. मगर उसके बाद की अवधि अच्छी, ईमानदार फ़िल्मों के भूखे दर्शक को खांटी सिनेमा से आश्वस्त करती है. अच्छे तो सब हैं लेकिन त्रासदी में सबसे ज्यादा उलझे चरित्रों को प्ले कर रहे जॉकिम फिनिक्स और मार्क रफ्फलो दोनों की एक्टिंग काफी इम्प्रेसिव है.. <br /><br />कंटेपररी समय में शहरी जीवन के मनोलोक के पारदर्शी सिनेमा में आपकी रुचि हो तो ‘<strong>रिज़र्वेशन रोड</strong>’ तक की एक कसरत आप भी कर आइए.Pramod Singhhttp://www.blogger.com/profile/11952815871710931417noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-1655044654219612786.post-82119132547084301912007-12-24T11:55:00.000+05:302007-12-24T12:27:59.968+05:30तारे ज़मीन पर<div align="justify"><a href="http://bp0.blogger.com/_5ov4XIuU0i0/R29RRMSvqzI/AAAAAAAAB98/7-quEJCkOTs/s1600-h/taare_zameen_par_3_1024x768.jpg"><img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5147422254907239218" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" src="http://bp0.blogger.com/_5ov4XIuU0i0/R29RRMSvqzI/AAAAAAAAB98/7-quEJCkOTs/s200/taare_zameen_par_3_1024x768.jpg" border="0" /></a><strong>अपने देश में</strong> नेकनीयती और साफ़गोई का ऐसा भयानक दलिद्दर है कि एक आदमी भीड़ से हटकर ज़रा भी अलग रास्ते पर पैर रखे ऐसा हल्ला होने लगता है मानो परमहंस का नया अवतार हो रहा हो, या गांधी बाबा नया आश्रम खोलनेवाले हों! फिर वह आदमी आमिर खान जैसा बड़ा, सेलेक्टिव स्टार हो तब तो कहना ही क्या. ‘<strong>तारे ज़मीन पर</strong>’ के रिलीज़ होने के साथ पत्रिकाओं में दो पेज़ के फीचर से लेकर कवर स्टोरी तक हर जगह अभी कुछ ऐसी ही छटा फैल गई और बनी रहनेवाली है कि फ़िल्म कैसी अद्भुत, और उसे सिरजनेवाली शख्सीयत कैसी अनोखी है! दिक़्क़त इन सुपरलेटिव्स की है, बाकी मामला दुरुस्त, स्वस्थ्य, खुशग़वार है. ‘तारे ज़मीन पर’ में तारे भी हैं और साफ़-सुथरी ज़मीन भी. आमिर खान की पहली डायरेक्टोरियल कोशिश है तो उसे ज़रा ऊंची आवाज़ में ताली सुनने का हक़ बनता भी है..<br /><br />आमिर पॉपुलर सिनेमा के आदमी हैं और पॉपुलर सिनेमा की उनकी जो, जैसी समझ होगी उस पैरामीटर्स में कंसिस्टेंट रहते हुए आमिर ने एक ठीक-ठाक मनोरंजक और समझदार फ़िल्म बनाई है. <strong>दर्शील सफारी</strong> एक सुलझा और समझदार बच्चा है. पारंपरिक रूप से सफल बच्चे जो सबकुछ कर सकते हैं, उन्हें न कर पाने के तनाव और दबाव में जीवन के साथ उसके संबंध व दुनिया को देखने के उसके अंदाज़ के मोह में हम गिरफ़्तार बने रहते हैं, और मनोरंजक तरीके से बने रहते हैं. फ़िल्म का फर्स्ट हाफ लगभग दर्शील के कौतुक देखते, उनमें उलझे कैसे गुजर जाती है आपको ख़्याल भी नहीं रहता. इंटरवल में आमिर की एक हें-हें, ठें-ठें गाने के साथ एंट्री होती है और हीरो की चिंताओं को एस्टेबलिश करने के चक्कर में स्क्रिप्ट फ़िल्म के असल नायक दर्शील को काफ़ी वक़्त तक चुप करा देती है. ठेंठे वाले गाने के बाद परेशान बच्चे के बारे में परेशान होता आमिर का राम शंकर निकुंभ एकदम-से गंभीर हो जाता है और फ़िल्म का यह तीस-चालिस मिनट का ‘आमिरी’ समय उतना एंटरटेनिंग नहीं, उसके बाद फ़िल्म फिर अपना लय पकड़ती है और आखिर तक पकड़े रहती है. अंतिम क्षणों के करीब सिनेमा हॉल के अंधेरे में ज़रा-सी मानवीयता कैसे बचाये रखी जाये के लिए आंसू बहाते हुए हम भोले, भावुक दर्शक क्षणिक तौर पर सुखी बन जाते हैं.<br /><br /><strong>दर्शील सफारी</strong> फ़िल्म की उपलब्धि है. उसकी स्वाभाविकता, स्पॉंटेनिटी, उसकी मैच्यूर समझदारी- सब. फिल्म के काफी सारे हिस्से काफी ढंग से लिखे और एक्ट भी किये गए हैं. दर्शिल का स्कूल बंक करके आवारा भटकना और दर्शिल के पैरेंट्स से मिलने निकले आमिर की सड़क यात्रा छोटे, दिलचस्प सिनेमेटिक मोमेंट बनते हैं. हालांकि दर्शिल के पिता और बोर्डिंग के अध्यापकों को विलेन बनाने के कैरिकेचर से बचा जाता तो शायद फ़िल्म और उम्दा बनती. गाने कहानी में ठीक से गुंथे हुए हैं और उनके साथ अच्छी बात है कि उनमें ऑर्केस्ट्रेशन का हल्ला नहीं है. उनमें एक कथात्मकता है लेकिन बुरी बात यह भी है कि उनमें मेलॅडी की अमीरी नहीं. तो अपने खत्म होने के साथ वे उतनी ही आसानी से भुला भी दिये जाते हैं. शायद यह एक कॉंशस प्रयोग हो और खुद में ऐसी बुरी बात न भी हो. सेतु का कैमरावर्क अच्छा, फ्रेंडली, एक्सेसिबल और कल्पनाशील है. वैसा ही प्रॉडक्शन डिज़ाईन और एनिमेशन का इस्तेमाल भी. अपने व अपने बच्चे पर उखड़ने के बाद आप जाकर फिल्म देख आयें, गिनकर पांच दफ़ा आंख के कोनों पर नमी महसूस करें, देखिए, मज़ा आयेगा. इससे अलग काम की एक और बात. . जहां तक अपने यहां समस्या-प्रधान चरित्रोंवाली संजय भंसाली की 'ब्लैक' टाइप फ़िल्मों की बात है, 'तारे ज़मीन पर' उससे दस नहीं तीस कदम आगे है और सिर्फ़ इसी बिना पर उसे मुहब्बत से देखी जानी चाहिए. </div>Pramod Singhhttp://www.blogger.com/profile/11952815871710931417noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-1655044654219612786.post-50866831234317000572007-12-23T11:13:00.000+05:302007-12-23T11:21:18.557+05:30दो फ़िल्म और आधी..<span style="font-size:130%;color:#990000;">Two and Half Films…</span><br /><br /><a href="http://bp3.blogger.com/_5ov4XIuU0i0/R232pcSvqyI/AAAAAAAAB90/yHE8aayiAdc/s1600-h/manorama.JPG"><img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5147041140984228642" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" src="http://bp3.blogger.com/_5ov4XIuU0i0/R232pcSvqyI/AAAAAAAAB90/yHE8aayiAdc/s320/manorama.JPG" border="0" /></a>Having been stuck by monetary troubles, later on rescued and taken to theatres by UTV ‘<strong>Khosla ka Ghosla</strong>’ (2006) is quite an amusing and titillating film about life and living in Delhi. Other than the last half an hour or so when the elder son plans and executes to get back the money stolen from his family by the baddie land mafia, the film runs pretty smoothly with nice character etchings and intelligent dialogues. Till date the six films that <strong>Jaideep Sahni</strong> has written, three (Company, Chak de! India and Khosla ka Ghosla) are quite decent accomplishment. Even actors do their part pretty all right. Its first film for director Dibakar Banerjee. We should hope to see more interesting outputs from him in coming years.<br /><br />The second film, ‘<strong>Manorama Six Feet Under</strong>’ is a also a first film for director <strong>Navdeep Singh</strong> written with Devika Bhagat. Though considering it to be a thriller, the writing could have been more tight and intriguing. Writers mix up the laid back set-up with the story telling as well and the ploy kills the viewers’ interest for the whole two-third of the film. The film moves tiredly and a flat performance by Abhay Deol hardly infuses with any warmth or intelligence. Though it’s a pleasing to watch Vinay Pathak, Gul Panag and Raima Sen in cameo roles. The camerawork by Arvind Kannabiran is very impressive. But watching the film one feels one is in company of a good and sensitive director. Lets wait and see what twists and turns Navdeep gives us in future.<br /><br />The remaining half film that I am going to write about is not by a first timer. Its more expensive, more ambitious but after first three minutes or so, one realizes its going to be a hopeless journey. In fact it doesn’t even become any journey as it just refuses to go anywhere. Whatever the prmos, producer say or media blabbers about, the film doesn’t have a story. It doesn’t even have a sequence worth mentioning about. The whole thing is just a compilation of glossy images hopelessly going nowhere. Well, it’s pretty ‘<strong>Khoya Khoya…</strong>’ whatever.<br /><br /><em>By <strong>Jainarain</strong></em><strong> </strong>Pramod Singhhttp://www.blogger.com/profile/11952815871710931417noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-1655044654219612786.post-89123645205898025122007-12-11T22:24:00.000+05:302007-12-11T22:43:48.290+05:30कॉफ़ी एंड सिगरेट्स..<a href="http://bp0.blogger.com/_5ov4XIuU0i0/R17E0psyYhI/AAAAAAAAB5Y/Wwnmm8qBNB4/s1600-h/jim+jarmusch+and+tom+waits.jpg"><img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5142764233329631762" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" src="http://bp0.blogger.com/_5ov4XIuU0i0/R17E0psyYhI/AAAAAAAAB5Y/Wwnmm8qBNB4/s200/jim+jarmusch+and+tom+waits.jpg" border="0" /></a>पोलिश मूल के अमरीकी <a href="http://www.sensesofcinema.com/contents/directors/03/jarmusch.html" target="_blank">जिम जारमुश</a> ने न्यूऑर्क फ़िल्म स्कूल में पढ़ाई के दौरान ही अपने हिस्से की शॉर्ट फिल्म को 15,000 डालर्स के फिसड्डी बजट में एक फीचर की तरह शूट किया ().. पढ़ाई के बाद कुछ वक़्त फ्रांस में गुजारने के बाद जब वापस अमरीका लौटे तो विम वेंडर्स को शूटिंग करते हुए पकड़ा, अपनी फिल्म की शूटिंग में बझे वेंडर्स से रॉ स्टॉक हासिल किया और 1984 में अपनी पहली व्यवस्थित फ़िल्म बनाई- ‘<a href="http://www.filmsinreview.com/FilmReviews/DVDs/stp.html" target="_blank">स्ट्रेंजर देन पैराडाइज़</a>’- जो कान में कैमरा दा’र के पुरस्कार से पुरस्कृत हुई. अस्सी के शुरूआत से सिनेमा में सक्रिय जारमुश मुख्यधारा से बाहर उन फ़िल्मकारों में हैं जो अब भी काली-सफ़ेद फ़िल्मों को जिंदा रखे हुए हैं. आइए, उनकी फीचर ‘<a href="http://www.imdb.com/title/tt0379217/" target="_blank">कॉफ़ी एंड सिगरेट्स</a>’ (2003) की कुछ क्लिपिंग्स देखते हैं..<br /><br />फ़िल्म का <strong>पहला एपिसोड</strong>:<br /><br /><embed src="http://www.youtube.com/v/ggqrEMtA3TU&rel=" width="425" height="355" type="application/x-shockwave-flash" wmode="transparent"></embed><br /><br /><strong>टॉम वेट्स और इगी पॉप एपिसोड</strong>:<br /><br /><embed src="http://www.youtube.com/v/K6Mw6b1T50U&rel=" width="425" height="355" type="application/x-shockwave-flash" wmode="transparent"></embed><br /><br /><strong>कज़न्स एपिसोड</strong>. एक सफल एक्टर की ज़रा अपने प्रति सुरक्षा देखिए:<br /><br /><embed src="http://www.youtube.com/v/x9-F-Izif3Y&rel=" width="425" height="355" type="application/x-shockwave-flash" wmode="transparent"></embed><br /><br /><strong>मोर कज़न्स</strong>:<br /><br /><embed src="http://www.youtube.com/v/VjEvS7ZlvsA&rel=" width="425" height="355" type="application/x-shockwave-flash" wmode="transparent"></embed><br /><br /><strong>जुड़वां एपिसोड</strong>:<br /><br /><embed src="http://www.youtube.com/v/H2MyCmRrCaQ&rel=" width="425" height="355" type="application/x-shockwave-flash" wmode="transparent"></embed><br /><br />नेट पर <a href="http://film.guardian.co.uk/Guardian_NFT/interview/0,,110607,00.html" target="_blank">यहां</a> <strong>द गार्जियन</strong> का लिया जारमुश का एक <strong>इंटरव्यू</strong>.<br /><br /><span style="font-size:85%;">(<em>ऊपर टॉम वेट्स के साथ जिम जारमुश</em>)</span>Pramod Singhhttp://www.blogger.com/profile/11952815871710931417noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-1655044654219612786.post-85290298992656295582007-12-08T14:10:00.000+05:302007-12-08T14:20:39.905+05:30पुरानी फ़िल्म रीविजिटेड..<a href="http://bp1.blogger.com/_5ov4XIuU0i0/R1pajhs7RiI/AAAAAAAAB1k/AxsHwC-6J3Y/s1600-h/rajnigandha.JPG"><img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://bp1.blogger.com/_5ov4XIuU0i0/R1pajhs7RiI/AAAAAAAAB1k/AxsHwC-6J3Y/s200/rajnigandha.JPG" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5141521490985567778" /></a><strong>बचपन में देखी</strong>, और देखकर लहालोट हुई फ़िल्मों पर दुबारा लौटना, देखना ख़तरनाक खेल है. अब तक मेरा अनुभव तो यही रहा है (हो सकता है सिनेमा से ज़रा ज़्यादा जुड़े रहने और उसके विविध पहलुओं की छांट-छटाई के स्वाभाविक अभ्यास ने यह ‘खेल’ मेरे लिए थोड़ा ज्यादा निर्मम बना दिया हो, मगर कमोबेश ऐसे अनुभव अन्य लोगों को भी हुए ही होंगे. फिर, यह भी सच है कि कुछ फ़िल्में- इसलिए कि उनकी फ़िल्ममेकिंग विशिष्ट है- सदाबहार बनी भी रहती हैं). ख़ैर, मैं बचपन की देखी फ़िल्मों के ‘री-विजिट’ के ख़तरों की बाबत कह रहा था. और विनम्रता के साथ ज़ोर देकर कहना चाह रहा हूं कि इन मान्यताओं को किसी व्यक्ति या काम-विशेष के विरूद्ध न समझा जाये. तो पहले भी ऐसे मौके आये थे. राजेश खन्ना और नन्दा की एक थ्रिलर थी, ‘<strong>द ट्रेन</strong>’. बचपन में देखने पर बड़ा मज़ा आया था कि क्या धांसू स्टंट हैं, कहानी का कसाव है इत्यादि-इत्यादि. गाने तो बढ़िया थे ही (<em>गुलाबी आंखें जो तेरी देखीं शराबी ये दिल हो गया; किसलिए मैंने तुझे प्यार किया, किसलिए इक़रार किया, सांझ-सबेरे तेरी राह देखी</em>), बहुत वर्षों बाद कहीं से सीडी लेकर फ़िल्म लगाई, फिर वही मज़ा लेने की कोशिश की तो हाथ-पैर फूलने लगे! चेतन आनंद ने इन्द्राणी मुखर्जी और राजेश खन्ना के साथ एक फ़िल्म की थी- <strong>आख़िरी ख़त</strong>, चेतन साहब का अपना ‘<em>बेबीज़ डे आऊट</em>’. गाने उसमें भी मस्त थे- <em>बहारों मेरा भी जीवन संवारो</em>, भूपिंदर का ‘<em>रुत जंवा, जवां, रात मेहरबां</em>’), बचपन में खूब आंखें गीली हुई थीं, दुबारा देखने पर चेतन साहब की पूरी फिल्ममेकिंग रहस्यवाद लग रही थी. लग रहा था कैमरा चालू करने के बाद भूल गए हों कि इन द फ़र्स्ट प्लेस चालू किया क्यों था और चालू कर दिया तो ‘कट’ जैसी कोई चीज़ बोली भी जाती है!<br /><br />ओपी रल्हन एक कॉमेडियन हुआ करते थे, धर्मेंद्र और मीना कुमारी को लेकर एक सोशल ड्रामा बनायी थी (डायरेक्ट्रियल डेबू)- <strong>फूल और पत्थर</strong>. धमाल फ़िल्म थी, धमाल चली भी थी. दुबारा प्लेयर पर चढ़ाने के बाद हमसे दस मिनट चलाते नहीं चली. इस श्रृंखला में और नाम हैं- मनोज कुमार की ‘<strong>पहचान</strong>’ (<em>बस यही अपराध हर बार करता हूं, आदमी हूं आदमी से प्यार करता हूं</em>.. <strong>पाक़िज़ा</strong> को फेल करके उस साल फिल्मफेयर के अवार्ड्स हथियानेवाली फिल्म पहचान ही थी!), चेतन आनंद की ‘<strong>हंसते ज़ख़्म</strong>’, विजय आनंद की ‘<strong>तेरे मेरे सपने</strong>’, यश चोपड़ा की ‘<strong>इत्तेफ़ाक</strong>’, कि कभी मज़ा आया था लेकिन दुबारा देखने पर क्यों मज़ा आया था का सवाल पहेली बनकर रह गया. यही बात विमल राय की ‘<strong>मधुमती</strong>’, ‘<strong>देवदास</strong>’, के आसिफ के ‘<strong>मुग़ले-आज़म</strong>’ और साऊथ की ‘<strong>राम और श्याम</strong>’ और रमेश सिप्पी के ‘<strong>शोले</strong>’ देखने पर नहीं होता. मगर कल फिर खेल में फंस गया और मुंह की खायी. <br /><br />जब आयी थी तो मैंने ही नहीं, बहुतों ने आनन्द लिया था और फिल्म को हिट बनायी थी. <strong>बासू चटर्जी</strong> की ‘<strong>रजनीगंधा</strong>’. <strong>मन्नू भंडारी</strong> की कहानी ‘<em>यही सच है</em>’ पर आधारित अमोल पालेकर और विद्या सिन्हा की पहली, प्रेम त्रिकोण फिल्म (1974). कल फिल्म दुबारा देखना हुआ तो मन में बार-बार यही बात आ रही थी कि कुछ फिल्में अपने समय का मिज़ाज भले पकड़ती हों, होती निहायत ‘डेटेड’ हैं, और बतौर फिल्म उनका भविष्य नहीं होता! माने स्क्रिप्ट और संवाद ऐसे थे कि उसे पढ़ने का ख़्याल आते बोरियत होने लगे. बहुत सारे संवाद दो नहीं, लगता था चार-चार बार बोले जा रहे हैं. फिर हंसी और उदासी के बने-बनाये चार एक्सप्रेशंस. <strong>केके महाजन</strong> का कैमरा वर्क ऐसा मानो आज के सीरियल एपिसोड की फिल्म बारह दिन में छापने की हड़बड़ी हो. कोई कल्पनाशीलता नहीं. सब बड़े सीधे-सपाट इमेज़ेस. कभी-कभी <strong>सलिल चौधरी</strong> के बैकग्राउंड स्कोर और मुकेश का ‘<em>कई बार यूं ही देखा है..</em>’ से अलग पूरी कसरत अब एक भयानक थकान की तरह याद रहनेवाली है. जय हो बचपन की मधुर स्मृतियां..Pramod Singhhttp://www.blogger.com/profile/11952815871710931417noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-1655044654219612786.post-60012039895134221042007-12-06T09:48:00.000+05:302007-12-06T10:01:20.947+05:30प्यार करने के ख़तरनाक नतीजे..<a href="http://bp3.blogger.com/_5ov4XIuU0i0/R1d5sxs7RZI/AAAAAAAAB0g/hA8CeOWeXaE/s1600-h/Voksne_mennesker.jpg"><img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://bp3.blogger.com/_5ov4XIuU0i0/R1d5sxs7RZI/AAAAAAAAB0g/hA8CeOWeXaE/s200/Voksne_mennesker.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5140711309829686674" /></a><strong>सत्तर के दशक</strong> के <strong>फ्रंचेस्को रोज़ी</strong>, <strong>बेर्तोलुच्ची</strong> के इतालवी सिनेमा का वर्तमान बेहद निराशाजनक है. पिछले तीसेक वर्षों से रहा है. मोनिका बेलुच्ची और <a href="http://www.imdb.com/name/nm0868153/" target="_blank">जुसेप्पे तोरनातोरे</a> के सेंसुअस सिनेमा (‘<strong>इल चिनेमा परादिज़ो</strong>’, ‘<strong>मलेना</strong>’) ने भले अपने चहेते बनाये हों, आठवें दशक की शुरुआत से- <a href="http://www.imdb.com/name/nm0604335/" target="_blank">नान्नी मोरेत्ती</a> और <a href="http://www.imdb.com/name/nm0546510/" target="_blank">फ्रांको मरेस्को</a> व <strong>दनियेले चिप्री</strong> जैसे चंद नामों से अलग शायद ही ऐसे इतालवी निर्देशक बचे हों, फ़िल्म-लुभैयों की अंतर्राष्ट्रीय बिरादरी जिसका बेसब्री से इंतज़ार करती हो. जो कुछेक महत्वपूर्ण काम हुआ है, सब मुख्यधारा और रोम के दक्षिण में हुआ है. साऊथ का सिसिलियन कनेक्शन. प्राचीनता की जड़ों व उत्तर-औद्योगिक समाज के पेचिदे रिश्तों की अपने-अपने तरीकों से, इतमिनान से पड़ताल करता सिनेमा. दक्षिण के इन नये निर्देशकों में <a href="http://www.imdb.com/name/nm0815204/" target="_blank">पाओलो सोर्रेंतिनो</a> भी एक ख़ास नाम है (पैदाइश नेपल्स, 1970). अब तक छह फ़िल्में बनाई हैं. मैंने जो देखी, ‘<a href="http://www.imdb.com/title/tt0398883/" target="_blank">द कन्सिक्वेंसेज़ ऑव लव</a>’ (अंतर्राष्ट्रीय अंग्रेजी शीर्षक) वह 2004 में बनाई थी. रोमन भराव के मध्य अकेलापन. प्रेम का अकाल और प्रेमजन्य दुस्साहस की धीमे-धीमे बुनती सनसनियों के आधुनिक बिम्ब. <br /><br />पिछले दिनों मिली-जुली कुछ और फ़िल्में देखीं. 1973, पैरिस, फ्रांस में जन्मे डैनिश सिनेकार <strong>दागुर कारि</strong> की 2005 में बनाई ‘<a href="http://www.imdb.com/title/tt0408318/" target="_blank">डार्क हॉर्स</a>’ (अंतर्राष्ट्रीय अंग्रेजी शीर्षक). कुछ-कुछ जिम जारमुश की काली-सफ़ेद फ़िल्मों के असर वाली कारि की फ़िल्म ज्यादा सरल व कॉमिक है. साधारणता का औसत जीवन जीते नायक की छोटी-छोटी अस्तित्ववादी परेशानियां एक खूबसूरत ग्राफ़ खड़ा करती हैं. <br /><br />फिर <strong>ऑरसन वेल्स</strong> की ‘<a href="http://www.criterion.com/asp/release.asp?id=322&eid=470§ion=essay" target="_blank">मिस्टर अर्काडिन</a>’. लम्बी अवधि तक शूटिंग व हॉलीवुड स्टुडियो के टंटों में फंसी रही मुश्किल और परतदार फ़िल्म (जैसीकि वेल्स की फ़िल्में होती हैं. बहुतों को बहुत अच्छी लगती है तो ऐसे भी ढेरों स्वर हैं जो अर्काडिन को ‘<strong>सिटिज़न केन</strong>’ का कमतर ऑफ़शूट बताते हैं. पर्सनली मेरे लिए अच्छी कसावट की अच्छी वेल्सियन फ़िल्म. <br /><br />जर्मनी के <strong>हरज़ोग</strong> की 1977 की ‘<a href="http://www.imdb.com/title/tt0075276/" target="_blank">स्त्रोज़ेक</a>’. दो लात खाये चरित्रों का इस उम्मीद में अमरीका पलायन कि वह उन्हें अमीर व सुखी कर देगा. फिर सपनों के देश का दु:स्वप्न में बदलना. टिपिकल, रिच हर्जोगियन ईनसाइट.Pramod Singhhttp://www.blogger.com/profile/11952815871710931417noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-1655044654219612786.post-23220014207770597842007-12-01T19:59:00.000+05:302007-12-06T10:09:27.105+05:30माइकल मूर की सिको<a href="http://bp3.blogger.com/_5ov4XIuU0i0/R1Fx-Rs7RPI/AAAAAAAABzQ/rG9b_quyuLI/s1600-R/SiCKO_GLOVE.jpg"><img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://bp3.blogger.com/_5ov4XIuU0i0/R1Fx-Rs7RPI/AAAAAAAABzQ/PeiJvxI6kJY/s200/SiCKO_GLOVE.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5139013964524111090" /></a>साल: 2007<br />भाषा: अंग्रेजी<br />लेखक-निर्देशक: <a href="http://www.michaelmoore.com/" target="_blank">माइकल मूर</a><br />रेटिंग: ***<br /><br /><strong>बहुत बार गांव में रहनेवाला व्यक्ति</strong> बाहरी संसार को सिर्फ़ किवदंतियों और उड़ी हुई सूचनाओं के सहारे जानता है. बाहरी जगहों की झूठी कहानियां ही उसका निजी यथार्थ बनी रहती हैं. माइकल मूर अपनी ताज़ा डॉक्यूमेंट्री ‘<a href="http://www.michaelmoore.com/sicko/about/synopsis/" target="_blank">सिको</a>’ में समूचे अमरीकी मानस को एक ऐसे बड़े गांव की ही तरह दिखाते हैं.. जहां सरकार (निक्सन के ज़माने से) और राक्षसी मेडिकल इंश्युरेंस कॉरपोरेशंस की मिली-भगत से हेल्थ केयर के क्षेत्र में साधनहीन तो दूर, ठीक-ठाक मध्यवर्गीय परिवार भी अपनों को कुत्तों की मौत मरता देख रहे हैं और स्तब्ध हैं.. मगर आधुनिक जीवन के इस दुश्चक्र से बाहर आने का जिन्हें विकल्प नहीं दिखता.. जबकि अमरीका के ठीक पड़ोस कनाडा में हेल्थ केयर हर नागरिक के लिए मुफ्त है (मूर कनाडा के बाद हमें इंग्लैण्ड और फ्रांस घुमाते हैं, और दिखाते हैं कि वहां भी कनाडा की ही तरह नागरिकों के स्वास्थ्य का जिम्मा सरकार है, और सेवायें मुफ़्त है).. जबकि एक आम अमरीकी की पारंपरिक नज़र में कनाडा, इंग्लैण्ड, फ्रांस अमरीका की तुलना में हास्यास्पद मुल्क हैं.. क्यों? फिल्म के बीच कहीं मूर मज़ेदार सवाल करते हैं, कहीं इसीलिए तो नहीं कि हमारे शासक नहीं चाहते कि हम इन मुल्कों के अच्छे पहलू देखें और अपने जीवन में उसकी कामना करें?.. <br /><br />दो घंटों की इस बड़ी डॉक्यूमेंट्री में, जैसाकि मूर की अन्य फ़िल्मों के साथ भी है, ख़ास रवानी और रोचकता बनी रहती है. बीच-बीच में ऐसे हिस्से आते हैं ठहरकर सोचने का मन करे. फ़िल्म में एक दृश्य है जब एक बड़ा कॉरपोरेट अस्पताल पैसा भर पाने में लाचार मरीजों को गाड़ियों में भर बाहर सड़क पर ठेल आता है. वॉयस-ओवर में मूर सवाल करते हैं: <em>“May I take a minute to ask a question that has been on my mind? Who are we? Is this what we've become? A nation that dumps its own citizens like so much garbage on the side of the curb, because they can't pay their hospital bill?... आगे कहते हैं: “I always thought and believe to this day that we're good and generous people. This is what we do when somebody's in trouble.. They say that you can judge a society by how it treats those who are the worst-off. But is the opposite true? That you can judge a society by how it treats its best? Its heroes?”</em> <br /><br />अमरीकी भलमनसी की तस्वीरों से होती हुई फ़िल्म कुछ उन आम फायर फाइटरों के जीवन में झांकती है जिन्होंने 9/11 के दरमियान महीनों मलबों के भीतर जनसेवा में गुजारे थे, मलबों के भीतर गुजारे समय के असर में पांच वर्षों बाद अब जब वे अजीबो-गरीब बीमारियों से ग्रस्त हैं तो सरकार ने उनकी किसी भी तरह की मदद से हाथ खींच लिए हैं. आतंकवादियों के रख-रखाव वाला सबसे बड़ा अड्डा ग्वांतानामो बे में बीमारों की देखरेख के लिए सब सुविधाएं हैं, सरकार ने इसका विशेष इंतज़ाम किया है, लेकिन 9/11 के आम हीरोज़ को उसने उनके हाल पर छोड़ दिया है.. <br /><br />एक अच्छे एक्टिविस्ट फ़िल्ममेकर की तरह मूर यहां एक मज़ेदार काम करते हैं. ऐसे इन सारे मरीजों को किराये की तीन नावों में लाद सीधे ग्वांतानामो बे पहुंचते हैं कि भइया, ख़ासम-खास आतंकवादियों की देखभाल कर रहे हो तो अपने हीरोज़ की भी करो! जब ग्वांतानामो में दाल नहीं गलती तो मूर एक और नाटकीय कदम उठाते हैं.. सीमावर्ती जल से लगे वहीं से क्यूबा में प्रवेश करते हैं.. वहां जाने पर एक और मज़ेदार बात खुलती है कि वहां भी स्वास्थ्य सेवा मुफ्त है, और जिस एक खास दवा के लिए मरीज़ 120 डॉलर भर रहा था, वहां वह महज 6 सेंट में उपलब्ध है! <br /><br />क्यों है अमरीका में मेडिकल जायंट कॉरपोरेशंस का ऐसा दबदबा, खौफ़, खुली लूट? अपने नागरिकों के साथ सरकार का दो कौड़ियों का व्यवहार? सिर्फ़ इसीलिए कि लुटेरों से उसकी सीधी मिली-भगत है, या इसलिए भी अमरीकी सिस्टम अपने नागरिकों को हमेशा खौफ़ और आतंक के माहौल में रखती है? <strong>टॉनी बेन</strong>, पूर्व इंगलिश सांसद, नेशनल हेल्थ केयर का इतिहास किस्सा बताते हुए एक जगह लोकतंत्र के बारे में दिलचस्प टिप्पणी करते हैं- <em>“I think democracy is the most revolutionary thing in the world. Far more revolutionary than socialist ideas, or anybody else's idea. But if you have power, you use it to meet the needs of your community. And this idea of choice that Capitalism talks about all the time, ‘you gotta have a choice’, Choice depends on the freedom to choose. And if you're shackled in debt, you don't have a freedom to choose. It seems that it benefits the system, If the average working person is shackled and is in debt? Yes, because people in debt become hopeless, and hopeless people don't vote. See, they always say that everyone should vote But I think, if the poor in Britain or the United States turned out and voted for people representing their interests, it would be a real democratic revolution. So they don't want it to happen."</em><br /><br /><strong>माइकल मूर का सिको संबधी एक इंटरव्यू:</strong><br /><br /><object width="425" height="355"><param name="movie" value="http://www.youtube.com/v/n_QoffvYQpw&rel=1"></param><param name="wmode" value="transparent"></param><embed src="http://www.youtube.com/v/n_QoffvYQpw&rel=1" type="application/x-shockwave-flash" wmode="transparent" width="425" height="355"></embed></object>Pramod Singhhttp://www.blogger.com/profile/11952815871710931417noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-1655044654219612786.post-8792789845136713772007-11-28T02:36:00.000+05:302007-11-28T02:56:50.103+05:30जब वी मेट रीविसिटेड..<em>by <strong>Jainarain</strong></em><br /><br /><a href="http://bp0.blogger.com/_5ov4XIuU0i0/R0yIxXwhQpI/AAAAAAAAByI/64dn6t1R418/s1600-h/jwm1_01.jpg"><img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://bp0.blogger.com/_5ov4XIuU0i0/R0yIxXwhQpI/AAAAAAAAByI/64dn6t1R418/s320/jwm1_01.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5137631656695382674" /></a><strong>"Jab We Met"</strong> is not about real life and real situations, but whenever the mainstream Hindi films are? Besides, anyways, films are not about real life.. they just happen to carry some illusions to the kind of reality we know.. that even JWM does. But it’s not a good film for a regular film-buff, meaning it’s loaded with patchy stuffs—bad songs, badly acted cameo scenes, shoddy tidbits here and there. Then what’s good about it? Well, going by the current mumbo-jumbo fiesta of “<a href="http://nirmal-anand.blogspot.com/2007/11/blog-post_11.html" target="_blank">Sawaria</a>” and “<a href="http://nirmal-anand.blogspot.com/2007/11/blog-post_15.html" target="_blank">Om Shanti Om</a>”, JWM is prettily written script, with lots of interesting conversation between a boy and a girl... And Kareena generally, and Shahid for the last forty minutes of the film, invest it with shiny performances, where one really stays hooked to of how they are going to handle their heart… <br /><br />There are touching moments of emotional ambiguities (the way they really are in life), uncertainty, hurt and happiness the way you hardly see them in a conventional Hindi movie… thinking all this one feels good that the audience has lapped it up and the film is making money.Pramod Singhhttp://www.blogger.com/profile/11952815871710931417noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-1655044654219612786.post-84731235319434191662007-10-30T20:20:00.000+05:302007-10-30T20:32:44.402+05:30नो स्मोकिंग<a href="http://bp2.blogger.com/_5ov4XIuU0i0/RydF1F_BpFI/AAAAAAAABuQ/2DMx8WRG7Ns/s1600-h/ns.jpg"><img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5127143479226508370" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" src="http://bp2.blogger.com/_5ov4XIuU0i0/RydF1F_BpFI/AAAAAAAABuQ/2DMx8WRG7Ns/s200/ns.jpg" border="0" /></a><br /><br />साल: २००७<br />भाषा: हिन्दी<br />लेखक/ निर्देशक: अनुराग कश्यप<br />रेटिंग:*<br />अवधि: १२० मिनट<br /><br /><br /><a href="http://passionforcinema.com/author/anurag/">अनुराग कश्यप</a> की <a href="http://www.imdb.com/title/tt0995740/">नो स्मोकिंग </a>बॉक्स ऑफ़िस पर बुरी तरह फ़्लॉप है। मुझको और मेरे मित्र को मिलाकर आज दोपहर के शो में कुल आठ लोग थे। किसी भी फ़िल्मकार के लिए दुःखद है यह, और खासकर अनुराग के लिए तो और भी जिन्हे मैं बहुत ही काबिल फ़िल्मकार मानता हूँ। उनकी फ़िल्म ब्लैक फ़्राईडे को मैं पिछले सालों में देखी गई सबसे बेहतरीन फ़िल्म समझता हूँ। मगर नो स्मोकिंग निराशाजनक है। एक स्वर से सभी समीक्षकों ने इसे नकार दिया है और दर्शको का हाल तो पहले ही कह दिया।<br /><br /><a href="http://bp3.blogger.com/_3Daz3CsJg_0/Ryc46sFEe0I/AAAAAAAAA0o/BqzGp4eLaeQ/s1600-h/no+smoking.jpg"></a>कहा जा रहा है कि अनुराग की अतिरंजना है यह फ़िल्म- इनडलजेंस। सत्य है आंशिक तौर पर। मगर उच्च कला, कलाकार की अतिरंजना ही होती है। जहाँ कलाकार सिर्फ़ और सिर्फ़ अपनी कल्पित संसार के प्रति प्रतिबद्ध होता है, और दूसरे के लिए उसका संसार कितना सुगम होगा इसकी चिंता नहीं करता। मेरा निजी खयाल तो यह है कि अनुराग अपनी अतिरंजना के स्तर एक तल और ऊपर ले जाते तो शायद फ़िल्म बेहतर बनती। अभी यह बीच में कहीं अटक गई है। ना तो यह अपने सररियल ट्रीटमेंट के कारण दर्शकों की एक सीधी सादी कहानी सुनने की भूख को पूरा करती है और न ही यथार्थ के बहुस्तरीय स्वरूप की परतें को अपनी बुनावट में उघाड़ने का कोई प्रयत्न। उलटे एक सरल रूपक के चित्रण में नितान्त एकाश्मी बनी रहती है। जिसकी वजह से सामान्य दर्शक और कला प्रेमी दोनो ही मुतमईन नहीं होते। फ़िल्म की असफलता इस बात में नहीं है कि यह आम दर्शक के लिए कुछ ज़्यादा जटिल बन गई या वित्तीय पैमाने पर चारों खाने चित है बल्कि अपने मूल मक़सद- अपने दर्शक तक अपने संदेश का अपनी कलात्मक एकता में संप्रेषण- में नाकामयाब रही है।<br /><br />अपनी असफलता के बावजूद अनुराग ने हिस्सों में अच्छा प्रभाव छोड़ा है। बाबा बंगाली के पाताल-लोक का चित्रण देखने योग्य है। पर उनका आरम्भिक और आखिरी उजबेकी बरफ़ीले मैदानों का स्वप्न कोई प्रभाव नहीं छोड़ता। खैर! अब उनकी अगली फ़िल्म का इंतज़ार रहेगा।<br /><br /><em><strong>-अभय तिवारी</strong></em>Pramod Singhhttp://www.blogger.com/profile/11952815871710931417noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-1655044654219612786.post-87826462016497104492007-10-30T19:53:00.000+05:302007-10-30T20:19:11.809+05:30जब वी मेट<a href="http://bp0.blogger.com/_5ov4XIuU0i0/RydDml_BpEI/AAAAAAAABuI/bCSiFj2wLE4/s1600-h/JAB21007.jpg"><img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5127141031095149634" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" src="http://bp0.blogger.com/_5ov4XIuU0i0/RydDml_BpEI/AAAAAAAABuI/bCSiFj2wLE4/s200/JAB21007.jpg" border="0" /></a><br /><br /><br /><br />भाषा: हिन्दी<br /><br />साल: २००७<br /><br />लेखक/निर्देशक:इम्तियाज़ अली<br /><br />रेटिंग:**<br /><p>उदीयमान निर्देशक इम्तियाज़ अली की पहली फ़िल्म <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Socha_Na_Tha">‘सोचा न था’ </a>भी कुछ छोटी-मोटी कमियों के बावजूद एक ऐसी ताज़गी से भरी फ़िल्म थी जो किसी नए फ़िल्मकार से ही अपेक्षित होती है। मगर अपनी दूसरी फ़िल्म <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Jab_We_Met">‘जब वी मेट’</a> से उन्होने अपने भीतर की कलात्मक ईमानदारी का मुज़ाहिरा कर के फ़िल्म इंडस्ट्री के मठाधीशों के चूहे जैसे दिल को भयाकुल हो जाने का एक बड़ा कारण दे दिया है। क्योंकि वे हर सफल व्यक्ति की तरह वे दूसरों की सफलता की धमक से डरते हैं। </p><p>मैं उनके दिल को चूहेसम बता रहा हूँ क्योंकि करोड़पति अरबपति होने के बावजूद उनके भीतर अपनी ही बनाई किसी पिटी-पिटाई लीक छोड़कर कुछ अलग करने का साहस नहीं है। चूंकि पैसे के फेर में अपने दिल की आवाज़ सुनने का अभ्यास तो खत्म ही हो चुका है यह उनकी फ़िल्मों से समझ आता है। और दूसरों की दिलों की आवाज़ पर भरोसा करने की उदारता भी उनमें नहीं होती इसीलिए किसी नए को मौका देने के बावजूद उसकी स्वतःस्फूर्तता को लगातार एक समीकरण के अन्तर्गत दलित करते जाते हैं। </p><p>जब वी मेट एक रोमांटिक फ़िल्म है। एक लम्बी परम्परा है हमारे यहाँ रोमांटिक फ़िल्मों की। मगर पिछले सालों में मैने एक अच्छी रोमांटिक फ़िल्म कब देखी थी याद नहीं आता। ‘दिलवाले दुल्हनिया ले जायेंगे’ और ‘कुछ कुछ होता है’ को मात्र मसाला फ़िल्में मानता हूँ, उसमें असली रोमांस नहीं है। असली रोमांस देखना हो तो जा कर देखिये जब वी मेट। </p><p><em><strong>-अभय तिवारी</strong></em></p><p> </p>Pramod Singhhttp://www.blogger.com/profile/11952815871710931417noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-1655044654219612786.post-16259904931882215342007-09-13T10:05:00.000+05:302007-09-13T10:24:55.481+05:30इकिरू<a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://bp3.blogger.com/_5ov4XIuU0i0/Rui-f5_WNTI/AAAAAAAABqo/ozo6ALCzoaY/s1600-h/ikiru.jpg"><img style="margin: 0pt 10px 10px 0pt; float: left; cursor: pointer;" src="http://bp3.blogger.com/_5ov4XIuU0i0/Rui-f5_WNTI/AAAAAAAABqo/ozo6ALCzoaY/s200/ikiru.jpg" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5109543232603567410" border="0" /></a><br /><br /><br />साल: 1952<br />भाषा: जापानी<br />डायरेक्टर: <a target="_blank" href="http://www.imdb.com/name/nm0000041/">अकिरा कुरोसावा</a><br />लेखक: शिनोबू हाशिमोतो, अकिरा कुरोसावा<br />रेटिंग: ***<br /><br /><br /><br />काफ़ी सारे लोग <a target="_blank" href="http://www.imdb.com/title/tt0044741/">इकिरू</a> को कुरोसावा की सबसे अच्छी कृति मानते हैं। जबकि कुरोसावा की बनाई गई इकत्तीस फ़िल्मों में <span style="font-weight: bold;">रोशोमॉन, मदादायो, रान, देरसू उज़ाला, कागेमुशा, योजिम्बो, स्ट्रे डॉग</span> और <span style="font-weight: bold;">सेवेन समुराई</span> शामिल हैं- सब मास्टरपीस। अगर मैंने इनमें से कोई फ़िल्म नहीं देखी होती तो मैं विश्वास से कह देता कि इकिरू ही कुरोसावा की सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म होगी। आधार यह होता कि इससे बेहतर क्या बनाएगा कोई। मगर मैंने इनमें से कुछ फ़िल्में देखीं है और मैं फ़ैसला नहीं कर सकता कि कौन सी सबसे अच्छी है।<br /><br /><a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://bp0.blogger.com/_5ov4XIuU0i0/Rui_IJ_WNUI/AAAAAAAABqw/wnQf86tfvo8/s1600-h/ikiru01_img0232.jpg"><img style="margin: 0pt 0pt 10px 10px; float: right; cursor: pointer;" src="http://bp0.blogger.com/_5ov4XIuU0i0/Rui_IJ_WNUI/AAAAAAAABqw/wnQf86tfvo8/s200/ikiru01_img0232.jpg" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5109543924093302082" border="0" /></a>न दिलचस्प है न मज़ेदार बस निहायत मामूली आदमी- जिसने तीस बरस तक बिलानागा सिटी हॉल में एक सेक्शन चीफ़ की नौकरी बजाई है- कहानी है इस आदमी की जिसे पता चलता है कि उसके जीवन के सिर्फ़ छै माह और बचे हैं। मृत्यु को अपने इतना करीब पा कर इस आदमी के भीतर यह एहसास जागता है कि उसने अभी तक कितना अर्थहीन जीवन जिया है या जिया ही नहीं है। पहले ही जीने की कला भूल चुका यह आदमी अब अपने बचे हुए जीवन को पूरी उमंग से जीना चाहता है लेकिन नहीं जानता कैसे!<br /><br /><br />हम देखते हैं उसे रात की रंगीनियों में ज़िन्दगी को खोजते, शराब पीते, लहराते, गिरते, वेश्याओं के बीच चिल्लाते.. मगर जीवन नहीं मिलता उसे। मिलता है एक ऐसी जगह जहाँ उसने उम्मीद न की थी.. और वहीं से मिलती है प्रेरणा अपने शेष दिनों को एक सार्थक रूप देने की।<br /><br />इकिरू का यह अभिशप्त नायक आधी फ़िल्म में ही मर जाता है और उसके बाद भी फ़िल्म एक घण्टे तक जारी रहती है। आप पहले से भी ज़्यादा साँस साध कर देखते रहते हैं उसकी मृत्यु पर आयोजित शोक-सभा का कार्य-व्यापार। उस लम्बे सीक्वेन्स को देखते हुए मुझे मुहर्रम की याद हो आई है- इमाम हुसेन की शहादत को आँखों से देखने वालों का कलेजा इतना नहीं कटा होगा, जितना उनकी कहानी को साल-दर-साल सुनते हुए कटता है। ये कहानी सुनाने की ताक़त ही होती है जो पत्थर-दिल मर्दों को भी सिनेमा हॉल के भीतर आँसुओं में पिघला देती है।<br /><br />इकिरू का अंग्रेज़ी नाम मिलता है- टु लिव। समझ में आता है- मगर किस तरह जिया जाय इस बात को कुरोसावा कहीं किसी संवाद में किसी किरदार से कहलाते नहीं। जीवन के प्रति उनका विचार इकिरू देखने के अनुभव के बाद स्वतः उपज आता है आप के मन में।<br /><br /><a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://bp0.blogger.com/_5ov4XIuU0i0/Rui_ZJ_WNVI/AAAAAAAABq4/OOx_BaMvk9A/s1600-h/Akira_Kurosawa.jpg"><img style="margin: 0pt 10px 10px 0pt; float: left; cursor: pointer;" src="http://bp0.blogger.com/_5ov4XIuU0i0/Rui_ZJ_WNVI/AAAAAAAABq4/OOx_BaMvk9A/s200/Akira_Kurosawa.jpg" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5109544216151078226" border="0" /></a>आज की तारीख में भी लोग इस तरह का स्क्रिप्ट डिज़ाइन अपनाने में घबराएंगे उस समय तो यह निश्चित ही क्रांतिकारी रहा होगा। कुरोसावा कहानी सुनाते-दिखाते हुए कभी हड़बड़ी में नहीं रहते। जिस पल में रहते हैं, उस में रमे रहते हैं और अपने दर्शक को भी रमा देते हैं। समय को साधने की यह कला ही उन्हे एक महान निर्देशक बना देती है।<br /><br />इकिरू व्यक्ति, समाज और जीवन तीनों के भीतर एक गहन दृष्टि डालती है। ऋत्विक घटक की <span style="font-weight: bold;">सुबर्णरेखा</span> का एक महत्वपूर्ण सीक्वेन्स और ऋषिकेश मुखर्जी की <span style="font-weight: bold;">आनन्द</span> इकिरू के प्रभाव में बनाई गई थी।<br /><br /><span style="font-weight: bold; font-style: italic;">-अभय तिवारी</span>Pramod Singhhttp://www.blogger.com/profile/11952815871710931417noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-1655044654219612786.post-62777221803078685742007-09-07T01:54:00.000+05:302007-09-07T02:11:37.836+05:30द ब्लैक डाहलिया<a href="http://bp3.blogger.com/_5ov4XIuU0i0/RuBkN0mqvQI/AAAAAAAABpg/ZxTqzqfQMSs/s1600-h/black_dahlia.jpg"><img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5107192166060047618" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" src="http://bp3.blogger.com/_5ov4XIuU0i0/RuBkN0mqvQI/AAAAAAAABpg/ZxTqzqfQMSs/s200/black_dahlia.jpg" border="0" /></a>साल: 2006<br />भाषा: अंग्रेज़ी<br />डायरेक्टर: <a href="http://www.imdb.com/name/nm0000361/" target="_blank">ब्रायन द पाल्मा</a><br />लेखक: जोश फ्रायडमान, जेम्स एलरॉय<br />रेटिंग: **<br /><br /><strong>बेबात की सत्रह अदायें</strong> हिंदी फ़िल्मों का ही दुर्गुण हो, ऐसा नहीं.. हॉलीवुड में ये नौटंकियां ज़मीन-आसमान एक करने लगती हैं, इसलिए भी कि उनके पास फूंकने को ज़्यादा पैसा है.. लगातार मोबाइल कैमरे से मिज़ानसेन रचने में ‘स्कारफेस’, ‘द अनटचेबल्स’, ‘मिशन इम्पॉसिबल’ जैसी बड़ी व सफल फ़िल्मों के निर्देशक ब्रायन द पाल्मा विशेष आनन्द लेते हैं.. बहुत बार सीन बड़ा महत्वपूर्ण होने जा रहा है इसका भरम भी बनता है.. मगर फिर धीमे-धीमे आप समझने लगते हैं ये अदायें हैं.. और अदायें सिर्फ़ अदायें होती हैं..<br /><br />2006 में बनी <a href="http://www.imdb.com/title/tt0387877/" target="_blank">‘द ब्लैक डाहलिया’</a> चालीस के दशक में एलिज़ाबेथ शॉर्ट नामकी <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Black_Dahlia" target="_blank">एक अभिनेत्री के मर्डर की सच्ची हटना</a> पर लिखे जेम्स एलरॉय के उपन्यास का फ़िल्मी रूपान्तर है.. थ्रिलर.. ब्रायन द पाल्मा का हमेशा का पसंदीदा जानर.. <strong>विल्मोस सिगमोंद</strong> की अच्छी सिनेमाटॉग्राफ़ी है.. बीच-बीच में अच्छे चुटीले वाक्य सुनने को मिलते हैं.. लगता है मज़ेदार पॉप फ़िलॉसफ़ी की पंक्तियां बरसीं.. <strong>जोश हार्टनेट</strong> और <strong>स्कारलेट जोहानसन</strong> का अभिनय भी बीच-बीच में आपको लपेटता है.. मगर फिर आप थकने लगते हैं.. और राह तकते हैं कि ठीक है, भाई, अब फ़िल्म खत्म हो.. मगर होती नहीं.. प्याज़ की परतों की तरह, और ‘देखो, दुनिया में कितना गंध है!’ वाले अंदाज़ में एक के बाद एक जाने कैसे-कैसे उलझे भेद खुलते रहते हैं.. आपको बस यही समझ आता है देखने में अच्छी, मगर अंतत: सुगधिंत मूर्खता है.. हॉलीवुडियन एक्स्ट्रावैगांज़ा है, विशुद्ध इंडलजेंस है.Pramod Singhhttp://www.blogger.com/profile/11952815871710931417noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-1655044654219612786.post-4170482921910454392007-09-04T18:41:00.000+05:302007-09-04T18:50:44.697+05:30रैटाटुई<a href="http://bp2.blogger.com/_5ov4XIuU0i0/Rt1bmUmqvHI/AAAAAAAABoY/sthW56FN6cE/s1600-h/LR.jpg"><img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5106338266432060530" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" src="http://bp2.blogger.com/_5ov4XIuU0i0/Rt1bmUmqvHI/AAAAAAAABoY/sthW56FN6cE/s200/LR.jpg" border="0" /></a>साल: 2007<br />भाषा: अंग्रेज़ी<br />लेखक व डाइरेक्टर: ब्रेड बर्ड<br />अवधि: 110 मिनट<br />रेटिंग: ****<br /><br />आसपास किसी सिनेमा में लगी हो तो बीच में कभी फुरसत लहाकर <span style="color:#990000;">‘रैटाटुई’</span> देख आइए. बेसिक इमोशंस को झिंझोड़ने, ज़रा बेहतर इंसान बना सकने की सिनेमा की ताक़त पर एक बार फिर भरोसा जगेगा (जो विशेषता आजकल आमतौर पर फ़िल्मों से क्रमश: छिनती गई है; सिनेमा हॉल में बैठे हुए व बाहर निकलकर आप थोड़ा और विवेक व समझदारी लेकर बाहर निकलें, ऐसा अब होता भी है तो बहुत कम होता है)..<br /><br />रैटाटुई पिक्सार की एनिमेशन फ़िल्म है जो उन्होंने वॉल्ट डिज़्नी के लिए बनाई है. कहानी ये है.. कहानी रहने दीजिए, मैं कहानी सुनाने लगूंगा और आप खामख्वाह बैठके बोर होइएगा! कथासार का लब्बौलुवाब यह है कि समाज और दुनिया की बनाई पूर्वाग्रही तस्वीरों में उलझने और जकड़कर रह जाने की जगह अपनी आत्मा की राह पर निकलना चाहिए.. देर-सबेर उसे पहचाना जाता है.. प्रशस्ति मिलती है.. यहां संदर्भ रेमि नाक के एक चूहे की है जो अपनी बिरादरी के ‘चुराके खाओ और अपनी औकात में रहो’ के मुल्य की जगह अपनी खोज व सिरजने की राह पर निकलता है, व तमाम अवरोधों के पश्चात पाक विद्या के गढ़ में स्नेह व इज़्ज़त हासिल करके रहता है.<br /><br />कहानी अच्छी चाल से आगे बढ़ती है, बच्चे हंसते रहते हैं तो लगता है सबका मनोरंजन हो रहा है.. मगर फिर, बीच-बीच में ढेरों ऐसे मौके बनते हैं जब फ़िल्म का स्वर अचानक एकदम ऊपर उठकर विशुद्ध सिनेमा हो जाता है, और आपके मन के गहरे कोनों में अंतरंगता व समझ की मीठी थपकियां छोड़ जाता है! काफी सारे प्रसंग हैं जब रैटाटुई का लेखन और किरदारों की डेलिवरी बड़ी उम्दा महसूस होती है. आंतोन इगो व लिंग्विनी की आवाज़ों के लिए क्रमश पीटर ओ’टूल और लू रोमानो का काम दाद के काबिल है.<br /><br />सोचिए मत, जाकर फ़िल्म देख आइए.Pramod Singhhttp://www.blogger.com/profile/11952815871710931417noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-1655044654219612786.post-64553658647156605852007-08-25T10:06:00.000+05:302007-08-25T10:14:07.466+05:30चक दे! इंडिया<a href="http://bp3.blogger.com/_5ov4XIuU0i0/Rs-yvEmqusI/AAAAAAAABkg/Jgul3kp9Kq8/s1600-h/chak+de!+india.jpg"><img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5102493424593582786" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" src="http://bp3.blogger.com/_5ov4XIuU0i0/Rs-yvEmqusI/AAAAAAAABkg/Jgul3kp9Kq8/s200/chak+de!+india.jpg" border="0" /></a>साल: 2007<br />भाषा: हिंदी<br />डायरेक्टर: <a href="http://www.imdb.com/name/nm0024912/" target="_blank">शिमित अमीन</a><br />लेखक: जयदीप साहनी<br />रेटिंग: ***<br /><br />डिसग्रेस्ड हीरो की शुरुआत हमेशा फ़िल्म को एक अच्छी बिगनिंग देती है.. आगे इस तनाव का सस्पेंस खिंचा रहता है कि हीरो के ग्रेस की वापसी कैसे होगी.. होगी या नहीं (होगी कैसे नहीं, भई, फ़िल्म है, वास्तविक जीवन नहीं?). उस लिहाज़ से ‘चक दे! इंडिया’ की शुरुआत तनी और कसी हुई नहीं.. लिखाई में भी इकहरापन है.. मगर उसके बाद फ़िल्म एकदम-से अपनी चाल पकड़ लेती है.. आमतौर पर हिंदी फ़िल्मों के घटियापे से अलग कैरेक्टराइज़ेशन पर ध्यान देती दिखती है.. चरित्रों के अंर्तलोक की जटिल परतों को बीच-बीच में मज़ेदार तरीके से पकड़ती है.. दर्शकों की दिलचस्पी बांधे रखती है.. और बड़ी मस्तानी चाल से आगे दौड़ती रहती है.. बीच-बीच में ऐसे डायलॉग आते रहते हैं कि आपको हिंदी फ़िल्मों के लेखन को दो कौड़ी का तय करने के फ़ैसले में असुविधा हो.<br /><br /><strong>सबसे मज़ेदार है चक दे! इंडिया की लड़कियां..</strong> <span style="color:#ff6666;">कोमल चौटाला, प्रीति सबरवाल, विद्या शर्मा, बिंदिया नायक</span> ऐसी लड़कियां है जिन्हें सोचते और अपनी बात कहता देख खुशी होती है.. कभी-कभी आगे बढ़कर उनसे हाथ मिलाने का मन करता है.. वे ऐसी लड़कियां हैं जिन्हें आप शायद आगे किसी फ़िल्म में न देखें.. क्योंकि वे ख़ूबसूरत और सेक्सी- कोई प्रीति झिंटा या रानी मुखर्जी नहीं.. अपने पैरों व दिमाग़ पर खड़ी आज की ज़िंदा लड़कियां हैं.. चक दे! इंडिया की व्यावसायिक सफलता के पीछे भी शायद दर्शकों का इन लड़कियों में अपना अक़्स देख लेना ही है.<br /><br />लड़कियां कमाल की हैं, शाहरूख नहीं, जैसाकि प्रैस फ़िल्म के बारे में लिखते-बताते हुए बार-बार बोलती रही है.. हिंदी फ़िल्मों के ढेरों दुर्गुणों से मुक्त चक दे! की लिखाई, कैरेक्टराइज़ेशंस, अच्छी कास्टिंग फ़िल्म का अच्छे पहलू हैं.. तो कुछ बुरे पहलू भी हैं.. मसलन पूरी फ़िल्म में अनाप-शनाप बजता सलीम-सुलैमान का बैकग्राउंड स्कोर और वैसे ही ऊटपटांग गाने.. आप उसपर कान न दीजिए तो बाकी फ़िल्म फिट है.. हिट तो है ही.<br /><br /><strong>ट्रेड के लिहाज़ से</strong> यह तथ्य भी मज़ेदार है कि यशराज की ज़्यादा महात्वाकांक्षी, मुख्यधारा के टंटों में ज़्यादा रची-बसी ‘झूम बराबर झूम’ बाज़ार से हवा हो जाती है.. और शिमित अमीन जैसे एक ‘अब तक छप्पन’ के ऑफ़बीट, अनफमिलियर निर्देशक की लाटरी निकल पड़ती है.Pramod Singhhttp://www.blogger.com/profile/11952815871710931417noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-1655044654219612786.post-45339458383066443082007-08-20T18:40:00.000+05:302007-08-20T18:58:21.864+05:30जर्मनी ईयर ज़ीरो<a href="http://bp3.blogger.com/_5ov4XIuU0i0/RsmWTkmqudI/AAAAAAAABio/P9hmKDu7CwU/s1600-h/year+zero.jpg"><img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5100773315961338322" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" src="http://bp3.blogger.com/_5ov4XIuU0i0/RsmWTkmqudI/AAAAAAAABio/P9hmKDu7CwU/s200/year+zero.jpg" border="0" /></a> साल: 1948<br />भाषा: इतालवी<br />डाइरेक्टर: <a href="http://www.imdb.com/name/nm0744023/">रॉबर्तो रोस्सेलिनि</a><br />अवधि: 71 मिनट<br />रेटिंग: ****<br /><br />रोस्सेलिनि <strong>नियो रियलिस्ट सिनेमा</strong> के बड़े हस्ताक्षर हैं. <strong>रोम ओपेन सिटी</strong> और <strong>पैसान</strong> के साथ यह फ़िल्म उनकी युद्ध त्रयी का आखिरी भाग है.<br /><br />दूसरा विश्व युद्ध खत्म हो चुका है. जरमनी खण्डहर बन चुका है. उस पर विजेता अलाइड फ़ोर्सेज़ काबिज़ हैं. जिनके घर नष्ट हो गए हैं वे सरकार द्वारा दूसरों के घरों में ठूँस दिए गए हैं. ऐसे ही एक छोटे से परिवार की कहानी है यह फ़िल्म. फ़िल्म की क्रूर और नंगी सच्चाई को हम 12 साल के एदमन्द की आँखों से देखते हैं. पिता बीमार हो कर खाट पकड़े हुए है. नाज़ी सेना का लड़ाका रह चुका भाई छुप कर रहा है. डरता है कि उसे डण्डित किया जाएगा. चार मुँह भरने की जिम्मेदारी बड़ी बहन पर है जो रातों को एलाईड फ़ोर्सेज़ के सैनिकों के दिल बहला कर कुछ कमाई करती है. और एदमन्द पर जो कम उमर होने पर भी कब्रें खोद कर और काला बाज़ार में घर का सामान बेच कर अपने परिवार की अस्तित्व रक्षा करना चाहता है. हालात कठिन हैं. पर एदमन्द सीखने को तैयार है. वह अपने पुराने शिक्षक के द्वारा कामुक पुचकार भी सहने को तैयार है, अगर कुछ कमाई होती हो. मगर पिता का दर्द और परिवार की भूख उस से देखी नहीं जाती.. और वह कुछ ऐसा अप्रत्याशित कर बैठता है जो शायद पूरी जर्मन जाति द्वारा अपने इतिहास को नकारने के प्रतीक तुल्य है.<br /><br />बिना किसी भावुकता के फ़िल्माई यह श्याम श्वेत फ़िल्म आप को अन्तर को गहरे तक चीरती चली जाती है और कुछ मूलभूत सवाल खड़े करती है.<br /><br /><em><strong>- अभय तिवारी</strong></em>Pramod Singhhttp://www.blogger.com/profile/11952815871710931417noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-1655044654219612786.post-69302255232039681952007-08-12T21:11:00.000+05:302007-08-12T21:38:48.188+05:30ब्लू अम्ब्रेला<a href="http://www.imdb.com/title/tt0457802/fullcredits#writers"><span style="color:#cc0000;" target="_blank">छतरी चोर</span></a><br /><br /><a href="http://bp2.blogger.com/_5ov4XIuU0i0/Rr8sPyL6btI/AAAAAAAABfQ/Ey8NIts0WBE/s1600-h/The+Blue+Umbrella.jpg"><img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5097841952888090322" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" src="http://bp2.blogger.com/_5ov4XIuU0i0/Rr8sPyL6btI/AAAAAAAABfQ/Ey8NIts0WBE/s200/The+Blue+Umbrella.jpg" border="0" /></a>डाइरेक्टर: <strong>विशाल भारद्वाज</strong><br />कहानी: रस्किन बांड<br />पटकथा: विशाल भारद्वाज,<br />अभिषेक चौबे, मिंटी कुंवर तेजपाल<br />संवाद: विशाल भारद्वाज<br />कैमरामैन: सचिन के क्रिश्न<br />संगीत: विशाल भारद्वाज<br />साल: 2007<br />अवधि: 90 मिनट<br />रेटिंग: ***<br /><br />मैने विशाल भारद्वाज की सभी फ़िल्में देखी हैं.. मेरे ख्याल में <strong>ब्लू अम्ब्रेला</strong> उनकी सबसे बेहतर फ़िल्म है.. फ़िल्म की कहानी बहुत मामूली है.. एक पहाड़ी कस्बे की एक दस ग्यारह बरस की लड़की बिनिया को एक जापानी छतरी मिल जाती है.. जिसे पा कर वह उड़ती फिरती है.. मगर कस्बे के अधेड़ परचूनी नन्दू की भी नज़र छतरी पर है.. और एक दिन छतरी चोरी हो जाती है.. बिनिया को शक़ है कि छतरी नन्दू ने ली है जो पहले भी छतरी हथियाने के लिए उसे तरह तरह के प्रलोभन दे चुका है.. मगर तलाशी लेने पर भी छतरी नन्दू के पास से नहीं मिलती..बाकी फ़िल्म बिनिया और नन्दू के बीच छतरी को लेकर इसी तनाव की कहानी है..<br /><br />फ़िल्म बच्चों की निश्छल दुनिया को दिखाती है.. काफ़ी हद तक और काफ़ी देर तक बच्चों की मासूम नज़र से भी दिखाती है.. इन्टरवल के बाद के एक गाने और कुछ दसेक मिनट को छोड़ दें तो फ़िल्म में एक कसाव बना रहता है.. बच्चों की उस भूली बिसरी दुनिया को मैं देखता सुनता रहा जो काफ़ी सालों से हिन्दी फ़िल्मों के लिए अनजानी है.. सत्तर के दशक में गुलज़ार ने उसे कभी छुआ था.. और अस्सी के दशक में शेखर कपूर ने.. नहीं तो बचपन का वह संसार हिन्दी फ़िल्मों में निरापद ही रहा है..<br /><br />फ़िल्म हिमाचल के किसी छोटे कस्बे में फ़िल्माई गई है.. और गर्मी, बरसात और बरफ़ानी सर्दी सभी मौसम की रंगत दिखलाती है.. पहाड़ों पर आप किसी भी तरफ़ कैमरा रख कर चला दीजिये कुछ खूबसूरत क़ैद हो ही जाएगा.. लिहाज़ा फ़िल्म खूबसूरत ब