tag:blogger.com,1999:blog-162459482009-03-28T09:53:25.485+05:30झरोखादुनिया देखने का मेरा ज़रियाशालिनी नारंगhttp://www.blogger.com/profile/07725139668070862028noreply@blogger.comBlogger25125tag:blogger.com,1999:blog-16245948.post-1173699077450119412007-03-12T18:01:00.000+05:302007-03-12T18:01:17.456+05:30हम तो भैया ऐसे ही हैं.........<span style="font-family:Mangal;">यहाँ हम तो से मेरा आशय हम हिंदुस्तानियों से है।&nbsp;&nbsp;हम सब लोगों में कोई न कोई अच्छी या बुरी आदत अवश्य होती है।&nbsp;&nbsp;यहाँ उन आदतों के बारे में बताया जा रहा है जो हम हिंदुस्तानियों में अमूनन तौर पर पाई जाती हैं।&nbsp;&nbsp;हम लोग अपने घर से तो सारा कूड़ा निकाल देते हैं और उसका ढेर लगाते हैं पड़ोसी के दरवाजे पर या गली के नुक्कड़ पर ।&nbsp;&nbsp;अपने घर-आँगन के फर्श को तो फिनायल वाले पानी से धोते हैं और सारा पानी जाकर जमा होता है पड़ोसी के घर के सामने।&nbsp;&nbsp;सड़क पर या गाड़ी में चलते हुए फट से थूक देते हैं फिर चाहे वह थूक किसी राह चलते व्यक्ति पर ही क्यों न गिरे।&nbsp;&nbsp;रेलगाड़ी में, बसों में मूँगफली के छिलके फैंकते हुए बिल्कुल नहीं हिचकते।&nbsp;&nbsp;केले, संतरे खाकर छिलके रास्ते पर फैंकते हैं।&nbsp;&nbsp;बेकार कागज़ की चिंदियाँ बनाकर मज़े से हवा में उड़ाते हैं।&nbsp;&nbsp;सड़कों पर जमा बारिश के पानी में से बड़ी तेजी से गाड़ी निकालते हैं फिर चाहे गंदे पानी की उस बौछार से कोई राह चलता आदमी भीगे या दुपहिया पर बैठा आदमी।&nbsp;&nbsp;जिस दीवार पर लिखा हो यहाँ पेशाब करना मना है वहीं आपको चार आदमी खड़े होकर भूमिगत पानी का स्तर बढ़ाते हुए दिख जाऎंगे।&nbsp;&nbsp;अस्पताल, स्कूल के पास जहाँ लिखा हो यहाँ हार्न मत बजाएँ वहीं अधिकतर गाड़ी वाले बेसब्री से हार्न बजाते हुए दिख जाएँगे।&nbsp;&nbsp;अपने घर छोटे भाई-बहनों या बच्चों की परीक्षा समाप्त हो गई तो हम फुल स्पीड पर गाने चलाएँगे फिर चाहे पड़ोसी के बच्चों की परीक्षा हो या उनके यहाँ कोई बीमार हो।&nbsp;&nbsp;भले ही गाड़ियाँ खरीदे हुए 2-3 साल बीत जाएँ पर उसकी सीट पर चढ़े प्लास्टिक कवर नहीं उतारेंगे फिर चाहे उनसे कितना ही पसीना क्यों न आए।&nbsp;&nbsp;हम लोग भ्रष्ट नेताओं और नौकरशाहों की बुराईयाँ तो करते हैं पर इस व्यवस्था से लड़ने की कोशिश नहीं करते।&nbsp;&nbsp;हम रिश्वत देते हैं, दूर-दूर की रिश्तेदारियाँ निकालते हैं जिससे हमारा काम निकल जाए।&nbsp;&nbsp;भले ही हमें दूर तक सड़क पर जाम ही नज़र आ रहा हो फिर भी हम हार्न लगातार तब तक बजाते हैं जब तक कि हमारे आगे की गाड़ी वाला अपने बैक व्यू मिरर में हमें घूर कर नहीं देखता।&nbsp;&nbsp;समय की कद्र करना तो हमने जैसा सीखा ही नहीं।&nbsp;&nbsp;किसी के यहाँ से हमें सुबह के नाश्ते का निमंत्रण मिला हो तो हम मज़े से लंच के समय तक पहुँचते हैं और फिर मुस्कराते हुए कहते हैं कि आपने तो सोचा भी नहीं होगा कि हम इतनी जल्दी आ जाएँगे।&nbsp;&nbsp;तो बात है कि संवेदनशीलता की।&nbsp;&nbsp;अगर हम दूसरे लोगों, समाज व पर्यावरण के प्रति संवेदनशील हों तो हम सब इनमें से कोई भी आदत नहीं पालेंगे।&nbsp;&nbsp;अगर मेरे इस लेख से आप में से कोई भी अपनी कोई बुरी आदत छोड़ दे तो मैं अपना लेखन सफल मानूँगी।&nbsp;&nbsp;</span><div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/16245948-117369907745011941?l=1jharokha.blogspot.com'/></div>शालिनी नारंगhttp://www.blogger.com/profile/07725139668070862028noreply@blogger.com5tag:blogger.com,1999:blog-16245948.post-1166687515942250992006-12-21T13:13:00.000+05:302006-12-21T13:21:55.953+05:30कैलेंडर 2007दोस्तों, लंबी छुट्टियों के बाद अब वापसी हुई है। आशा करती हूँ कि अब ब्लाग पर नियमित लिखने का यह सिलसिला ज़ारी रहेगा। पेश है वर्ष 2007 का कैलेंडर जिसमें साल के सभी त्योहार और अवकाश भी दिए गए हैं। डाउनलोड करने के लिए <a href="http://www.navdurga.com/Calendar07.xls">यहाँ</a> क्लिक कीजिए।<div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/16245948-116668751594225099?l=1jharokha.blogspot.com'/></div>शालिनी नारंगhttp://www.blogger.com/profile/07725139668070862028noreply@blogger.com2tag:blogger.com,1999:blog-16245948.post-1159436243046471992006-09-28T14:53:00.000+05:302006-09-28T15:40:40.060+05:30चंडी चरित्र<a href="http://photos1.blogger.com/blogger/4993/1519/1600/durga.1.jpg"><img style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; CURSOR: hand; TEXT-ALIGN: center" height="254" alt="" src="http://photos1.blogger.com/blogger/4993/1519/320/durga.0.jpg" width="289" border="0" /></a><br /><a href="http://photos1.blogger.com/blogger/4993/1519/1600/durga.0.jpg"></a>भाल निपट विशाल शशिमृग मीन खंजन लोचनी,<br />भाल बदन विशाल कोमल सकल विध्न विमोचनी ।<br />सिंह वाहिनी धनुष धारिणी कनक सेवत सोहिनी,<br />रूण्ड माल अरोल राजत् मुनिन के मन मोहिनी ।<br />एक रूप अनेक तेरो मैया गुणन की गिनती नहीं,<br />कछु ज्ञान अतः ही सुजान भक्तन भाव से विनती करी ।<br />वर वेष अनूड़ा खड़ग खप्पर अभय अंकुश धारिणी,<br />कर काज लाज जहाज जननी जनन के हित कारिणी ।<br />मंद हास प्रकाश चहूं दिस विंध्य वासिनी गाईये,<br />क्रोध तज अभिमान परिहर दुष्ट बुद्धि नसाईये ।<br />उठत बैठत चलत सोवत बार बार मनाईये,<br />चण्ड मुण्ड विनाशिनी जी के चरण हित चित्त लाईये ।<br />चंद्र फल और वृंद होते अधिक आनंद रूप हैं,<br />सर्व सुख दाता विधाता दर्श पर्श अनूप हैं ।<br />तू योग भोग विलासिनी शिव पार्श्व हिम गिरी नंदिनी,<br />दुरत तुरत निवारिणी जग तारिणी अद्य खंजिनी ।<br />आदि माया ललित काया प्रथम मधु कैटभ छ्ले,<br />त्रिभुवन भार उतारवे को महा महिषासुर मले ।<br />इंद्र चंद्र कुबेर वरूणो सुरन के आनंद भये,<br />भुवन चौदह मैया दश दिशन में सुनत ही सब दुख गये ।<br />धूम्रलोचन भस्म कीनो मैया क्रोध के ‘हुँ’कार सों,<br />हनी है सेना मैया सकल ताकी सिंह के भभकार सों ।<br />चण्ड मुण्ड प्रचण्ड दोऊ मैया प्रवल से अति भ्रष्ट हैं,<br />मुण्ड जिनके किए खण्डन असुर मण्डल दुष्ट हैं ।<br />रक्तबीज असुर अधर्मी आयो हैं दल जोड़ के,<br />शोर कर मरवे को धायो कियो रण घनघोर से ।<br />जय जय भवानी युक्ति ठानी सर्व शक्ति बुलाईके,<br />महा शुम्भ निशुम्भ योद्धा हन्यो खड़ग् बजाईके ।<br />परस्पर जब युद्ध माच्यो दिवस सों रजनी भई,<br />दास कारण असुर मारे मैया पुष्प घन वर्षा भई ।<br />चित्त लाई चंडी चरित्र पढ़त और सुनत जो निसदिन सदा,<br />पुत्र मित्र कलात्र सुख सों दुख न आवे डिग कदा ।<br />भुक्ति मुक्ति सुबुद्धि बहुधन धान्य सुख संपत्त लिए,<br />शत्रु नाश प्रकाश दुनिया आनंद मंगल जन्म लहें ।<div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/16245948-115943624304647199?l=1jharokha.blogspot.com'/></div>शालिनी नारंगhttp://www.blogger.com/profile/07725139668070862028noreply@blogger.com1tag:blogger.com,1999:blog-16245948.post-1155036504258506122006-08-08T16:50:00.000+05:302006-08-08T16:58:24.286+05:30असली-नकली<a href="http://photos1.blogger.com/blogger/4993/1519/1600/Image(050).jpg"><img style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" src="http://photos1.blogger.com/blogger/4993/1519/320/Image%28050%29.jpg" border="0" /></a><br />फ़ोटोग्राफ़ी पर <a href="http://raviratlami.blogspot.com/2006/08/blog-post_08.html">रवि जी का लेख</a> पढ़ने के बाद मैं भी एक फोटो यहाँ दे रही हूँ जो नोकिया 3230 के कैमरे (1.2 मेगापिक्सल) से लिया गया है। बताइए कौन असली है और कौन नकली?<div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/16245948-115503650425850612?l=1jharokha.blogspot.com'/></div>शालिनी नारंगhttp://www.blogger.com/profile/07725139668070862028noreply@blogger.com2tag:blogger.com,1999:blog-16245948.post-1154934206504028762006-08-07T12:26:00.000+05:302006-08-07T12:33:26.516+05:30युद्धएक शाम दादाजी अपने पौत्र से बैठे बात कर रहे थे। दादाजी बोले – आज मैं तुम्हें उस युद्ध के बारे में बताता हूँ जो हम सबके शरीर में दो शक्तियों के बीच होता है। <br />एक शक्ति बुराई है जिसका भोजन गुस्सा, जलन, द्वेष, घमंड, दुख, पछतावा, लालच, निराशा, झूठ, पाप, आक्रोश और अहंकार हैं। दूसरी शक्ति अच्छाई है जिसका भोजन खुशी, शांति, प्रेम, आशा, पवित्रता, मानवता, दयालुता, उदारता, सच, विश्वास, दया और सहानुभूति है। <br />पौत्र ने कुछ देर विचार कर अपने दादाजी से पूछा कि इस युद्ध में किस शक्ति की विजय होती है? दादाजी तुरंत बोले – उसी की जिसे तुम भोजन देते हो।<div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/16245948-115493420650402876?l=1jharokha.blogspot.com'/></div>शालिनी नारंगhttp://www.blogger.com/profile/07725139668070862028noreply@blogger.com2tag:blogger.com,1999:blog-16245948.post-1148900662407917292006-05-29T16:04:00.000+05:302006-05-29T16:34:22.446+05:30नज़रों का धोखा!अगर अपने दिमाग और आँखों को भ्रम में डालना चाहते हैं तो इन तस्वीरों को गौर से देखिए। ये हिलती हुई प्रतीत होती हैं पर हैं नहीं।<br /><br /><a href="http://photos1.blogger.com/blogger/4993/1519/1600/Picture1.png"><img style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" src="http://photos1.blogger.com/blogger/4993/1519/320/Picture1.png" border="0" /></a><br /><br /><a href="http://photos1.blogger.com/blogger/4993/1519/1600/Picture1.png"></a><br /><br /><br /><a href="http://photos1.blogger.com/blogger/4993/1519/1600/Picture1.png"></a><br /><br /><br /><br /><br /><br /><a href="http://photos1.blogger.com/blogger/4993/1519/1600/Picture2.png"><img style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" src="http://photos1.blogger.com/blogger/4993/1519/320/Picture2.png" border="0" /></a><br /><a href="http://photos1.blogger.com/blogger/4993/1519/1600/Picture3.png"><img style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" height="220" alt="" src="http://photos1.blogger.com/blogger/4993/1519/320/Picture3.png" width="313" border="0" /></a><br /><br /><br /><br /><br /><br /><br /><br /><br /><br /><br /><br /><a href="http://photos1.blogger.com/blogger/4993/1519/1600/Picture4.png"><img style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" src="http://photos1.blogger.com/blogger/4993/1519/320/Picture4.png" border="0" /></a>और ये देखिए और बताइए कि ये रेखाएँ समानान्तर हैं या नहीं।<br /><br /><br /><br /><br /><br /><br /><br /><br /><br /><br /><a href="http://photos1.blogger.com/blogger/4993/1519/1600/Picture5.png"><img style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" src="http://photos1.blogger.com/blogger/4993/1519/320/Picture5.png" border="0" /></a> 1. इस तस्वीर के मध्य में चार बिंदुओं को 30 सेकंड तक देखिए।<br />2. अब अपने पास की किसी दीवार पर देखिए।<br />3. क्या दिखा आपको? या कौन दिखा आपको?<div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/16245948-114890066240791729?l=1jharokha.blogspot.com'/></div>शालिनी नारंगhttp://www.blogger.com/profile/07725139668070862028noreply@blogger.com5tag:blogger.com,1999:blog-16245948.post-1147765225220541392006-05-16T13:08:00.000+05:302006-05-16T13:10:25.233+05:30एक सच्ची डरावनी कहानी (कमज़ोर दिल वाले न पढ़ें)कृपया कमज़ोर दिल वाले न पढ़ें। यह एक सच्ची घटना है जो पिछले महीने लोनावाला के पास घटी। <br />एक युवक मुम्बई से पुणे अपनी कार से जा रहा था। जब वह घाट के पास पहुँचा तभी अनहोनी घटी। उसकी कार खराब हो गई और वहाँ दूर-दूर तक कोई नज़र भी नहीं आ रहा था। वह किसी कार से पास के कस्बे तक लिफ्ट लेने की आशा में सड़क के किनारे-किनारे चलने लगा। रात अँधेरी और तूफानी थी। पानी झमाझम बरस रहा था। जल्दी ही वह पूरी तरह भीग गया और काँपने लगा। उसे कोई कार नहीं मिली और पानी इतनी तेज बरस रहा था कि कुछ मीटर दूर की चीजें भी नहीं दिखाई दे रही थीं। तभी उसने एक कार को अपनी तरफ आते देखा जो उससे पास आकर धीरे हो गई। लड़के ने आव देखा न ताव, झट से कार का पिछला दरवाजा खोला और अंदर कूद गया। जब वह अपने मददगार को धन्यवाद देने के लिए आगे झुका तो उसके होश उड़ गए क्योंकि ड्राइवर की सीट खाली थी। आगे की सीट खाली और इंजन की आवाज़ न होने के बावजूद भी कार सड़क पर चल रही थी। लड़के ने तभी आगे सड़क पर एक मोड़ देखा। अपनी मौत नजदीक देख वह लड़का जोर-जोर से भगवान को याद करने लगा। तभी खिड़की से एक हाथ आया और उसने कार के स्टीयरिंग व्हील को मोड़ दिया। कार मोड़ से सकुशल आगे बढ़ गई। लड़का बुरी तरह भयभीत हो कर देखता रहा कि कैसे हर मोड़ पर खिड़की से एक हाथ अंदर आता और स्टीयरिंग व्हील को मोड़ देता। आखिरकार उस लड़के को कुछ दूरी पर रोशनी दिखाई दी। लड़का झट से दरवाजा खोल कर नीचे कूदा और सरपट रोशनी की तरफ दौड़ा। यह एक छोटा सा कस्बा था। वह सीधा एक ढाबे में रुका और पीने को पानी माँगा। फिर वह बुरी तरह रोने लगा। थोड़ी देर बाद सामान्य होने पर उसने अपनी भयानक कहानी सुनानी शुरु की। ढाबे में सन्नाटा छा गया कि तभी.............................<br />संता और बंता ढाबे में पहुँचे और संता लड़के की तरफ इशारा करके बंता से बोला कि अरे यही वह बेवकूफ लड़का है ना जो हमारी कार में कूदा था जब हम कार को धक्का लगा रहे थे।<div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/16245948-114776522522054139?l=1jharokha.blogspot.com'/></div>शालिनी नारंगhttp://www.blogger.com/profile/07725139668070862028noreply@blogger.com11tag:blogger.com,1999:blog-16245948.post-1147256866799918082006-05-10T15:05:00.000+05:302006-05-10T15:57:48.516+05:30माँ तुझे सलाम!<a href="http://photos1.blogger.com/blogger/4993/1519/1600/mother&baby.0.jpg"><img style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" src="http://photos1.blogger.com/blogger/4993/1519/200/mother%26baby.jpg" border="0" /></a> एक बार जब एक बच्चा धरती पर जन्म के लिए तैयार था तो उसके मन में भय और आशंका के कई बादल उमड़ रहे थे। उसने भगवान से कहा कि मैंने सुना है कि आप मुझे जल्दी ही धरती पर भेज रहे हैं, पर मैं तो इतना छोटा और निशक्त हूँ तो वहाँ कैसे रहूँगा? भगवान ने कहा कि बहुत से फरिश्तों में से मैंने तुम्हारे लिए एक फरिश्ता चुना है जो धरती पर तुम्हारा इंतज़ार कर रहा है और जो तुम्हारा ख्याल रखेगा। बच्चे ने फिर पूछा कि यहाँ आपके पास तो मैं बस गाता और मुस्कराता हूँ और खुश रहता हूँ वहाँ मेरा क्या होगा? भगवान ने कहा कि वह फरिश्ता तुम्हारे लिए गीत गाएगा और इतना प्यार देगा कि तुम वहाँ भी खुश रहोगे। बच्चे ने फिर पूछा कि मैं वहाँ के लोगों की भाषा कैसे समझूँगा? भगवान ने कहा कि वह फरिश्ता तुम्हें नए और मीठे शब्द सिखाएगा और धैर्य व मेहनत से बोलना सिखाएगा। बच्चे ने फिर पूछा कि अगर मेरा आपसे बात करने का मन करेगा तो मैं क्या करूँगा? भगवान ने कहा कि वह फरिश्ता तुम्हें हाथ जोड़कर प्रार्थना करना सिखाएगा। बच्चा फिर बोला कि पर मैंने सुना है कि धरती पर बहुत से बुरे लोग हैं, मुझे उनसे कौन बचाएगा? भगवान ने उसे बाँहों में भरकर कहा कि वह फरिश्ता तुम्हारी उन बुरे लोगों से रक्षा करेगा चाहे उसे अपनी जान की बाजी क्यों न लगानी पड़े। <br /><br />तभी स्वर्ग में शांति सी छा गई और धरती से आवाज़ें स्पष्ट सुनाई पड़ने लगीं। बच्चे ने कहा कि अब मैं धरती पर जाने लगा हूँ तो आप मुझे जल्दी से मेरे फरिश्ते का नाम बता दीजिए। भगवान बोले कि तुम्हारे फरिश्ते का नाम कोई मायने नहीं रखता क्योंकि तुम उसे केवल 'माँ' कहकर पुकारोगे।<div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/16245948-114725686679991808?l=1jharokha.blogspot.com'/></div>शालिनी नारंगhttp://www.blogger.com/profile/07725139668070862028noreply@blogger.com8tag:blogger.com,1999:blog-16245948.post-1145261958100296282006-04-17T13:05:00.000+05:302006-04-17T15:17:32.310+05:30कुछ मज़ेदार तस्वीरेंआज अपने कंप्यूटर की साफ-सफाई करते हुए ये कुछ मज़ेदार तस्वीरें हाथ लगीं। सो पेश हैं-<br /><br /><a href="http://photos1.blogger.com/blogger/4993/1519/1600/smile.jpg"><img style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" src="http://photos1.blogger.com/blogger/4993/1519/200/smile.jpg" border="0" /></a><br /><br /><br />क्लिक कीजिए फिर पूरी तस्वीर सिलेक्ट कीजिए (Control + A) और देखिए।<br /><br /><br /><br /><br /><br /><a href="http://www.navdurga.com/imageout/spider.gif"><img style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" src="http://www.navdurga.com/imageout/spider.gif" border="0" /></a><br />अगर स्पाईडरमैन हिंदी फिल्मों का हीरो होता तो कुछ यूँ होता ।<br /><br /><br /><a href="http://photos1.blogger.com/blogger/4993/1519/1600/maneka.jpg"><img style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" src="http://photos1.blogger.com/blogger/4993/1519/200/maneka.jpg" border="0" /></a><br /><br /><br />कलयुग के विश्वामित्र और मेनका ।<br /><br /><br /><br /><br /><a href="http://photos1.blogger.com/blogger/4993/1519/1600/prey.jpg"><img style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" src="http://photos1.blogger.com/blogger/4993/1519/200/prey.jpg" border="0" /></a><br /><br /><br /><br />शिकारी खुद यहाँ शिकार हो गया । कलयुग में यह भी संभव है।<br /><br /><br /><br /><br /><br /><a href="http://photos1.blogger.com/blogger/4993/1519/1600/bush-chimpanzee.jpg"><img style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" src="http://photos1.blogger.com/blogger/4993/1519/200/bush-chimpanzee.jpg" border="0" /></a><br /><br /><br /><br />बंदर ही मनुष्य के पूर्वज हैं। विश्वास नहीं होता तो खुद ही देख लीजिए।<br /><br /><br /><br /><br /><a href="http://photos1.blogger.com/blogger/4993/1519/1600/ride.jpg"><img style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" src="http://photos1.blogger.com/blogger/4993/1519/200/ride.jpg" border="0" /></a><br /><br />यारों की सवारी। यारों का साथ हो तो हर सफ़र सुहाना हो जाता है।<div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/16245948-114526195810029628?l=1jharokha.blogspot.com'/></div>शालिनी नारंगhttp://www.blogger.com/profile/07725139668070862028noreply@blogger.com4tag:blogger.com,1999:blog-16245948.post-1144663917725293952006-04-10T15:39:00.000+05:302006-04-10T15:41:57.876+05:30अनुगूँज १८: मेरे जीवन में धर्म का महत्व<a href="http://www.akshargram.com/sarvagya/index.php/Anugunj"><img alt="Akshargram Anugunj" hspace="5" src="http://akshargram.com/images/anugunj.jpg" align="right" vspace="5" border="0" /></a>पहली बार अनुगूँज में भाग ले रही हूँ। जहाँ तक जीवन में धर्म के महत्व का प्रश्न है तो मैं यह मानती हूँ कि धर्म से ज्यादा अध्यात्म जीवन के लिए जरुरी है।<br /><br />भारत में हिन्दु, मुस्लिम, ईसाई, सिक्ख धर्म और फिर इन धर्मों से जुड़ी हुई अनेक शाखाएँ हैं। भारत में चार हजार भाषाएँ हैं, जातियाँ हैं तो धर्म भी इतने ही हो सकते हैं क्योंकि धर्म का जाति से चोली-दामन का रिश्ता है। कैसे हैं ये धर्म? संकीर्ण विचारों से ग्रस्त, अनेकानेक मनगढ़न्त मान्यताओं व धारणाओं में कैद तथा सिर्फ अपने धर्माचरण के नियमों के प्रति प्रतिबद्ध। कार्ल मार्क्स ने सही कहा है कि “धर्म अफीम का नशा है”। लोगों को धर्म का नशा इतना चढ़ गया है कि उन्हें यह भान नहीं रहा कि वे मानव भी हैं। इन तथाकथित धर्म के अनुयायियों में करुणा, दया, अहिंसा, प्रेम, सहिष्णुता का नाम तक नहीं है। आडम्बर, पाखण्ड, घमण्ड का लबादा ओढ़कर महान आस्तिक कहलाते हैं। आँखों पर मानो कोई पट्टी बँधी है इसलिए अपने सामने का व्यक्ति मनुष्य नजर नहीं आता। इतना दम्भ। यह धर्म का नशा ही तो है।<br /><br />चाहे आसाम का कामाख्या मंदिर हो या फिर कोलकाता का रुद्र काली का मंदिर, बिना बलि के वहाँ भोग प्रसाद नहीं चढ़ता। क्या ममता, करुणा-दया की साक्षात मूर्ति माँ इतनी कठोर और हिंसक हो गई है कि वह अपने जीवित, लाचार व मूक पशु रूपी बच्चों का भक्षण कर सकती है। इसी प्रकार कुर्बानी के नाम पर बकरे का निर्मम तरीके से सिर कलम किया जाता है, क्या खुदा इतना क्रूर है कि उसे खुथ करने के लिए एक निरीह पशु की हत्या की जाए? कोई भी धर्म यदि हिंसा की इजाजत देता है तो वह धर्म नहीं है। आज धर्म के नाम पह लोग एक दूसरे को मारने में जरा भी संकोच नहीं करते। “धर्म” शब्द संस्कृत की “धृ” धातु से बना है जिसका अर्थ है धारण करना। जिस शक्ति ने हमें, हमारे शरीर के धारण कर रखा है उसी शक्ति ने सारे विश्व को, संपूर्ण ब्रह्मांड को धारण कर रखा है वह है धर्म “धारयिते इति धर्म:”।<br /><br />चूँकि इस शक्ति को हमने भुला दिया और सच्चा धर्म न जानकर पाखण्ड रुपी भूलभुलैया में भटक गए, इसलिए आज अध्यात्म की आवश्यक्ता है। अधि: आत्म-आत्मा में प्रवेश करना अध्यात्म है। हालांकि अध्यात्म को भी धर्म के ठेकेदारों ने नहीं छोड़ा है, धर्म का मुलम्मा चढ़ाकर अध्यात्म की दुकानदारी कर रहे हैं और यही कारण है कि लोगों में परिवर्तन नहीं होता। रत्नाकर डाकू वाल्मिकी बन गए, कितने ही दुराचारी, पापियों का अध्यात्म का मार्ग अपनाने से हृदय परिवर्तन हुआ तो क्यों नहीं आज भी अध्यात्म को अपनाया जाए।<br /><br />अध्यात्म वह विद्या है जिसे भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में “राजविद्या” कहकर संबोधित किया है। अध्यात्म की कोई शाखा नहीं है क्योंकि इसका सीधा तात्पर्य है प्रत्येक मनुष्य के अंत:करण में मौजूद “चैतन्य” से साक्षात्कार करना और जब वह यह अनुभूति कर लेगा तो स्वत: ही दिव्य व अलौकिक गुणों का विकास होगा, बुरे विचार और आदतों का परित्याग होगा तथा एक सुंदर समाज की रचना की बुनियाद मजबूत होगी। धर्म के नाम पर जब लोग भटक जाते हैं तो “यदा यदा ही धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत:” की बात भी चरितार्थ होती है और श्रीकृष्ण को अंतत: कहना भी पड़ा “सर्व धर्मान् परित्यज्यते मामेक शरणं ब्रज:” अर्थात् समस्त धर्मों का परित्याग कर मुझ एक की शरण में आ जा और यही संदेश अध्यात्म का है। अध्यात्म वह “ज्ञान” है जिसमें कि “स्वंय” का परिचय मिलता है और अंत:करण में प्रवेश कर केवल एक ही प्रभु की शरण का आश्रय।<br />जहाँ भेद-भाव, पाखंड और कर्मकांड का कोई स्थान ही नहीं है, करुणा, दया, प्रेम, शांति और आनंद जहाँ मौजूद है, जिनकी मनुष्यों को आवश्यकता है और धर्म चूँकि ये चीजें नहीं दे सकता, अध्यात्म द्वारा ही प्राप्त की जा सकती हैं इसीलिए आज धर्म नहीं, अध्यात्म जरुरी है।<div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/16245948-114466391772529395?l=1jharokha.blogspot.com'/></div>शालिनी नारंगhttp://www.blogger.com/profile/07725139668070862028noreply@blogger.com5tag:blogger.com,1999:blog-16245948.post-1142933883013294882006-03-21T15:06:00.000+05:302006-03-21T15:08:03.026+05:30जिंदगीबनो ऐसे फूल जो पूरी तरह खिल कर मुरझाए<br /> न कि ऐसा पेड़ जिस पर कभी बहार ही न आए ।<br />बनो ऐसी चिंगारी जो पल भर ही चमक कर खाक हो जाए<br /> न कि ऐसी रोशनी जो किसी को राह ही न दिखा पाए ।<br />बनो ऐसा धूमकेतू जो अपनी पूरी आभा से दमके<br /> न कि ऐसा ग्रह जो दूसरों की रोशनी से चमके ।<br />अपने समय का सदुपयोग करो न कि व्यर्थ गँवाओ ।<br /> अपनी जिंदगी को पूरी तरह जियो न कि बस बिताओ ।<div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/16245948-114293388301329488?l=1jharokha.blogspot.com'/></div>शालिनी नारंगhttp://www.blogger.com/profile/07725139668070862028noreply@blogger.com3tag:blogger.com,1999:blog-16245948.post-1139383070079398052006-02-08T11:26:00.000+05:302006-02-08T12:47:50.130+05:30रस्सीयह कहानी एक ऐसे पर्वतारोही की है जो सबसे ऊँचे पर्वत पर विजय पाना चाहता था। कई सालों की कड़ी मेहनत के बाद उसने अपना साहसिक अभियान शुरु किया। पर वह यह उपलब्धि किसी के साथ साझा नहीं करना चाहता था, अत: उसने अकेले ही चढ़ाई करने का निश्चय किया। उसने पर्वत पर चढ़ना आरंभ किया, जल्दी ही शाम ढलने लगी। पर वह विश्राम के लिए तम्बू में ठहरने की जगह अंधेरा होने तक चढ़ाई करता रहा। घने अंधकार के कारण वह कुछ भी देख नहीं पा रहा था। हाथ को हाथ भी सुझाई नहीं दे रहा था। चंद्रमा और तारे सब बादलों की चादर से ढके हुए थे। वह निरंतर चढ़ता हुआ पर्वत की चोटी से कुछ ही फुट के फासले पर था कि तभी अचानक उसका पैर फिसला और वह तेजी से नीचे की तरफ गिरने लगा। गिरते हुए उसे अपने जीवन के सभी अच्छे और बुरे दौर चलचित्र की तरह दिखाई देने लगे। उसे अपनी मृत्यु बहुत नजदीक लग रही थी, तभी उसकी कमर से बंधी रस्सी ने झटके से उसे रोक दिया। उसका शरीर केवल उस रस्सी के सहारे हवा में झूल रहा था। उसी क्षण वह जोर से चिल्लाया: ‘भगवान मेरी मदद करो!’ तभी अचानक एक गहरी आवाज आकाश में गूँजी:<br /><br />- तुम मुझ से क्या चाहते हो ?<br /><br />पर्वतारोही बोला - भगवन् मेरी रक्षा कीजिए!<br /><br />- क्या तुम्हें सच में विश्वास है कि मैं तुम्हारी रक्षा कर सकता हूँ ?<br /><br />वह बोला - हाँ, भगवन् मुझे आप पर पूरा विश्वास है ।<br /><br />- ठीक है, अगर तुम्हें मुझ पर विश्वास है तो अपनी कमर से बंधी रस्सी काट दो.....<br /><br />कुछ क्षण के लिए वहाँ एक चुप्पी सी छा गई और उस पर्वतारोही ने अपनी पूरी शक्ति से रस्सी को पकड़े रहने का निश्चय कर लिया।<br /><br />अगले दिन बचाव दल को एक रस्सी के सहारे लटका हुआ एक पर्वतारोही का ठंड से जमा हुआ शव मिला । उसके हाथ रस्सी को मजबूती से थामे थे... और वह धरती से केवल दस फुट की ऊँचाई पर था।<br /><br /><br />और आप? आप अपनी रस्सी से कितने जुड़े हुए हैं । क्या आप अपनी रस्सी को छोड़ेंगे? भगवान पर विश्वास रखिए। कभी भी यह नहीं सोचिए कि वह आपको भूल गया है या उसने आपका साथ छोड़ दिया है । याद रखिए कि वह हमेशा आपको अपने हाथों में थामे हुए है।<div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/16245948-113938307007939805?l=1jharokha.blogspot.com'/></div>शालिनी नारंगhttp://www.blogger.com/profile/07725139668070862028noreply@blogger.com3tag:blogger.com,1999:blog-16245948.post-1139307698490907052006-02-07T15:50:00.000+05:302006-02-07T15:51:38.516+05:30चाहआकाश के कोने में टंगे उस छोटे से धूप के टुकड़े को उतार लाना चाहती हूँ,<br />जिससे हट जाए मन का सारा अँधकार । <br />बादलों में सिमटी उस पानी की बूँद को पाना चाहती हूँ,<br />जिससे मिट जाए यह अनबुझी प्यास । <br />उड़ते पंछियों के परों को अपनाना चाहती हूँ,<br />जिससे यह दिल भी भर सके उड़ान ।<br />तितलियों से फूलों का रस लेना चाहती हूँ,<br />जिससे जीवन में भर सकूँ मिठास ।<br />दिल में बंद बातों को शब्दों में सहेजना चाहती हूँ,<br />जिससे कुछ भी न रह जाए अनकहा ।<br />हर पल को पूरी तरह जीना चाहती हूँ,<br />जिससे गम न हो कि जिंदगी को क्यों नहीं जिया ।<div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/16245948-113930769849090705?l=1jharokha.blogspot.com'/></div>शालिनी नारंगhttp://www.blogger.com/profile/07725139668070862028noreply@blogger.com1tag:blogger.com,1999:blog-16245948.post-1138176951643922822006-01-25T13:15:00.000+05:302006-01-25T14:07:53.636+05:30आँखों की जाँच<div align="left">क्या आपको साफ़ दिखाई देता है? यह जाँचने के लिए यह सरल सा टेस्ट करिए –<br /><br />1. पहले अपनी एक आँख बंद कीजिए।<br />2. अब अपने mouse pointer को लाल “!” पर ले जाइए।<br />3. अब right click करके select all चुनिए।<br />4. अब आपको परिणाम दिखाई देगा।<br /><br /><span style="color:#fef6ee;">बुद्धू </span><span style="font-size:180%;color:#ff0000;"><strong>!<br /></strong></span><br /><span style="color:#fef6ee;">कोई तुम्हें कुछ भी करने को कहता है तो तुम अपना दिमाग लगाए बिना वह काम कर लेते हो।<br />तुम्हारी आँखें तो ठीक हैं पर तुम्हारा दिमाग ज़रूर ठीक नहीं है।<br />हा, हा, हा, हा, ही, ही, ही, ही। कभी-कभी अपने आप पर भी हँस लेना चाहिए।<br /></span></div><div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/16245948-113817695164392282?l=1jharokha.blogspot.com'/></div>शालिनी नारंगhttp://www.blogger.com/profile/07725139668070862028noreply@blogger.com7tag:blogger.com,1999:blog-16245948.post-1135850462816326932005-12-29T15:31:00.000+05:302005-12-29T15:48:21.013+05:30दिल का दौरा<a href="http://photos1.blogger.com/blogger/4993/1519/1600/Slide1.gif"><img style="CURSOR: hand" alt="" src="http://photos1.blogger.com/blogger/4993/1519/320/Slide1.jpg" border="0" /></a> <a href="http://photos1.blogger.com/blogger/4993/1519/1600/Slide2.gif"><img style="CURSOR: hand" alt="" src="http://photos1.blogger.com/blogger/4993/1519/320/Slide2.jpg" border="0" /></a><br /> <a href="http://photos1.blogger.com/blogger/4993/1519/1600/Slide3.gif"><img style="CURSOR: hand" alt="" src="http://photos1.blogger.com/blogger/4993/1519/320/Slide3.jpg" border="0" /></a><a href="http://photos1.blogger.com/blogger/4993/1519/1600/Slide4.gif"><img style="CURSOR: hand" alt="" src="http://photos1.blogger.com/blogger/4993/1519/320/Slide4.jpg" border="0" /></a><br /> <a href="http://photos1.blogger.com/blogger/4993/1519/1600/Slide5.gif"><img style="CURSOR: hand" alt="" src="http://photos1.blogger.com/blogger/4993/1519/320/Slide5.jpg" border="0" /></a><a href="http://photos1.blogger.com/blogger/4993/1519/1600/Slide6.gif"><img style="CURSOR: hand" alt="" src="http://photos1.blogger.com/blogger/4993/1519/320/Slide6.jpg" border="0" /></a><div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/16245948-113585046281632693?l=1jharokha.blogspot.com'/></div>शालिनी नारंगhttp://www.blogger.com/profile/07725139668070862028noreply@blogger.com4tag:blogger.com,1999:blog-16245948.post-1135580602154843892005-12-26T12:33:00.000+05:302005-12-26T12:33:22.203+05:30पिता का आशीर्वाद<span style="font-family:Mangal;">एक बार एक युवक अपनी कॉलेज की पढ़ाई पूरी करने वाला था।&nbsp;&nbsp;उसकी बहुत दिनों से एक शोरूम में रखी स्पोर्टस कार लेने की इच्छा थी।&nbsp;&nbsp;उसने अपने पिता से कॉलेज की पढ़ाई पूरी होने पर उपहारस्वरूप वह कार लेने की बात कही क्योंकि वह जानता था कि उसके पिता उसकी इच्छा पूरी करने में समर्थ हैं।&nbsp;&nbsp;कॉलेज के आखिरी दिन उसके पिता ने उसे अपने कमरे में बुलाया और कहा कि वे उसे बहुत प्यार करते हैं तथा उन्हें उस पर गर्व है।&nbsp;&nbsp;फिर उन्होंने उसे एक सुंदर कागज़ में लिपटा उपहार दिया ।&nbsp;&nbsp;उत्सुकतापूर्वक जब युवक ने उस कागज़ को खोला तो उसे उसमें एक आकर्षक जिल्द वाली </span>‘<span style="font-family:Mangal;">भगवद् गीता</span>’ <span style="font-family:Mangal;">मिली जिसपर उसका नाम भी सुनहरे अक्षरों में लिखा था।&nbsp;&nbsp;यह देखकर वह युवक आगबबूला हो उठा और अपने पिता से बोला कि इतना पैसा होने पर भी उन्होंने उसे केवल एक </span>‘<span style="font-family:Mangal;">भगवद् गीता</span>’ <span style="font-family:Mangal;">दी।&nbsp;&nbsp;यह कहकर वह गुस्से से गीता वहीं पटककर घर छोड़कर निकल गया।</span><br/><br/><span style="font-family:Mangal;">बहुत वर्ष बीत गए और वह युवक एक सफल व्यवसायी बन गया।&nbsp;&nbsp;उसके पास बहुत धन-दौलत और भरापूरा परिवार था।&nbsp;&nbsp;एक दिन उसने सोचा कि उसके पिता तो अब काफी वृद्ध हो गए होंगे।&nbsp;&nbsp;उसने अपने पिता से मिलने जाने का निश्चय किया क्योंकि उस दिन के बाद से वह उनसे मिलने कभी नहीं गया था।&nbsp;&nbsp;अभी वह अपने पिता से मिलने जाने की तैयारी कर ही रहा था कि अचानक उसे एक तार मिला जिसमें लिखा था कि उसके पिता की मृत्यु हो गई है और वे अपनी सारी संपत्ति उसके नाम कर गए हैं।&nbsp;&nbsp;उसे तुरंत वहाँ बुलाया गया था जिससे वह सारी संपत्ति संभाल सके।</span><br/><br/><span style="font-family:Mangal;">वह उदासी और पश्चाताप की भावना से भरकर अपने पिता के घर पहुँचा।&nbsp;&nbsp;उसे अपने पिता की महत्वपूर्ण फाइलों में वह </span>‘<span style="font-family:Mangal;">भगवद् गीता</span>’ <span style="font-family:Mangal;">भी मिली जिसे वह वर्षों पहले छोड़कर गया था।&nbsp;&nbsp;उसने भरी आँखों से उसके पन्ने पलटने शुरू किए।&nbsp;&nbsp;तभी उसमें से एक कार की चाबी नीचे गिरी जिसके साथ एक बिल भी था।&nbsp;&nbsp;उस बिल पर उसी शोरूम का नाम लिखा था जिसमें उसने वह स्पोर्टस कार पसंद की थी तथा उस पर उसके घर छोड़कर जाने से पिछले दिन की तिथि भी लिखी थी।&nbsp;&nbsp;उस बिल में लिखा था कि पूरा भुगतान कर दिया गया है।&nbsp;&nbsp;</span><br/><br/><span style="font-family:Mangal;">कई बार हम भगवान की आशीषों और अपनी प्रार्थनाओं के उत्तरों को अनदेखा कर जाते हैं क्योंकि वे उस रूप में हमें प्राप्त नहीं होते जिस रूप में हम उनकी आशा करते हैं।</span><br/><span style="font-family:Mangal;"></span><div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/16245948-113558060215484389?l=1jharokha.blogspot.com'/></div>शालिनी नारंगhttp://www.blogger.com/profile/07725139668070862028noreply@blogger.com6tag:blogger.com,1999:blog-16245948.post-1134716877880945742005-12-16T12:23:00.000+05:302005-12-16T12:37:57.893+05:30साइबर मंदिर<div align="justify">हम में से अधिकतर लोग किसी न किसी कारणवश प्रतिदिन मंदिर जाकर भगवान को माथा नहीं टेक सकते। अत: अब प्रस्तुत है - साइबर मंदिर जिससे आप घर या कार्यालय कहीं भी केवल कंप्यूटर के द्वारा ही मंदिर जा सकते हैं। मंदिर जाने के लिए केवल नीचे दी गई कड़ी पर क्लिक कीजिए ।</div><br /><div align="center"><strong><span style="font-family:georgia;font-size:180%;color:#ff6600;"><a href="http://www.navdurga.com/cybertemple.exe">साइबर मंदिर</a></span></strong></div><div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/16245948-113471687788094574?l=1jharokha.blogspot.com'/></div>शालिनी नारंगhttp://www.blogger.com/profile/07725139668070862028noreply@blogger.com4tag:blogger.com,1999:blog-16245948.post-1133766385065100782005-12-05T12:36:00.000+05:302005-12-05T15:42:58.246+05:30रेत और पत्थर<span style="font-family:Mangal;">एक बार दो दोस्त रेगिस्तान में से होकर कहीं जा रहे थे । रास्ते में उनमें किसी बात पर बहस हो गई और एक दोस्त ने दूसरे दोस्त को थप्पड़ मार दिया । जिस दोस्त को थप्पड़ मारा गया था वह बहुत दुखी हुआ पर उसने बिना कुछ बोले रेत पर लिखा, </span>“<span style="font-family:Mangal;">आज मेरे सबसे अच्छे दोस्त ने मुझे थप्पड़ मारा</span>” <span style="font-family:Mangal;">। थोड़ा और आगे चलने पर उन्हें एक झील दिखाई दी और उन दोनों ने पानी में नहाने का विचार बनाया । पहला दोस्त जिसे थप्पड़ लगा था, दलदल में फँस गया और डूबने लगा । तब दूसरे दोस्त ने उसकी जान बचाई । डूबने से बचने पर उसने एक पत्थर पर लिखा, </span>“<span style="font-family:Mangal;">आज मेरे सबसे अच्छे दोस्त ने मेरी जान बचाई</span>” <span style="font-family:Mangal;">। इस पर दूसरे दोस्त ने पूछा कि जब मैनें तुम्हें थप्पड़ मारा तब तुमने रेत पर लिखा पर जब मैंने तुम्हारी जान बचाई तब तुमने पत्थर पर लिखा, ऐसा तुमने क्यों किया </span>? <span style="font-family:Mangal;">इस पर पहले दोस्त ने उत्तर दिया, </span>“<span style="font-family:Mangal;">जब कोई तुम्हें दुख पहुँचाता है तो उसे रेत पर लिखना चाहिए जिससे क्षमा की आँधी उसे मिटा सके। पर जब कोई तुम्हारे साथ भलाई करता है तो उसे पत्थर पर लिखना चाहिए जिससे समय की हवा भी उसे मिटा न सके।</span>”<br /><strong><em><span style="font-family:Mangal;">अपने साथ किए गए बुरे बर्ताव को रेत पर और भलाई को पत्थर पर लिखना सीखिए।</span></em></strong><div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/16245948-113376638506510078?l=1jharokha.blogspot.com'/></div>शालिनी नारंगhttp://www.blogger.com/profile/07725139668070862028noreply@blogger.com5tag:blogger.com,1999:blog-16245948.post-1132989736773869722005-11-26T12:37:00.000+05:302005-11-28T14:42:56.620+05:30कुछ सरल व्यायाममित्रों,<br /><br />आपकी पीठ को मज़बूत बनाने के लिए तथा आपको चुस्त-दुरुस्त रखने के लिए कुछ सरल व्यायाम प्रस्तुत हैं।<br /><br /><a href="http://photos1.blogger.com/blogger/4993/1519/1600/exercise.6.gif"><img style="CURSOR: hand" alt="" src="http://photos1.blogger.com/blogger/4993/1519/200/exercise.5.gif" border="0" /></a> <a href="http://photos1.blogger.com/blogger/4993/1519/1600/ex2.3.gif"><img style="CURSOR: hand" alt="" src="http://photos1.blogger.com/blogger/4993/1519/200/ex2.2.gif" border="0" /></a> <a href="http://photos1.blogger.com/blogger/4993/1519/1600/ex4.0.gif"><img style="CURSOR: hand" alt="" src="http://photos1.blogger.com/blogger/4993/1519/200/ex4.0.gif" border="0" /></a><br /><br /><br /><a href="http://photos1.blogger.com/blogger/4993/1519/1600/ex6.2.gif"><img style="CURSOR: hand" alt="" src="http://photos1.blogger.com/blogger/4993/1519/200/ex6.2.gif" border="0" /></a><a href="http://photos1.blogger.com/blogger/4993/1519/1600/exercise.5.gif"></a> <a href="http://photos1.blogger.com/blogger/4993/1519/1600/ex7.0.gif"><img style="CURSOR: hand" alt="" src="http://photos1.blogger.com/blogger/4993/1519/200/ex7.0.gif" border="0" /></a><br /><br /><br /><a href="http://photos1.blogger.com/blogger/4993/1519/1600/ex9.1.gif"><img style="CURSOR: hand" alt="" src="http://photos1.blogger.com/blogger/4993/1519/200/ex9.1.gif" border="0" /></a> <a href="http://photos1.blogger.com/blogger/4993/1519/1600/ex8.0.gif"><img style="CURSOR: hand" alt="" src="http://photos1.blogger.com/blogger/4993/1519/200/ex8.0.gif" border="0" /></a><div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/16245948-113298973677386972?l=1jharokha.blogspot.com'/></div>शालिनी नारंगhttp://www.blogger.com/profile/07725139668070862028noreply@blogger.com3tag:blogger.com,1999:blog-16245948.post-1128071764363847382005-09-30T14:46:00.000+05:302005-09-30T14:46:04.396+05:30ताबूत<span style="font-family:Mangal;">एक बार एक किसान बहुत बूढ़ा होने के कारण खेतों में काम नहीं कर सकता था।&nbsp;&nbsp;वह सारा दिन खेत के किनारे पेड़ की छाँव में बैठा रहता था।&nbsp;&nbsp;उसका बेटा खेत में काम करता रहता और रह-रह के सोचता कि&nbsp;&nbsp;उसके पिता का जीवन व्यर्थ है क्योंकि वह अब कोई काम करने लायक नहीं रहा।&nbsp;&nbsp;यह सोच-सोच कर उसका बेटा एक दिन इतना दुखी हो गया कि उसने लकड़ी का एक ताबूत बनाया और उसे घसीट कर पेड़ के पास ले गया।&nbsp;&nbsp;उसने अपने पिता को उस ताबूत में लेटने के लिए कहा।&nbsp;&nbsp;किसान एक शब्द भी बोले बिना उस ताबूत में लेट गया।&nbsp;&nbsp;ताबूत का ढक्कन बंद करके बेटा ताबूत को घसीटता हुआ खेत के किनारे ले गया जहाँ एक गहरी खाई थी।&nbsp;&nbsp;जैसे ही बेटा ताबूत को खाई में फैंकने लगा, ताबूत के अंदर से पिता ने उसे पुकारा।&nbsp;&nbsp;बेटे ने ताबूत खोला तो अंदर लेटे उसके पिता ने शांत भाव से कहा कि मैं जानता हूँ कि तुम मुझे खाई में फैंकने वाले हो पर उससे पहले मैं तुम्हें कुछ कहना चाहता हूँ।&nbsp;&nbsp;बेटे ने पूछा कि अब क्या है</span>?&nbsp;&nbsp;<span style="font-family:Mangal;">तब उसके पिता ने कहा कि तुम चाहो तो बेशक मुझे खाई में फैंक दो पर इस बढ़िया ताबूत को नहीं फैंको।&nbsp;&nbsp;भविष्य में तुम्हारे बूढ़े होने पर तुम्हारे बच्चों को इसकी जरुरत पड़ेगी।</span><div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/16245948-112807176436384738?l=1jharokha.blogspot.com'/></div>शालिनी नारंगhttp://www.blogger.com/profile/07725139668070862028noreply@blogger.com8tag:blogger.com,1999:blog-16245948.post-1127286771134834142005-09-21T12:42:00.000+05:302005-09-21T12:42:51.163+05:30पैरों के निशान<span style="font-family:Mangal;">एक रात एक आदमी ने एक सपना देखा ।&nbsp;&nbsp;उसने सपने में देखा कि वह और भगवान समुद्र तट पर साथ-साथ टहल रहे हैं ।&nbsp;&nbsp;आकाश में उसकी बीती जिंद़गी के दृश्य चलचित्र की तरह चल रहे थे ।&nbsp;&nbsp;उसने देखा कि उसकी जिंद़गी के हर पल में रेत में दो जोड़ी पैरों के निशान थे, एक उसके पैरों के और दूसरे भगवान के पैरों के ।&nbsp;&nbsp;जब उसकी जिंद़गी का आखिरी दृश्य उसके सामने आया तो उसने पीछे मुड़कर रेत में पैरों के निशानों को देखा।&nbsp;&nbsp;उसने पाया कि उसकी जिंद़गी के कई पलों में रेत में केवल एक जोड़ी पैरों के निशान थे।&nbsp;&nbsp;उसने महसूस किया कि ये उसकी जिंद़गी के सबसे बुरे और दुख-भरे पल थे ।&nbsp;&nbsp;इस बात से वह बहुत परेशान हुआ और उसने भगवान से पूछा कि </span>“<span style="font-family:Mangal;">भगवान आपने तो कहा था कि जब मैंने एक बार आपका अनुसरण करने का निश्चय कर लिया तो उसके बाद आप जिंद़गी की राह पर मेरा साथ नहीं छोड़ेंगे ।&nbsp;&nbsp;पर मैंने पाया है कि मेरी जिंद़गी के सबसे मुश्किल पलों में रेत में केवल एक जोड़ी पैरों के निशान हैं ।&nbsp;&nbsp;मैं समझ नहीं पा रहा कि जब मुझे आपकी सबसे ज्यादा ज़रुरत थी तब आपने मुझे अकेला क्यों छोड़ दिया </span>?” <span style="font-family:Mangal;">भगवान ने उत्तर दिया कि </span>“<span style="font-family:Mangal;">मेरे बच्चे, मैंने तुम्हें कभी अकेला नहीं छोड़ा ।&nbsp;&nbsp;तुम्हारे बुरे और मुश्किल पलों में तुम केवल एक जोड़ी पैरों के निशान इसलिए देख रहे हो क्योंकि उस समय मैंने तुम्हें गोद में उठाया हुआ था ।</span>”<div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/16245948-112728677113483414?l=1jharokha.blogspot.com'/></div>शालिनी नारंगhttp://www.blogger.com/profile/07725139668070862028noreply@blogger.com4tag:blogger.com,1999:blog-16245948.post-1126075023786167302005-09-07T11:58:00.000+05:302005-09-12T11:56:05.126+05:30<p align="center"><strong><span style="color:#990000;">गणेश चतुर्थी (7 सितंबर 2005)</span></strong></p><p align="center"> </p><p align="left"><a href="http://photos1.blogger.com/blogger/4993/1519/1600/ganesh1.gif"><img style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; CURSOR: hand; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://photos1.blogger.com/blogger/4993/1519/400/ganesh1.gif" border="0" /></a></p><div align="left"></div><div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/16245948-112607502378616730?l=1jharokha.blogspot.com'/></div>शालिनी नारंगhttp://www.blogger.com/profile/07725139668070862028noreply@blogger.com3tag:blogger.com,1999:blog-16245948.post-1125990526552447212005-09-07T00:18:00.000+05:302005-09-09T13:12:52.203+05:30<span style="color:#660000;"><strong> खुश रहने के सरल नियम</strong></span><br /><strong></strong><a href="http://photos1.blogger.com/blogger/4993/1519/1600/happiness1.gif"></a><br /><a href="http://photos1.blogger.com/blogger/4993/1519/1600/happiness1.gif"><img style="CURSOR: hand" alt="" src="http://photos1.blogger.com/blogger/4993/1519/400/happiness1.gif" border="0" /></a><div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/16245948-112599052655244721?l=1jharokha.blogspot.com'/></div>शालिनी नारंगhttp://www.blogger.com/profile/07725139668070862028noreply@blogger.com0tag:blogger.com,1999:blog-16245948.post-1125919844682422102005-09-05T16:37:00.000+05:302005-09-12T12:02:04.373+05:30<span style="font-size:130%;color:#663333;"><strong>बातें स्कूल के दिनों की</strong></l></span><br /><span style="color:#ffffff;">...<br /></span>मैं कक्षा में हमेशा प्रथम आने के कारण स्कूल में सभी अध्यापिकाओं की चहेती थी । जब मैं छठी कक्षा में थी तब हमारी अंग्रेजी की अध्यापिका श्रीमती सलूजा थीं । एक बार परीक्षा में मैंने अंग्रेज़ी के प्रार्थना पत्र में एक गलती की तो उन्होंने मेरा एक अंक काट लिया जबकि अन्य लड़कियों की तीन गलतियाँ होने पर एक अंक काटा । इस बारे में मैंने जब उनसे शिकायत की तो उन्होंने उत्तर दिया कि उन सब से अपनी तुलना मत करो, मुझे तुमसे गलती की आशा नहीं है, इसलिए ही मैंने तुम्हारा एक अंक काटा है जिससे भविष्य में तुम गलती न करो । उनकी उस बात से मुझे बहुत प्रेरणा मिली और मैं परीक्षा में ज्यादा सावधान रहने लगी।<br /><br />नवीं कक्षा में हमारी सामाजिक विज्ञान की अध्यापिका श्रीमती सतनाम थीं । वे छोटे कद की गोलमटोल महिला थीं अत: हम आपस में उन्हें ड्रम कहते थे । सामाजिक विज्ञान में मेरी रूचि न के बराबर थी अत: उनकी अनुपस्थिती बहुत खुशी देती थी । हमारे स्कूल में सूचना पट्ट पर अध्यापिकाओं की छुट्टी की सूचना हर रोज़ लगाई जाती थी । कक्षा मॉनीटर होने के कारण मैं ही सूचना पट्ट देखने जाती थी । एक दिन सामाजिक विज्ञान का पीरियड शुरु होने पर भी जब सतनाम मैम नहीं आईं तो मैं सूचना पट्ट देखने गई । वहाँ लिखा था कि आज वे अनुपस्थित हैं तथा कक्षा मॉनीटर ही कक्षा में अनुशासन रखेगी । यह देखकर मैं खुशी से भागती हुई कक्षा में आई और मेज़ पर खड़े होकर ज़ोर-ज़ोर से हाथ हिलाते हुए बोली "चलो बच्चों खुश हो जाओ, आज ड्रम नहीं आया है" । उसी समय सतनाम मैम बोलीं, शालिनी नीचे उतरो मैं यहीं खड़ी हूँ । मेरे ऊपर तो घड़ों पानी पड़ गया । उस दिन के बाद से वे कक्षा में आते ही मुझे आगे खड़ा कर देती थीं जिससॆ मैं कुछ शैतानी न कर पाऊँ । आज 20 साल बाद भी मुझे यह घटना याद आती है तो हँसी रोकना मुश्किल हो जाता है।<br /><br />ऐसे थे वे स्कूल के दिन, खुशी, मस्ती और बेफिक्री से भरे । सच ही है कि विद्यार्थी जीवन सब से अच्छा होता है । स्कूल और ज़िंदगी में फर्क बताते हुए किसी ने कहा है कि स्कूल में पहले सबक सिखाया जाता है और फिर परीक्षा ली जाती है पर ज़िंदगी पहले परीक्षा लेती है फिर सबक सिखाती है।<br />(शिक्षक दिवस पर मेरी सभी अध्यापिकाओं को सादर समर्पित)<div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/16245948-112591984468242210?l=1jharokha.blogspot.com'/></div>शालिनी नारंगhttp://www.blogger.com/profile/07725139668070862028noreply@blogger.com1tag:blogger.com,1999:blog-16245948.post-1125729324450592742005-09-03T12:05:00.000+05:302005-09-03T13:02:24.910+05:30कुछ पंक्तियाँ<span style="font-size:130%;"><span style="color:#663300;"><span style="font-family:Mangal;">नमस्कार दोस्तों, मेरे पन्ने में आपका स्वागत है ।</span><br /></span></span><span style="font-family:Mangal;">मेरी लिखी हुई कुछ पंक्तियाँ आपके सामने प्रस्तुत हैं जो अलग-अलग मनोस्थितियों को दर्शाती हैं ।</span><br /><span style="font-family:Mangal;"></span><br /><span style="font-family:Mangal;">सुबह उठने से रात सोने तक, हर वक्त काम ही काम है</span><br /><span style="font-family:Mangal;">अरमानों का यह हश्र देखकर, न चैन न ही आराम है ।</span><br /><span style="font-family:Mangal;">शायद कभी यह मसरुफ़ियत खत्म होगी,</span><br /><span style="font-family:Mangal;">और हँसी फिर से मेरी हमदम होगी ।</span><br /><span style="font-family:DV-TTSurekhEN;font-size:180%;"></span><br /><span style="font-family:DV-TTSurekhEN;font-size:180%;"></span><br /><span style="font-family:Mangal;">जल रही हैं आँखें, सिर भी है भारी</span><br /><span style="font-family:Mangal;">यह तो है आजकल बड़ी कॉमन बीमारी ।</span><br /><span style="font-family:Mangal;">दिल्ली जो कभी शान थी, अब है प्रदूषण की मारी</span><br /><span style="font-family:Mangal;">चारों तरफ वाहनों का कोलाहल है भारी ।</span><br /><span style="font-family:Mangal;">ऐसे में कोई क्या करे, किससे कहे</span><br /><span style="font-family:Mangal;">क्योंकि सभी की तो जल रही हैं आँखें</span><br /><span style="font-family:Mangal;">और सिर भी है भारी ।</span><br /><span style="font-family:DV-TTSurekhEN;font-size:180%;"></span><br /><span style="font-family:DV-TTSurekhEN;font-size:180%;"></span><br />When the sun sets<br />Birds rest in their nests<br />Time to go home comes<br />Then my heart jumps<br />Not because I have to go home<br />But coz I am not alone<br />You are there always<br />To make me feel that way<br />All your care and affection<br />Like a mirror I give reflection<br />May God bless us with a life of dignity<br />And you remain mine till the eternity.<div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/16245948-112572932445059274?l=1jharokha.blogspot.com'/></div>शालिनी नारंगhttp://www.blogger.com/profile/07725139668070862028noreply@blogger.com2